एक हसीना एक दीवाना: भाग 1- क्या रंग लाया प्रभात और कामिनी का इश्क ?

जिस कामिनी को पूरे 3 साल तक कहांकहां नहीं ढूंढ़ा, वह एक दिन अचानक खुद सामने आ जाएगी, प्रभात ने ऐसा कभी नहीं सोचा था. प्रभात एक सरकारी बैंक में अफसर था. उस दिन वह अपने काम में मसरूफ था कि किसी औरत की आवाज कानों में सुनाई पड़ी, तो उस ने मुड़ कर देखा. कामिनी बोली, ‘‘कैसे हो प्रभात?’’

प्रभात ने सिर उठा कर देखा, तो वह खुशी से झूम उठा. उस के  सामने उस की प्रेमिका कामिनी खड़ी थी. प्रभात का दिल हुआ कि वह लोकलाज की परवाह न करते हुए कामिनी को बांहों में भर ले, मगर वह ऐसा न कर सका. उस से पूछा, ‘‘मुझे छोड़ कर तुम कहां चली गई थीं?’’

‘‘मेरे लिए तुम अब भी तड़प रहे हो? क्या तुम ने अब तक शादी नहीं की?’’ कामिनी ने पूछा.

‘‘तुम अच्छी तरह जानती हो कि मेरी चाहत तुम हो, फिर मैं किसी और के साथ शादी कैसे कर सकता हूं?’’

‘‘ऐसी बात है, तो मैं तुम्हारी चाहत जरूर पूरी करूंगी. मैं यहां एक काम से आई थी. तुम्हें देख कर तुम्हारे पास आ गई. मेरा घर पास में ही है. तुम ऐसा करो कि अपना काम खत्म कर के मेरे साथ चलो. वहां पर आराम से बातें करेंगे. बैंक में मेरा जो काम है, वह किसी दूसरे दिन कर लूंगी.’’

प्रभात ने कामिनी को ऊपर से नीचे तक बडे़ ही गौर से देखा. गुलाबी रंग की साड़ी और मैचिंग ब्लाउज में वह बड़ी खूबसूरत दिख रही थी. प्रभात का उसे पाने के लिए मन मचल गया.

प्रभात ने कहा, ‘‘तुम कहो, तो मैं अभी छुट्टी ले कर चलूं?’’

यह सुन कर कामिनी मुसकरा उठी, फिर बोली, ‘‘इतने उतावले क्यों हो रहे हो? अब तो तुम्हारी चाहत पूरी हो ही जाएगी. फिलहाल तो तुम अपना काम निबटा लो. मैं कहीं बैठ जाती हूं.’’

‘‘अच्छा यह बताओ कि तुम बैंक में किस काम से आई थीं?’’

‘‘अपना काम शुरू करने के लिए मुझे इस बैंक से अच्छाखासा लोन लेना है. मगर अभी तो तुम मेरे घर चलो.’’

इस के बाद कामिनी सोफे पर जा कर बैठ गई. प्रभात अपना काम खत्म करने में लग गया.

प्रभात बिहार के एक गांव का रहने वाला था. गांव के स्कूल से 12वीं जमात पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वह शहर के कालेज में दाखिल हुआ, तो वहां कामिनी से उस की मुलाकात हुई.

कामिनी भी 12वीं जमात पास करने के बाद 2 दिन पहले ही कालेज में दाखिल हुई थी. कामिनी इतनी ज्यादा खूबसूरत थी कि प्रभात अपने दिल पर काबू न रख सका. उस ने मन ही मन निश्चय किया कि वह हर हाल में उस से शादी करेगा. फिर तो उसी दिन से वह उस के आगेपीछे लट्टू की तरह नाचने लगा था.

ऐसी बात नहीं थी कि कामिनी की खूबसूरती पर सिर्फ प्रभात ही मरता था. कालेज के ज्यादातर लड़के उस पर अपनी जान छिड़कते थे, मगर बाजी प्रभात के हाथ लगी. 6 महीने बाद प्रभात को लगा कि अगर उस ने अपने दिल की बात कामिनी से नहीं कही, तो कोई दूसरा लड़का बाजी मार ले जाएगा.

आखिरकार हिम्मत कर के एक दिन प्रभात ने कामिनी से कहा, ‘‘मैं तुम्हें प्यार करता हूं. ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘मैं जानती हूं कि तुम मुझे प्यार करते हो. मैं भी तुम्हें प्यार करती हूं, मगर शादी मैं तभी करूंगी, जब मुझे कोई अच्छी सी नौकरी मिल जाएगी.’’

‘‘मैं भी अपने मांबाप का एकलौता बेटा हूं. मेरी कोई बहन नहीं है. हमारे पास खेती के लिए 80 एकड़ से ज्यादा की जमीन है. उस से हमारा गुजारा मजे से हो जाएगा, फिर तुम्हें नौकरी की क्या जरूरत है?’’ प्रभात ने पूछा.

‘‘मैं गुजारा नहीं करना चाहती, शानशौकत की जिंदगी जीना चाहती हूं. फिर तुम जिस जमीन की बात कर रहे हो, वह तुम्हारी नहीं तुम्हारे पुरखों की है. मैं चाहती हूं कि मेरा होने वाला पति अपने पैरों पर खड़ा हो.’’

‘‘ठीक है, मैं किसानी नहीं करूंगा. गे्रजुएशन होने के बाद मैं कहीं नौकरी कर लूंगा. मगर तुम क्यों नौकरी करना चाहती हो?’’

‘‘मैं अपने पति पर निर्भर नहीं रहना चाहती. मैं खुद पैरों पर खड़ी हो कर अपनी जरूरतें पूरी करना चाहती हूं, इसलिए मैं ने तय किया है कि मैं उसी से शादी करूंगी, जो मेरे रास्ते में दीवार नहीं खड़ी करेगा.’’

‘‘अगर तुम मुझ से प्यार करते हो और मुझ से शादी करना चाहते हो, तो तुम्हें मेरी नौकरी मिलने तक इंतजार करना होगा.’’

प्रभात कामिनी की बात सुन कर राजी हो गया. उस दिन के बाद से प्रभात ने शादी की बात कभी नहीं की. पहले की तरह दोनों एकदूसरे से मिलते रहे. इस तरह ढाई साल बीत गए.

इस के बाद प्रभात मुसीबत में फंस गया. हुआ यह कि एक दिन अचानक उस के पिता ने उसे एक लड़की दिखा कर उस से शादी करने के लिए कहा.

प्रभात कामिनी के सिवा किसी और से शादी नहीं करना चाहता था, इसलिए लड़की के घर से अपने घर आते ही उस ने पिता को कामिनी के बारे में सबकुछ बता दिया.

प्रभात ने अपने पिता को यह चेतावनी भी दी कि अगर कामिनी से उस की शादी नहीं हुई, तो वह खुदकुशी कर लेगा.

प्रभात के पिता ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं थे, मगर समझदार थे. वे बेटे का जुनून समझ गए. 2-3 दिनों तक सोचने के बाद उन्होंने प्रभात से कहा, ‘‘पहले कामिनी से मुझे मिलाओ. उस से बात करने के बाद ही उस के घर वालों से बात करूंगा.’’

यह सुन कर प्रभात खुश हो गया. वह उसी दिन कामिनी से बात कर लेना चाहता था, मगर उस दिन कामिनी कालेज नहीं आई थी. प्रभात ने फोन किया, लेकिन उस का मोबाइल फोन स्विच औफ था.

प्रभात परेशान हो गया. उस ने बारबार कामिनी को फोन किया, मगर उस का फोन नहीं लगा. अगले दिन भी कामिनी कालेज नहीं आई, तो उस की परेशानी और बढ़ गई.

प्रभात ने कामिनी की 3-4 सहेलियों से बात की. सभी ने यही कहा कि कामिनी का फोन स्विच औफ है, इसलिए पता नहीं कि वह कालेज क्यों नहीं आ रही है.

तीसरे दिन भी कामिनी कालेज नहीं आई, तो प्रभात उस के घर चला गया.

कामिनी का अपना घर दूरदेहात में था. शहर में वह बूआ के साथ रहती थी. बूआ का घर कालेज से 5 किलोमीटर दूर था. कामिनी बस से कालेज आतीजाती थी.

कामिनी की बूआ से प्रभात बहाने से मिला. बूआ ने बताया कि कामिनी की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, इसलिए उसे गांव आना पड़ा.

कामिनी को देखे बिना प्रभात को चैन नहीं मिलने वाला था, इसलिए बूआ से गांव का पता ले कर अगले दिन ही वह मोटरसाइकिल से उस के गांव चला गया.

कामिनी का गांव शहर से 60 किलोमीटर दूर था. गांव की एक बुजुर्ग औरत की मदद से प्रभात कामिनी से एक सुनसान जगह पर मिला.

कामिनी के आते ही प्रभात उस पर बरस पड़ा था, ‘‘फोन पर असलियत बता दी होती, तो मुझे इतना परेशान नहीं होना पड़ता. जानती हो कि एक दिन भी मैं तुम्हें नहीं देखता हूं, तो बेचैन हो जाता हूं. तुम ने अपना फोन भी बंद कर रखा है.’’

कामिनी ने समझाबुझा कर पहले प्रभात का गुस्सा शांत किया, उस के बाद कहा, ‘‘मैं ने फोन बंद नहीं किया था. शहर से गांव आते समय हाथ से छूट कर मोबाइल फोन जमीन पर गिर जाने के चलते खराब हो गया था. तब से बंद पड़ा है. अब शहर जा कर ही फोन को ठीक कराऊंगी.’’

‘‘अच्छा… अब तुम जाओ. यह शहर नहीं गांव है. अगर किसी ने तुम्हारे साथ मुझे देख लिया और मेरे घर वालों को बता दिया, तो मेरी पढ़ाई बंद कर दी जाएगी. तब मेरा सपना भी पूरा नहीं होगा.

‘‘अगर मेरा सपना पूरा नहीं होगा, तो मैं तुम से शादी नहीं कर पाऊंगी. 3-4 दिन बाद मां की तबीयत बिलकुल ठीक हो जाएगी, तो मैं कालेज आ जाऊंगी.’’

कामिनी वहां से चली जाना चाहती थी, लेकिन प्रभात ने उसे जाने नहीं दिया. उस ने कहा, ‘‘दरअसल, मैं तुम्हें एक बात बताने आया हूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘मैं ने तुम्हारे बारे में अपने मातापिता को बता दिया है. वे तुम से मिलना चाहते हैं. तुम से बात करने के बाद ही वे तुम्हारे घर वालों से शादी की बात करेंगे.’’

‘‘क्या बकवास कर रहे हो तुम? मैं ने पहले ही तुम्हें बताया था कि मैं शादी तभी करूंगी, जब मुझे कोई अच्छी नौकरी मिल जाएगी.’’

‘‘अभी शादी करने के लिए मैं कहां कह रहा हूं. तुम मेरे पिता से मिल लो, बात कर लो. शादी तभी करना, जब तुम्हें नौकरी मिल जाए.’’

‘‘मैं अभी तुम्हारे घर वालों से नहीं मिलूंगी. तुम भी मेरे घर वालों से मिलने की कोशिश मत करो. अगर ऐसा करोगे, तो मैं तुम से संबंध तोड़ लूंगी.

‘‘तुम नहीं जानते कि हम कितने गरीब हैं. मेरे पिता बड़ी मुश्किल से मेरी पढ़ाई का खर्च उठा रहे हैं. मेरे पिता के पास कुछ नहीं है. वे मजदूरी कर के परिवार को पाल रहे हैं. मेरी 3 और बहनें हैं. वे तीनों मुझ से छोटी हैं. उन के प्रति भी मेरी जिम्मेदारी है.’’

उस के बाद कामिनी रुकी नहीं. प्रभात ठगा सा वहीं खड़ा रह गया. उस रात प्रभात को नींद नहीं आई. कामिनी की बात से उसे एहसास हो गया था कि वह 4-5 साल से पहले शादी नहीं करेगी.

कामिनी के घर से लौटने के बाद प्रभात ने शादी करने की उस की शर्त पिता को बता दी.

पिता ने बगैर देर किए अपना फैसला प्रभात को सुना दिया था. उन्होंने कहा, ‘‘अब तुम कामिनी को हमेशाहमेशा के लिए भूल जाओ.

‘‘जिस लड़की को मैं ने तुम्हें दिखाया है, 5-6 महीने में उस से शादी कर लो और गे्रजुएशन के बाद खेती में जुट जाओ. अपनी जमीन रहते तुम्हें नौकरी करने की कोई जरूरत नहीं है.’’

प्रभात कामिनी से ही शादी करना चाहता था, मगर पिता का विरोध भी नहीं करना चाहता था. वह कोई ऐसा रास्ता निकालना चाहता था, जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

कामिनी से शादी करने का प्रभात को  जब कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ा, तो उस ने कामिनी से जिस्मानी रिश्ता बनाने का फैसला किया. उसे लगा कि रिश्ता हो जाने के बाद कामिनी अपनी शर्त भूल जाएगी और उस से शादी कर लेगी.

आगे पढ़ें- क्या प्रभात कामिनी के साथ जिस्मानी रिश्ता बना पाया?

लेखक- राम महेंद्र राय

थ्रेडिंग के बाद होने वाले पिंपल से बचें ऐसे

थ्रेडिंग आईब्रो पर मौजूद बालों को हटाने का पुराना तरीका है, जिसका इस्‍तेमाल काफी पहले से किया जा रहा है. थ्रेडिंग लगभग सभी तरह की स्किन की जाती है, चाहे आपकी स्किन सेंसिटिव क्‍यों न हो. वैक्सिंग जैसे विकल्‍प की तुलना में थ्रेडिंग एक बेहतर औप्शन है, क्‍योंकि यह स्किन की परत को दूर नहीं करती. लेकिन कभी-कभी खासकर सेंसिटिव स्किन पर थ्रेडिंग करवाने के बाद पिंपल्‍स, चकते या स्किन में लालिमा आ जाती है. अगर आपकी भी यही प्रौब्लम है तो ये टिप्स आपके लिए मददगार साबित हो सकते हैं.

 1. थ्रेडिंग से पहले फेस को करें क्लीन

थ्रेडिंग करवाने से पहले फेस को धोकर अच्‍छे से पोंछ लें. स्किन को गुनगुने पानी से धोने पर ज्‍यादा फायदा होता है. इससे थ्रेडिंग करवाते समय दर्द कम होगा और आप फ्रेश फील करेगी. फिर एक कौटन का साफ कपड़ा लेकर अपने फेस को हल्‍के हाथों से पोंछ लें. क्‍योंकि रगड़कर पोंछने से आपकी स्किन  ड्राई हो सकती है.

 2. थ्रेडिंग से पहले होममेड टोनर का करें इस्तेमाल

अब घरेलू टोनर लगाकर अपने फेस को हल्‍का नम कर दें. दाने वाली स्किन  के लिए विच हेजल जडी़ बूटी से बना टोनर अच्‍छा रहता है. आप चाहें तो दालचीनी की चाय को टोनर के रूप में लगा सकते हैं. अब पार्लर में जाकर थ्रेडिंग बना लें.

3. थ्रेडिंग करवाने के बाद ये टिप्स अपनाएं

टोनर को आईब्रो पर लगाकर बर्फ लगाएं. इससे आपको जलन और संक्रमण नहीं होता है. अगर आप अपना चेहरा धोना चाहती हैं तो गुलाब जल से धोयें. यह प्राकृतिक जल, आईब्रो पर लगने वाले कट को सही कर देता है और दाने व पिंपल भी सही हो जाते हैं.

4. 12 से 24 घंटे के बीच थ्रेडिंग वाले हिस्‍से को न छूएं

सुनिश्चित करें कि थ्रेडिंग करवाने के बाद 12 से 24 घंटे के बीच थ्रेडिंग वाले हिस्‍से को न छूएं. ऐसा करने से वहां पिंपल्‍स, चकते या जलन पैदा हो सकती है. कोशिश करें थ्रेडिंग के तुरंत बाद किसी भी प्रकार के स्‍टीम ट्रीटमेंट से बचें.

5. कैमिकल वाले कौस्मैटिक से बचना है जरूरी

अपने फेस पर थ्रेडिंग करवाने के बाद, उस हिस्‍से में कम से कम 12 घंटे की अवधि के दौरान एसिड की मौजूदगी वाले सुगांधित कौस्‍मेटिक उत्‍पाद जैसे क्‍लींजर और मौइश्चराइजर न लगाये. ऐसा इसलिए क्‍योंकि यह एसिडिक उत्‍पाद स्किन  की बाहरी परत को हटा देते हैं. बाल हटाने के बाद इन्‍हें इस्‍तेमाल करने से प्रतिकूल प्रतिक्रिया हो सकती है, खासकर अगर आपकी संवेदनशील स्किन  है तो.

प्रैगनैंसी टालें पर एक सीमा तक

आज कई महिलाएं अपना कैरियर बनाने और अपनी फिगर मैंटेन रखने के चलते प्रैगनैंसी को टालती रहती हैं. और जब प्रैगनैंट होना चाहती हैं, तो कई तरह की परेशानियां उन के प्रैगनैंट होने में बाधक बन जाती हैं.

‘‘अनुज, आखिर क्यों यह निर्णय हम ने पहले नहीं लिया? कैरियर और पैसा कमाने के चक्कर में आज मैं मां बनने के लिए तरस रही हूं,’’ एक वर्किंग वूमन ने अपने पति से कहा.

‘‘नेहा, तुम चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा,’’ पति ने उसे सांत्वना दी.

‘‘लेकिन कैसे अनुज? कितने ही डाक्टरों को दिखाया पर सब का वही जवाब कि आप चिंता मत कीजिए. पर हमारी शादी को 6 वर्ष बीत गए. काश, यह फैसला हम ने पहले लिया होता,’’ अब नेहा को अपने फैसले पर अफसोस था.

यदि उम्र ज्यादा हो जाए तो कंसीविंग में काफी अड़चनें आ जाती हैं. इस के पीछे स्त्री रोग विशेषज्ञा डा. नूपुर पगौड़े ने कुछ कारण बताए:

प्रैगनैंसी टालने के कारण

– आजकल इस समस्या में ज्यादा बढ़ोतरी देखी जा रही है. इस का कारण है, देर से शादी याशादी के बाद ऐंजौयमैंट को प्राथमिकता देते हुए बच्चा पैदा न करना.

– कैरियर बनाने, सही मुकाम पाने, सफलता पाने के चक्कर में जल्दी बच्चा पैदा न करने की जिद.

– अच्छा घर, लग्जरी कार, घर में हर आरामदायक वस्तु का होना. सुविधा की वस्तुएं होंगी तभी तो लाइफस्टाइल अच्छा होगा, स्टेटस बनेगा. इस होड़ में बच्चे से पहले इन वस्तुओं को प्राथमिकता दी जाती है.

– फिगर खराब न हो जाए, इस के चलते भी प्रैगनैंसी को टाला जाता है.

– औफिस में क्या इंप्रेशन पड़ेगा, यदि इतनी जल्दी बच्चा हो जाएगा. यह सोच कर भी जल्दी बच्चे का होना टाला जाता है.

– कई लड़कियां अपने औफिस में अपनी शादी छिपाती हैं, इसलिए भी जल्दी बच्चा पैदा करने से कतराती हैं.

– इस के अलावा कुछ शारीरिक परेशानियों के चलते भी प्रैगनैंसी टाली जाती है. जैसे किसी को टीबी है या कोई अन्य बीमारी है तो डाक्टर ही जल्दी बच्चे पैदा न करने की सलाह देते हैं.

– अंडाणु का न बन पाना, फैलोपियन ट्यूब खराब होना और शुक्राणु के विकार के कारण भी प्रैगनैंसी में बाधा आती है.

– कुपोषण, तनाव, प्रदूषण, मोटापा जैसी समस्याएं भी कुछ हद तक प्रैगनैंसी में बाधा उत्पन्न करती हैं.

गर्भधारण की सही उम्र

इन्हीं कारणों की वजह से महिलाएं गर्भधारण करने से या तो बचती हैं या मजबूरी में नहीं कर पातीं, जिस की वजह से एक उम्र के बाद गर्भधारण में बहुत सी मुश्किलें आने लगती हैं.

सामान्य रूप से गर्भधारण की सही उम्र अमूमन 30-32 से पहले ही मानी जाती है. लेकिन कैरियर बनाने या अन्य कारणों के चलते 30-32 साल की उम्र तो यों ही बीत जाती है और जब महिलाएं प्रैगनैंट होना चाहती हैं तो काफी दिक्कतें आती हैं.

आज की युवा पीढ़ी बंधन नहीं चाहती. नए दंपती अपनीअपनी जिंदगी जीने में विश्वास रखते हैं. ऐसे में बच्चा एक आफत लगता है. और जब मां बनने की सुध आती है, तब तक या तो देर हो चुकी होती है या किसी अन्य कारण से गर्भधारण में परेशानी आती है.

इस तरह सभी को या तो बच्चा होने से पहले या बच्चा होने के बाद किसी न किसी तरह की परेशानी का सामना करना पड़ता है. लेकिन यदि देखा जाए तो दोनों ही हालात में पतिपत्नी को ज्यादा समझदारी दिखाने की जरूरत होती है.

स्नैक्स में परोसें मसूर दाल कबाब

फेस्टिव सीजन में अगर आप स्नैक्स की रेसिपी सोच रही हैं तो मसूर दाल के कबाब की ये आसान रेसिपी ट्राय करना ना भूलें. ये हेल्दी और टेस्टी रेसिपी है, जिसे आप अपने बच्चों से लेकर मेहमानों को आसानी से खिला सकते हैं.

सामग्री

1/2 कप मसूर दाल साबूत

1 बड़ा चम्मच अदरक,

हरीमिर्च और लहसुन का पेस्ट

1/4 कप पनीर कद्दूकस किया

1/4 कप प्याज बारीक कटा

1 बड़ा चम्मच पुदीनापत्ती कटी

1 छोटा चम्मच धनियापत्ती कटी

2 बड़े चम्मच ब्रैडक्रंब्स

1 बड़ा चम्मच भुने चनों का आटा

कबाब सेंकने के लिए थोड़ा सा रिफाइंड औयल

चाटमसाला व नमक स्वादानुसार.

विधि

दाल को 2 घंटे पानी में भिगोएं. फिर पानी निथार कर 4 बड़े चम्मच पानी के साथ प्रैशरकुकर में 1 सीटी आने के बाद 2 मिनट धीमी आंच पर रखें. आंच बंद कर दें. दाल गल जानी चाहिए और पानी नहीं रहना चाहिए. दाल को मैश कर के सारी सामग्री मिलाएं और छोटेछोटे कबाब बना कर नौनस्टिक तवे पर तेल लगा कर सेंक लें. प्याज के छल्लों, चटनी व सौस के साथ सर्व करें.

रिश्ता: क्या सही था माया का फैसला

रात के ढाई बजे हैं. मैं जानती हूं आज नींद नहीं आएगी. बैड से उठ कर चेयर पर बैठ गई और बैड पर नजर डाली. राकेश आराम से सोए हैं. कभीकभी सोचती हूं यह व्यक्ति कैसे जीवन भर इतना निश्चिंत रहा? सब कुछ सुचारु रूप से चलते जाना ही जीवन नहीं है. खिड़की से बाहर दूर चमकती स्ट्रीट लाइट पर उड़ते कुछ कीड़े, शांत पड़ी सड़क और हलकी सी धुंध नजर आती है जो फरवरी माह के इस समय कम ही देखने को मिलती है. अचानक जिस्म में हलचल होने लगी. ड्रैसिंग रूम में आईने के सामने गाउन उतार कर खड़ा होना अब भी अच्छा लगता है. अपने शरीर को किसी भी युवती की ईर्ष्या के लायक महसूस करते ही अंतर्मन में छिपे गर्व का एहसास चेहरे छा गया. कसी हुई त्वचा, सुडौल उन्नत वक्ष, गहरी कटावदार कमर, सपाट उभार लिए कसा हुआ पेट, चिकनी चमकदार मांसल जांघें, सुडौल नितंब, दमकता गुलाबी रंग और चेहरे पर गहराई में डुबोने वाली हलकी भूरी आंखें, यही तो खूबियां हैं मेरी. अचानक अर्जुन के कहे शब्द याद आने से चेहरे पर मुसकान कौंधी फिर लाचारी का एहसास होने लगा. सच मैं उस के साथ कितना रह सकती  हूं.

अर्जुन ने कहा था, ‘‘रिश्ते आप के जीवन में पेड़पौधों से आते हैं. जिन में से कुछ पहले से होते हैं, कुछ अंत तक आप के साथ चलते हैं, तो कुछ मौसमी फूलों की तरह बहुत खूबसूरत तो होते हैं, लेकिन सिर्फ एक मौसम के लिए.’’

‘‘और तुम कौन सा पेड़ हो मेरे जीवन में,’’ मैं ने मुसकरा कर उसे छेड़ा था.

‘‘मुझे गन्ना समझिए. एक बार लगा है तो 3 साल काम आएगा.’’

‘‘फिर जोर से हंसे थे हम. अर्जुन बड़ा हाजिरजवाब था. उस का ऐसा होना उस की बातों में अकसर झलक जाता था. 3 साल से उस का मतलब हमारे 3 साल बाद वापस लुधियाना जाने से था.

अर्जुन कैसे धीरेधीरे दिमाग पर छाता चला गया पता ही न चला. मिला भी अचानक ही था, पाखी की बर्थडे पार्टी में. वहां की भीड़ और म्यूजिक का शोर थका देने वाला था. मैं साइड में लगे सोफे पर बैठ गई थी. कुछ संयत होने पर बगल में नजर गई तो देखा पार्टी से बिलकुल अलग लगभग 24-25 वर्ष का आकर्षक युवक आंखें बंद किए और पीछे सिर टिकाए आराम से सो रहा था. तभी दीपिका आ कर बोली, ‘‘थक गईं दीदी?’’ फिर उस की नजर सोए उस युवक पर गई, तो वह बोली, ‘‘तुम यहां सोने आए हो…’’ फिर उस ने उस का चेहरा अपने एक हाथ में पकड़ जोर से हिला दिया.

‘‘ओ भाभी, मैं तो बस आंखें बंद किए बैठा था,’’ कह कर वह मुसकराया फिर हंस पड़ा.

‘‘मीट माया दीदी, अभी इन के हसबैंड ट्रांसफर हो कर यहां आए हैं और दीदी ये है अर्जुन रोहित का फ्रैंड,’’ दीपिका ने परिचय कराया था.

‘‘लेकिन रोहित के हमउम्र तो ये लगते नहीं,’’ मैं ने कहा.

‘‘रोहित से 8 साल छोटा है, लेकिन उस का बेहतरीन फ्रैंड और सब का फैं्रड है,’’ फिर बोली, ‘‘अर्जुन दीदी का खयाल रखना.’’

‘‘अरे मुझे यहां से कोई उठा कर ले जाने वाला है, पर क्या?’’ मैं ने दीपिका से कहा.

मैं इसे आप को कंपनी देने के लिए कह रही हूं,’’ कह कर दीपिका मुसकराई फिर बाकी गैस्ट्स को इंटरटैन करने के लिए चली गई. मैं ने अर्जुन की ओर देखा, वह दोबारा सो गया था.

रकेश का ट्रांसफर लुधियाना से हम यहां होने पर मेरठ आए थे. दीपिका के इसी शहर में होने से यहां आनाजाना तो बना ही रहा था, लेकिन व्यवस्थित होने के बाद अकेलापन सालने लगा था. पल्लवी कितनी जल्दी बड़ी हो गई थी. वह इसी साल रोहतक मैडिकल कालेज में ऐडमिशन होने से वहीं चली गई थी. गाउन पहन मैं वापस कमरे में आ कर चेयर पर आ बैठ गई. बैड पर सिमटे हुए राकेश को देख कर लगता है कितना सरल है जीवन. यदि राकेश की जगह अर्जुन बैड पर होता तो लगता जीवन कितना स्वच्छंद और गतिशील है  अर्जुन दूसरी बार भी दीपिका के घर पर ही मिला था. वह डिनर के वक्त एक बहुत ही क्यूट छोटा व्हाइट डौगी गोद में लिए अचानक चला आया था. आ कर उस ने डौगी पाखी की गोद में रख दिया. इतना प्यारा डौगी देख पाखी और राघव तो बहुत खुश हो गए थे.

‘‘इसे कहां से उठा लाए तुम?’’ दीपिका ने पूछा.

‘‘पाखी, राघव बहुत दिनों से कह रहे थे, अब मिला तो ले आया.’’

‘‘मुझे से भी तो पूछना चाहिए था,’’ दीपिका ने प्रतिवाद किया

‘‘मुझे ऐसा नहीं लगा,’’ अर्जुन ने मुसकरा कर कहा.

‘‘रोहित यह लड़का…समझाओ इसे, डौगी वापस ले कर जाए.’’

‘‘तुम भी जानती हो डौगी यहीं रहने वाला है, इसे प्यार से ऐक्सैप्ट करो,’’ रोहित ने कहा.

फिर सभी डिनर टेबल पर आ गए.

‘‘अर्जुन, तुम राकेश से मिले नहीं शायद. यह शास्त्रीनगर ब्रांच में ब्रांच मैनेजर हो कर पिछले महीने ही मेरठ आए हैं और भाईसाब यह अर्जुन है,’’ रोहित ने परिचय कराया, अर्जुन ने खामोशी से हाथ जोड़ दिए.

‘‘आप क्या करते हैं?’’ राकेश ने उत्सुकता से पूछा था.

‘‘जी कुछ नहीं.’’

‘‘मतलब, पढ़ाई कर रहे हो?’’ आवाज से सम्मान गायब हो गया था.

‘‘इसी साल पीएच.डी. अवार्ड हुई है.’’

‘‘अच्छा अब लैक्चरर बनोगे,’’

‘‘जी नहीं…’’

तभी बीच में रोहित बोल पड़ा, ‘‘भाईसाहब यह अभी भी आप के मतलब का आदमी है. इस के गांव में आम के 3 बाग, खेत, शहर में दुकानों और होस्टल कुल मिला कर ढाईतीन लाख रुपए का मंथली ट्रांजैक्शन है, जिसे इस के पापा देखते हैं इन का सीए मैं ही हूं.’’

‘‘गुड, इन का अकाउंट हमारे यहां कराओ, राकेश चहका.’’

‘‘कह दूंगा इस के पापा से,’’ रोहित ने कहा.

‘‘हमारे घर आओ कभी,’’ राकेश ने अर्जुन से कहा.

‘‘जी.’’

‘‘यह डिफैंस कालोनी में अकेला रहता है,’’ दीपिका ने कहा फिर अर्जुन से बोली, ‘‘तुम दीदी को बाहर आनेजाने में हैल्प किया करो. रक्षापुरम में घर लिया है इन्होंने.’’

‘‘जी.’’

मुझे बाद में पता चला था शब्दों का कंजूस अर्जुन शब्दों का कितना सटीक प्रयोग जानता है. रात के 3 बजे हैं. सब कुछ शांत है. ऐसा लग रहा है जैसे कभी टूटेगा ही नहीं. बांहों के रोम उभर आए हैं. उन पर हथेलियां फिराना भला लग रहा है. अगर यही हथेलियां अर्जुन की होतीं तो उष्णता होती इन में, शायद पूरे शरीर को झुलसा देने वाली.

हमेशा ही तो ऐसा लगता रहा, जब कभी अर्जुन की उंगलियां जिस्म में धंसी होती थीं तब कितना मायावी हो जाता था. सच में सभी पुरुष एक से नहीं होते. तनमन, यौवन सभी तो, फर्क होता है और उस से भी अधिक फर्क इन तीनों के संयोजन और नियत्रंण में होता है. किशोरावस्था से ही देखती आई हूं पुरुषों की कामनाओं और अभिव्यक्तियों के वैविध्य को. समय से हारते अपने प्यार सचिन की लाचारी आज तक याद है. उस रोमानियत में बहते न उस ने न कभी मैं ने ही सोचा था कि अचानक खुमार ऐसे टूट आएगा. अभी ग्रैजुएशन का सैकंड ईयर चल ही रहा था कि मां को मेरी सुरक्षा मेरे विवाह में ही नजर आई. कितना बड़ा विश्वास टूटा था हम सब का. डैड की जाफना में हुई शहादत के बाद अपने भाइयों का ही तो सहारा था मां को. उन्हीं के भरोसे वे अपनी दोनों बेटियों के साथ देहरादून छोड़ सहारनपुर आ कर अपने मायके में रहने लगी थीं. सब कुछ ठीक चला. नानानानी और तीनों मामाओं के भरोसे हमारा जीवन पटरी पर लौटा था, लेकिन फिर भयावाह हो कर खंडित हो गया.

मां दीपिका को ले कर चाचाजी के घर गई थीं जबकि गरमी के उन दिनों अपने ऐग्जाम्स के कारण मैं नहीं जा सकी थी, इसलिए नानाजी के घर पर थी. नानानानी 3 मामाओं और 3 मामियों व बच्चों वाला उन का बड़ा सा घर मुझे भीड़भाड़ वाला तो लगता था, लेकिन अच्छा भी लगता था. लेकिन वहां एक दिन अचानक मेरे साथ एक घटना घटी. उस दिन मेरे रूम से अटैच बाथरूम की सिटकनी टूटी हुई मिली. इस पर ध्यान न दे कर मैं नहाने लगी, क्योंकि उस बाथरूम में मेरे सिवा कोई जाता नहीं था. वहां अचानक जब दरवाजा खोल कर मझले मामा को नंगधडं़ग आ कर अपने से लिपटा पापा तो भय से चीख उठी थी मैं. मेरे जोर से चीखने से मामा भाग गए तो उस दिन मेरी जान बच गई, लेकिन मां के वापस लौटने पर जब मैं ने उन्हें यह बात बताई तो मां को अपनी असहाय स्थिति का भय दिनरात सालने लगा. परिणाम यह हुआ कि हम ने दोबारा देहरादून शिफ्ट किया, लेकिन मां ने उसी वर्ष मेरी शादी में मेरी सुरक्षा ढूंढ़ ली जबकि दीपिका अभी बहुत छोटी थी.

राकेश अच्छे किंतु साधारण व्यक्ति हैं, काम और सान्निध्य ही इन के लिए अहम रहा. मानसिक स्तर पर न इन में उद्वेग था न ही मैं ने कभी कोई अभिलाषा दिखाई. पल्लवी के जन्म के बाद मेरा जीवन पूरी तरह से उस पर केंद्रित हो गया था. राकेश के लिए बहुत खुशी की बात यह थी कि उन की पत्नी ग्रेसफुली घर चलाती है बच्चे को देखती है और नानुकर किए बिना शरीर सौंप देती है. कभी सोचती हूं तो लगता है यही जीवन तो सब जी रहे हैं, इस में गलती कहां है. धीरेधीरे पहचान बढ़ने पर मैं ने ही अर्जुन को घर बुलाना शुरू किया था. तब मुझे ड्राइविंग नहीं आती थी और सभी मार्केट यहां से बहुत दूर हैं. बिना कार ऐसी कालोनी में रहना दूभर होता है. कुछ भी तो नहीं मिलता आसपास. ऐसे में अर्जुन बड़ा मददगार लगा. वह अकसर मुझे मार्केट ले जाता था. मुझे दिन भर अर्जुन के साथ रहना और घूमना सब कुछ जीवन के भले पलों की तरह कटता रहा. शादी के बाद पहली बार कोई लड़का इतना निकट हुआ था, जीवन में आए एकमात्र मित्र सा. फिर सहसा ही वह पुरुष में परिवर्तित हो गया. कार चलाना सिखाते हुए अचानक ही कहा था उस ने काश आप को चलाना कभी न आए हमेशा ऐसे ही सीखती रहें. आप को छूना बहुत अच्छा लगता है.’’

दहल गई थी मैं, ‘‘पागल हो गए हो?’’ खुद को संयत रखने का प्रयास करते हुए मैं ने प्रतिवाद किया.

इन 4 महीनों में उस का व्यवहार कुछ तो समझ आने लगा था. मैं ने जान लिया कि वह वही कह रहा था, जो उस के मन में था. मैं ने कार को वापस घर की ओर मोड़ दिया. असहजता बढ़ने लगी थी. अर्जुन वैसा ही शांत बैठा था. मैं बहुत कुछ कहना चाहती थी उस से होंठ खुल ही नहीं पाए.

‘‘आउट,’’ घर पहुंचने पर कार रोक कर मैं क्रोध से बोली.

वह खामोशी से उतरा और चला गया. मैं चाहती थी वह सौरी बोले कुछ सफाई दे, लेकिन वह चुपचाप चला गया. उस के इस तरह जाने ने मुझे झकझोर दिया. बाद में घंटों उस का नंबर डायल करती रही, लेकिन फोन नहीं उठाया. अगले दिन मैं उस के घर पहुंच गई, लेकिन गेट पर ताला लगा था. फोन अब भी नहीं उठ रहा था. दीपिका से उस के बारे में पता करने का प्रयास किया तो पता चला वह कल से फोन ही नहीं उठा रहा है. धीमे कदमों से घर पहुंची. गेट के सामने अर्जुन को खड़ा पाया. दिल हुआ कि एक चांटा खींच कर मारूं इस को, लेकिन वह हमेशा की तरह शांत शब्दों में बोला, ‘‘कल मोबाइल आप की कार की सीट पर पड़ा रह गया था.’’

‘‘ओह गौड…मैं ने सिर पकड़ लिया.’’

फिर 3 साल जैसे प्रकाश गति से निकल चले. उस दिन जब घर में अर्जुन ने मुझे पहली बार बांहों में लिया था तब एहसास हुआ था कि शरीर सैक्स के लिए भी बना है. कितना बेबाक स्पर्श था उस का. अपने चेहरे पर उस के होंठ अनुभव करती मैं नवयौवना सी कांप उठी थी. उस की उंगलियों की हरकतें, मैं ने कितने सुख से अपने को सौंप दिया उसे. उस के वस्त्र उतारते हाथ प्रिय लगे. पूर्ण निर्वस्त्र उस की बांहों में सिमट कर एहसास हुआ था कि अभी तक मैं कभी राकेश के सामने भी वस्त्रहीन नहीं हुई थी. अर्जुन एक सुखद अनुभव सा जीवन में आया था. उस के साथ बने रिश्ते ने जीवन को नया उद्देश्य, नई समझ दी थी. अब जीवन को सचझूठ, सहीगलत, पापपुण्य से अलग अनुभव करना आ गया था. 3 साल बीत गए ट्रांसफर ड्यू था सो राकेश ने वापस ट्रांसफर लुधियाना करवा लिया. सामान्य हालात में यह खुशी का क्षण होता, लेकिन अब जैसे बहती नदी अचानक रोक दी गई थी. जानती हूं सदा तो अर्जुन के साथ नहीं रह सकती. परिवार और समाज का बंधन जो है. सोचती रही कि अर्जुन कैसे रिएक्ट करेगा, इसलिए एक हफ्ते यह बात दबाए रही, लेकिन कल शाम तो उसे बताना ही पड़ा. मौन, सिर झुकाए वह चला गया बिना कुछ कहे, बिना कोई एहसास छोड़े.

सुबह 8 बजे जाना है, 4 बज चुके हैं. आंखों में नींद नहीं, राकेश पहले की तरह सुख से सोए हैं. अचानक मोबाइल में बीप की आवाज. नोटिफिकेशन है अर्जुन के ब्लौग पर नई पोस्ट जो एक कविता है:

मोड़ से पहले

जहां गुलदाउदी के फूल हैं,

लहू की कुछ बूंदें

चमक रही हैं.

माली ने शायद

उंगली काट ली हो.

जब निकलोगी सुबह

रुक कर देखना,

क्या धूप में रक्त

7 रंग देता है.

नहीं तो जीवन

इंद्रधनुषी कैसे हो गया.

जब जाने लगो

देखना माली के हाथों पर,

सूखे पपड़ाए जख्म मिलेंगे

रुकना मत.

जीवन साथ लिए

जीवन सी ही निकल जाना.

मोड़ से पहले

जहां गुलदाउदी के फूल हैं ,

कुछ खत्म हुआ है

तुम्हारे सपनों सा.

पर मैं सदा ही

जीवित रहूंगा तुम्हारे सपनों में.

नुकसान उस का है जो दबा है

अडानी समूह पर बहस में कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकाअर्जुन खड़गे ने एक जगह कह दिया कि सरकार ने सारे न्यूज चैनलों के ऐंकर खरीद लिए हैं. गोदी मीडियागोदी मीडिया… सुनने वाले चैनल ऐंकरों को आमतौर पर इस तरह की सुनने की आदत है पर एक ने एक जगह पूछ लिया कि साबित कर के दिखाओ कि ऐंकरों ने एक भी पाई ली हो.

यह साबित करने की बात भी मजेदार है. ऐंकरों को यह कहना पड़ रहा है कि दूसरा पक्ष साबित करे कि वह ?ाठ बोल रहा हैअपनेआप में स्वीकारोक्ति है. जनता या नेता कोई ईडीसीबीआईएनआईए तो हैं नहीं जो आप को महीनों बंद कर के रखें कि आप की पाई को ढूंढ़ना है. यह ताकत तो उन के पास है जो पाई दे सकते हैं.

गोदी मीडिया बिका हुआ है यह तो साफ दिखता है कि वह रातदिन हिंदूमुसलिम करता हैसरकार का प्रचार करता है. प्रधानमंत्री की चुनावी रैलियों का सीधा प्रसारण घंटों तक करता है और उन के चैनल ही फ्री औफ कौस्ट सैटटौप बौक्सों से ग्राहकों तक पहुंचते हैं. किसी के बिकने का सुबूत इतना ही काफी है कि वह अमीरोंउद्योगपतियोंसब में बैठे लोगों की बातें रातदिन करे और जो लोग उन की पोल खोलें उन की बात को रिपोर्ट भी न करे.

अकसर आलोचना करने वालों से पूछा जाता है कि आप दूसरा पक्ष भी क्यों नहीं देते. सरिता’ को इस तरह सैकड़ों पत्र मिलते हैं. दूसरी तरफ की बातें यानी वे बातें जो सरकार ढिंढोरा पीट कर कह रही है और मंदिरों के प्रवचनों में रोजाना दोहराई जा रही हैंहम भी क्यों नहीं कह रहेनहीं कह रहे तो अवश्य किसी ने खरीद रखा है.

यह अजीबोगरीब तर्क है. जिस के पास पैसा वही तो खरीद सकता है. जब आप पैसे वालों की आलोचना कर रहे होपोल खोल रहे होजनता को गुमराह होने से बचा रहे होपीडि़तों से उन के अधिकारों की बात कर रहे हो तो कौन आप को खरीदेगाआप से तो हरेक को डर लगेगा कि अगर आज कुछ दे भी दिया तो कल ये उन के खिलाफ भी बोल सकते हैं.

कांग्रेस अपनेआप में पूरी तरह डिटर्जैंट से धुली हो जरूरी नहीं. वह सत्ता में 50-60 साल रही. हर कांग्रेसी ठसके वाला है. हरेक के पास घरगाडि़यांबंगले हैं पर फिर भी यदि ये लोग आज भी कांग्रेस में हैं और भाग कर भारतीय जनता पार्टी के तले नहीं चले गए तो यह साबित करता है कि इन में कुछ अभी बाकी है जो लोकतंत्रजवाबदेहीकमजोरों के अधिकारों की रक्षा कर रहे हैं.

जिस तरह से विपक्षी दलों और उन के नेताओं को बंद किया जा रहा है और बंद करते समय जिस तरह ऐंकर सुर्खियों में समाचार प्रकाशित करते हैं और जिस तरह से वे दिल्ली के उपराज्यपाल या अन्य राज्यपालों की दखलंदाजियों की खबरें पचा जाते हैंजिस तरह से वे औरतों पर हो रहे अत्याचारों की बात को 3 सैकंड में दिखा कर रफादफा कर देते हैं उस से क्या साबित करना बचता है कि ऐंकर शुद्ध हरिद्वार जल से पापरहित हो चुके हैं?

भक्तिभाव में डूबे होना भी बिकना है. हो सकता है कि चैनलों के मालिकों की श्रद्धा किसी नेता में हो क्योंकि व्यक्तिगत तौर पर किसी के अंधभक्त होंयह भी बिकना है.

आज चाहे एक जने के अधिकार व अस्तित्व की रक्षा की बात हो या सुप्रीम कोर्टचुनाव आयोगअल्पसंख्यकोंऔरतोंविचारकोंछोटे मजदूरोंकिसानों कीयदि वे समाज में घुटन महसूस कर रहे हैं तो जो भी उन का मालिक या संचालक है वह खुद बिका हुआ है या खरीद रहा है. नुकसान उस का है जो दबा है.

दसरा फिल्म रिव्यू: नानी और कीर्ति सुरेश का शानदार अभिनय

 रेटिंग: तीन स्टार

निर्माताः सुधाकर चेरीकुरी

लेखकः श्रीकांत ओडेला,  जेला श्रीनाथ, अर्जुना पुटेरी,  वामसी कृष्णा पी

निर्देशक: श्रीकांत ओडेला

कलाकारः नानी, कीर्ति सुरेश,  दीक्षित शेट्टी, शाइन टामो चाको,  समुथिरकानी,  सई कुमार,  झांसी,  शामना कासिम,  राज षेखर अनिंगी

अवधि: दो घंटे 36 मिनट

बौलीवुड में सामाजिक मुद्दे या नारी उत्थान पर बनने वाली फिल्मों को इस तरह से बनाया जाता है कि यह सारे मुद्दे गायब हो जाते हैं और यह साफ नजर आने लगता है कि फिल्मसर्जक ने इस फिल्म को किस मकसद से बनाया है. जबकि दक्षिण भारतीय सिनेमा की खासियत यह है कि वह मुद्दे वाली फिल्म को भी मनोरंजक तरीके से बनाते हैं, परिणामतः उनकी फिल्में उपदेशात्मक भी नही लगती.  इसका ताजातरीन उदाहरण पहली बार स्वतंत्र लेखक व निर्देशक बने श्रीकांत ओडेला की तेलुगू फिल्म ‘‘दसरा’’ ( दशहरा), जो कि हिंदी सहित पांच भाशाओं में 30 मार्च को प्रदर्शित हुई है.

ग्रामीण पृष्ठभूमि में नारी की मर्जी के साथ ही ‘प्यार बड़ा या हवस बड़ा’ के सवाल को उठाने वाली फिल्म ‘दसरा’ एक ऐसी एक्शन प्रधान फिल्म है, जो अंत तक लोगों को बांधकर रखती है. जी हां! एक्शन प्रधान फिल्म ‘‘दसरा’’ बिना किसी शोरशराबे या भाषणबाजी के ग्रामीण राजनीति, सरपंच का चुनाव, दोस्ती, शराब में डूबे गांव के पुरूषों के चलते गांव में विधवा औरतांे की बढ़ती संख्या, जातिगत भेदभाव, दलित व मुस्लिम एकता, विधवा औरत की मर्जी के बिना उसे मंगल सूत्र पहनाना सही या गलत सहित कई मुद्दों पर बात करती है.

फिल्म ‘‘दसरा’’ यह संदेश भी देती है कि वर्तमान हालातों में रावण (राक्षसी प्रवृत्ति के लोग ) का विनाश करने के लिए राम नही रावण (राक्षसी प्रवृत्ति ही अपनाना) ही बनना पड़ेगा. फिल्म के नायक नानी दूसरी बार हिंदी भाषी दर्षकों के समक्ष हैं. इससे पहले हिंदी भाषी दर्शकों ने नानी को 2012 में एस एस राजामौली निर्देषित फिल्म ‘ईगा’ को हिंदी में डब होकर ‘मक्खी’ के नाम से प्रदर्षित हुई फिल्म में देखा था.

शाहिद कपूर की फिल्म ‘जर्सी’ इन्हीं नानी की इसी नाम की तेलुगू फिल्म की हिंदी रीमेक थी. इस बार नानी ने अपनी फिल्म ‘दसरा’ (दशहरा) का हिंदी ट्रेलर लखनउ, उत्तरप्रदेश में रिलीज किया था.

कहानीः

ग्रामीण पृष्ठभूमि में तमिलनाड़ु, अब तेलंगाना के कोयला खनन वाले वीरलापल्ली नामक की गांव की कहानी है. कहानी उस काल की है जब एन टी रामाराव मुख्यमंत्री थे और उन्होंने शराब बंदी लागू कर दी थी. यह गांव देश के मानचित्र पर एक धब्बा है. यह ऐसा गांव है, जहां सुबह होते ही गांव के सभी पुरूश ‘सिल्क बार’ पहुंचकर शराब का सेवन करना षुरू कर देते हैं. वह कोयले की खान में काम करते हैं और इसलिए उन्हें लगता है कि शराब पीना जरूरी है.

दलित व निचली जाति के लोगों को ‘सिल्क बार’ के अंदर जाने की इजाजत नही है. परिणामतः महिलाएं शोशण का षिकार होती रहती हैं. कहानी के केंद्र में धरणी (नानी) और सूरी (दीक्षित शेट्टी) और एक लड़की वेनेला(कीर्ति सुरेश)हैं. धरणी, सूरी व वेनेला बचपन से ही जिगरी दोस्त हैं. धरणी व सूरी चलती मालगाड़ियों से कोयले की चोरी करते रहते हैं. नम्र स्वभाव का धरणी परोपकारी है और टकरावों से दूर रहने में विश्वास करता है.

धरणी,  वेनेला को बचपन से ही प्यार करता आया है. पर जवानी मे जब पता चलता है कि सूरी और वेनेला एक दूसरे से प्यार करते हैं, तो वह अपना प्यार कुर्बान कर देता है. कई वर्षों के बाद,  गाँव और बार के नियंत्रण के लिए युद्ध में दो सौतेले भाइयों,  राजन्ना (साइकुमार) और शिवन्ना  (समुथिरकरानी) के बीच अनुचित सत्ता की राजनीति से प्रेम त्रिकोण बढ़ जाता है.  षिवन्ना का बेटा नंबी  (शाइन टॉम जैकब) आक्रामक स्वभाव का है, उसकी वजह से इस गांव की दिशा व दशा ही बदल जाती है.

धरणी, सूरी व वेनेला की जिंदगी में सारी समस्याओ की जड़ हवसी नंबी (शाइन टॉम जैकब) ही है. नंबी का अस्तित्व राजनीतिक और जातिगत दबदबे के कारण है. नंबी द्वारा रची गयी हिंसा से धरनी का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और अब वह प्रतिशोध की योजना बनाने से लेकर खुद के अंदर साहस जुटाने में लग जाता है. डरपोक,  उत्तरदायित्व से जी चुराने वाला व्यक्ति धरणी अब तकदीर को मानने की बजाय कुछ कर गुजरने का फैसला ले लेता है.

लेखन व निर्देशनः

इंटरवल से पहले फिल्म की गति धीमी है. षुरूआती आधा घंटा निराशा जनक है. इंटरवल में जिस मोड़ पर फिल्म थमती है, उसे देखकर दर्षक जो कुछ सोचता है, उसके विपरीत इंटरवल के बाद कहानी न सिर्फ तेज गति से आगे बढ़ती है, बल्कि कई अलग अलग मोड़ आते हैं. तब लोगों की समझ में आता है कि इंटरवल से पहले धीमी गति से चलती हुई कहानी किस तरह किरदारों को परिभाषित करती है.

यह पटकथा लेखकों और निर्देशक का कमाल है. पटकथा लेखक व निर्देशक की खूबी यह है कि फिल्म का नाम ‘दसरा’ है, मगर क्लायमेक्स से पहले तक दर्षक के दिमाग में ‘दसरा’ (दशहरा) आता ही नही है. हम यहां याद दिला दें कि दक्षिण भारत में आज भी रावण की पूजा की जाती है. पर दशहरे के दिन रावण दहन की भी परंपरा है.

फिल्म ‘दसरा’ के सर्जक ने अपनी फिल्म की कहानी के लिए पात्र व उपमाएं हिंदू धर्म ग्रंथ ‘रामायण’ से ही चुने हैं. इंटरवल के बाद ही समझ में आता है कि धरणी, सूरी व वेनेला की जिंदगी में सारी समस्याओ की जड़ हवसी नंबी (शाइन टॉम जैकब) ही है. नंबी का अस्तित्व राजनीतिक और जातिगत दबदबे के कारण है.

फिल्म ‘दसरा’ देखकर लोगों की समझ में आएगा कि तीस साल पहले भी गांवों में किस तरह राजनीतिक प्रतिद्वंदिता व गांव का सरपंच आम लोगों का शोशण कर रहा था. फिल्म में जाति गत भेदभाव , प्रेम कहानी व दोस्ती को भी प्रभावी तरीके से उकेरा गया है.

फिल्म में फिल्म सर्जक ने जाति विभाजन के चलते सामाजिक परिणामों को अपने तीन मुख्य पात्रों के माध्यम से स्पष्ट तौर पर रेखंाकित किया है. फिल्म में सूरी व वेनेला की जाति एक ही है, जबकि धरणी की जाति अलग है. फिल्म में धरणी के हर निर्णय को सूरी के साथ अपनी प्रगाढ़ दोस्ती बताकर निर्देशक इस सवाल से जरुर बच गए कि वेनेला व सूरी एक ही जाति के हैं, इसलिए धरणी ने अपने प्यार को कुर्बान किया.

शायद इस मुद्दे से फिल्मकार खुद को अलग रखना चाहते थे. औरत की अपनी मर्जी के बिना कोई भी पुरूष उसके साथ कुछ नही कर सकता. इस पर बौलीवुड ने कई फिल्में बना डाली. जबकि इस फिल्म के लेखक व निर्देशक ने इसी सवाल को बिना भाशणबाजी के महज दो मिनट के अंदर पुरजोर तरीके से उठाया है. शादी के बाद हनीमून से पहले ही सूरी की हत्या के बाद जब वेनेला के सिर से सिंदूर, गले से मंगल सूत्र व हाथ की चूड़ियंा तोड़ी जाती है और उसे विधवा का दर्जा दिया जाता है, तभी धरणी वही मंगल सूत्र पुनः वेनेला को पहनाकर अपने घर ले आता है. पर उसके साथ धरणी दोस्ताना व्यवहार ही करता है.

उस वक्त मूक रही वेनेला बाद में स्पष्टीकरण मांगती है कि उसकी ओर से जीवन-परिवर्तनकारी निर्णय लेने से पहले उसकी सहमति क्यों नहीं मांगी गई?वह कहती है-‘‘मेरे गले में मंगलसूत्र डालने से पहले मेरी मर्जी क्यों नही पूछी गयी.’’ वेनेला के इस सवाल पर धरणी का जवाब एक तरह से माफी मांगने जैसा ही है. क्या बौलीवुड के फिल्मकार अपनी फिल्मों में इस तरह की बात करने का साहस दिखा सकते हैं?

फिल्म का कमजोर पक्ष यह है कि राख से भरे परिवेश, कालिख से भरी हवा व कोयले से भरी मालगाड़ी के अलावा कोयला खदान को स्थापित करने के लिए फिल्मकार ने कुछ नही किया. इसके अलावा फिल्म में राजन्ना का किरदार जबरन ठूंसा हुआ लगता है. क्योंकि राजन्ना राजनीति में कड़ुवाहट घोलने के बाद हर जगह सिर्फ शो पीस की तरह मौजूद रहता है.  अपने समर्थकों के पक्ष में भी कुछ नही करता.

फिल्म का क्लायमेक्स भी अनूठा है. फिल्म के कैमरामैन सत्थान सूर्यान की भी तारीफ करनी पड़ेगी. फिल्म के सभी गाने पार्श्व में चलते हैं, मगर पात्रों के मन की बात करते हुए कहानी को आगे बढ़ाते हैं. फिल्म के एक्शन दृष्यों की भी तारीफ की जानी चाहिए. कम से कम बौलीवुड के सर्जकों को ‘दसरा’ से सीखना चाहिए कि एक्शन क्या होता है?

अभिनयः

2008 में अभिनय जगत में कदम रखने वाले व कई भारतीय पुरस्कारों के साथ ही 2013 में ‘टोरंटो आफटर डार्क फिल्म फेस्टिवल’ में सर्वश्रेष्ठ हीरो का अवार्ड अपनी झोली में डाल चुके नानी की ‘दसरा’ 29वीं फिल्म है.

डिग्लैमरस धरणी के किरदार को नानी अपनी कुशाग्र बुद्धि से जीवंतता प्रदान करने में सफल रहे हैं. परोपकारी, अति विनम्र स्वभाव व झगड़े से दूर रहने वाले धरणी का कर्मठ युवा से लेकर निर्दयी इंसान बनने तक का जो बदलाव है, उसे बाखूबी परदे पर नानी ने जिया है.

इतना ही नहीं धरणी ने जिस तरह से अपने अंदर अपने प्यार को दबा रखा है, उसे नानी ने बाखूबी जिया है. अफसोस की बात यह है कि हिंदी में नानी के संवाद अभिनेता शरद केलकर ने डब किए हैं, जो कि नानी के किरदार धरणी पर फिट नही बैठते. यह फिल्म की कमजेार कड़ी है.

सूरी के किरदार में शेट्टी दीक्षित अपनी छाप छोड़ जाते हैं.

वेनेला की जिंदगी में कई भावनात्मक उतार चढ़ाव आते हें और हर भाव को अपने चेहरे से उकेरने में सफल रहने वाली अभिनेत्री कीर्ति सुरेश ने 2018 में प्रदर्शित तेलुगू फिल्म ‘‘महानती’ में अपनी अभिनय प्रतिभा का परिचय दे चुकी हैं. मलयालम फिल्मों के निर्माता सुरेश कुमार और तमिल अभिनेत्री मेनका की बेटी कीर्ति सुरेश को अभिनय व फिल्म माहौल बचपन से मिला है.

बतौर बाल कलाकार भी वह तीन फिल्में कर चुकी हैं. कीर्ति सुरेश कमाल की अभिनेत्री हैं. नंबी के किरदार में अभिनेता शाइन टॉम चाको भी छा जाते हैं. उन्हे देखकर या उनकी बौडीलेंगवेज से यह कल्पना नही की जा सकती है कि इतना बुरा इंसान है.

मेकअप रिमूव न करने के नुकसान

अगर आप भी उन महिलाओं में से हैं जो घर से बाहर निकलते वक्त खुद को परफैक्ट लुक देना नहीं भूलतीं और औफिस पहुंच कर भी बिलकुल टिंच रहती हैं, तो इस का मतलब है कि मेकअप आप के रूटीन का अहम हिस्सा बन चुका है. कई महिलाएं तो अपने वीकली औफ वाले दिन भी घर में मेकअप से लिपीपुती रहती हैं तो कुछ बैड पर जाने से पहले भी मेकअप करना नहीं भूलतीं ताकि उन के पार्टनर को उन का बिना मेकअप वाला चेहरा न दिखे.

दरअसल, वे ऐसा पार्टनर का पूरा अटैंशन पाने के लिए करती हैं. एक सर्वे के मुताबिक करीब 53% महिलाओं ने स्वीकारा कि रात में बिना मेकअप वे अपने पार्टनर को रिझा नहीं पाएंगी. लेकिन शायद आप को इस बात पर यकीन न आए पर कई शोधों के मुताबिक यह सच है कि जो महिलाएं रात में मेकअप रिमूव नहीं करतीं, उन की त्वचा पर मेकअप नकारात्मक प्रभाव डालता है. 

ध्यान रहे जितना जरूरी मेकअप करना है, उतना ही जरूरी उसे साफ करना भी है. ऐसा न करने पर चेहरे पर इन्फैक्शन भी हो सकता है. मेकअप की परत चढ़ते ही त्वचा के रोमछिद्र बंद हो जाते हैं और रोमछिद्रों के लंबे समय तक बंद रहने से त्वचा के भीतर की गंदगी बाहर नहीं निकल पाती, जो बाद में कीलमुंहासों का रूप ले लेती है.

बहुत सी महिलाएं कई बार बिना मेकअप साफ किए ही सो जाती हैं. अगर आप चाहती हैं कि आप की त्वचा संक्रमित होने से बची रहे तो सोने से पहले मेकअप जरूर रिमूव कर दें. 

रिमूव न करने पर क्या होगा

अगर आप मेकअप नहीं हटाती हैं, तो दिन भर में चेहरे पर लगे धूलमिट्टी के कण चेहरे पर अटैक करेंगे और रात में आप ने मेकअप चाहे लाइट किया हो या हैवी, साफ नहीं किया तो वह पूरी रात चेहरे पर रहेगा और स्किन को नुकसान पहुंचाएगा. इस का नतीजा यह होगा कि आप के चेहरे पर उम्र से पहले झुर्रियां पड़ने लगेंगी. और आप का कौंप्लैक्शन भी डार्क हो सकता है. 

उत्पाद के पड़ने वाले बुरे प्रभाव

मेकअप के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले फाउंडेशन की मोटी परत त्वचा पर चढ़ती है, इसलिए उस की जगह अन्य उत्पाद दिन के लिए इस्तेमाल किए जाएं. फाउंडेशन में होने वाले कण और पिगमैंट दिन भर त्वचा के रोमछिद्रों पर इफैक्ट करते हैं. वे कण त्वचा में लौक हो जाते हैं और त्वचा की परत में हवा के बाहर और अंदर आने में बाधक बनते हैं. प्राइमर: प्राइमर त्वचा को ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. साथ ही आप इसे कैसे लगा रही हैं, उस पर भी यह निर्भर करता है. अगर आप ने प्राइमर पूरा दिन लगाए रखा है तो प्रदूषण आप की त्वचा पर बहुत ही हानिकारक प्रभाव डालेगा.

लिपस्टिक:

अगर आप रात में लिपस्टिक लगा कर सो रही हैं, तो उस का परिणाम आप को अगले दिन, होंठों के सूखे व फटेफटे से होने के रूप में मिलेगा. यदि आप की लिपस्टिक में ज्यादा पिगमैंट है तो इसे लगाने से आप के होंठ काले भी पड़ सकते हैं. आप को इस तरह की लिपस्टिक हटाने के लिए सौफ्ट वाइप्स से हलकी स्क्रबिंग करनी होगी. कई कंपनियों की लिपस्टिक होंठों पर लंबे समय तक टिकी रहती है. ऐसे में लिपस्टिक हटाने के लिए पैट्रोलियम जैली का इस्तेमाल करें. लिपस्टिक हटाने के बाद लिप्स और ज्यादा ड्राई हो जाते हैं. ऐसे में लिप बाम जरूर लगाएं ताकि होंठों की नमी बरकरार रहे और वे मुलायम हो जाएं.

आईज:

महिलाओं को रोज आंखों पर मसकारा, काजल और आईलाइनर लगाने की आदत होती है. इन में से कोई चीज लगाए बिना तो उन के घर से पैर ही नहीं निकलते. उन के पास में भी ये चीजें जरूर मिलेंगी. आईज मेकअप उन्हें बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन ज्यादातर महिलाएं इसे बिना साफ किए ही सो भी जाती हैं. अगर आप भी ऐसा करती हैं तो फौरन ऐसा करना बंद कर दें. माना कि पलकों पर मसकारा लगाए बिना मेकअप पूरा नहीं होता, मगर इसे लगाए ही रात को सो जाती हैं, तो आप की पलकों में फैलाव आना स्वाभाविक है. मसकारा आप की पलकों पर बोझ डालता है, इसे साफ न करने से पलकें अलगअलग होने लगती हैं. इस से न केवल आप की पलकें ज्यादा टूटेंगी, बल्कि बेहद हलकी भी पड़ जाएंगी. मसकारा के अंदर पाए जाने वाले कण आप की त्वचा के छिद्रों को बंद कर देते हैं. ऐसे में आप ब्लेफ्राइटिंस बीमारी से भी ग्रस्त हो सकती हैं. इस के अलावा लंबे समय तक कंजक्टिविटीज की समस्या भी रह सकती है.

काजल, आईलाइनर या मसकारा यदि रात भर लगा कर रखा जाए तो आंखों की इन समस्याओं से आप को जूझना पड़ेगा. शुरुआत में आंखों में इरिटेशन और हलकी ऐलर्जी भी हो सकती है. आंखों में सूजन भी आ सकती है.

बचाव

रात को सोने से पहले सारा मेकअप जरूर उतार दें. मेकअप में धूलमिट्टी फंसी हो सकती है. सारी रात इसे लगा कर सोने से धूलमिट्टी चेहरे के रोमछिद्रों को बंद कर सकती है. साथ ही मेकअप में कुछ ऐसे कैमिकल भी हो सकते हैं, जो कुछ समय बाद आप की त्वचा में जलन पैदा कर सकते हैं. इसलिए सोने से पहले मेकअप उतारना न भूलें. अगर आप अकसर मेकअप साफ करना भूल जाती हैं और बैड पर आ जाती हैं, तो अपने बैड की साइड की टेबल पर मेकअप रिमूव करने की सारी चीजें रखें और अपनी स्किन को स्वस्थ व चमकदार बनाने की ओर कदम बढ़ाएं.

यह भी न भूलें

आप की मेकअप किट में मेकअप का सारा सामान होने के साथ ही मेकअप रिमूवर होना भी बहुत जरूरी है. आंखें काफी सैंसिटिव होती हैं और उन्हें अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है. फेशियल मेकअप, फाउंडैशन, लिपस्टिक, वाटर बेस्ड मेकअप आदि क्लींजर से आसानी से साफ हो जाता है, लेकिन आई मेकअप जैसे आईलाइनर, काजल और मसकारा को हटाने के लिए अलग रिमूवर की जरूरत होती है.

कुछ टिप्स

क्या आप जानती हैं कि बेबी औयल एक अच्छा मेकअप रिमूवल है? हां, लेकिन आप को हलका फीवर है तो आई मेकअप रिमूवल को चुनते वक्त एहतियात जरूर बरतें. अगर आप की आंख में लालिमा या फिर इन्फैक्शन है तो कौटन को एक ही आंख पर रख कर इस्तेमाल करें. अगर आप ऐसा नहीं करती हैं तो आप की दूसरी आंख में भी इन्फैक्शन हो सकती है. इस के अलावा कई महिलाएं रात को सोने से पहले चेहरा साबुन से धोती हैं. तो आप को बता दें कि मेकअप हटाने के लिए साबुन यूज न करें.

सास के कारण मैं परेशान हो गया हूं, मैं क्या करुं?

सवाल-

मेरा 2 वर्ष पूर्व ही विवाह हुआ है. मेरी 45 वर्षीय सास बेहद खूबसूरत है. वह विधवा है और अकेली रहती है. एक दिन मैं किसी काम से ससुराल गया तो वह टीवी पर ब्लू फिल्म देख रही थी. मुझे देख कर शरमा गई, पर फिल्म बंद नहीं की. कनखियों से मुझे देखती रही. धीरेधीरे हम दोनों ही उत्तेजित होने लगे और फिर आलिंगनचुंबन करतेकरते हमबिस्तर हो गए. उस दिन से यह सिलसिला लगातार चल रहा है. मैं डरता भी हूं पर खुद पर नियंत्रण नहीं कर पाता. कहीं मैं संकट में तो नहीं पड़ जाऊंगा?

जवाब-

आप की कुछ समय पहले ही शादी हुई है. घर में जवान पत्नी है बावजूद इस के आप उस की अधेड़ उम्र मां (जो आप के लिए भी मां समान है) से अवैध संबंध बना रहे हैं. सब से हैरतअंगेज तो आप की सास का व्यवहार है, जो अपनी ही बेटी के घर में सेंध लगा रही है. जरा सोचिए, यदि आप की पत्नी को कभी आप के रिश्ते की भनक लग गई तो उस पर क्या गुजरेगी. अवैध संबंध ज्यादा दिनों तक छिपे नहीं रहते. देरसवेर जगजाहिर हो ही जाते हैं. तब आप का दांपत्य जीवन तो तहसनहस होगा ही समाज में बदनामी भी होगी. अत: समय रहते संभल जाएं.

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धोखा देना इंसान की फितरत है फिर चाहे वह धोखा छोटा हो या फिर बड़ा. अकसर इंसान प्यार में धोखा खाता है और प्यार में ही धोखा देता है. लेकिन आजकल शादी के बाद धोखा देने का एक ट्रेंड सा बन गया है. शादी के बाद लोग धोखा कई कारणों से देते हैं. कई बार ये धोखा जानबूझकर दिया जाता है तो कई बाद बदले लेने के लिए. इतना ही नहीं कई बार शादी के बाद धोखा देने का कारण होता है असंतुष्टि. कई बार तलाक का मुख्‍य कारण धोखा ही होता है. लेकिन ये जानना भी जरूरी है कि शादी के बाद धोखा देना कहां तक सही है, शादी के बाद धोखे की स्थिति को कैसे संभालें. क्या करें जब आपका पार्टनर आपको धोखा दे रहा है.

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फैमिली के लिए डिनर में बनाएं अरहर दाल के गट्टे

बेसन के गट्टे की सब्जी आपने कई बार ट्राय की होगी. लेकिन क्या आपने अरहर दाल के गट्टे की सब्जी बनाई है. अगर नहीं तो ये आपके लिए हेल्दी और टेस्टी सब्जी है.

सामग्री

1/2 कप अरहर दाल

1 इंच अदरक का टुकड़ा

1 हरीमिर्च कटी

1 छोटा चम्मच धनिया भुना व दरदरा कुटा

1/2 छोटा चम्मच जीरा

1 छोटा चम्मच सौंफ

चुटकी भर हींग पाउडर

1/4 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर

1/4 छोटा चम्मच हलदी पाउडर

1/2 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर

1 छोटा चम्मच रिफाइंड औयल

नमक स्वादानुसार.

सामग्री तड़के की

1 बड़ा चम्मच सफेद तिल

चाटमसाला स्वादानुसार

2 छोटे चम्मच रिफाइंड औयल.

विधि

दाल को 3 घंटे पानी में भिगोएं. फिर पानी निथार कर अदरक व हरीमिर्च के साथ थोड़ा दरदरा पीसें. तेल को छोड़ कर बाकी सारी सामग्री मिलाएं और हाथ को तेल से चिकना कर के गट्टे की तरह रोल बनाएं. बीच में एक मोटी सलाई से छेद कर भाप में 10 मिनट पकाएं. ठंडा कर के 1/2 इंच मोटे टुकड़े काटें. एक नौनस्टिक कड़ाही में तेल गरम कर के तिल चटकाएं. फिर इन टकेपैसों को डाल कर लगभग 3 मिनट उलटेंपलटें. चाटमसाला डाल कर सर्व करें.

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