शरणागत: कैसे तबाह हो गई डा. अमन की जिंदगी- भाग 1

आईसीयू में लेटे अमन को जब होश आया तो उसे तेज दर्द का एहसास हुआ. कमजोरी की वजह से कांपती आवाज में बोला, ‘‘मैं कहां हूं?’’

पास खड़ी नर्स ने कहा, ‘‘डा. अमन, आप अस्पताल में हैं. अब आप ठीक हैं. आप का ऐक्सिडैंट हो गया था,’’ कह कर नर्स तुरंत सीनियर डाक्टर को बुलाने चली गई.

खबर पाते ही सीनियर डाक्टर आए और डा. अमन की जांच करने लगे. जांच के बाद बोले, ‘‘डा. अमन गनीमत है जो इतने बड़े ऐक्सिडैंट के बाद भी ठीक हैं. हां, एक टांग में फ्रैक्चर हो गया है. कुछ जख्म हैं. आप जल्दी ठीक हो जाएंगे. घबराने की कोई बात नहीं.’’

डाक्टर के चले जाने के बाद नर्स ने डा. अमन को बताया कि उन के परिवार वालों को सूचित कर दिया गया है. वे आते ही होंगे. फिर नर्स पास ही रखे स्टूल पर बैठ गई. अमन गहरी सोच में पड़ गया कि अपनी जान बच जाने की खुशी मनाए या अपने जीवन की बरबादी का शोक मनाए?

कमजोरी के कारण उस ने अपनी आंखें मूंद लीं. एक डाक्टर होने के नाते वह यह अच्छी तरह समझता था कि इस हालत में दिमाग और दिल के लिए कोई चिंता या सोच उस की सेहत पर गलत असर डाल सकती है पर वह क्या करे. वह भी तो एक इंसान है. उस के सीने में भी एक बेटे, एक भाई और पति का दिल धड़कता है. इन यादों और बातों से कहां और कैसे दूर जाए?

आज उसे मालूम चला कि एक डाक्टर हो कर मरीज को हिदायत देना कितना आसान होता है पर एक सामान्य मरीज बन कर उस का पालन करना कितना कठिन.

डा. अमन के दिलोदिमाग पर अतीत के बादल गरजने लगे… डा. अमन को याद आया अपना वह पुराना जर्जर मकान जहां वह अपने मातापिता और 2 बहनों के साथ रहता था. उस के पिता सरकारी क्लर्क थे. वे रोज सवेरे 9 बजे अपनी पुरानी साइकिल पर दफ्तर जाते और शाम को 6 बजे थकेहारे लौटते.

उस की मां बहुत ही सीधीसादी महिला थीं. उस ने उन्हें हमेशा घर के कामों में ही व्यस्त देखा, कभी आराम नहीं करती थीं. वे तीनों भाईबहन पढ़नेलिखने में होशियार थे. जैसे ही बहनों की पढ़ाई खत्म हुई उन की शादी कर दी गई. पिताजी का आधे से ज्यादा फंड बहनों की शादी में खर्च हो गया. उस के पिता की इच्छा

थी कि वे अपने बेटे को डाक्टर बनाएं. इस इच्छा के कारण उन्होंने अपने सारे सुख और आराम त्याग दिए.

वे न तो जर्जर मकान को ही ठीक करवा पाए और न ही स्कूटर या कार ले पाए. बरसात में जब जगहजगह से छत से पानी टपकने लगता तो मां जगहजगह बरतन रखने लगतीं. ये सब देख कर उस का मन बहुत दुखता था. वह सोचता कि क्या करना ऐसी पढ़ाई को जो मांबाप का सुखचैन ही छीन ले पर जब वह डाक्टरी की पढ़ाई कर रहा था तब पिता के चेहरे पर एक अलग खुशी दिखाई देती. उसे देख उसे बड़ा दिलासा मिलता था.

तभी दरवाजा खुलने की आवाज उसे वर्तमान में लौटा लाई. उस के मातापिता और बहनें आई थीं. पिता छड़ी टेकते हुए आ रहे थे. मां को बहनें पकड़े थीं. उस का मन घबराने लगा. सोचने लगा कि मैं कपूत उन के किसी काम न आया. मगर वे आज भी उस के बुरे समय में उस के साथ खड़े थे. जिसे सब से पहले यहां पहुंचना चाहिए था उस का कोसों दूर तक पता न था.

काश वह एक पक्षी होता, चुपके से उड़ जाता या कहीं छिप जाता. अपने मातापिता का सामना करने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी. उस ने आंखें बंद कर लीं. मां का रोना, बहनों का दिलासा देना, पिता का कुदरत से गुहार लगाना सब उस के कानों में पिघले सीसे की तरह पड़ रहा था.

तभी नर्स ने आ कर सब को मरीज की खराब हालत का हवाला देते हुए बाहर जाने को कहा. मातापिता ने अमन के सिर पर हाथ फेरा तो उसे ऐसे लगा मानो ठंडी वादियों की हवा उसे सहला रही हो. धीरेधीरे सब बाहर चले गए.

अमन फिर अतीत के टूटे तार जोड़ने लगा…

जैसे ही अमन को डाक्टर की डिग्री मिली घर में खुशी की लहर दौड़ गई. मातापिता खुशी से फूले नहीं समा रहे थे. बहनें भी खुशी से बावली हुई जा रही थीं. 2 दिन बाद ही इन खुशियों को दोगुना करते हुए एक और खबर मिली. शहर के नामी अस्पताल ने उसे इंटरव्यू के लिए बुलाया था. 2 सप्ताह बाद अमन की उस में नौकरी लग गई. उस के पिता की बहुत इच्छा थी

कि वह अपना क्लीनिक भी खोले. उस ने पिता की इच्छा पर अपनी हामी की मुहर लगा दी. वह अस्पताल में बड़े जोश से काम करने लगा.

अभी अमन की नौकरी लगे 1 साल भी नहीं हुआ था कि अचानक उस की जिंदगी में एक ऐसा तूफान आया कि उस ने उस के जीवन की दिशा ही बदल दी.

दोपहर के लंच के बाद अमन डा. जावेद के साथ बातचीत कर रहा था. डा. जावेद सीनियर, अनुभवी और शालीन स्वभाव के थे. वे अमन की मेहनत और लगन से प्रभावित हो कर उसे छोटे भाई की तरह मानने लगे थे.

उसी समय एक घायल लड़की को अस्पताल लाया गया. वह कालेज से आ रही थी कि उस की साइकिल का बैलेंस बिगड़ गया और वह बुरी तरह जख्मी हो गई. डा. जावेद, अमन और अन्य डाक्टर उस के इलाज में जुट गए. उसे काफी चोटें आई थीं. एक टांग में फ्रैक्चर भी हो गया था. लड़की के मातापिता बहुत घबराए हुए थे. उन्हें दिलासा दे कर बाहर वेटिंग हौल में बैठने को कहा. लड़की के इलाज का जिम्मा डा. अमन को सौंपा गया.

लड़की बेहोश थी. उस के होश में आने का वहीं बैठ कर इंतजार करने लगा. लड़की बहुत सुंदर थी. तीखे नैननक्श, गोरा रंग, लंबे बाल. उस के होश में आने पर उस के मातापिता को बुलाया गया. बातोंबातों में पता चला कि लड़की का नाम नीरा है. बीए फाइनल का आखिरी पेपर दे कर लौट रही थी. सहेली के साथ बातें करती आ रही थी. तभी ऐक्सिडैंट हो गया.

आगे पढ़ें- अमन ने उन्हें धीरज बंधाते हुए…

FILM REVIEW-‘‘मिसेज चक्रवर्ती वर्सेज नाॅर्वेः रानी मुखर्जी ने अपने अभिनय से मां को मेलोड्रामा बना दिया

रेटिंगः डेढ़ स्टार
निर्माताः निखिल अडवाणी,मोनिषा अडवाणी,मधु भोजवानी और जी स्टूडियो
लेखकः समीर सतीजा,आषिमा छिब्ब्र और राहुल हांडा
निर्देषकः आषिमा छिब्बर
कलाकारः रानी मुखर्जी,अनिर्बन भट्टाचार्य,जिम सर्भ,नीना गुप्ता व अन्य
अवधिः दो घंटे 15 मिनट

जब किसी सत्य घटनाक्रम पर फिल्म बनानी हो,तो ‘सिनेमाई स्वतंत्रता’ के नाम पर तथ्यों से छेड़छाड़ नहीं किया जाता.मगर आषिमा छिब्बर निर्देषित पारिवारिक कानूनी डामा फिल्म ‘‘ मिसेज चक्रवर्ती वर्सेज नाॅर्वे’’ देखने के बाद अहसास होता है कि फिल्मकार ने 2010 से 2012 के बीच घटित घटनाक्रम पर फिल्म बनाते समय इतिहास को बदलने का प्रयास किया है.यह कितना सच है ,कितना गलत,इस पर बहस जरुर छिड़ेगी.

फिल्म ‘‘मिसेज चक्रवर्ती वर्सेज नाॅर्वे’ नाॅर्वे में 2010 से 2012 के बीच नाॅर्वे में एक भारतीय जोड़े के साथ घटी सत्य घटना पर है.यह फिल्म सागरिका भट्टाचार्य की आत्मकथा ‘द जर्नी ऑफ ए मदर‘ पर आधारित है,जिनके दो बच्चे 2011 में नार्वेजियन चाइल्ड केयर सिस्टम (बार्नवेर्नेट) द्वारा उनसे ले लिए गए थे. हैदराबाद में जन्मी व दिल्ली मंे पली बढ़ी आषिमा छिब्बर ने बतौर सहायक निर्देषक कैरियर की षुरूआत की थी.फिर वह फिल्म ‘‘राॅकस्टार’’ और ‘‘लेट्स गो इंडिया’ में सेकंड युनिट डायरेक्टर व सहायक निर्देषक के रूप में भी जुड़ी रही.2013 में उन्हे ‘यषराज फिल्मस’ की फिल्म ‘मेरे डैड की मारूती’ स्वतंत्र रूप से निर्देषित करने का अवसर मिला था.पर इस फिल्म ने कुछ खास प्रभाव नहीं डाला था.और अब पूरे दस वर्ष बाद आषिमा छिब्बर बतौर निर्देषक फिल्म ‘‘मिसेज चक्रवर्ती वर्सेज नाॅर्वे’ लेकर आयी हैं.पूरी तरह से निराष करने वाली इस फिल्म में तथ्यात्मक त्रुतियों की भरमार है.मगर जिस महिलायानी कि सागरिका भट्टाचार्य के साथ नाॅर्वे में घटी घटना क्रम पर बनी इस फिल्म को लेकर सागरिका भट्टाचार्य भी फिल्म की तारीफों के पुल बांधते हुए नहीं थक रही हैं.षायद उन्हे अपनी जिंदगी की कहानी पर फिल्म बनाने के लिए एक लंबी रकम मिल गयी होगी.वैसे भी इस फिल्म या यंू कहें कि नाॅर्वे में सागरिका भट्टाचार्य के साथ जो कुछ घटित हुआ था, उसकी जड़ में पैसा और पारिवारिक मतभेद ही था.फिल्म में सिनेमाई स्वतंत्रता के नाम पर सागरिका भट्टाचार्य की जगह देबिका चक्रवर्ती और उनके पति अनूप भट्टाचार्य की जगह अनिरूद्ध चक्रवर्ती नाम रखे गए हैं.

कहानीः

कहानी चक्रवर्ती परिवार की है.अनिरूद्ध चक्रवर्ती इंजीनियर हैं और उनकी पत्नी देबिका चक्रवर्ती बीएससी पास है.अच्छे भविष्य के लालच में चक्रवर्ती अपनी पत्नी के साथ नॉर्वे चले गए थे.उनका एक बेटा षुभ है. जबकि देबिका 2010 में बेटी सुचि को जन्म देती हंै.जब सुचि चार माह की होती है,तभी षुभ और सुचि को माता पिता के अनुचित व्यवहार के आधार पर बार्नवरनेट (जिसे नॉर्वेजियन चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज के रूप में भी जाना जाता है) द्वारा अपने कब्जे में ले लिया जाता है.पता चलता है कि चक्रवर्ती के एक भारतीय सहकर्मी व उनके दोस्त ने ही उनके खिलाफ षिकायत की थी.चक्रवती परिवार नॉर्वे की एक अदालत में अपील करते हैं,लेकिन असफलता ही हाथ लगती है.देबिका हार मानने को तैयार नही है.जब नाॅर्वे के साथ एक ट्ीटी पर हस्ताक्षर करने भारतीय विदेषमंत्री पहुॅचते हंै,तो प्रेस काॅफ्रेंस में देबिका अपने बच्चों को वापस दिए जाने का मसला उठाती हैं.फिर भारतीय विदेश मंत्रालय हस्तक्षेप करता है. लेकिन देबिका के लालची देवर,सास व ससुर को अपने साथ कर नार्वे सरकार दोनों बच्चे देबिका के देवर को दत्तक दे देती है.ज्ञातब्य है कि जिसे बच्चे दत्तक मिलते हैं,उसे नाॅर्वे सरकार बच्चों के अठारह वर्ष की उम्र में पहुॅचने
तक हर माह पचास लाख रूपए देती है.इस तरह देबिका के देवर को एक करोड़ रूपए मिल रहे थे.फिर देबिका का पति उसे तलाक दे देता है और देबिका का देवर उसे बच्चे देने से इंकार कर देता है.तब देबिका कलकत्ता उच्च न्यायालय पहुॅचती है.
अंततः नवंबर 2012 में देबिका को बच्चे मिल जाते हैं.

लेखन व निर्देषनः

पूरे दस वर्ष बाद आषिमा छिब्बर बतौर निर्देषक यह फिल्म लेकर आयी हैं,जो कि पारिवारिक मेलोड्ामा के अलावा कुछ नही है.आषिमा छिब्बर ने दो अन्य लेखकांे समीर सतीजा और राहुल हांडा के साथ मिलकर इस फिल्म को लिखा है.लेखकों को कहानी व पटकथा लिखने के लिए पूरी कहानी एक आत्मकथा वाली किताब ‘‘द जर्नी आॅफ ए मदर’ मिली थी,इसके बावजूद पटकथा में काफी झोल हैं.हमने यह किताब नही पढ़ी है,इसलिए हम यह दावा नही कर सकते कि फिल्म उस किताब पर कितना आधारित है.

 

मगर फिल्म देखकर सागरिका भट्टाचार्य जरुर फिल्म और उनका किरदार निभाने वाली अभिनेत्री रानी मुखर्जी की प्रषंसा करते हुए नही थक रही है.उधर रानी मुखर्जी का दावा है कि वह सागरिका से मिल ही नही.फिल्म के लिए फिल्मकार ने कोई षोध कार्य किया हो,ऐसा भी नहीं लगता.फिल्मकार ने दक्षिण एषियाई देषों में बच्चों की परवरिष के नियमों पर फिल्म बात नही करती.केवल भारतीय परवरिष पर बात करती है. चाइल्ड वेल्फेअर के नाम पर नाॅर्वे जो बहुत बड़ा भ्रष्टाचार हो रहा है,उस पर फिल्म ज्यादा बात नही करती.फिल्मकार का सारा ध्यान सत्य घटनाक्रम को सही परिप्रेक्ष्य मंे पेष करने की बजाय भारतीय परिवारों के अंदर मेलोड्ामा को चित्रित कर दर्षक को उलझाए रखना ही रहा है.

फिल्म इतनी तेज गति से भागते हुए दर्षक को सम्मोहित करती है कि दर्षक प्रमाणिकता की परवाह करना भूल जाता है.
इसका फायदा फिल्मकार ने जमकर उठाया है.पूरी फिल्म के घटनाक्रम विरोधाभासों से भरे हुए हैं.क्या एक पिता महज नाॅर्वे की नागरिकता पाने या चंद रूपयांे के लिए अपने बच्चों की बलि दे सकता है?
फिल्मकार आषिमा छिब्बर ने सारा ध्यान रानी मुखर्जी से मेलाड्ामैटिक अभिनय करवाने पर ही केंद्रित रखा.मगर मां से छीनकर बच्चे फोस्टर व दत्तक परिवार मंे जाते हैं,तो उन पर किस तरह का मानसिक दबाव पड़ता है,उनकी क्या मनः स्थिति है,उसका कहीं कोई जिक्र नहीं.जबकि इस सत्य घटनाक्रम में
सर्वाधिक यातना तो भोले भाले दो बच्चे झेलते हैं.पर फिल्मसर्जक की नजर इस पर नही जाती.षायद निर्देषक आषिमा छिब्बर को बाल मनोविज्ञान की समझ नही है और न ही उन्होने इस पर षोधकर जानना चाहा. यह इस फिल्म की सबसे बडी कमजोर कड़ी है.

फिल्म के अंत मंे जिस तरह से भारतीय एंथेम को पेष किया गया है,वह अजीब लगता है. नाॅर्वे में अदालत के अंदर जो जज सुनवाई करते हैं,वह नार्वे के नही बल्कि वह जर्मन या रषियन नजर आते हैं.नाॅर्वे में हर इंसान सिर्फ नार्वेजियन भाषा ही बोलते हैं,मगर इस फिल्म में वह अंग्रेजी बोलते नजर आते हैं.यह भी कमजोर कड़ी है.
फिल्म मेें दो देषों की संस्कृतियों के टकराव महज चीख पुकार में बदलकर रह गयी है.फिल्मकार किसी भी मुद्दे को ंसंवेदनषीलता के साथ सही परिप्रेक्ष्य में नहीं उठाता. फिल्म की कहानी का घटनाक्रम 2010 से 2012 तक का है.उस वक्त भारत में यूपीए/मनमोहन सिंह की सरकार थी.पर फिल्म के अंत में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व.सुषमा स्वराज व वृंदा कारंत का धन्यवाद अदा किया गया है कि इनके प्रयासों से सागरिका को उनके बच्चे मिल पाए.वृंदा कारंत ने तो कलकत्ता में सागरिका की मदद की थी और सागरिका के साथ अदालत भी जाती थीं.पर पूर्व केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ..? क्या यह इतिहास को नए सिरे से परिभाषित या लिखने का फिल्माकर ने प्रयास किया है?

अभिनयः

देबिका चटर्जी के किरदार में रानी मुखर्जी का अभिनय महज मेलोड्ामा के कुछ नही है.जोर जोर से चिल्लाना या चीखना अभिनय नही होता.यह तो हर आम औरत हर दिन कर सकती है.देबिका चटर्जी के किरदार में सागरिका की भावनाओं को उकेरने में रानी मुखर्जी विफल रही है.रानी मुखर्जी जैसी उम्दाकलाकार से इस तरह के अभिनय की उम्मीद नही थी.एक मां से उसका तीन साल का बेटा व चार माह की बेटी छीन ली जाए,तो जिस तरह की मनः स्थिति होती है,उसे यथार्थ के धरातल पर रानी मुखर्जी साकार नही कर पायी.रानी मुखर्जी ने मां को पूरी तरह से मेलोड्ामैटिक बना दिया है.इसे दर्षक कैसे सहन करेगा. उनके पति अनिरूद्ध के किरदार में अनिर्बन का अभिनय ठीक ठाक है.
नाॅवे में वकील दानियल सिंह सिस्पुक की छोटी भूमिका में जिम सर्भ का अभिनय जानदार है.पूरी फिल्म मंे वह न सिर्फ छा जाते हैं,बल्कि फिल्म खत्म होने पर वह दर्षकों के दिलो दिमाग में रह जाते हैं.पटकथा का साथ न मिल पाने के चलते कोई भी कलाकार ख्ुाद को मेलोड्ामैटिक होने से नहीं बचा पाता.

सस्टेनेबल फैशन में हाथ बढाने, आगे आये कई सेलेब्स

पिछले कई सालों से फैशन इंडस्ट्री को सस्टेनेबिलिटी के साथ जोड़ा जाता रह है, क्योंकि फैशन इंडस्ट्री का एनवायर्नमेंटल पोल्यूशन में एक बड़ा हाथ रहा है, क्योंकि फैशन प्रोडक्ट से एक बहुत बड़ी मात्रा में वेस्ट प्रोडक्ट निकलता है, जिसका सही रूप में प्रयोग करना जरुरी है, इसलिए सभी डिज़ाइनर इस बात का ध्यान रखने की कोशिश करते है कि स्लो फैशन हो, ताकि अंधाधुंध कपडे न खरीदकर एक अच्छी और खूबसूरत पोशाक पर व्यक्ति पैसे खर्च करें जो सालों साल एक जेनरेशन से दूसरी जेनरेशन को हस्तांतरित की जा सकें. इस बार की लेक्मे फैशन वीक 2023 जो फैशन डिजाइनिंग काउंसलिंग ऑफ़ इंडिया के पार्टनरशिप के साथ शुरू की गयी, जिसमे पहले दिन इको फैशन पर आधारित शो में आईएनआईऍफ़डी जेन नेक्स्ट के विजेता ‘कोयटोय’ ने ब्राइट कलर्स और ब्राइट मोटिफ्स से सबके मन को मोहा, राज त्रिवेदी की कलेक्शन "Scintilla" ने मेटेलिक पोशाक को रैंप पर जगह दी. हीरू के कलेक्शन की स्मार्ट लेयरिंग फ्री फ्लो फैशन पर अधिक ध्यान दिया, जिसमें स्टोन वाशिंग, चुन्नटे, प्लीट्स और स्मोकिंग पर अधिक काम किया गया. जैकेट, पलाज़ो पेंट, स्कर्ट, फ्रॉक्स आदि सभी मेलेनियल पोशाक जो यूथ हर अवसर पर पहन सकते है, उसको प्राथमिकता दी गई.

सस्टेनेबल साडी की बात करें, तो इसमें डिज़ाइनर अनाविला मिश्रा की पोशाक ‘डाबू’ की खूबसूरती देखने लायक थी. 10 साल के उनके इस अनुभव में उन्होंने साड़ी पहनने को एक नया रूप दिया है, जो मॉडर्न, लाइट एंड ऑथेंटिक रही. इसमें डिज़ाइनर ने ब्लाक प्रिंटिंग, वेजिटेबल डाई आदि का प्रयोग किया है, जो बहुत ही स्टाइलिंग और अलग दिखे. उनके कॉटन साडीज, जो धोती पैटर्न, जुड़े के साथ सबके आकर्षक का केंद्र बनी, ये स्टाइल अनाविला मिश्रा ने बंगाल के शान्तिनिकेतन से प्रेरित हो कर क्रिएट किया है, वह कहती है कि आजकल की लडकिया साड़ी ड्रेपिंग नहीं जानती, उन्हें ये कठिन लगता है. मैंने बंगाल के फुलिया से प्रेरित मसलिन फेब्रिक को साड़ी में प्रयोग किया है, जो बहुत सॉफ्ट और आरामदायक है और इसे सालों से बंगाल में महिलाएं बिना ब्लाउज के पहना करती थी, जिसे आज की लड़कियों ने कभी देखा और जाना नहीं, ये कपडे बहुत ही सॉफ्ट और सालों साल पहने जा सकते है. इसमें उन्होंने ब्लाक प्रिंट के लिए मड यानि कीचड़ का प्रयोग किया है, जिसमे कपडे पर पहले कीचड़ को स्प्रे कर बाद में रंगों का स्प्रे किया जाता है, जो पर्यावरण के हिसाब से भी हानिकारक नहीं होता और कूल फील देता है.

दिल्ली की डिज़ाइनर डूडल एज ने भी रिसायकलड वेस्ट मटेरियल से बने पोशाक रैम्प पर उतारें, जिसमे 90 के दशक के सुंदर फ्लोरल प्रिंट्स, सॉलिड कलर्स, डेनिम प्रस्तुत किये. दूसरी सबसे अच्छी रुचिका सचदेवा की ब्रांड बोडीस रही, जिसके कैजुअल आउटफिट काफी सुंदर रहे, जिसमे प्लेटेड शर्ट्स, फ्लेयर्ड ट्राउजर्स, असमान टॉप, जो किसी भी दिन और रात को पहनने के लिए परफेक्ट पोशाक है, उसे दिखाया गया.

इस दिन एक्ट्रेस रकुल प्रीत सिंह डिज़ाइनर श्रुति संचेती के लिए शो स्टॉपर रही, जबकि अभिनेता विजय वर्मा दिव्यम मेहता के लिए और अभिनेत्री, मॉडल आर माँ नेहा धूपिया आईएनआईऍफ़डी लांचपैड के लिए रैम्प पर वाक् किया और नए डिजाईनरों को सस्टेनेबल फैशन के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. इसके अलावा इस दिन कोंकना सेन शर्मा, सोनाली बेंद्रे और मंदिरा बेदी भी सस्टेनेबल फैशन को सपोर्ट करने के लिए इंडियन ऑउटफिट में दिखाई पड़ी.

‘ये रिश्ता’ की ‘नायरा’ हुई बीमार, शिवांगी जोशी ने शेयर की अस्पताल की फोटो

टीवी की मशहूर एक्ट्रेस शिवांगी जोशी इन दिनों काफी चर्चा में बनी हुई हैं. जल्द ही एक्ट्रेस शालीन भनोट और ईशा सिंह के ‘बेकाबू‘ में भी नजर आएंगी. हालांकि उनका रोल शो में ज्यादा बड़ा नहीं है, लेकिन प्रोमो में शिवांगी और जैन की केमिस्ट्री देख लोग भी ‘बेकाबू’ दिखाई दिये. इन सबसे इतर हाल ही में शिवांगी जोशी की तबीयत बिगड़ गई, जिससे उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. दरअसल, शिवांगी जोशी को किडनी में इंफेक्शन हो गया है और इस बात की जानकारी उन्होंने इंस्टाग्राम पर फोटो शेयर कर दी है. एक्ट्रेस ने बताया है कि उनकी तबीयत पहले से कहीं बेहतर है. शिवांगी की पोस्ट को देखने के बाद फैंस से लेकर सितारे तक उनके जल्दी से जल्दी ठीक होने की कामना कर रहे हैं.

 

शिवांगी जोशी ने शेयर की फोटो 

शिवांगी जोशी ने हॉस्पिटल से फोटो शेयर की, जिसमें वह नारियल पानी के साथ पोज देती दिखाई दीं.  इस हालत में भी एक्ट्रेस मुस्कुराती हुई नजर आईं.  उन्होंने पोस्ट साझा कर लिखा, “हेलो दोस्तों. बीते कुछ दिन काफी मुश्किल रहे हैं.  मुझे किडनी में इंफेक्शन हो गया था, लेकिन आप लोगों को बताना चाहती हूं कि परिवार, दोस्तों, डॉक्टर, हॉस्पिटल स्टाफ और भगवान के रहमों करम से मैं अच्छा महसूस कर रही हूं.  ये आप लोगों को याद दिलाने के लिए है कि आप लोग अपने शरीर, दिमाग और आत्मा का ख्याल रखें.  सबसे बड़ी बात पानी पीते रहें. आप सभी को मेरा ढेर सारा प्यार.”

 

लोगों ने किया मैसेज 

शिवांगी जोशी ने अपने कैप्शन में आगे लिखा, “मैं जल्द ही लौटूंगी. फिल्हाल धीरे-धीरे ठीक हो रही हूं.” शिवांगी जोशी की इस पोस्ट पर टीवी सितारों ने कमेंट कर उनके जल्द से जल्द ठीक होने की कामना की. श्रद्धा आर्या ने लिखा, “अरे नहीं…जल्दी ठीक हो जाओ राजकुमारी. तुम्हें हमारा ढेर सारा प्यार. ” रुबीना दिलैक ने लिखा, “जल्दी से पूरी तरह ठीक हो जाओ.” सुधांशु पांडे ने लिखा, “तुम्हारे जल्दी ठीक होने की दुआ करता हूं.” इनके अलावा धीरज धूपर, श्रेणू पारेख, श्वेता तिवारी और चेतना पांडे जैसे सितारों ने भी कमेंट कर उनके जल्द से जल्द ठीक होने की कामना की.

Anupamaa: महान बनने के चक्कर में अनुपमा हुई अनुज से दूर ,क्या खत्म होगा Maan का रिश्ता!

स्टार प्लस का धमाकेदार सीरियल ‘अनुपमा’ इन दिनों काफी चर्चा में बना हुआ है। रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा‘ की पूरी कहानी इन दिनों छोटी अनु के इर्द-गिर्द घूम रही है. शो में दिखाया जाएगा कि छोटी अनु, अनुज और अनुपमा को छोड़कर चली जाएगी. लेकिन उसके जाने के बाद अनुज और अनुपमा के बीच दूरियां आ जाएंगी. ये दूरियां इस कदर बढ़ जाएंगी कि अनुज अपना 26 साल का प्यार भुला बैठेगा और अनुपमा को सारी चीजों का जिम्मेदार ठहराएगा. इससे जुड़ा रुपाली गांगुली के ‘अनुपमा’ का प्रोमो वीडियो भी रिलीज हो गया है, जिसने फैंस का भी दिल तोड़ दिया है.

 

 

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क्या अनुज- अनुपमा हुए एक दूसरे से दूर!

अनुपमा के इस प्रोमो वीडियो में देखने को मिला कि छोटी अनु के जाने के बाद अनुज बिल्कुल बेसुध हो जाता है. अनुपमा उसे संभालने की कोशिश करती है, लेकिन वह उल्टा उसी पर भड़क जाता है. अनुज छोटी अनु की तस्वीरें देखकर आंसू बहाता है. ऐसे में अनुपमा उसके पास आकर कहती है, “सोएंगे नहीं तो नींद कैसे आएगी. छोटी को खोने का दुख मुझे भी है.” इसपर अनुज भड़क जाता है और कहता है, “क्या खोया है तुमने? तुम्हारे तीनों बच्चे तुम्हारे पास हैं. तुम्हारा पूरा परिवार तुम्हारे पास है. अकेला मैं रह गया हूं मैं. तुम्हारी ये बातें मुझे बार-बार छोटी अनु की याद दिलाती है. तुम्हारा साया मुझे अंधेरों में घेर लेता है. दम घुटता है मेरा तुम्हारे साथ, दम घुटता है.

 

 

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अनुपमा का प्रोमो देखकर भड़के फैंस

अनुज के इस व्यवहार से अनुपमा बिल्कुल टूट जाती है और कांपने लगती है. ‘अनुपमा’ के इस प्रोमो वीडियो को देखने के बाद फैंस को भी झटका लगा. उन्होंने अनुज के साथ-साथ मेकर्स पर नाराजगी जहिर की, साथ ही अनुज की तुलना वनराज से भी की. एक यूजर ने प्रोमो वीडियो पर नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा, “अनुज क्या पहले अंधा था. पहले उसे पता नहीं था कि अनुपमा के 3 बचे हैं. अनुज पर अब वनराज से भी ज्यादा गुस्सा आ रहा है. बेचारी अनुपमा क्या करे. उसके खुद के बच्चों को फेंक दे क्या अब. बुद्धू अनुज.”

 

 

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नाराजगी दिखा रहे है दर्शक

‘अनुपमा’ के प्रोमो पर नाराजगी जाहिर करने वाले यहीं नहीं रुके. एक यूजर ने लिखा, “अनुपमा को देखकर लगता है कि सच में इतना अच्छा होना ठीक नहीं है.” एक यूजर ने अनुज पर गुस्सा निकालते हुए लिखा, “सब के सब एक जैसे ही हैं. वनराज ने भी यही किया था. लेकिन अनुज तुम्हारे ऊपर तो शर्म आ रही है. तुमसे ये उम्मीद नहीं थी. यही था 25 साल का प्यार, ऐसे व्यवहार कर रहा है कल की आई बच्ची के लिए. खुद की बेटी होती तो पता नहीं क्या करता ये आदमी.”

 

 

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भांडा तो फूटा है मगर होगा क्या

लड़कियां मजबूत होंगी तो वे सैक्सुअल हैरेसमैंट से बच सकती हैं और उन्हें सैल्फ डिफेंस सीखना चाहिए. कुश्ती संघ के उधड़े जख्मों से अब साफ है कि वह बेकार है. जरूरत लड़कियों को शारीरिक रूप से मजबूत होने की नहीं है, उस सामाजिक ढांचे को पटकनी देने की है जो औरतों को एक पूरी जमात के तौर पर दबा कर रखता है.

भाजपा के ऊंची जाति के सांसद ब्रज भूषण सिंह खुद कुश्ती खेलना न जानते हों, वे ‘रैसलिंग फैडरेशन औफ इंडिया’ के प्रैसिडैंट हैं और उन के शैडो में सैकड़ों रैसलर सैक्सुअल हैरेसमैंट की शिकायतें ले कर उठ खड़ी हुई हैं.

रैसलिंग कैंपों, विदेशी टूरों, सिलैक्शन में कोचों और न जाने किनकिन को खुश करना पड़ता है तब महिला रैसलर विदेश व देश में मैडल पाने का मौका पाती हैं. हर महिला रैसलर की कहानी शायद मैडल के पीछे लगी पुरुष वीर्य की बदबू से भरी है. कदकाठी और ताकत में मजबूत होने के बाद रैसलरों को न जाने किसकिस को ‘खुश’ करना पड़ता है. रैसलर महिलाओं के साथ जो बरताव होता है उस के पीछे एक कारण है कि वे पिछड़ी जातियों से ज्यादा आती हैं जिन के बारे में हमारे धर्मग्रंथ चीखचीख कर कहते हैं कि वे तो जन्म ही सिर्फ सेवा करने के लिए लेती हैं. देश के देह व्यापार में यही लड़कियां छाई हुई हैं. जाति और समाज के बंधन रैसलर लड़कियों को सैक्सुअल हैरेसमैंट से मुक्ति नहीं दिला सकते. ऐसा बहुत से क्षेत्रों में होता है जहां औरतें अकेली रह जाती हैं. एक युग में जब काशी और वृंदावन हिंदू ब्राह्मण विधवाओं से भरे थे, जिन के घर वालों ने उन्हें त्याग दिया था. वहीं के पंडित संरक्षकों ने उन्हें विदेश ले जाए जा रहे गिरमिटिया मजदूरों के साथ भिजवाया था.

एक तरह से वे जापानी सेना की कंफर्ट वूमंस की तरह थीं जिन्हें कोरियाई सेना के साथ सैनिकों को सुख देने के लिए पकड़ कर रखा था. यह द्वितीय विश्वयुद्ध में हुआ था जब जापान ने कोरिया पर कब्जा कर लिया था. कोरियाई लड़कियां शारीरिक रूप से कमजोर थीं और जब देश ही हार गया हो तो वे क्या करें? अफसोस यह है कि बड़ीबड़ी बातें करने वाला समाज तुलसीदास का कथन औरतों को ताड़न का अधिकारी ही मानता है और सरकार समर्थक अपनी बात पर अड़े रहने के लिए ताड़ना शब्द का नयानया अर्थ रोज निकालते हैं. यही रैसलिंग फैडरेशन में होता है, सभी खेलों में होता है जहां चलती पुरुषों की है पर खेलती लड़कियां हैं. गांवों से आने वाली कम पढ़ीलिखी लड़कियां केवल कपड़े न उतारने की जिद के कारण चमकदमक, विदेशी दौरों, बढि़या रिहाइश का मौका नहीं खोना चाहतीं.

उन्हें बचपन से सिखाया गया है कि पिता, भाई, पति, ससुर के हर हुक्म को सिरआंखों पर रख कर मान लो. अब यह भांड़ा फूटा है पर होगा क्या? होगा यह कि विद्रोह करने वाली लड़कियों को शहद की बूंदों पर मंडराने वाली घरेलू मक्खियों की तरह मार दिया जाएगा. सरकारी आदेशों की हिट उन पर छिड़क दी जाएगी. अगले दौर में उन लड़कियों को लिया जाएगा जो पहले दिन से सर्वस्व देने को तैयार हों. न समाज बदलने वाला, न पुरुषों की लोलुपता और कामुकता. ऊपर से रामायण, महाभारत के किस्से स्पष्ट करते रहेंगे कि औरतो, तुम तो बनी ही यातनाएं सहने को, तुम्हें लक्ष्मण रेखाओं में रहना है, तुम्हें अग्नि में जलना है या भूमि में समाना है, तुम्हें एक नहीं कई पतियों को खुश रखना है, वंश चलाने के लिए व नपुंसक पतियों की इज्जत बचाने के लिए तुम्हें दूसरे पुरुषों के हवाले किया जा सकता है. वह स्वर्ण पौराणिक युग फिर लौट आया है. राम और कृष्ण की जन्मभूमियों को नमन करो और फैडरेशन के अफसरों को खुश करो वरना न पैसा मिलेगा, न 2 वक्त की कुछ दिन अच्छी रोटी मिलेगी.

बच्चों के टिफिन के लिए बनाएं ये रेसिपी

बच्चों के रिजल्ट्स आ चुके है और स्कूल फिर से खुल गए हैं. माताओं के लिए सबसे बड़ी समस्या होती है उनके लिए ऐसा लंच बॉक्स तैयार करना जिसमें उन्हें पर्याप्त पोषण भी मिले आए स्वाद भी. आमतौर पर बच्चों को फ़ास्ट फ़ूड बहुत पसंद होता है तो बाजार के रेडीमेड फ़ास्ट फ़ूड की अपेक्षा घर पर ही हैल्दी फ़ास्ट फ़ूड तैयार किया जाए इसी तारतम्य में हम आज ऐसी रेसिपी बना रहे हैं बहुत हैल्दी भी हैं और स्वादिष्ट भी साथ ही इन्हें बहुत आसानी से घर पर बनाया भी जा सकता है तो आइए देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाया जाता है-

1-मैक्रोनी अप्पे

कितने लोगों के लिए 4
बनने में लगने वाला समय 30 मिनट
मील टाइप वेज

सामग्री

अप्पे के लिए

सूजी 1 कप
ताजा दही 1 कप
नमक 1/4 टीस्पून
जीरा 1/8 टीस्पून
ईनो फ्रूट सॉल्ट 1 सैशे
घी या बटर 1 टेबलस्पून
सामग्री (भरावन के लिए)
उबली मैक्रोनी 1 कप
बारीक कटी शिमला मिर्च 1 टेबलस्पून
बारीक कटी गाजर 1 टेबलस्पून
बारीक कटी प्याज 1 टेबलस्पून
नमक 1/4 टीस्पून
कश्मीरी लाल मिर्च 1/4 टीस्पून
नीबू का रस 1/4 टीस्पून
चिली फ्लैक्स 1चुटकी
कटी हरी धनिया 1 टेबलस्पून
तेल 1 टीस्पून

विधि

सूजी को दही और नमक के साथ घोलकर 20 मिनट के लिए ढककर रख दें. अब एक पैन में तेल डालकर सभी सब्जियां डाल दें और नमक डालकर सब्जियों के गलने तक पकाएं. जब सब्जियां गल जाएं तो मैक्रोनी, कश्मीरी लाल मिर्च, चिली फ्लैक्स और नींबू का रस डालकर अच्छी तरह चलाएं. जब पानी बिल्कुल सूख जाए तो कटी हरी धनिया डाल कर गैस से उतार लें.
अब सूजी में ईनो फ्रूट और जीरा डालकर अच्छी तरह चलाएं. अप्पे के सांचे में बटर लगाएं और तैयार सूजी का 1 चम्मच मिश्रण डालकर 1 चम्मच भरावन डालें और इसे फिर से सूजी का मिश्रण डालकर कवर कर दें. ढककर दोनों तरफ से चिकनाई लगाकर सुनहरा होने तक पका लें, इसी प्रकार सारे अप्पे तैयार करें और टोमेटो सॉस या चटनी के साथ सर्व करें.

2 -नूडल्स उत्तपम

सामग्री (उत्तपम के लिए)

कितने लोगों के लिए 4
बनने में लगने वाला समय 30 मिनट
मील टाइप वेज
धुली मूंग दाल 1 कप
नमक 1/4 टीस्पून
तेल सेंकने के लिए
बेकिंग सोडा 1/4 टीस्पून
बारीक कटी हरी धनिया 1 टीस्पून

सामग्री ( भरावन के लिए)

उबले नूडल्स 1 कप
बारीक कटी प्याज 1
बारीक कटी शिमला मिर्च 1/2
बारीक कटी बीन्स 1/2 कप
उबले कॉर्न 1 टेबलस्पून
बारीक कटा पनीर 1 टेबलस्पून
तेल 1 टीस्पून
टोमेटो सॉस 1 टीस्पून
वेनेगर 1/4 टीस्पून
सोया सॉस 1/4 टीस्पून
चिली सॉस 1/4 टीस्पून

विधि

बनाने से 3-4 घण्टे पहले मूंग दाल को भिगो दें. पानी निकालकर इसे मिक्सी में पीसकर बेकिंग सोडा और नमक डालकर अच्छी तरह फेंट लें.
एक नॉनस्टिक पैन में तेल डालकर सभी सब्जियां और नमक डाल दें. सब्जियों के गल जाने पर पनीर, कॉर्न, नूडल्स, वेनेगर और सभी सॉसेज डालकर अच्छी तरह चलाएं. अब एक नॉनस्टिक पैन पर चिकनाई लगाकर मूंग दाल का एक चम्मच मिश्रण पतला पतला फैला दें. जैसे ही हल्का सा सिक जाए तो 1 चम्मच भरावन फैलाएं और पुनः मूंग के बेटर से इसे कवर कर दें. पलटकर दोनों तरफ से सुनहरा होने तक सेंकें. इसे आप बच्चों के टिफिन में टोमेटो सॉस के साथ रखें.

स्तन कैंसर: निदान संभव है

भारत में 40 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे अधिक प्रचलित कैंसर है. ऐसे मामले विश्व स्तर पर हर साल लगभग 2% की दर से बढ़ रहे हैं. यह महिलाओं में कैंसर संबंधित मौतों का सबसे आम कारण भी है.

आज हमारे पास स्तन कैंसर से होने वाली मौतों को कम करने का मौका है. स्तन कैंसर को जल्दी पकड़ा जा सकता है ओर हारमोन थेरेपी, इम्यूनो थेरेपी और टारगेटेड थेरेपी जैसी नई विकसित के जरीए पहले की तुलना में अधिक विश्वास के साथ इसका इलाज किया जा सकता है.

सेल्फ एग्जामिनेशन

यदि प्रारंभिक चरण में कैंसर का पता लग जाता है तो उपचार अधिक प्रभावी ढंग से हो सकता है. इस अवस्था में कैंसर छोटा और स्तन तक सीमित होता है.

शुरुआत में एक छोटी गांठ की उपस्थिति या स्तन के आकार में बदलाव के अलावा कोई कथित लक्षण नहीं होता है, जिसे रोगियों द्वारा आसानी से अनदेखा किया जा सकता है. यही वह समय है जब स्क्रीनिंग जरूरी है. स्क्रीनिंग टेस्ट से स्तन कैंसर के बारे में जल्दी पता लगाने में मदद मिलती है. ऐसे में जब कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते तब भी स्क्रीनिंग के द्वारा हमें इस बीमारी का पता चल सकता है. स्क्रीनिंग के लिए नियमित रूप से डाक्टर के पास जाना चाहिए ताकि रोगी महिला के स्तन की पूरी तरह से जांच कर सकें. डाक्टर अकसर इस के जरीए ब्रेस्ट में छोटीछोटी गांठ या बदलाव का पता लगा लेते हैं. वे महिलाओं को सेल्फ एग्जामिनेशन करना भी सिखा सकते हैं ताकि महिलाएं खुद भी इन परिवर्तनों को पकड़ सकें.

हालांकि मैमोग्राफी स्तन कैंसर की जांच का मुख्य आधार है. यह एक एक्स-रे एग्जामिनेशन है और गांठ दिखने से पहले ही स्तनों में संदिग्ध कैंसर से जुड़े परिवर्तनों का पता लगाने में मदद करता है.

पहला मैमोग्राम कराने और इसके बाद भी कितनी बार मैमोग्राम कराना है. यह इस पर निर्भर करता है कि उस महिला को ब्रेस्ट कैंसर होने का रिसक कितना है. जिन महिलाओं के रक्त संबंधी स्तन कैंसर या ओवेरियन कैंसर से पीडि़त हैं और जिनको पहले भी स्तनों से जुड़ी कुछ असामान्यताओं जैसे स्तनों में गांठ, दर्द या डिस्चार्ज आदि का सामना करना पड़ा है उन्हें जोखिम ज्यादा रहता है. ऐसी महिलाओं को 30 साल की उम्र के बाद हर साल मैमोग्राफ कराना चाहिए. दूसरों को 40 साल की उम्र के बाद हर साल या हर 2 साल में जांच करवानी चाहिए.

टेस्टिंग

अगर मैमोग्राम में कैंसर का कोई संदिग लक्षण दिखता है तो पक्के तौर पर कैंसर है या नहीं इसका पता लगाने के लिए बायोप्सी की जाती है. इस प्रक्रिया में संदिग्ध क्षेत्र से स्तन ऊतक के छोटे हिस्से को निकाल लिया जाता है और कैंसर सेल्स का पता लगाने के लिए प्रयोगशाला में विश्लेषण किया जाता है.

उच्च जोखिम वाल महिलाओं के लिए, बीआरसीए म्युटेशन जैसी जेनेटिक असामान्यताओं का पता लगाने के लिए जेनेटिक टेस्टिंग की भी सिफारिश की जाती है. ‘बीआरसीए’ दरअसल ब्रेस्ट कैंसर जीन का संक्षिप्त नाम है. क्चक्त्रष्ट्न१ और क्चक्त्रष्ट्न२ दो अलगअलग जीन हैं तो किसी व्यक्ति के स्तन कैंसर के विकास की संभावनाओं को प्रभावित करते हैं. जिन महिलाओं में ये असामान्यताएं होती हैं उन सभी को स्तन कैंसर हो ऐसा जरूरी नहीं, मगर उनमें से 50% को यह जिंदगी में कभी न कभी जरूर होता है.

वीआरसीए जीन असामान्यता वाली महिलाओं को अतिरिक्त सतर्क रहना चाहिए और नियमित रूप से वार्षिक मैमोग्राम कराने से चूकता नहीं चाहिए. जो महिलाएं नियमित रूप से जांच नहीं कराती हैं उनके लिए यह संभावना बढ़ जाती है कि उनके स्तन कैंसर का पता लेटर स्टेज या एडवांस स्टेज पर लगेगा. इस स्तर पर कैंसर संभावित रूप से स्तन या शरीर के कुछ दूसरे हिस्सों में फैल सकता है. ऐसे में इलाज एक चुनौती बन जाती है, लेकिन जब डाइग्रोसिस शुरुआती स्टेज में हो जाती है तब इलाज के कई तरह के विकल्प मौजूद होते हैं जो कैंसर का सफलतापूर्वक कर पाते हैं और इसके फिर से होने की संभावना पर भी रोक लगाते हैं.

आपके लिए कौन सा इलाज अच्छा

होगा यह प्रत्येक कैंसर की प्रोटीन असामान्यताओं पर निर्भर करता है, जिसका पता कुछ खास जांच द्वारा लगाया जाता है. एडवांस्ड थैरेपीज जिसे इम्मुनोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और हारमोनल थेरेपी इन विशेष अब्नोर्मिलिटीज पर काम करती है और बेहतर परिणाम देती हैं.

कुछ रोगियों के लिए ये उपचार पारंपरिक कीमोथेरेपी की जगह भी ले सकते हैं. कुछ उपचार जो कैंसर दोबारा होने से रोकते हैं उन्हें गोलियों के रूप में मौखिक रूप से भी लिया जा सकता है. यह अर्ली स्टेज के स्तन कैंसर की मरीज को भी एक अच्छी जिंदगी जीने को संभव बनाते हैं.

प्रारंभिक अवस्था में स्तन कैंसर डायग्नोज होने वाली महिलाओं में से 90% से अधिक इलाज के बाद लंबे समय तक रोग मुक्त जिंदगी जी सकती हैं. लेकिन भारत में स्तन कैंसर से पीडि़त महिलाओं की 5 साल तक जीवित रहने की दर महज 42-60% है. ऐसा इसलिए है क्योंकि लगभग आधे रोगियों का पता केवल अंतिम चरण में चलता है.

हम इसे बदल सकते हैं. यदि महिलाएं अपने थर्टीज में स्तन कैंसर की जांच की योजना बनाती हैं और लक्षणों के प्रकट होने की प्रतीक्षा नहीं करती हैं.

स्तन कैंसर का डायग्नोज होना अब मौत की सजा की तरह नहीं होना चहिए क्योंकि हम कैंसर का जल्द पता लगा सकते हैं और हमारे पास इसके सफल उपचार के लिए इफेक्टिव थेरेपीज हैं.

क्लाउड किचन: कम लागत अधिक मुनाफा

बिजनैस छोटा हो या बड़ा हमें औफलाइन ग्राहकों के साथसाथ औनलाइन ग्राहकों को भी ध्यान में रख कर अपनी व्यवसायिक रणनीति तय करनी होती है, तभी ज्यादा से ज्यादा फायदा हो सकता है क्योंकि आज हर किसी के मोबाइल में असीमित डाटा है. अब ज्यादातर काम औनलाइन ही हो रहे हैं. तभी तो क्लाउड किचन बिजनैस भारत और दुनियाभर में सब से ट्रैंडिंग बिजनैस में से एक है.

क्लाउड किचन जिसे अकसर ‘घोस्ट किचन’ या ‘वर्चुअल किचन’ के रूप में भी जाना जाता है, एक प्रकार का ऐसा रैस्टोरैंट है जहां सिर्फ टेक अवे और्डर ही दिए जा सकते हैं. औनलाइन फूड और्डरिंग सिस्टम के माध्यम से ग्राहकों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए एक व्यवसाय स्थापित किया जाना ही क्लाउड किचन है. जोमैटो और स्विग्गी जैसे फूड डिलीवरी ऐप्लिकेशंस का इन से टाईअप होता है.

2019 में भारत में लगभग 5,000 क्लाउड किचन थे. औनलाइन फूड और्डरिंग ऐप्स और वैबसाइटों के सहयोग से क्लाउड किचन को बड़ा समर्थन मिला है. आज भारत में 30,000 से अधिक क्लाउड किचन हैं.

सही प्लानिंग करें

आप महज क्व5 से 6 लाख में इस काम की शुरुआत अच्छे स्तर पर कर सकते हैं. महिलाएं भी इस बिजनैस में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं. हम ने बात की ऐसे ही एक क्लाउड किचन ‘द छौंक’ की कोफाउंडर मंजरी सिंह और हिरण्यमि शिवानी से. कोविड-19 के समय जब लोग अपने घरों में बंद थे तब हिरण्यमि शिवानी भी फंस गई थीं और अपने घर नहीं जा पाई थीं. उसी दौरान उन्हें क्लाउड किचन शुरू करने का खयाल आया. वह बिहार से ताल्लुक रखती हैं. इसलिए उन्होंने लोगों को घर के खाने का स्वाद देने खासकर स्वादिष्ठ बिहारी भोजन उपलब्ध कराने के मकसद से बिहारी कुजीन के साथ जुलाई, 2021 में ‘द छौंक’ की शुरुआत गुरुग्राम से की. इस काम में उन की बहू मंजरी सिंह ने भी साथ दिया और दोनों ने मिल कर इस बिजनैस में कदम रखा.

बढ़ चुका है काम

मंजरी सिंह बताती हैं कि शुरू में उन्होंने अपना बिजनैस घर से ही शुरू किया था और घर में ही खाना तैयार कर के औनलाइन फूड डिलीवरी ऐप्प के द्वारा लोगों को खाना डिलीवर करते थे. आज दिल्ली/एनसीआर में उन के 5 आउटलेट्स हैं. अधिकांश सिस्टम औटोमेटिक और औनलाइन है. स्विगी, जोमैटो के साथ भोजन की डिलीवरी के लिए जुड़े हुए हैं.

अभी सालाना टर्नओवर लगभग 2 करोड़ प्रोजेक्टेड है और इस साल 15-16% प्रौफिट ऐक्सपेक्ट कर रहे हैं. अभी उन के पास कुल

28 स्टाफ है जिन में से 6 स्टाफ बैक औफिस में है और बाकी किचन में है.

जाहिर है आज काम काफी बढ़ चुका है. महिला होने की वजह से सिर्फ एक मुश्किल यह होती है कि वे सोर्सिंग में बहुत ज्यादा इन्वौल्व नहीं हो पाती हैं. रा मैटेरियल जैसे सब्जी, मसाले, अनाज आदि सोर्स करने होते हैं. मार्केट में कुछ नई चीज आई हो तो वह भी देखने जाना होता है. मगर ज्यादातर मंडियां बहुत क्राउडेड और इंटीरियर एरिया में होती हैं जहां महिलाएं बारबार नहीं जा पातीं.

वैसे भी दोनों होम मेकर हैं और साथ ही बच्चों का भी ध्यान रखना होता है. इस समस्या से निबटने के लिए उन्होंने सोर्सिंग मैनेजर और कई कर्मचारी रखे हैं जो इन चीजों में उन की काफी मदद करते हैं.

इस के अलावा कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा है.

जीएसटी और फाइनैंशियल इश्यूज

रैस्टोरैंट और क्लाउड किचन बिजनैस में 5% जीएसटी लगाया जाता है. अगर और्डर जोमैटो और स्विग्गी के जरीए आ रहा है तो एग्रीगेटर्स जीएसटी रिटर्न फाइल करेंगे. अगर वैबसाइट के माध्यम से और्डर आ रहा है तो क्लाउड किचन को 5% जीएसटी सरकार को जमा करना होगा. इस के अलावा कोई अप्रत्यक्ष कर शामिल नहीं हैं. यही कारण है कि हम देखते हैं कि क्लाउड किचन उद्योग में कोई कर विनियमन जटिलताएं नहीं हैं.

किस तरह की परेशानियां आ सकती हैं

– ऐग्रीगेटर के हाई कमीशन (करीब 30%) के कारण यह बहुत कम मार्जिन वाला व्यवसाय है. इसलिए रिटर्न की तुलना में तकनीकी खर्च बहुत अधिक है. ग्राहक से डायरैक्ट संपर्क का अभाव होता है. प्रतिक्रिया और समीक्षा के लिए ग्राहकों के साथ कोई सीधा संवाद नहीं. ऐग्रीगेटर्स कस्टमर का डायरैक्ट कौंटैक्ट नहीं देते.

– यही नहीं इस फील्ड में बहुत सारे ब्रैंड और कैटेगरीज आ गई हैं इसलिए बहुत प्रतियोगिता है. एक क्लाउड किचन का लिमिटेशन 6 से 7 किलोमीटर का होता है. इतनी दूरी में ही करीब 2-3 हजार रैस्टोरैंट्स हैं. लिमिटेड लोकेशन में

1000+ब्रैंड्स हैं. इस वजह से कस्टमर को बहुत से औप्शन मिलते हैं. ऐसे में आप को मार्केटिंग पर काफी खर्च करना होता है ताकि आप का रैस्टोरैंट ऊपर दिखे. बहुत से औफर देने पड़ते हैं. इस से प्रौफिट का काफी हिस्सा ऐसे ही चला जाता है.

– अधिकांश ब्रैंड संगठित नहीं हैं और भोजन और काम करने का तरीका और्गनाइज्ड नहीं है. रसोइया/स्टाफ कम सैलरी में अपनी नौकरी बदलते रहते हैं जिस से स्वाद को बनाए रखना मुश्किल हो जाता है. न्यू स्टाफ को बारबार ट्रेंड करना पड़ता है. ट्रेंड होने के बाद वे कहीं और चले जाते हैं इस से हमारा लौस होता है. उपभोक्ता सेम नहीं होते हैं और बड़ी संख्या में ब्रैंडों के कारण वे भी बदलते रहते हैं. इसलिए विज्ञापन पर खर्च बहुत अधिक होता है.

-क्लाउड किचन के लिए कोई अलग सरकारी नीति नहीं है और उन्हें अभी भी डाइन इन रेस्तरां के रूप में माना जा रहा है जबकि दोनों बहुत अलग हैं. उन का कमीशन कम जाता है. प्रौफिट मार्जिन ज्यादा है जिस से पौलिसी उन के फेवर में चली जाती है.

ये परेशानियां सामान्य किस्म की हैं जो हर बिजनैस में किसी न किसी रूप में आती ही हैं. हर बिजनैस के अपने फायदे और नुकसान होते हैं. जहां तक क्लाउड किचन की बात है तो इस के कई फायदे भी हैं:

इस में कम इन्वैस्टमैंट में ज्यादा प्रौफिट

की अपेक्षा की जा सकती है. काम करना भी आसान होता है और आप घर संभालते हुए यह काम कर सकते हैं. अन्य पारंपरिक रेस्तरां और डाइनिंग की तुलना में क्लाउड किचन में मैटेरियल मैनेजमैंट कौस्ट, ओवरहेड कौस्ट, लेबर कौस्ट बहुत कम है. यहां केवल खाना बनता है और पैक हो कर डिलीवर हो जाता है, जिस से ज्यादा कर्मचारी नहीं रखने होते और साफसफाई में भी कम मेहनत लगती है.

शौक को बनाएं बिजनैस

क्लाउड किचन के लिए कम जगह की आवश्यकता होती है और इसे शहर के किसी भी हिस्से में स्थापित किया जा सकता है. महिलाएं घर से भी शुरुआत कर लेती हैं. आप को सिर्फ इस बात का खयाल रखना है कि आप का घर शहर के व्यवसायिक क्षेत्र में होना चाहिए. बाद में व्यवसाय बढ़ने पर अलग जगह ले सकते हैं.

लौंग टर्म प्रौफिट

आप यदि चाहें तो औफलाइन बाजार भी खोल सकते हैं जैसे कि किसी रैस्टोरैंट को रैगुलर सप्लाई करना, हौस्टल और कौरपोरेट औफिस तक रोज लगने वाले टिफिन की जरूरत को पूरा करना, पार्टियों के कैटरिंग और्डर लेना आदि. वहीं त्योहारों के समय कुछ खास तरह के पकवानों के और्डर ले सकते हैं.

भारत में क्लाउड किचन शुरू करने की प्रक्रिया

स्थान: आप के पास एक ऐसा स्थान ऐसा होना चाहिए जहां आप अपने द्वारा पेश किए जाने वाले फूड की बड़ी डिमांड की अपेक्षा कर सकें. साथ ही आप को उस स्थान पर व्यवसाय चलाने की सारी सुविधाएं भी मिलें.

लाइसेंस: बिना लाइसेंस के कोई भी व्यवसाय स्थापित करना असंभव है. क्लाउड किचन शुरू करने के पहले कुछ लाइसेंस की आवश्यकता होती है. इस में शामिल हैं:

– एफएसएसएआई लाइसेंस

– जीएसटी रजिस्ट्रेशन

– लेबर लाइसेंस

– फायर क्लीयरैंस

रसोई के उपकरण: हमें काम शुरू करने के लिए स्टोव, ओवन, माइक्रोवेव, डीप फ्रीजर, रैफ्रिजरेटर, चाकू जैसे रसोई के उपकरण जरूरत पड़ते हैं.

पैकेजिंग: खाना कितना भी स्वादिष्ठ या अच्छी तरह से पका हुआ क्यों न हो जब तक इसे अच्छी तरह से पैक नहीं किया जाता है यह बाजार में ज्यादा नहीं बिकता है. इसलिए आकर्षक पैकेजिंग भी जरूरी है.

औनलाइन कनैक्टिविटी: इंटरनैट और मोबाइल फोन की आवश्यकता होगी क्योंकि डिजिटल रूप से सक्रिय रहना होगा.

मार्केटिंग: आप को जोमैटो और स्विग्गी जैसी फूड वैबसाइटों के साथ रजिस्ट्रेशन करना आवश्यक होगा क्योंकि उन के पास लाखों ग्राहक हैं, जो अपना और्डर देते हैं.

कर्मचारी: रसोई के लिए स्टाफ सदस्य का चयन क्लाउड किचन की स्थापना में सब से महत्त्वपूर्ण पहलुओं में से एक है. आप को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे अच्छी तरह से प्रशिक्षित, कुशल स्टाफ हों जो आप के क्लाउड किचन के कामकाज को अच्छी तरह संभालने के लिए आवश्यक कौशल रखते हैं.

इस के बाद रा मैटेरियल, वेंडर्स और मैनपावर फाइनल किए जाते है. सारे लाइसेंस आते ही काम शुरू किया जा सकता है.

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