अनन्या पांडे की बहन अलाना ने इवोर मैकक्रे से की शादी, देखें फोटोज

बॉलीवुड एक्ट्रेस अनन्या पांडे की कजिन अलाना पांडे (Alanna Panday) ने अपने लॉन्गटर्म बॉयफ्रेंड आइवर मैक्रे (Ivor Mccray) के साथ शादी कर ली है. इस कपल ने 16 मार्च यानी गुरुवार को फैमिली मेंबर्स और करीबी लोगों के अलावा बॉलीवुड इंडस्ट्री के सिलेब्स की मौजूदगी में सात फेरे लिए हैं. अलाना पांडे और आइवर मैक्रे की शादी मुंबई में हुआ है और दोनों की शादी के बाद तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. कपल की तस्वीरें को फैंस खूब पसंद कर रहे हैं

 

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Alanna Panday (@alannapanday)

अनन्या पांडे ने दिखाई शादी की झलक

अनन्या पांडे ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट की स्टोरी पर अपने कजिन अलाना पांडे और आइवर मैक्रे की शादी के वीडियो शेयर किए हैं. वहीं, अनुराग कश्यप की बेटी आलिया कश्यप ने भी दोनों की शादी की तस्वीर अपने इंस्टाग्राम अकाउंट की स्टोरी पर शेयर की है. शादी के दौरान अलाना पांडे ने आइवरी कलर का लहंगा पहना हुआ था. वहीं आइवर मैक्रे ने मैचिंग शेरवानी पहन रखी थी। अपनी शादी में ये कपल काफी प्यारा लग रहा था.

 

अलाना पांडे और आइवर मैक्रे की शादी में पहुंचे सिलेब्स

अलाना पांडे और आइवर मैक्रे की शादी में चंकी पांडे की फैमिली के अलावा बॉलीवुड इंडस्ट्री से जैकी श्रॉप, मनीष मल्होत्रा, नंदिता महतानी, अलविरा अग्निहोत्री, महिमा चौधरी, एली अवराम और अनुषा दांडेकर सहित तमाम सेलिब्रिटीज पहुंचे थे. बताते चलें कि अलाना पांडे और आइवर मैक्रे के प्री-वेडिंग फंक्शन के फोटोज सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुए थे. गौरतलब है कि अलाना पांडे और आइवर मैक्रे की सगाई पहले हो चुकी है और ये दोनों लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे थे. बताते चलें कि अलाना पांडे बॉलीवुड के वेटरन एक्टर चंकी पांडे के भाई चिक्की पांडे और भाभी डिएन पांडे की बेटी हैं. अलाना पांडे भले ही बॉलीवुड इंडस्ट्री में एक्टिव ना हो लेकिन सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरों से लाइमलाइट में रहती हैं.

आत्मसम्मान का हक बहू को भी है

युवा पतिपत्नी को पति के मातापिता ने अलग से रहने का मकान दिलाया और उस को सुधारने में सारा खर्चा युवा पतिपत्नी ने अपनी दोनों की कमाई से उठाया. फिर पति की मां बीचबीच में आ कर टांग अड़ाने लगी कि यह सोफा साइड में रखो, परदों का रंग बदलो, घरेलू आया को घर से निकाल दो क्योंकि उस ने घंटी बजने पर दरवाजा खोलने में देर कर दी या फिर चाय दूधशक्कर वाली की जगह ग्रीन टी दे दी तो इस पति की मां को क्या कहेंगे?

यही न कि वह बेटेबहू का घर जोड़ नहीं रही, संभाल नहीं रही, तोड़ रही है. यह काम हमारे केंद्र सरकार के नियुक्त गवर्नर उन राज्यों में कर रहे हैं जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें नहीं हैं.

दिल्ली में तो यह भयंकर रूप से एक के बाद एक राज्यपाल कर रहे हैं. भाजपा चाहे 7 की 7 संसद सीटें जीत जाए, पहले 2 बार वह विधानसभा में और इस बार दिल्ली नगर निगम चुनावों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से बुरी तरह हारी. अब वह उस सास की तरह व्यवहार कर रही है जिस के बेटे ने अपनी मरजी से शादी की और मां की ढूंढ़ी लड़कियों को रिजैक्ट कर दिया.

यह तंग करने का अधिकार भारतीय जनता पार्टी के डीएनए में है क्योंकि पुराणों में बारबार जिक्र है कि ऋषिमुनि राजा के दरबार में घुस कर जबरन राजा से काम कराते थे.

नरसिंह अवतार बन कर विष्णु ने हिरण्यकश्यप का अकारण वध किया. कृष्ण ने बिना वजह कौरवों व पांडवों के बीच मतभेद खड़े किए और इस कुरूवंश को समाप्त करा दिया. विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को जबरन राक्षसों को मारने ले गए और सारी रामायण में उन की तरह के ऋषिमुनि अयोध्या के राजकाज में विघ्न डालते रहे.

जो कथा इन ऋषिमुनियों ने गढ़ी उन में तो राजा का काम उसी तरह ऋषियों की बेमतलब की बातों को थोपना था जैसा केंद्र सरकार के गवर्नर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, दिल्ली, छत्तीसगढ़, झारखंड में कर रहे हैं.

पौराणिक ऋषियों की दखलअंदाजी से पौराणिक कथाओं के राजा हर समय ऋषिमुनियों के आदेश पर लड़ने को मजबूर रहते थे और यही ऋषिमुनि आज घरों में युवा पत्नियों को परेशान करते हैं. आमतौर पर सासें किसी न किसी स्वामी महाराज, गुरु की भक्त होती हैं और रातदिन उन की सेवा में लगी रहती हैं. वे ही सासों को उकसाते हैं कि बहुओं को नकेल में डाल कर रखो.

जो सोचते हैं कि सरकार तो अपने कामकाज से सिर्फ गृहस्थी चलाने वालियों या गृहस्थी की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में लगी है, वे गलत हैं क्योंकि हर जिंदगी का फैसला आज उसी तरह के पौराणिक सोच वाले लोगों के हाथों में आ चुका है. गवर्नरों की दखलअंदाजी, सरकारों की धौंस, बुलडोजरों से राज, हिंदूमुसलिम विवाद सब की काली छाया हर घर पर पड़ती है, सीधे या परोक्ष में.

अफसोस यह है कि औरतें बराबर की वोटर होते हुए भी पुरातनपंथी सोच को वरीयता देने में लगी हैं कि हमें क्या मतलब, जो पति कहेंगे वही कर लेंगे. यह दकियानूसीपन स्वतंत्रता को दान में देना है. यही औरतों को बेचारी बनाता है.

गवर्नरों का काम करने का तरीका है कि या तो हमारी मानो वरना हम नाक में दम कर के रखेंगे, यह सोच प्रधानमंत्री कार्यालय से शुरू होती है और छनछना कर हर घर तक पहुंच जाती है. क्या विद्रोह करने का, विरोध करने का, अपना आत्मसम्मान व आत्मविश्वास रखने का हक हर बहू को है या नहीं? क्या लोकतंत्र में विपक्ष की सरकारों को चलने का हक है या नहीं?

किचन की सफाई से छुटकारा दिलाती कुचीना

रीना औफिस से थकीहारी आई थी. आज औफिस में लंबी मीटिंग चली. अभी कपड़े बदल कर सोफे पर बैठी ही थी और सोच रही थी कि डिनर में कुछ हलका-फुलका बना ले तभी निखिल ने घर में घुसते ही ऐलान किया कि आज रात का खाना बाहर खाएंगे.
रीना झुंझला उठी. दिनभर की थकी-मांदी, डेढ़ घंटा मेट्रो की भीड़ में खड़े-खड़े सफर करके घर पहुंची है. अभी-अभी कपड़े बदले हैं और अब बाहर जाने के लिए फिर से तैयार हो?
रहने दो, मैं घर में ही कुछ सदा सा बना लेती हूं, उसने निखिल को मना करना चाहा.
निखिल थोड़ा नाराज हो गया, बोला, ‘‘मैं तो तुम्हारे लिए ही कह रहा था. थकी हुई दिख रही हो. अब किचन में घुसोगी. आधे घंटे में उबला सा खाना बनाओगी और डेढ़ घंटा किचन साफ करने में लगाओगी.’’
रीना सफाई को लेकर बड़ी पार्टिकुलर है. खासतौर से किचन की सफाई. मगर ये सफाई उसके खाना बनाने के वक्त को और मन को मार देती है. कितने दिन हो जाते हैं पति को कुछ अच्छा बना कर नहीं खिला पाती है. ऐसा नहीं है कि उसके हाथ में स्वाद नहीं है. भरपूर स्वाद है मगर तड़का-छौंका वाला खाना वो इसीलिए अवौयड करती है कि तेल और धुआं उड़ेगा. अब बिना तड़केछौंके के न तो कोई सब्जी अच्छी लगती है न दाल.
रीना जैसी महिलाओं को जिनकी रसोई में हवा के सही आवागमन का इंतजाम नहीं है और जिनकी रसोई छोटी है, की तकलीफों को कुचीना होम मेकर्स प्राइवेट लिमिटेड ने समझने की कोशिश की है.
दरअसल, कोरोना महामारी के वक्त में जब सब तरफ लौकडाउन लगा और नौकरीपेशा लोग वर्क फ्रौम होम करने लगे, बच्चे घर में रह कर औनलाइन पढ़ाई करने लगे तब किचन की सफाई का बड़ा मसला गृहिणियों के सामने उभरा.
किचन की गंदगी
अधिकांश घरों में तो पतियों ने भी किचन में खूब हाथ आजमाया. जितना भी पाक-विज्ञान उन्हें आता था कोरोनाकाल में वो सारा हुनर उन्होंने पत्नी और बच्चों को दिखा डाला. यूट्यूब पर नएनए व्यंजनों की रेसिपी देखदेख कर खूब प्रयोग किचन में किए गए. मगर उसके बाद किचन की जो हालत हुई उसने पत्नियों की कमर तोड़ दी.
खाना पकाने के दौरान किचन से निकली गर्म हवा का सही तरीके से घर से बाहर निकलना बहुत जरूरी है. मगर छोटे घरों में और फ्लैट सिस्टम में ऐसा हो नहीं पाता है. इस बात को कुचीना होम मेकर्स प्राइवेट लिमिटेड ने ही समझा और एक ऐसा प्रोडक्ट मार्किट में उतारा जिसने महिलाओं की साफसफाई की समस्या का काफी हद तक निराकरण कर दिया है. कुचीना होम मेकर्स प्राइवेट लिमिटेड आपके किचन में ही रेस्तरां जैसा स्वादिष्ठ भोजन पकाने के लिए आपको भरपूर समय देने और आपकी सुविधानुसार इस उपकरण को डिजाइन किया है.
कुचीना ने बनाया काम आसान
कुचीना ने सबसे पहले गृहिणियों के दिल को समझा. उसने समझा कि हर गृहिणी अपने घर के सदस्यों को और खासकर अपने बच्चों को हमेशा ही लजीज भोजन ही बना कर खिलाना चाहती है, जिसके लिए उसको कुछ एक्स्ट्रा वक्त चाहिए.
रसोई उपकरण निर्माता मर्क्यूरियल के प्रबंध निदेशक नमित बाजोरिया कहते हैं कि हम कुचीना को बाजार में लाए हैं क्योंकि मैंने खुद अपने घर में अपनी मां को रसोई में कड़ी मेहनत करते और बेचैनी सहते देखा है. उनके लिए खाना बनाने के बाद चीजों को साफ करना एक कठिन काम था. तभी मैंने ये विचार बना लिया था कि भारतीय रसोई को साफ रखने का कोई तरीका मुझे निकालना होगा और कुचीना मेरे उसी विचार का असल रूप है. इसने गृहिणियों के कई मुद्दों को हल कर दिया है. उनके समय को बचाया है और कड़ी मेहनत से उन्हें निजात दी है.
नमित बताते हैं कि उन्होंने 1996 में अपना करियर शुरू किया था. शुरुआत उन्होंने औफिस औटोमेशन सेवा उत्पादों की बिक्री से की. मगर उनकी महत्वाकांक्षा इससे ऊंची उड़ान भर रही थी और वे अपना कोई ब्रांड लेकर आना चाहते थे. लिहाजा 2003 में ही उन्होंने एक औटोमेटिक चिमनी के साथ अपना ब्रांड मार्किट में उतारा.
नमित कहते हैं, ‘‘2003 में जब हमने चिमनी लौंच की थी. तब बाजार पश्चिमी देशों की तरह समान सेवाएं देने वाले ब्रांडों से भरा हुआ था. मैंने सोचा कि क्या वे भारतीय आवश्यकताओं को पूरा करते हैं? क्योंकि भारतीय रसोई को तो ‘प्रलय’ माना जाता है. जो गंदगी और ग्रीस से भरी होती है. हमने देखा कि हमारी गृहिणियां अपने दैनिक समय 50% सफाई और धुलाई में खर्च करती हैं. फिर हमने गहन शोध किया और कुचीना जैसा उपकरण हम लेकर आए जो भारतीय रसोई की सफाई संबंधी जरूरतों को पूरा करने में पूरी तरह सक्षम है.’’
कुचीना में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है जिससे किचन तो साफ होता ही है, तेल बिंदुओं से भरी सारी गर्म हवा भी बाहर निकल जाती है और उसके बाद पूरी चिमनी अपनेआप साफ हो जाती है. नमित कहते हैं, ‘‘आधुनिक तकनीक वाली कुचीना चिमनी में बटन दबाते ही सफाई शुरू हो जाती है. ये आई-क्लीन तकनीक से संभव हुआ है. जल्दी ही भारत के हर किचन में हमारी ये चिमनी होगी ऐसी मेरी कोशिश है.’’
नमित कहते हैं, ‘‘हम हर दिन प्रयोग कर रहे हैं ताकि हमारे उत्पाद प्रगति करते रहें. ग्राहकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उत्पादों में नवाचार किया जा रहा है. हमने औटो-क्लीन चिमनियों के साथ शुरुआत की, जिसके लिए जरूरी था कि सिस्टम में साबुन के पानी को जोड़ा जाए. जो हमने किया. हम मौड्यूलर किचन में जर्मन तकनीक का भी इस्तेमाल कर रहे हैं जो सर्वश्रेष्ठ है. हमने अपने उत्पादों को आम भारतीय ग्राहक की जेब के अनुसार रखा है. धीरे-धीरे, उत्पादों की शृंखला में भी वृद्धि हो रही है. जल्दी ही हम पूर्ण रसोई समाधान प्रदान करेंगे.’’

पिछले महीने एक दुर्घटना में मेरे कान के परदे में छेद हो गया है, इस के उपचार के कौनकौन से विकल्प हैं?

सवाल 

पिछले महीने एक दुर्घटना में मेरे कान के परदे में छेद हो गया है. इस के उपचार के कौनकौन से विकल्प हैं?

जवाब 

अगर कोई जानलेवा घटना जैसेकि विस्फोट या वाहन चलाते समय कोई दुर्घटना घटित होने से कान में अचानक तेज दर्द हो तो संभवतया कान के परदे में छेद हो गया है. अगर दुर्घटना के समय तेज दर्द हो और फिर बंद हो जाए तो सम?िए की कान के मध्यभाग को नुकसान पहुंचा है. अगर कान के परदे में छोटा छेद है तो अपनेआप ही भर जाता है. लेकिन अगर बड़ा छेद हो तो उपचार कराना जरूरी हो जाता है.

मैडिकेटेड पेपर से कान के परदे वाले स्थान पर पैचिंग कर दी जाती है. गंभीर मामलों में शरीर के दूसरे भाग से ऊतक ले कर छेद को बंद करने के लिए वहां लगा दिए जाते हैं. समय रहते उपचार न कराया जाए तो कान में तेज दर्द हो सकता है और संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है.

ये भी पढ़ें-

मैं एक डिस्को बार में काम करती हूं. पिछले कुछ दिनों से मुझे थोड़ा कम सुनाई दे रहा है. मैं क्या करूं?

आंतरिक कान में छोटीछोटी हेयर सेल्सर की एक कतार होती है. ये मस्तिष्क को संकेत पहुंचाती हैं. तेज आवाज में संगीत सुनने से यह हेयर सेल्से चपटे हो जाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद फिर से अपनी सामान्य स्थिति में आ जाते हैं. लंबे समय तक चलने वाला ध्वनि प्रदूषण इन्हें क्षतिग्रस्त कर नष्ट कर सकता है. उम्र बढ़ने के साथ यह समस्या और गंभीर हो जाती है, जिस से सुनने की क्षमता समाप्त हो जाती है.

जब आप तेज आवाजों से बच न सकें, तो हियरिंग प्रोटैक्शन डिवाइसेस जैसे ईयर प्लग्स और ईयर मफ्स का इस्तेमाल करें. अगर जौब के कारण इन का इस्तेमाल संभव न हो तो जौब बदल लें क्योंकि युवावस्था में ही सुनने की क्षमता सुरक्षित रखने के प्रयास करना जरूरी है.

 

मीठे मे बनाए स्वादिष्ट बादाम की खीर और रागी के लड्डू

बादाम  प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होते हैं. और बादाम की खीर बड़ी मजेदार होती है, और बच्चों को बेहद पसंद आती है. तो इस वीकेंड आप बनाएं बादाम की खीर.

  1. बादाम का खीर

सामग्री

– 1 कप बादाम भीगे और छिलका हटे

– 1/2 लिटर फुल क्रीम दूध द्य 4 बड़े चम्मच चीनी (बूरा)

– 1 छोटा चम्मच इलायची पाउडर

– एक चुटकी केसर दूध में भीगा द्य 1/4 कप कद्दूकस किया हुआ मावा.

विधि

एक पैन में फुल क्रीम दूध को तब तक उबालें जब तक कि यह 30% कम न हो जाए फिर ठंडा होने के लिए अलग रख दें. बादाम को फुल क्रीम दूध के साथ मिला कर मुलायम पेस्ट बना लें. इस में इलायची पाउडर और चीनी मिलाएं. एक अलग पैन में कद्दूकस किया हुआ मावा मध्यम आंच पर नरम होने और पेस्ट बनने तक भून लें. मावा में धीरेधीरे दूध डालें और लगातार चलाते रहें ताकि कोई गांठ न रहे. तैयार होने पर आंच बंद कर लें और मिश्रण को छलनी की सहायता से बाउल में छान लें. इस में केसर डालें और मिक्स कर के फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दें. बारीक कटे काजूबादाम, कद्दू के बीज या गुलाब की पंखुडि़यां डाल कर गार्निश करें और सर्व करें.

2. रागी के लड्डू

सामग्री

– 1 कप रागी का आटा

-1/2 कप पाउडर शुगर

– 2 बड़े चम्मच पानी

– 3/4 कप घी

– 1/2 छोटा चम्मच अदरक पाउडर (सौंठ)

-1/2 छोटा चम्मच इलायची पाउडर

– 1 बड़ा चम्मच तिल.

विधि

एक पैन में तिल को ड्राई रोस्ट कर के एक तरफ रख दें. उसी पैन में रागी के आटे को तब तक ड्राई रोस्ट करें जब तक कि उस का रंग न बदल जाए. उस के बाद घी और रागी का आटा डालें और मिक्स कर के आंच से उतार लें. एक अलग पैन में शुगर पाउडर को पानी के साथ तब तक पकाएं जब तक कि वह पिघल न जाए. अब पहले से तैयार रागी के आटे के मिश्रण में तुरंत ही चाशनी डालें. साथ ही इस में अदरक पाउडर, इलायची पाउडर और भुने हुए तिल डाल कर अच्छी तरह मिक्स करें. हाथों को घी से चिकना कर मिश्रण से लड्डू तैयार करें. अगर मिश्रण ज्यादा ठंडा हो जाए तो इस में हलका गरम घी डाल सकते हैं. चांदी के वर्क से गार्निश कर परोसें.

तो हाजमा रहेगा सही

अगर पाचनतंत्र ठीक से काम न कर सके तो अपच की समस्या हो सकती है. अपच आमतौर पर कई बीमारियों और जीवनशैली से जुड़े कारकों की वजह से होता है. पाचन संबंधी समस्याओं के लक्षण आमतौर पर कुछ इस तरह होते हैं:

पेट फूलना, गैस, कब्ज, डायरिया, उलटी, सीने में जलन. आहार जो पाचनतंत्र के लिए फायदेमंद है

छिलके वाली सब्जियां: सब्जियों में फाइबर भरपूर मात्रा में होता है, जो पाचन के लिए महत्त्वपूर्ण है. फाइबर कब्ज दूर करने में मदद करता है. सब्जियों के छिलके में फाइबर बहुत अधिक होता है, इसलिए अच्छा होगा कि आप पूरी सब्जी खाएं. आलू, बींस और फलियों के छिलकों में फाइबर बहुत ज्यादा मात्रा में पाया जाता है.

फल: फलों में फाइबर बहुत अधिक पाया जाता है. इन में विटामिन और मिनरल्स भी अधिक मात्रा में पाए जाते हैं जैसे विटामिन सी और पोटैशियम. उदाहरण के लिए सेब, संतरा और केला पाचन के लिए बेहद कारगर हैं.

साबूत अनाज से युक्त आहार: साबूत अनाज भी घुलनशील और अघुलनशील फाइबर का अच्छा स्रोत है. घुलनशील फाइबर बड़ी आंत में जैल जैसा पदार्थ बना लेता है, जिस से पेट भरा महसूस करते हैं और शरीर में ग्लूकोस का अवशोषण धीरेधीरे होता रहता है. अघुलनशील फाइबर कब्ज से बचाने में मदद करता है. फाइबर पाचनतंत्र में अच्छे बैक्टीरिया को पोषण भी देता है.

खूब तरल का सेवन करें: त्वचा को स्वस्थ रखने, इम्यूनिटी और ऊर्जा बढ़ाने के लिए शरीर को पानी की जरूरत होती है. पानी पाचन के लिए भी जरूरी है. जिस तरह हमारे पाचनतंत्र में अच्छे बैक्टीरिया को होना जरूरी है उसी तरह तरल भी बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण है.

अदरक: अदरक पाचन की समस्याओं जैसे पेट फूलना में राहत देती है. सूखा अदरक पाउडर बेहतरीन मसाला है, जो भोजन को बेहतरीन स्वाद देता है. अदरक का इस्तेमाल चाय बनाने में भी किया जाता है. अच्छी गुणवत्ता का अदरक चुनें. चाय के लिए ताजा अदरक लें.

हलदी: हलदी आप की किचन में मौजूद ऐंटीइनफ्लैमेटरी और ऐंटीकैंसर मसाला है. इस में करक्युमिन पाया जाता है, जो पाचनतंत्र के भीतरी स्तर को सुरक्षित रखता है, अच्छे बैक्टीरिया को पनपने में मदद करता है और बोवल रोगों एवं कोलोरैक्टल कैंसर के उपचार में भी कारगर पाया गया है.

योगहर्ट: इस में प्रोबायोटिक्स होते हैं. ये लाइव बैक्टीरिया और यीस्ट हैं, जो पाचनतंत्र के लिए फायदेमंद होते हैं.

असंतृप्त वसा: इस तरह की वसा यानी फैट शरीर को विटामिनों के अवशोषण में मदद करते हैं. इन के साथ फाइबर पाचन को आसान बनाता है. पौधों से मिलने वाले तेल जैसे जैतून का तेल अनसैचुरेटेड फैट का अच्छा स्रोत है, लेकिन वसा का इस्तेमाल हमेशा ठीक मात्रा में करें. एक वयस्क को रोजाना अपने आहार में 2000 कैलोरी की जरूरत होती है, जिस में वसा की मात्रा 77 ग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए.

क्या न खाएं

कुछ खाद्य एवं पेयपदार्थों के कारण पेट फूलना, सीने में जलन और डायरिया जैसी समस्याएं होती हैं. उदाहरण के लिए:

तेलीय/वसा युक्त आहार: तले और मसालेदार भोजन के सेवन से बचें, क्योंकि यह आप के पाचनतंत्र के लिए कई समस्याओं का कारण बन सकता है. ऐसे आहार को पचने में ज्यादा समय लगता है. इस कारण कब्ज, पेट फूलना या डायरिया जैसी समस्याएं होती हैं. तले खाद्यपदार्थों के सेवन से ऐसिडिटी और पेट फूलना जैसी समस्याएं होती हैं.

मसालेदार भोजन: मसालेदार भोजन पेट में दर्द या मलत्याग करते समय असहजता का कारण बन सकता है.

प्रोसैस्ड फूड: अगर आप को पाचन संबंधी समस्याएं हैं. प्रोसैस्ड खाद्यपदार्थों का सेवन न करें, इस तरह के आहार में फाइबर कम मात्रा में होता है, जबकि कृतिम चीनी, कृत्रिम रंग, नमक एवं प्रीजरर्वेटिव बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, जो आप की पाचन संबंधी समस्याओं को और बदतर बना सकते हैं, साथ ही फाइबर न होने के कारण इस तरह के भोजन को पचाने के लिए शरीर के ज्यादा काम करना पड़ता है और यह कब्ज का कारण बन सकता है.

रिफाइंड चीनी, सफेद रिफाइंड चीनी इनफ्लैमेटरी कैमिकल बनाती है और पाचनतंत्र में डिसबायोसिस को बढ़ावा देती है. इस से पाचनतंत्र में बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ जाता है. इस तरह की चीनी हानिकर बैक्टीरिया को बढ़ावा देती है.

शराब: शराब के सेवन से डीहाइड्रेशन हो जाता है, जो कब्ज और पेट फूलने का कारण बन सकता है. यह पेट एवं पाचनतंत्र के लिए नुकसानदायक है और लिवर के मैटाबोलिज्म में बदलाव ला सकती है. शराब ऐसिडिक होती है, इसलिए स्टमक यानी आमाशय के भीतरी अस्तर को नुकसान पहुंचा सकती है.

कैफीन: कैफीन, चाय, कौफी, चौकलेट, सौफ्ट ड्रिंक, एनर्जी ड्रिंक, बेक्ड फूड, आईसक्रीम में पाया जाता है. यह पाचनतंत्र के मूवमैंट को तेज करता है, जिस से पेट जल्दी खाली हो जाता है. इस से पेट दर्द और डायरिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

कार्बोनेटेड पेय: इन में मौजूद गैस पेट फूलना जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है. इस का असर आमाशय के भीतरी स्तर पर भी पड़ता है. साथ ही इस तरह के पेयपदार्थों में चीनी बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है, जो पाचन की समस्याओं को और बढ़ा सकती है. कार्बोनेटेड पेय, शरीर में इलैक्ट्रोलाइट के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं, जिस से शरीर डीहाइड्रेट हो सकता है.

नीम की पत्तियों के ये फेसपैक करें ट्राय, ग्लोइंग रहेगी स्किन

नीम की पत्तियां औषधीय गुणों से भरपूर हैं. इसलिए इनका प्रयोग विंटर्स में भी बहुत फायदेमंद होता है. इनका सेवन न केवल सर्दी-खांसी, बुखार, डायबिटीज व डेंगू जैसी बीमारियों में फायदेमंद है बल्कि नीम पत्तियों को सुदंरता बढ़ाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है. आइए जानते हैं नीम के कुछ फेस पैक के बारे में.

1. औयली स्किन

इस तरह की स्किन पर पिंपल्स की समस्या अधिक होती है. नीम की पत्तियों से बना पैक ऑयली स्किन व पिंपल्स की समस्या दूर करता हैं. असल में नीम में एंटीऑक्सीडेंट व एंटीसेप्टिक गुण होते हैं, जिससे सभी ब्यूटी प्रॉब्लम्स को दूर किया जा सकता है.

फेस पैक

नीम की 8-10 पत्तियों को पीस लें और  2 टीस्पून गुलाबजल व 1 टीस्पून नींबू का रस मिलाएं.  चेहरे पर 5 से 10 मिनट के लिए लगााायें और सूखने के  बाद  पानी से फेेस धो लें.

2. ड्राई स्किन

नीम की पत्तियों में मौजूद एंटी-बैक्टीरियल और एंटीफंगल गुण स्किन के रूखेपन को  दूर करते है और स्किन को अंदर से पोषण और नमी देते है.

फेस पैक

नीम की पत्तियों को पीसें फिर 1  टीस्पून कच्‍ची हल्दी और 1 टीस्पून नारियल तेल मिलाकर  चेहरे व, गर्दन और हाथों पर लगाएं. कुछ देर के बाद इसे  पानी से धो लें.   स्किन ग्‍लो करेगी और ड्राईनेस भी दूर होगी.

3. दाग-धब्‍बों के लिए

नीम स्किन की डेड सेल्‍स को हटाता है व रोम छिद्रों को साफ करता है.

फेस पैक

1 टेबलस्पून नीम का पेस्ट ,1 टेबलस्पून चना पाउडर, 1 टीस्पून दही सबको मिलाकर चेहरे और गर्दन पर लगाएं. 10 मिनट बाद साफ पानी से चेहरा धो लें.

4. ग्‍लोइंग स्किन

बेजान स्किन को निखारता है.

फेस पैक

नीम की पत्तियों का पेस्ट लें. इसमें 1 कप पपीते के गूूूदे को मिलायें.  सूखने के बाद आप फेस धो लें. हफ्ते में 2 बार इस्तेमाल करें.

5. झाइयां

झाइयां और फाइन लाइन्स जैसी परेशानी को दूर करने के लिए नीम की पत्तियों से बना पैक फायदेमंद है.

फेस पैक

2 टेबलस्पून ओटमील, 1 टेबलस्पून कच्चा दूध, 1 टीस्पून शहद, 2 चाय का चम्मच नीम के पेस्ट को मिलाकर फेस पर लगाएं और 10 मिनट बाद धोयें. हफ्ते में 2 बार प्रयोग करें.समस्या से छुटकारा मिलेगा.

 

शरणागत: कैसे तबाह हो गई डा. अमन की जिंदगी

शरणागत: कैसे तबाह हो गई डा. अमन की जिंदगी- भाग 1

आईसीयू में लेटे अमन को जब होश आया तो उसे तेज दर्द का एहसास हुआ. कमजोरी की वजह से कांपती आवाज में बोला, ‘‘मैं कहां हूं?’’

पास खड़ी नर्स ने कहा, ‘‘डा. अमन, आप अस्पताल में हैं. अब आप ठीक हैं. आप का ऐक्सिडैंट हो गया था,’’ कह कर नर्स तुरंत सीनियर डाक्टर को बुलाने चली गई.

खबर पाते ही सीनियर डाक्टर आए और डा. अमन की जांच करने लगे. जांच के बाद बोले, ‘‘डा. अमन गनीमत है जो इतने बड़े ऐक्सिडैंट के बाद भी ठीक हैं. हां, एक टांग में फ्रैक्चर हो गया है. कुछ जख्म हैं. आप जल्दी ठीक हो जाएंगे. घबराने की कोई बात नहीं.’’

डाक्टर के चले जाने के बाद नर्स ने डा. अमन को बताया कि उन के परिवार वालों को सूचित कर दिया गया है. वे आते ही होंगे. फिर नर्स पास ही रखे स्टूल पर बैठ गई. अमन गहरी सोच में पड़ गया कि अपनी जान बच जाने की खुशी मनाए या अपने जीवन की बरबादी का शोक मनाए?

कमजोरी के कारण उस ने अपनी आंखें मूंद लीं. एक डाक्टर होने के नाते वह यह अच्छी तरह समझता था कि इस हालत में दिमाग और दिल के लिए कोई चिंता या सोच उस की सेहत पर गलत असर डाल सकती है पर वह क्या करे. वह भी तो एक इंसान है. उस के सीने में भी एक बेटे, एक भाई और पति का दिल धड़कता है. इन यादों और बातों से कहां और कैसे दूर जाए?

आज उसे मालूम चला कि एक डाक्टर हो कर मरीज को हिदायत देना कितना आसान होता है पर एक सामान्य मरीज बन कर उस का पालन करना कितना कठिन.

डा. अमन के दिलोदिमाग पर अतीत के बादल गरजने लगे… डा. अमन को याद आया अपना वह पुराना जर्जर मकान जहां वह अपने मातापिता और 2 बहनों के साथ रहता था. उस के पिता सरकारी क्लर्क थे. वे रोज सवेरे 9 बजे अपनी पुरानी साइकिल पर दफ्तर जाते और शाम को 6 बजे थकेहारे लौटते.

उस की मां बहुत ही सीधीसादी महिला थीं. उस ने उन्हें हमेशा घर के कामों में ही व्यस्त देखा, कभी आराम नहीं करती थीं. वे तीनों भाईबहन पढ़नेलिखने में होशियार थे. जैसे ही बहनों की पढ़ाई खत्म हुई उन की शादी कर दी गई. पिताजी का आधे से ज्यादा फंड बहनों की शादी में खर्च हो गया. उस के पिता की इच्छा

थी कि वे अपने बेटे को डाक्टर बनाएं. इस इच्छा के कारण उन्होंने अपने सारे सुख और आराम त्याग दिए.

वे न तो जर्जर मकान को ही ठीक करवा पाए और न ही स्कूटर या कार ले पाए. बरसात में जब जगहजगह से छत से पानी टपकने लगता तो मां जगहजगह बरतन रखने लगतीं. ये सब देख कर उस का मन बहुत दुखता था. वह सोचता कि क्या करना ऐसी पढ़ाई को जो मांबाप का सुखचैन ही छीन ले पर जब वह डाक्टरी की पढ़ाई कर रहा था तब पिता के चेहरे पर एक अलग खुशी दिखाई देती. उसे देख उसे बड़ा दिलासा मिलता था.

तभी दरवाजा खुलने की आवाज उसे वर्तमान में लौटा लाई. उस के मातापिता और बहनें आई थीं. पिता छड़ी टेकते हुए आ रहे थे. मां को बहनें पकड़े थीं. उस का मन घबराने लगा. सोचने लगा कि मैं कपूत उन के किसी काम न आया. मगर वे आज भी उस के बुरे समय में उस के साथ खड़े थे. जिसे सब से पहले यहां पहुंचना चाहिए था उस का कोसों दूर तक पता न था.

काश वह एक पक्षी होता, चुपके से उड़ जाता या कहीं छिप जाता. अपने मातापिता का सामना करने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी. उस ने आंखें बंद कर लीं. मां का रोना, बहनों का दिलासा देना, पिता का कुदरत से गुहार लगाना सब उस के कानों में पिघले सीसे की तरह पड़ रहा था.

तभी नर्स ने आ कर सब को मरीज की खराब हालत का हवाला देते हुए बाहर जाने को कहा. मातापिता ने अमन के सिर पर हाथ फेरा तो उसे ऐसे लगा मानो ठंडी वादियों की हवा उसे सहला रही हो. धीरेधीरे सब बाहर चले गए.

अमन फिर अतीत के टूटे तार जोड़ने लगा…

जैसे ही अमन को डाक्टर की डिग्री मिली घर में खुशी की लहर दौड़ गई. मातापिता खुशी से फूले नहीं समा रहे थे. बहनें भी खुशी से बावली हुई जा रही थीं. 2 दिन बाद ही इन खुशियों को दोगुना करते हुए एक और खबर मिली. शहर के नामी अस्पताल ने उसे इंटरव्यू के लिए बुलाया था. 2 सप्ताह बाद अमन की उस में नौकरी लग गई. उस के पिता की बहुत इच्छा थी

कि वह अपना क्लीनिक भी खोले. उस ने पिता की इच्छा पर अपनी हामी की मुहर लगा दी. वह अस्पताल में बड़े जोश से काम करने लगा.

अभी अमन की नौकरी लगे 1 साल भी नहीं हुआ था कि अचानक उस की जिंदगी में एक ऐसा तूफान आया कि उस ने उस के जीवन की दिशा ही बदल दी.

दोपहर के लंच के बाद अमन डा. जावेद के साथ बातचीत कर रहा था. डा. जावेद सीनियर, अनुभवी और शालीन स्वभाव के थे. वे अमन की मेहनत और लगन से प्रभावित हो कर उसे छोटे भाई की तरह मानने लगे थे.

उसी समय एक घायल लड़की को अस्पताल लाया गया. वह कालेज से आ रही थी कि उस की साइकिल का बैलेंस बिगड़ गया और वह बुरी तरह जख्मी हो गई. डा. जावेद, अमन और अन्य डाक्टर उस के इलाज में जुट गए. उसे काफी चोटें आई थीं. एक टांग में फ्रैक्चर भी हो गया था. लड़की के मातापिता बहुत घबराए हुए थे. उन्हें दिलासा दे कर बाहर वेटिंग हौल में बैठने को कहा. लड़की के इलाज का जिम्मा डा. अमन को सौंपा गया.

लड़की बेहोश थी. उस के होश में आने का वहीं बैठ कर इंतजार करने लगा. लड़की बहुत सुंदर थी. तीखे नैननक्श, गोरा रंग, लंबे बाल. उस के होश में आने पर उस के मातापिता को बुलाया गया. बातोंबातों में पता चला कि लड़की का नाम नीरा है. बीए फाइनल का आखिरी पेपर दे कर लौट रही थी. सहेली के साथ बातें करती आ रही थी. तभी ऐक्सिडैंट हो गया.

आगे पढ़ें- अमन ने उन्हें धीरज बंधाते हुए…

FILM REVIEW-‘‘मिसेज चक्रवर्ती वर्सेज नाॅर्वेः रानी मुखर्जी ने अपने अभिनय से मां को मेलोड्रामा बना दिया

रेटिंगः डेढ़ स्टार
निर्माताः निखिल अडवाणी,मोनिषा अडवाणी,मधु भोजवानी और जी स्टूडियो
लेखकः समीर सतीजा,आषिमा छिब्ब्र और राहुल हांडा
निर्देषकः आषिमा छिब्बर
कलाकारः रानी मुखर्जी,अनिर्बन भट्टाचार्य,जिम सर्भ,नीना गुप्ता व अन्य
अवधिः दो घंटे 15 मिनट

जब किसी सत्य घटनाक्रम पर फिल्म बनानी हो,तो ‘सिनेमाई स्वतंत्रता’ के नाम पर तथ्यों से छेड़छाड़ नहीं किया जाता.मगर आषिमा छिब्बर निर्देषित पारिवारिक कानूनी डामा फिल्म ‘‘ मिसेज चक्रवर्ती वर्सेज नाॅर्वे’’ देखने के बाद अहसास होता है कि फिल्मकार ने 2010 से 2012 के बीच घटित घटनाक्रम पर फिल्म बनाते समय इतिहास को बदलने का प्रयास किया है.यह कितना सच है ,कितना गलत,इस पर बहस जरुर छिड़ेगी.

फिल्म ‘‘मिसेज चक्रवर्ती वर्सेज नाॅर्वे’ नाॅर्वे में 2010 से 2012 के बीच नाॅर्वे में एक भारतीय जोड़े के साथ घटी सत्य घटना पर है.यह फिल्म सागरिका भट्टाचार्य की आत्मकथा ‘द जर्नी ऑफ ए मदर‘ पर आधारित है,जिनके दो बच्चे 2011 में नार्वेजियन चाइल्ड केयर सिस्टम (बार्नवेर्नेट) द्वारा उनसे ले लिए गए थे. हैदराबाद में जन्मी व दिल्ली मंे पली बढ़ी आषिमा छिब्बर ने बतौर सहायक निर्देषक कैरियर की षुरूआत की थी.फिर वह फिल्म ‘‘राॅकस्टार’’ और ‘‘लेट्स गो इंडिया’ में सेकंड युनिट डायरेक्टर व सहायक निर्देषक के रूप में भी जुड़ी रही.2013 में उन्हे ‘यषराज फिल्मस’ की फिल्म ‘मेरे डैड की मारूती’ स्वतंत्र रूप से निर्देषित करने का अवसर मिला था.पर इस फिल्म ने कुछ खास प्रभाव नहीं डाला था.और अब पूरे दस वर्ष बाद आषिमा छिब्बर बतौर निर्देषक फिल्म ‘‘मिसेज चक्रवर्ती वर्सेज नाॅर्वे’ लेकर आयी हैं.पूरी तरह से निराष करने वाली इस फिल्म में तथ्यात्मक त्रुतियों की भरमार है.मगर जिस महिलायानी कि सागरिका भट्टाचार्य के साथ नाॅर्वे में घटी घटना क्रम पर बनी इस फिल्म को लेकर सागरिका भट्टाचार्य भी फिल्म की तारीफों के पुल बांधते हुए नहीं थक रही हैं.षायद उन्हे अपनी जिंदगी की कहानी पर फिल्म बनाने के लिए एक लंबी रकम मिल गयी होगी.वैसे भी इस फिल्म या यंू कहें कि नाॅर्वे में सागरिका भट्टाचार्य के साथ जो कुछ घटित हुआ था, उसकी जड़ में पैसा और पारिवारिक मतभेद ही था.फिल्म में सिनेमाई स्वतंत्रता के नाम पर सागरिका भट्टाचार्य की जगह देबिका चक्रवर्ती और उनके पति अनूप भट्टाचार्य की जगह अनिरूद्ध चक्रवर्ती नाम रखे गए हैं.

कहानीः

कहानी चक्रवर्ती परिवार की है.अनिरूद्ध चक्रवर्ती इंजीनियर हैं और उनकी पत्नी देबिका चक्रवर्ती बीएससी पास है.अच्छे भविष्य के लालच में चक्रवर्ती अपनी पत्नी के साथ नॉर्वे चले गए थे.उनका एक बेटा षुभ है. जबकि देबिका 2010 में बेटी सुचि को जन्म देती हंै.जब सुचि चार माह की होती है,तभी षुभ और सुचि को माता पिता के अनुचित व्यवहार के आधार पर बार्नवरनेट (जिसे नॉर्वेजियन चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज के रूप में भी जाना जाता है) द्वारा अपने कब्जे में ले लिया जाता है.पता चलता है कि चक्रवर्ती के एक भारतीय सहकर्मी व उनके दोस्त ने ही उनके खिलाफ षिकायत की थी.चक्रवती परिवार नॉर्वे की एक अदालत में अपील करते हैं,लेकिन असफलता ही हाथ लगती है.देबिका हार मानने को तैयार नही है.जब नाॅर्वे के साथ एक ट्ीटी पर हस्ताक्षर करने भारतीय विदेषमंत्री पहुॅचते हंै,तो प्रेस काॅफ्रेंस में देबिका अपने बच्चों को वापस दिए जाने का मसला उठाती हैं.फिर भारतीय विदेश मंत्रालय हस्तक्षेप करता है. लेकिन देबिका के लालची देवर,सास व ससुर को अपने साथ कर नार्वे सरकार दोनों बच्चे देबिका के देवर को दत्तक दे देती है.ज्ञातब्य है कि जिसे बच्चे दत्तक मिलते हैं,उसे नाॅर्वे सरकार बच्चों के अठारह वर्ष की उम्र में पहुॅचने
तक हर माह पचास लाख रूपए देती है.इस तरह देबिका के देवर को एक करोड़ रूपए मिल रहे थे.फिर देबिका का पति उसे तलाक दे देता है और देबिका का देवर उसे बच्चे देने से इंकार कर देता है.तब देबिका कलकत्ता उच्च न्यायालय पहुॅचती है.
अंततः नवंबर 2012 में देबिका को बच्चे मिल जाते हैं.

लेखन व निर्देषनः

पूरे दस वर्ष बाद आषिमा छिब्बर बतौर निर्देषक यह फिल्म लेकर आयी हैं,जो कि पारिवारिक मेलोड्ामा के अलावा कुछ नही है.आषिमा छिब्बर ने दो अन्य लेखकांे समीर सतीजा और राहुल हांडा के साथ मिलकर इस फिल्म को लिखा है.लेखकों को कहानी व पटकथा लिखने के लिए पूरी कहानी एक आत्मकथा वाली किताब ‘‘द जर्नी आॅफ ए मदर’ मिली थी,इसके बावजूद पटकथा में काफी झोल हैं.हमने यह किताब नही पढ़ी है,इसलिए हम यह दावा नही कर सकते कि फिल्म उस किताब पर कितना आधारित है.

 

मगर फिल्म देखकर सागरिका भट्टाचार्य जरुर फिल्म और उनका किरदार निभाने वाली अभिनेत्री रानी मुखर्जी की प्रषंसा करते हुए नही थक रही है.उधर रानी मुखर्जी का दावा है कि वह सागरिका से मिल ही नही.फिल्म के लिए फिल्मकार ने कोई षोध कार्य किया हो,ऐसा भी नहीं लगता.फिल्मकार ने दक्षिण एषियाई देषों में बच्चों की परवरिष के नियमों पर फिल्म बात नही करती.केवल भारतीय परवरिष पर बात करती है. चाइल्ड वेल्फेअर के नाम पर नाॅर्वे जो बहुत बड़ा भ्रष्टाचार हो रहा है,उस पर फिल्म ज्यादा बात नही करती.फिल्मकार का सारा ध्यान सत्य घटनाक्रम को सही परिप्रेक्ष्य मंे पेष करने की बजाय भारतीय परिवारों के अंदर मेलोड्ामा को चित्रित कर दर्षक को उलझाए रखना ही रहा है.

फिल्म इतनी तेज गति से भागते हुए दर्षक को सम्मोहित करती है कि दर्षक प्रमाणिकता की परवाह करना भूल जाता है.
इसका फायदा फिल्मकार ने जमकर उठाया है.पूरी फिल्म के घटनाक्रम विरोधाभासों से भरे हुए हैं.क्या एक पिता महज नाॅर्वे की नागरिकता पाने या चंद रूपयांे के लिए अपने बच्चों की बलि दे सकता है?
फिल्मकार आषिमा छिब्बर ने सारा ध्यान रानी मुखर्जी से मेलाड्ामैटिक अभिनय करवाने पर ही केंद्रित रखा.मगर मां से छीनकर बच्चे फोस्टर व दत्तक परिवार मंे जाते हैं,तो उन पर किस तरह का मानसिक दबाव पड़ता है,उनकी क्या मनः स्थिति है,उसका कहीं कोई जिक्र नहीं.जबकि इस सत्य घटनाक्रम में
सर्वाधिक यातना तो भोले भाले दो बच्चे झेलते हैं.पर फिल्मसर्जक की नजर इस पर नही जाती.षायद निर्देषक आषिमा छिब्बर को बाल मनोविज्ञान की समझ नही है और न ही उन्होने इस पर षोधकर जानना चाहा. यह इस फिल्म की सबसे बडी कमजोर कड़ी है.

फिल्म के अंत मंे जिस तरह से भारतीय एंथेम को पेष किया गया है,वह अजीब लगता है. नाॅर्वे में अदालत के अंदर जो जज सुनवाई करते हैं,वह नार्वे के नही बल्कि वह जर्मन या रषियन नजर आते हैं.नाॅर्वे में हर इंसान सिर्फ नार्वेजियन भाषा ही बोलते हैं,मगर इस फिल्म में वह अंग्रेजी बोलते नजर आते हैं.यह भी कमजोर कड़ी है.
फिल्म मेें दो देषों की संस्कृतियों के टकराव महज चीख पुकार में बदलकर रह गयी है.फिल्मकार किसी भी मुद्दे को ंसंवेदनषीलता के साथ सही परिप्रेक्ष्य में नहीं उठाता. फिल्म की कहानी का घटनाक्रम 2010 से 2012 तक का है.उस वक्त भारत में यूपीए/मनमोहन सिंह की सरकार थी.पर फिल्म के अंत में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व.सुषमा स्वराज व वृंदा कारंत का धन्यवाद अदा किया गया है कि इनके प्रयासों से सागरिका को उनके बच्चे मिल पाए.वृंदा कारंत ने तो कलकत्ता में सागरिका की मदद की थी और सागरिका के साथ अदालत भी जाती थीं.पर पूर्व केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ..? क्या यह इतिहास को नए सिरे से परिभाषित या लिखने का फिल्माकर ने प्रयास किया है?

अभिनयः

देबिका चटर्जी के किरदार में रानी मुखर्जी का अभिनय महज मेलोड्ामा के कुछ नही है.जोर जोर से चिल्लाना या चीखना अभिनय नही होता.यह तो हर आम औरत हर दिन कर सकती है.देबिका चटर्जी के किरदार में सागरिका की भावनाओं को उकेरने में रानी मुखर्जी विफल रही है.रानी मुखर्जी जैसी उम्दाकलाकार से इस तरह के अभिनय की उम्मीद नही थी.एक मां से उसका तीन साल का बेटा व चार माह की बेटी छीन ली जाए,तो जिस तरह की मनः स्थिति होती है,उसे यथार्थ के धरातल पर रानी मुखर्जी साकार नही कर पायी.रानी मुखर्जी ने मां को पूरी तरह से मेलोड्ामैटिक बना दिया है.इसे दर्षक कैसे सहन करेगा. उनके पति अनिरूद्ध के किरदार में अनिर्बन का अभिनय ठीक ठाक है.
नाॅवे में वकील दानियल सिंह सिस्पुक की छोटी भूमिका में जिम सर्भ का अभिनय जानदार है.पूरी फिल्म मंे वह न सिर्फ छा जाते हैं,बल्कि फिल्म खत्म होने पर वह दर्षकों के दिलो दिमाग में रह जाते हैं.पटकथा का साथ न मिल पाने के चलते कोई भी कलाकार ख्ुाद को मेलोड्ामैटिक होने से नहीं बचा पाता.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें