ये है वो पांच फेसपैक जो दूर करेंगे आप के व्हाइटहेड

औयली स्किन वालों के लिए व्हाइटहेड की परेशानी होना एक आम बात है. खराब खाने की आदत और अपनी त्‍वचा पर ध्‍यान न देने से यह हो जाते हैं. ग्रीन टी पीने से आपकी इस समस्‍या में काफी राहत मिल सकती है पर आप चाहें तो घर पर भी अपने द्रारा फेसपैक बना कर इस समस्‍या से छुटकारा पा सकती हैं. चलिए जानते हैं इसको बनाने की विधि के बारे में.

व्हाइटहेड दूर करने के लिए फेसपैक

  1. बटर फ्रूट और सूजी रवा मास्‍क:व्हाइटहेड के लिए बटर फ्रूट काफी लाभदायक है. इसमें मौजूद एंटीऑक्‍सीडेंट सीबम में बढ़ रहे बैक्‍टीरिया को रोकता है और दाग धब्‍बे से मुक्ति दिलाता है. बटर फ्रूट के गूदे को निकाल लें और उसे दालचीनी पाउडर के साथ मिला कर अपने चेहरे पर कुछ देर मसाज करें और जब वह सूख जाए तब चेहरा ठंडे पानी से धो लें. इससे पिंपल और दाग धब्‍बों से मुक्ति मिलेगी.
  2. औरेंज पील,शहद और आटे का मास्‍क –सिट्रस वाले फलों में एंटीबैक्‍टीरियल तत्‍व पाए जाते हैं. वहीं पर गेहूं एक प्राकृतिक स्‍क्रब और शहद त्‍वचा को सुरक्षित कर के उसे कसा बनाता है. यह पेस्‍ट बना कर चेहरे पर गोलाइ में लगाएं और फिर 15 मिनट बाद धो लें.
  3. दही,साबुदाना और बादाम पाउडर- दही में हल्‍के एसिड होते हैं जो चेहरे को अच्‍छे से साफ करता है. साबूदाने और दही को एक साथ मिला कर पेस्‍ट बनाएं और चेहरे पर लगाएं इससे चेहरे के बंद रोमछिद्र खुल जाएगें. वहीं पर बादाम स्‍क्रब के रूप में काम करता है. अगर आप इस फेस पैक को लगाएगीं तो आपकी त्‍वचा को नमी,सफाई और स्‍क्रबिंग तीनों मिलती रहेगी.
  4. स्‍ट्रौबेरी और टमाटर प्‍यूरी-इनके रस से चेहरे पर थोड़ी देर मालिश करने से चेहरा बिल्‍कुल खिल उठता है. इसको लगाने के बाद अपने चेहरे को गरम पानी से ही धोएं.
  5. पुदीना और पीपीता के बीज –इनको प्रयोग करने से यह स्‍क्रब का काम करता है. सबसे पहले पीपीते के गूदे में पुदीने को पीस लें और ध्‍यान रहे कि पीपीते के बीज भी साथ में ही रहें. इसके बीज स्‍क्रबिंग का कार्य करेगें और पपीता बैक्‍टीरिया को बढने से रोकेगा जिससे आपकी त्‍वचा साफ और चमकदार लगेगी.

जो भी प्रकृति दे दे – भाग – 3

‘मैं बदल लूंगी, आप जाइए, सोम. और घर की चाबी भी लौटा दीजिए.’’

सोम का चेहरा सफेद पड़ गया, शायद अपमान से. यह क्या हो गया है निशा को? क्या निशा स्वयं को उन के सामीप्य में असुरक्षित मानने लगी है? क्या उन्हें जानवर समझने लगी है?

एक सुबह जबरन सोम ने ही पहल कर ली और रास्ता रोक बात करनी चाही.

‘‘निशा, क्या हो गया है तुम्हें?’’

‘‘भविष्य में आप खुश रहें उस के लिए हमारी दोस्ती का समाप्त हो जाना ही अच्छा है.’’

‘‘सब के लिए खुशी का अर्थ एक जैसा नहीं होता निशा, मैं निभाने में विश्वास रखता हूं.’’

तभी दफ्तर में एक फोन आया और लोगों ने चर्चा शुरू कर दी कि बांद्रा शाखा के प्रबंधक विकास शर्मा की पत्नी और दोनों बच्चे एक दुर्घटना में चल बसे.

सकते में रह गए दोनों. विश्वास नहीं आया सोम को. निशा के पैरों तले जमीन ही खिसकने लगी, वह धम से वहीं बैठ गई.

सोम के पास विकास की बहन का फोन नंबर था. वहां पूछताछ की तो पता चला इस घटना को 2 दिन हो गए हैं.

भारी कदमों से निशा के पास आए सोम जो दीवार से टेक लगाए चुपचाप बैठी थी. आफिस के सहयोगी आगेपीछे घिर आए थे.

हाथ बढ़ा कर सोम ने निशा को पुकारा. बदहवास सी निशा कभी चारों तरफ देखती और कभी सोम के बढ़े हुए हाथों को. उस का बच्चा भी चला गया… एक आस थी कि शायद बड़ा हो कर वह अपनी मां से मिलने आएगा.

भावावेश में सोम से लिपट निशा चीखचीख कर रोने लगी. इतने लोगों में एक सोम ही अपने लगे थे उसे.

विकास दिल्ली वापस आ चुका था. पता चला तो दोस्ती का हक अदा करने सोम चले गए उस के यहां.

‘‘पता नहीं हमारे ही साथ ऐसा क्यों हो गया?’’ विकास ने उन के गले लग रोते हुए कहा.

वक्त की नजाकत देख सोम चुप ही बने रहे. उठने लगे तो विकास ने कह दिया, ‘‘निशा से कहना कि वह वापस चली आए… मैं उस के पास गया था. फोन भी किया था लेकिन उस ने कोई जवाब नहीं दिया,’’ विकास रोरो कर सोम को सुना रहा था.

उठ पड़े सोम. क्या कहते… जिस इनसान को अपनी पत्नी का रिसता घाव कभी नजर नहीं आया वह अपने घाव के लिए वही मरहम चाहता है जिसे मात्र बेकार कपड़ा समझ फेंक दिया था.

‘‘निशा तुम्हारी बात मानती है, तुम कहोगे तो इनकार नहीं करेगी सोम, तुम बात करना उस से…’’

‘‘वह मुझ से नाराज है,’’ सोम बोले, ‘‘बात भी नहीं करती मुझ से और फिर मैं कौन हूं उस का. देखो विकास, तुम ने अपना परिवार खोया है इसलिए इस वक्त मैं कुछ कड़वा कहना नहीं चाहता पर क्षमा करना मुझे, मैं तुम्हारीं कोई भी मदद नहीं कर सकता.’’

सोम आफिस पहुंचे तो पता चला कि निशा ने तबादला करा लिया. कार्यालय में यह बात आग की तरह फैल गई. निशा छुट्टी पर थी इसलिए वही उस का निर्देश ले कर घर पर गए. निर्देश पा कर निशा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई.

‘‘तबीयत कैसी है, निशा? घाव तो भर गया है न?’’

‘‘पता नहीं सोम, क्या भर गया और क्या छूट गया.’’

धीरे से हाथ पकड़ लिया सोम ने. ठंडी शिला सी लगी उन्हें निशा. मानो जीवन का कोई भी अंश शेष न हो. ठंडे हाथ को दोनों हाथों में कस कर बांध लिया सोम ने और विकास के बारे में क्या बात करें यही सोचने लगे.

‘‘मैं क्या करूं सोम? कहां जाऊँ? विकास वापस ले जाने आया था.’’

‘‘आज भी उस इनसान से प्यार करती हो तो जरूर लौट जाओ.’’

‘‘हूं तो मैं आज भी बंजर औरत, आज भी मेरा मूल्य बस वही है न जो 2 साल पहले विकास के लिए था…तब मैं मनु की मां थी…अब तो मां भी नहीं रही.’’

‘‘क्या मेरे पास नहीं आ सकतीं तुम?’’ निशा के समूल काया को मजबूत बंधन में बांध सोम ने फिर पूछा, ‘‘पीछे मुड़ कर क्यों देखती हो तुम…अब कौन सा धागा तुम्हें खींच रहा है?’’

किसी तरह सोम के हाथों को निशा ने हटाना चाहा तो टोक दिया सोम ने, ‘‘क्या नए सिरे से जीवन शुरू नहीं कर सकती हो तुम? सोचती होगी तुम कि मां नहीं बन सकती और जो मां बन पाई थी क्या वह काल से बच पाई? संतान का कैसा मोह? मैं भी कभी पिता था, तुम भी कभी मां थीं, विकास तो 2 बच्चों का पिता था… आज हम तीनों खाली हाथ हैं…’’

‘‘सोम, आप समझने की कोशिश करें.’’

‘‘बस निशा, अब कुछ भी समझना शेष नहीं बचा,’’ सस्नेह निशा का माथा चूम सोम ने पूर्ण आश्वासन की पुष्टि की.

‘‘देखो, तुम मेरी बच्ची बनना और मैं तुम्हारा बच्चा. हम प्रकृति से टक्कर नहीं ले सकते. हमें उसी में जीना है. तुम मेरी सब से अच्छी दोस्त हो और मैं तुम्हें खो नहीं सकता.’’

सोम को ऐसा लगा मानो निशा का विरोध कम हो गया है. उस की आंखें हर्षातिरेक से भर आईं. उस ने पूरी ताकत से निशा को अपने आगोश में भींच लिया. कल क्या होगा वह नहीं जानते परंतु आज उन्हें प्रकृति से जो भी मिला है उसे पूरी ईमानदारी और निष्ठा से स्वीकारने और निभाने की हिम्मत उन में है. आखिर इनसान को उसी में जीना पड़ता है जो भी प्रकृति दे.

YRKKH: अक्षरा ने दिखाया सच्चाई का आईना, खाली हाथ लौटा अभिमन्यु

स्टार प्लस का हिट टीवी सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ सालों से दर्शकों के दिलों पर राज कर रहा है. इस सीरियल के मेकर्स भी कहानी में जबरदस्त टर्न और ट्विस्ट लाने में कोई कसर नहीं छोड़ते और इसी वजह से प्रणाली राठौड़ (Pranali Rathod) और हर्षद चोपड़ा (Harshad Chopda) स्टारर यह सीरियल टीआरपी की लिस्ट में बना हुआ है. बीते दिनों सीरियल में देखने को मिला था कि अभिमन्यु ने आरोही से शादी के लिए मान जाता है. लेकिन अब अभि को अहसास हुआ है कि वह अक्षरा के बिना नहीं जी सकता. बीते एपिसोड में अभि अपनी अक्षु से प्यार का इजहार करता है. लेकिन अब कहानी में जबरदस्त ट्विस्ट आएगा. आइए आपको अपकमिंग एपिसोड का हाल बताते हैं.

 

अक्षरा के रिजेक्शन के बौखला जाएगा अभिमन्यु

ये रिश्ता क्या कहलाता है (Yeh Rishta Kya Kehlata Hai) के अपकमिंग एपिसोड में देखने के लिए मिलेगा अभिमन्यु अक्षरा द्वारा मिले रिजेक्शन को झेल नहीं पाएगा. कहानी में दिखाया जाएगा कि अक्षरा मंदिर से निकलकर सीधा अभिनव के गले लग जाती है और अभिमन्यु दोनों को देखता रहता जाता है. इसके बाद अभि नंगे पैर ही मंदिर से बाहर निकल जाएगा और वह सड़कों अकेले भटकता रहेगा. दूसरी तरफ बिरला हाउस में सब लोग अभिमन्यु को तलाश कर रहे होते हैं. पूरे घर में हंगामा खड़ा हो जाता है. इसके बाद घर के लोगों को अभि सड़क पर ही मिलेगा.

 

कसौली के जाएगी अक्षरा

इसके आगे कहानी में देखने के लिए मिलेगा कि अभिमन्यु को छोड़कर अक्षरा कसौली के लिए निकल जाती है और वह अभिनव और अबीर के साथ अपने घर पहुंच जाती है. यहां पर अबीर अपने गंदे घर को देखकर हैरान रह जाता है लेकिन अक्षु अपने घर को पूरी तरह ठीक करने की बात कहती है. दूसरी तरफ अक्षरा और अभिमन्यु को मंदिर में साथ देखकर अभिनव अभी भी काफी परेशान है और वह खुद को ठीक से संभाल भी नहीं पाता. वह अपनी सारी परेशानी नीलम मां को बताता है और वह कहता है कि मैं मामूली सा ड्राइवर हूं लेकिन अगर अक्षरा मेरे साथ रहकर मेरा अहसान चुका रही है तो मुझे ऐसा नहीं चाहिए.

अक्षरा से रिश्ते तोड़ेगा अभिमन्यु?

ये रिश्ता क्या कहलाता हैं की कहानी में आगे यह भी देखने के लिए मिलेगा कि अभिनव अक्षरा से कहता है कि जब आप ही पहले जैसी नहीं रही है तो आप घर को पहले जैसे क्यों बनाना चाहती है. इतना ही नहीं, वह खुद को अक्षरा का नाम का पति भी कहता है और बोलता है कि वह अभिमन्यु और अक्षरा के बीच में आ गया है और अब उसे जाना चाहिए. दूसरी तरफ अभिमन्यु भी आरोही को मंदिर में हुई सारी बातें बता देता है.

 

छोटी अनु ने खुद छोड़ा अनुज-अनुपमा का साथ, देखें वीडियो

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ इन दिनों काफी चर्चा में बना हुआ है. शो की पूरी कहानी छोटी अनु के इर्द-गिर्द घूम रही है. जहां एक तरफ माया ने छोटी के दिमाग में जहर भर दिया है तो वहीं छोटी के जाने से अनुज और अनुपमा के बीच भी दूरियां आनी शुरू हो गई हैं. दुख की बात तो यह है कि इस ट्रैक ने दर्शकों को भी परेशान करके रख दिया है. बीते दिन रुपाली गांगुली के ‘अनुपमा‘ में देखने को मिला कि माया छोटी अनु को लेकर अनुज और अनुपमा से मिलवाने आती है. अनुज और अनुपमा उसे मनाते हैं कि वह वहां रुक जाए और छोटी को कहीं न लेकर जाएं. लेकिन माया उसे ताना मारती है और खुद अनुज भी उसका साथ नहीं देता. हालांकि रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना के ‘अनुपमा’ में आने वाले ट्विस्ट यहीं पर खत्म नहीं होते हैं.

 

 

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अनुपमा के सामने जाने का कारण बताएगी छोटी अनु

रुपाली गांगुली के ‘अनुपमा’ में देखने को मिलेगा कि छोटी अनु अनुपमा के गले लगकर भावुक हो जाती है और बताती है कि उसे अनुज व अनुपमा के साथ ज्यादा अच्छा लगता है। इसके साथ ही छोटी बोल पड़ती है कि मैं माया के साथ जाऊंगी, क्योंकि उन्होंने मुझे बताया कि वो अकेली हैं और आपके पास तो सब हैं। छोटी की बात सुनकर अनुपमा हैरान रह जाती है

 

 

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माया की क्लास लगाएंगा परिवार

एंटरटेनमेंट से भरपूर ‘अनुपमा‘ में जल्द ही दिखाया जाएगा कि माया अनुज और अनुपमा के बीच जाने की कोशिश करती है और छोटी को उनसे छीनने की कोशिश करती है. लेकिन पूरा परिवार उसका रास्ता रोककर खड़ा हो जाता है. माया उनसे पूछती है कि वह अनुज-अनुपमा से बात करना चाहती है तो लोग उसे रोक क्यों रहे हैं, लेकिन इसपर बा भी ताना मारती हैं कि ये अनुज-अनुपमा का घर है तो तू हमें रोकने वाली होती कौन है

 

 

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अनुज-अनुपमा को छोड़कर चली जाएगी छोटी अनु

छोटी अनु अनुपमा से बताती है कि अगर वह यहां रही तो माया उन दोनों के बीच झगड़ा कराती रहेगी और छोटी को ले जाने के लिए दोनों को परेशान भी करेगी. छोटी अनु अनुपमा से जिद करती है कि वह उसे माया के साथ जाने दे और यह बात अनुज को भी समझा दें. ‘अनुपमा’ के प्रोमो वीडियो में भी देखने को मिला कि अनुपमा और अनुज रोते-रोते छोटी अनु को विदा करते हैं। दोनों उसकी कार के पीछे भी भागते हैं, लेकिन माया उसे लेकर चली जाती है.

दिखावा: अम्मा से आखिर क्यूं परेशान थे सब- भाग 2

दादी की इकलौती बची बहू ने तो शायद अपनी सास को न छूने का प्रण कर रखा था. घर से चलती तो कम से कम भारी साड़ी पहन कर. साथ में मेलखाता हुआ ब्लाउज. इस के ऊपर रूज, लिपस्टिक का मेकअप. अस्पताल में जा कर पुन: एक बार अपना मेकअप शीशे में देखना न भूलती ताकि राह में कोई गड़गड़ हुई हो तो ठीक की जा सके. उस उम्र में भी चाची का ठसका देखने वाला था. वह तो मु?ा तक से फ्लर्ट कर लिया करती थी.

मैं ने उस से एक दिन कह ही दिया, ‘‘चाची, आप का यह शृंगार यहां शोभा नहीं देता.’’

वह तपाक से बोली, ‘‘तुम क्या जानो. बहुत सारे डाक्टर यहां आते हैं. कुछेक उन के व दामादों के मित्र भी हैं. वे मित्र भी दादी को देखने आते ही हैं. मु?ो सादे कपड़ों में देखेंगे तो क्या कहेंगे. कितनी बेइज्जती होगी तुम्हारे चाचा की एक बड़े व्यापारी की पत्नी के नाते मु?ो यह सब पहनना पड़ता है. घर की इज्जत का सवाल जो है.’’

दादा के एकमात्र सुपुत्र और हमारे यहां मौजूद एक ही अदद चाचा साहब को तो बिजनैस से ही फुरसत नहीं मिलती थी. हां, रोज रात एक बार जरूर इधर से हो जाते थे. रात में ठहरने के नाम पर दुकान के नौकर को बैठा जाते थे, जो आधा सोता तो आधा ऊंघता था. रात में ग्लूकोस आदि चढ़ाते समय दादी के हाथ को पकड़े रहना पड़ता था क्योंकि अकसर वे हाथ को ?ाटक देती थीं. इसलिए रात में दीप्ति और मैं बारीबारी सोते व जागते थे.

घर में करीब 7वें रोज महामृत्युंजय का पाठ प्रारंभ हो गया था, दादी को मोक्ष दिलाने के लिए. साथ ही एक पंडित की नियुक्ति अस्पताल में अम्मांजी को भागवत पढ़ कर सुनाते के लिए कर दी गई थी. वह 1 घंटे के पूरे 200 रुपए लेता था. दादी के स्वस्थ रहते कोई उन्हें एक छोटा किस्सा भी नहीं सुनाता था, पर अब भागवत सुनाई जा रही थी. जब तक दादी ठीक थीं, किसी को उन की चिंता तक न थी, कोई खाने को नहीं पूछता था, लावारिस सी घर के कोने में पड़ी रहती थीं.

जब सुनता था तो इच्छा होती थी दादी को अपने पास ले आऊं पर दादी नहीं आतीं. कह देती थीं, ‘‘बेटा, कुछ ही दिन रह गए है. यहीं गुजार लेने दो.’’

करीब 8वें दिन सुबह दादी का अस्पताल में देहांत हो गया. चाचाचाची, मेरी चचेरी सालियां व उन के पति आ गए थे. उस दिन बच्चे घर ही पर रहने दिए गए.

आते ही सब दादी के शरीर से लिपट गए. (ऐसे वे मेरे सामने पहले कभी नहीं लिपटे थे). थोड़ी ही देर में पूरा कमरा दहाड़ें मार कर रोने की आवाजों से गूंज उठा. यों लगा जैसे एकसाथ कई लोग कत्ल कर दिए गए हों. 5 मिनट में ही सब शांत भी हो गए. किसी के चेहरे को देख कर नहीं लग रहा था कि उस की आंखों से आंसू का एक कतरा भी बहा हो. पूरा सीन मेरी आंखों के सामने नाटक के रिहर्सल की तरह निकल गया. मेरे अपने मातापिता जिंदा थे और दोनों ही मेरी तरह अकेले संतान थे. किसी को मरने के समय देखने का यह पहला मौका था.

दादी के शव को स्ट्रेचर पर डालने के वक्त चूंकि चाचा अकेले थे, मैं ने सोचा दादीको उठाने में मदद कर दूं. अभी हाथ बढ़ाया ही था कि बड़ी साली बोल उठी, ‘‘दिनेश, तुम हाथ न लगाना. तुम तो दामाद हो, तुम्हारा हाथ लग गया तो अम्मां को नर्क जाना होगा,’’ इस बहाने पति को भी हाथ लगाने से बचा लिया.

दादी के मरने तक तो मैं सेवा करता रहा. उस समय किसी को याद नहीं आया कि मैं घर का दामाद हूं. पर यह चूंकि दादी को मोक्ष मिलने की बात थी, अतएव मैं अपना हाथ लगा कर उन के मोक्ष के रास्ते का द्वार बंद नहीं करना चाहता था.

दादी को उठाना चाचाके अकेले के बस की बात नहीं थी. वे खुद 65 के थे. दादी 89 की थीं. फिर भी भाई साहब, मेरी श्रीमतीजी व भाभीजी दादी को उठा कर स्ट्रेचर पर लाने लगे. स्ट्रेचर मेरी दोनों सालियों ने पकड़ रखी थी. इस से पहले कि शव स्टे्रचर पर आ पाता, वह फर्श पर जा गिरा.

जमीन पर से किसी तरह फिर अर्दली की हैल्प से शव उठा कर स्ट्रेचर पर डाल लिया गया.

लाश घर पर ले जाई गई. आननफानन में रैफ्रीजरेटड ग्लास कौफिन गया था. करीब

20 किलोग्राम गुलाब के फूल, इतने ही मखाने मंगवा लिए गए थे. एक प्रतिष्ठित व्यवसायी की मां की शवयात्रा थी. उन की सारी प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी. कहीं कोई यह न कह दे, लड़के ने मां के लिए कुछ खर्च नहीं किया.

मेरा पत्ता चूंकि पहले ही कट गया था, इसलिए मैं ऐसी जगह बैठ गया था, जहां से समस्त क्रियाकलाप देखे जा सकें. मु?ो तो वैसे भी सब दामाद सम?ाते थे.

औरतें जत्थों में चली आ रही थीं. जैसे ही वे लाश के करीब आतीं, सब की सब एक सुर में दहाड़ मार कर रो पड़ती थीं. क्या गजब का सामंजस्य था. कुछ ही क्षणों में  फिर शांति छा जाती थी. पहले आई औरतें पीछे हट कर एक ओर खिसक जाती थीं, जहां वे आपस में मृतक अर्थात दादी के बारे में हर तरह की चर्चा प्रारंभ कर देती थीं. भले ही दादी के जीतेजी कभी कानी आंख भी वे सब इधर नहीं ?ांकी होंगी, पर अब कालोनी की तमाम स्त्रियों का हुजूम था.

थोड़ी देर बाद आवाजें आईं, ‘‘नाती कहां है. बुलवाओ, पैर तो छू लें. दादी को मोक्ष मिल जाएगा.’’

मैं किंकर्त्तव्यविमूढ़ था. मेरे छूने मात्र से दादी को नर्क मिल सकता था, पर मेरे लड़के के छूने से नहीं. जब वे बीमार थीं तो कोई उन्हें हाथ नहीं लगा रहा था.

मेरी दोनों सालियां व बहू अपनेअपने लड़कों को शव की तरफ हांकने लगीं. अंतत: सभी दादी के मृत शरीर का चरणस्पर्श कर चुके थे.

मैं ने सोचा, अच्छा हुआ मेरे दोनों साढू भाईर् नहीं आए वरना मेरी तरह तमाशा बनते व मूर्ति की तरह कोनों में बैठे होते.

एक फोटोग्राफर भी था. लाश पर कफन डाला जाने वाला ही था कि भाई साहब की निगाह शायद अम्मां के गले व हाथ की कलाई पर चली गई. सोने का हार व कंगन थे. कम से कम 4 तोला सोना. भाई साहब ने लपक कर निकाल लिया, गोया कोई ले कर भागने वाला था.

शव ऐंबुलैंस पर रखकर सभी लोग घाट की तरफ रवाना हो गए. घाट पर लकड़ी की चिता भी तैयार हो गईर् थी. लाश को चिता पर रखने से पहले नदी का गोता भी लगवाना था. पर अभी भाई साहब की खोपड़ी नहीं घुटी थी. तुरंत ही एक नाई भाई साहब के बाल मूंडने लगा. मुंडन संस्कार के बाद भाई साहब के तन पर श्वेत ?ाना वस्त्र था. सर्द हवा के कारण भाई साहब की कंपकंपी छूट चली थी.

दिल्लगी: क्या था कमल-कल्पना का रिश्ता- भाग 3

वह कब गहरी नींद सो गया, कल्पना को पता ही नहीं चला. भीतरबाहर से थकीहारी कल्पना भी शीघ्र ही सो जाना चाहती थी, पर नींद तो मानो उस की आंखों से कोसों दूर थी. बंद पलकों में बजाय नींद के अतीत की भूलीबिसरी स्मृतियां उमड़घुमड़ रही थीं.

कल्पना एक मध्यवर्गीय परिवार की इकलौती लड़की थी. उस के पिता कृष्णगोपाल की खिलौनों की एक दुकान थी. उन के पड़ोसी घनश्यामलाल कमल के सगे मामा थे. घनश्यामलाल के शहर में दूध के डेरों बूथ थे और बहुत अच्छा काम था. वे काफी पढ़ेलिखे थे इसलिए उस के पिता व घनश्याम घर से बाहर पड़े तख्तों पर घंटों देश की राजनीति और समाज पर चर्चा करते थे.

कल्पना कमल को बचपन से जानती थी. हर साल गरमी की छुट्टियां नैनीताल में बिताने की गरज से कमल का परिवार घनश्यामलाल के यहां आ कर ठहरता था. दोनों घरों में आंगन एक ही था. वह, कमल और उस के 2 अन्य भाईबहन एकसाथ आंखमिचौली खेला करते थे. वह उन के साथ ही खाने भी बैठ जाती और प्राय: रात तो उन के उस बड़े पलंग पर भी जा पहुंचती, जिस पर कमल और उस के छोटे भाईबहन सोते थे. वह बिना किसी संकोच के उन के बीच जा लेटती थी.

कुछ वर्ष बाद कमल ने कल्पना के साथ ही कालेज जीवन में पदार्पण किया था. चूंकि कमल के मामामामी बेऔलाद थे, इसलिए उन्होंने कमल को बजाय होस्टल के अपने पास ही रहने के लिए राजी कर लिया था. दोनों साथसाथ कालेज जाते, साथसाथ ही घर लौटते. उस के पिता और कमल के मामाजी के बीच गहरी आत्मीयता होने के कारण कालेज या घर में उन दोनों के मिलनेजुलने पर कोई रोकटोक नहीं थी.

कल्पना के मन में यह धारण बचपन से ही बैठ गई थी कि कमल पर अन्य लोगों की अपेक्षा उस का कुछ विशेष अधिकार है. उस विशेषाधिकार की भावना से कमल पर वह खूब रोब जमाती थी और उस पर ज्यादती भी करती थी. वह सहनशील बन कर उस की प्रत्येक इच्छा व आज्ञा का पालन करता और जब कभी ऐसा न करता तो कल्पना उसे जो भी सजा देती उसे वह सहर्ष स्वीकार कर लेता था.

प्राय: कल्पना की मां उस के पिता से दबे स्वर में कहती थी, ‘‘देखो, दोनों की जोड़ी कितनी अच्छी लगती है पर…’’

कल्पना तब सम?ादार हो गई थी. मां की इस बात ने उस के मन में कमल के प्रति उस की धारणा को और भी मजबूत कर दिया था. उसे पूरा विश्वास था कि कमल ही उस का जीवनसाथी बनेगा और उसे स्वयं फिर इस संबंध पर कोई आपत्ति नहीं थी. हां वह मां के ‘पर…’ को नहीं सम?ा पाई थी.

बीए की परीक्षा खत्म होते ही कमल अपने मामामामी, उस के मातापिता व उस से विदा लेकर अपने घर चला गया था. चलते वक्त वह उस से यह वादा कर गया था कि शीघ्र ही परिवार सहित लौटेगा. कमल के चले जाने के बाद पहली बार उसे महसूस हुआ था मानो कमल के बिना नैनीलाल की प्रत्येक वस्तु व स्थान का आकर्षण फीका पड़ गया है. अपनेआप को भी वह अस्तित्वहीन सम?ाने लगी थी.

तीसरे दिन उसे कमल का पत्र मिला था. पत्र पढ़तेपढ़ते उस के चेहरे की उदासी बढ़ती चली गई थी. कमल ने लिखा था कि मां की तबीयत खराब होने के कारण उस का परिवार इस साल नैनीताल नहीं जा सकेगा. उस ने वादा पूरा न कर सकने पर खेद प्रकट किया था.

उस के बाद वह रोती हुई घर आ गई. अगले ही दिन उसे पता चला कि कमल और उस के मातापिता कमल की दादी के देहांत के कारण बाजपुर चले गए हैं. कमल फिर नहीं लौटा. उस के मैसेज पहले की तरह आते रहे. कल्पना को मालूम था कि उस का एडवैंचर कमल के मोबाइल में कैद है इसलिए वह भी सामान्य बना रही.

कुछ दिन बाद उस के मांबाप राजीव को ढूंढ़ कर लाए तो उस ने शादी को तुरंत हां कर दी और कमल को आमंत्रण भी भेज दिया. कमल ने मैसेज भी किया कि वह आएगा और तोहफे में एक मोेबाइल दे जाएगा. पर शादी पर वह नहीं आया तो कल्पना को हरदम एक अनजाना भय लगा रहता कहीं कमल उस का भंडाफोड़ न कर दे. आज उस का आना, इस तरह बेतकल्लुफी से मिलना उस पर भारी पड़ रहा था.

मगर कल्पना पर तो मानो कोई भूत सवार ही गया था. कमल की बातों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था. उस ने कमल को अनेक उलटीसीधी बातें कह डाली थीं. बेचारा कमल हार कर चुप हो गया था. खून के आंसू रोता उस का मन चाह रहा था कि कहीं एकांत में पहुंच कर मन की भड़ास निकाल ले. मगर पुरुष होने के कारण वह ऐसा नहीं कर सका था. कल्पना ने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि वह कमल को दिखा देगी कि नारी का स्वाभिमान कितनी बड़ी चीज होती है.

राजीव ने वकालत पास करने के बाद अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी. दोनों ही पक्षों के आधुनिक विचार होने के कारण उन का विवाह बेहद साधारण ढंग से हुआ था. विवाह के दौरान वह खामोशी की प्रस्तर प्रतिमा बनी रही थी. उस ने कोई भी आपत्ति नहीं की थी. उलटा कमल को ईर्ष्या की आग में जलाने के लिए उस ने उसे शादी का कार्ड भी भेजा था पर कमल नहीं आया था. उस का पत्र आया था. उस ने लिखा था:

‘‘कल्पना,

‘‘तुम्हारे विवाह में सम्मिलित होने पर मु?ो बेहद प्रसन्नता होती, पर अकस्मात ही हृदयरोग से ग्रस्त मां का निधन हो जाने के कारण मैं पहुंचने में असमर्थ हूं. आशा है मेरी विवशता सम?ाते हुए मेरे न आने को अन्यथा न ले कर क्षमा करोगी. मेरी शुभकामनाएं हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगी.

‘‘-कमल’’

पत्र में पिछली किसी बात का उल्लेख न देख कर सहसा तब उस ने ठंडे दिल से सोचा था, कहीं वास्तव में वह कमल के प्रति गलतफहमी की शिकार तो नहीं है. संभव है, कमल अपनी जगह पर सही हो. उस ने सचमुच में ही कभी उसे मित्र से ज्यादा अहमियत न दी हो. मन में जागे इन विचारों ने उस के दिल से कमल के प्रति समाई पूरी घृणा दूर कर दी थी. इस के बाद तो उसे कमल से कोई शिकवाशिकायत नहीं रह गई थी. तब उस ने औपचारिकता के नाते कमल को शोक भरा पत्र भी लिख दिया था.

राजीव की समीपता में 1 वर्ष कब बीत गया, कल्पना को कभी इस का एहसास तक नहीं हुआ.

मिलेट्स से बने हेल्दी फूड के बारें में क्या कहती है महिला उद्यमी विद्या जोशी, जानें यहां

अगर जीवन में कुछ करने को ठान लिया हो तो समस्या कितनी भी आये व्यक्ति उसे कर गुजरता है. कुछ ऐसी ही कर दिखाई है, औरंगाबाद की महिला उद्यमी विद्या जोशी. उनकी कंपनी न्यूट्री मिलेट्स महाराष्ट्र में मिलेट्स के ग्लूटेन और प्रिजर्वेटिव फ्री प्रोडक्ट को मार्किट में उतारा है, सालों की मेहनत और टेस्टिंग के बाद उन्होंने इसे लोगों तक परिचय करवाया है, जिसे सभी पसंद कर रहे है. उनके इस काम के लिए चरक के मोहा ने 10 लाख रुपये से सम्मानित किया है. उनके इस काम में उनका पूरा परिवार सहयोग देता है.

किये रिसर्च मिलेट्स पर

विद्या कहती है कि साल 2020 में मैंने मिलेट्स का व्यवसाय शुरू किया था. शादी से पहले मैंने बहुत सारे व्यवसाय किये है, मसलन बेकिंग, ज्वेलरी आदि करती गई, लेकिन किसी काम से भी मैं पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पा रही थी. मुझे हमेशा से कुछ अलग और बड़ा करना था, लेकिन क्या करना था, वह पता नहीं था. उसी दौरान एक फॅमिली फ्रेंड डॉक्टर के साथ चर्चा की, क्योंकि फ़ूड पर मुझे हमेशा से रूचि थी, उन्होंने मुझे मिलेट्स पर काम करने के लिए कहा. मैंने उसके बारें में रिसर्च किया, पढ़ा और मिलेट्स के बारें में जानने की कोशिश की. फिर उससे क्या-क्या बना सकती हूँ इस बारें में सोचा, क्योंकि मुझे ऐसे प्रोडक्ट बनाने की इच्छा थी, जिसे सभी खा सके और सबके लिए रुचिकर हो. किसी को परिचय न करवानी पड़े. आम इडली, डोसा जैसे ही टेस्ट हो. इसके लिए मैंने एक न्यूट्रीशनिस्ट का सहारा लिया, एक साल उस पर काम किया. टेस्ट किया, सबको खिलाया उनके फीड बेक लिए और फीडबेक सही होने पर मार्किट में लांच करने के बारें में सोचा.

मिलेट्स है पौष्टिक

विद्या आगे कहती है कि असल में मेरे डॉक्टर फ्रेंड को नैचुरल फ़ूड पर अधिक विशवास था. उनके कुछ मरीज ऐसे आते थे, जो रोटी नहीं खा सकते थे, ऐसे में उन्हें ज्वार, बाजरी, खाने के लिए कहा जाता था, जिसे वे खाने में असमर्थ होते थे. कुछ नया फॉर्म इन चीजो को लेकर बनाना था, जिसे लोग खा सकें. मसलन इडली लोग खा सकते है, मुझे भी इडली की स्वाद पसंद है. उसी सोच के साथ मैंने एक प्रोडक्ट लिस्ट बनाई और रेडी टू कुक को पहले बनाना शुरू किया, इसमें इडली का आटा, दही बड़ा, अप्पे, थालपीठ आदि बनाने शुरू किये. ये ग्लूटेन और राइस फ्री है. उसमे प्रीजरवेटिव नहीं है और सफ़ेद चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता है. इसमें अधिकतर असली घी और गुड से लड्डू, कुकीज बनाया जाता है. इन सबको बनाकर लोगों को खिलाने पर उन्हें जब पसंद आया, तब मैंने व्यवसाय शुरू किया. इसमें मैंने बैंक से मुद्रा लोन लिया है. मैंने ये लोन मशीन खरीदने के लिए लिया था. सामान बनाने से लेकर पैकिंग और अधिक आयल को प्रोडक्ट से निकालने तक की मशीन मेरे पास है.

हूँ किसान की बेटी

विद्या कहती है कि नए फॉर्म में मैंने मिलेट्स का परिचय करवाया. इसमें सरकार ने वर्ष 2023 को मिलेट्स इयर शुरू किया जो मेरे लिए प्लस पॉइंट था. मैं रियल में एक किसान की बेटी हूँ, बचपन से मैंने किसानी को देखा है, आधा बचपन वहीँ पर बीता है. मेरे पिता खेती करते थे, नांदेड के गुंटूर गांव में मैं रहती थी. 11 साल तक मैं वही पर थी. कॉलेज मैंने नांदेड में पूरा किया. मैंने बचपन से ज्वार की रोटी खाई है. शहर आकर गेहूँ की रोटी खाने लगी थी. मेरे परिवार में शादी के बाद मैंने देखा है कि उन्हें ज्वार, बाजरी की रोटी पसंद नहीं, पर आब खाने लगे. बच्चे भी अब मिलेट्स की सभी चीजे खा लेते है. ज्वार, बाजरा, नाचनी, रागी, चेना, सावा आदि से प्रोडक्ट बनाते है.

मुश्किल था मार्केटिंग

विद्या को मार्किट में मिलेट्स से बने प्रोडक्ट से परिचय करवाना आसान नहीं था. विद्या कहती है कि मैंने व्यवसाय शुरू किया और कोविड की एंट्री हो चुकी थी. मेरा सब सेटअप तैयार था, लेकिन कोविड की वजह से पहला लॉकडाउन लग गया, मुझे बहुत टेंशन हो गयी. बहुत कठिन समय था, सभी लोग मुझे व्यवसाय शुरू करने को गलत कह रहे थे, क्योंकि ये नया व्यवसाय है, लोग खायेंगे नहीं. लोगों में मिलेट्स खाने को लेकर जागरूकता भी नहीं थी, जो आज है. इसमें भी मुझे फायदा यह हुआ है कि कोविड की एंट्री से लोगों में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ी है. हालाँकि दो महीने मेरा यूनिट बंद था, क्योंकि मैं लॉकडाउन की वजह से कही जा नहीं सकती थी, लेकिन लोग थोडा समझने लगे थे. बैंक का लोन था, लेकिन उस समय मेरे पति ने बहुत सहयोग दिया, उन्होंने खुद से लोन भरने का दिलासा दिया था. इसके बाद भी बहुत समस्या आई, कोई नया ट्राई करने से लोग डर रहे थे. शॉप में भी नया प्रोडक्ट रखने को कोई तैयार नहीं था, फिर मैंने सोशल मीडिया का सहारा लिया. तब पुणे से बहुत अच्छा रेस्पोंस मिला. वह से आर्डर भी मिले. इसके अलावा शॉप के बाहर भी सुबह शाम खड़ी होकर मिलेट्स खाने के फायदे बताती थी. बहुत कठिन समय था. अब सभी जानते है. आगे भी कई शहरों में इसे भेजने की इच्छा है.

मिलेट्स होती है सस्ती

विद्या का कहना है कि ये अनाज महंगा नहीं होता, पानी की जरुरत कम होती है. जमीन उपजाऊं अधिक होने की जरुरत नहीं होती. इसमें पेस्टीसाइड के प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती. इसलिए इसके बने उत्पाद अधिक महंगे नहीं होते. मैं बाजार से कच्चे सामान लेती हूँ. आगे मैं औरंगाबाद के एग्रीकल्चर ऑफिस से सामान लेने वाली हूँ. किसान उनके साथ जुड़े होते है. वहां गुणवत्ता की जांच भी की जाती है. अच्छी क्वालिटी की प्रोडक्ट ली जाती है. सामान बनने के बाद भी जांच की जाती है. हमारे प्रोडक्ट में भी प्रिजेर्वेटिव नहीं होते. कई प्रकार के आटा, थालपीठ, ज्वार के पोहे, लड्डू आदि बनाती हूँ. मैं औरंगाबाद में रहती हूँ. गोवा, पुणे, चेन्नई और व्हार्ट्स एप ग्रुप और औरंगाबाद के दुकानों में भेजती हूँ. इसके अलावा मैं जिम के बाहर भी स्टाल लगाती हूँ.

मिला सहयोग परिवार का

परिवार का सहयोग के बारें में विद्या बताती है कि मैं हर दिन 10 से 12 घंटे काम करती हूँ, इसमें किसी त्यौहार या विवाह पर गिफ्ट पैकिंग का आर्डर भी मैं बनाती हूँ. सबसे अधिक सहयोग मेरे पति सचिन जोशी करते है, जो एक एनजीओ के लिए काम करते है. मेरे 3 बच्चे है, एक बड़ी बेटी स्नेहा जोशी 17 वर्ष और जुड़वाँ दो बच्चे बेदांत और वैभवी 13 वर्ष के है. बच्चे अब बड़े हो गए है, वे खुद सब काम कर लेते है. मेरी सास है, वह भी जितना कर सकें सहायता करती है. सहायता सरकार से नहीं मिला, लेकिन चरक के मोहा से मुझे 10 लाख का ग्रांट मिला है, जिससे मैं आगे मैं कुछ और मशीनरी के साथ इंडस्ट्रियल एरिया में जाने की कोशिश कर रही हूँ. अभी मैं मिलेट्स की मैगी पर काम कर रही हूँ. जो ग्लूटेन फ्री होगा और इसका ट्रायल जारी है. 5 लोगों की मेरे पास टीम है. प्रोडक्ट बनने के बाद न्यूट्रशनिस्ट के पास भेजा जाता है, फिर ट्रायल होती है. इसके बाद उसका टेस्ट और ड्यूरेबिलिटी देखी जाती है. फिर लैब में इसकी गुणवत्ता की जांच की जाती है.

सस्टेनेबल है मिलेट्स

स्लम एरिया में प्रेग्नेंट महिलाओं को मैं मिलेट्स के लड्डू देती हूँ, ताकि उनके बच्चे स्वस्थ पैदा हो. अधिकतर महिलायें मेरे साथ काम करती है. इसके अलावा तरुण भारत संस्था के द्वारा महिलाओं को जरुरत के अनुसार ट्रेनिंग देकर काम पर रखती हूँ. उन्हें जॉब देती हूँ, इससे उन्हें रोजगार मिल जाता है.

मिलेट्स से प्रोडक्ट बनाने के बाद निकले वेस्ट प्रोडक्ट को दूध वाले को देती हूँ, जो दुधारू जानवरों को खिलाता है. इस तरह से कुछ भी ख़राब नहीं होता. सब कंज्यूम हो जाता है.

गर्मियों में आइसक्रीम बनाने के 11 टिप्स

गर्मियों का मौसम प्रारम्भ हो चुका है. यूं तो आजकल पूरे वर्ष भर ही आइसक्रीम खाई जाती है परन्तु गर्मियां तो आइसक्रीम के लिए ही जानी जातीं हैं. इन दिनों बाजार में भी भांति भांति के फ्लेवर्स की आइसक्रीम की बहार छाई रहती है. बाजार से हरदम आइसक्रीम लाना महंगा भी पड़ता है और हरदम लाना सम्भव भी नहीं होता इसीलिए आज हम आपको कुछ ऐसे टिप्स बता रहे हैं जिनका ध्यान रखकर आप बड़ी आसानी से घर पर ही बिल्कुल बाजार जैसी आइसक्रीम जमा सकतीं हैं-

ऐसे बनाएं बेसिक आइसक्रीम

-2 कप व्हिपड क्रीम को 1/2 कप कन्डेन्स्ड मिल्क के साथ तब तक फेंटे जब तक कि यह फूलकर दोगुनी न हो जाये. जिस बाउल में आप फेंट रहीं हैं उसे उल्टा कर दें यदि क्रीम न गिरे तो बेसिक आइसक्रीम तैयार है.

-250 लीटर दूध में 4 टीस्पून शकर, 4 टीस्पून कॉर्नफ्लोर, 4 टीस्पून जी. एम. एस. पाउडर और 1/4 टीस्पून सी एम एस पाउडर को अच्छी तरह मिलाकर गैस पर चढ़ाएं उबाल आने पर गैस बंद कर दें. इसे फ्रीजर में जमा दें. जब जम जाए तो निकालकर फेंट लें अब इससे आप मनचाहा फ्लेवर तैयार कर सकतीं हैं.

-ऐसे बनाएं फ्लेवर्ड आइसक्रीम

-यदि आप एसेंस और कलर से आइसक्रीम बना रहीं हैं तो बेसिक आइसक्रीम में मनचाहा कलर और एसेंस डालकर फ्रिज में उच्चतम तापमान पर 7 से 8 घण्टे तक जमाकर सर्व करें उदाहरण के लिए यदि आप वनीला आइसक्रीम जमा रही हैं तो बेसिक आइसक्रीम में 4-5 बूंदे वनीला एसेंस की डालकर अच्छी तरह चलाएं फिर ढककर फ्रीजर में जमाकर सर्व करें.

-नेचुरल आइसक्रीम बनाने के फलों का प्रयोग किया जाता है इसके लिए आप फलों को साफ करके उनकी प्यूरी बनाकर बेसिक आइसक्रीम में मिला दें साथ ही फलों को बारीक काटकर भी मिलाएं ताकि खाते समय फल का स्वाभाविक स्वाद भी मिल सके. आवश्यकतानुसार रंग का प्रयोग भी किया जा सकता है.

-चॉकलेटी आइसक्रीम बनाने के लिए बेसिक आइसक्रीम में कोको पाउडर मिलाएं. कोको पाउडर को चम्मच की अपेक्षा बीटर से फेंटकर ही मिलाएं. ऊपर से कुछ चॉको चिप्स डाल दें.

-क्रीम एंड कुकीज आइसक्रीम को बिस्किट से बनाया जाता है इसे जमाने के लिए किसी भी चॉकलेटी फ्लेवर के बिस्किट को हल्का सा क्रश करके बेसिक आइसक्रीम में मिलाकर जमाएं.
रखें इन बातों का ध्यान

-आइसक्रीम जमाने के लिए हमेशा ढक्कनदार कंटेनर का प्रयोग करें ताकि आइसक्रीम पर बर्फ के क्रिस्टल न जमने पाएं.

-आइसक्रीम को जमाते समय फ्रीजर का तापमान हाई कर दें और जमने के बाद इसे मीडियम रखें ताकि निकालने में आसानी रहे.

-आइसक्रीम सर्व करते समय स्कूपर को गर्म पानी में डालकर रखें इससे आप बहुत आसानी से आइस्क्रीम निकाल पाएंगी.

-यदि आप अमरूद, स्ट्राबेरी, जामुन जैसे खट्टे फलों से आइसक्रीम जमाना चाहतीं हैं तो फलों के टुकड़ों को कुछ देर शुगर सीरप में उबाल लें ताकि उनका खट्टापन बेलेंस हो जाये.

-यदि आप किटी पार्टी या बर्थडे पार्टी के लिए आइसक्रीम जमा रहीं हैं तो कंटेनर की अपेक्षा सीधे कप्स में सिल्वरफॉइल से ढककर आइसक्रीम जमा दें इससे आपको सर्व करने में बहुत आसानी रहेगी.

औयली और ड्राय स्किन के लिए ट्राय करें ये फेसपैक

जितनी बुरी ऑइली स्‍किन होती है, उतनी ही बुरी ड्राय स्‍किन भी. रूखी त्‍वचा पर आप चहे जितना मॉइस्‍चराइजर लगाइये उस पर कोई फरक नहीं पड़ता. और आपकी जानकारी के लिये बता दं कि रूखी त्‍वचा वालों को झुर्रिंया काफी तेजी से पड़ती हैं. हांलाकि आप चाहें तो खुद का एलो वेरा फेस पैक बना सकते हैं.

अगर आपकी स्‍किन रूखी है तो हमेशा उसको नम रखने की कोशिश करें. इसके लिये सबसे पहले तो आपको ढेर सारा पानी पीना होगा और चेहरे पर कोई भी प्रोडक्‍ट यूज करने से पहले सावधानी बरतन होगी.

इसलिये आज हम आपको तीन चमत्‍कारी फेस पैक बनाना सिखाएंगे जो कि एलो वेरा से तैयार हो सकत हैं, आइये जानें इनके बारे में

1. एलो वेरा और दही से दूर करें खुशकी

रूखे चेहरे पर लालिमा और खुशकी हमेश रहती है. जिसको दूर करने के लिये आप 2 चम्‍मच एलोवेरा और दही ले कर मिक्‍स कर लें. फिर इसे पूरे चेहरे पर लगाएं. इससे चेहरा फटेगा नहीं और लालिमा भी दूर होगी. इस पैक को रोज लगाएं क्‍यंकि यह चेहरे को ठंडक पहुंचाता है.

2.एलोवेरा और हल्‍दी से पाएं चमक

1 चम्‍मच एलोवेरा जैल में 1 चुटकी हल्‍दी मिक्‍स करें और चेहरे पर लगाएं. जब यह सूख जाए तब चेहरे को धो लें. इससे चेहरा ड्राई भी नहीं होगा और चेहरे पर चमक भी आएगी.

3.एलोवेरा और पपीते से हटाएं चेहरे के बाल

पपीते में एक इंजाइम होता है, जिससे चेहरे के बाल कमजोर हो कर टूटने लगते हैं. 1 चम्‍मच एलोवेरा जैल में एक टुकडा पीता मिला कर पेस्‍ट बनाएं और चेहरे पर लगाएं. 20 मिनट के बाद चेहरे को धो लें. इस पैक को नियमित लगाने से आपको पर्लर जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी.

ऑइली स्‍किन या फिर तैलीय त्‍वचा वालों को अपना चेहरा साफ रखने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. ना वे कोई क्रीम लगा सकती हैं और मेकअप लगाने की तो बात ही छोड़ो.

ऑइली स्‍किन के लिये चंदन और मुल्‍तानी मिट्टी पाउडर काफी अच्‍छे माने जाते हैं क्‍योंकि ये चेहरे से तेल को सोख लेते हैं और उसे ऑइली नहीं होने देते हैं. चंदन पाउडर से बाइये रूप निखारने वाला फेस पैक अगर आप भी कुछ ऐसा प्राकृतिक इलाज चाहती हैं तो हमारा बताया हुआ चंदन पाउडर का यह फेस पैक लगाना ना भूलें.

आइये देखें इसे कैसे बनाया जाता है और इसके गुण क्‍या क्‍या हैं.

चंदन फेस पैक बनाने की विधि

– 1 चम्‍मच मुल्‍तानी मिट्टी में 1 चम्‍मच चंदन पाउडर और चुटकीभर हल्‍दी मिलाएं. फिर इसमें थोड़ा सा दूध मिला कर गाढा पेस्‍ट तैयार करें.

– इस पेस्‍ट को चेहरे पर 10 से 20 मिनट तक लगा रहने दें. फिर जब यह पेस्‍ट सूख जाए तब चेहरे पर थोड़ा पानी लगाएं और फेस पैक को उगंलियों से रगड़ कर गोलाई में छुड़ाएं.

– उसके बाद चेहरे को पानी से धो लें और सुखा लें. आप इस फेस पैक को हफ्ते में एक बार लगा सकती हैं.

यह कैसे काम करता है?

इस फेस पैक में मुल्‍तानी मिट्टी होता है जो चेहरे से एक्‍सट्रा तेल को सोख लेती है और उस पर से गंदगी तथा डेड स्‍किन को साफ करती है. इसके अलावा इसमें चंदन भी होता है, जो कि चेहरे को नमी प्रदान करता है और खुले पोर्स को छोटा करता है. इस पैक में हल्‍दी भी मिलाया जाता है, जो त्‍वचा का रंग साफ करने में मदद करता है. अगर इसे दूध के साथ मिला कर लगाया जाए तो चेहरे पर ग्‍लो आता है और सनबर्न तथा पिगमेंटेशन से राहत मिलती है.

तुम आज भी पवित्र हो– भाग 3

नमन किसी तरह उसे उस खौफ से बाहर निकालना चाह रहा था. लेकिन जो डर क्षितिजा के ऊपर हावी हो गया था वह निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था. यह सोच कर ही वह सहम जाती कि अगर उस के बौस ने कहीं उस का वह न्यूड वीडियो वायरल कर दिया तो? कहीं उसी वीडियों को ले कर वह उसे ब्लैकमेल करने लगा तो वह क्या करेगी? उस के मन की ये सारी बातें नमन अच्छी तरह समझ रहा था.

क्षितिजा के दिलोदिमाग से हमेशा के लिए वह खौफ निकल जाए और वह नमन से शादी कर अपनी जिंदगी उस के साथ खुशी से बिता सके, इस के लिए नमन ने अपने मन में ही एक फैसला लिया. पहले तो उस ने अपनी पहले वाली जौब छोड़ क्षितिजा की ही कंपनी में नौकरी जौइन कर ली और फिर उस के बौस नरेश का भरोसा जीता. अब नरेश अपनी कंपनी के लिए जो भी फैसला लेता उस में नमन की राय जरूर शामिल होती थी.

नमन की बातें और उस का व्यवहार नरेश को इतना अच्छा लगने लगा कि उसे वह अपना सच्चा दोस्त नजर आने लगा. अपनी जिंदगी से जुड़ी हर बात वह उसे बताने लगा और नमन को अपने घर भी ले जाता. उस के साथ और उस की बातों से इतना तो समझ में आ गया नमन को कि नरेश एक नंबर का ऐयाश किस्म का इंसान है और क्षितिजा से पहले भी उस ने कई लड़कियों का इसी प्रकार शोषण किया है.

लेकिन सब इस डर से चुप रह गईं कि कहीं वह उन का आपत्तिजनक वीडियो वायरल न का दे. उस की गंदी हरकतों को जानने के बाद उस की पत्नी उसे छोड़ कर जा चुकी थी. लेकिन इस बात का उसे कोई मलाल नहीं था, बल्कि वह तो खुश था कि अब उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं है. अपनी योजना के अनुसार जब नमन ने बताया कि आज उस का जन्म दिन है और इसलिए वह नरेश को एक छोटी सी पार्टी देना चाहता है और उस ने विदेशी शराब और लड़की का भी इंतजाम किया है तो सुन कर नरेश के मुंह में पानी आ गया. नमन बोला, पर एक  शर्त है सर और वह यह कि पार्टी आप के घर पर ही होगी, क्योंकि…’’

नमन की पूरी बात सुने बिना ही नरेश ने उस बात के लिए हामी भर दी. ‘‘अब शराब ही पिलाते रहोगे या लड़की के भी दर्शन करवाओगे नमन?’’ नरेश ने बेसब्री से पूछा. ‘‘हां सर, वह बस आती ही होगी. आप और लीजिए न,’’ कह कर नमन ने फिर नरेश का गिलास शराब से भर दिया.

नशा तो चढ़ ही चुका था नरेश के सिर. अत: कहने लगा, ‘‘अब जन्मदिन तुम्हारा है और विदेशी शराब और शबाब की पार्टी तुम मुझे दे रह हो? अरे, उपहार तो मुझे तुम्हें देना चाहिए नमन?’’ नरेश को नमन ने घूर कर देखा और फिर मन ही मन बोला कि ‘सारे उपहार तो आज मैं उसे दूंगा. मेरी क्षितिजा को तूने छूने की कोशिश की थी न? अब मैं बताऊंगा तुझे कि किसी लड़की का फायदा उठाना किसे कहते हैं. पर बोला, ‘‘हां सर, सही कर रहे हैं आप. वैसे उपहार तो लूंगा ही मैं आप से,’’ कह कर नमन ने फिर उस का गिलास शराब से भर दिया, ‘‘वैसे सर, उस लड़की का नाम क्या था? हां क्षितिजा, क्या किया था आप ने उस के साथ?’’ क्षितिजा का नाम सुनते ही नरेश ने अचकचा कर नमन को देखा. बोला, ‘‘तु… तुम्हें कैसे पता उस लड़की के बारे में और मैं ने क्या…’’ ‘ ‘अरे सर, अभी तो आप ने बताया कि उस लड़की के साथ आप ने यहीं इसी घर में क्याक्या किया था,’’ नमन ने अंधेरे में पहला तीर छोड़ा. समझ गया नमन कि अब नरेश पर नशा चढ़ चुका है और अब वह जो चाहे उस के साथ कर सकता है… जो चाहे उस के मुंह से उगलवा सकता है.

‘‘अच्छा, शराब से भरे गिलास को एक बार में ही गटकते हुए बोला, ‘बड़ी नमकीन थी, पर साली थी बहुत तेज…हाथ ही नहीं लगाने देती थी अपने शरीर को कभी. लेकिन मैं भी कहां कम था. पा ही लिया उस के शरीर को… अरे, तूने भी नमन किस की याद दिला दी यार. फिर उस का शरीर पाने को मन मचल उठा. वैसे एक बात समझ नहीं आती कि औरतें मर्दों से इतना बिदकती क्यों हैं? अरे, वे भोगने की वस्तु ही तो हैं और अगर हम उन के शरीर को नहीं भोगेंगे तो भला और कौन…’’ कह कर वह मुंह फाड़ कर हंसने लगा.

नमन खून का घूंट पी कर रह गया. नशे में ही वह बोल गया कि उस ने आज तक किसी भी लड़की का वीडियो नहीं बनाया… उन्हें डराने की खातिर झूठ बोला ताकि वे अपना मुंह बंद रखें. ‘ओह तो यह बात है. इस का मतलब इस ने क्षितिजा का भी कोई वीडियो नहीं बनाया होगा? मन ही मन सोच नमन खुश हो उठा.

नरेश अब तक इतना पी चुका था कि बैठने के काबिल भी नहीं रहा, फिर भी नमन उसे पिलाए जा रहा था  और वह नशे में बस ‘लड़की को बुलाओ न नमन, लड़की को बुलाओ,’ की रट लगाए था. फिर उस के मुंह से वह भी निकलना बंद हो गया. थोड़ी देर में वह वहीं जमीन पर लुढ़क गया और गिलास उस के हाथ से छूट गया. ‘लगता है साला मर गया,’ उस की नाक के सामने अपनी उंगली लगाते हुए नमन ने सोचा फिर सारे सुबूत मिटा कर वहां से चलता बना.

अगले दिन नरेश, टीवी और अखबारों की खबर बन गया कि फंला कंपनी का बौस अपने ही घर में मृत पाया गया और उस की मौत ज्यादा शराब पीने की वजह से हुई है. पुलिस की तहकीकात, मैडिकल रिपोर्ट और उस की पत्नी की गवाही से यही साबित हुआ कि ज्यादा शराब पीना ही नरेश की मौत का कारण बना. क्षितिजा के साथ उस के मातापिता भी यह खबर सुन कर बहुत खुश हुए.

लेकिन नमन सामने से क्षितिजा के चेहरे की खुशी को देखना चाहता था. ‘‘क्षितिजा अब तो तुम खुश हो न?’’ प्यार से उसे अपनी बांहों में भरते हुए नमन ने पूछा तो उस ने हौले से मुसकराते हुए हां में जवाब दिया.

नमन उत्साह से भर कर फिर कहने लगा, ‘‘क्षितिजा, एक और बात बताऊं तुम्हें? उस ने तुम्हारा कोई वीडियो नहीं बनाया था, बल्कि उस ने किसी भी लड़की का कोई वीडियो नहीं बनाया था. उस ने तो सिर्फ तुम्हें डराने के लिए ऐसा बोला था ताकि तुम किसी के भी सामने अपना मुंह न खोल सको.’’ ‘‘पर तुम्हें ये सब कैसे पता नमन?’’ आश्चर्यचकित हो कर जब उस की आंखों में आंखें डाल कर क्षितिजा ने पूछा तो वह सकपका गया? फिर उसे चूमते हुए बोला कि उसे किसी तरह पता चल गया.

मगर क्षितिजा को समझते देर नहीं लगी कि नरेश की मौत के पीछे कौन है और क्यों? ‘उस की मौत जैसे भी हुई हो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, पर जो भी हुआ बहुत अच्छा हुआ, क्योंकि उस कमीने को यही सजा मिलनी चाहिए थी, वरना न जाने वह और कितनी मासूम लड़कियों की जिंदगियां तबाह कर डालता,’ सोच कर क्षितिजा नमन की ओर देख मुसकराई तो नमन भी सुकून की एक लंबी सांस भरते हुए प्यार से क्षितिजा को निहारने लगा.

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