आपको क्यों बनना चाहिए एलआईसी एजेंट जानें विस्तार से

वक्तबदल चुका है. आजकल स्कूली पढ़ाई समाप्त होते ही नौजवान आत्मनिर्भर बनने की चाह रखते?हैं. यह एक ऐसा समय होता है जब नौजवान अपने भविष्य को संवारने के लिए प्रयास कर रहे होते हैं. ऐसे में पढ़ाई और खर्चों में तालमेल बैठाने के लिए वे कुछ ऐसे काम की तलाश में होते हैं जिसमें उन्हें पैसा भी मिले और पढ़ाई करने के लिए समय भी. उनकी इस तलाश को पूरा करती है एलआईसी. जी हां, एलआईसी को कैरियर की शुरुआत के लिए चुना जा सकता है. एलआईसी एजेंट बन कर आप अच्छा पैसा कमा सकते हैं. इसके लिए बस आपकी स्कूली शिक्षा का पूरा होना और 18 वर्ष की आयु का होना जरूरी है. ढ्ढक्त्रष्ठ्न की परीक्षा पास होने के बाद ही एजेंसी का लाइसेंस प्राप्त कर सकते हैं. एजेंसी के लिए आप एलआईसी के विकास अधिकारी/ सी.एल.आई.ए./शाखा से संपर्क कर सकते हैं. एलआईसी में अपने पेशेवर जीवन की योजना को भी आप अच्छी तरह से बना सकते हैं.

हम आपको ऐसे 10 कारण बता सकते हैं कि आपको क्यों एलआईसी एजेंट बनना चाहिए? ये कारण आपके जीवन को बदल सकते हैं, इसलिए एक बार जरूर गौर करें:

  1. खुशी देने वाला व्यवसाय: लोग कैरियर का चुनाव हमेशा अपनी या अपने परिवार की खुशी को ध्यान में रख कर करते हैं. खासतौर पर कैरियर के चुनाव में हर कोई अपना फायदा देखता है और अधिकतर जॉब ऐसी ही होती हैं जिनमें सिर्फ नौकरी करने वाले को ही फायदा हो रहा होता है. लेकिन एक एलआईसी एजेंट अपने साथ एलआईसी पॉलिसी खरीदने वाले का भी फायदा कराता है. एलआईसी एजेंट ही वह व्यक्ति होता है जो लोगों को यह एहसास कराता है कि उन्हें अपने सपनों को साकार करने के लिए अपने धन को कहां निवेश करना चाहिए. ऐसा करने में जब आपको सफलता मिलती है तो जो सकून मिलता है वह किसी और व्यवसाय में नहीं मिलता.
  2. एक सफल टीम का हिस्सा बनें: एलआईसी से जुड़ने पर आपको एक सफल टीम का हिस्सा बनने का मौका मिलेगा. इस वर्ष एलआईसी ने मिलियन डॉलर राउंड टेबल में अपने 20558 सदस्यों की हिस्सेदारी दर्ज कराते हुए ग्लोबल फोरम में विश्व के चुनिंदा सफल बीमा एजेंट तैयार करने का खिताब हासिल किया है.
  3. आकर्षक पारिश्रमिक: महंगाई के इस दौर में हर चीज की कीमत में बढ़ोत्तरी हो चुकी है. ऐसे में वेतन अच्छा होगा तभी एक अच्छी जीवनशैली का अनुसरण किया जा सकेगा. ऐसे में एलआईसी एजेंट का कैरियर चुनना एकदम सही है क्योंकि यह सिफ आपका वर्तमान ही नहीं बल्कि भविष्य की कमाई को भी सुनिश्चित करता है. यह एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें आप अपनी क्षमता के अनुसार अपने लक्ष्यों को तय कर सकते हैं और जिंदगी भर जितना चाहें उतना कमा सकते हैं.
  4. स्वतंत्रता: एक एजेंट के रूप में आप एक अच्छे व्यवसायी बन सकते हैं. इस व्यवसाय में आप खुद के बॉस होते हैं. खुद के लिए काम करते हैं, इतना ही नहीं आप अपने क्लाइंट्स भी खुद चुन सकते हैं और जितने चाहें उतने पैसे बना सकते हैं. सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस व्यवसाय को शुरू करने के लिए आपको किसी भी तरह से अपनी पूंजी लगाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, जोकि अन्य व्यवसायों में संभव नहीं है.
  5. वर्ल्ड क्लास ट्रेनिंग: एलआईसी अपने एजेंट्स को दुनिया का सबसे बेहतरीन प्रशिक्षण देता है. कोई भी कंपनी अपने उत्पाद को बेचने के लिए अनुभवी व्यक्ति चाहती है लेकिन एलआईसी में आपको बिना किसी अनुभव के ही प्रवेश मिल सकता है क्योंकि एलआईसी में अनुभवी ट्रेनरों के द्वारा शामिल हुए सदस्यों को मल्टी डाइमेंशनल ट्रेनिंग दी जाती है जो उन्हें जीवन बीमा पॉलसियों को बेचने में माहिर बना देती हैं.
  1. कैरियर एजेंसी प्रणाली के प्रति प्रतिबद्धता: एलआईसी आपके द्वारा किए गए प्रयासों को केवल आज ही नहीं बल्कि जिंदगी के हर मोड़ पर सराहती है और आपको व्यवसाय में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है. इतना ही नहीं यदि आपकी परफॉर्मेंस अच्छी होती है तो एलआईसी आपको अपनी मैनेजमेंट टीम का हिस्सा बना कर आपके कैरियर को नए स्तर पर पहुंचाता है.
  2. बुनियादी सुविधाएं: एलआईसी की सभी ब्रांचों में एजेंटों और कर्मचारियों को बुनियादी सुविधाएं दी गई हैं, जिनके प्रयोग से उन्हें अपना व्यवसाय चलाने और उसे आगे बढ़ाने में सहायता मिलती है.
  3. उत्पाद और सेवाओं की फुल रेंज: एलआईसी आपको अपने कस्टमर्स के लिए उत्पाद और सेवाओं की एक बड़ी रेंज उपलब्ध कराता है. आप अपने गाहकों की आर्थिक क्षमता को समझते हुए उनके लक्ष्यों को पूरा करने के लिए उन्हें एलआईसी के विशेष उत्पाद और विभिन्न राइडर्स सेवाएं लेने में उनकी मदद कर सकते हैं. एलआईसी हमेशा अपने कस्टमर्स के लिए उत्पादों की नई और अभिनव श्रृंखला लाती रहती है.
  4. बिक्री एवं विपणन समर्थन: किसी भी व्यवसायी के लिए यह सबसे बड़ी सुविधा होती है कि वे अपने उत्पाद की बिक्री के लिए उसे ग्राहकों के मध्य विज्ञापनों के द्वारा पहुंचा सकें. लेकिन यह उतना आसान नहीं होता. मगर यदि आप एलआईसी एजेंट हैं तो यह आपके लिए बेहद आसान है क्योंकि एलआईसी की अपनी सेल्स और मार्केटिंग टीम होती है, जो उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए समयसमय पर उसके विज्ञापनों को प्रकाशित करावाती रहती है.
  1. वित्तीय शक्ति: एलआईसी आपको और आपके ग्राहकों को बेजोड़ वित्तीय ताकत ओर दृढ़ता प्रदान करता है.

शरणागत: कैसे तबाह हो गई डा. अमन की जिंदगी- भाग 4

2 महीने में ही नीरा अपनी दिनचर्या से ऊब गई. उसे अपने कालेज के लुभावने दिनों की याद आने लगी. कभी खाना बनाने का भी मूड न करता. कभी दालसब्जी कच्ची रह जाती, कभी रोटी जल जाती. उस ने अमन के सामने आगे पढ़ाई करने का प्रस्ताव रखा जिसे उस ने तुरंत मान लिया और घर के कामकाज के लिए एक नौकरानी का इंतजाम कर दिया.

अमन की सादगी का फायदा उठाते हुए नीरा ने अपने परिवार से भी मोबाइल के जरीए टूटे रिश्ते जोड़ लिए. अब वह कभीकभी कालेज के बाद अपने मायके भी जाने लगी. अमन इन सब बातों से बेखबर था. वह जीजान से नीरा को खुश रखने की कोशिश करता.

कुछ समय बाद अमन को लगा कि नीरा में बहुत बदलाव आ गया है. वह कालेज से आ कर या तो लैपटौप पर चैट करती है या फिर मोबाइल पर धीरेधीरे बातें करती रहती है. अमन कब आया, कब गया, खाना खाया या नहीं उसे इस बात का कोई ध्यान नहीं रहता. उस ने सबकुछ नौकरानी पर छोड़ दिया था.

अमन अंदर ही अंदर घुटने लगा. उस ने पाया कि आजकल नीरा बातबात में किसी राहुल नाम के प्रोफैसर का जिक्र करती है जैसे कितना अच्छा पढ़ाते हैं, बहुत बड़े स्कौलर हैं, देखने में भी बहुत स्मार्ट हैं आदिआदि.

अमन ने कहा, ‘‘भई, ऐसे सभी गुणों से पूर्ण व्यक्ति से हम भी मिलना चाहेंगे. कभी उन्हें घर बुलाओ.’’

यह सुन कर नीरा कुछ सकपका सी गई. समय बीतता गया. नीरा की लापरवाहियां बढ़ती ही जा रही थीं. कभी कपड़े धुले न होते, तो कभी घर अस्तव्यस्त होता. अमन ने दबे स्वर में आगाह भी किया. पर नीरा ने कोई ध्यान न दिया.

नीरा रात को भी कभी सिरदर्द, तो कभी थका होने का बहाना कर जल्दी सो जाती. अमन की नींदें गायब होने लगीं. उसे ऐसा लगने लगा कि वह ठगा गया है. अपनी शरण में आई लड़की का मान रखने के लिए उस ने अपने घरबार, मांबाप, बहनों सब को छोड़ दिया पर उसे क्या मिला? यही सोचतेसोचते पूरी रात करवटें लेते बीत जाती.

वैसे तो अमन के जीवन में चिंताओं और तनाव के बादल हमेशा के लिए छा गए थे, परंतु एक दिन तो ऐसा तूफान आया कि उस के जीवन का सारा सुखचैन उड़ा ले गया.

एक दिन डा. जावेद के साथ अमन एक होटल में गया. होटल में कौफी का और्डर दे कर वे बैठे ही थे कि अचानक हौल के कोने में बैठे एक जोड़े पर अमन की निगाह रुक गई. एक गोरा सुंदर सा युवक अपनी महिला साथी के हाथों को पकड़े बैठा था. कभी बातें करता तो कभी ठहाके लगाता.

अचानक उस युवक ने उस युवती के हाथों को चूम लिया. युवती जोर से खिलखिला कर हंस पड़ी. उस के हंसते ही सारे राज खुल गए. दरअसल युवती और कोई नहीं नीरा ही थी. ध्यान से देखा तो उस की साड़ी भी पहचान में आ गई. यही साड़ी तो आज कालेज जाते समय नीरा पहन कर गई थी.

अमन का चेहरा सफेद पड़ गया. यह देख कर डा. जावेद ने भी पलट कर उधर देखा, वे भी नीरा को पहचान गए. होटल में कुछ अनहोनी न हो जाए, इसलिए वे गुस्से में कांपते अमन को लगभग खींचते हुए होटल से बाहर ले आए. लड़खड़ाती टांगों से किसी तरह अमन कार में बैठ गया. गुस्से से वह अभी तक कांप रहा था.

डा. जावेद उसे अपने घर ले आए. अमन के दिल पर गहरी चोट लगी थी. वह डा. जावेद से आंखें नहीं मिला पा रहा था. जब वह थोड़ा नौर्मल हुआ तो डा. जावेद ने बड़े भाई की तरह उस की पीठ पर हाथ फेरते हुए समझाया, ‘‘अमन, नीरा से मैं खुद बात करूंगा. उस ने ऐसा क्यों किया, सब कुछ पूछूंगा. अमन लव मैरिज में दोनों ओर से पूर्ण समर्पण होना जरूरी होता है. 1 महीने में तुम नीरा को कितना जान पाए? और नीरा तुम्हें कितना जान पाई? बस यहीं पर तुम अपने जीवन की सब से बड़ी भूल कर बैठे. मैं ने तुम्हें आगाह भी किया था पर तब तुम पर शरणागत का मान रखने, रक्षा करने का भूत सवार था.’’

अमन लज्जित सा उठ खड़ा हुआ. डा. जावेद अमन को उस के घर तक पहुंचा आए.

अमन बड़ी बेचैनी से नीरा का इंतजार करने लगा. वह अंदर ही अंदर सुलग रहा था. उस ने सोच लिया कि आज नीरा से आरपार की बात करेगा. बहुत धोखा दे चुकी है.

नीरा रोज की तरह दोपहर बाद घर आई. अमन को घर में देख हैरान हो गई. बोली, ‘‘अरे, आज बहुत थक गई. तुम खाना खा लेना. मैं नहा कर आती हूं.’’

अमन के सब्र का बांध टूट गया. उस ने नीरा से दोटूक पूछा, ‘‘तुम आज कालेज के बाद कहीं गई थी?’’

नीरा सफेद झूठ बोल गई, ‘‘अरे, आज तो सभी प्रोफैसर आए थे. एक के बाद एक लैक्चर होते रहे.’’

अमन का क्रोध बढ़ता जा रहा था. नीरा उठ कर जाने लगी तो अमन ने उस का हाथ पकड़ लिया. पूछा, ‘‘होटल आकाशदीप में कौन बैठा था तुम या तुम्हारी कोई हमशक्ल?’’

यह सुन कर नीरा घबरा गई. बौखला कर चिल्लाने लगी, ‘‘अच्छा तुम मेरी जासूसी भी करने लगे हो? तुम्हारी सोच इतनी ओछी है, मैं सोच भी नहीं सकती थी. प्रोफैसर के साथ कौफी पीने चली गई तो कौन सा आसमान गिर गया?’’

‘‘अच्छा, कौफी पीतेपीते प्रोफैसर हाथ चूमने लगते हैं?’’ अमन बोला.

चोरी पकड़ी जाने पर नीरा गुस्से में चीजें उठाउठा कर पटकने लगी. वह चिल्लाते चिल्लाते बोली, ‘‘मैं ने भी कितने संकीर्ण विचारों वाले व्यक्ति से शादी कर ली… वास्तव में तुम मेरे योग्य नहीं हो. मैं ने जल्दबाजी में गलत व्यक्ति को चुन लिया,’’ कह झटके से उठी और अपने कुछ कपड़े एक बैग में डाल खट से दरवाजा खोल बाहर निकल गई.

अमन कुछ देर तक तो बुत बना बैठा रहा, फिर अचानक उसे होश आया तो बाइक उठा कर नीरा को देखने निकल गया.

नीरा की बातें अमन के दिमाग पर ऐसे लग रही थीं जैसे कोई हथौड़ों से वार कर रहा हो. वह बाइक चला रहा था पर उस का ध्यान कहीं और था. अयोग्य व्यक्ति, संकीर्ण विचारों वाला, जासूसी करना, छोटी सोच यही बातें उस के दिमाग से टकरा रही थीं. तभी उस की बाइक सामने से तेजी से आ रही कार से जा टकराई और वह छिटक कर दूर जा गिरा. उस के बाद क्या हुआ उसे नहीं पता. अब अस्पताल में होश आया.

अचानक किसी आवाज से अमन की तंद्रा टूटी तो उस ने देखा सामने उस की बहन और डा. जावेद खड़े थे. डा. जावेद ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘अमन, गनीमत है इतना बड़ा ऐक्सिडैंट होने पर भी तुम खतरे से बाहर हो… अब तुम नीरा के बारे में सोच कर परेशान न होना. अगर उसे अपनी गलती का एहसास हो गया तो वह माफी मांग कर लौट आएगी और अगर ऐसा नहीं करती तो समझ लो वह तुम्हारे योग्य ही नहीं है. तुम उसे उस के हाल पर छोड़ दो. बस जल्दी ठीक हो जाओ.’’

बहन ने भी डा. जावेद के सुर में सुर मिलाया. बोली, ‘‘हां अमन, अभी तो तुम्हें घर भी ठीक करवाना है, क्लीनिक भी खोलना है.’’

यह सुन कर अमन तेज दर्द में भी मुसकरा दिया.

साठ पार का प्यार – भाग 3

फिट है, तो जो पहनती है उस पर फबता भी है. सुंदर लगती है, तो उस का आत्मविश्वास भी बना रहता है खुद पर. सेहत अच्छी है, तो हर तरह के मनोरंजन में हिस्सा भी लेती है. घर के सारे काम भी कर लेती है. सामाजिक कामों में सक्रिय रहती है और अपनी सखीसहेलियों के साथ मस्ती भी कर लेती है.

आजकल समीर का ध्यान घर के नौकरचाकरों से हट कर सुहानी पर केंद्रित हो गया था. इसलिए घर में काम करने वाले राहत महसूस कर रहे थे.

बच्चों के साथ भी सुहानी का जुड़ाव अच्छा था बिलकुल दोस्तों जैसा. फोन पर बच्चों से बात करती तो कोई पता नहीं लगा सकता कि बच्चों से बात कर रही है या हमउम्र से. जबकि समीर बच्चों के साथ फोन पर बातचीत में गंभीरता ओढ़े रहते. बच्चे भी उन से सिर्फ मतलब की बात करते, फिर गप मम्मी से ही मारते.

अगले दिन सुहानी ने ऐलान किया कि उस की मित्रमंडली पिकनिक जा रही है. शाम को लौटने में थोड़ी देर हो जाएगी. समीर चाहे तो पूरे दिन का अपना कोई प्रोग्राम बना सकते हैं.

‘‘तुम पूरे दिन के लिए चली जाओगी, तो मैं क्या करूंगा पूरे दिन अकेले?’’ समीर आश्चर्य से बोले.

‘‘अब क्या करूं डियर, खुद से प्यार करना है तो मेहनत तो करनी ही पड़ेगी न. यों घर में रह कर मैं खुद को सजा नहीं दे सकती. तुम्हें तो घर में बैठना पसंद है, पिकनिक जाना, पिक्चर देखना, घूमनाफिरना तुम्हें अच्छा नहीं लगता. इसलिए मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती. पर मैं खुद से प्यार करने लगी हूं, इसलिए खुद की खुशी के लिए जो मुझे पसंद है वह तो मैं करूंगी. अभी तो हमारा शहर से बाहर जाने का प्रोग्राम भी बन रहा है कुछ दिनों का. यह सब तो अब चलता ही रहेगा. तुम अकेले रहने की आदत अब डाल ही लो.

‘‘और फिर, मैं जब खुद खुश रहूंगी तभी तो तुम से…’’ सुहानी ने बात फिर से अधूरी छोड़ दी. समीर के दिल की धड़कन तेज हो गई. सुहानी आजकल तीर सीधे उन के दिल पर छोड़ने लगी थी. अब अकसर यही होने लगा. सुहानी का प्रोग्राम कभी कहीं और कभी कहीं का बन जाता. वह दिनोंदिन और भी खुश होती दिखाई दे रही थी.

कभीकभी समीर को लगता, कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं. कहीं सुहानी इस उम्र में हाथ से तो नहीं निकली जा रही. आम कुरतासलवार और साड़ी पहनने वाली सुहानी इन दिनों अपने कपड़ों में भी तरहतरह के प्रयोग करने लगी थी. कभी कुरती के साथ लहंगा, कभी पैंट्स, कभी प्लाजो, कभी फ्लेयर्स, जो भी शालीन फैशन था अपनाने लगी थी. उस की दोस्ती कालोनी की अपने से कम उम्र की महिलाओं से होने लगी थी. बहू से उस की बातें मेकअप, फैशन, नई फिल्मों, हीरोहीरोइनों व क्रिकेटरों को ले कर होतीं. यह नहीं कि ‘हमारे जमाने में ये होता था…हमारे जमाने में वो होता था.’

खुद से प्यार करना इतना अच्छा होता है क्या? समीर बारबार सोचने के लिए मजबूर हो जाते. सुहानी खुद से प्यार कर के इतनी बदल सकती है तो वे खुद क्यों नहीं.

सुबह नाश्ते में सुहानी समीर के टोस्ट पर मक्खन की मोटी परत लगा रही थी, ‘‘अरे, यह क्या कर रही हो सुहानी. खुद तो सूखा टोस्ट खाती हो और मेरे टोस्ट पर इतना मक्खन लगा रही हो. कितना वजन बढ़ गया है मेरा. तुम नहीं चाहतीं कि मेरा वजन कम हो. कल से फल, दूध, दही, दलिया वगैरह दिया करो, ये घीमक्खन आदि सब बंद.’’

‘‘क्यों?’’ सुहानी हैरानी से बोली हालांकि अंदर से वह खुश हुई जा रही थी, ‘‘तुम्हें तो टोस्ट पर जब तक ज्यादा मक्खन न लगे, मजा नहीं आता, बिना घी की छौंक लगे दाल हजम नहीं होती. परांठा भी एक दिन छोड़ कर देशी घी या मक्खन में बनना चाहिए. पूरीकचौड़ी, पकौड़े भी तुम्हें बहुत पसंद हैं अभी भी.’’

‘‘मैं ने कह दिया न कि अब सब बंद. जो मैं कह रहा हूं वही करो,’’ समीर दिखावटी गुस्से में बोले.

खाने के बाद सुहानी स्वीटडिश ले आई. समीर को खाने के बाद मीठा जरूर चाहिए था. इस के अलावा भी उन्हें मीठा बहुत पसंद था.

‘‘अरे, तुम यह मीठा बनाना जरा कम करो सुहानी. क्यों बनाती हो इतना मीठा, बना देती हो, फिर खाना पड़ता है,’’ समीर सारा दोष उस के सिर पर मढ़ते हुए बोले.

‘‘हां, पर तुम्हें पसंद है, तभी बनाती हूं. नहीं बनाती हूं तो तुम गुड़ या चीनी ही खा जाते हो. पर मीठा तुम्हें जरूर चाहिए खाने के बाद,’’ सुहानी अपनी मुसकान छिपाते हुए बोली, ‘‘तुम्हारे लिए ही बनाती हूं, मैं तो खाती भी नहीं हूं.’’

‘‘वही तो, तुम तो चाहती हो कि तुम दुबलीपतली रहो और मैं फैल कर एक क्ंिवटल का हो जाऊं.’’

सुहानी हतप्रभ हो समीर को देखती रह गई. समीर आगे बोले, ‘‘ऐसे क्या देख रही हो, कल से रोज का मीठा बंद. देखा नहीं था पिछली बार शुगर नौर्मल लिमिट को क्रौस कर गई थी. पर तुम्हें मेरी सेहत का जरा भी खयाल नहीं. और होगा भी कैसे, तुम्हें अपने सैरसपाटे, पिकनिक, सहेलियों से फुरसत मिले तब तो. हां, कभीकभार की बात अलग है.’’

सुहानी अपलक समीर को देखती  रह गई. चित भी मेरी पट भी मेरी. ‘‘ठीक है,’’ वह स्वीटडिश उठाती हुई बोली, ‘‘जैसा तुम कहो. मुझे तो खुद के बाद तुम से ही प्यार करना है.’’ सुहानी तिरछी नजर से समीर को देख रही थी, समीर घायल होतेहोते बचे.

‘खानपान और दिनचर्या पर कंट्रोल रखना पति या पत्नी पर एकदूसरे की बस की बात नहीं होती. जबरदस्ती करने या टोकाटाकी करने से झगड़ा होने का पूरापूरा अंदेशा रहता है. यह तभी हो सकता है जब खुद अंदर से ही सोच आ जाए,’ सुहानी ने यह सोचा.

एक दिन समीर से मिलने 2 आदमी आए. समीर अंदर आए, सुहानी से चाय बनाने के लिए कहा. थोड़ी देर बाद दोनों आदमी चले गए.

‘‘कौन थे ये, पहले तो कभी नहीं देखा इन्हें?’’ सुहानी बोली.

‘‘यहां एक संस्था है गोकुल,’’ समीर बोले, ‘‘जो विकलांग लोगों के लिए काम करती है. ये दोनों उसी संस्था के लिए काम करते हैं. मैं सोचता हूं सुहानी, गोकुल संस्था मैं भी जौइन कर लूं. समय भी अच्छा बीतेगा, बिजी भी रहूंगा और एक नेक काम भी होगा. क्यों, तुम क्या कहती हो?’’ समीर ने सुहानी की तरफ देखा.

‘‘मैं क्या कहूंगी, जो तुम ने सोचा, ठीक ही सोचा होगा,’’ सुहानी बोली और मन ही मन सोचा, ‘घर में भी सुखशांति रहेगी, काम वाले भी आराम से काम करेंगे.’

दूसरे दिन जब सुहानी जौगिंग के  लिए तैयार हो कर कमरे से बाहर  आई तो लौबी में समीर को ट्रैक सूट व जूतों से लैस पाया. वह खुशी से भीगी आंखों से समीर को देखती रह गई. वह तो यही सोच रही थी कि समीर अभी भी बिस्तर पर गुड़मुड़ सो रहे होंगे. उस ने ध्यान भी नहीं दिया कि कब समीर उठ कर दूसरे बाथरूम में जा कर तैयार हो कर आ गए.

‘‘समीर तुम? आज इतनी जल्दी कैसे उठ गए?’’ सुहानी करीब आ कर खड़ी हो गई, ‘‘कहां जा रहे हो?’’

‘‘लव इन सिक्सटीज डियर,’’ समीर उसी के अंदाज में उस के गालों पर चिकौटी काट कर होंठों को उंगली से सहलाते हुए बोले, ‘‘मैं ने सोचा कि तुम ही क्यों, मैं क्यों नहीं प्यार कर सकता सिक्सटी में खुद से. खुद से प्यार करूंगा, तभी तो तुम से…’’ कह कर समीर बहकने का नाटक करते हुए उस की तरफ झुक गए.

‘‘ऊं हूं,’’ सुहानी पीछे हटती हुई बोली, ‘‘मुझ से अभी नहीं. पहले खुद से तो ठीक से प्यार करना सीख लो. लेकिन सोच लो, प्यार की डगर बहुत कठिन होती है, फिसलनभरी होती है. बहुत हिम्मत, सब्र व लगन के साथ आगे बढ़ना पड़ता है. फिर चाहे प्यार खुद से करना हो या दूसरे से. कर पाओगे? बीच राह में हिम्मत तो नहीं हार जाओगे?’’

‘‘अब प्यार किया तो डरना क्या, ओखली में सिर दे दिया तो मूसल से क्या डरना. औरऔर…’’

‘‘बस, बस. बहुत हो गए मुहावरे,’’ सुहानी हंसती हुई बोली.

‘‘ओके डार्लिंग, मैं चला,’’ कह कर समीर 2 उंगलियों से स्टाइल से बाय कहते हुए बाहर निकल गए.

अपनी जीत पर मन ही मन मुसकराती सुहानी ने मेन दरवाजे की चाबी घुमाई और दौड़ती हुई समीर की बगल में जा कर कदमताल करती हुई दौड़ने लगी. सुबह का खूबसूरत समां था. पक्षियों का दिलकश कलरव था और सिक्सटीज की उम्र में खुद से प्यार करने का कुछ अलग ही मजा था.

आपकी गलत ब्रा बना सकती है मास्टालजिया दर्द का शिकार

आज के इस दौर में छोटी से छोटी समस्या भी बड़ी लगने लगती है क्योंकि कम उम्र में ही कई लोग गंभीर बीमारी से पीड़ित हो जाते हैं. जिसके चलते हम यह बिलकुल नहीं चाहते कि हम खुद की या किसी अपने की सेहत के साथ लापरवाही बरतें. महिलाओं में ऐसी ही एक समस्या है ब्रेस्ट में दर्द होना. जिस के कारण कभी कभी वह खुद को काफी तनाव में महसूस करती हैं जिस का कारण ब्रैस्ट कैंसर का भय होता है . लेकिन ब्रेस्ट में दर्द होना एक ऐसी समस्या है जिसका सामना अधिकतर महिलों को अपने जीवन काल में कभी न कभी करना पड़ता है . इस दर्द को मास्टालजिया का दर्द कहा जाता है. आज इस लेख में हम आपको मास्टालजिया के कारण ,बचाव और उपचार के बारे में बताने जा रहे हैं.

मास्टालजिया का दर्द कई कारणों से हो सकता है। जैसे की हार्मोन्स में बदलाव , इन्फेक्शन , मासिक चक्र में असामानता, गलत ब्रा का चयन , स्तनपान और सूजन आदि ब्रेस्ट में दर्द का कारण बन सकते हैं।
कारण

संक्रमण हो सकती है वजह

ब्रैस्ट फीड कराने वाली महिलाओं में यह एक आम बात हैं आमतौर पर शुरुवाती तीन महीने में उन्हें अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता हैं . यह संक्रमण ब्रैस्ट के मेमोरी ग्लैंड में होता हैं इस स्थति में ब्रेस्ट की टिशूज में इंफ्लेमेशन, दर्द, लालिमा ,सूजन,जलन , बुखार, हो सकता है.

मासिक धर्म के दौरान

मासिक धर्म के समय हार्मोन लेवल में उतार-चढ़ाव होता है जिस कारण पीरियड्स की डेट नजदीक आने पर यह दर्द होने लगता है. व पीरियड्स खत्म होने पर दर्द एक दो दिन में ही ठीक हो जाता है . कभी कभी इस दर्द की अवधि 5 से 10 दिन भी हो सकती है. साथ ही मेनोपोज़ के बाद स्तनों में आए बदलाव के कारण भी इस परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

दवाओं का साइड इफ़ेक्ट

यदि आप नियमित किसी बीमारी के कारण लम्बे समय तक दवाइयों का सेवन करती हैं तो भी यह समस्या हो सकती है.

ब्रा के चयन में गलती

आपकी ब्रा सिर्फ आपके स्तनो को ही शेप में नहीं रखती बल्कि यह आपको ऐसे दर्द से भी निजात दिलाती है लेकिन यदि आप गलत साइज की ब्रा पहनती हैं तो इससे ब्लड सर्कुलेशन सही तरीके से नहीं होता. गलत फैब्रिक व अधिक टाइट ब्रा पहनने से भी ब्रेस्ट की मांसपेशियों में दर्द हो सकता है.

ट्रीटमेंट

यदि आपको लम्बे समय से दर्द की परेशानी बनी हुई हैं तो डॉक्टर आपको मैमोग्राम ,अल्ट्रा साउंड ,बॉयोप्सी ,मैग्नैटिक रेजोनेंस इमेजिन {MRI} कराने की सलाह देते हैं .

बचाव के लिए अपनाएं टिप्स

गलत साइज व टाइट ब्रा को करें ना ,रात में सोते समय मुलायम फैब्रिक की ढ़ीली ब्रा पहने या सोने से पहले ब्रा हटा दें.
कैफीन वाले ड्रिंक्स लेने से बचें.
यदि आपका बच्चा ब्रेस्ट फीडर हैं तो आप दिन में एक -दो बार अपने स्तनो की सिकाई करें.
दर्द में पैन किलर दवाई (पेरासिटामोल ,ब्रूफेन )का सेवन कर सकती हैं लेकिन लम्बे समय तक ऐसी दवाओं के सेवन से बचें व समय रहते डॉक्टर की सलाह अवश्य लें.
डॉक्टर की सलाह पर आप प्रिमरोज तेल से मालिश व विटामिन ई की कैप्सूल ले सकती हैं .

विकास के आधार को लेकर क्या कहती है पत्रकार और टीवी एंकर बरखा दत्त

पत्रकार और राइटर बरखा दत्त का जन्म नई दिल्ली में एयर इंडिया के अधिकारी एस पी दत्त और प्रभा दत्त, के घर हुआ था. दत्त को पत्रकारिता की स्किल मां से मिला है. महिला पत्रकारों के बीच बरखा का नाम लोकप्रिय है. उनकी छोटी बहन बहार दत्त भी टीवी पत्रकार हैं. बचपन से ही क्रिएटिव परिवार में जन्मी बरखा ने पहले वकील या फिल्म प्रोड्यूस करने के बारें में सोचा, लेकिन बाद में उन्होंने पत्रकारिता को ही अपना कैरियर बनाया.

चैलेंजेस लेना है पसंद

वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के समय कैप्टेन बिक्रम बत्रा का इंटरव्यू लेने के बाद बरखा दत्त काफी पॉपुलर हुई थी. वर्ष 2004 में भूकंप और सुनामी के समय भी रिपोर्टिंग की थी. उन्हें चुनौतीपूर्ण काम करना बहुत पसंद था, इसके लिए उन्हें काफी कंट्रोवर्सी का सामना करना पड़ा. वर्ष 2008 में बरखा को बिना डरे साहसिक कवरेज के लिए पदम् श्री पुरस्कार भी मिला है. इसके अलावा उन्हें बेस्ट टीवी न्यूज एंकर का ख़िताब भी मिल चुका है. बरखा के चुनौतीपूर्ण काम में कोविड 19 के समय उत्तर से दक्षिण तक अकेले कवरेज करना भी शामिल है, जब उन्होंने बहुत कम मिडिया पर्सन को ग्राउंड लेवल पर मजदूरों की दशा को कवर करते हुए पाया. उनकी इस जर्नी में सबसे कठिन समय कोविड से आक्रांत उनकी पिता की मृत्यु को मानती है, जब वह कुछ कर नहीं पाई.

 

 

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बरखा दत्त ने मोजो स्टोरी पर ‘वी द वीमेन’ की 6 एडिशन प्रस्तुत किया है, जहाँ महिलाओं ने अपने जीवन की कठिन परिस्थितियों से गुजरते हुए कैसे आगे बढ़ी है, उनके जर्नी की बात कही गयी है, जिसे सभी पसंद कर रहे है. वह कहती है कि वुमन एम्पावरमेंट पर कई कार्यक्रम हर साल होते है, जिसमे कुछ तो एकेडमिक तो कुछ ग्लैमर से जुड़े शो होते है, जिससे आम महिलाएं जुड़ नहीं पाती. मैंने ग्रासरूट से लेकर सभी से बात की है. ग्राउंड से लेकर एडल्ट सभी को शामिल किया गया है, इसमें केवल महिलाएं ही नहीं, पुरुषों, गाँव और कम्युनिटी की औरतों को भी शामिल किया गया है. इसमें गे राईट से लेकर मेनोपोज सभी के बारें में बात की गई है, ताकि दर्शकों के पसंद के अनुसार कुछ न कुछ देखने और सीखने को मिले.

इक्विटी ऑफ़ वर्क है जरुरी

बरखा आगे कहती है कि मुझे लगता है, चुनौती हर इंसान का अपने अपने अंदर होता है, इसमें हमारे संस्कार, एक माहौल में बड़े होना शामिल होती है. घरों में क्वालिटी की बात नहीं होती, लेकिन महिलाएं काम और ड्रीम शुरू करती है, लेकिन आगे जाकर छोड़ देती है, इसे क्यों छोड़ दिया, या क्या समस्या था, पूछने पर वे परिवार और बच्चे की समस्या को खुद ही उजागर कर संतुष्टि पा लेती है. मैं हमेशा कहती हूँ कि ‘इक्वलिटी ऑफ़ वर्क’ अधूरी रहेगी, अगर महिला ने घर पर इक्वलिटी की बात न की हो, क्योंकि एक सर्वे में पता चला है कि कोविड के दौरान काफी महिलाओं ने काम करना छोड़ दिया है. देखा जाय तो महिलाएं हर बाधाओं को पार कर काम कर रही है. फाइटर जेट से लेकर फ़ौज और स्पेस में भी चली गई है, लेकिन आकड़ों को देखे तो इंडिया में काम करने वाली महिलाओं की संख्या में कमी आई है, बढ़ी नहीं है. भागीदारी काम में कम हो रही है. पढ़ी लिखी औरतों के लिए मेरा कहना है कि पढ़े लिखे होने की वजह से हमेशा जागरूक होनी चाहिए. हमें मौका गवाना नहीं चाहिए, क्योंकि कई महिलाओं को ये मौका नहीं मिल पाता है.

 

 

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करना पड़ा, खुद को प्रूव

बरखा कहती है कि मैंने कई बार अपनी बातों को जोर देकर सामने रखा है. वर्ष 1999 में जब मैंने कारगिल वार को कवर करने गई थी, मुझे अपनी ऑर्गनाइजेशन को बहुत मनाना पड़ा. वार फ्रंट में जाने का मौका नहीं मिल रहा था, आज तो महिलाएं फ़ौज में है, तब बहुत कम थी. उन्होंने कहा कि खाने , रहने औए बाथरूम के लिए जगह नहीं होगी, मैंने कहा कि मैं सबकुछ सम्हालने के लिए तैयार हूँ, क्योंकि मैं एक वार ज़ोन में जा रही हूँ. मैंने देखा है कि आप जितना ही चुनौतीपूर्ण काम करें और अचीव कर लें, उतनी ही आपको बहुत अधिक मेहनत करने की जरुरत आगे चलकर होती है और उस पोस्ट पर पहुँच कर 10 गुना अधिक काम, कंट्रोवर्सी और जजमेंट की शिकार होना पड़ता है. एक महिला को पूरी जिंदगी संघर्ष करनी पड़ती है, वह ख़त्म कभी नहीं होती.

खुले मन से किया काम

बरखा ने हमेशा ही चुनौतीपूर्ण काम किया है और ग्राउंड लेवल से जुड़े रहना उन्हें पसंद है. वह कहती है कि कोविड के समय में मैंने दिल्ली से केरल गाडी में गयी थी और पूरे देश का कवरेज दिया था. किसी बड़ी मिडिया को मैंने रास्ते पर नहीं देखा. माइग्रेंट्स रास्ते पर पैदल जा रहे थे, केवल दो चार लोकल प्रेस दिखाई पड़ी थी. बड़े-बड़े टीवी चैनल कोई भी नहीं दिखा. रिपोर्टर के रूप मैं मुझे लोगों तक ग्राउंड लेवल तक पहुंचना मेरा पैशन रहा है. इसके अलावा मुझे ऑथेंटिक रहने की इच्छा हमेशा रही है, क्योंकि मैंने बहुतों को देखा है कि वे खुले मन से काम नहीं करते. फॉर्मल रहते है और अगर कोई व्यक्ति फॉर्मल रहता है, तो अगला भी कुछ कहने से हिचकिचाएगा. मैने हमेशा एक आम इंसान बनकर ही लोगों से बातचीत की है.

 

 

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था कठिन समय

उदास स्वर में बरखा कहती है कि जीवन का कठिन समय मेरे पिता का कोविड में गुजर जाना रहा. दो साल से मैंने कोविड को कवर किया और बहुत सारे ऐसे स्टोरी को कवर किया जिसमे लोगों को ऑक्सीजन, बेड और प्रॉपर चिकित्सा नहीं मिल रही थी. मेरे लिए अच्छी बात ये रही कि मैने फ़ोन कर पिता को एक हॉस्पिटल मुहैय्या करवाया था. मैं उस समय बहुत सारे हॉस्पिटल गई, लेकिन मेरे पिता जिस हॉस्पिटल में थे, वहां नहीं जा पाई. जबतक मैं पहुंची, बहुत देर हो चुकी थी. वही मेरे लिए जीवन का सबसे कठिन समय था.

मिली प्रेरणा

बरखा आगे कहती है कि मेरा प्लान वकील बनने का था, फिर फिल्म बनाने की सोची, लेकिन जब मैंने मास्टर की पढाई पूरी की, तो कोई प्राइवेट प्रोडक्शन हाउस इंडिया में नहीं थी. केवल दूरदर्शन के पास प्रोडक्शन हाउस था. मैंने एन डी टीवी में ज्वाइन किया और मुझे एक स्टोरी करने के लिए भेजा दिया गया, उन्हें मेरा काम पसंद आया और मैं रिपोर्टर बन गई

विकास का आधार

विकास का आधार हर इंसान का हक बराबर होने से है. मेरी राय में घर्म, जाति, क्लास आदि से किये गए आइडेंटिटी कई बार लोगों को डिसाइड करती है तो कई बार डीवाईड करती है. विकास मेरे लिए एक्रोस आइडेंटिटी, केटेगोरी, डिवीज़न आदि सबके अधिकार एक जैसे होने चाहिए, तभी विकास संभव हो सकेगा.

करना पड़ता है: धर्म ने किया दानिश और याशिका को दूर- भाग 2

‘‘यशिका, तुम्हारे पापा का औफिस कहां है?’’

‘‘क्यों आंटी? आप उन से मिलना चाहती हैं?’’

‘‘नहीं, ऐसे ही पूछ रही हूं.’’

‘‘एन. मौल के पीछे वाली रोड पर उन का औफिस है, कभी वहां जाते हैं, कभी घर में ही जो औफिस बना रखा है, वहां लोग आतेजाते रहते हैं.’’

अगले दिन नौशीन ने औफिस से छुट्टी ली. यशिका के पिता ललित के औफिस पहुंचीं, बाहर रखी एक चेयर पर बैठ गईं.

वहां काम करने वाले सुनील ने उन के पास जा कर आने का कारण पूछा तो नौशीन ने कहा, ‘‘ललितजी से मिलना है, जरूरी काम है, मु?ो उन की हेल्प चाहिए.’’

शिंदे ने जाकर ललित को बताया तो उन्होंने कहा, ‘‘अरे यार, इसे टरकाओ, अभी मु?ो बहुत लोगों से मिलना है.’’

‘‘बोला साहब. कह रही है आज आप नहीं मिल पाए तो कल फिर आएगी.’’

‘‘हां, ठीक है, बाद में देखेगें.’’

उस दिन नौशीन ललित से नहीं मिल पाईं, फिर वे घर जा कर अपना औफिस का काम करती रहीं. अब वह मन ही मन बहुत कुछ ठान चुकी थीं. अगले दिन वे फिर उन के औफिस पहुंचीं. इस बार ललित ने उन्हें अंदर बुला ही लिया. करीब 50 साल की बेहद स्मार्ट, स्टाइलिश नौशीन जैसे ही उन्हें ‘हैलो सर’ बोलती हुई अंदर आई, वे अचानक पता नहीं क्यों खड़े हो गए, फिर धम्म से अपना सिर हिलाते हुए उन्हें भी बैठने का इशारा किया. नौशीन के पास से आती कीमती परफ्यूम की खुशबू को उन्होंने गहरी सांस ले कर अपने अंदर उतारा.

नौशीन ने बेहद सभ्य तरीके से अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘मैं नीलकंठ वैली में फ्लैट लेना चाहती हूं, पर वहां का बिल्डर मुसलिम्स को कोई भी फ्लैट नहीं बेच रहा है. यह गलत बात है न? क्या हम इंसान नहीं?

‘‘क्या हम यहां के नागरिक नहीं? यह भेदभाव क्या अच्छा लगता है? और कोई भी

उसे इस बात के लिए टोक भी नहीं रहा. आप

की बहुत तारीफ सुनी है, इसीलिए आप के पास चली आई.’’

ललित तो नौशीन के बात करने के ढंग में, उस की पर्सनैलिटी के जादू के असर में बैठे थे, बोले, ‘‘मैं देखता हूं क्या हो सकता है. आप अपना फोन नंबर लिखवा दीजिए. मैं जल्द ही आप से बात करूंगा.’’

नौशीन ललित के औफिस से क्या उठी, ललित का दिल जैसे नौशीन के साथ उड़ चला. वे खुद बहुत गुड लुकिंग, स्मार्ट इंसान थे. नौशीन का परिचय जान कर खुश हुए थे. अकेली अपने बेटे के साथ रहती हैं, जौब करती हैं, वे नौशीन से इस पहली मुलाकात में ही बहुत इंप्रैस्ड हो गए थे. जल्द ही उन्होंने शिंदे को कह कर बिल्डर को फोन लगवाया, उन्हें एक फ्लैट नौशीन की इच्छानुसार बुक करने के लिए कहा, फिर उन्होंने नौशीन को फोन किया, ‘‘बिल्डर से बात हो गई है, अब आप उस एरिया में जो फ्लैट चाहें, बुक कर सकती हैं.’’

 

नौशीन ने शुक्रिया कहते हुए बड़े अपनेपन से कहा, ‘‘आप ने तो कमाल कर

दिया. आप तो बिलकुल वैसे ही अच्छे इंसान निकले जैसा सुना था. अब आप थोड़ा सा भी टाइम निकाल कर मेरे घर चाय पर जरूर आइए. इतना तो आप को करना पड़ेगा.’’

ललित बड़े धर्मसंकट में पड़े. एक मुसलिम के घर चाय पीने जाएंगे? उफ, आज तक तो किसी मुसलिम के घर पैर नहीं रखा, चायपानी पीना तो दूर की बात है.

नौशीन की मीठी सी आवाज फिर सुनाई दी, ‘‘ओह, सम?ा. आप शायद हमारे घर न आना चाहें, कोई बात नहीं.’’

‘‘अरे, नहींनहीं, संडे को आता हूं, आप की भी छुट्टी होगी.’’

नौशीन ने अब दानिश और यशिका को अपने पास बैठा कर ये सब बता दिया तो दोनों हंसते हुए उन से लिपट गए.

दानिश ने कहा, ‘‘मम्मी, आप क्याक्या सोच लेती हैं. यह क्या कर रही हैं?’’

‘‘करना पड़ता है बेटा, अपने बच्चों को खुशियां देने के लिए कुछ कदम उठाने जरूरी होते हैं. वे हमारे घर आएं, तुम से मिलें, यहां थोड़ा टाइम बिताएं, तो उन के पूर्वाग्रह कुछ दूर होंगे. अब यशिका, तुम इस संडे को यहां मत आना. इस संडे तुम्हारे पापा हमारे मेहमान होंगे, मेरे होने वाले समधी पहली बार आ रहे हैं,’’ कहते कहते नौशीन ने प्यार से दोनों को गले लगा लिया.

संडे शाम 5 बजे शोल्डर कट बाल, छोटी सी बिंदी, डार्क ब्लू कलर की प्लेन शिफौन साड़ी, स्टाइलिश ब्लाउज, अपने सदाबहार परफ्यूम की खुशबू बिखेरते नौशीन ने जब डोरबैल बजने पर अपने फ्लैट का दरवाजा खोला तो ब्लैक टीशर्ट और जींस पहने ललित ने उन्हें बुके देते हुए मुसकरा कर कहा, ‘‘यह आप के लिए.’’

नौशीन ने ‘‘अरे, वाह, थैंक यू’’ कहते हुए फूल लिविंगरूम के एक कोने में रखे वास में लगा दिए, फिर दानिश को आवाज दे कर उन से मिलवाने के लिए बुलाया. दानिश ने आ कर उन्हें नमस्ते करते हुए उन के पांव छू कर उन्हें प्रणाम किया. ललित तो जैसे मंत्रमुग्ध से सुंदर से सोफे पर बैठ कर लिविंग रूम का इंटीरियर देखते हुए मन ही मन तारीफ कर रहे थे. नौशीन ने वहीं बैठते हुए कहा, ‘‘आप का आना बहुत अच्छा लगा, मु?ो तो लग ही नहीं रहा था कि आप हमारे घर आएंगे.’’

‘‘अरे, क्यों नहीं लग रहा था?’’

नौशीन ने जरा उदास होते हुए कहा, ‘‘कई कारण हैं. आप तो सब जानते ही हैं कि आजकल क्या माहौल है. क्या ही कहा जाए. वह तो आप जैसे खुली सोच वाले

लोग कभी मिल जाएं तो मिल कर खुशी होती है, बस हमारा देश, समाज आप जैसों की दरियादिली पर ही चल रहा है.’’

ललित जानते थे कि नौशीन जैसा कह रही है, वैसा बिलकुल नहीं है. वे भी वैसे ही हैं, जैसों के कारण नफरतें बढ़ती जा रही हैं पर क्या कहते. सामने बैठी महिला और उस के बेटे की सभ्यता ने मन मोह लिया था.

नौशीन ने कहा, ‘‘दानिश, आप लोग बातें करो, मैं चाय लाती हूं.’’

जब तक नौशीन किचन में रही, दानिश से हुई बातों ने ललित का मन खुश कर दिया. इतना विचारवान लड़का, इतने मैनर्स, इतनी नौलेज. यशिका इकलौती संतान थी, दानिश से बातें करते हुए उन्हें लगा कि जैसे एक जमाना हो गया है उन्हें ऐसे किसी लड़के से बातें किए.

Kundli Bhagya: 20 साल के लीप के बाद शो में हुई 3 नए एक्टर्स के एंट्री, देखें प्रोमो

टीवी एक्ट्रेस श्रद्धा आर्या का ‘कुंडली भाग्य’ इन दिनों खूब सुर्खियों में है. जल्द ही श्रद्धा आर्या के ‘कुंडली भाग्य’ में लीप आने वाला है, जिसमें एक साथ कई सितारों की भी एंट्री होने वाली है. हाल ही में कुंडली भाग्य (Kundali Bhagya) में आने वाले लीप से जुड़ा प्रोमो वीडियो भी रिलीज हुआ है, जिसमें पारस कलनावत (Paras Kalnawat), सना सैय्यद (Sana Sayyad) और बसीर अली (Baseer Ali) भी नए किरदारों में नजर आए. इस प्रोमो वीडियो से जहां कुछ लोग खुश दिखाई दिये तो वहीं कुछ यूजर्स में नाराजगी भी नजर आई. ‘कुंडली भाग्य’ का यह प्रोमो वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है.

 

नया प्रोमो हुआ लॉन्च

‘कुंडली भाग्य’ के प्रोमो वीडियो में पारस कलनावत राजवीर लूथरा के रोल में दिखाई दिये, जो सबके दिलों में बसता है लेकिन उसके दिल में उसकी मां प्रीता बसती है. वहीं बसीर अली शौर्य लूथरा के रोल में दिखाई दिये, जो कि एक बड़े बाप की बिगड़ैल औलाद के तौर पर नजर आए. वहीं सना सैय्यद पलकी की भूमिका में दिखाई दीं, जो यूं तो लोगों की खूब मदद करती है, लेकिन गलत के खिलाफ भी मजबूती से खड़ी होती है. ‘कुंडली भाग्य’ के इस प्रोमो वीडियो को देखकर कहा जा सकता है कि शो एक लव ट्रायएंगल बनने वाला है.

 

 

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कुंडली भाग्य’ को लेकर लोगों ने यूं दिये रिएक्शन

एंटरटेनमेंट से भरे ‘कुंडली भाग्य’ (Kundali Bhagya) के प्रोमो वीडियो को देखने के बाद लोग भी खूब कमेंट कर रहे हैं. एक यूजर ने लिखा, “ये दुख की बात है कि एक डल स्टोरी वाले शो में पारस कलनावत और सना जैसे शानदार कलाकारों की एंट्री हुई है. उनके इस टैलेंट का प्रयोग किसी अच्छी स्क्रिप्ट वाले शो में किया जा सकता था. एक अच्छे निर्देशक और एक अच्छे प्रोड्यूसर के साथ.” दूसरे यूजर ने लिखा, “मैं जानती हूं कि लीप ठीक नहीं है, लेकिन मैं इस बात से खुश हूं कि इसमें पारस को लिया है.” एक यूजर ने लव ट्रायएंगल पर तंज कसते हुए लिखा, “पूरी कोशिश है सीरियल को बंद नहीं करना चाहे कितना भी लीप लाने पड़े. लेकिन कहानी वही दोहराई गयी है कि 2 भाई और एक लड़की.”

बंगाली शादी के बाद व्हाइट साड़ी में पारसी दुल्हन बनीं कृष्णा मुखर्जी, देखें फोटोज

‘ये है मोहब्बतें’ से मशहूर हुईं टीवी एक्ट्रेस कृष्णा मुखर्जी अपने प्यार चिराग बाटलीवाला (Chirag Batliwala) के साथ शादी के बंधन में बंध चुकी हैं. 13 मार्च 2023 को कृष्णा मुखर्जी ने पहले बंगाली रीति-रिवाज से शादी की और फिर दोनों ने पारसी रीति-रिवाज से शादी की. उनकी पारसी वेडिंग की तस्वीरें सामने आई हैं. आइए आपको दिखाते हैं.

 

कृष्णा मुखर्जी की पारसी वेडिंग

‘नागिन’ एक्ट्रेस कृष्णा मुखर्जी के पति चिराग बाटलीवाला पारसी परिवार से ताल्लुक रखते हैं. ऐसे में बंगाली शादी के बाद उन्होंने अपने पति के धर्म के अनुसार भी शादी रचाई. पारसी वेडिंग में कृष्णा और चिराग बहुत प्यारे लग रहे थे. चिराग ने पारसी ग्रूम लुक चुना था. उन्होंने व्हाइट ट्रेडिशनल आउटफिट के साथ पारसी टोपी भी पहनी थी. वहीं, कृष्णा मुखर्जी ने व्हाइट साड़ी पहनी थी, जिसे उन्होंने सीधा पल्लू के साथ ड्रैप किया था और इसे एक स्ट्रेपी ब्लाउज के साथ पेयर किया था.

 

 

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कृष्णा मुखर्जी का पारसी लुक

एक्ट्रेस ने एक नेकलेस के साथ अपने लुक को सिंपल रखा था और मांग में लगे सिंदूर और चूड़ा को फ्लॉन्ट किया था. कम मेकअप और गजरे में बंधा बन उनके लुक में चार-चांद लगा रहा था. वह अपने पारसी ब्राइडल लुक में बहुत सुंदर लग रही थीं. एक्ट्रेस के पारसी वेडिंग से कई वीडियोज और तस्वीरें वायरल हो रही हैं. एक वीडियो में एक्ट्रेस को अपने पति चिराग के साथ रोमांटिक डांस करते हुए भी देखा गया. ब्राइडल एंट्री के दौरान भी वह अपने पति के साथ झूमते हुए नजर आईं.

कृष्णा मुखर्जी का बंगाली लुक

कृष्णा मुखर्जी ने अपनी बंगाली शादी में एकदम ट्रेडिशनल दुल्हन बनी थीं. उन्होंने व्हाइट कलर का लहंगा पहना था, जिस पर चौड़ा रेड बॉर्डर था. इसे एक्ट्रेस ने रेड ब्लाउज और रेड बॉर्डर वाले व्हाइट ब्लाउज के साथ पेयर किया था. एक्ट्रेस ने डबल मोतियों का हार पहना था. माथा पट्टी और इयररिंग्स से लुक को कंप्लीट किया था. ओवरऑल ब्राइडल लुक में कृष्णा की सुंदरता देखने लायक थी. चिराग भी बंगाली ग्रूम लुक में जच रहे थे.

 

 

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एकांत कमजोर पल- भाग 3

बड़ी बेगम ने भूमिका बांधी, ‘‘जब तुम्हारे अब्बू दूसरी बीवी ले आए थे तो मैं भी उन्हें छोड़ना चाहती थी पर सामने तुम दोनों बच्चे थे.’’

‘‘आप की बात अलग थी मैं खुद को और अपनी बच्ची को संभाल सकती हूं. उस की गलती की सजा उसे मिलना ही चाहिए, सनोबर बोली.’’

‘‘उस की गलती की सजा उस के साथसाथ तुम्हारी बेटी को भी मिलेगी या तो उस का बाप छिनेगा या मां और अगर तुम दोनों ने दूसरी शादी कर ली तो इस का क्या होगा?’’

‘‘अम्मी एक शादी से दिल नहीं भरा जो दूसरी करूंगी? रह गया पिता तो ऐसे पिता के होने से ना होना भला,’’ सनोबर के मन की सारी कड़वाहट होंठों पर आ गई.

बड़ी बेगम जानती थीं इस का गुस्सा निकलना अच्छा है. उन्होंने बहस नहीं की.

बोलीं, ‘‘ठीक है तुम को लगता है तुम अकेली ही अच्छी परवरिश कर सकती हो तो ठीक है, पर मैं चाहती हूं कि तुम तलाक की अर्जी 6 महीने बाद दो. कुछ वक्त दो फिर जो तुम्हारा फैसला होगा मैं मानूंगी.’’

‘‘नो वे अम्मी मैं 6 दिन भी न दूं. जबजब मुझे याद आता है साहिल और बाई… घिन आती है उस के नाम से. कोई इतना गिर सकता है?’’

बड़ी बेगम ने दुनिया देखी थी. अपने पति को बहुतों के साथ देखा था. उन्होंने अपने अनुभव का निचोड़ बताया, ‘‘वह एक वक्ती हरकत थी. उस का कोई अफेयर नहीं था. जब एक औरत और एक मर्द अकेले हों तो दोनों के बीच तनहाई में एक कमजोर पल आ सकता है.’’

मैं भी तो औफिस में अकेली मर्दों के साथ घंटों काम करती हूं. मेरे साथ तो कभी ऐसा नहीं हुआ. आत्मसंयम और मर्यादा ही इंसान होने की पहचान हैं वरना जानवर और आदमी में क्या फर्क है?’’

‘‘मैं ने अब तक तुम से कुछ नहीं कहा पर बहुत सोच कर तुम से समय देने को कह रही हूं. आगे तुम्हारी जो मरजी.’’

‘‘ठीक है आप कहतीं हैं तो मान लेती हूं पर मेरे फैसले पर कोई असर नहीं पड़ेगा.’’

सनोबर यह सोच कर मान गई कि उसे भी तो कुछ काम निबटाने हैं. प्रौपर्टी के पेपर अपने नाम करवाना और सेविंग्स में नौमिनी बदलना आदि. फिर अभी औफिस का भी प्रैशर है. रात को रोज की तरह साहिल ने फोन किया तो सनोबर ने उठा लिया.

साहिल खुशी और अचंभे के मिलेजुले स्वर में बोला, ‘‘सनोबर मुझे माफ कर दो, वापस आ जाओ.’’

सनोबर ने तटस्थ स्वर में कहा, ‘‘मुझे तुम से मिलना है.’’

साहिल बोला, ‘‘हां, हां… जब कहो.’’

सनोबर बोली, ‘‘कल औफिस के बाद घर पर.’’ और फोन रख दिया.

औफिस के बाद सनोबर घर पहुंची. साहिल उस की प्रतिक्षा कर रहा था. घर भी उस ने कुछ ठीक किया था. साहिल ने सनोबर का हाथ पकड़ना चाहा तो उस ने झिड़क दिया और दूर बैठ गई.

‘‘साहिल मैं कोई तमाशा नहीं करना चाहती. शांति से सब तय करना चाहती हूं. मेरातुम्हारा जौइंट अकाउंट बंद करना है. इंश्योरैंस पौलिसीज में नौमिनी हटाना है. इस फ्लैट में तुम्हारा जो पैसा लगा वह तुम ले लो. मैं इसे अपने नाम करवाना चाहती हूं. मुझे तुम से कोई पैसा नहीं चाहिए, मैं काजी के यहां खुला (औरत की ओर से निकाह तोड़ना) की अर्जी देने जा रही हूं.’’

थोड़ी देर के लिए साहिल चुप रहा फिर बोला, ‘‘सनोबर, मेरा जो कुछ है सब तुम्हारा और हमारी बेटी का है. तुम सब ले लो मुझे मेरी सनोबर दे दो. मुझे एक बार माफ कर दो. मेरी गलती की इतनी बड़ी सजा न दो. अगर तुम मेरी जिंदगी में नहीं तो मैं यह जिंदगी ही खत्म कर दूंगा,’’ सनोबर जानती थी साहिल भावुक है पर इतना ज्यादा है यह नहीं जानती थी. वह उठ कर चली गई.

अब बस औफिस जाने और मन लगा कर काम करने में और बेटी के साथ उस का समय बीतने लगा. बड़ी बेगम के कहने पर और बेटी की जिद पर वह राजी हुई कि साहिल सप्ताह में एक बार बेटी से मिल सकता है. उसे बाहर ले जा सकता है. वह नहीं चाहती थी कि उस की बेटी को उस के पिता की असलियत पता चले. इस आयु में यदि उसे पिता के घिनौने कारनामे का पता चलेगा तो वह जाने क्या प्रतिक्रिया करे. साहिल सप्ताह में 2 घंटे के लिए बेटी को घुमाने ले जाता, गिफ्ट दिलाता और सनोबर की पसंद का भी कुछ बेटी के साथ भेजता पर सनोबर आंख उठा कर भी न देखती.

तभी सनोबर की पदोन्नति हुई साथ ही मुख्यालय में तबादला भी. सनोबर को न चाह कर भी दिल्ली जाना पड़ा. बेटी को नानी के पास छोड़ना पड़ा. स्कूल का सैशन समाप्त होने में अभी 2 महीने थे. बड़ी बेगम ने आश्वासन दिया, ‘‘मैं संभाल लूंगी तुम जाओ मगर हर वीकैंड पर आ जाना.’’

मुख्यालय में उस के कुछ पूर्व साथी भी थे, सब ने स्वागत किया. एक प्रोजैक्ट में उस को समीर के साथ रखा गया. समीर भी सनोबर का पुराना साथी था और उस पर फिदा भी था.

समीर और सनोबर साथसाथ काम करते हुए काफी समय एकदूसरे के साथ बिताते. सनोबर ने साहिल और अपने बारे में समीर को नहीं बताया. जिस प्रोजैकट पर दोनों काम कर रहे थे उस में क्लाइंट की लोकेशन पर भी जाना होता था. दोनों साथसाथ जाते, होटल में रहते और काम पूरा कर के आते. घंटों अकेले एकसाथ काम करते. आज भी दोनों सुबह की फ्लाइट से गए थे. दिन भर काम कर के रात को होटल पहुंचे. समीर बोला, ‘‘फ्रैश हो लो फिर खाना खाने नीचे डाइनिंगरूम में चलते हैं.’’

सनोबर बोली, ‘‘तुम जाओ. मैं अपने रूम में ही कुछ मंगवा लूंगी.’’

समीर बोला, ‘‘ठीक है मेरा भी कुछ और्डर कर देना, साथ ही खा लेंगे.’’

सनोबर को समीर चाहता भी था, उस का आदर भी करता था. सनोबर के हैड औफिस आने के बाद समीर ने कभी अपने पुराने प्यार को प्रकट नहीं किया. वह अपनी पत्नी और बच्चों में खुश था.

समीर सनोबर के कमरे में आ गया. खाना आने की प्रतीक्षा में दोनों काम से जुड़ी बातें ही करते रहे. समीर की पत्नी का फोन भी आया. समीर की और उस की पत्नी की बातों से लग रहा था दोनों सुखी व संतुष्ट हैं.

समीर ने साहिल के बारे में पूछा तो सनोबर बात टाल गई. फिर खाना आया, दोनों खाना खातेखाते पुराने दिनों की बातें करने लगे.

समीर ने सनोबर से पूछा, ‘‘अच्छा एक बात बताओ यदि तुम साहिल से शादी न करतीं तो क्या मुझ से शादी करतीं?’’

सनोबर झिझकी फिर बोली, ‘‘शायद हां.’’

समीर ने मजाकिया अंदाज में कहा, ‘‘अरे पहले बताती तो मैं उस को गोली मार देता,’’ बात आईगई हो गई. दोनों ने खाना खाया फिर समीर अपने कमरे में चला गया.

सनोबर सोचने लगी समीर अच्छा दोस्त हैं. फिर जाने क्यों साहिल याद आ गया. वह काफी थकी थी. कुछ ही देर में सो गई. अगले दिन भी दोनों बहुत व्यस्त रहे.

‘‘आज भी खाना कमरे में मंगवाते हैं ठीक है?’’ समीर ने पूछा तो सनोबर बोली, ‘‘हां, ठीक है.’’

फिर समीर फ्रैश हो कर सनोबर के कमरे में आ गया. खाना और्डर कर के दोनों बातें करने लगे. सनोबर को खाते समय खाना सरक गया वह खांसने लगी. समीर ने उसे जल्दी से पानी निकाल कर दिया. पानी पी कर ठीक हुई. खाने के बाद समीर ने चाय बना कर सनोबर की दी तो दोनों का हाथ एकदूसरे से टकराया. दोनों चुपचाप धीरेधीरे चाय पीने लगे.

एक अजीब सा सन्नाटा छा गया. दोनों पासपास बैठे थे. एक अजीब सी चाह सनोबर ने अपने मन में महसूस की जैसे वह समीर के सीने से लग के रोना चाहती हो. फिर उस ने देखा समीर की निगाहें भी उस के ऊपर टिकी हैं. शायद वह भी सनोबर को अपनी बांहों में जकड़ना चाहता है. तभी उसे लगा कहीं यही वह एकांत कमजोर पल तो नहीं है जिस के बारे में अम्मी कह रही थी. वह संभल गई और उठ कर इधरउधर कुछ रखनेउठाने लगी. समीर से बोली, ‘‘अच्छा, कल मिलते हैं.’’

समीर भी उठते हुए बोला, ‘‘हां देर हो गई, गुड नाईट.’’

अगले दिन दोनों वापस आ गए. सनोबर अपनी अम्मी के पास चली गई. अम्मी उसे बताने लगीं कि उस की बेटी खाने में नखरा करती है. साहिल बेटी का बहुत ध्यान रखता है. अपने साथ ले जाता है, बराबर फोन करता है. अम्मी साहिल की प्रशंसा किए जा रही थीं.

सनोबर ने साहिल को फोन किया, ‘‘मैं तुम से मिलना चाहती हूं अभी.’’ वह साहिल से मिलने चल पड़ी. साहिल पलकें बिछाए उस की राह ताक रहा था. घर लगता था साहिल ने ही साफ किया था. बैडरूम पर नजर गई तो बदलाबदला लग रहा था. साहिल बहुत प्यार से बोला, ‘‘अब तो वापस आ जाओ, मुझे माफ कर दो.’’

सनोबर एकांत कमजोर पल क्या होता है यह जान चुकी थी. उस ने साहिल को माफ कर दिया. साहिल ने सनोबर का हाथ पकड़ा और दोनों एकदूसरे के बहुत पास आ गए.

भारत में दलितों के प्रति भेदभाव

अमेरिका के एक शहर सीएटल में एक भारतीय मूल की नगर पार्षद की मेहनत से जाति के नाम पर भेदभाव को धर्म, रंग, रेस, सैक्स, शिक्षा, पैसे के साथ जोड़ दिया गया है. हालांकि अमेरिका में भारतीय मूल के लोग ही कम हैं और सिएटल में तो और भी कम पर इस से भी भारतीय मूल के ऊंची जातियों के भारतीय बहुत खफा हैं.

भारतीय मूल के ऊंची जातियों वाले बड़ी कंपनियों में अक्सर दिखते हैं. तमिल ब्राह्मïणों की एक बड़ी लौवी वहां टैक कंपनियों में है जहां रटतुपीरों की बहुत जरूरत होती है और ब्राह्मïणों के मंत्रों की याद रखने की सदियों की आदत है. इन्होंने इस सिएटल के कानून को भारत और भारतीयता के खिलाफ होने की जंग छेड़ी हुई है.

भारत सरकार दलितों के प्रति भेदभाव को हमेशा से छिपाती रही है पर असल में हमारी समस्या वही नहीं है, हमारी एक बड़ी समस्या सवर्ण औरतों के प्रति देश और विदेश में हो रहे भेदभाव है. सती प्रथा क्या थी. सती महिला क्या है. दहेज प्रथा क्या है. भोगलिक होने का दोष क्या है. 16 शुक्रवारों के व्रत अच्छे पति को पाने के लिए क्या हैं. करवाचौथ क्या है. विधवाओं की मांगलिक कामों में अलग रखना क्या है. यह सवर्ण औरतों के साथ होने वाला भेदभाव है जो आज भी औरतें सह रही हैं. सासससुर की सेवा, पति का आदरसम्मान करना, कामकाजी हैं तो सारा वेतन पति के पास में रख देना, केवल पत्नी ही रसोई में जाए, यह सोचना, ये सब स्वर्ण औरतों के प्रति भेदभाव हैं.

जब औरतों के नाम पर जाति व्यवस्था आज खुलेआम पनप रही है तो देशभर में फैली हुई जाति व्यवस्था का एक्सपोर्ट नहीं हुआ होगा. यह कैसा तर्क है. हर भारतीय जब एयरक्राफ्ट में बैठना ही उस के सिर पर एक अदृश्य गठरी होती है जिस में अंधविश्वास, रीतिरिवाज, पूजापाठ, दानपुण्य के साथ जातिगत अहम अहंकार या जातिगत दयनीयता साथ होती है. अमेरिका में भारतीय मजदूर कम गए हैं पर जो गए हैं वे ऊंची जातियों के शिक्षिकों के साथ उठतेबैठते नहीं हैं. उन के घर मोहल्ले अलगथलक हैं.

अमेरिका में रह कर कुछ बदलाव आया है पर यह तो भारत के शहरों में भी हुआ है पर जोरजबरदस्ती, सरकारी फ्लैटों में हर जाति के लोगों को अगलबगल रहना पड़ता है पर जल्दी ही औरतों का लेनदेन जाति के अनुसार हो जाता है. यही आदत औरत होने की जाति व्यवस्था में बदल जाती है. लगभग सभी ग्रंथों ने औरतों को निम्य स्तर दिया है तो भारतीय धर्म ग्रंथ क्यों पीछे रहते. औरतों की इस देश में जब बात होती है तो वह दलितों की औरतों की क्या, ओबीसी की औरतों की कम, स्वर्ण औरतों की ज्यादा होती है कि आज भी वे अत्याचार व अत्याचार घरों की 4 दीवारो में सह रही हैं. अफसोस यह है कि देश की पढ़ीलिखी, सक्षम, एक्टीविस्ट औरतें भी इस जातिगत व्यवस्था पर चुप हैं. पितृ….समाज का अर्थ यही है कि औरत जाति को दबा कर रखा जाए. तेजाब फैकने की घटनाएं हो या भ्रूण हत्या की या दहेज हत्या की, यह ङ्क्षहदू स्वर्ण औरतों के साथ ज्यादा होता है जहां तकनीक भी मालूम है और जरूरत भी.

किट्टी पाॢटयां और लंबे घंटों या दिनों चलने वाले धाॢमक अनुष्ठïान एक तरह से सवर्ण ङ्क्षहदू औरतों को उलझाए रखने के लिए गढ़े गए हैं ताकि वे इन में बिजी रहें. घरों में ओबीसी जाति की मेड्र्स होने से जो औरतें खाली हो गई उन्हें काम पर जाने की छूट कम दी गई, उधरउधर फंसा दिया गया. बच्चों को, घर को, बूढ़े होते मांबाप को कौन संभालेगा कह कर सवर्ण औरतों पर जाति व्यवस्था को सीखा पाठ थोपा गया है. पहले वहीं सती होती थीं भी या विधवाओं के शहरों वृंदावन या काशी में झोंक दी जाती थीं. आज यह मानसिकता दूसरे रूप में पनप रही है. यह कम दिखे पर दिलों पर उतनी ही गहरी चोट करती है जितनी अमेरिका के दलितों के दिल पर जिन्होंने यह कानून बनवाया है.

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