मैंने सुना है कि पेन किलर्स किडनियों को नुकसान पहुंचाती है, क्या यह सही है?

सवाल

मैं सेल्स गर्ल हूं. ड्यूटी के कारण मुझे रोजाना कई घंटों तक खड़े रहना होता है. पैरों में दर्द के कारण अकसर मैं पेन किलर्स ले लेती हूं. मैं ने सुना है कि पेन किलर्स किडनियों को नुकसान पहुंचाती है. क्या यह सही है?

जवाब 

यह सही है कि बिना सोचे समझे पेन किलर्स का इस्तेमाल किडनियों से संबंधित समस्याओं का कारण बन सकता है. अमेरिका के नैशनल सैंटर फौर बायोटैक्नोलौजी इनफौर्मेशन के अनुसार लगातार पेन किलर्स की हाई डोज लेना पूरे विश्व में एक्यूट किडनी फेल्योर की सब से प्रमुख कारण है. ब्रूफेन नामक पेन किलर को 10-15 दिन भी ले लें तो किडनी खराब हो सकती है. इसलिए दर्द के उपचार के लिए इस्तेमाल होने वाले ऐनालजेसिक्सो (पेनकिलर) का सेवन बिना डाक्टर की सलाह के न करें. पैरों का दर्द दूर करने के लिए पेन किलर्स के बजाय दूसरे नुसखे आजमाएं.

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मेरी माताजी की उम्र 62 वर्ष है. उन की किडनियां फेल हो गई हैं. हम डायलिसिस से परेशान आ चुके हैं. क्या इस उम्र में उन का किडनी ट्रांसप्लांट संभव है?

अधिकतर लोग किडनी ट्रांसप्लांट करा सकते हैं. इस से कोई अंतर नहीं पड़ता कि मरीज की उम्र क्या है. यह प्रक्रिया उन सब के लिए उपयुक्त है जिन्हें ऐनेस्थीसिया दिया जा सकता है और कोई ऐसी बीमारी नहीं हो जो औपरेशन के पश्चात बढ़ जाए जैसे कैंसर आदि. हर वह व्यक्ति किडनी ट्रांसप्लांट करा सकता है जिस के शरीर में सर्जरी के प्रभावों को सहने की क्षमता हो. किडनी ट्रांसप्लांट की सफलता की दर दूसरे ट्रांसप्लांट से तुलनात्मक रूप से अच्छी होती है. जिन्हें गंभीर हृदयरोगकैंसर या एड्स है उन के लिए प्रत्यारोपण सुरक्षित और प्रभावकारी नहीं है.

क्यों जरूरी है मैडिक्लेम पौलिसी

आजकल विभिन्न बीमारियों के मामले बढ़ते जा रहे हैं. ऐसीऐसी बीमारियां जिन का पहले नाम भी नहीं सुना था हो रही हैं. कोरोना महामारी ने लोगों के शरीर में कई दूसरी व्याधियों को बढ़ा दिया है. ब्लैक फंगस, व्हाइट फंगस, ब्लड क्लौटिंग जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं जिन के इलाज में लाखों रुपयों का खर्च है. बढ़ती महंगाई के कारण आम आदमी के लिए अस्पताल का खर्च उठाना लगभग नामुमकिन सा हो गया है.

जैसेजैसे हैल्थ सैक्टर में टैक्नोलौजी बढ़ रही है वैसेवैसे बीमारियों पर होने वाले खर्चे भी बढ़ रहे हैं. पहले डाक्टर चैक कर के, नाड़ी देख कर या छोटामोटा टैस्ट करवा कर रोगी का इलाज कर देते थे, मगर अब बुखार भी आ जाए तो तमाम तरह के ब्लडयूरिन टैस्ट लिख देते हैं. गंभीर बीमारियों में तो टैस्ट, ऐक्सरे, एमआरआई, थेरैपी जैसी महंगी चीजों से बीमार और तीमारदार को जू?ाना पड़ता है.

बड़ी बीमारी इंसान की सारी जमापूंजी चट कर जाती है. ऐसे में परिवार का मैडिक्लेम होना बहुत जरूरी है. मैडिक्लेम पौलिसी मुश्किल समय में तनावमुक्त और आर्थिक रूप से सुरक्षित रहने में मदद करती है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिस में बीमाधारक का इलाज उन अस्पतालों में किया जाता है जो बीमा कंपनी के नैटवर्क के अंतर्गत आते हैं. इस के तहत, बीमा कंपनी क्लेम का एक हिस्सा या पूरी राशि ही अस्पताल को दे देती है और मरीज व उस के परिवार पर अचानक कोई आर्थिक बो?ा नहीं पड़ता है.

सुरक्षित विकल्प

अप्रत्याशित चिकित्सा की जरूरत सामने खड़ी हो जाए तो उस पर होने वाले खर्चों की बड़ी रकम का मुकाबला करने के लिए मैडिक्लेम आज सब से सुरक्षित विकल्प है. जिस व्यक्ति ने अपना मैडिक्लेम करवा रखा है उसे किसी बीमारी या दुर्घटना के कारण अस्पताल में भरती होने पर अपनी जेब से पैसा देने की आवश्यकता नहीं रह जाती है. वह सारा खर्च मैडिक्लेम देने वाली कंपनी उठाती है.

आप की मैडिक्लेम पौलिसी दुर्घटना, गंभीर बीमारी या सर्जरी आदि की स्थिति में हौस्पिटल का खर्च तो उठाती ही है बल्कि हौस्पिटल से डिस्चार्ज के बाद चलने वाली दवाओं और समयसमय पर होने वाले टैस्ट का खर्चा भी उठती हैं. मैडिक्लेम पौलिसी में सभी स्थितियों को कवर किया जाता है. आज मैडिकल इमरजैंसी के मामले में मैडिक्लेम सर्विस एक वरदान है.

मैडिक्लेम के फायदे

मैडिक्लेम पौलिसी एक स्वास्थ्य बीमा योजना है जिस के अनेक फायदे हैं:

– यह स्मूद कैशलैस हौस्पिटलाइजेशन प्रदान करता है.

– यह आप की चिकित्सा आपात स्थिति के दौरान बड़ी वित्तीय सहायता है.

– यह आप को वित्तीय बो?ा में डूबने से बचाता है.

– विभिन्न कंपनियों के पास मस्डिक्लेम पौलिसी औनलाइन खरीदने की सुविधा है जिस से समय और ऊर्जा की बचत होती है.

– यह आयकर अधिनियम 1961 के तहत टैक्स में छूट भी प्रदान करता है.

– सीनियर सिटीजन मैडिक्लेम पौलिसी के तहत सीनियर सिटीजन को अतिरिक्त लाभ दिया जाता है. अस्पताल में भरती होने से पहले और बाद के मैडिकल खर्चों को कुछ शर्तों के साथ मैडिक्लेम पौलिसियों द्वारा कवर किया जाता है.

– नियमित वार्ड या इंटैंसिव केयर यूनिट आईसीयू का लाभ उठाने के लिए जो भी खर्च होता है, मैडिक्लेम पौलिसियों द्वारा कवर किया जाता है.

विभिन्न मैडिक्लेम पौलिसी चिकित्सा खर्चों की स्थिति में भारत में विभिन्न हैल्थ इंश्योरैंस कंपनियां अनेक प्रकार की पौलिसियां देती हैं. इस में इंडिविजुअल मैडिक्लेम पौलिसी, फैमिली फ्लोटर मैडिक्लेम पौलिसी, सीनियर सिटीजन मैडिक्लेम पौलिसी, क्रिटिकल इलनैस मैडिक्लेम पौलिसी, ओवरसीज मैडिक्लेम पौलिसी, लो कास्ट मैडिक्लेम पौलिसी और गु्रप मैडिक्लेम पौलिसी बड़ी तादात में लोग लेते हैं.

फैमिली हैल्थ प्लान

सब से अच्छा है फैमिली हैल्थ प्लान लेना. उदाहरण के लिए अगर एक परिवार में 5 सदस्य हैं और हर व्यक्ति के लिए अलगअलग 1 लाख रुपए का बीमा है तो ऐसे में परिवार का कोई भी एक सदस्य बीमा कंपनी से अपने लिए 1 लाख रुपए से ज्यादा की मदद प्राप्त नहीं कर सकता. पांचों व्यक्तियों के लिए यह अलगअलग पौलिसी की तरह काम करेगी. लेकिन अगर यही 5 लाख का प्लान फैमिली हैल्थ प्लान के रूप में लिया जाए तो फिर कोई भी सदस्य 5 लाख रुपए तक की मदद पा सकता है.

इसी तरह गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर, किडनी फेल्योर, हार्ट अटैक, सर्जरी, लकवा, स्ट्रोक, और्गन ट्रांसप्लांट, बाईपास सर्जरी या इस तरह की अन्य बीमारियों के लिए क्रिटिकल इलनैस मैडिक्लेम पौलिसी बहुत अच्छा कवर देती है.

सीनियर सिटीजन मैडिक्लेम पौलिसी

सीनियर सिटीजन मैडिक्लेम पौलिसी 60 साल की उम्र पार कर चुके बुजुर्ग लोगों के अस्पताल में भरती होने के खर्चों को कवर करने के लिए डिजाइन की गई है. सीनियर सिटीजन हैल्थ इंश्योरैंस पौलिसी सीनियर सिटीजन की हैल्थ जरूरतों को कवर करते हुए कई बातों का खयाल रखती है.

वहीं ग्रुप मैडिक्लेम भारत के अधिकांश उद्योगों के कर्मचारियों को दी जाती है. बड़े क्लब या संघों के सदस्यों का भी ग्रुप मैडिक्लेम किया जाता है. यह कौरपोरेट जगत में ली जाने वाली पौलिसी है. इस में कर्मचारियों के वेतन से प्रीमियम भुगतान के रूप में एक छोटा सा प्रतिशत काटा जाता है.

मैडिक्लेम जरूर करवाएं

मैडिक्लेम आप को मुश्किल समय में तनावमुक्त और आर्थिक रूप से सुरक्षित रहने में मदद करता है. अब मामूली बीमारियों के इलाज में भी लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं. हैल्थ इंश्योरैंस आप की जेब पर पढ़ने वाले भार को कम करने में मदद करता है. लगातार बढ़ते मैडिकल खर्च के इस दौर में मैडिक्लेम पौलिसी जल्द से जल्द ले लेने में ही सम?ादारी है.

केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि मैडिकल इमरजैंसी के मामले में 80 फीसदी केस पैसे की दिक्कत की वजह से बिगड़ जाते हैं. किसी दुर्घटना की स्थिति में न सिर्फ इलाज पर आप को पैसे खर्च करने पड़ते हैं, बल्कि आप की कमाने की क्षमता भी घट जाती है. इस हिसाब से दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति पर दोहरी मार पड़ती है.

यदि आप के पास मैडिक्लेम पौलिसी है तो ऐसे समय में आप की हिम्मत नहीं टूटेगी और आप का इलाज भी बेहतर तरीके से होगा. हैल्थ इंश्योरैंस के लिए नियमित अंतराल पर आप थोड़ाथोड़ा प्रीमियम चुका कर खुद के लिए मैडिकल खर्च की व्यवस्था कर सकते हैं. यह आज के दौर में बहुत जरूरी है.

 

स्तन कैंसर: निदान संभव है

भारत में 40 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे अधिक प्रचलित कैंसर है. ऐसे मामले विश्व स्तर पर हर साल लगभग 2% की दर से बढ़ रहे हैं. यह महिलाओं में कैंसर संबंधित मौतों का सबसे आम कारण भी है.

आज हमारे पास स्तन कैंसर से होने वाली मौतों को कम करने का मौका है. स्तन कैंसर को जल्दी पकड़ा जा सकता है ओर हारमोन थेरेपी, इम्यूनो थेरेपी और टारगेटेड थेरेपी जैसी नई विकसित के जरीए पहले की तुलना में अधिक विश्वास के साथ इसका इलाज किया जा सकता है.

सेल्फ एग्जामिनेशन

यदि प्रारंभिक चरण में कैंसर का पता लग जाता है तो उपचार अधिक प्रभावी ढंग से हो सकता है. इस अवस्था में कैंसर छोटा और स्तन तक सीमित होता है.

शुरुआत में एक छोटी गांठ की उपस्थिति या स्तन के आकार में बदलाव के अलावा कोई कथित लक्षण नहीं होता है, जिसे रोगियों द्वारा आसानी से अनदेखा किया जा सकता है. यही वह समय है जब स्क्रीनिंग जरूरी है. स्क्रीनिंग टेस्ट से स्तन कैंसर के बारे में जल्दी पता लगाने में मदद मिलती है. ऐसे में जब कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते तब भी स्क्रीनिंग के द्वारा हमें इस बीमारी का पता चल सकता है. स्क्रीनिंग के लिए नियमित रूप से डाक्टर के पास जाना चाहिए ताकि रोगी महिला के स्तन की पूरी तरह से जांच कर सकें. डाक्टर अकसर इस के जरीए ब्रेस्ट में छोटीछोटी गांठ या बदलाव का पता लगा लेते हैं. वे महिलाओं को सेल्फ एग्जामिनेशन करना भी सिखा सकते हैं ताकि महिलाएं खुद भी इन परिवर्तनों को पकड़ सकें.

हालांकि मैमोग्राफी स्तन कैंसर की जांच का मुख्य आधार है. यह एक एक्स-रे एग्जामिनेशन है और गांठ दिखने से पहले ही स्तनों में संदिग्ध कैंसर से जुड़े परिवर्तनों का पता लगाने में मदद करता है.

पहला मैमोग्राम कराने और इसके बाद भी कितनी बार मैमोग्राम कराना है. यह इस पर निर्भर करता है कि उस महिला को ब्रेस्ट कैंसर होने का रिसक कितना है. जिन महिलाओं के रक्त संबंधी स्तन कैंसर या ओवेरियन कैंसर से पीडि़त हैं और जिनको पहले भी स्तनों से जुड़ी कुछ असामान्यताओं जैसे स्तनों में गांठ, दर्द या डिस्चार्ज आदि का सामना करना पड़ा है उन्हें जोखिम ज्यादा रहता है. ऐसी महिलाओं को 30 साल की उम्र के बाद हर साल मैमोग्राफ कराना चाहिए. दूसरों को 40 साल की उम्र के बाद हर साल या हर 2 साल में जांच करवानी चाहिए.

टेस्टिंग

अगर मैमोग्राम में कैंसर का कोई संदिग लक्षण दिखता है तो पक्के तौर पर कैंसर है या नहीं इसका पता लगाने के लिए बायोप्सी की जाती है. इस प्रक्रिया में संदिग्ध क्षेत्र से स्तन ऊतक के छोटे हिस्से को निकाल लिया जाता है और कैंसर सेल्स का पता लगाने के लिए प्रयोगशाला में विश्लेषण किया जाता है.

उच्च जोखिम वाल महिलाओं के लिए, बीआरसीए म्युटेशन जैसी जेनेटिक असामान्यताओं का पता लगाने के लिए जेनेटिक टेस्टिंग की भी सिफारिश की जाती है. ‘बीआरसीए’ दरअसल ब्रेस्ट कैंसर जीन का संक्षिप्त नाम है. क्चक्त्रष्ट्न१ और क्चक्त्रष्ट्न२ दो अलगअलग जीन हैं तो किसी व्यक्ति के स्तन कैंसर के विकास की संभावनाओं को प्रभावित करते हैं. जिन महिलाओं में ये असामान्यताएं होती हैं उन सभी को स्तन कैंसर हो ऐसा जरूरी नहीं, मगर उनमें से 50% को यह जिंदगी में कभी न कभी जरूर होता है.

वीआरसीए जीन असामान्यता वाली महिलाओं को अतिरिक्त सतर्क रहना चाहिए और नियमित रूप से वार्षिक मैमोग्राम कराने से चूकता नहीं चाहिए. जो महिलाएं नियमित रूप से जांच नहीं कराती हैं उनके लिए यह संभावना बढ़ जाती है कि उनके स्तन कैंसर का पता लेटर स्टेज या एडवांस स्टेज पर लगेगा. इस स्तर पर कैंसर संभावित रूप से स्तन या शरीर के कुछ दूसरे हिस्सों में फैल सकता है. ऐसे में इलाज एक चुनौती बन जाती है, लेकिन जब डाइग्रोसिस शुरुआती स्टेज में हो जाती है तब इलाज के कई तरह के विकल्प मौजूद होते हैं जो कैंसर का सफलतापूर्वक कर पाते हैं और इसके फिर से होने की संभावना पर भी रोक लगाते हैं.

आपके लिए कौन सा इलाज अच्छा

होगा यह प्रत्येक कैंसर की प्रोटीन असामान्यताओं पर निर्भर करता है, जिसका पता कुछ खास जांच द्वारा लगाया जाता है. एडवांस्ड थैरेपीज जिसे इम्मुनोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और हारमोनल थेरेपी इन विशेष अब्नोर्मिलिटीज पर काम करती है और बेहतर परिणाम देती हैं.

कुछ रोगियों के लिए ये उपचार पारंपरिक कीमोथेरेपी की जगह भी ले सकते हैं. कुछ उपचार जो कैंसर दोबारा होने से रोकते हैं उन्हें गोलियों के रूप में मौखिक रूप से भी लिया जा सकता है. यह अर्ली स्टेज के स्तन कैंसर की मरीज को भी एक अच्छी जिंदगी जीने को संभव बनाते हैं.

प्रारंभिक अवस्था में स्तन कैंसर डायग्नोज होने वाली महिलाओं में से 90% से अधिक इलाज के बाद लंबे समय तक रोग मुक्त जिंदगी जी सकती हैं. लेकिन भारत में स्तन कैंसर से पीडि़त महिलाओं की 5 साल तक जीवित रहने की दर महज 42-60% है. ऐसा इसलिए है क्योंकि लगभग आधे रोगियों का पता केवल अंतिम चरण में चलता है.

हम इसे बदल सकते हैं. यदि महिलाएं अपने थर्टीज में स्तन कैंसर की जांच की योजना बनाती हैं और लक्षणों के प्रकट होने की प्रतीक्षा नहीं करती हैं.

स्तन कैंसर का डायग्नोज होना अब मौत की सजा की तरह नहीं होना चहिए क्योंकि हम कैंसर का जल्द पता लगा सकते हैं और हमारे पास इसके सफल उपचार के लिए इफेक्टिव थेरेपीज हैं.

-डा. सुरेश एच. आडवाणी द्वारा एमडी, (एफआईसीपी, एफएनएएमएस, कंसल्टेंट आन्कोलौजिस्ट)

 

सोच पर असर डालता है आपका पहनावा

मानसी क्राइम रिपोर्टर थी. वह संवेदनशील और जु?ारू रिपोर्टर थी. कानपुर में ज्यादातर सलवारकुरते में ही रिपोर्टिंग करती थी. उसे इस परिधान में कभी कोई दिक्कत नहीं हुई. कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि इन कपड़ों में उस की परफौरमैंस पर कोई असर पड़ा. इस पहनावे में उसे अपनी ऊर्जा में कोई कमी महसूस नहीं हुई बल्कि इस में वह खुद को बहुत कंफर्टेबल महसूस करती थी. शहर के लोग उस की काबिलियत से वाकिफ थे. किसी भी पुलिस अधिकारी ने उसे इंटरव्यू देने में कभी आनाकानी नहीं की. वह भीतर की बातें भी बड़ी आसानी से निकाल लाती थी.

मगर मानसी जब 2008 में उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से ट्रांसफर हो कर दिल्ली आई तो उन दिनों दिल्ली में कई आतंकी घटनाएं और बम धमाके हुए थे. मानसी ने अपनी पत्रिका के लिए इन घटनाओं को पूरी संवेदनशीलता के साथ कवर किया. पीडि़तों का अस्पताल जाजा कर हाल पूछा और लिखा मगर संबंधित क्षेत्र के डीसीपी और क्राइम सैल के हैड की बाइट लेने के लिए कई चक्कर लगाने पर भी उसे सफलता नहीं मिली. उस ने कमिश्नर औफ पुलिस का इंटरव्यू लेने के लिए भी कोशिश की मगर 3 दिन तक वह उन के कार्यालय के बाहर बैठ कर वापस आ गई. मुलाकात नहीं हो सकी.

ऐसे खोलें तरक्की के रास्ते

दरअसल, इन अधिकारियों के औफिस में हर वक्त मीडिया कर्मियों का जमावड़ा लगा रहता था. जींसटौप में टिपटौप दिखती, बौयकट बालों को ?ाटकती, फुल मेकअप में रिपोर्टर कम और मौडल या ऐंकर ज्यादा लगने वाली रिपोर्टर्स को ही हर जगह अहमियत मिल रही थी.

अधिकारी का चपरासी ऐसी बालाओं को फटाफट साहब से मिलवा रहा था जबकि मानसी द्वारा विजिटिंग कार्ड भिजवाए जाने के बाद भी उसे अधिकारी से मिलने में सफलता नहीं मिली.

मानसी ?ां?ाला कर अपने औफिस लौट आई मगर अधिकारी की बाइट या इंटरव्यू के बिना उस की रिपोर्ट को अधूरा कह कर एडिटर ने उसे उस की टेबल पर वापस पटक दिया. मानसी रोंआसी हो गई. तव साथी रिपोर्टर निखिल ने उसे सम?ाया और बोला कि दिल्ली में रिपोर्टिंग करनी है तो पहले अपना हुलिया बदलो.

3 दिन में अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगालगा कर मानसी को भी सम?ा में आ गया था कि भले आप अच्छे रिपोर्टर न हों, भले आप में खबरों को लिखने की सम?ा न हो और भले आप में संवेदनशीलता की कमी हो पर यदि आप जींसटौप या पश्चिमी परिधान में रहते हैं, बातबात में स्टाइल मरते हैं और इंग्लिश में थोड़ी गिटपिट कर लेते हैं तो आप को हर जगह अहमियत मिलने लगती है. अधिकारी खड़े हो कर आप से हाथ मिलाते हैं. आप को पूरा वक्त देते हैं. आप के सामने चायबिस्कुट पेश करते हैं और आप के बेवकूफी भरे सवालों के जवाब भी गंभीरता से देते हैं. पर यदि आप ओल्ड फैशन के परिधान में हैं, सिंपल दिखते हैं तो आप के गंभीर सवालों पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता है.

सहकर्मी की सलाह पर मानसी ने अपना परिधान बदला तो उस के तरक्की के रास्ते भी ऐसे खुले कि आज वह एक बड़े न्यूज चैनल में बड़ी रिपोर्टर बन चुकी है.

आश्चर्यजनक प्रभाव

किसी की वेशभूषा का उस के व्यक्तित्व पर बड़ा प्रभाव पड़ता है. समीर एक इंटरनैशनल कंपनी में कार्यरत हैं. वे बताते हैं कि एक बार एक शादी में बिना तैयारी के जबरन जाना पड़ गया. मैं ने रिश्तेदारों को बहुत सम?ाया मगर उन्होंने घर भी नहीं जाने दिया. साधारण वेशभूषा में बरात में शामिल होना पड़ा. बरात आगरा से मेरठ जानी थी. मेरठ में मेरे एक दोस्त का घर था. रास्ते भर बरात में ऐसा लग रहा था जैसे हर व्यक्ति मु?ो ही देख रहा था.

मेरी वेशभूषा पर दूसरे से खुसुरफुसुर कर रहा था. मेरे अंदर इतनी हीनभावना घर कर गई कि मेरठ पहुंचते ही मैं बरात छोड़ अपने दोस्त के घर चला गया. हीन भावना इतनी कि बारबार मन उसे भी अपने इस हाल की सफाई देने की कोशिश करता रहा, मगर मौका नहीं लगा. सुबह जल्दी उठ कर बात में भी नहीं गया और ट्रेन पकड़ कर वापस आगरा आ गया. हीनभावना ने जब तक पीछा नहीं छोड़ा जब तक मैं घर नहीं पहुंच गया. उस दिन मैं ने जाना कि वेशभूषा सामने वाले से अधिक अपनेआप में नकारात्मकता या सकारात्मकता पैदा करती है और सहज रहने न रहने में परेशानी होती है.

समीर कहते हैं कि बहुत कुछ सामने वाले की सोच पर निर्भर होता है कि वह क्या अनुभव करता है. वह यदि आप को जानता है तो आप की वेशभूषा से पहले आप के व्यक्तित्व पर ध्यान देगा और नहीं जानता तो पहले आप की वेशभूषा से आप का मूल्यांकन करेगा बाद में आप के विचारों से.

इंसानी सोच और पहनावा

चेहरे के बाद इंसान का ध्यान पहनावे पर ही जाता है. पहनावा इंसानी सोच पर बहुत प्रभाव डालता है. व्यक्ति अपना परिचय अपने कार्य व्यवहार से तो बाद में दे पाता है, लेकिन लोग उस के परिधान के आधार पर ही बहुत से पूर्वाग्रह निर्मित कर लेते हैं. हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जहां व्यक्ति की हैसियत और इंटैलिजैंस उस के परिधान से आंकी जाती है.

बुरके में सिर से पैर तक ढकी महिला को देख कर उस के रूढि़वादी, अशिक्षित और पिछड़े होने का ही अनुमान लगता है. भले वह कोई उच्चशिक्षित डाक्टर या वकील हो. इसी तरह धोती कुरता पहने व्यक्ति को देख कर कोई यह नहीं कहेगा कि वह हाई सोसाइटी का पढ़ालिखा अमीर आदमी होगा. भले ही वह हो.

बढ़ता है आत्मविश्वास

परिधान देखने वाले और पहनने वाले दोनों के व्यवहार और सोच को बदलने की क्षमता रखता है. मैट्रो में टाइट जींसटौप पहने लड़कियां सब के आकर्षण का केंद्र होती हैं. इन कपड़ों में वे स्मार्ट और ऊर्जावान दिखती हैं. यह सच भी है कि जींसटौप के साथ चाल में स्मार्टनैस और तेजी खुदबखुद आ जाती है. कौन्फिडैंस लैवल बढ़ जाता है.

इंसान खुद को आजाद महसूस करता है खासतौर पर लड़कियां. वहीं सलवारकुरता या साड़ी पहनी लड़कियां दबीसकुचाई सी नजर आती हैं. उन की तरफ किसी का ध्यान नहीं होता. महानगरों में मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत 45 से 50 साल की महिला जींस पहन कर जिस ऊर्जा से काम करती दिखती है, उस के मुकाबले घर में रहने वाली इसी उम्र की महिला खुद को बूढ़ा मान कर धर्मकर्म के कार्यों में लग जाती है.

लक्ष्य बनाएं आसान

भारतीय परिवार में आमतौर पर सासससुर के साथ रहने वाली बहुएं साड़ी या दुपट्टे के साथ सलवारकमीज ही पहनती हैं. वे ज्यादातर शांत, शालीन और नाजुक सी दिखती हैं. लेकिन जो युगल अपने परिवार से अलग दूसरे शहर में रहते हैं वहां बहू यदि जींस, स्कर्ट जैसे पाश्चात्य कपड़े पहनती है तो पति को अपनी पत्नी में प्रेमिका की छवि दिखती है.

उन के बीच लंबे समय तक आकर्षण, शारीरिक संबंध और प्यार बना रहता है. वे ऊर्जावान रहते हैं और साथ घूमनेफिरने के लिए लालायित रहते हैं. उस के विपरीत साड़ी पहनने वाली औरतों की अकसर यह शिकायत होती है कि उन के पति उन पर ध्यान नहीं देते और न कहीं घुमाने ले जाते हैं. दरअसल, उन का परिधान पति के लिए उबाऊ हो जाता है.

सभ्य और कंफर्टेबल वेशभूषा पहनने से हमारा आत्मविश्वास ही बढ़ता है क्योंकि इस से हमारे काम व सोच पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. अच्छी सोच और आत्मविश्वास के कारण ही हम जिंदगी के हर लक्ष्य को प्राप्त करते हैं

इन 6 दवाईयों से बनाएं फेस पैक और पाएं बेदाग स्किन

हमारे सारे प्रयास बेदाग त्वचा पाने की दिशा में होते हैं. एक ऐसी त्वचा जिस पर कोई दाग, धब्बा, झुर्रियां, झाइयां व मुंहासे ना हों. ऐसी त्वचा पाना आसान नहीं है लेकिन कुछ विटामिन फेस मास्क यह करिश्मा दिखा सकते हैं.

एक साफ और निखरी त्वचा पाने के लिए आपको विटामिन व मिनरल की सबसे अधिक जरूरत होती है. विटामिन ई आपको दागों से छुटकारा दिलाता है जबकि विटामिन सी आपकी त्वचा को जवां बनाए रखता है.

इन फेस मास्क को बनाने के लिए आप किसी भी कैप्सूल का इस्तेमाल नहीं कर सकती. इसके लिए आपको आपकी त्वचा व त्वचा से जुड़ी समस्याओं की समझ होनी चाहिए.

जैसे एस्पिरिन की गोलियों में मौजूद सलिसीक्लिक एसिड मुंहासों से छुटकारा दिलाता है जबकि विटामिन ई के कैप्सूल में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट आपकी त्वचा को साफ व कोमल बनाते हैं.

लेकिन इन सब से भी अधिक जरूरी बात है कैप्सूल को इस्तेमाल करने की मात्रा. कौन सा कैप्सूल कितनी मात्रा में इस्तेमाल करना है या बनाए गए लेप को हफ्ते में कितनी बार लगाना चाहिए जैसे सवालों के जवाब भी पता होने चाहिए.

हमने नीचे कुछ फेस पैक को तैयार करने की विधि दी है. साइड-इफैक्ट्स से बचने के लिए पैक को बनाकर एक पैच टेस्क लें. इन पैकों को आजमाने पर परिणाम 15 से 30 दिनों के भीतर नजर आएंगे.

1. एस्पिरिन की गोलियां:

एस्पिरिन में मौजूद सलिसीक्लिक एसिड त्वचा से डेड स्किन को हटाता है तथा चेहरे को दागदार करने वाले धब्बों व मुंहासों से छुटकारा पाने में मदद करता है.

सामग्री: 3 एस्पिरिन की गोलियां, 1 कप पानी, 1 चम्मच जैविक शहद

विधि: एक चम्मच पानी में एस्पिरिन की गोलियां को घोलें. इसे एक लेप के रूप में तैयार करने के लिए आवश्यकता अनुसार पानी डालें. अब इसमें शहद डालकर घोलें. इस तैयार हुए लेप को अपने चेहरे व गर्दन पर फैलाएं. इस लेप को 20 मिनट तक रहने दें, बाद में अपने चेहरे को पानी से धो लें. इस पैक को हफ्ते में सिर्फ एक बार लगाएं.

ध्यान रहे: कभी भी 8 से ज्यादा गोलियां का इस्तेमाल ना करें.

2. विटामिन ई:

विटामिन ई के कैप्सूल एंटीऑक्सीडेंट से युक्त होते हैं तथा इनसे बनाया गया पैक त्वचा के भीतर जल्द समाता है. यह पैक आपकी त्वचा को नर्म, मुलायम व जवा बनाएगा.

सामग्री: 3 विटामिन ई के कैप्सूल, 5 बूंदें बादाम के तेल की

विधि: विटामिन ई के कैप्सूल को तोड़कर उसके अंदर मौजूद जेल को एक कटोरी में निकालें. अब इसमें बादाम का तेल मिलाएं. रात में सोने से पहले इस पैक से अपनी त्वचा की मालिश करें. सुबह अपने चेहरे को ठंडे पानी से धोएं.

3. विटामिन सी की गोली:

विटामिन सी में मौजूद एल-एस्कॉर्बिक एसिड त्वचा में कोलेजन स्तर को बढ़ाता है, जिससे आपकी त्वचा जवा व टाइट बनी रही है.

सामग्री: 1 विटामिन सी का कैप्सूल या गोली, 1 चम्मच गुलाब जल,  ½ बड़ा चम्मच ग्लिसरीन,  5 बूँदें रोजहिप तेल की

विधि: ऊपर दी गई सारी सामग्री को मिलाकर एक लेप तैयार करें. इस लेप को रात में सोने से पहले अपनी त्वचा पर एक मोइस्चराइज़र के रूप में लगाएं. विटामिन सी से बना यह पैक केवल मुंहासों से ही छुटकाना नहीं दिलाएगा बल्कि चेहरे पर नजर आने वाली झुर्रियों व फाइनल लाइन से भी आपका पीछा छुड़ा देगा.

4. प्रोबायोटिक कैप्सूल:

इन कैप्सूल में मौजूद गुड बैक्टीरिया, फ्री रैडिकल से आपकी त्वचा की रक्षा करता है, तथा चेहरे पर नजर आने वाले काले धब्बों को घटाकर त्वचा को कोमल बनाता है.

सामग्री 2 या 3 प्रोबायोटिक के कैप्सूल, 5 बूंदें लैवेंडर के तेल की, 5 बूँदें बादाम के तेल की

विधि: पहले दोनों तेलों को मिलालें फिर इसमें कैप्सूल को तोड़ कर डालें. सारी सामग्री को अच्छे से मिलालें. इस मिश्रण को अपने चेहरे व गर्दन पर लगाएं. जब मास्क आपके चेहरे पर सूख जाएं तब चेहरे को ठंडे पानी से धो लें. बेदाग चेहरा पाने के लिए इस उपाय को हफ्ते में दो बार आजमाएं.

5. सीवीड कैप्सूल:

सीवीड कैप्सूल में भरपूर मात्रा में विटामिन व मिनरल होते हैं. ये त्वचा से मृत कोशिकाओं को हटाते हैं तथा त्वचा को स्वस्थ बनाकर झुर्रियों से छुटकारा दिलाते हैं.

सामग्री: 3 सीवीड कैप्सूल, खूबानी के तेल की 10 बूंदें, 1 चम्मच जैविक शहद

विधि: कैप्सूल को तोड कर उसमें शहद व खूबानी के तेल को मिलाएं. इस विटामिन से युक्त पैक को अपने चेहरे व गर्दन पर लगाएं. इस पैक को अपने चेहरे पर 30 मिनट के लिए रहने दें और बाद में अपने चेहरे को ठंडे पानी से धो लें. इस घरेलू नुस्खे को सप्ताह में दो बार आजमाएं.

6. गाजर के तेल के कैप्सूल

हम सब जानते हैं कि गाजर में बीटा-कैरोटीन होता है, जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को ठीक करता है व रक्त परिसंचरण को बढ़ाता है. इससे आपका चेहरा चमक उठता है.

सामग्री: 2 गाजर के तेल के कैप्सूल, 2 बूंदें गुलमेहंदी का तेल 2 बूंदें बादाम का तेल

विधि: पहले अपने चेहरे को धोलें. फिर इन सारी चीजों को मिलाकर इनसे अपनी चेहरे की मालिश करना आरंभ करें. इसे रात भर रहने दें सुबह अपने चेहरे को ठंडे पानी से धो लें. यदि चिपचिपाहट महसूस हो तो मिश्रण को थोड़ा कम लगाएं.

भारतीय प्रधानमंत्री का विदेशी दौरा

भारतीय मूल के और भारतीय ससुर के दामाम होने के बावजूद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रिषी सुनक भी भारतीयों के इंग्लैंड में प्रवेश पर पाबंदियां लगाने लगे हैं. इंग्लैंड के कट्टरपंथी अब रेस रिलिज्य व कलर को लेकर उसी तरह बेचैन होने लगे हैं जैसे भारतीय प्रधानमंत्री, गृहमंत्री से ले कर आप की गली के नुक्कड़ के मंदिर के पुरोहित हैं. उन्हें लगता है कि ग्रेट ब्रिटेन में जल्दी ही गोरे मूल निवासी बन रह जाएंगे. उन्हें भी गोरों की कम जन्मदर और भूरों, कालों की जन्मदर के बारे में व्हाट्सएप ज्ञान उसी तरह बांटा जा रहा है जैसा भारत में बांटा जा रहा है.

भारतीय प्रधानमंत्री इस बार में बात करने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकते. अमेरिका की भारतीय रक्त वाली कमला हैरिस और गृह ब्रिटेन के पूरे भारतीय रक्त वाले रिषी सुनक को ले कर भारतीय जनता पार्टी ने न तो देश भर में घी के दिए जला कर न देश में ढोल में पीटे कि यह कारनामा पार्टी की उपलब्धि है क्योंकि इन दोनों विश्व नेताओं ने भारत के प्रधानमंत्री से कोई ज्यादा लाड नहीं जताया.

भारतीयों का वीसा ले कर ग्रेट ब्रिटेन में प्रवेश करने के लिए कतारों में खड़ा रहना तो चालू है ही, हजारों जोखिम भरी इंग्लिश चैनल छोटीछोटी बातों में यूरोपीय मेनलैंड से चल कर प्यार पा रहे हैं ताकि वहां जा कर कह सकें कि उन्हें अपने देश की सरकार से खतरा है. दुनिया भर में जो भारतीय गैरकानूनी ढंग से फैले हुए हैं उन में से बहुतों ने यही कहा है कि वे अपने मूल देश में भेदभाव, जुल्मों सरकारी तानाशाही के शिकार हैं और उन्हें राजनीतिक शरणार्थी के तौर पर शरण दी जाए. इस तरह वे कानून बहुत से यूरोपीय देश में हैं कि वे किसी भी शरण मांगने वाले को बिना सुनवाई के भगाएंगे नहीं. इस सुनवाई के दौरान भारतीय शरण मांगने वाले अपने घर हो रहे जुल्मों की झूठी अच्छी कहानियां अदालत को सुनाते हैं.

यह अफसोस है कि ङ्क्षहदू होते हुए भी रिषी सुनक ने अपने धर्म भाईयों की नहीं सुनी. उन्हें धर्म भाईयों और रक्त भाइयों की नहीं, अपने नए देश के नागरिकों की वोटों की ङ्क्षचता है. रिषी सुनक जैसे भारतीय मूल के लोग ग्रेट ब्रिटेन और अमेरिका में ही नहीं और बहुत से देशों में हैं जो अपने देश को एक बुरा सपना मान कर त्याग चुके हैं. वे भारतीय मूल के हो कर भी भारत सरकार की हां में हां नहीं मिलाते.

उस से अच्छे थे तो पिछले एक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनेल्ड ट्रंप थे जो दिल्ली, मुंबई में टं्रप टौवर बनवाने के लिए अमेरिका के हाउसटन में नरेंद्र मोदी की भारतीय मूल के लोगों की सभा में खड़े हुए थे और फिर भारत भी ऐन कोविड से पहले आए थे जब अहमदाबाद में वे नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में ‘एक बार फिर ट्रंप सरकार’ के नारे से गदगद हुए थे. रिषी सुनक और कमला हैरिस जो यहाकदा पूजापाठ करने भारत आते हैं को धर्म विद्रोही क्यों नहीं घोषित किया जाए.

रुबीना दिलैक की बहन ज्योतिका बनीं दुल्हन, देखें वेडिंग फोटोज

टीवी की पॉपुलर एक्ट्रेस रुबीना दिलैक (Rubina Dilaik) की बहन ज्योतिका दिलैक शादी के बंधन में बंध गई हैं. उन्होंने लॉन्ग टाइम बॉयफ्रेंड रजत शर्मा शिमला के होटल में शादी की. शादी में सिर्फ में परिवार के लोग, रिश्तेदार और कुछ करीबी दोस्त शामिल हुए. ज्योतिका ने शादी के बाद की पहली तस्वीर खुद शेयर कर फैंस को झलक दिखाई है.

ज्योतिका दिलैक की शादी की तस्वीरें हुईं वायरल

Rubina Dilaik’s Sister Jyotika Dilaik Rajas Sharma Wedding Photos: टीवी की मशहूर एक्ट्रेस रुबीना दिलैक की बहन ज्योतिका दिलैक शादी के बंधन में बंध चुकी हैं. उन्होंने लॉन्ग टाइम बॉयफ्रेंड रजत शर्मा संग शादी रचाई, जिसमें परिवार और खास दोस्त ही शामिल हुए. ज्योतिका दिलैक और रजत शर्मा की शादी से जुड़ी तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी जमकर वायरल हो रही हैं. इन तस्वीरों ने लोगों का दिल जीतने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. खास बात तो यह है कि शादी के जोड़े में दूल्हा-दुल्हन दोनों ही बेहद प्यारे लगे। तो चलिए एक नजर डालते हैं ज्योतिका दिलैक और रजत शर्मा की शादी की तस्वीरों पर-

 

 

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ज्योतिका ने शेयर की पहली तस्वीर

फेरों के बाद रुबीना दिलैक की बहन ज्योतिका दिलैक ने इंस्टाग्राम एकाउंट से शादी की पहली तस्वीर साझा की. इस तस्वीर में रजत अपनी दुल्हनिया में खोए नजर आए

 

 

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बेहद प्यारी लगी रजत और ज्योतिका की जोड़ी

ज्योतिका दिलैक और रजत शर्मा की जोड़ी बेहद प्यारी लगी. फोटोज में कपल एक-दूजे की आंखों में खोया नजर आया. उनकी इन तस्वीरों पर फैंस भी खूब प्यार लुटा रहे हैं.

पहाड़ी रीति-रिवाजों से हुई ज्योतिका दिलैक की शादी

बता दें कि ज्योतिका दिलैक और रजत शर्मा की शादी हिमाचली रीति-रिवाजों से हुई. दोनों ने शिमला की खूबसूरत वादियों के बीच फेरे लिये

लाल जोड़े में बेहद प्यारी लगीं ज्योतिका

ज्योतिका दिलैक ने शादी के मौके पर लाल जोड़ा पहनना बेहतर समझा. इस लाल जोड़े में ज्योतिका दिलैक का लुक भी देखने लयक रहा. वहीं उनके पति रजत शर्मा गहरे हरे रंग की शेरवानी में नजर आए.

मेहमानों संग भी कपल ने दिये पोज

ज्योतिका दिलैक और रजत शर्मा ने शादी में आए मेहमानों के साथ भी एक से बढ़कर एक पोज दिये। फोटोज में दोनों के चेहरे पर खुशी देखने लायक रही

 

 

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ज्योतिका-रजत के रिसेप्शन की फोटोज भी हुई वायरल

ज्योतिका दिलैक और रजत शर्मा का रिसेप्शन भी उसी दिन हुआ, जिससे जुड़ी फोटो सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोर रही है. फोटो में ज्योतिका गोल्डन कलर के लहंगे में दिखीं, जिसमें उनका लुक बेहद प्यारा लगा

 

 

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पिंक सूट में बेहद प्यारी लगी थीं ज्योतिका

रुबीना दिलैक की बहन ज्योतिका दिलैक ने हल्दी पर पिंक सूट पहना था, जिसमें उनका लुक देखने लायक रहा. हल्दी पर रुबीना और उनका पूरा परिवार साथ में पोज देता दिखाई दिया

YRKKH: फिर करीब आएंगे अक्षरा-अभिमन्यु! टूटेगा आरोही -अभिनव का दिल

टीवी सीरियल ये रिश्ता क्या कहलाता है में दर्शकों के बीच काफी ज्यादा पॉपुलर है. इस सीरियल की कहानी में जमकर फैमिली ड्रामा देखने को मिलता है और इन दिनों सीरियल में बवाल मचा हुआ है. कहानी में अक्षरा और अभिमन्यु छह साल पहले अलग हो चुके हैं. अभि की शादी आरोही से हो रही है. लेकिन बीते एपिसोड में देखने को मिला था कि अभिमन्यु बार-बार अक्षरा को फोन करता है लेकिन जब वह फोन नहीं उठाती तो वह गोयनका हाउस आ जाता है. तभी उसका एक्सीडेंट हो जाता है. हालांकि, मंजरी अक्षरा को अभि की इस हालत का जिम्मेवार बताती है. वहीं, अब अपकमिंग एपिसोड में भी काफी कुछ देखने को मिलेगा.

 

अभिनव से सवाल करेगी मंजरी

ये रिश्ता क्या कहलाता है (Yeh Rishta Kya Kehlata Hai) में देखने को मिला था कि सुरेखा, अभिनव और अक्षरा के अलग-अलग बिस्तर देख लेती है. अपकमिंग एपिसोड में देखने को मिलेगा कि सुरेखा अभिनव से स्वर्णा और सोहासनी के सामने ही पूछती है कि क्या कल रात उसकी कमर में सच में दर्द था. वह कहती है कि आप और अक्षरा काफी स्वीट है और दोनों का रिश्ता भी प्यार है. लेकिन पति-पत्नी ऐसे नहीं होते हैं.

 

 

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अभिनव के मन में आएंगे ढेरों सवाल

सीरियल में आगे देखने को मिलेगा कि सुरेखा की बातें सुनकर अभिनव शांत हो जाता है और फिर अपने कमरे में चला जाता है. यहां पर वह बार-बार अक्षरा और अभिमन्यु के बारे में सोचता है। इतना ही नहीं, वह बाहर बैठी हुई अक्षु के पास भी जाता है, जहां वह उसे देखकर कर सोचता है कि आपने मेरी तरफ एक कदम बढ़ाया था और मैंने मन ही मन चार कदम बढ़ा लिए थे. लेकिन अब आप जैसे अभिमन्यु की तरफ भागी है, उससे मैं कंफ्यूज हो गया हूं.

एकांत कमजोर पल- भाग 2

घर आ कर मां से सारी बात बताई और फफक कर रो पड़ी, ‘‘साहिल ने मुझे धोखा दिया. अब मैं उस के साथ नहीं रह सकती.’’

बड़ी बेगम का दिल रो पड़ा. वर्षों पहले जिस आग में उन का घर जला था आज उन की बेटी के घर पर उस की आंच आ गई.

निकाह में शर्तें रखने से भी क्या हुआ? सब मर्द एकजैसे होते हैं, जब जिसे मौका मिल जाए कोई नहीं चूकता.

बड़ी बेगम ने बेटी को संभाला, ‘‘बेटी मैं तुम्हारा दुख समझ सकती हूं. तुम सो जाओ.’’ और उस का सिर अपनी गोद में रख कर सहलाने लगीं.

दूसरे दिन जब सनोबर औफिस गई और बच्ची स्कूल तो साहिल आया. जानता था बड़ी बेगम अकेली होगी. नौकरानी ने बैठाया. बड़ी बेगम को सलाम कर के बैठ गया. धीरे से बोला, ‘‘खालाजान, मुझ से बड़ी गलती हो गई. मैं एक कमजोर पल में बहक गया था. मुझ से गलती हो गई. मैं कसम खाता हूं अब कभी ऐसा नहीं होगा. मुझे माफ कर दीजिए, सनोबर से माफ करवा दीजिए,’’ इतना सब वह एक सांस में ही कह गया था.

बड़ी बेगम चुप रहीं. उन को बहुत दुख था और गुस्सा भी. साहिल की बातों और आंखों में शर्मिंदगी और पछतावा था. वे धीरे से बोलीं, ‘‘मैं कुछ नहीं कर सकती, जैसा सनोबर चाहे.’’

‘‘खालाजान मेरा घर टूट जाएगा, मेरी बेटी मेरे बारे में क्या सोचेगी? मैं सनोबर के बिना जी नहीं सकता.’’

बड़ी बेगम कुछ न कह सकीं.

शाम को जब सनोबर औफिस से आई तो बड़ी बेगम ने बताया कि साहिल आया था और माफी मांग रहा था.

सनोबर ने गुस्सा किया, ‘‘आप ने उसे आने क्यों दिया? हमारा कोई रिश्ता नहीं उस से. मैं तलाक लूंगी.’’

बड़ी बेगम को याद आया जब वकील साहब दूसरी बीवी ले आए थे तो वे भी मायके जाना चाहती थीं पर उन का न तो कोई सहारा था न वे अपने पैरों पर खड़ी थीं. आज सनोबर अपने पैरों पर खडी है. अपने फैसले खुद ले सकती है. फिर सोचने कि लगीं तलाक से इस मासूम बच्ची का क्या होगा? मां या बाप किसी एक से कट जाएगी. अगर दोनों ने दूसरी शादी कर ली तो इस का क्या होगा? वे अंदर ही अंदर डर गईर्ं. अपने बेटे को सनोबर और साहिल के बारे में बताया तो वह दूसरे दिन ही आ गया. दोनों बहनभाई की एक ही राय थी कि तलाक ले लिया जाए. साहिल रोज फोन करता, मैसेज भेजता पर सनोबर जवाब न देती.

साहिल बड़ी बेगम से मिन्नतें करता, ‘‘खालाजान, आप सब ठीक कर सकती हैं. एक बार मुझे माफ कर दीजिए और सनोबर से भी माफ करवा दीजिए. मैं अपनी गलती के लिए बहुत शर्मिंदा हूं.’’

एक दिन सनोबर औफिस से अपने फ्लैट पर कुछ सामान लेने गई तो उस ने देखा घर बिखरा है. किचन में भी कुछ बाहर का खाना पड़ा है. वह समझ गई बाई नहीं आ रही है. घर में हर तरफ लिखा था, ‘आई एम सौरी, वापस आ जाओ सनोबर.’ सनोबर को लगा साहिल 40 साल का नहीं, कोई नवयुवक हो और उसे मना रहा हो.

धीरेधीरे कई कोशिशों के बाद साहिल ने बड़ी बेगम को विश्वास दिला दिया कि यह एक कमजोर पल की भूल थी. उस ने पहले कभी कोई बेवफाई नहीं की. बड़ी बेगम ने सोचा यह तो सच है कि साहिल से भूल हो गई, अपनी गलती पर उसे शर्मिंदगी भी है, माफी भी मांग रहा है. प्रश्न बच्ची का भी है. वह दोनों में से किसी एक से छिन जाएगी. तो क्या इसे एक अवसर देना चाहिए?

बड़ी बेगम ने साहिल को बताया कि सनोबर तलाक लेने की तैयारी कर रही है. यह सुनते ही साहिल दौड़ादौड़ा आया, ‘‘खालाजान, अगर सनोबर ने तलाक की अर्जी डाली तो मैं मर जाऊंगा, मुझे एक मौका दीजिए और बच्चों की तरह रोने लगा.’’

बड़ी बेगम को दया आने लगी बोलीं, ‘‘तुम रो मत मैं आज बात करूंगी.’’

सनोबर बोली, ‘‘औफकोर्स अम्मी.’’

मेरे पिताजी की एक किडनी 70% काम कर रही है, क्या इस के लिए डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट ही एकमात्र उपचार है?

सवाल

मेरे पिताजी की उम्र 62 वर्ष है. उन की एक किडनी 70% काम कर रही है. दूसरी लगभग 20%. मैं यह जानना चाहती हूं कि क्या इस के लिए डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट ही एकमात्र उपचार है?

जवाब

डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता तब होती है जब किडनी फेल्योर हो चुका हो. किडनी फेल्योर शब्दावली तब इस्तेमाल की जाती है जब दोनों किडनियां काम करना बंद कर देती हैं. अगर एक किडनी ठीक प्रकार से काम कर रही है तो सामान्य जीवन जीया जा सकता है. जिन्हें किडनी से संबंधित बीमारियां हैंवे ऐक्सरसाइजडाइट और दवाइयों से इसे नियंत्रित कर किडनी फेल्योर के खतरे को कम कर सकते हैं और सामान्य जीवन जी सकते हैं. इसलिए बहुत जरूरी है कि आप के पिताजी की एक किडनी जो ठीक प्रकार से काम कर रही है उसे स्वस्थ रखने के लिए सभी जरूरी उपाय किए जाएं ताकि उन्हें डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट जैसी स्थितियों का सामना न करना पड़े.

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