अमेरिकन बहू- भाग 3: समाज को भाने लगी विदेशी मीरा

राहुल पढ़ाई पूरी कर के अमेरिका में ही बहुत ऊंची तनख्वाह वाली नौकरी भी करने लगा. पर शादी की बात सुजाता ने उस से जब भी छेड़ी वह टाल गया. अंत में हुआ वही जिसका डर उन्हें पूरे 3 सालों से सता रहा था. कोविड के दिनों में वे उस के अभाव को ?ोलते रहे. गनीमत यह रही कि न कुमार, न सुजाता और न ही राहुल कोविड की चपेट में आए.

राहुल उन के मन के हर कोने में छिपी भावनाओं से परिचित था. इतना सम?ाना उस के लिए कठिन नहीं था कि मां को जान कर कितना आघात लगेगा कि वह एक अमेरिकन युवती से विवाह करना चाहता था. इस खुशखबरी को डैडी को देने में ही सम?ादारी होगी. यही उस ने किया भी. पिता की खुली सोच से वह परिचित था ही. कुमार उस की अकादमिक सफलताओं के कारण हमेशा से उस पर गर्व करते आते थे. ‘अपने विषय में जो भी निर्णय लेगा वह बहुत सोचसम?ा कर ही लेगा…’ इस का उन्हें भरोसा था और राहुल को डैडी पर. इसलिए मां को पहले यह खबर देने के लिए फिर सम?ाबु?ा कर राजी कर लेने के लिए उस ने डैडी का ही सहारा लिया.

एक दिन देर रात तक फोन पर उस ने विस्तार में पिता को बताया कि कैसे एक पार्टी में मीरा से उस की मुलाकात हुई थी. मीरा ने कालेज में ‘भारतीय इतिहास और संस्कृति’ विषय पर एक कोर्स किया था और इस के बाद भारत में उस की रुचि बढ़ती ही गई थी. यह रुचि केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रही थी. उसे हिंदू वर्णव्यवस्था की खामियों, दानपुण्य के ढकोसलोंकी भी पूरी जानकारी थी.

औफिस की एक पार्टी में भारत के प्रति उस का यह ?ाकाव ही उसे राहुल के इतना करीब ले आया था. जोरजोर से बज रहे संगीत के माहौल में चिल्लाचिल्ला कर उन्होंने एकदूसरे को अपना नाम बताया था. जब उस का नाम मीरा ले कर मुसकराते हुए राहुल ने कहा था कि यह तो एक विशुद्ध भारतीय नाम है तो उस ने हंस कर कहा था, ‘‘आई नो, बट राहुल, डोंट यू इमैजिन यू आर कृष्णा. यू बेटर रिमैन राहुल.’’

राहुल ने जोरदार ठहाका तो लगाया था पर साथ ही उस की भारत के विषय में इतनी जानकारी देख कर बेहद प्रभावित भी हुआ था. इस के बाद पार्टी के शोरगुल से ऊपर उठ कर सुकून से बातें कर पाएं इस के लिए वे टैरिस पर आ गए थे. वहां मीरा देर तक उस से भारत के विषय में बहुत सारे  पूछती रहीं. उस ने राहुल को यह भी बताया कि उस के नाम का सही उच्चारण अमेरिकन ढंग से तो मायिरा होना चाहिए था पर जब किसी से मीरा के कृष्णप्रेम के बारे में सुन कर उस ने उन के बारे में विस्तार में पढ़ा था तभी से उस ने अपने नाम का भारतीय उच्चारण ‘मीरा’ ही अपना लिया था.

उस पार्टी के बाद राहुल और मीरा की मुलाकातें अकसर

होने लगी थीं. दोनों का एक ही कंपनी में कार्यरत होना इस में बड़ा सहायक सिद्ध हुआ था. मीरा पढ़ाई, प्रशिक्षण और व्यवसाय से तो इंजीनियर थी पर भारतीय इतिहास और दर्शन में उस की रुचि इतनी गहरी थी कि उस के प्रश्नों के उत्तर दे पाने के लिए राहुल को खुद अपने देश के बारे में बहुत कुछ पढ़ना पड़ा. पर इस का यह अर्थ नहीं था कि राहुल और मीरा अपना जीवन गुरुकुल में पढ़ने वाले छात्रों की तरह बिताना चाहते थे.

पार्टी, पब, सैरसपाटा भी उन की फितरत में था. मीरा के दादा स्वीडन से आ कर अमेरिका में बस गए थे. मीरा अच्छे कदकाठी की, छरहरी, चमकती आंखों और सुनहरे बालों की वजह से स्वीडिश युवती की तरह दिखती थी. गोरी त्वचा के प्रति एक आम भारतीय की स्वाभाविक कमजोरी राहुल में थी ही. ऊपर से सुंदरता के हर मानदंड पर मीरा पूरी तरह से खरी उतरती थी.

उधर भारतीय प्रोफैशनल्स के अमेरिका में बढ़ते हुए दबदबे, बहुराष्ट्रीय कंपनियों में उन की कार्यनिष्ठा और जिम्मेदारी की बढ़ती हुई इज्जत के चलते राहुल भी मीरा के लिए एक बेहद आकर्षक नवयुवक था. सब से अच्छा यह था कि  मीरा को भारत में दिलचस्पी थी.

कुल मिला कर दोनों तरफ से आग बराबर लगी और 3 महीने बीततेबीतते मीरा की तरफ से राहुल को अपने दादाजी के घर पर आने का बुलावा भी मिल गया. उस के अपने पिता तो उस की मां को तलाक देने के बाद अपनी दूसरी पत्नी को भी त्याग कर तीसरी के साथ ब्याह रच चुके थे और उस की मां अपने दूसरे पति के साथ उस के टैक्सास स्थित रेंच पर रहने चली गई थी. पर मीरा के दादा और दादी 50 सालों से भी अधिक पुराने अपने विवाहित जीवन की आदर्श मिसाल कायम करते हुए न्यूजर्सी के एक उपनगर में रहते थे. मीरा दादादादी की बहुत प्यारी पोती थी.

राहुल उन से मिलने गया तो वे इतने प्यार से उस से मिले कि उसे अपने बचपन की याद आ गई. उस के बाद अधिक समय नहीं लगा था राहुल को यह निर्णय लेने में कि वही इस अमेरिकी मीरा का कृष्ण था. पर अपनी मम्मी को मीरा के विषय में आश्वस्त कर पाना उस के लिए टेढ़ी खीर थी.

एक सम?ादार और प्रतिभाशाली बेटे की हर इच्छा पर कुरबान होने वाले कुमार ने पहले तो राहुल को सम?ाया कि मां को खुश देखना है तो वह किसी भारतीय लड़की का चुनाव करे पर एक तो राहुल की अपनी इच्छा उन के लिए सब से महत्त्वपूर्ण थी, ऊपर से स्वीडिश रक्त वाली इस अमेरिकन लड़की के भारत

के बारे में अद्भुत बातें सुनसुन कर वे इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने सुजाता को राजी करने की जिम्मेदारी ले ही ली. उन्होंने राहुल को आश्वस्त कर दिया कि वह मीरा से विवाह कर पाएगा. उन्हें पता था कि सुजाता को राजी करने में सब से अधिक आसानी होगी मीरा की इस ख्वाहिश से कि वह भारत आ कर परंपरागत ढंग से भारतीय शादी रचाना चाहती थी.

 

मीरा के भारतीयता के प्रति रुचि का विस्तार में खाका खींचने के बाद जब अंत में

उस की इस ख्वाहिश का जिक्र कुमार ने किया तो सुजाता के मन से जैसे सैकड़ों मन का बो?ा हट गया. अपनी कूटनीतिक सफलता का जश्न मनाने के अंदाज में कुमार ने फिर राहुल को स्काइप पर बुला कर मां का स्नेह भी दिला दिया. इसी के अगले दिन राहुल ने मां को फिर लैपटौप के सामने खड़ा कर दिया. फिर उस खूबसूरत स्वीडिश अमेरिकन युवती ने जब मुसकरा कर ‘‘नैमेस्टे मम्मीजी,’’ कहा तो सुजाता का वात्सल्य खुशी के आंसुओं में बदल कर उन की आंखों में बह निकला.

उस पहली मुलाकात के बाद तो समय

जैसे पंख लगा कर उड़ने लगा. यह तय हो गया कि मीरा और राहुल दोनों साल के अंत में भारत आ जाएंगे और उसी सप्ताह में बाजेगाजे, धूमधड़ाके के साथ उन की पहले तो कानून के अनुसार शादी होगी और फिर भारतीय रीतिरिवाजों के बीच लंहगे और शेरवानी में हंसीमजाक व नाचगाना होगा.

शादी के बाद 1 सप्ताह और भारत में बिता कर वे वापस जाएंगे. हनीमून मनाने के लिए मीरा के ही आग्रह पर उदयपुर की ?ाल के बीच खड़े भव्य और सब से महंगे होटल में कमरा बुक करा दिया गया. मीरा के पिता या दादाजी नहीं आ सके तो कुमार साहब के सब से घनिष्ठ मित्र को यह किरदार निभाने के लिए कह दिया गया. ग्रैंड इंडियन वैडिंग हो यह सास और बहू दोनों की हार्दिक इच्छा थी.

सास की तमन्ना थी की दूरदूर से इकट्ठा हुए सारे रिश्तेदारों को अमेरिकन बहू के शुद्ध भारतीय संस्कार देख कर गर्व हो. सुजाता को विश्वास था कि खुशी के इस मौके पर उन के कुछ रिश्तेदार जो छोटे और मं?ोले शहरों से आने वाले थे, कोई कोताही नहीं करेंगे.

उस ने मन में गांठ बांध ली थी कि अपनी अमेरिकन बहू के भारतीय ढंग दिखा कर वे सब को चमत्कृत कर देंगी, सब के मुंह बंद करा देंगी. उस के बाद से ही स्काइप की सारी मुलाकातें मीरा के पूर्ण भारतीयता में खर्च होने लगी.

तुम आज भी पवित्र हो– भाग 2

क्षितिजा के पूछने पर कि उस की पत्नी और बच्चे कहां हैं तो कोल्डड्रिंक्स का गिलास उस के हाथ में पकड़ाते हुए उस का बौस नरेश कहने लगा कि खाने का सारा अरैंजमैंट उस की पत्नी ने ही किया है,

पर अचानक से उस के किसी दूर के रिश्तेदार, जो इसी शहर में रहते थे उन की मौत हो गई तो उसे फौरन वहां जाना पड़ा. वह बस आती ही होगी.

‘‘क्षितिजा यह सोच कर धीरेधीरे कोल्डड्रिंक्स के घूंट भरने लगी कि जब उस की पत्नी आ जाएगी तब सब साथ में ही खाना खाएंगे. मगर उसे इस बात की चिंता भी हो रही थी कि मां उस के लिए परेशान हो रही होंगी. अपने फोन की बैटरी लो होने के कारण, जब वह बौस के फोन से मुझे फोन लगाने लगी तो यह कह कर नरेश ने उस के हाथ से फोन ले लिया कि अब वह कोई छोटी बच्ची नहीं रही जो हर बात की खबर अपनी मां को देती रही.

‘‘अरे, अब तो वह शादी कर के अपने पिया के घर चली जाएगी तो क्या फिर भी मां को हर बात की जानकारी देती रहेगी? उस की बातों पर क्षितिजा भी मुसकरा पड़ी.

लेकिन उसे एहसास होने लगा कि उस की आंखें बोझिल होने लगी हैं. कुछ समझबोल पाती, उस से पहले ही वह वहीं सोफे पर लुढ़क गई.

‘‘सुबह जब उस की आंखें खुलीं तो उस ने खुद को एक बड़े से बैड पर पाया. उस का पूरा बदन दर्द के मारे टूट रहा था. लग रहा था जैसे किसी ने उस के शरीर को मचोड़ कर रख दिया हो. मगर हैरान तो वह तब रह गई जब उस ने अपने को बिलकुल वस्त्रहीन पाया. फिर अचानक उसे मेरा खयाल आया और जैसे ही वह बैड पर से उठने की कोशिश करने लगी. नरेश सामने आ कर खड़ा हो गया. उस के हाथ में शराब से भरा गिलास था.’’

‘‘एक बड़ा सा घूट भरते हुए वह बोला कि आराम से… आराम से… वैसे ठीक तो हो न?’’ वह कुछ समझबूझ पाती नरेश उसे घूरते हुए बोला बहुत मजा आया सच में… तुम ने मेरी रात रंगीन कर दी. इस रात को मैं हमेशा याद रखूंगा. बोल कर वह जोर से हंसा और फिर शराब से भरा गिलास एक बार में ही गटक गया.

‘‘नरेश को इस रूप में देख और उस की बातें सुन कर क्षितिजा की आंखें हैरानी से फैल गई. उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि नरेश ने उस के साथ ये सब कुछ किया? चादर से ही अपने नंगे बदन को किसी प्रकार ढकती हुई बोली कि तो तुम ने मेरे साथ…धोखे से अपने घर बुला कर तुम ने मेरा बलात्कार किया? और वहां मेरी मां…

‘‘क्षितिजा की बातों पर वह जोर से हंसा और फिर बोला कि तो क्या अपनी मरजी से तुम मेरे साथ सोने के लिए राजी हो जाती? और मां… हा…हा…हा…

कर वह ठहाके लगाने लगा.’’

‘‘उस की बेशर्मी देख गुस्से से क्षितिजा की आंखें लाल हो गईं. ललकारते हुए बोली कि ठीक है अब देखो मैं क्या करती हूं.

कहीं का नहीं छोडूंगी मैं तुम्हें. सब बताऊंगी पुलिस को कि किस तरह से तुम ने मुझे धोखे से अपने घर बुलाया और फिर कैसे मेरी बेहोशी का फायदा उठाया. बोल कर वह कमरे से निकलने लगी कि नरेश ने यह बोल कर उस का मुंह बंद कर दिया कि अगर उस ने ऐसा सोचा भी तो वह उस का न्यूड वीडियो जो उस ने बना लिया है उसे वायरल कर देगा. इसलिए उस की भलाई इसी में है कि अपना मुंह बंद रखे.’’

सारी बात सुन कर नमन का खून खौल उठा. मन तो किया उस का कि अभी जा कर उस नरेश का खून कर दे, पर उस ने अपने गुस्से पर कंट्रोल कर लिया और सोचने लगा कि अगर उस शख्स के खिलाफ पुलिस में शिकायत करे तो वह खबर तुरंत अखबारों और टीवी की सुर्खियां बन जाएगी और तब शायद क्षितिजा और अवसाद में चली जाएगी, हो सकता है बदनामी के डर से वह खुद को ही खत्म कर ले.

लेकिन अगर दोषी को सजा नहीं मिलती है तो भी खौफ में वह जी नहीं पाएगी.

क्या शादी के बाद बलात्कार को याद कर वह अपना वैवाहिक जीवन अच्छी तरह जी पाएगी कभी? ‘नहीं, मैं अपनी क्षितिजा को यों घुटघुट कर मरते नहीं देख सकता. मैं इसे इस अवसाद से बाहर निकाल कर ही रहूंगा और इस के लिए चाहे मुझे कुछ भी क्यों न करना पड़े मैं पीछे नहीं हटूंगा, और फिर मन ही मन नमन ने फैसला कर लिया कि अब उसे क्या करना है. नमन और क्षितिजा कालेज के समय से ही एकदूसरे से प्यार करते थे. उन की शादी से उन के परिवार वालों को भी कोई आपत्ति नहीं थी पर वे दोनों चाहते थे कि जौब लगने के बाद ही शादी के बंधन में बंधे. नौकरी लगते ही वादे के अनुसार दोनों ने शादी करने का फैसला ले लिया. कुछ दिन बाद ही दोनों की सगाई होनी थी और ये सब हो गया.

दिनप्रतिदिन क्षितिजा को और अवसाद में जाते देख उस के माता-पिता और नमन बहुत परेशान थे. सब ने अनेक प्रकार से उसे समझाने की कोशिश की, पर उसे तो जैसे काठ मार गया था. न तो वह किसी से ठीक से बात करती थी और न ही ठीक से कुछ खातीपीती थी. दिनबदिन शरीर और कमजोर होता जा रहा था. अंदर ही अंदर टूट रही थी. उस मंजर को याद कर कभी-कभी आधी रात में ही उठ जाती और फिर उसे संभालना काफी मुश्किल हो जाता था.

आज फिर वही भयानक दृश्य क्षितिजा को दहला गया और वह घबरा कर उठ बैठी. उस की आंखों से टपटप आंसू बहने लगे. उस की हथेलियों को अपने दोनों हाथों के बीच दबा कर नमन कहने लगा. ‘‘क्षितिजा, मेरी तरफ देखो, अकेली तुम ही एक लड़की नहीं हो इस दुनिया में जो इस दुख से गुजर रही हो. ऐसी कितनी लड़कियां होंगी जो इस दुख से गुजरी होंगी और गुजर रही होंगी, तो क्या सब ने हिम्मत हार दी होगी? जीना छोड़ दिया सब ने? अरे, गलती किसी और ने की है. फिर तुम क्यों खुद को सजा दे रही हो बोलो?

देखो अपनी मां की तरफ, क्या हालत हो गई है उन की और देखो मेरी आंखों में, क्या लगता है कि अब इन आंखों में तुम्हारी तसवीर नहीं है?

‘‘क्षितिजा,

तुम यह बिलकुल मत समझना कि किसी के छूने भर से तुम्हारा कौमार्य भंग हो गया या तुम अपवित्र हो गई या फिर पहले की तरह नहीं रही. फालतू की बातों को कभी अपने ऊपर हावी मत होने देना तुम. आज भी मेरे लिए तुम उतनी ही मासूम और पवित्र हो जितनी पहले थी और देखना, उस पापी को उसके किए की सजा एक दिन जरूर मिलेगी,’’ कह कर नमन ने क्षितिजा को अपने सीने से लगा लिया.

आगे पढ़ें- नमन किसी तरह उसे उस खौफ से बाहर निकालना

करना पड़ता है: धर्म ने किया दानिश और याशिका को दूर- भाग 1

‘क्यासोच रही हो मम्मी?’’

नौशीन ने एक ठंडी सांस ले कर कहा, ‘‘सोचने को तो अब बहुत कुछ है, बेटा. तुम ने तो बहुत गलत जगह दिल लगा लिया,’’ कहतेकहते वे अपने बेटे दानिश को देख कर परेशानी में भी मुसकरा दी जो उन का स्वभाव था.

दानिश गंभीर रहा, आजकल परेशान तो मांबेटा दोनों ही थे. दानिश को अपनी सहकर्मी यशिका से मुहब्बत हो गई थी और अब वह उस से शादी करना चाहता था. मुलुंड, मुंबई में नौशीन और दानिश, ये 2 ही थे घर में.

नौशीन के पति अब इस दुनिया में नहीं थे. नौशीन ने अपने बेटे की बहुत अच्छी परवरिश अकेले ही की थी. वे खुद भी एक अच्छी कंपनी में कार्यरत थीं. मांबेटा अब दोस्तों की तरह थे. दानिश ने जब पहली बार यशिका से उन्हें मिलवाया, वे उस से मिल कर खुश ही हुईं थीं. वैसे भी आजकल मांएं बच्चों की पसंद में अपनी सहमति खुशीखुशी दे देती हैं और नौशीन तो महानगर में ही पलीबढ़ी, खुली सोच वाली महिला थीं. उन का मायका, ससुराल सब मुंबई में ही थे पर नौशीन उन सब की पुरातनपंथी सोच से अलग थलग रहने में ही सुकून पातीं.

आज शनिवार था. नौशीन और दानिश की औफिस की छुट्टी थी. शाम के 5 बजे थे. डोरबैल हुई तो नौशीन ने दानिश से कहा, ‘‘जाओ, दरवाजा तुम ही खोलो. तुम्हारे लिए ही कोई आया होगा.’’

यह मांबेटे का खेल था कि दोनों कोशिश करते कि दरवाजा उसे न खोलना पड़े. सब्जी, दूध वाला आता तो दानिश हंसता, ‘‘जाओ, आप के लिए ही कोई आया है.’’

 

यह यशिका के आने का ही टाइम था. दोनों जानते थे. वह अकसर शनिवार की शाम

आती. कभी तीनों डिनर पर निकल जाते, कभी मूवी देखने चले जाते, कभी घर पर ही तीनों अच्छा हंसीमजाक कर टाइम पास करते. देखने में एकदम परफैक्ट फैमिली पिक्चर लगती पर अभी कहां. अभी तो इस मुहब्बत के सामने जाति की दीवार ऐसे खड़ी थी जिसे हटाने के लिए रोज नए मंसूबे बनते, धराशायी होते.

यशिका ही थी. आते ही उस ने हाथ सैनिटाइज किए, अपना बैग एक तरफ पटका, नौशीन के गले मिली और दानिश को ‘हाय’ कहते हुए नौशीन के पास बैठ गई. पहले आम हालचाल हुए फिर यशिका ने जोश से पूछा, ‘‘आंटी, आज तो बड़ी मुश्किल से घर से निकली. पापा पता नहीं क्यों आज फ्री थे. आज उन की कोई राजनीति वाली बैठक नहीं थी. घर में ही मु?ो पकड़ कर पूछने लगे कि शादी के बारे में क्या सोचा है. मैं ने कहा कि जब सोचूंगी, आप को ही बताउंगी तो बोले कि मु?ो बस इतना ही कहना है कि लड़का अपनी जाति का हो, बस यह ध्यान रखना. मैं ने सोचा, आज मौका मिला है तो मैं भी उन्हें कुछ हिंट दे देती हूं, मैं ने कहा कि पापा, किसी को पसंद करना अपने हाथ में थोड़े ही होता है. देखो, कौन पसंद आता है. कास्ट का क्या है, इंसान अच्छा होना चाहिए, बस, आंटी, पापा को जैसे करंट लगा. बोले कि ये सब फिल्मी बातें मत करो मु?ा से. जातबिरादरी से बाहर किसी को पसंद करने की सोचना भी मत.

‘‘तुम्हारा भी नुकसान होगा, उस लड़के का भी. इस धमकी पर मु?ो गुस्सा तो बहुत आया, पर चुप रह गई और मेरी मम्मी. क्या कहूं उन्हें. पापा की हर गलत बात को चुपचाप सहती हैं, कभी उन्हें किसी भी गलत बात का विरोध करते नहीं देखा और घरों में मांएं कम से कम अपने बच्चों के लिए तो खड़ी हो जाती हैं और मेरे घर में तो मेरी मम्मी ने मु?ो ही इस बात पर आंख दिखाई. आंटी, आप ही कुछ करो.’’

नौशीन हंस पड़ीं, ‘‘वाह, इश्क तुम लोग फरमाओ, समाधान मैं ढूंढूं. तुम्हारे नेता कट्टर पापा से मैं निबटूं?’’

दानिश ने कहा, ‘‘मां हो मेरी. कुछ तो आप को करना ही पड़ेगा. हमें नहीं पता, पर आप ही देखो, मम्मी, कैसे क्या करना है.’’

दोनों बच्चों को स्पेस देते हुए नौशीन ‘अभी आती हूं’ कह कर अपने रूम में चली गईं. दानिश की पसंद यशिका उन्हें भी पसंद थी. वे चाहती थीं कि जल्दी से उन की शादी हो जाए. पर यशिका के पापा कट्टर हिंदू थे, जो किसी भी तरह एक मुसलिम लड़के से अपनी बेटी का विवाह हरगिज न होने देते. लोकल न्यूजपेपर में उन की गतिविधियां नौशीन अच्छी तरह पढ़ चुकी थीं पर कुछ तो करना पड़ेगा. उन्होंने बैठेबैठे बहुत सोचा कि वे कैसे उन्हें इस विवाह के लिए मना सकती हैं, वे बहुत सुंदर, स्मार्ट और होशियार थीं. इस समस्या को सुल?ाने का समाधान उन्हें जब सू?ा तो मन ही मन खुद को शाबाशी दे बैठीं. खयाल ही ऐसा आया था कि उन्हें अपने आइडिया पर रोमांच भी हुआ और हंसी भी आई.

नौशीन लिविंग रूम में आईं, बच्चों को अपने आइडिया के बारे में अभी नहीं बताना चाहती थीं. धीरेधीरे आराम से हर कदम सोच कर आगे बढ़ाना चाहती थीं. दोनों टीवी पर कोई शो देख रहे थे, नौशीन ने पूछा,

सुष्मिता सेन के हार्ट अटैक की खबर पर भाभी चारु ने दिया ये रिएक्शन

बॉलीवुड एक्ट्रेस और पूर्व मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन (Sushmita Sen) ने अपने हार्ट अटैक की खबर से हर किसी को हैरान कर दिया है. इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए सुष्मिता सेन ने खुलासा किया कि उन्हें हाल ही में हार्ट अटैक आया था. हालांकि अब उनकी तबीयत ठीक है. सुष्मिता सेन के इस पोस्ट से उनके फैंस और सेलेब्स शॉक्ड रह गए हैं और उनके स्वास्थ्य के लिए कामनाएं कर रहे हैं. इसी बीच सुष्मिता सेन की भाभी और एक्ट्रेस चारू असोपा (Charu Asopa) ने भी अपनी ननद के लिए खास पोस्ट किया है.

चारू असोपा ने सुष्मिता सेन के लिए कही ये बात
चारू असोपा ने सुष्मिता सेन के हार्ट अटैक पर रिएक्शन दिया है, जो कि काफी तेजी से वायरल हो रहा है. चारू असोपा ने सुष्मिता सेन की खूबसूरत तस्वीर इंस्टाग्राम स्टोरी पर शेयर करते हुए लिखा, ‘दीदी हम आपको प्यार करते हैं, आप सबसे स्ट्रॉन्ग महिला है, आपका दिल बहुत बड़ा है.’ इसके साथ ही चारू असोपा ने दिल वाला इमोजी भी बनाया है.

 

 

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राजीव सेन ने बहन सुष्मिता को बताया सबसे मजबूत
इसके साथ ही राजीव ने भी अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी में अपनी बहन को ‘सबसे मजबूत’ कहा और एक प्यारी सी तस्वीर शेयर की है. इस तस्वीर में दोनों काफी खूबसूरत अंदाज में दिखाई दे रहे हैं. मालूम हो कि चारू असोपा सुष्मिता के भाई राजीव सेन की पत्नी हैं. जहां राजीव और चारू का रिश्ता बनने को टूटने को लेकर सुर्खियों में रहता हैं, तो वहीं चारू राजीव के परिवार के काफी क्लोज हैं और सुष्मिता के साथ चारू की बेहद खास बॉन्डिंग है. दोनों अक्सर एक-दूसरे की तस्वीरों और वीडियो पर खूब कमेंट भी करती दिखाई देती हैं.

 

 

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सुष्मिता सेन ने दी ये जानकारी
गुरुवार को एक पोस्ट में सुष्मिता सेन (Sushmita Sen) ने इंस्टाग्राम पर अपने पिता के साथ एक तस्वीर शेयर करते हुए खुलासा किया कि कुछ दिन पहले उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. उन्होंने आगे लिखा, ‘एंजियोप्लास्टी हो गई है…स्टेंट सही जगह पर है…और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मेरे हार्ट स्पेशलिस्ट ने कहा कि ‘मेरा दिल बड़ा है’.

Anupamaa: क्या उजड़ जाएगा अनुपमा का दूसरा घर! माया चलेगी नई चाल

टीवी शो ‘अनुपमा’ में इन दिनों देखा जा सकता है कि अनुज कपाड़िया के प्यार में माया पूरी तरह पागल हो चुकी है. शाह हाउस में महाशिवरात्रि का सेलिब्रेशन होता है, जहां पूरा कपाड़िया परिवार भी मौजूद रहता है. कपल की शिवरात्रि पूजा में माया भी आती है. माया भी अनुज के लिए व्रत रखती है और वह अपना व्रत पूरा करने के लिए सारे नियम चुपके-चुपके पूरे करती है, जिसे काव्या देख लेती है. इसके बाद काव्या आखिरकार अनुपमा को सच बता देती है कि माया वही कर रही हो, जो उसने उसके साथ किया था. माया अनुज से प्यार करने लगी है.

 

अनुपमा के सामने आई माया की सच्चाई

आज के एपिसोड में दिखाया जाएगा कि, काव्या माया की सभी हरकतें अनुपमा और बाकी घरवालों को बताती है. वह उस रात की भी बात बताती है, जब माया ने अनुज को किस किया था और गले लगाया था. इसके बाद बा माया पर तंज कसते हुए कहती हैं कि सारी सिंगल महिलाएं ऐसी ही होती हैं. बरखा भी माया की हरकतों पर आवाज उठाती है. फिर अनुपमा माया से पूछती है कि क्या वह अनुज से प्यार करती है, वह हां में जवाब देती है. फिर वनराज अनुज पर लांछन लगाता है और कहता है कि अनुज कोई दूध का धुला नहीं है.

अनुपमा के सामने बेचारी बनी माया

नराज अनुज पर आरोप लगाते हुए कहता है कि अनुज ने माया को हिंट दिया होगा, तभी माया इतना आगे बढ़ी. अपने पति पर लांछन लगाते हुए देख अनुपमा चुप नहीं होती है और वह अनुज को साक्षात ‘महादेव’ कहती है. साथ ही तारीफों के पुल बांध देती है. माया बीच में कूदती है और कहती  है कि अनुज ने कभी उसे हिंट नहीं दिया, हमेशा सम्मान दिया, इसीलिए वह उससे प्यार करने लगी. माया बार-बार अपने प्यार का बाखान करती है और अनुज इस बात से इरीटेट हो जाता है.

अनुज पर लगे लांछन

इसके बाद वनराज कहता है कि अनुज इतना ही दूध का धुला है तो उसने अनुपमा से उस रात की सच्चाई क्यों नहीं बताई. वनराज के इस सवाल से अनुपमा के मन में भी सवाल उठने लगता है. माया ऊपर से भोली-भाली बनने का नाटक करती है और अंदर से ये सोचती है कि सही हुआ कि अनुपमा के मन में शक की चिंगारी लग गई है, जो अनुज के प्रति उसके विश्वास को राख कर देगी. वहीं, वनराज के बार-बार आरोप लगाने के बाद माया काव्या का भांडाफोड़ कर देती है. वह कहती है कि क्या काव्या ने आपको बताया कि उसका एक्स हसबैंड अनिरुद्ध उसे फिर से पाना चाहता है. ये सुनकर वनराज शॉक रह जाता है.

माया ने दी धमकी

आने वाले एपिसोड में देखने को मिलेगा कि अनुपमा और अनुज माया को कपाड़िया हाउस से निकल जाने के लिए कहते हैं, लेकिन माया कहती है कि अगर वह जाएगी तो अपनी बेटी छोटी अनु के साथ जाएगी, क्योंकि वह उसकी बायोलॉजिकल मदर है और कोई भी कानून उसे उसकी बेटी से अलग नहीं कर सकता है. ये सुनकर अनुज और अनुपमा चौंक जाते हैं. अब देखना होगा कि आगे क्या होगा.

तूफान की वह रात- भाग 2

बाहर ही चौकी रखी थी. गरमियों में आमतौर पर बिहार में चौकीखाट वगैरह रात में पुरुषोंबच्चों के सोने के लिए निकाल दिए जाते हैं. वह वहीं आराम से बैठ गया. मां उस पर ताड़ के पत्तों से पंखे की तरह झलने लगी.

नहाने के बाद मां ने उसे चाय का गिलास और घर के बने नमकीन की तश्तरी उस के आगे धर दी थी. दोनों छोटे भाईबहन भी वहीं आ कर बैठ गए थे. उस ने जल्दीजल्दी चाय पी और नमकीन खत्म कर बोला, “शर्माजी के घर हो कर आता हूं. तुम इंतजार करना. जल्दी ही लौट आऊंगा.”

रात लगभग 9 बजे अर्थी उठी और वह भी सभी के साथ श्मशान घाट तक गया. दाह संस्कार के बीच वह जैसे शून्य में खोया सा था कि तभी आलोक आ कर उस से बोला, “राजू भाई, यह अचानक क्या हो गया?”

“क्या कहूं आलोक,” वह फफकफफक कर रो पड़ा, “मृत्यु नजदीक थी. कुछ को मुक्ति मिल गई. कुछ हमारे जैसे लोग भारतीय नौसेना की वजह से बच गए.”

“अब जो होना था, हो ही गया,” आलोक उसे सांत्वना देते हुए कहने लगा, “कुछकुछ जानकारी हमें भी हुई है. तुम बहुत थके हो और परेशान भी रहे. अब घर लौट जाओ. यहां हम कई लोग हैं देखने के लिए.”

उस के मन में वापस लौटने की इच्छा थी, मगर वह संकोचवश उठ नहीं रहा था. भारी मन लिए वह वहां से उठा और घर चला आया.

एक बार पुनः स्नान कर वह ताजातरीन हुआ और बेमन से खाना वगैरह खा कर बाहर बिछी चौकी पर लेट गया. छोटा भाई आ कर पैर दबाने लगा. उस ने उसे मना किया, तो वह मनुहार भरे स्वर में बोला, “इसी बहाने तुम्हारे पास हूं भैया. यहां मां और दीदी कितना रोती हैं.”

“क्योंक्यों, क्या बात हुई?” वह उठ कर बैठ गया, “फिर तुम तो घर पर ही हो.”

“मगर, मैं क्या कर सकता हूं. मैं तो बहुत छोटा हूं,” वह सुबकता हुआ बोला, “एक तो तुम इतनी दूर चले गए. उस पर ये तूफान वाला हादसा हुआ तो हम बहुत डर गए.”

“डरने की कोई बात नहीं. मैं हूं ना. अब बाहर नहीं जाता तो घर के खर्चे कैसे चलते?” वह उसे समझाते हुए बोला, “अब तुम जाओ. रात बहुत हो गई है इसलिए जा कर सो जाओ. मुझे भी नींद आ रही है. कल ढेर सारी बातें करूंगा.”

“नहीं, मैं तुम्हारे साथ ही सोऊंगा.”

“ठीक है, सो जा,” उस ने उसे अपने बगल में सुलाते हुए कहा.

अब वह सोने का प्रयास करने लगा था, मगर नींद अब आंखों से कोसों दूर थी. ऊपर आसमान तारों से सजा था, जिसे वह निहार रहा था. वह उन में कहीं पंकज शर्मा को खोज रहा था शायद, कि उसे अपने दिवंगत पिता की याद आ गई.

विगत वर्ष जब उस के पिता का देहांत हुआ था तो इसी प्रकार के भयावह शून्य को देख कर घबराया था. उन के अंतिम क्रिया संपन्न होने के बाद समस्या यह थी कि अब रोजमर्रा के खर्चे कैसे चलेंगे. तिस पर बिरादरी वालों ने श्राद्ध के नाम से अलग शाहीखर्च करा उस के घर को कर्ज में डुबा गए थे. उस की भी उसे भरपाई करनी थी. थोड़ी सी खेती थी. दरअसल, उसी पर सभी की दृष्टि लगी थी. मगर मां उसे किसी भी कीमत पर बेचने को तैयार नहीं थी. बहुत

उस ने भागदौड़ की. उस ने 3 साल पहले ही आईटीआई से वेल्डर का सर्टिफिकेट हासिल कर लिया था. मगर सरकारी तो दूर, कोई प्राइवेट नौकरी भी उसे नहीं मिल रही थी. वह वहीं समस्तीपुर में एक ग्रिल बनाने वाली दुकान में बतौर वेल्डर लग गया था कि घर बैठने से अच्छा है कि कुछ किया जाए. इस से काम में हाथ भी साफ रहता और परिपक्वता भी आती.

उन्हीं दिनों पंकज शर्मा छठ त्योहार के अवसर पर घर आए थे. वह मुंबई में किसी शिपिंग कंपनी में मैरीन इंजीनियर के अच्छे पद परथे. एक दिन वह किसी काम के सिलसिले में उन के छोटे भाई आलोक से मिलने गया, तो उस से भेंट हो गई. वह उस के घर का हालचाल पूछने लगे, तो जैसे दिल का दर्द बाहर उमड़ आया, “आप से कुछ छुपा तो है नहीं. दानेदाने तक के लिए मोहताज थे हम. तभी मैं समस्तीपुर में उस ग्रिल बनाने वाली दुकान पर जाने लगा. इस लौकडाउन में तो हमारी क्या, सभी की हालत खराब रही. वे बस कुछ खानेपीने भर को दे देते हैं. छोटे भाई को अगले साल बारहवीं की परीक्षा देनी है. पता नहीं, वह पैसों के चलते फार्म भर पाएगा कि नहीं. वह इसीलिए विक्षिप्त सा हो रहा है. छोटी बहन को भी दसवीं की परीक्षा देनी है. उस की पढ़ाई में कुछ खर्च तो होता नहीं, मगर भोजनपानी तो चाहिए ही चाहिए ना. उधर हमारी थोड़ी सी बची जमीन पर गिद्धदृष्टि लगाए बैठे हैं. वो कैसे बचेगी, और बड़ी बात यह कि हम कैसे बचें, समझ नहीं पाता हूं.

“आप तो मुंबई में अच्छे पद पर हैं. वहां कुछ जुगाड़ हो पाता मेरा तो बहुत अच्छा रहता. मुमकिन हो तो आप अपनी शिपिंग कंपनी में  ही मुझे रखवा लें.”

“अरे, मैं भी तो उस कंपनी में मुलाजिम ही हूं,” कहते हुए वह जोरों से हंसे थे, “मैं वहां क्या कर सकता हूं…?”

थोड़ी देर ठहर कर कुछ याद करते हुए से वह बोले, “तुम ने वेल्डिंग ट्रेड से आईटीआई पास किया है ना. कैसा काम है तुम्हारा?”

“अब मैं अपने मुंह से अपनी प्रशंसा क्या करूं. मैं जिस दुकान में काम करता हूं, उन्हीं से पूछ लीजिएगा. इस फिनिशिंग से काम करता हूं कि सभी मेरी वेल्डिंग की प्रशंसा करते हैं.”

“मैं जिस जहाज पर काम करता हूं, उस के कैप्टन ने मुझ से किसी अच्छे वेल्डर के बारे में बात की थी. मगर भाई, सागर में जहाज की नौकरी रहेगी. पता नहीं, तुम्हें पसंद आए या नहीं? वैसे, पैसे अच्छे मिलेंगे. संभवतः 20,000 रुपए महीने के दें.”

उस ने उन के पैर पकड़ लिए थे, “मुझे मंजूर है, समुद्र के जहाज पर रहना. कम से कम मेरी मां तो ठीक से रहेगी. भाईबहन थोड़ी पढ़ाई तो कर पाएंगे. आप मुझे साथ ले चलिए.”

और इस प्रकार वह पंकज शर्मा के साथ मुंबई आ गया था. वहां पहले उसे शिपिंग कंपनी के तकनीकी विभाग में रखा गया. फिर वह जहाजों पर ही काम करने लगा था. कैसा नीरस जीवन था यहां का. समुद्र तट से सैकड़ों मील दूर स्थित जहाजों में टूटफूट होती रहती थी और उस के साथ ही मरम्मत का काम भी चलता था. चूंकि जहाज लोहेइस्पात के ही बने  होते हैं. और इस के लिए कुशल तकनीशियनों की जरूरत पड़ती ही थी. शीघ्र ही उस ने अपने काम से सभी का दिल जीत लिया था.

पंकज शर्मा का जीवन तो समुद्र में खड़े जहाजों के बीच ही गुजरता था. फिर भी उन्होंने मुंबई के उपनगर अंधेरी में एक कमरा ले रखा था. वेतन मिलते ही वह वहां जाते और कुछ आवश्यक खरीदारी के साथ घर पैसा भेज देते थे. अगले माह जब वेतन मिला, तो वह उसे भी साथ ले गए.

Holi 2023: रिश्तों में उल्लास भरें त्योहार

रिश्तों की डोर बहुत नाजुक होती है. कभीकभी न चाहते हुए भी इन में दूरियां आ जाती हैं. ऐसे में त्योहार रिश्तों में आई दूरियों को मिटाने के लिए बेहतरीन मौका साबित हो सकते हैं और वैसे भी त्योहारों और संबंधियों का रिश्ता गहरा होता है. त्योहारों में संबंधी साथ न हों तो वे बेहद फीके लगते हैं, उन का मजा अधूरा ही रहता है.

रिश्तों में ताजगी लाते त्योहार

त्योहार हमें खुशी मनाने का मौका देते हैं, रूटीन लाइफ से अलग करते हैं. खुशी के ये ऐसे मौके होते हैं जिन्हें सगेसंबंधियों के साथ ऐंजौय करने से रिश्तों की खोई ताजगी को भी वापस लाया जा सकता है. परी अपना अनुभव बताती हैं, ‘‘मेरे पति और मेरे बीच अकसर इस बात को ले कर झगड़ा होता था कि वे अपने परिवार को समय नहीं देते. मैं जब भी उन से यह शिकायत करती कि वे मेरे साथ ऐंजौय क्यों नहीं करते तो हमारी बहस शुरू हो जाती, जिस की वजह से हमारा वैवाहिक जीवन बहुत ही नीरस होता जा रहा था. ‘‘लेकिन दीवाली के दिन तब हमारे सारे गिलेशिकवे दूर हो गए जब उन्होंने मुझे बिना बताए मेरी बहन और भाई को हमारे घर बुलाया और जब मैं सुबह सो रही थी तो उन सभी ने मुसकरा कर मुझे दीवाली की मुबारकबाद दी. मैं ने अपने पति, बहन और भाई के साथ बहुत ऐंजौय किया. उन के इस सरप्राइज ने तो मेरे सारे मूड को ही बदल दिया.’’

करीब लाते हैं त्योहार

समय के अभाव में एकदूसरे के साथ वक्त बिताना आज एक मुश्किल काम है. ऐसे में त्योहार इस का अच्छा उपाय हैं. त्योहारों पर सभी की छुट्टी रहती है, इसलिए इन्हें सगेसंबंधियों के साथ मिलजुल कर मनाना चाहिए. इस से रिश्ते मजबूत होते हैं.

अपनों को न भूलें

अरुण एम.बी.ए. करने के लिए अमेरिका गया था. लेकिन हर त्योहार पर अपने सभी रिश्तेदारों व दोस्तों को बधाई जरूर देता. उन्हें मैसेज और ईमेल भेजता. यानी वह दूर होते हुए भी सभी रिश्तेदारों, मित्रों से जुड़ा रहता. एकदूसरे से मेलमिलाप बढ़ाने का त्योहारों से अच्छा माध्यम और कोई नहीं हो सकता. बस जरूरत है, इन्हें याद रखने की चाहे आप अपनी जिंदगी में कितने भी व्यस्त क्यों न रहते हों अथवा दूर. त्योहारों पर अपनों को याद करने पर आप यकीनन उन के दिलों में एक खास जगह बना लेंगे.

उपहार भेजें

त्योहारों के खास मौकों पर मार्केट में बहुत सुंदरसुंदर उपहार उपलब्ध होते हैं. उपहार छोटा हो या बड़ा, यह माने नहीं रखता. आप को दिखावा नहीं करना है, बल्कि उपहारों के जरिए करीबियों के प्रति अपनी भावनाएं दर्शानी हैं.

बधाई अवश्य दें

यदि आप मिल कर मिठाई या गिफ्ट नहीं दे पाए तो कम से कम बधाई तो अवश्य दें. त्योहार पर किया गया एक मैसेज या फोन भी आप के भावों को दर्शाने का अच्छा तरीका होता है. बधाई भरे मैसेज हर किसी के चेहरे पर मुसकान बिखेर जाते हैं.

सरप्राइज दें

त्योहार के दिन बिना बताए ही संबंधियों व दोस्तों के घर उन की मनपसंद मिठाई ले कर पहुंच जाएं और उन्हें चौंका दें. यह निमंत्रण दे कर बुलाने से कहीं ज्यादा ऐक्साइटिंग तरीका बन जाता है. प्लानिंग से ऐंजौयमैंट करने से ज्यादा मजा चौंकाने में है. 

पछतावा-भाग 2: क्यूं परेशान थी सुधा

तन्वी दीदी के इस रवैए से हैरान थी. आखिर दीदी को उस फ्लैट में रहने वालों से क्या लेनादेना है, इतनी दिलचस्पी क्यों है. दीदी जैसे लोग ही सच्चीझूठी बातों में मिर्चमसाला लगा कर अफवाहें फैलाते हैं. दीदी का तो यह नया रूप देखने को मिल रहा था उस को. वह सोचने लगी कि अपने घर पर ध्यान देने के बदले दूसरों के घर में ताकझांक करना क्या दीदी को शोभा देता है…तन्वी अपने विचारों में खोई हुई थी कि तभी सुधा उस के पास आई और बोली, “तन्वी, नाश्ते के लिए शक्करपारे बना लेते हैं. चाय के साथ अच्छे लगते है खाने में.”

“हां दीदी, सही कह रही हो. तुम मुझे सब सामान दे दो. में शक्करपारे बनाने की तैयारी करती हूं.”

सुधा सब सामान तन्वी को दे रही थी, तभी किचन में पिंटू आया और बोला, “मम्मी, वह तोंदू का फ़ोन आया है, मैं ने फ़ोन होल्ड पर रखा है. जल्दी चलो बात करने.”

आटा गूंधतेगूंधते तन्वी पलटी और बोली, “ये तोंदू कौन है?”

“अरे, वही टकलू अंकल. उसी को तोंदू कहते हैं हम,” पिंटू ने कहा, “मम्मी, तुम जल्दी आओ,” यह कह कर वह चला गया.

 

तन्वी ने सुधा से पूछा, “दीदी, ये तोंदू, टकलू किस के नाम रखे हैं तुम ने?”

इस पर सुधा ने हंसते हुए कहा, “वही बुद्धूचरण, पाठक अंकल, रसिक बलमा.” और जोरजोर से वह हंसने लगी.

उस की बातें सुन कर तन्वी को भी हंसी आ गई. फिर वह बोली, “क्या दीदी, तुम ने अपने बौयफ्रेंड के क्याक्या फनी नाम रखे हैं.” यह सुनकर सुधा खिलखिला कर हंसने लगी और बोली, “आती हूं बात कर के.”

तन्वी अपने बेटे आयुष और बेटी पूर्वी से बात करना चाहती थी लेकिन टाइम ही नहीं मिल पा रहा था. पूरे दिन वह दीदी के साथ किचन में हाथ बंटाती थी, फिर कोई नाश्ता बनाना हो तो दीदी उस पर छोड़ कर चली जातीं और आधा घंटा, पौने घंटे के बाद आती. कभीकभी नहीं आती और सोफे पर आराम करती रहती.

वह अभी मोबाइल पर नंबर डायल कर रही थी, तभी उस ने देखा दीदी ने धीरे से पिंटू से कुछ कहा और पिंटू चप्पल पहन कर तेजी से घर से बाहर चला गया. दसबारह मिनट बाद वह वापस आया और दीदी को इशारे से कुछ कहा. जवाब में दीदी ने सिर हिलाया और ओके कहा.

दीदी के घर का माहौल तन्वी को अजीब लग रहा था. क्या खिचड़ी पक रही थी, उस की समझ के बाहर था. सच पूछो तो वह जानना भी नहीं चाहती थी. इतने दिनों से वह जो कुछ भी देख व सुन रही थी, जो कोई भी देखता या सुनता वह यही कहता कि दीदी के घर का माहौल बहुत ख़राब है, किसी चीज में अनुशासन नहीं था.

तन्वी आयुष को फ़ोन लगा रही थी लेकिन लग नहीं रहा था. शायद नैटवर्क की प्रौब्लम होगी, थोड़ी देर बाद फ़ोन लगाऊंगी, यह सोच कर तन्वी ने मोबाइल टेबल पर रख दिया. उस ने दीदी की तरफ देखा, वे अभी भी पाठक अंकल से बात करने में व्यस्त थीं. काफी देर तक उन की बातें चलती रहीं. पाठक अंकल से एकडेढ़ घंटा बात करने के बाद फाइनली दीदी ने बाय कहा. और तन्वी की तरफ देख कर मुसकरा दी.

तन्वी ने सुधा से पूछ लिया, “दीदी, इतनी देर तक क्याक्या बातें करती हो? चलो, थोड़ी तो रोमैंटिक बातें होती होंगी, मान लिया लेकिन और कौन सी बातें करते हो आप लोग? आप तो सुबह से ले कर रात के सोने तक बात करती हो. हर घंटे तुम चैटिंग करती हो. पूरे दिन में 5 से 6 बार फ़ोन पर बात होती है, इसीलिए पूछ रही हूं.”

इस पर सुधा बोली, “अरे, तू नहीं जानती इस बुद्धूचरण को, पता नहीं किसी और औरत से चक्कर न चला ले, इसलिए पूरे दिन इसी बहाने उस पर निगरानी रखती हूं. उस से घर की सब बातें पूछती रहती हूं. उस से उस की दिनभर की दिनचर्या का पता चल जाता है. वे भी मुझ से छोटी से छोटी बातें शेयर करते हैं- कितना बैंक बैलेंस है, उन की बहन को राखी पर क्या गिफ्ट दिया, वे कहां जाने वाले हैं, कब आएंगे… सब बातें मुझे मालूम होती हैं, यहां तक कि वे मुझ से सलाह भी लेते हैं.

“मैं ने अपनी उंगलियों पर उन को नचा रखा है. मैं फ़ोन करूं और वे फ़ोन न उठाएं, इतनी मजाल नहीं है उन की. इसीलिए उन की पलपल की खबर रखती हूं. वह कहते हैं न, बंदर बूढ़ा हो जाए तो क्या, गुलाटी खाना नहीं भूलता. उन को लगता है, मैं उन की कितनी परवा करती हूं, उन से कितना प्रेम करती हूं…”

“लेकिन यह तो एक दिखावा है तुम्हारा, है न दीदी?”   तन्वी तपाक से बोली.

“हूँ,” और सुधा ने सहमति में अपना सिर हिलाया.

तन्वी ने फिर पूछा, “उन की फैमिली नहीं है क्या?”

“उन की फैमिली है,” सुधा ने जवाब दिया, “2 बच्चे हैं, दोनों विदेश में रहते हैं. उन की वाइफ वेल एडुकेटेड हैं और दिखने में भी बहुत सूंदर हैं…”

सुधा पाठक अंकल के बारे में बता रही थी, तभी निशा कमरे में अपने मोबाइल का चार्जर ढूंढती हुई आ गई. उस को देखते ही सुधा ने निशा से पूछा, “अरे, तूने लिस्ट बना ली है न, तुझे बर्थडे पर क्याक्या चाहिए. थोड़ा महंगा ही पसंद किया है न, तूने? और सुन, पाठक अंकल को फ़ोन कर के लिस्ट का सामान लिखवा दे. या फिर व्हाट्सऐप पर लिस्ट भेज दे.”

इस पर निशा ने कहा, “यह आप जानें, कितनी बार मुझे बोल चुकी हो. मैं ने लिस्ट बना ली है, पाठक अंकल को ही फ़ोन करने जा रही थी. तभी पता चला मोबाइल में चार्जिंग ही नहीं है. मैं फ़ोन चार्ज होते ही उन को कौल कर लूंगी. तुम उस की चिंता मत करो.”

“हां, वह तो सब ठीक है लेकिन थोड़ी चिकनीचुपड़ी बातें करना उन से. थोड़ी लच्छेदार समझ, गईं न,” सुधा ने निशा से कहा.

निशा ने कहा, “हां मम्मी, सब मालूम है मुझे, कैसे बात करनी है उन से. हर बार तो बताती हो यह बोलना, वह बोलना. कोई पहली बार थोड़ी न लिस्ट दे रही हूं.

निशा और सुधा की बातें चल ही रही थीं, तभी सुधा के फ़ोन की रिंगटोन बज उठी. सुधा ने फ़ोन उठाया और बोली, “समीर, 5 मिनट रुको न, प्लीज, मैं थोड़ा बिज़ी हूं. आई कौल यू लैटर.” यह कह कर सुधा ने फ़ोन रख दिया. उस ने निशा को कुछ समझाया. फिर निशा चली गई. फिर सुधा ने समीर से करीब 45 मिनट बात की. बात करतेकरते बीच में हंस भी रही थी.

तन्वी सोच रही थी की यह भी कोई बौय फ्रैंड ही होगा दीदी का. तभी तो दूसरे कमरे में जा कर बात कर रही हैं, वह भी इतनी देर से.

समीर से बात कर के सुधा फिर से तन्वी के पास आ कर बैठ गई. बहुत खुश लग रही थी. तन्वी से रहा नहीं गया और उस ने सुधा से पूछ लिया, “समीर भी आप का बौयफ्रैंड है, दीदी?”

“हां रे, मुझ पर जान छिड़कता है. तुझे पता है, वह मेरे लिए ब्रैंडेड हैंडबैग ला रहा है. मुझ से पूछ रहा था कि किस कलर का लाऊं. और भी बहुत सारे गिफ्ट ला रहा है मेरे लिए. मैं ने उस से एक ब्रैंडेड टीशर्ट भी मंगवाई है जिस पर हार्ट बना हुआ हो. वह बोला ले कर आऊंगा,” ये बातें सुधा इतराइतरा कर बता रही थी जैसे उस ने कोई महान काम किया हो, जिस के लिए उस को पुरस्कार मिल रहा हो.

“कौन है ये समीर और क्या करता है?” तन्वी ने पूछा.

“हमारी ही बिल्डिंग में रहता है. मैनेजर की पोस्ट पर काम करता है. उस की सैलरी भी बहुत अच्छी है, दिल खोल कर खर्च करता है. मेरे बिना वह रह नहीं सकता,” सुधा ने कहा.

तन्वी ने पूछा, “विवाहित है या अविवाहित?”

 

इस पर सुधा ने कहा, “विवाहित है. उस के 2 बच्चे भी हैं. मेरे से दसग्यारह साल छोटा है.

 

“उस की वाइफ जौब करती है या हाउसवाइफ है?” तन्वी ने पूछा.

सुधा ने कहा, “वह हाउसवाइफ है, काव्या नाम है उस का. पढ़ीलिखी है. और तो और, सूंदर भी बहुत है, बहुत मौडर्न है.

तन्वी बोली, “अजीब इत्तफाक है न, दीदी. आप के दोनों बौयफ्रैंड की वाइफ पढ़ीलिखी और सुंदर हैं. समीर तुम से दसग्यारह साल छोटा है. उस की उम्र करीब 34 वर्ष है. जवान लड़का है. भले ही उस की शादी हो गई हो लेकिन उस में मैच्योरिटी की कमी है. इस उम्र के लड़के घूमनाफिरना और मौजमस्ती में विश्वास रखते हैं. ताज्जुब तो मुझे पाठक अंकल पर हो रहा है. उन की तकरीबन 35 साल की गृहस्थी है. अच्छा भरापूरा परिवार है. उन की पत्नी भी सूंदर और पढीलिखी हैं. आप दिखने में एकदम साधारण हो. उन की उम्र भी बड़ी है. जिंदगी का काफी अनुभव रहा होगा. काफी मईच्योर भी होंगे. फिर उन को तुम जैसी साधारण दिखने वाली लड़की से अफेयर करने की जरूरत क्यों पड़ी.

“जाहिर सी बात है कि उन की पत्नी सुशील और कुशल गृहिणी होंगी. अच्छी पत्नी न हो, तो इतनी लंबी शादी टिकना नामुमकिन है. मैं तुम से दावे के साथ कह सकती हूं कि पाठक अंकल की जिंदगी में आने वाली तुम पहली औरत नहीं हो. आप से पहले भी उन के कई अफेयर रहे होंगे. तभी तो सिर्फ दोतीन मुलाकातों में ही तुम्हारा अफेयर हो गया. जैसे वे तुम्हारे पहले बौयफ्रैंड नहीं हैं क्योंकि इस के पहले भी तुम्हारे कई बौयफ्रैंड रह चुके है, वैसे ही तुम उन की पहली प्रेमिका नहीं हो सकतीं.”

“यह तू क्या कह रही है?”   सुधा ने तमक के कहा.

इस पर तन्वी बोली, “मैं सही कह रही हूं, दीदी. दोनों की सुंदर पढ़ीलिखी पत्नी होने के बावजूद वर्षों से उन्होंने तुम्हारे साथ चक्कर चला रखा है, अपनी वाइफ को धोखा दे रहे हैं. समीर और पाठक अंकल चरित्रहीन पुरुष हैं या यों कहूं, ठरकी हैं, तो गलत नहीं होगा.”

“इस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि न तो मुझे उन दोनों से प्रेम है और न ही मुझे शादी करनी है. इतना तो मैं भी जानती हूं की उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता. मुझे तो सिर्फ गिफ्ट और पैसों से मतलब है, इस से जयादा कुछ नहीं. मूवी देखने को मिल जाती है, बड़ेबड़े होटलों में डिनर, लंच करने को मिलता है, ब्रैंडेड कपड़े और जो चाहो वह मिल जाता है. मुझे ऐसी ही ऐशोआराम की जिंदगी चाहिए थी.

“इतना ही नहीं, मुझे जितने पैसे चाहिए, मेरे अकाउंट में आ जाते हैं, यहां तक कि जब मैं मम्मीपापा से मिलने आती हूं तो कैब के किराए से ले कर आनेजाने का टिकट भी अंकल कर के देते हैं. मैं सिर्फ एक बार बोलती हूं और सब काम हो जाता है. मेरी चिकनीचुपड़ी बातों में पाठक अंकल आ जाते हैं. थोड़ी झूठी तारीफ कर देती हूं, बस. तारीफ सुन कर वे सातवें आसमान पर पहुंच जाते हैं. मैं उन को आसानी से मूर्ख बना देती हूं. और मेरा काम हो जाता है. उन को लगता है कि सचमुच वे महान इंसान हैं,” यह सब कह कर सुधा हंसने लगी.

तन्वी और सुधा बातें कर रहे थे, तभी डोरबेल बजी. सुधा ने उठ कर दरवाजा खोला, सामने खड़ी लेडी ने जोरजोर से चिल्लाना शुरू किया, “यह सिखाया है तुम ने अपने बच्चों को कि किसी के भी साथ मारपीट करो. और बड़ों के साथ बदतमीजी से बात करो. उन की इंसल्ट करो.” वह औरत लगातार बोले जा रही थी.

सुधा और तन्वी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. तभी सुधा ने चिल्ला कर कहा, “एक मिनट चुप हो जाओ तुम. कौन हो तुम और मेरे यहां आ कर झगड़ा क्यों कर रही हो?”

इस पर वह महिला बोली, “ज्यादा अनजान बनने का नाटक मत करो. अपने बच्चों की करतूतें नहीं जानती हो क्या? यहां सब जानते हैं, सब के साथ वे झगड़ा करते हैं. अभी मेरे बच्चे के साथ मारपीट की है. उसे साइकिल से धक्का दे दिया. वह नीचे गिर गया. और उस के सिर से खून बहने लगा. मेरे पति उस को डाक्टर के पास ले कर गए हैं. तुम अपने बच्चों को संभालो, वरना अच्छा नहीं होगा. अगली बार उन्होंने ऐसा किया तो मैं उन की हड्डीपसली तोड़ दूंगी.”   सुधा गुस्से में बोली, “तुम्हारे बच्चे ने ही कुछ किया होगा. मेरे बच्चे ऐसे नहीं हैं. तुम झूठ बोल रही हो. हम लोग बहुत अच्छे घर से हैं, तुम्हारी तरह नहीं हैं.”

वह महिला गुस्से से आगबबूला हो गई, “हमारी तरह नहीं हो, इस का क्या मतलब है तुम्हारा? तू कैसी औरत है, पूरी सोसायटी जानती है. ज्यादा सतीसावित्री होने का ढोंग मत कर. और तेरे बच्चे कितनी बिगड़ैल औलादें हैं, पूरी दुनिया जानती है. तेरी जो शानोशौकत है, उस का पूरा राज भी मुझ को पता है, इसलिए मेरे मुंह लगने की गलती मत करना वरना पछताएगी.”

इतना सुनते ही सुधा अपना आपा खो बैठी. उस ने उस महिला को जोर से धक्का दिया. इस पर उस महिला ने सुधा के मुंह पर जोर से एक थप्पड़ मारा. और बाल पकड़ कर दीवार की तरफ धक्का दिया और जोर से एक लात मारी. सुधा और वह महिला लगातार मारामारी कर रही थीं. दोनों में से कोई भी रुकने का नाम नहीं ले रहा था. बिल्डिंग के बाकी लोग इन को रोकने के बजाय लड़ाई का मजा ले रहे थे. और, उस महिला को और सुधा को उकसा रहे थे. उन में से एक आंटी बोल रही थीं, ‘मार और मार. इस ने और इस के बच्चों ने नाटक मचा रखा है.’ तन्वी को समझ नहीं आ रहा था कि इन की लड़ाई कैसे रोके. बीचबचाव करते हुए यदि उस को एकाध थप्पड़ या लात पड़ गई तो? उन के बीच घमासान चालू था. उस ने वहीं खड़ी एक महिला को मदद के लिए इशारा किया. और बड़ी मुश्किल से उन का झगड़ा रोका.

जातेजाते वह महिला सुधा से बोली, “तेरे को तो मैं देख लूंगी. तेरे को इतनी आसानी से छोडूंगी नहीं मैं. तेरे घर मैं तेरे बच्चों की शिकायत ले कर आई थी. और तूने मेरे साथ मारपीट की. तेरी ईंट से ईंट बजा दूंगी. वह औरत सुधा को धमकी दे कर चली गई.

सुधा और तन्वी घर में आ गए. सुधा कुछ लंगड़ा कर चल रही थी. उस औरत ने लात जोर से मारी थी. उस को लंगड़ाता देख कर तन्वी बोली, “क्या हुआ, दीदी?”

सुधा ने कहा, “अरे, उस औरत ने लात बहुत जोर से मारी थी. इसलिए थोड़ा चलने में दिक्कत हो रही है, बस.”

वह औरत बहुत हट्टीकट्टी थी. लात तो जोर से ही पड़ी होगी. यह सोच कर न चाहते हुए भी तन्वी अपनी हंसी रोक न पाई. और हंस पड़ी. उस ने सुधा से कहा, “दीदी, यह लड़ाईझगड़ा, मारपीट करना क्या आप को शोभा देता है? आप के बच्चे आप का ही अनुसरण करेंगे.”

इतने में पिंटू और निशा घर पर आ गए. “कहां रह गए थे तुम लोग?” सुधा ने बच्चों से पूछा.

पिंटू बोला, “हम तो घर ही आ रहे थे लेकिन जब आप को उन आंटी के साथ मारपीट करते देखा तो हम लोग डर कर भाग गए. कहीं वे आंटी हमारी भी पिटाई न कर दें.”

“ऐसे डरने की जरूरत नहीं है. अगली बार वह झगड़ा करे तो उस की जम कर पिटाई करना. मैं देख लूंगी वह क्या करती है. अभी तुम हाथपैर धो कर कपड़े बदल लो,” सुधा बोली.

बच्चों ने स्वीकृति में सिर हिलाया और चले गए. अब तन्वी ने सुधा से कहा, “दीदी, यह क्या उलटासीधा पाठ बच्चों को सिखा रही हो? उन्हें लड़ाईझगड़ा करने से रोकने के बदले आप उन्हें उकसा रही हो. और वैसे भी, उन की हमेशा, चाहे स्कूल हो या तुम्हारी सोसायटी, शिकायतें आती ही रहती हैं. अभी तो वे बच्चे हैं लेकिन यह यदि उन की आदत ही बन गई तो बड़े होने के बाद भी उन का लड़ाईझगड़ा करना चालू रहेगा.”

इस पर सुधा बोली, “यह अपना ज्ञान अपने पास रख. मुझे मालूम है बच्चों की परवरिश कैसे करना है और उन को क्या सिखाना है और क्या नहीं.”

तन्वी सोचने लगी, अंधे के आगे रोना और अपने नैन खोना. इन को कुछ भी समझाना बेकार ही होगा. उस ने चुप रहना उचित समझा.

तन्वी को सुधा के घर पर अच्छा नहीं लग रहा था. उन के घर का वातावरण भी उसे ठीक नहीं लग रहा था. वह तो सुधा के पास यह सोच कर आई थी कि कुछ दिन दीदी के साथ रहेगी तो थोड़ा चेंज हो जाएगा. और फिर बच्चे भी घर पर नहीं थे. उस ने सोचा कि अब उसे अपने घर चले जाना चाहिए. वैसे भी, जब से वह आई है, दीदी औपचारिकता ही अपना रही है, अपनेपन का तो कोई नामोनिशान ही नजर नहीं आ रहा. उस को काम में बिजी कर देती है और फिर मोबाइल पर घंटों समीर, पाठक अंकल और न जाने किसकिस से बातें करती रहती है. और तो और, सुबह दूधब्रेड लेने जाती है तो किसी बाइक वाले पर फ़िदा हो गई. पता नहीं और कितने गुल खिलाएगी.

तन्वी ने अपना पहले वाला टिकट रद्द कर दिया. उस के हिसाब से उसे और 8 दिन रुकना पड़ता. वह जल्दी से जल्दी दीदी के घर से जाना चाहती थी. इसलिए अगले दिन के लिए टिकट बुक करने लगी. लेकिन अगले दिन का टिकट उपलब्ध नहीं था. इसलिए उस ने परसों का टिकट बुक कर लिया. और यह बताने के लिए वह सुधा के पास जा रही थी, तभी निशा ने सुधा को आवाज लगाई और कहा, “मम्मी, आप के लिए फ़ोन है.”

“किस का फ़ोन है?” सुधा ने बाथरूम के अंदर से ही पूछा.

“समीर अंकल का,” निशा ने कहा. इतने में मोबाइल पर गेम खेलते हुए पिंटू ने हंसते हुए कहा, “समीर हवा का झोंका” तो  निशा भी हंसने लगी. दोनों ने एकदूसरे के हाथ पर हाथ मारा और फिर और जोरजोर से हंसने लगे.

तन्वी खड़े रह कर यह सब चुपचाप देख रही थी. दीदी तो अब समीर से बात करेंगी, यह सोच कर वह अपने कमरे में जाने लगी. फिर उस को खयाल आया कि कल मार्केट भी जा कर बच्चों के लिए गिफ्ट लेने हैं, पैकिंग भी करनी है. दीदी को टिकट के बारे में बताना भी जरूरी है. उस को सामने देख कर दीदी समीर से जल्दी बात कर के भी फ़ोन रख सकती हैं, नहीं तो डेढ़दो घंटे करेंगी.

सुधा समीर से बात कर रही थी. तन्वी को उन की बातें सुनने में कोई रुचि नहीं थी. बेमन से वहां बैठी थी वह. तभी सुधा ने समीर से जो कुछ कहा वह सुन कर तन्वी चौँक गई. वह समीर से कह रही थी कि अभी हम मार्केट गए थे, व हां मैं ने तुम्हारी पत्नी काव्या को किसी अनजान आदमी से बातें करते देखा. उस के साथ हंसहंस कर बातें कर रही थी. हम ने साड़ी शौपिंग कर ली लेकिन फिर भी वह वहीं खड़े रह कर बातें करती रही. मेरी बहन भी साथ में थी, इसलिए ज्यादा देर मैं रुक न सकी. वे दोनों क्या बातें कर रहे थे, इस का पता नहीं चल सका. हम लोग घर आए, तब तक वह वहीं थी. अभी घर आई है कि नहीं, यह पता नहीं. जरूर उस का बौयफ्रैंड ही होगा. वह तो आज मैं ने इत्तफाक से देख लिया. पता नहीं और कितनी बार मिली होगी उस से.

Sumbul Touqeer Khan ने खरीदा नया घर, हाउस पार्टी में पहुंचीं बिग बॉस की मंडली

बिग बॉस 16 से बाहर आते ही अदाकारा सुंबुल तौकिर खान ने एक नया घर खरीदा. जिसकी झलक अदाकारा ने अपने सोशल मीडिया हैंडल के जरिए फैंस को दिखाई है. अदाकारा ने अपने नए घर में दोस्तों के लिए हाल ही में एक पार्टी रखी थी. जिसमें उनके करीबी दोस्त हिस्सा लेने पहुंचे थे. इमली स्टार सुंबुल तौकिर खान के इस नए घर की पार्टी में बिग बॉस 16 की मंडली के सदस्य भी नजर आए. यहां शिव ठाकरे और निमृत कौर आहलूवालिया भी पहुंचे थे. हालांकि इस पार्टी में एक्ट्रेस के बेस्ट फ्रेंड फहमान खान नहीं नजर आए.

 

 

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सुंबुल तौकिर खान ने दिखाई अपने नए घर की पार्टी की तस्वीरें

अदाकारा सुंबुल तौकिर खान ने अपने नए घर पर रखी इस पार्टी की तस्वीरें फैंस के साथ सोशल मीडिया पर शेयर की हैं. जिसमें वो बेहद खुश नजर आईं.

खुशी से चौड़ा हो गया था सुंबुल के पापा का सीना

इस तस्वीर में सुंबुल तौकिर खान के पिता अपनी बेटी की कामयाबी पर बेहद खुश नजर आए. तस्वीर में सुंबुल के पापा के चेहरे पर खुशी देखते ही बन रही थी

 

 

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सुंबुल तौकिर खान खुशी-खुशी बयां कर ही थी हरेक बात

अदाकारा सुंबुल तौकिर खान खुद भी इस मौके पर बेहद खुश थीं. एक्ट्रेस अपने घर से जुड़ी बातें दोस्तों को बताती दिखीं

सुंबुल तौकिर खान के घर पहुंचे थे शिव ठाकरे

अदाकारा सुंबुल तौकिर खान की इस पार्टी में उनके बिग बॉस 16 के दोस्त शिव ठाकरे भी पहुंचे थे. यहां दोनों ने ढेर सारी मस्ती की.

 

निमृत कौर आहलूवालिया ने भी मारे सुंबुल संग पोज

अदाकारा सुंबुल तौकिर खान की इस पार्टी में अदाकारा निमृत कौर आहलूवालिया भी पहुंची थीं. अदाकारा निमृत ने पार्टी में सुंबुल संग खूब रंग जमाया

 सुंबुल तौकिर खान को दोस्तों ने दी नए घर की बधाई

अदाकारा सुंबुल तौकिर खान को इस दौरान उनके दोस्तों ने ढेर सारी बधाई दी. इस दौरान अदाकारा के घर पर उनके कई दोस्त पहुंचे थे.

 

 

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सुंबुल तौकिर खान के दोस्त भी थे बेहद खुश

सुंबुल तौकिर खान के नए घर की पार्टी में उनके सभी दोस्त खुश नजर आए थे. अदाकारा की ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर आते ही छा गईं.

 

मीठी परी: भाग 1- सिम्मी और ऐनी में से किसे पवन ने अपनाया

प्रकृति की अद्भुत देन नर और मादा न होते तो इस संसार का विकल्प कुछ और ही होता. स्त्रीपुरुष की देन के साथ कितना कुछ जुड़ा है- दिमाग की सोचविचार, भाषा, भंगिमा, प्रेम प्रदर्शन, दिशा, सहमति, समर्पण, उत्पत्ति, आनंद आदि. जन्मदात्री स्त्री का तो हृदय परिवर्तन ही हो जाता है जब वह अपने शरीर से उपजे नन्हे शरीर को पहली बार छूती है. पनपती है एक अनुभूति ममता.

रमा ने अपने दोनों बेटों नयन और पवन को पति के सहयोग से जो दिशा दी, उस का परिणाम सामने है. बड़ा बेटा नयन सेना में है. फिलहाल असम में तैनात है. छोटा बेटा पवन इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर विदेश में नौकरी करने के लिए जाने की तैयारी में है.

पिता दोनों को देखते हैं तो गर्व से फूले नहीं समाते, अपने जवान बेटों पर. और अब तो एक और खुशखबरी है, बिग्रेडियर बक्शी की बेटी संजना का नयन से शादी का प्रस्ताव. न कहने की कोई गुंजाइश नहीं. दोनों ओर से हां होते ही रस्मोरिवाज, लेनदेन का सिलसिला चलता रहा. शादी 6 महीने बाद होनी तय हुई.

नयन की शादी घर की पहली शादी थी, सो वे पतिपत्नी तैयारी की योजना में लग गए, होने वाली बहू के लिए गहनेकपड़ों के अलावा देनेलेने के लिए गिफ्ट्स, अतिथियों की लिस्ट, बाजेगाजे, पार्टी का प्रबंध आदि.

अचानक काला साया एक रात नयन के पिता को ले चला. औफिस से थोड़ा पहले घर आ, रमा को थोड़ा थका बता, आराम करने लेटे. जबरदस्ती चाय के साथ हलका नाश्ता करा रमा उन के माथे पर हलका स्पर्श दे, सहलाती रही जब तक वे सो नहीं गए. कंधे तक चादर ओढ़ा, थोड़ी देर उन के पास बैठी रही, फिर शाम का खाना बनाने के लिए उठ गई. दोनों बेटे भी घर आ कर पिता के आराम में बाधा न डालने की सोच, दबेपांव जा उन्हें सोता देख लौट आए.

नयन के कहने पर कि उन्हें आराम करने दें, रमा ने थोड़ा सा बच्चों के साथ खा लिया और कमरे में लौटी. पति को सोते में न जगाया जाए, यह सोच वह दूसरी चादर ले, पास चुपचाप लेट गई. बारबार उठ, बिस्तर के दूसरे कोने में दूसरी ओर लेटे पति को रात की मद्धिम लाइट में शांत सोते देख उन के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती रही. जब नींद ही नहीं आ रही तो उठा जाए, सोच कर रमा रसोई में जा कर अपने और पति के लिए चाय बना लाई.

धीरे से पति को आवाज दी, फिर हिलाया. माथा, मुंह, बांहें छू कर जो समझी, तो चीख मार बच्चों को आवाज दी. पता नहीं कब उस के पति इस दुनिया से चले गए थे. डाक्टर ने उन की मृत्यु का कारण घातक हार्टअटैक बताया जो कई घंटे पहले आ चुका था. बेटों ने खुद को, मां को संभालते हुए सब को सूचना दी व पड़ोसियों की सहायता से पिता के दाहसंस्कार की तैयारी व बाकी के प्रबंध में लग गए.

रमा के मायके से भाईभाभी ने पहुंच, उसे संभाला. नयन की होने वाली ससुराल वालों व और सब के आने पर शाम जब क्रियाकर्म करवा लौटे तो रुदन की दिल हिलाने वाली आवाजों से घर का कोनाकोना रो रहा था. रमा को कौन समझाए. बेटे की होने वाली शादी की कहां तो वह खुशीखुशी पति के साथ मिल सब तैयारियां कर रही थी और आज उन के बिना कोने में बैठी कितनी उदास व निरीह सी बैठी थी. शादी अब पति की बरसी होने तक टाल दी गई थी.

संजना के पिता ब्रिगेडियर बक्शी के प्रयत्न से नयन की 6 महीने की अपातकालीन छुट्टी का प्रबंध कर दिया गया था ताकि वह अपनी मां के पास रह, उसे इस दुख से उबार सके. समझदार रमा ने इस नियति की मार से उबरने का प्रयास कर अब अकेले ही अपनी हिम्मत जुटा, बच्चों के प्रति अपनी ममता व कर्तव्य को जानते हुए व्यस्त रहती. बेटे उस का पूरा ध्यान रखते.

अभी 2 महीने ही बीते थे कि पवन को सूचना मिली कि उसे यूनाइटेड किंगडम की एक अच्छी कंपनी में तुरंत जौब करने का औफर है. बच्चों के भविष्य को समझते हुए रमा ने हां कह उसे तुरंत जाने की तैयारी करने को कहा. पवन अपने बड़े भाई नयन की होने वाली पत्नी यानी अपनी भाभी संजना से मिलने गया, लंदन जाने के बाद इतनी जल्दी भाई की शादी पर आना हो पाए या नहीं. मां का मन चिंतित व उदास हुआ यह सोच कर कि बच्चा इतनी दूर जा रहा है, फिर मैं उसे देख भी पाऊंगी. पति की अकस्मात मृत्यु से ऐसे विचार आना स्वाभाविक थे. उस के जाने के दिन रमा के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

खुले विचारों वाले पवन को लंदन पहुंच कर अच्छा लगा. कंपनी की तरफ से छोटा सा सुंदर अपार्टमैंट मिला और कार की भी सुविधा थी. उस ने अपने साथ काम करने वाले सहयोगियों से जल्दी दोस्ती गांठ ली, विशेषकर लड़कियों से. फुर्तीला, काम में अच्छा, व्यवहार में विनम्र, अच्छे कपड़े पहनने का शौकीन पवन जहां जाता, अपनी जगह स्वयं बना लेता.

वहां लोग फ्राइडे शाम को कुछ ज्यादा ही रिलैक्स्ड रहते हैं. पब पीने वालों से भरे होते और सड़कें मस्त जोड़ों से. कौन पत्नी है और कौन गर्लफ्रैंड क्या जानना, बस बांहों में बांहें डाले मौजमस्ती करते जीवन का भरपूर आनंद उठाते कितने ही जोड़े दिखते. पवन भी पब में शुक्रवार की शाम बिताता और वहां एक लड़की को कोने में अकेली आंखें नीचे किए बैठी बियर पीते देखता.

एक शुक्रवार को पवन से रहा नहीं गया. अपना बियरभरा गिलास लिए उस के पास की दूसरी कुरसी पर लगभग बैठता हुआ पूछ बैठा, ‘‘डू यू माइंड इफ आई…’’ पलकें उठा, उस की ओर देखते, वह बोली, ‘‘इट्स ओके.’’

बस 10 मिनट ही लगे पवन को उस लड़की के बारे में जानने में. पिछले महीने ही 2 वर्षों से साथ रहते बौयफ्रैंड से ब्रेकअप हुआ था. कारण, अपनी बीमार मां को साथ लाना. ‘‘सौरी टू नो दैट.’’ कहा तो ऐनी ने आंखें उठा देखा जिस में छिपा दर्द साफ झलक रहा था. ऐनी ने उस के बारे में कुछ नहीं पूछा. यह सिलसिला केवल शुक्रवार मिलने से अब रोज मिलने पर आ गया.

पवन ने एक इतवार ऐनी को बाहर लंच पर बुलाया और बाद में कौफी के लिए घर ले आया. अपार्टमैंट में चीजें बिखरी पड़ी थीं, अकेला रहता था, कौन देखने आने वाला है. इंडिया में घर को ठीकठाक रखना तो नौकर का काम होता था. अब यह कौफी का नया दौर चला तो हर शनिवार वह घर व रसोई ठीक कर लेता.

3 बार के बाद ऐनी ने कहा कि अगली बार लंच वह बना कर लाएगी. चीज से बने पकवान और रोस्टेड चिकन दोनों ने भरपूर आनंद ले खाया. टीवी पर मूवी देखी. शाम की कौफी बाहर गैलरी में बैठ पी. ठंडी हवा का आनंद लिया और अब रात घिर आई थी. न तो ऐनी का घर जाने का मन था और न ही पवन उसे जाने देना चाहता था. एक ही बार रुकने को कहा तो ऐनी ने दोनों हाथों से उस का चेहरा पकड़, आंखों में झांकते कहा, ‘ठीक है’. पवन को जैसे आंखों ही आंखों में ऐनी की इजाजत मिल गई.

हमेशा की तरह मां अपने बेटे से बात कर उस की खबर लेती रहती. पर इस बार सामने पड़ा फोन बजता रहा, पवन ने नहीं उठाया. वह मां को नई खबर नहीं देना चाहता था.

अगले हफ्ते ऐनी अपना सामान ला पवन के साथ रहने आ गई. अंधा क्या मांगे, दो आंखें. बिखरा सामान ठिकाने लग गया. सुबह का नाश्ता दोनों इकट्ठे बैठ कर खाते. शनिवार पब जाने और बाहर खाना खा कर आने का रूटीन बन गया. इतवार घर में रह मस्ती होती और अब पवन ने भी कुछकुछ पकाना सीख लिया था. शाम की कौफी बनाना अब उस की जिम्मेदारी थी.

अब पवन मां को स्वयं फोन कर थोड़ी सी बातें कर लेता, लेकिन अभी तक ऐनी की कोई चर्चा नहीं की. मां की बारबार शादी की बात वह यह कह कर टाल जाता कि अभी वह और अच्छी नौकरी की तलाश में है.

मां उसे कुछ समय के लिए वापस घर बुला रही थी. पिता की बरसी करनी थी और फिर एक महीने बाद नयन की संजना से शादी थी. रमा की भाभी उस के पास रहने व सहारा देने आ गईं. कहा जाता है कि सब काम समय पर होते चलते हैं. बस, जाने वाला ही चला जाता है. सब के प्रयत्न से शादी अच्छी हो गई. पर रमा बारबार होती गीली आंखों के आंसुओं को अंदर ही रोके रही, शगुन का काम था.

कुछ दिन मायके और ससुराल रह संजना नयन के साथ असम चली गई. नयन मां को अकेला छोड़ कर नहीं जाना चाहता था पर मां ने सब यादों को समेटे अपने घर में ही रहना तय किया. संजना कभीकभी फोन कर देवर का हाल जानती रहती थी.

उधर, ऐनी व पवन के बीच सब ठीक चल रहा था, कभी छुट्टियां ले दोनों कहीं घूम आते. देखतेदेखते 10 महीने बीत गए. मां ने इस बार पवन को खुशखबरी देते संजना के गर्भवती होने की बात बताई.

आगे पढ़ें- ऐनी यह सब सोचते हुए परेशान थी. वह…

लेखिका- वीना त्रेहन

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