होली के बारें में अभिनेत्री श्रद्धा कपूर क्या कहती है, पढ़े इंटरव्यू

मुझे हिंदी फिल्मे देखना सबसे अधिक पसंद है. मेरी फेवोरिट फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ जैसी फॅमिली टाइप फिल्मे मुझे अधिक पसंद है. मनोरंजन फिल्म की मुख्य पार्ट होनी चाहिए और मैं भी उन्ही फिल्मों को अधिकतर देखती हूँ, जिसमे मनोरंजन अधिक हो. फिल्मे देखने हॉल में जाना और पॉपकॉर्न और परिवार के साथ उसे एन्जॉय करना ही मुझे पसंद है, कहती है, मुंबई की जुहू इलाके में रहने वाली अभिनेत्री श्रद्धा कपूर, जो शिवांगी कोल्हापुरे और शक्ति कपूर की बेटी है.बचपन से ही फ़िल्मी माहौल में पैदा हुई श्रद्धा कपूर को बचपन से अभिनय का शौक था.

सीखा उतार-चढ़ाव से

उसे पहला ब्रेक फिल्म ‘तीन पत्ती’ से मिला. फिल्म चली नहीं, पर श्रद्धा को तारीफे मिली, इसके बाद ‘लव का दि एंड’ आई, जो सफल नहीं थी.ऐसे में ‘आशिकी 2’ उसके जीवन की टर्निंग पॉइंट बनी और रातों रात उसकी जिंदगी बदल गयी.श्रद्धा शांत स्वभाव की है और सोच समझकर फिल्में चुनती है. फिल्म न चलने पर उसे खुद पर ही गुस्सा आता है. वह हर नए चरित्र को करना पसंद करती है. उन्होंने अपनी 12 साल की जर्नी में बहुत कुछ सीखा है. वह कहती है कि मैने अपने काम को सबसे अधिक प्यार करना सीखा. उतार-चढ़ाव कैरियर में आते है, लेकिन काम से प्यार होने पर उसपर अधिक फोकस होना संभव नहीं. मैं अच्छी फिल्मे और चुनौतीपूर्ण फिल्मों में काम करने की इच्छा रखती हूँ.

 

 

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उम्र के साथ बढती है अनुभव

अपनी कामयाबी का श्रेय वह अपने पेरेंट्स को देती है और मानती है कि माता-पिता ने हमेशा उन्हें हर वक्त सहारा दिया है. आज भी श्रद्धा अपने पेरेंट्स के साथ रहती है और अकेले रहना पसंद नहीं करती. हमेशा वह उनके साथ ही रहना चाहती है. श्रद्धा को बागीचा, पौधे. पेट्स बहुत प्रिय है. मसाला चाय उनके जीवन का प्रिय है, जिसे उनके घर पर देसी तरीके से बनाने पर पीती है और अपने जीवन में कभी छोड़ नहीं सकती. जिसे वह एक खास कप में पीती है. श्रद्धा उस कप को सालों से सम्हाल कर रखा है और चाय पीने के बाद खुद धोती है. उम्र श्रद्धा के लिए बहुत खास नहीं होती, एक नंबर होती है, जिसमे व्यक्ति खुद को एक अनुभवी मानने लगता है. वह कहती है कि हर व्यक्ति की एक बायोलॉजिकल और मेंटल ऐज होती है. मुझे कुछ लोग अजीबाई (नानी- दादी) कहते है, जबकि मेरी माँ हमेशा मुझसे पूछती है कि मैं बड़ी कब होउंगी. इस तरह कोई मुझे मेच्योर तो कोई मुझे एकदम बच्ची मानते है. असल में मैं पेरेंट्स को बहुत अधिक ज्ञान देती हूँ.

अभी उनकी फिल्म ‘तू झूठी मैं मक्कार’ रिलीज पर है, जिसे लेकर श्रद्धा बहुत उत्साहित है, क्योंकि इसमें पहली बार उनके साथ अभिनेता रणवीर कपूर है. इसमें श्रद्धा ने किसिंग सीन्स से लेकर बिकिनी सीन्स भरपूर दिए है. साथ ही इसमें उनकी भूमिका फ्रंटफुट लेने वाली आज की लड़की की है, जिसे किसी बात का डर नहीं और बिंदास है. ये चरित्र उनके लिए खास और अलग है. श्रद्धा ने अपनी जर्नी के बारें में बात की जो बहुत रोचक रही.

 

 

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झूठ बोलना है मुश्किल

श्रद्धा ने कई बार झूठ का सहारा लिया है, वह हंसती हुई कहती है कि मैंने एक बार अपनी फ्रेंड से पेपर लेकर एग्जाम दिया और बहुत अच्छे मार्क्स थे, क्योंकि मुझे प्रश्न मालूम थे. टीचर को मेरे इतने अच्छे नंबर देखकर शक हुआ मुझे बुलाया और मैंने सारी बातें उन्हें बता दी. मेरी चोरी पकड़ी जाने पर मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई और मैंने मेहनत कर अच्छे मार्क्स आगे लाइ. मैं बहुत बुरी झूठी हूँ, झूठ बोलने पर पसीना आता है. सबको पता चल जाता है कि मैं झूठ बोल रही हूँ. पेरेंट्स के आगे तो मैं कभी झूठ नहीं बोल पाती हकलाने लग जाती हूँ.

हुआ अनुभव हार्ट ब्रेक का

जिंदगी में मक्कार बॉयफ्रेंड मिलने के बारें में पूछे जाने पर श्रद्धा कहती है कि हर किसी को एक मक्कार बॉयफ्रेंड लाइफटाइम में अवश्य मिलता है, हार्ट ब्रेक का अनुभव हर किसी को हुआ होगा, ऐसे में फ्रेंड से मिलना, परिवार से बातचीत करना, काम पर लग जाना आदि करना पड़ता है, सबसे अधिक खुद की शोल्डर होती है, जिसमे खुद को ही समझाना पड़ता है, फिर इससे निकलना आसान होता है.

विरासत में मिली संगीत

श्रद्धा कपूर एक गायिका भी है, यह उन्हें परिवार से विरासत में मिला है. वह कहती है कि एक्टिंग मेरा पैशन है, लेकिन जब मुझे पता चला कि मैं गाना भी गा सकती हूँ, तो बहुत ख़ुशी हुई. मेरी माँ गाती है और लता मंगेशकर मेरी मासी है. म्यूजिक मेरे परिवार में है. बचपन से मैंने माँ और मासी को गाते हुए भी देखा है. मैं आज भी किसी अवसर पर गाना पसंद करती हूँ और आगे मैं संगीत पर भी कुछ करने की इच्छा रखती हूँ.

 

 

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चैलेंजेस है कई

श्रद्धा कहती है कि मेरी जर्नी में चुनौतियां बहुत है और ये अच्छा होता है. ये हर किसी के जीवन का हिस्सा होती है,पर इसे कैसे आप लेते है,यह आप पर निर्भर करता है. इससे बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है. आज मैने समझ लिया है कि असफलता से घबराना नहीं है. मेरे शुरू की दो फिल्में फ्लॉप रही,लेकिन ‘आशिक़ी 2’ की सफलता की वजह से मैं लोगो की पसंदीदा बनी. असफल फिल्मों की दौर से निकलने में मुझे कुछ समय लगा था. हर फिल्म हमेशा सफल हो ये संभव नहीं होता,लेकिन फिल्म के बनने की प्रोसेस को मैंने हमेशा से एन्जॉय किया है.मेहनत पूरी करती हूँ, दर्शकों को फिल्म पसंद नहीं आती,तो ख़राब लगता है. श्रद्धा कपूर मानती है कि उनके परिवार ने उन्हें जो कुछ दिया है, उसकी भरपाई संभव नहीं , लेकिन वह जितना हो सके उन्हें खुश रखने की कोशिश करती है. इंडस्ट्री ने बहुत कुछ दिया है. मेरे सपने सच इस इंडस्ट्री की वजह से हुआ है. इसके अलावा मेरे पूरे परिवार ने मुझे हमेशा किसी भी परिस्थिति में मेरा साथ दिया है.

मजेदार त्यौहार है होली

होली के बारें में श्रद्धा का कहना है कि होली एक मजेदार त्यौहार है और अभी मैं अधिक रंग नहीं खेलती, पर बचपन की यादें बहुत मजेदार है. ललित मोदी का बंगला मेरे बिल्डिंग के नीचे थी, मैं ऊपर से रंग वाले वाटर बैलून अपने फ्रेंड के साथ मिलकर उनके स्विमिंग पूल और घर पर फेंकती थी. पूल लाल कर देती थी. वहां पार्टी होती थी, मुझे वहां जाने की इच्छा होती थी. इस अवसर पर पूरनपोली बनाई जाती है, जो मुझे पसंद है. इस त्यौहार पर शरीर और चेहरे से रंग निकालना एक मुश्किल बात होती है.

 

 

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महिलाओं के लिए मेसेज

वह कहती है कि बनावटी चीजो पर अधिक ध्यान न दे, इससे आपका आत्मविश्वास कम होता है. खूबसूरती के अलावा जो आपकी खूबी है, उसे हमेशा निखारे,अपने आप को कभी कमतर न समझे.सुंदर दिखने के अलावा बहुत सारे दूसरे फैक्टर्स है, जो आपको सुंदर बना सकते है. रंग,कद-काठी ये सब सुन्दरता की परिभाषा नहीं हो सकती.

अनुज की चाहत में दीवानी हुई माया, अब छोटी अनु को मोहरा बनाकर रचेगी घिनौना शड्यंत्र

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना यानी टीवी के अनुज और अनुपमा #MaAn के फैंस इन दिनों काफी परेशान हैं. क्योंकि दोनों के बीच माया आ चुकी है. टीवी शो ‘अनुपमा’ में अब तक हमने देखा कि माया को अनुज से प्यार हुआ जिसके बाद उसने अनुज के करीब आने की कोशिश की. उसे कपाड़िया हाउस में अनुपमा की जगह लेने की कोशिश की. लेकिन उसका सच अब सबके सामने आ चुका है. काव्या ने महाशिवरात्रि की पूजा के दौरान माया का सच शाह और कपाड़िया परिवार के सामने ला दिया. जिसके बाद अब माया अनुज को पाने के लिए एक घिनौना शड्यंत्र रचने वाली है. आइए जानिए हैं आज 6 मार्च के एपिसोड में क्या ट्विस्ट आने वाला है.

 

अनुज को होगा गिल्टी फील

‘अनुपमा’ में आज के एपिसोड में दिखाया जाएगा कि माया का सच जानने के बाद अनुज गिल्टी फील करता है कि उसने अनुपमा को पिकनिक वाली बात नहीं बताई. लेकिन अनुपमा को अपने अनुज पर पूरा भरोसा है. इसलिए दोनों के बीच सब ठीक हो जाएगा. इसी बीच माया फिर मगरमच्छ के आंसू बहाकर दोनों को अपनी बातों में बहलाने की कोशिश करेगी.

 

माया ने दी अनुज को वादे की दुहाई 

माया का सच जानकर बरखा और अंकुश, अनुज और अनुपमा से कहेंगे कि अब माया को घर से बाहर कर दें. बरखा कहती है कि वह माया की ये साजिश पहले से समझ रही थी, अगर वह रहेगी तो अनुज और अनुपमा के बीच झगड़े बढ़ जाएंगे. लेकिन घर से बाहर जाने की बात सुनकर माया कहेगी कि अनुज ने उससे एक महीने और रुकने देने का वादा किया है. लेकिन अनुज कहता है कि जब उसने वादा किया था तब वह माया का सच नहीं जानता था. अनुज और अनुपमा माया से जाने के लिए कहेंगे.

 

माया ने अनुज-अनुपमा को किया ब्लैकमेल 

ऐसे में जब माया की एक न चली तो वह अपने असली रूप में सामने आएगी और अनुज अनुपमा को धमकी देना और ब्लैकमेल करना शुरू कर देगी. वह कहेगी कि वह जाएगी तो अकेले नहीं बल्कि छोटी अनु को भी लेकर जाएगी. क्योंकि वह उसकी बायोलॉजिकल मदर है, इसलिए दुनिया का कोई कानून उसे उसकी बेटी से अलग नहीं कर सकता. ये बात सुनकर अनुज और अनुपमा के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. लेकिन अनुज कहता है कि अनु से उसे कोई दूर नहीं कर सकता. अनुज और अनुपमा को टेंशन हो जाएगा.

जो भी प्रकृति दे दे – भाग 2

‘‘सच पूछो तो मुझे विकास पर तरस आने लगा है. मैं ने तो अपना सब एक हादसे में खो दिया. जिसे कुदरत की मार समझ मैं ने समझौता कर लिया लेकिन विकास ने तो अपने हाथों से अपना घर जला लिया.’’

कहतेकहते न जाने कितना कुछ कह गए सोम. अपना सबकुछ खो देने के बाद जीवन के नए ही अर्थ उन के सामने भी चले आए हैं.

दूसरे दिन जांच में और भी सुधार नजर आया. डाक्टर ने बताया कि इस की पूरी आशा है कि निशा का एक और छोटा सा आपरेशन कर प्राकृतिक मल द्वार खोल दिया जाए और पेट पर लगी थैली से उस को छुटकारा मिल जाए. डाक्टर के मुंह से यह सुन कर निशा की आंखें झिलमिला उठी थीं.

‘‘देखा…मैं ने कहा था न कि एक दिन तुम नातीपोतों के साथ खेलोगी.’’

बस रोतेराते निशा इतना ही पूछ पाई थी, ‘‘खाली गोद में नातीपोते?’’

‘‘भरोसा रखो निशा, जीवन कभी ठहरता नहीं, सिर्फ इनसान की सोच ठहर जाती है. आने वाला कल अच्छा होगा, ऐसा सपना तो तुम देख ही सकती हो.’’

निशा पूरी तरह स्वस्थ हो गई. पेट पर बंधी थैली से उसे मुक्ति मिल गई. अब ढीलेढाले कपड़े ही उस का परिधान रह गए थे. उस दिन जब घर लौटने पर सोम ने सुंदर साड़ी भेंट में दी तो उस की आंखें भर आईं.

विकास नहीं आए जबकि फोन पर मैं ने उन्हें बताया था कि मेरा आपरेशन होने वाला है.

‘‘विकास के बेटी हुई है और गायत्री अस्पताल में है. मैं ने तुम्हारे बारे में विकास से बात की थी और वह मनु को लाना भी चाहता था. लेकिन मां नहीं मानीं तो मैं ने भी यह सोच कर जिद नहीं की कि अस्पताल में बच्चे को लाना वैसे भी स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं होता.’’

क्या कहती निशा. विकास का परिवार पूर्ण है तो वह क्यों उस के पास आता, अधूरी तो वह है, शायद इसीलिए सब को जोड़ कर या सब से जुड़ कर पूरा होने का प्रयास करती रहती है.

निशा की तड़प पलपल देखते रहते सोम. विकास का इंतजार, मनु की चाह. एक मां के लिए जिंदा संतान को सदा के लिए त्याग देना कितना जानलेवा है?

‘‘क्यों झूठी आस में जीती हो निशा,’’ सोम बोले, ‘‘सपने देखना अच्छी बात है, लेकिन इस सच को भी मान लो कि तुम्हारे पास कोई नहीं लौटेगा.’’

एक सुबह सोम की दी हुई साड़ी पहन निशा कार्यालय पहुंची तो सोम की आंखों में मीठी सी चमक उभर आई. कुछ कहा नहीं लेकिन ऐसा बहुत कुछ था जो बिना कहे ही कह दिया था सोम ने.

‘‘आज मेरी दिवंगत पत्नी विभा और गुड्डी का जन्मदिन है. आज शाम की चाय मेरे साथ पिओगी?’’ यह बताते समय सोम की आंखें झिलमिला रही थीं.

सोम उस शाम निशा को अपने घर ले आए थे. औरत के बिना घर कैसा श्मशान सा लगता है, वह साफ देख रही थी. विभा थी तो यही घर कितना सुंदर था.

‘‘घर में सब है निशा, आज अपने हाथ से कुछ भी बना कर खिला दो.’’

चाय का कप और डबलरोटी के टुकड़े ही सामने थे जिन्हें सेक निशा ने परोस दिया था. सहसा निशा के पेट को देख सोम चौंक से गए.

‘‘निशा, तुम्हें कोई तकलीफ है क्या, यह कपड़ों पर खून कैसा?’’

सोम के हाथ निशा के शरीर पर थे. पेटी की वजह से पेट पर गहरे घाव बन चुके थे. थैली वाली जगह खून से लथपथ थी.

‘‘आज आप के साथ आ गई, पेट पर की पट्टी नहीं बदल पाई इसीलिए. आप परेशान न हों. पट््टी बदलने का सामान मेरे बैग में है, मैं ने आज साड़ी पहनी है. शायद उस की वजह से ऐसा हो गया होगा.’’

सोम झट से बैग उठा लाए और मेज पर पलट दिया. पट्टी का पूरा सामान सामने था और साथ थी वही पुरानी पेटी और थैली.

सोम अपने हाथों से उस के घाव साफ करने लगे तो वह मना न कर पाई.

पहली बार किसी पुरुष के हाथ उस के पेट पर थे. उस के हाथ भी सोम ने हटा दिए थे.

‘‘यह घाव पेटी की वजह से हैं सोम, ठीक हो जाएंगे…आप बेकार अपने हाथ गंदे कर रहे हैं.’’

मरहमपट्टी के बाद सोम ने अलमारी से विभा के कपड़े निकाल कर निशा को दिए. वह साड़ी उतार कर सलवारसूट पहनने चली गई. लौट कर आई तो देखा सोम ने दालचावल बना लिए हैं.

हलके से हंस पड़ी निशा.

सोम चुपचाप उसे एकटक निहार रहे थे. निशा को याद आया कि एक दिन विकास ने उसे बंजर जमीन और कंदमूल कहा था. आधीअधूरी पत्नी उस के लिए बेकार वस्तु थी.

‘क्या मुझे शरीरिक भूख नहीं सताती, मैं अपनेआप को कब तक मारूं?’ चीखा था विकास. पता नहीं किस आवेग में सोम ने निशा से यही नितांत व्यक्तिगत प्रश्न पूछ लिया, तब निशा ने विकास के चीख कर कहे वाक्य खुल कर सोम से कह डाले.

हालांकि यह सवाल निशा के चेहरे की रंगत बदलने को काफी था. चावल अटक गए उस के हलक में. लपक कर सोम ने निशा को पानी का गिलास थमाया और देर तक उस की पीठ थपकते रहे.

‘‘मुझे क्षमा करना निशा, मैं वास्तव में यह जानना चाहता था कि आखिर विकास को तुम्हारे साथ रहने में परेशानी क्या थी?’’

सोम के प्रश्न का उत्तर न सूझा उसे.

‘‘मैं चलती हूं सोम, अब आप आराम करें,’’ कह कर उठ पड़ी थी निशा लेकिन सोम के हाथ सहसा उसे जाने से रोकने को फैल गए..

‘‘मैं तुम्हारा अपमान नहीं कर रहा हूं निशा, तुम क्या सोचती हो, मैं तमाशा बना कर बस तुम्हारी व्यक्तिगत जिंदगी का राज जान कर मजा लेना चाहता हूं.’’

रोने लगी थी निशा. क्या उत्तर दे वह? नहीं सोचा था कि कभी बंद कमरे की सचाई उसे किसी बाहर वाले पर भी खोलनी पड़ेगी.

‘‘निशा, विकास की बातों में कितनी सचाई है, मैं यह जानना चाहता हूं, तुम्हारा मन दुखाना नहीं चाहता.’’

‘‘विकास ने मेरे साथ रह कर कभी अपनेआप को मारा नहीं था…मेरे घाव और उन से रिसता खून भी कभी उस की किसी भी इच्छा में बाधक नहीं था.’’

उस शाम के बाद एक सहज निकटता दोनों के बीच उभर आई थी. बिना कुछ कहे कुछ अधिकार अपने और कुछ पराए हो गए थे.

‘‘दिल्ली चलोगी मेरे साथ…बहन के घर शादी है. वहां आयुर्विज्ञान संस्थान में एक बार फिर तुम्हारी पूरी जांच हो जाएगी और मन भी बहल जाएगा. मैं ने आरक्षण करा लिया है, बस, तुम्हें हां कहनी है.’’

‘‘शादी में मैं क्या करूंगी?’’

‘‘वहां मैं अपनी सखी को सब से मिलाना चाहता हूं…एक तुम ही तो हो जिस के साथ मैं मन की हर बात बांट लेता हूं.’’

‘‘कपड़े बारबार गंदे हो जाते हैं और ठीक से बैठा भी तो नहीं जाता…अपनी बेकार सी सखी को लोगों से मिला कर अपनी हंसी उड़ाना चाहते हैं क्या?’’

उस दिन सोम दिल्ली गए तो एक विचित्र भाव अपने पीछे छोड़ गए. हफ्ते भर की छुट्टी का एहसास देर तक निशा के मानस पटल पर छाया रहा.

बहन उन के लिए एक रिश्ता भी सुझा रही थी. हो सकता है वापस लौटें तो पत्नी साथ हो. कितने अकेले हैं सोम. घर बस जाएगा तो अकेले नहीं रहेंगे. हो सकता है उन की पत्नी से भी उस की दोस्ती हो जाए या सोम की दोस्ती भी छूट जाए.

2 दिन बीत चुके थे, निशा रात में सोने से पहले पेट का घाव साफ करने के लिए सामान निकाल रही थी. सहसा लगा उस के पीछे कोई है. पलट कर देखा तो सोम खड़े मुसकरा रहे थे.

हैरानी तो हुई ही कुछ अजीब सा भी लगा उसे. इतनी रात गए सोम उस के पास…घर की एक चाबी सदा सोम के पास रहती है न…और वह तो अभी आने वाले भी नहीं थे, फिर एकाएक चले कैसे आए?

‘‘जी नहीं लगा इसलिए जल्दी चला आया. गाड़ी ही देर से पहुंची और सुबह का इंतजार नहीं कर सकता था…मैं पट्टी बदल दूं?’’

Holi 2023: होली अपने घर पर बनाएं मावा गुझिया

होली के त्योहार पर घर में गुझिया न बने ऐसा हो ही नहीं सकता .गुझिया एक बहुत ही पारम्परिक मिठाई है जिसे होली के अवसर पर जरूर बनाया जाता है. वैसे तो गुझिया बनाना कोई कठिन काम नहीं है पर हाँ इसे बनाने में समय जरूर लगता है.

गुझिया में कलौरी भरपूर मात्रा में होती है. इसलिए इसे खाने के साथ साथ अपनी सेहत का ख्याल जरूर रखें .

वैसे तो गुझिया बहुत तरह की बनायीं जाती है पर आज हम बनायेंगे मावा और मेवा की गुझिया .जो स्वादिष्ट होने के साथ साथ सेहत से भरपूर है.चलिए बनाते है मावा गुझिया-

हमें चाहिए (25-30 गुझिया के लिए)-

मैदा – 2 कप (250 ग्राम)

घी – 1/4 कप (60 ग्राम)

मावा – 250  ग्राम

चिरौंजी -2 बड़े चम्मच

बूरा या पिसी हुई चीनी – 3/4 कप (150 ग्राम)

बादाम – 10 से 12 (बारीक कटे हुए)

काजू – 10 से 12 (बारीक कटे हुए)

सूखा नारियल – 1/3 कप (कद्दूकस किया हुआ)

किशमिश – 1 टेबल स्पून

इलायची – 6 से 7

घी या रिफाइंड  – तलने के लिए

बनाने का तरीका-

1- गुझिया बनाने के लिए सबसे पहले एक थाली में मैदा  और हल्का गरम (पिघला)  घी लें .घी को मैदे में अच्छे से मिलाकर हथेली से रगड़े .घी को मैदे में अच्छे से मिलाने के बाद आप देखेंगे की मैदे को मुट्ठी में भरने से लड्डू जैसा बंध जायेगा .यह इस बात की पहचान है की मोयन एकदम सही मात्रा में है.अब  पानी डालकर थोड़ा सख्त आटा गूंथ लें. 15 मिनट के लिए सूती गीले कपड़े से आटे को ढककर रख दें.

2-अब एक कटोरी में एक बड़ा चम्मच मैदा लेकर उसमे एक बड़ा चम्मच पानी मिलाकर पतला घोल तैयार कर लीजिये .मैदे के इस घोल को हम गुझिया को बन्द करने में इस्तेमाल करेंगे.

stuffing के लिए

1-फीलिंग बनाने के लिए एक नॉनस्टिक पैन में खोया डालकर 3 मिनट के लिए  भूनें ले . फिर इसे ठंडा होने के लिए एक साइड रख दें.अब इसी पैन में घिसे हुए नारियल को भी 1 मिनट के लिए भून लें .

2 -इसके बाद इसमें चीनी का बूरा ,बारीक कटा हुआ बादाम,काजू,किसमिस,चिरौंजी ,इलाइची और भुना हुआ नारियल डाल कर अच्छे से मिला लें .

3-अब मैदे की छोटी-छोटी लोईयां बनाकर पूरियों के आकार में बेल लें. अब इसके बीच में तैयार की हुई फीलिंग भरकर किनारों पर तैयार किया हुआ घोल  लगाकर अच्छे से बंद कर दें और गुजिया की शेप दें.(आप चाहे तो पूरी की शेप में बिली हुई लोई को साचे के बीच में रखकर इसके चारों तरफ मैदे का घोल लगाकर बीच में फिलिंग भरकर सांचे को बन्द कर दे .फिर सांचे को अच्छे से दबाने के बाद सांचा खोल कर उसमे से गुझिया निकाल ले .)

4 –इसी प्रकार से सभी गुझिया को भरकर बना लें.एक बात का और ध्यान रखे की भरी हुई गुझिया को हलके गीले कपडे से ढककर रखें जिससे गुझिया सूखे नहीं.

5-अब एक कढाई में धीमी आंच पर रिफाइंड या घी गरम करें.अब इसमें हलके से 3-4 गुझिया डाले .ज्यादा गुझिया एक साथ डालने की जरूरत नहीं है.

6-अब गुझिया को घी में डालने के बाद उसे धीरे से पलटे .  गुझिया को गोल्डन ब्राउन होने तक डीप फ्राई करें.

7-तली हुई गुझिया को किचन पेपर पर निकाल लें.तैयार है स्वादिष्ट गुझिया.

8 – जब गुजिया पूरी तरह ठंडी हो जाए तो इसे आप एयरटाइट कंटेनर में भरकर रख सकते हैं.

Women’s Day: श्यामली- जब श्यामली ने कुछ कर गुजरने की ठानी

‘श्यामली बुटीक’ लखनऊ शहर में किसी परिचय का मुहताज नहीं था. होता भी क्यों, क्योंकि श्यामलीजी के जीवन का मोटो था कि अपने काम में परफैक्शन. इसी लक्ष्य के कारण कुछ वर्षों में ही उन का बुटीक शहर का सब से अच्छा बुटीक बन गया.

श्यामलीजी की मीठी, मधुर आवाज और चेहरे पर खिली मुसकान के साथ कस्टमर की पसंद को समझते हुए समय पर काम पूरा कर के वे उन्हें खुश कर देती थीं.

अब तो उन की बेटी राशि भी फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर के आ गई थी और बुटीक में उन का हाथ बंटा रही थी. बेटा शुभ अमेरिका पढ़ने गया तो वहीं का हो कर रह गया.

सोम उन के बुटीक के मैनेजर बन गए थे. उन के बालों की चांदनी, आंखों में चश्मा और थकती काया उन से रिटायरमैंट का इशारा करती दिखाई देती थी.

रात के 8 बजने वाले थे. श्यामलजी बुटीक बंद करवाने की सोच ही रही थीं कि दौड़तीहांफती वन्या उन के सामने आ कर खड़ी हो गई. फिर बोली, ‘‘मैम, मेरा लहंगा रैडी है?’’

‘हां…हां… आप ट्रायल कर लो, तो मैं फिनिशिंग करवा दूं.’

वन्या ट्रायलरूम में लहंगा पहन कर बाहर आते ही उन से लिपट कर बोली, ‘‘थैंक्यू मैम, आप के हाथ में जादू है.’’

वन्या की मां प्रज्ञा ने अपने बैग से कार्ड निकाला और फिर उन्हें देती हुए बोलीं, ‘‘दी, आप को शादी में जरूर आना है.’’

श्यामलीजी ने कार्ड को खोल कर देखते हुए कहा, ‘‘वैरी नाइस कार्ड.’’

‘‘7 दिसंबर… वाह जरूरी आऊंगी.’’

7 दिसंबर तारीख देखते ही श्यामलीजी अपने अतीत में खो गईं. पुरानी यादें चलचित्र की तरह उन की आंखों के सामने सजीव हो उठीं…

लखनऊ के पास सुलतानपुर एक छोटा सा शहर है. वे वहां रहती थीं. 3 बहनों और 2 भाइयों में वे सब से बड़ी थीं. पढ़ाई से अधिक सिलाईकढ़ाई में रुचि थी. जब वे छोटी थीं, तभी मां के दुपट्टे या साड़ी से अपनी गुडि़या के लिए तरहतरह के डिजाइनर लहंगे और दूसरी पोशाकें बनाया करती थीं.

ये सब देख कर मां कहतीं कि तुम्हें फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करवा देंगे. बीए पास करने के बाद फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर लिया. पापा को शादी की फिक्र होने लगी थी. उन के पास दहेज देने के लिए बड़ी रकम तो थी नहीं. वे नैट पर लड़कों का प्रोफाइल देखने में लगे रहते थे.

श्यामली का चेहरा गोल था, रंग गेहुंआ, लेकिन कटीले नैननक्श की वे नाजुक सी आकर्षक लड़की थीं. चचंल चितवन और प्यारी सी मुसकराहट सब को आकर्षित कर लेती. वे खाना बहुत अच्छा बनातीं इसलिए अपने पापा की अन्नपूर्णा थीं.

पापा को सोम का प्रोफाइल पसंद आया था. उन्होंने उन का बायोडाटा और छोटा सा फोटो उन के पिता के पास भेज दिया. सोम के पिता का लखनऊ के अमीनाबाद में खूब चलता हुआ बड़ा सा मैडिकल स्टोर था. अच्छाखासा संपन्न परिवार और साथ में इकलौता बेटा तो सोने में सुहागा जैसा था.

सोम के पिता केशवजी के फोन ने उन के घर में खुशियों की हलचल मचा दी. उन्होंने मेल आईडी मांगी. बस फिर शुरू हो गई थी सोम के साथ चैटिंग. सोम की प्यारभरी मीठीमीठी बातों ने श्यामलीजी के दिल के तार झंकृत कर दिए.

जल्दी ही शादी की शहनाइयां बज उठीं. वे अपने मन में सुनहरे भविष्य के रंगबिरंगे सपने संजो कर सोम का हाथ पकड़ कर उन की बड़ी सी कोठी में प्रवेश कर गईं. वे खुशी से फूली नहीं समा रही थीं.

सोम की बांहों के घेरे में सिमट कर वे विश्वास ही नहीं कर पा रहीं थीं कि उन की दुनिया इतनी हसीन भी हो सकती है.

श्यामली सोम के प्यार में डूबी थीं, लेकिन उन का रवैया कुछ समझ नहीं आ रहा था. 1-2 महीनों में उन्हें थोड़ा बहुत इशारा मिल गया कि सोम दुकान पर केवल पैसा लेने जाते और फिर दोस्तों के साथ सिगरेट, शराब और लड़कियों की संगत में ऐश की लाइफ जीने के शौकीन हैं.

सोम बातबात पर उन्हें डांट देते थे, इसलिए वे उन से डरने लगी थीं. एक शाम सोम ने उन से क्लब चलने के लिए तैयार होने को कहा. वे अपने कमरे में तैयार हो रही थीं. तभी उन्हें सोम की पापा के साथ जोरजोर की कहासुनी की आवाजें सुनाई देने लगीं.

सोम के चेहरे पर तनाव देख कर उन्होंने उन से पूछा भी था कि क्या बात है? पापा क्यों नाराज हो रहे थे? इस पर सोम का जवाब था कि अपने काम से काम रखा करो.

उस दिन श्यामलीजी बड़े मन से तैयार हुई थीं. ब्लैक साड़ी में बहुत खूबसूरत लग रही थीं.

ट्रैफिक में फंस जाने के कारण वे लोग क्लब काफी देर से पहुंचे. वहां कौकटेल पार्टी चल रही थी. सैक्सी ड्रैसेज पहनी महिलाओं के हाथ में डिं्रक के गिलास थे. श्यामली घबरा कर सोम के पीछे छिपने लगी थीं. उन के लिए वहां का माहौल एकदम से नया और अजीब सा था.

सोम के मित्र अतुल ने उन्हें ड्रिंक का गिलास औफर किया. श्यामलीजी ने घबरा कर कहा, ‘‘मैं ड्रिंक नहीं करती.’’

सोम ने गिलास ले कर जबरदस्ती उन के मुंह में लगा दिया, ‘‘छोड़ो भी यह बी ग्रेड देहाती मैंटेलिटी. अब तुम रईसों वाले शौक करो और ऐश की जिंदगी जीयो.’’

श्यामलीजी की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी. वे कोने में जा कर बैठ गईं. नौनवैज खाना देख खाने के पास भी नहीं गईं.

उस दिन उन के कारण सोम को अपनी बेइजती महसूस हुई थी. वे सारे रास्ते उन्हें भलाबुरा कहने के साथसाथ गालियां भी देते रहे थे.

इतनी गालीगलौज के बाद भी वे श्यामलीजी के तन को रौंदना नहीं भूले थे. वे रातभर सिसकती रही थीं. समझ नहीं पा रही थीं कि उन्हें ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए. अगली सुबह सब कुछ उलटपुलट कर उन के जीवन में अघटित घट गया. पापाजी रात में सोए तो उन्होंने सुबह आंखें ही नहीं खोलीं. सब कुछ बदल चुका था. मम्मीजी श्यामलीजी को अपशगुनी कहकह कर रो रही थीं. उन की शादी को अभी मात्र 2 महीने ही हुए थे.

नातेरिश्तेदारों की भीड़ के सामने मम्मीजी का एक ही प्रलाप जारी रहता कि बिना दानदहेज की तो बहू लाए और वह भी ऐसी आई कि मेरी जड़ ही खोद दी. इस ने तो हमें बरबाद कर दिया.

यह ठीक था कि सोम दुखी थे, लेकिन वे मम्मीजी को चुप भी तो करा सकते थे, परंतु नहीं. वे उन से खिंचेखिंचे से रहते, लेकिन रात में उन के शरीर पर उन का पूरा अधिकार होता. उन की इच्छाअनिच्छा की परवाह किए बिना वे अपनी भूख मिटा कर करवट बदल कर खर्राटे भरने लगते.

श्यामलीजी उदास और परेशान रहतीं, क्योंकि वहां उन का अपना कोई न था, जिस से वे अपने मन का दर्द कह सकें.

उन्हीं दिनों उन के शरीर के अंदर नवजीवन का स्फुरण होने लगा. वे समझ नहीं पा रही थीं कि हंसे या फूटफूट कर रोए. विद्रोह करने की न ही प्रवृत्ति थी और न ही हिम्मत. वे अपनी शादी को टूटने नहीं देना चाहती थीं. वे रिश्तों को निभाने में विश्वास रखती थीं. दोनों की इज्जत का समाज में मजाक नहीं बनने देना चाहती थीं. सोम मैडिकल स्टोर में बिजी हो गए थे. वे कभी नहीं सोच पाए कि श्यामलीजी का भी कोई अरमान या इच्छा होगी. वे भी प्यार और सम्मान की चाहत रखती होंगी. वे तो स्वचालित मशीन बन गई थीं,  जिस का काम था- मम्मीजी और सोम को हर हाल में खुश रखना. कोई आएजाए जो उस का आदरसम्मान और सेवा करना.

उन्होंने सुबह से शाम तक अपने को घर के कामों में झोंक दिया था. जो भी खाना बनातीं सोम को पसंद नहीं आता. कहते कि यह क्या खाना बनाया है? मुझे तो मटरपनीर की सब्जी खानी है. फिर वे थके कदमों से रात के 11 बजे सब्जी बनाने में जुट जातीं.

जब भी मम्मीपापा उन से मिलने को आए या घर ले जाने की बात की तो मम्मीजी ने ऐसा लाड़प्यार और उन की अनिवार्यता दिखाई कि उन लोगों को यह महसूस हुआ कि वे लोग धन्य हैं, जिन की बेटी को इतना संपन्न और प्यार करने वाला पति और परिवार मिला है.

वे अपनी मां के कंधे पर अपना सिर रख कर अपना मन हलका करना चाहती थीं, लेकिन मम्मीजी और सोम ने ऐसा जाल बिछाया कि एक पल को भी उन्हें मां के साथ अकेले नहीं बैठने दिया.

गोद में राशि के आने के सालभर बाद ही शुभ आ गया. उन की व्यस्तता जिम्मेदारियों के कारण बढ़ गई थी. वे घरगृहस्थी और बच्चों में उलझती गई थीं.

जब कभी सोम उन का अपमान करते या भलाबुरा कहते तो उन्हें अपने पर बहुत क्रोध आता कि क्यों वे ये सब सह रही हैं. क्या बच्चे केवल उन के हैं? आखिर बीज तो सोम का ही है.

सोम के लिए तो अब वे मात्र तन की भूख मिटाने की जरूरत बन कर रह गई थीं. सोम ने स्टोर पर कुछ काम बढ़ा लिया था. मैन काउंटर की डिस्ट्रीब्यूटरशिप ले ली थी. इसलिए और ज्यादा बिजी रहने लगे थे.

स्टोर पर कंप्यूटर का काम करने के लिए एक लड़की, जिस का नाम नइमा था, उसे रख लिया था. वह काफी खूबसूरत और फैशनेबल थी. जल्दी ही सोम उस के प्यार में पड़ गए. वे नइमा को साथ ले कर क्लब जाने लगे. वहां पौप म्यूजिक की धुन पर डांस और ड्रिंक के गिलास खनकते. वहां वह सोम का बखूबी साथ देती. जल्द ही नइमा सोम की जरूरत और जिंदगी बन गई.

एक दिन स्टोर के मैनेजर महेश ने मम्मीजी को अपना नाम न बताने की शर्त पर बताया कि सोम बहक गए हैं. नकली दवा बेचने लगे हैं. वे कई बार ऐक्सपायरी दवा भी ग्राहकों को दे देते हैं. ड्रग्स सप्लाई का काम भी करना शुरू कर दिया है. किसी भी समय मुसीबत में पड़ सकते हैं.

अब मम्मीजी को श्यामलीजी की याद आई कि श्यामली, सोम को कंट्रोल करो. वह तो अपनी तो अपनी, हम सब की बरबादी के रास्ते पर भी चल निकला है.

मम्मीजी की हिम्मत ही नहीं थी कि वे सोम से दुकान के विषय में बात कर सकें. उन्होंने जब भी कुछ पूछताछ या टोकाटाकी की तो सोम गालीगलौच पर उतर आते.

सोम के साथ उन का औपचारिक सा रिश्ता रह गया था. अब वे बच्चों के लिए महंगेमहंगे खिलौने लाते. उन के और मम्मीजी के लिए भी कीमती तोहफे ले कर आते. वे देर रात लौटते. उन के मुंह से रोज शराब की दुर्गंध आती. लेकिन श्यामलीजी लड़ाई से बचने के लिए चुप रहतीं.

उन्हें महंगे तोहफे, कीमती साडि़यों की चाह नहीं थी. वे तो पति के प्यार की भूखी थीं. वे उन की बांहों में झूलती हुईं प्यार भरी बातें करना चाहती थीं.

नियति ने स्त्री को इतना कमजोर क्यों बना दिया है कि वह घर न टूटने के डर से अपने वजूद की कुरबानी देती रहती है?

अब तो सोम के लाए हुए तोहफों को वे खोल कर भी नहीं देखती थीं.

एक दिन सोम चिढ़ कर बोले कि इतनी महंगी साडि़यां ला कर देता हूं, लेकिन तुम्हारा उदास और मायूस चेहरा मेरा मूड खराब कर देता है.

मैं तुम्हें मार रहा हूं? गाली दे रहा हूं? क्या कमी है?

श्यामलीजी हिम्मत कर के प्यार से, बच्चों का वास्ता दे कर उन से शराब पीने और क्लब जाने को मना करने लगीं तो सोम बेशर्मी से बोले कि मैं ये सब न करूं तो क्या करूं? मैं तुम से संतुष्ट नहीं हूं, न तो शारीरिक रूप से न ही मानसिक रूप से. मेरा और तुम्हारा मानसिक स्तर बिलकुल अलग है. हम दोनों कभी एक नहीं हो सकते.

मैं तुम्हारा खर्च उठा रहा हूं, तुम्हारे बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा रहा हूं. तुम्हें महंगेमहंगे गिफ्ट, जेवर, कपड़े ला कर देता हूं. गाड़ी है, ड्राइवर है. बड़ी कोठी में रह रही हो. इस से अधिक तुम्हें और क्या चाहिए?

पत्नी हो, पत्नी बन कर रहो. यदि यहां नहीं रहना है तो चली जाओ अपने गांव. लेकिन एक बात अच्छी तरह समझ लो कि मेरे बच्चे यहीं रहेंगे.

इतनी बातें कहसुन कर सोम क्लब या न जाने कहां चले गए. वे सहम कर चुप हो गई थीं. बच्चे तो उन की जान थे. वही तो उन के जीवन का संबल और आधार थे. उन्हीं के लिए तो वे जी रही थीं. उन की चुप्पी और सहनशीलता को देख सोम का हौसला बढ़ता गया. अब एक लड़की नइमा के साथ वे खुल्लमखुल्ला घूमने लगे थे. कई बार उसे वे घर भी ले कर आ जाते. कई बार वे रात में भी घर न आते.

श्यामलीजी चुप रहतीं, उन की पीड़ा आंसू बन कर आंखों से बहती. एकांत उन के हर दुख का साक्षी रहता. विद्रोह करना उन का स्वभाव नहीं था. वे समझ रही थीं कि यदि वे कुछ भी बोलेंगी तो उन का घरौंदा टूट जाएगा. उन के बच्चे अनाथ हो जाएंगे. अपनी बेचारगी पर वे कई बार स्वयं को धिक्कारती भी थीं, परंतु घर टूट जाने के डर से वह हिम्मत नहीं जुटा पाती थीं. नन्हीं राशि जब उन के आंसू पोंछती और उन्हें चुप हो जाने को कहती, तो उन को अपने आंसू रोकने मुश्किल हो जाते.

बुजुर्ग मैनेजर ने उन के पास भी 2-3 बार फोन कर के कहा कि सोम नकली दवाइयों का कारोबार बढ़ाते जा रहे हैं, साथ ही ड्रग्स का धंधा भी.

यदि इसी तरह से चलता रहा तो जल्द ही किसी मामले में फंस जाएंगे. वे चिंतित हो उठी थीं. उन के अपने प्यारे बच्चों और स्वयं का भविष्य दांव पर लगा था. उन्होंने दूसरे सेल्समैन लड़कों से बात कर के पता किया तो मालूम हुआ कि सच में सोम रास्ता भटक गए हैं.

आखिर एक दिन एक हादसा हो ही गया. उन के स्टोर से खरीदी नकली दवा से एक बच्चे की मौत हो गई. मामले ने तूल पकड़ा. वे लोग लाठियां ले कर आ गए और फिर दुकान में तोड़फोड़ कर दी. सोम की भी खूब पिटाई की. पुलिस आ गई. पुलिस को कुछ लेदे कर किसी तरह मामला शांत करवाया. पर इसी बीच बच्चे के पिता ने ‘ड्रग्स कंट्रोल डिपार्टमैंट’ में मेल कर दिया था. और वहां की टीम रेड करने आ गई. इस अचानक हमले का किसी को कोई अनुमान या तैयारी नहीं थी. नकली और ऐक्सपायरी दवा के साथसाथ ड्रग्स का भी स्टौक पकड़ा गया.

मामला संगीन था. लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने के आरोप में सोम गिरफ्तार हो गए और मैडिकल स्टोर को सील कर दिया गया. वकीलों पर पैसा पानी की तरह बहाया गया.

बेल होने में लगभग 3 महीने लग गए. घर खर्चे की दिक्कत होने लगी. एकएक कर सारे नौकर हटा दिए गए. यहां तक कि बच्चों के लिए दूध की भी परेशानी होने लगी थी. सामान बेच कर कुछ दिन काम चला.

इतनी विषम परिस्थिति कभी होगी, इस का उन्हें कतई अनुमान भी नहीं था. जब सोम जमानत के बाद घर आए, तो उन को पहचानना मुश्किल था. रंग काला पड़ गया था और शरीर कृषकाय हो चुका था. वे किसी का सामना नहीं करना चाहते थे. यहां तक कि बच्चों से भी बात नहीं करते थे. चुपचाप अपने कमरे में लेट कर छत को निहारते रहते.

सोम नया रास्ता तलाशने के बजाय निराशा के गर्त में डूब कर डिप्रैशन का शिकार बन गए. जख्मों को कुरेदने के लिए सांत्वना के नाम पर रिश्तेदारों और परिचितों के ताने और उलटेसीधे व्यंग्य वाणों के कारण सब का जीना दूभर हो गया था.

अब यह श्यामलीजी के लिए परीक्षा की घड़ी थी. अब आवश्यक हो चुका था कि वे स्वयं आगे बढ़ कर घर के हालात को सुधारने के लिए कुछ करें.

एक ओर नैराश्य में जकड़ा हुआ सोम दूसरी ओर 12 वर्ष की राशि तो 11 वर्ष का शुभ, ऐसे कठिन समय में घर का मोरचा संभाला. वे सोम का हौसलाअफजाई करतीं. बच्चों का भी उन्होंने पूरा ध्यान रखा.

मित्रों के सहयोग से एक नामी बुटीक में ड्रैस डिजाइनर की नौकरी मिल गई. जल्द ही बुटीक की मालकिन कल्पनाजी ने उन की प्रतिभा को पहचान लिया, उन के डिजाइन किए हुए कपड़े कस्टमर को पसंद आने लगे. 1 साल में ही बुटीक का बिजनैस काफी बढ़ गया, साथ में उन की सैलरी भी बढ़ गई.

जीवन पटरी पर लौटने लगा था. उन्हें नौकरी करते हुए लगभग 2 वर्ष हो चुके थे. अब वे अपना बुटीक खोलना चाह रही थीं. लेकिन पैसे की कमी बाधा बनी हुई थी.

उन्होंने ‘महिला गृह उद्योग’ योजना के अंतर्गत बैंक से लोन के लिए आवेदन किया और जल्दी ही घर के एक कमरे में अपना बुटीक शुरू कर दिया. 4 सिलाई मशीनें और कुछ कारीगर लड़कियों को रख कर काम शुरू कर दिया. देखते ही देखते उन की मेहनत और क्रिएटिविटी की क्षमता ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए.

आज उन के बुटीक की शहर में 2 ब्रांच और खुल गई हैं. करीब 40 लोगों को उन्होंने रोजगार दे रखा है.

राशि की आवाज ने उन की तंद्रा भंग कर दी, ‘‘मां, आज कहां खो गई हैं? घर नहीं चलना है क्या?’’

वे वर्तमान में लौटी ही थीं कि उन का मोबाइल बज उठा, ‘‘मैडम श्यामली?’’

‘‘यस.’’

‘‘महिला दिवस पर ‘विषम परिस्थितियों में स्वयं को सिद्ध करने के लिए’ आप को ‘विजय नगरम् हाल’ में मेयर के द्वारा सम्मानित किया जाएगा. कल हम लोग निमंत्रणपत्र ले कर आप के पास आएंगे.’’

‘‘धन्यवाद,’’ कहते हुए श्यामलीजी भावुक हो उठी थीं. चूंकि फोन स्पीकर पर था, इसलिए सभी ने इस खबर को सुन लिया था.

सोम भी भावुक हो उठे थे. उन्होंने प्यार से बांहों के घेरे में उन्हें ले लिया, ‘‘श्यामली, तुम्हें मैं वह प्यार और सम्मान नहीं दे पाया, जिस के योग्य तुम थीं. इसलिए अब पूरा लखनऊ शहर तुम्हें सम्मानित करेगा.’’

आज बरसों बाद सोम के प्यार भरे आलिंगन से वे अभिभूत हो उठी थीं. उन्होंने भी प्यार से सोम को अपनी बांहों में कैद कर लिया. बेटी राशि पर निगाह पड़ते ही उन का मुखमंडल शर्म से लाल हो उठा.

सोम फोन पर श्यामलीजी के मम्मीपापा को निमंत्रण दे रहे थे. आज उन के सारे विषाद धुल गए थे.

जानें सिंगल रहने के 10 फायदे

सक्सैसफुल कैरियर वूमन आजकल सिंगल रहना पसंद कर रही हैं. उन के फ्यूचर प्लान में शादी शब्द के लिए जैसे कोई स्थान ही नहीं रह गया है. लड़कियां अपनी सक्सैस, पावर, पैसा और आजादी को खुल कर ऐंजौय कर रही हैं. बेशक युवतियों में लेट मैरिज या नो मैरिज वाले सिंड्रोम से समाज या परिवार पर पड़ने वाले नकारात्मक असर को ले कर मातापिता, समाजशास्त्री, मनोवैज्ञानिक व डाक्टर चिंतित हैं, लेकिन युवतियां खुश हैं. वाकई बड़े फायदे हैं सिंगल रहने के. यकीन न हो तो आगे पढ़ लीजिए:

1. कैरियर में ऊंचा मुकाम

अपनी रिलेशनशिप को बरकरार रखने के लिए काफी प्रयास, ऊर्जा व समय खर्च करने की जरूरत होती है. जाहिर सी बात है कि अगर आप सिंगल हैं तो आप को ये सब करने की जरूरत नहीं है और आप अपनी सारी ऐनर्जी, समय, अटैंशन, काबिलीयत को अपने प्रोफैशन, कैरियर पर फोकस करती हैं, जिस से आप की प्रोडक्टिविटी बढ़ती है. साथ ही, आप लेट नाइट मीटिंग, बिजनैस डिनर और औफिशियल टूर के लिए भी हमेशा तत्पर रहती हैं. अपनी कंपनी, औफिस के लिए भी पूरी तरह समर्पित रहती हैं. तो जाहिर सी बात है कि आप के लिए प्रमोशन की राह आसान हो जाती है.

2. जो चाहें वह करें

चूंकि आप को हर पल यह नहीं सोचना पड़ता कि आप का पार्टनर क्या पसंद करता है और क्या नहीं, आप बड़ी आसानी से वह सब कर सकती हैं, जो आप करना चाहती हैं. जिंदगी के हर पल को जी भर कर जी सकती हैं और वह भी बिना किसी अपराधबोध के. जैसे आप कालेज गर्ल की तरह अपने गर्ल गैंग को घर बुला कर पाजामा पार्टी कर सकती हैं, अपनी मरजी से ड्रैसअप हो सकती हैं, अपने पेरैंट्स, रिलेटिव्स को अपने घर अपने साथ रख सकती हैं. इस मेरी मरजी वाले टौनिक से आप ज्यादा खुश, रिलैक्स रहेंगी और यह सब जानते ही हैं कि एक खुश, संतुष्ट व्यक्ति ही औरों की दुनिया में खुशियां बिखेर सकता है.

3. फिट, यंग व खूबसूरत

आप अपने आप पर ज्यादा ध्यान देती हैं. आप का खयाल रखने वाला दूसरा कोई नहीं होने से अपनी डाइट, हैल्थ, ब्यूटी ऐंड बौडी केयर सब आप की जिम्मेदारी हो जाती है और आज कैरियर गर्ल के लिए फिट, ग्लैमरस व प्रेजैंटेबल बने रहना जरूरी भी है व फायदेमंद भी. इसीलिए सिंगल गर्ल अन्य के मुकाबले लंबे समय तक न सिर्फ यंग नजर आती है, बल्कि बौडी भी शेप में रखती है और प्रभावशाली व्यक्तित्व की मालकिन होती है.

4. पूरी तरह से इंडीपैंडैंट

किसी रिलेशनशिप में न होने का मतलब है कि आप को अपनी जिंदगी के हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की जरूरत है. आप को पैंपर करने के लिए, डेली रूटीन को आसान बनाने के लिए किसी मर्द का कुशन न होने से आप की सीखने की क्षमता बढ़ती जाती है. हालात का मुकाबला आप अन्य महिलाओं से बेहतर करती हैं. यह आत्मनिर्भरता आप का आत्मविश्वास भी बढ़ाती है.

5. हर चुनौती स्वीकारती हैं

सिंगलहुड आप को मानसिक रूप से मजबूत बनाती है. दिनबदिन आप यह सीखती हैं कि स्ट्रैसफुल सिचुएशन में और अचानक आ पड़ी मुसीबत का सामना कैसे करना है. अलगअलग शख्सीयत, मिजाज वाले व्यक्तियों व कौंप्लैक्स पर्सनैलिटी वाले लोगों से आप को कैसे डील करना है, बिना उन के ईगो को ठेस पहुंचाए, यह आप बेहतर समझती हैं. और जबजब आप यह करने में कामयाब होती हैं तबतब आप अलौकिक खुशी और संतुष्टि पाती हैं.

6. ब्यूटी स्लीप भरपूर

आप के पास भरपूर मी टाइम होता है, जिस के लिए विवाहित महिलाएं तरसती हैं. आप अपने डेली रूटीन, स्लीपिंग रूटीन अपनी बौडी, वर्क और जरूरत के मुताबिक सैट कर सकती हैं, साथ ही पार्टनर का रुठनामनाना, बच्चों व ससुराल की चिंता भी आप के सिर पर नहीं होती है. इसी वजह से आप के लिए हर रोज प्रौपर, स्ट्रैसफ्री ब्यूटी स्लीप को प्राप्त करना आसान हो जाता है. रातभर की अच्छी नींद न सिर्फ आप की खूबसूरती, फिजिकलमैंटल हैल्थ के लिए बेहद आवश्यक होती है, बल्कि इस से आप का दिमाग भी सक्रिय होता है और आप की कार्यक्षमता, एकाग्रता, स्किल में इजाफा होता है.

7. खुद का लाइफस्टाइल

आप किसी और के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, इस वजह से आप के पास काफी समय, ऊर्जा और रिर्सोसेज होते हैं कि आप हैल्दी रूटीन फौलो कर सकें. अपने लाइफस्टाइल, ईटिंग हैबिट्स, ऐक्सरसाइज शैड्यल में बदलाव ला सकती हैं और अपनी लाइफ को बोरिंग होने से बचा सकती हैं.

8. मनी रिलेटेड इश्यू कम

आज के वर्किंग कपल के बीच मेरा पैसा, तेरा पैसा यानी मनी को ले कर होने वाले वादविवाद काफी स्ट्रैस पैदा करते हैं. खासतौर पर पत्नियां अपने पैसे का क्या करती हैं या उन को क्या करना चाहिए, यह अकसर पति तय करते देखे जाते हैं. लेकिन सिंगल होने का मतलब है कि आप को अपनी मनी को कहां, किस तरह से खर्च करना है, किस पर करना है या कितनी सेव करनी है, इन सब बातों को ले कर किसी को जवाब नहीं देना है. आप का पैसा पूरी तरह आप का है. आप शौपिंग करें, स्पा जाएं या इन्वैस्ट करें, आप की मरजी. यही फाइनैंशियल इंडीपैडैंस और फाइनैंशियल सिक्युरिटी आप को मजबूत बनाती है, आप का कौन्फिडैंस बढ़ाती है और सच्चे अर्थों में आप को मर्द के बराबर ला खड़ा करती है.

9. अलग पहचान बना सकती हैं

कैरियर में सैट होने के बाद अपनी हौबी को पुनर्जीवित कर सकती हैं, जो वक्त या पैसे की कमी के चलते अधूरी रह गई थी. जौब से लौटने के बाद बचे वक्त में थिएटर, स्क्रिप्ट राइटिंग, क्ले पेंटिंग या संगीत के प्रति अपने पैशन को नई दिशा दे सकती हैं. अपनी खुद की एक अलग पहचान बना सकती हैं. किसी भी तरह का रचनात्मक कार्य, क्रिएटिविटी आप के दिलदिमाग को सुकून पहुंचाएगी.

10. जब चाहें हौलिडे पर जाएं

सिंगल होने का एक और बड़ा फायदा यह है कि आप अपनी मरजी, मूड और पसंद के मुताबिक हौलिडे प्लान कर सकती हैं. वह डैस्टिनेशन चुन सकती हैं जहां जाना आप की हमेशा ख्वाहिश रही है. पार्टनर की मरजी के हिसाब से कंप्रोमाइज करना, अपना मन मारना, जोकि अमूमन महिलाएं करती हैं, ये सब आप को नहीं करना पड़ेगा. चाहें तो बर्फीली पहाडि़यों की ऊंचीऊंची चोटियों को निहारें या फिर समंदर किनारे रेत पर नंगे पैर चलें, आप ताजा दम हो कर सकारात्मक ऊर्जा में सराबोर हो कर ही घर लौटेंगी.

Women’s Day: अकेली महिला रोज बनाएं मनचाहा खाना

आज स्त्री पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही है. उस स्थिति में स्त्री के गुणों में भी परिवर्तन आया है. सब से बड़ा बदलाव है. आज की लड़कियों का पाक कला के प्रति बढ़ता रुझान है. पहले भी औरत के गुणों में पाक कला की निपुणता थी, पर आज उस की क्लालिटी बदल गई है.

युवतियों ने घर से बाहर की ओर कदम बढ़ाए हैं. आज एकल रहना आम होता जा रहा तो सब से पहले वे सही खाना बनाने की घर से चली आ रही आदत को छोड़ रही हैं. सीए इला को अपनी सर्विस के कारण घर व मातापिता से दूर रहना पड़ रहा है. वह अपनी जौब पूरे कमिटमैंट से करती हुई आगे बढ़ रही है. मगर पीछे छूट गईर् तो खुद खाना बना कर खाने की आदत, जिस के कारण वह आधा वक्त बाहर से खा कर काम चलाती है तो आधा वक्त भूखी ही रहती है, पर खुद खाना नहीं बनाती.

पेशे से वकील रजनी 32 साल की ही है पर तलाकशुदा है. वह अपनी निजी प्रैक्टिस करती है. उस का कहना है, ‘‘मैं पहले खाना बनाती थी पर अकेले के लिए क्या खाना बनाऊं. बाहर से मंगाती हूं व खाती हूं कोई परेशानी नहीं होती. मेरा काम चल ही जाता है.’’

किन कारणों के चलते एक एकल रहने वाली स्त्री खाना बनाने से बचने लगती है?

अकेलापन: एक अकेली युवती को अपने जीवन में कहीं न कहीं एक बात कचोटती रहती है कि वह अकेले जीवन जी नहीं रही बल्कि काट रही है. इस वजह से उस के मन से सब से पहली आवाज यही आती है कि वह खाना क्यों और किस के लिए बनाए? दूसरा कोई साथ हो तभी खाना बनाना अच्छा लगता है और जरूरी भी पर मैं तो अकेली हूं कैसे भी मैनेज कर लूंगी.’’ इस मैनेज शब्द के साथ ही रसोई से वह अपना नाता तोड़ देती है.

थकावट: एकल युवती होने के कारण यह भी लाजिम है कि दिनभर की भागदौड़ खुद करने के बाद वह इतना अधिक थकी होती है कि उस के पास थकावट के कारण इतनी हिम्मत नहीं बचती कि रसोई की ओर रुख करे. थकावट चुपकेचुपके उस से कहती है कि रसोई की तरफ मत जा बाजार से कुछ मंगा, खा और खा कर सो जा.

अहम: एकल रह रही युवती को रसोई में आने से रोकता है उस का अहम, जो उसे बारबार यही एहसास कराता है कि जब तू पुरुषों की तरह हजारों रुपए कमा रही है और बड़ी सम  झदारी व हिम्मत से अकेले निडर हो कर रह रही है तो तु  झे रसोई में जा कर इतना खपने की जरूरत ही क्या है. शान से पैसा फेंक बढि़या खाना और्डर कर और खा कर मस्त रह.

समय: एकल महिला के पास समय की कमी का पाया जाना भी एक मुख्य कारण है जोकि उसे विवश करता है कि नहीं तू खाना मत बना क्योंकि जितनी देर में सब्जी लाएगी, ग्रौसरी जमा करेगी, खाना बनाएगी उतनी देर में तो अपना एक और जरूरी काम पूरा कर लेगी. समय सीमा में बंधी स्त्री मजबूरीवश भोजन बनाना न चाहते हुए भी छोड़ देती है.

ये वे मुख्य कारण हैं जिन के चलते एकल रह रही महिला अपने लिए खाना नहीं बनाना चाहती पर कई वजहें हैं जिन के कारण एकल रह रही स्त्री को अपने लिए खाना बनाना ही चाहिए:

सेहत: कहते है ‘जान है तो जहान है’ इस कहावत को अगर एकल महिला मूलमंत्र मान ले तो वह कभी भी खाना बनाने से कतराएगी नहीं क्योंकि घर में बना खाना जितना शुद्ध होता है उतना बाहर का बना खाना नहीं. घर के खाने में जहां कम घी, तेल, मिर्चमसालों को वरियता दी जाती है वहीं बाहर के खाने में इस का उलटा ही होता है यानी चिकनाई व मिर्चमसालों की भरमार.  इसलिए एकल स्त्री अपना खाना स्वयं बनाए और सेहतमंद रहे.

बचत: आज आसमान छूती महंगाई में जहां जीवन की जरूरतों को पूरा करना कठिन हो चला है उस स्थिति में अगर एकल महिला घर पर स्वयं ही खाना बनाएगी तो पूंजी की काफी बड़ी मात्रा में बचत कर पाएगी. उदाहरण के तौर पर अगर बाजार में खाना 100-200 रुपए में मंगाती है तो घर पर वही खाना 30-40 रुपए खर्च कर आसानी से बना कर बड़ी मात्रा में धन हानि को रोक सकती है. क्लाइंड किचनों का वैसे भी भरोसा नहीं कि क्लालिटी क्या होगी. बाहर से मंगाया खाना हमेशा ज्यादा पोर्शन वाला होता है और फिर ज्यादा खाया जाता है.

समय: कई बार एकल युवतियां बोरियत व खाली समय जैसे शब्दों से भी घिरी होती हैं. उन की अकसर यह शिकायत होती है कि खाली वक्त को कैसे कम करें तो उस के लिए एक ही विकल्प है कि जब भी आप को लगे कि आप खालीपन के कारण बोर हो रही हैं तो उस वक्त रसोई में जा कर अपने लिए कोई बढि़या डिश तैयार कर मजे से खाए और अपने खालीपन का सदुपयोग करे.

मेजबान बने: एकल युवती के पास एक कारण होता है कि किस के लिए बनाए तो इस बात की काट भी खुद ही करे यानी एक अच्छी कुक व मेजबान बन कर अपनी सहेलियों को खाने पर आमंत्रण दे. उन के लिए दिल से अच्छा भोजन स्वयं बनाए और उन्हें भी खिलाए व खुद भी खाए यानी मेजबानी करना सीखे. पौटलक का आयोजन करती रहे चाहे अकेली लड़कियों व लड़कों के साथ चाहे विवाहित दोस्तों के साथ.

सामंजस्य: एकल रहना किसी भी युवती के लिए आसान कार्य नहीं है क्योंकि कई बार युवती मजबूरी से एकल रहती है तो कभी परिस्थितिवश. कारण कोई भी हो पर एकल रहना आसान नहीं होता. उन परिस्थितियों में एकल युवती को चाहिए कि वह अपनी परिस्थिति को सम  झे और अपने दिल और दिमाग से एकल शब्द को निकाल कर अपना खाना स्वयं जरूर बनाए और खाए.

खुद को खुद ही चेलैंज करे कि जब तू सब कार्य एकल करने में सक्षम है तो खाना बनाने में पीछे क्यों रहे. इस तरह की सकारात्मक सोच ही एक एकल युवती को खाना बनाने के लिए प्रेरित कर सकती है. यानी एकल महिला का आत्मविश्वास ही उसे रसोई तक ले जाने की क्षमता रख सकता है.

मनोचिकित्सकों के अनुसार कितनी युवतियां होती हैं जिन्हें यही समस्या होती कि चूंकि वे अकेले रह रही हैं तो उन का अपने लिए कुछ खाने की चीजें बनाना तो दूर रसोई की तरफ देखने की भी इच्छा नहीं होती है तो क्या करें. इस पर उन्हें यही सलाह है कि अकेले रहते हुए जैसे वे बाकी कार्यों को बखूबी पूरा कर रही हैं वैसे ही अपने लिए भोजन भी जरूर बनाएं.

अपनी आदत को बनाए रखने के लिए

1 सप्ताह का मैन्यू बना कर रखें और उस के अनुसार ही डेवाइज भोजन बनाएं. इस से उन्हें एक नहीं अनेक लाभ मिलेंगे जैसे समय पर सही ताजा भोजन मिलेगा, समय का उपयोग हो कर खालीपन दूर होगा, पैसे की बचत होगी और सब से जरूरी आप को अपना जीवन सजीव लगेगा.

तो सभी एकल महिलाओं को चाहिए कि वे अपना भोजन रोज व स्वयं बनाएं. अगर नहीं बनाती हैं तो बनाने की आदत डालें और जीवन को पूर्णता व सजीवता के साथ जीएं क्योंकि एकल होना जीवन में आ रही परिस्थिति का ही एक हिस्सा है अभिशाप का नहीं. इसलिए एकल हो कर भी खुल कर जीएं.

वुमंस डे पर दें अपनी महिला मित्र को दें ये अनोखे ​गिफ्ट

किसी खास अवसर पर जब हमें अपनी बहन, फ्रैंड, गर्लफ्रैंड, औफिस की ​कलिग या फिर अपनी पत्नी को कोई गिफ्ट देना होता है तो हम कई गिफ्ट देखने के बाद ही उन में से एक बैस्ट चुनते हैं, उस वक्त हम सोचते हैं कि हम उन्हें कुछ ऐसा गिफ्ट दें, जिसे देखने के बाद उन के मुंह से बस यही निकले कि इस से अच्छा गिफ्ट और कुछ नहीं हो सकता. यह सब तो ठीक है लेकिन क्या कभी आप ने कुछ ऐसे गिफ्ट्स के बारे में सोचा है जो उन्हें खुशी दे, उन्हें सम्मान दे. यकीनन आप ने नहीं सोचा होगा, आइए इस महिला दिवस उन्हें कुछ ऐसे ही गिफ्ट्स देते हैं.

1 गंदे और भद्दे चुटकुलों को कहें ना

महिला हो या पुरुष मस्ती मजाक सभी को अच्छा लगता है, लेकिन इस का भी एक दायरा होता है. कई पुरुष जानबूझकर औफिस में व सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं से संबंधित भद्दे व गंदे जोक्स मारते हैं. ग्रुप में जब भी बात करते हैं तो ​महिलाओं को सैंटर टौपिक में रखते हैं और ठहाके मार के हंसते हैं. हर वक्त बस लड़कियों में कमी निकालते रहते हैं. अगर आप भी ऐसा करते हैं तो अपनी इस आदत को बदल डालिए. सिर्फ यही नहीं बल्कि अगर आप के सामने भी कोई ऐसा करता है तो मूक दर्शक बन कर न देखते रहें बल्कि उसे भी समझाएं.

2 टैलेंट पर न करें शक

कुछ पुरुषों की आदत होती है कि वे ​महिलाओं को प्रोत्साहित करने के बजाय उन्हें बारबार कहते रहते हैं कि तुम से नहीं हो पाएगा तुम रहने दो. कई बार तो औफिस में यह भी देखने को मिलता है कि अगर महिलाएं किसी काम को करने के लिए आगे आती हैं तो बौस तक कह देते हैं ‘आरती तुम रहने दो इस काम को लड़के अच्छे से कर लेंगे, रोहित तुम इस काम को कर लो’. आप ऐसा व्यवहार करना छोड़ दें बल्कि अगर वे कोई काम करना चाहती हैं तो उन्हें प्रोत्साहित करें, न कि उन के टैलेंट पर शक कर के उन्हें पीछे खींचे.

3 न ढूंढ़े टचिंग का बहाना

अक्सर पुरुष भीड़ की आड़ में महिलाओं को टच करने का बहाना ढूंढ़ते रहते हैं, मौका मिला नहीं कि हाथ साफ करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं. लेकिन क्या आप को पता है ऐसा कर के आप महिलाओं के साथ ‘लिटिल रेप’ करते हैं. जी हां, आज ईव टीजिंग भी लिटिल रेप से कम नहीं है इसलिए अपनी इस तरह की आदतों को छोड़िए और महिलाओं को सम्मान देना शुरू करिए.

4 न दें कैरेक्टर सर्टिफिकेट

महिलाओं को पूरी आजादी है कि वे क्या पहनना चाहती हैं और क्या नहीं, कहां जाना चाहतीं हैं और कहां नहीं, किस से बात करना चाहती हैं और किस से नहीं. आप इस आधार पर कभी भी किसी महिला का कैरेक्टर डिसाइड न करें कि वह कैसी है.

5 न करें कमैंट

पुरुष कितनी भी रफ ड्राइविंग करें लेकिन जब महिलाएं डाइविंग करते हुए थोड़ी सी भी गलती करतीं हैं तो ताने मारने लगते हैं कि समझ नहीं आता कि महिलाएं क्यों ड्राइव करती हैं, उन के लिए तो पिछली सीट ही ठीक है. आप इस तरह के कमैंट करना छोड़ दें बल्कि अगर वे गलती करते दिखें तो कमैंट के बजाय समझाएं.

आजकल एड में बीबी ग्लो के बारे में बताया जाता है, क्या यह सचमुच स्किन के लिए अच्छा है?

सवाल

आजकल एड में बीबी ग्लो के बारे में बताया जाता है. क्या यह सचमुच स्किन के लिए अच्छा है?

जवाब

बीबी ग्लो एक ऐसा ट्रीटमैंट है जिस में आप की स्किन के अंदर एक मशीन के द्वारा अकौर्डिंग टू योर स्किन न्यूट्रिएंट्स डाल दिए जाते हैं. ये स्किन के अंदर जा कर स्किन को स्ट्रैच करते हैंरिंकल फ्री करते हैं और ग्लो देते हैं. इस के साथसाथ बीबी ग्लो में आप की स्किन के अनुसार एक फाउंडेशन स्किन के अंदर डाल दिया जाता हैजिस से आप की स्किन के ऊपर एक हलका मेकअप आ जाता हैजो करीब 20 से 30 दिन तक रहता हैसाथ में आप की फेस को शेप देने के लिए कंटूरिंग और ब्लशर भी डाल दिया जाता है जिस से फेस की बहुत खूबसूरत शेप आ जाती है. यह एक बहुत ही अच्छा ट्रीटमैंट है जिस से आप की स्किन ग्लो भी करती हैसाथ में शेप भी आ जाती है और 20 से 30 दिन के लिए मेकअप भी आ जाता है.

 

Women’s Day: अकेली लड़की- कैसी थी महक की कहानी

” बेटे आप दोनों को गिफ्ट में क्या चाहिए? ” मुंबई जा रहे लोकनाथ ने अपनी बच्चियों पलक और महक से पूछा.

12 साल की पलक बोली,” पापा आप मेरे लिए एक दुपट्टे वाला सूट लाना.”

” मुझे किताबें पढ़नी हैं पापा. आप मेरे लिए फोटो वाली किताब लाना,” 7 साल की महक ने भी अपनी फरमाइश रखी.

“अच्छा ले आऊंगा. अब बताओ मेरे पीछे में मम्मी को परेशान तो नहीं करोगे ?”

“नहीं पापा मैं तो काम में मम्मी की हैल्प करूंगी.”

“मैं भी खूब सारी पेंटिंग बनाऊंगी. मम्मी को बिल्कुल तंग नहीं करूंगी. पापा मुझे भी ले चलो न, मुझे मुंबई देखना है,” मचलते हुए महक ने कहा.

” चुप कर मुंबई बहुत दूर है. क्या करना है जा कर? अपने बनारस से अच्छा कुछ नहीं,” पलक ने बहन को डांटा.

” नहीं मुझे तो पूरी दुनिया देखनी है,” महक ने जिद की.

” ठीक है मेरी बच्ची. अभी तू छोटी है न. बड़ी होगी तो खुद से देख लेना दुनिया,” लोकनाथ ने प्यार से महक के सर पर हाथ फिराते हुए कहा.

पलक और महक दोनों एक ही मां की कोख से पैदा हुई थीं मगर उन की सोच, जीवन को देखने का नजरिया और स्वभाव में जमीन आसमान का फर्क था. बड़ी बहन पलक जहां बेहद घरेलू और बातूनी थी और जो भी मिल गया उसी में संतुष्ट रहने वाली लड़की थी तो वहीं महक को नईनई बातें जानने का शौक था. वह कम बोलती और ज्यादा समझती थी.

पलक को बचपन से ही घर के काम करने पसंद थे. वह 6 साल की उम्र में मां की साड़ी लपेट कर किचन में घुस जाती और कलछी चलाती हुई कहती,” देखो छोटी मम्मी खाना बना रही है.”

तब उस के पिता उसे गोद में उठा कर बाहर निकालते हुए अपनी पत्नी से कहते,” लगता है हमें इस की शादी 18 साल से भी पहले ही करनी पड़ेगी. इसे घरघर खेलना ज्यादा ही पसंद है. ”

18 तो नहीं लेकिन 23 साल की होतेहोते पलक ने शादी की सहमति दे दी और एक बड़े बिजनेसमैन से उस की अरेंज मैरिज कर दी गई. इधर महक बड़ी बहन के बिलकुल विपरीत शादीब्याह के नाम से ही कोसों दूर भागती थी. उसे ज्ञानविज्ञान और तर्कवितर्क की बातों में आनंद मिलता. वह जीवन में दूसरों से अलग कुछ करना चाहती थी. जॉब कर के आत्मनिर्भर जीवन जीना चाहती थी.

जल्द ही उसे एक एडवरटाइजिंग कंपनी में कॉपी एडिटर की जॉब भी लग गई. वक्त गुजरता गया. पलक अब तक 32 साल की हो चुकी थी मगर जब भी घर वाले शादी की बात उठाते वह कोई न कोई बहाना बना देती. शादी में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाती. इस बीच एक एक्सीडेंट में उस के मम्मीपापा की मौत हो गई. यह वक्त महक के लिए बहुत कठिन गुजरा. अब उसे खुद को अकेले संभालना था. शुरू में तो कुछ समय तक वह पलक के घर में रही. पर बहन की ससुराल में ज्यादा लंबे समय तक रहना अजीब लगता है इसलिए वह अपने घर लौट आई और अकेली रहने लगी.

अकेले रहने की आदी न होने के कारण उसे शुरू में अच्छा नहीं लगता. रिश्तेदार बहुत से थे मगर सब अपने जीवन में व्यस्त थे. इसलिए समय के साथ उस ने ऐसे ही जीने की आदत डाल ली. मांबाप की मौत ने उस के अंदर गहरा खालीपन भर दिया था. यह ऐसा समय था जब वह खुद को अंदर से कमजोर महसूस करने लगी थी. ऐसे में उसे पलक का सहारा था. पलक उसे सपोर्ट देती थी मगर यह बात कहीं न कहीं पलक के घरवालों को अखरती थी.

उस के जीजा नवीन पलक से अक्सर कहा करते,” तुम्हारी बहन शादी क्यों नहीं करती? क्या जिंदगी भर तुम्हारा आंचल पकड़ कर चलेगी? समझाती क्यों नहीं कि बिना शादी के जीना बहुत कठिन है.”

तब पलक हंस कर कहती,” मैं ने उसे आंचल पकड़ाया ही कहां है? वैसे भी उसे जो करना होता है वही करती है. मेरे समझाने का कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.”

अकेली लड़की की जिंदगी में परेशानियां कम नहीं आतीं. लोगों की बुरी नजरों से खुद को बचाते हुए अपने दम पर परिस्थितियों का सामना करना महक धीरेधीरे सीख रही थी.

उस दिन महक ऑफिस से घर लौटी तो तबीयत काफी खराब लग रही थी. बुखार नापा तो 102 डिग्री बुखार था. कुछ करने की हिम्मत नहीं हो रही थी. वह क्रोसिन खा कर सो गई. अगले दिन बुखार और भी ज्यादा बढ़ गया. उसे डॉक्टर के पास जाने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी. तब उस ने पलक को फोन लगाया. पलक ने उसे अपने घर बुला लिया. घर के पास ही एक डॉक्टर से दवाइयां लिखवा दीं. महक को टाइफाइड था. ठीक होने में 10- 12 दिन लग गए. फिर जब तक महक पूरी तरह ठीक नहीं हो गई तब तक वह पलक के ही घर रही. पलक उस के खानेपीने का अच्छे से प्रबंध करती रही. महक की वजह से उस के काम काफी बढ़ गए थे. कई बार उस की वजह से पलक को पति की बात भी सुननी पड़ जाती. तब पलक उसे समझाती कि शादी कर ले।

ठीक होते ही महक अपने घर आ गई. एक दिन रात में 8 बजे महक ने पलक को फोन कर कहा,” मेरे घर के सामने दो अनजान युवक बहुत देर से खड़े बातें कर रहे हैं. मुझे उन की मंशा सही नहीं लग रही. बारबार मेरे ही घर की तरफ देख रहे हैं.”

” ऐसा कर तू सारी खिड़कियांदरवाजे बंद कर और लाइट ऑफ कर के सोने का नाटक कर. वे खुद चले जाएंगे ,” पलक ने सलाह दी.

उस दिन तो किसी तरह मामला निपट गया मगर अब यह रोज की दिनचर्या बन गई थी. लड़के उस के घर की तरफ ही देखते रहते. पलक को असहज महसूस होता. वह घर से निकलती तब भी वे लड़के उसे घूरते रहते.

कुछ समय से वह वर्क फ्रॉम होम कर रही थी मगर आसपड़ोस में काफी शोरगुल होता रहता था. इसलिए वह ठीक से काम नहीं कर पाती थी. उस के घर के ऊपरी फ्लोर पर नया परिवार आया था. ये लोग हर 2 -4 दिन के अंतर पर घर में कीर्तन रखवा देते. माइक लगा कर घंटों भजन गाए जाते. कीर्तन और घंटियों की आवाजें सुनसुन कर उस के दिमाग की नसें हिल जातीं. तब उस ने तय किया कि वह घर शिफ्ट कर लेगी मगर जल्दी ही उसे समझ आ गया कि अकेली लड़की के लिए अपनी पसंद का फ्लैट खोजना भी इतना आसान नहीं है. उस ने 2- 3 सोसाइटीज पसंद कीं जहां उस ने घर लेने की कोशिश की तो पता चला कि वहां बैचलर्स को घर नहीं दिया जाता. इस बात को ले कर महक कई दिनों तक परेशान रही.

उस की परेशानियों के मद्देनज़र उस के जीजा एक ही बात कहते,” शादी कर लो. जीवन में आ रही सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी.”

पलक भी उसे समझाती,” अकेले रहने में समस्याएं तो आएंगी ही. हम हर समय तुम्हारी मदद के लिए खड़े नहीं रह सकते. अपना परिवार बनाओ और चैन से रहो. देख मैं कितनी निश्चिन्त हूँ. जो भी चिंता करनी होती है वह तेरे जीजा करते हैं.”

यह बात तो महक को भी समझ आती थी मगर वह ऐसे ही किसी से शादी करने को तैयार नहीं थी. वह शादी तभी करना चाहती थी जब कोई उसे पसंद आए और उस के लायक हो. तब उस के लिए जीजा ने एक रिश्ता सुझाया और उस के साथ महक की मीटिंग फिक्स कर दी. वह लड़का महक के जीजा के पुराने जानपहचान का था इसलिए वह चाहते थे कि महक शादी के लिए हां कह दे. मगर महक को वह जरा भी पसंद नहीं आया. ठिगना कद और बारहवीं पास वह लड़का महक की सोच के आगे कहीं भी नहीं टिकता था.

भले ही उस लड़के के पास धनदौलत और शानोशौकत की कोई कमी नहीं थी. वह एक शानदार बंगले और कई गाड़ियों का मालिक भी था. मगर महक को जीवनसाथी के रूप में कोई अपने जैसा पढ़ालिखा और काबिल इंसान चाहिए था. महक उसे इंकार कर के चली आई. इस बात पर जीजा और भी ज्यादा भड़क गए.

पलक को सुनाते हुए बोले,” खबरदार जो अब महक के लिए कुछ भी किया या उस की मदद करने की कोशिश भी की. उसे खुद की काबिलियत और शिक्षा पर बहुत घमंड है न. देखता हूं, अकेली लड़की कितने समय तक अपने बल पर जी सकेगी. हर काम में तो उसे हमारी मदद चाहिए होती है. हमारे बिना 4 दिन भी रह ले तो बताना. ”

” यह तो सच है कि उसे हर समय हमारी मदद चाहिए होती है मगर जब कोई सलूशन बताओ तो मानती नहीं. मैं खुद उस से तंग आ गई हूं. ”

इस के बाद दोनों पतिपत्नी ने तय कर लिया कि वह महक को अपनी जिंदगी से दूर रखेंगे. इस बात को 4- 6 महीने बीत गए. पलक ने महक को खुद से दूर कर दिया था. महक सब समझ रही थी मगर उस ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी जंग जारी रखी.

एक दिन पलक ने रोते हुए फोन किया,” महक तेरे जीजा जी का एक्सीडेंट हो गया है. वे छत से गिर गए हैं. सिर पर चोट आई है. खून बह रहा है. मुझे तो कुछ सूझ नहीं रहा कि क्या करूं. निक्कू भी एग्जाम देने गया हुआ है और गोकुल (नौकर) 2 दिन से आ ही नहीं रहा. घर में कोई नहीं है. पापा जी भी जानती ही है, पैरों में तकलीफ की वजह से चल नहीं सकते.”

” कोई नहीं पलक दी मैं आ रही हूं,” महक ने बहन को हिम्मत दी.

बिजली की सी फुर्ती से महक घर से निकली. रास्ते में ही उस ने एंबुलेंस वाले को फोन कर दिया था. आननफानन में उस ने एंबुलेंस में जीजा को हॉस्पिटल पहुंचाया. पलक से उस ने इंश्योरेंस के कागजात भी रखने को कह दिया था. हॉस्पिटल पहुँचते ही उस ने जीजा को एडमिट कराने की सारी प्रक्रिया फटाफट पूरी कराई और उन्हें एडमिट करा दिया. बड़े से बड़े डॉक्टरों से बात कर अच्छे इलाज का पूरा प्रबंध भी करा दिया. कुछ देर में जीजा को होश आ गया. माथे पर गहरी चोट लगी थी सो सर्जरी करनी पड़ी.

इस बीच पलक ने बताया कि इंश्योरेंस वालों ने किसी वजह से क्लेम कैंसिल कर दिया है. महक तुरंत सारे कागजात ले कर भागी और सब कुछ सही कर के ही वापस लौटी.

महक के प्रयासों से सब कुछ अच्छे से निबट गया. कुछ दिन हॉस्पिटल में रख कर जीजा को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. जीजा इतने दिनों में महक को बाहरभीतर की सारी जिम्मेदारियां निभाते देख काफी प्रभावित हो गया था. पलक भी अपनी बहन की तारीफ किए बगैर नहीं रह सकी, ” सच महक अब मुझे यकीन हो गया है कि तू अकेले भी खुद को बहुत अच्छे से संभाल सकती है. अकेली हो कर भी तू कमजोर नहीं है. खुद में पूर्ण है. ”

” दीदी जिंदगी में एक पल ऐसा जरूर आता है जब कोई भी इंसान खुद को अकेला या कमजोर महसूस करता है. जैसे आप की जिंदगी में भले ही सब कुछ है. पति है, बेटा है, घरपरिवार है, मगर सोचिए जब पूरे दिन परिवार के लिए काम करने के बाद रात में जीजाजी आप को किसी कारण से बात सुना कर बाहर चले जाते हैं, निक्कू अपने मोबाइल में और अंकल टीवी में बिजी रहते हैं, तब क्या आप को नहीं लगता कि आप बहुत अकेली हो. इसी तरह मुझे भी कभीकभी लगता है कि मैं बहुत अकेली हूं. मगर जब चुनौतियों को हरा कर कुछ अच्छा करती हूं तो दिल का खालीपन भर जाता है. आखिर अपनी जिंदगी अपनी पसंद के अनुसार हम खुद चुनते हैं. इस में सही या गलत नहीं होता. बस परिस्थितियां ही सही या गलत होती हैं. ”

पलक ने बहन को गले लगाते हुए कहा,” मैं समझ गई हूं महक तू मेरे जैसी नहीं पर मुझ से कम भी नहीं. तेरी सोच अलग है मगर कमजोर नहीं. बहुत स्ट्रॉन्ग है तू. आज तेरा लोहा सिर्फ मैं ने ही नहीं तेरे जीजा ने भी मान लिया है. मेरी प्यारी बहन मुझे तुझ पर गर्व है, ” पलक से अपनी तारीफ सुन कर महक की आंखों में विश्वास भरी चमक उभर आई थी.

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