बेटियों को फाइनैंशियली इंडिपैंडैंट बनाना जरूरी- शिवजीत भारती, आईएएस

हरियाणा के पंचकूला जिले के एक छोटे से गांव जयसिंहपुरा की रहने वाली 29 वर्षीय शिवजीत भारती के पिता गुरनाम सैनी अखबार बेचने का काम करते हैं. एक दिन उन की खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्हीं समाचारपत्रों की सुर्खियों में उन की अपनी बेटी का नाम रोशन हो रहा था. गांव की इस बेटी का सलैक्शन पहले ही प्रयास में हरियाणा सिविल सर्विस में हुआ था. वर्तमान में वे चंडीगढ़ में डिप्टी सैक्रेटरी उप सचिव कोपरेशन डिपार्टमैंट सहकारिता विभाग में कार्यरत हैं.

शिवजीत की मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं. शिवजीत भारती ने पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से मैथ्स में ग्रैजुएशन और पोस्ट ग्रैजुएशन किया है. आर्थिक तंगी के कारण वे अच्छी कोचिंग प्राप्त नहीं कर पाईं थीं पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. किताबों, पत्रिकाओं, अखबारों और यूट्यूब वीडियोज का सहारा ले कर सफलता पाई. अतिरिक्त कमाई के लिए वे अपने घर पर ही छात्रों को ट्यूशन भी पढ़ाती थीं. 2 महीने पहले उन्होंने लव मैरिज की है. उन के पति भी सिविल सर्विसेज में हैं. पति मध्य प्रदेश के हैं, मगर अब हरियाणा सिविल सर्विस कंपीट कर के भारती के साथ चंडीगढ़ में ही हैं.

आर्थिक मजबूती जरूरी

यह पूछने पर कि वे किन समस्याओं पर सब से पहले ध्यान देना चाहती हैं? तो शिवजीत बताती हैं, ‘‘मैं हरियाणा में सैक्स रेश्यो के इम्प्रूवमेंट के लिए काम करना चाहेंगी जिस में हरियाणा काफी कमजोर है. दूसरी कोशिश ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ के लिए करना चाहेंगी. सोसाइटी में अपनी जगह बनाने के लिए महिलाओं और लड़कियों का आर्थिक रूप से इंडिपैंडैंट होना काफी जरूरी है.

ऐसी महिलाएं बच्चों को भी एक अलग प्रोस्पैक्टिव दे सकती हैं. महिला घर से भी काम कर सकती है. छोटे बिजनैस कर सकती है. इस से महिला का आत्मविश्वास बढ़ता है और परिवार को भी आर्थिक सहयोग मिलता है.’’अपने संघर्ष के बारे में बताते हुए शिवजीत कहती हैं, ‘‘मेरे पिता न्यूज पपेर बेचने का काम करते थे. मां आंगनबाड़ी में काम करती हैं. 1 बहन और 1 भाई और है. भाई स्पैशल चाइल्ड है. हम फाइनैंशियली स्ट्रौंग नहीं थे, मगर मेरे पेरैंट्स सपोर्टिव थे. जब मैं पढ़ाई के लिए दिल्ली गई तो सोसाइटी में सब बोलते थे कि बेटी को इतनी दूर भेज दिया. तब लोग मेरे पिता को समझते थे कि इस की शादी करा दो. मगर मेरे पेरैंट्स ने उन की बातों पर ध्यान नहीं दिया और तभी आज मैं इस मुकाम पर हूं.’’

आज भी महिलाओं के लिए समाज की स्टीरियोटाइप थिंकिंग से पार पाना कितना मुश्किल है? इस सवाल के जवाब में शिवजीत कहती हैं, ‘‘अगर फैमिली खासकर पेरैंट्स सपोर्टिव हैं, आप का हस्बैंड और बौस की सपोर्ट है और आप के अंदर आत्मविश्वास है तो आप हर बाधा पार कर सकती हैं. यही वजह है कि लाख बाधाओं के बावजूद महिलाओं ने खुद को हमेशा प्रूव किया है. महिलाओं में किसी भी परेशानी या दुख से उबरने और कठिनाइयों से लड़ने की क्षमता बहुत अधिक होती है.’’

मां से मिली प्रेरणा

शिवजीत भारती को हमेशा अपनी मां से प्रेरणा मिली है. वे बताती हैं, ‘‘मेरा भाई स्पैशल चाइल्ड है जबकि मां वर्किंग वूमन थीं. वे घर का काम भी करती थीं और जौब भी. मेरे भाई को भी संभालती थीं. यदि किसी के घर में स्पैशल चाइल्ड होता है तो इंसान और सबकुछ भूल जाता है. जौब भी भूल जाता है और दूसरे बच्चों को भी. मगर मेरी मां ने सबकुछ बहुत अच्छे से संभाला.

संदेश

महिलाओं को संदेश देते हुए भारती कहती हैं, ‘‘वे यह न सोचें कि बेटी हैं तो उन की ऐजुकेशन, जौब या ऐंपावरमैंट औप्शनल है. जितना यह सब बेटे के लिए जरूरी है उतना ही बेटी के लिए भी. फाइनैंशियल इंडिपैंडैंस औप्शनल नहीं है. महिलाएं जब पढ़ेंगी और अपने पैरों पर खड़ी होंगी तभी दुनिया बदलेगी, समाज में समानता आएगी.’’

महिला असफल हो जाए तो लोग उस की क्षमता पर सवाल उठाते हैं- विदिशा बथवाल

विदिशा एक बिजनैस फैमिली से आती हैं और उन्होंने बिजनैस की डिगरी भी हासिल की है. उन की शादी भी एक व्यावसायिक परिवार में ही हुई. यही वजह है कि उन के मन में भी अपना खुद का बिजनैस शुरू करने का जनून जगा.

उन्होंने 2011 में पैपरिका की शुरुआत की जिस का उद्देश्य कोलकाता के लोगों को रैस्टोरैंट स्टाइल फैसी कुक्ड मील्स मुहैया कराना था. एक दशक से भी अधिक समय से यह ब्रैंड कोलकाता का प्रीमियम और पसंदीदा गोरमे डैस्टिनेशन बना हुआ है.

विदिशा बताती हैं, ‘‘मैं हमेशा से एक ऐसा व्यवसाय करना चाहती थी जिसे अपना कह सकूं और जिस से मुझे पहचान मिले. मैं शुरू में लंदन में हेज फंड ऐनालिस्ट के रूप में काम कर रही थी. फिर वह नौकरी छोड़ दी और कोलकाता चली गई. वहीं इस बिजनैस का विचार दिमाग में आया.

कई पुरस्कार जीते

पैपरिका के साथ अपने एक दशक के लंबे सफर के दौरान विदिशा ने कई पुरस्कार भी जीते. मसलन, 2012 में गौरमे के क्षेत्र में ‘अपराजिता पुरस्कार,’ 2018 में ‘गो गेटर वाईएफएलओ कोलकाता गौरमंड’, 2018 में ‘जस्ट डायल पैपरिका टेक अवे’ और 2019 में फिक्की द्वारा संजीव कपूर कुकिंग कंपीटिशन में भी पुरस्कार हासिल किया.

क्या आज भी महिलाओं के लिए समाज की रूढि़वादी सोच से पार पाना मुश्किल है? इस सवाल के जवाब में विदिशा कहती हैं, ‘‘लड़कियों को इसी मानसिकता के साथ बड़ा किया जाता है कि युवा होते ही उन की शादी कर दी जाए और उन के बच्चे हो जाएं. फिर सारी जिंदगी घरपरिवार के कामों में उलझे रहें. अगर कोई महिला अपना बिजनैस शुरू करना चाहे तो उस का अपना ही परिवार, दोस्त, रिश्तेदार और समाज के लोग उसे पीछे खींचते हैं. कभीकभी जब एक महिला अपना बिजनैस शुरू करती है और कोई समस्या आती है तो उस की क्षमता पर सवाल उठता है. लोग कहने लगते हैं कि हमें पता था तुम से नहीं होगा.

शाम के बाद लड़की घर से नहीं निकलेगी भले ही उस का कैटरिंग इवेंट मैनेज करने के लिए शाम में जाना जरूरी हो. इस तरह उस के पैर बांधने की कोशिश की जाती है.’’

एक घटना ने बदली जिंदगी

जिंदगी की कोई घटना जिस ने आप के जीवन की दिशा बदल दी हो? इस सवाल के जवाब में विदिशा कहती हैं, ‘‘अपने कैरियर की शुरुआत में मैं ने कोलकाता में एक बौंबे कंपनी की फ्रैंचाइजी ली थी. हालांकि यह अच्छा नहीं चल रहा था और मुझे भारी मन से उस बिजनैस को बंद करना पड़ा. इस निर्णय ने मेरे विजन को और भी मजबूत बना दिया. मैं ने जो भी निवेश कर के बौंबे फ्रैंचाइजी शुरू की थी वह मैं नहीं चाहती थी कि यह बरबाद हो जाए. इसलिए मैं ने उसी से अपना कैटरिंग क्लाउड किचन शुरू किया और फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा.’’

इस फील्ड में कितना कंपीटिशन है? इस के जवाब में वे कहती हैं, ‘‘12 साल पहले जब मैं ने काम शुरू किया था तब से अब तक प्रतिस्पर्धा  काफी बढ़ गई है. बहुत सारे कम उम्र के लड़के हों या लड़कियां इस बिजनैस में आ रहे हैं.  वे प्रौपर ट्रेनिंग ले रहे हैं और प्रोफैशनल शेफ बन रहे हैं. इस से प्रतिस्पर्धा बढ़ती है क्योंकि वे बिजनैस के सभी गुर सीख रहे हैं और अपने स्वयं के कैफे, रेस्तरां खोल रहे हैं जो एक तरह से बहुत अच्छा है.’’

विदिशा कहती हैं, ‘‘हम ने दुबई, संयुक्त अरब अमीरात में इस नाम के साथ कैटरिंग शुरू की. दुबई ने हम पर ढेर सारा प्यार बरसाया और हमारे ब्रैंड का खुले हाथों से स्वागत किया. हम अपनी कैटरिंग पेरुवियन कोरियन और मैक्सिकन तक फैला रहे हैं. मैं रचनात्मकता और जनून में दृढ़ विश्वास रखती हूं और मैं इस बात पर जोर देती हूं कि व्यक्ति को हमेशा ऊंचा लक्ष्य रखना चाहिए. मेरा लक्ष्य भविष्य में रैस्टोरैंट खोलने का है.

21 साल बाद मिसेज वर्ल्ड का ताज भारत लाना गर्व भरा पल था- सरगम कौशल, मिसेज वर्ल्ड 2022

मिसेज वर्ल्ड का खिताब 21 साल बाद फिर एक बार भारत के नाम हुआ. 2022 में यह खिताब सरगम कौशल ने जीता, जो एक मौडल हैं, मगर मौडलिंग की दुनिया में कदम रखने से पहले वे विशाखापट्टनम में अध्यापन का कार्य कर रही थीं. मिसेज वर्ल्ड का खिताब इस से पहले वर्ष 2001 में डा. अदिति गोवित्रीकर ने जीता था.

सरगम का जन्म 17 सितंबर, 1990 को हुआ था. जम्मू कश्मीर की रहने वाली सरगम कौशल अभी 32 वर्ष की हैं. 2018 में उन की शादी आदित्य मनोहर शर्मा से हुई जो भारतीय नौसेना में लैफ्टिनैंट कमांडर हैं. सरगम अपनी कामयाबी का क्रैडिट अपने पिता और पति को देती हैं, जो उन के हर कदम और फैसले में साथ खड़े रहते हैं.

सरगम के पिता जी.एस. कौशल बैंक औफ इंडिया में चीफ मैनेजर के पद से रिटायर हुए हैं और माता रीमा खजुरिया गृहिणी हैं. सरगम का एक छोटा भाई मंथन कौशल है.

लड़कियां हर क्षेत्र में आगे

सरगम को मिसेज वर्ल्ड का ताज मिलने के बाद जब लोग उन के मातापिता को बधाई देने पहुंचे तो बेटी की इस सफलता पर खुशी व्यक्त करते हुए उन की मां ने कहा, ‘‘आज हम सरगम के नाम से पहचाने जा रहे हैं. हमारी बेटी ने अपनी इच्छाशक्ति और मेहनत से इस मुकाम को हासिल किया है और इस में उस के पति आदित्य का बड़ा योगदान है. यह न सिर्फ जम्मू कश्मीर वरन पूरे देश के लिए गर्व की बात है. वर्तमान समय में लड़केलड़कियां बराबर हैं. आज लड़कियां हर क्षेत्र में आगे हैं.

मैं लोगों से कहना चाहूंगी कि जब भी मौका मिले लड़कियों के लिए कुछ न कुछ जरूर करें. उन्होंने प्रेरित करें और उन का सहारा बनें. बेटियां परिवार के साथ देश का नाम भी रोशन करती हैं, यह सरगम ने सच कर दिखाया है.’’

भारतीयों के लिए गर्व का क्षण

शादी के बाद सरगम जब मुंबई आईं तब उन्हें मौडलिंग का चस्का चढ़ा. उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और जल्द ही वे इंडस्ट्री में स्थापित हो गईं. उन के ससुराल वालों ने भी उन का पूरा साथ दिया. जब उन्होंने मिसेज वर्ल्ड प्रतियोगिता में भाग लेने का फैसला किया तो घर वालों ने उन का हौसला बढ़ाया. एक कठिन प्रतियोगिता जो कई राउंड में समाप्त हुई और जब स्टेज पर ‘मिसेज वर्ल्ड’ का नाम अनाउंस हुआ, तो अपना नाम सुन कर सरगम कौशल हैरान रह गईं. खिताब लेते वक्त उन की आंखों में आंसू थे. इमोशनल मोमैंट की झलक शेयर करते हुए  इंस्टाग्राम अकाउंट पर सरगम ने कैप्शन में लिखा, ‘‘लंबा इंतजार खत्म हुआ,

21 साल बाद हमारे पास ताज वापस आया है.’’उन की इस जीत से भारत का सिर फक्र से ऊंचा हुआ. भारतीयों के लिए वह गर्व का क्षण था. मिसेज वर्ल्ड दुनिया का पहला ऐसा ब्यूटी पेजैंट है, जिसे शादीशुदा महिलाओं के लिए बनाया गया है. इस की शुरुआत 1984 में हुई थी. पहले इस का नाम ‘मिसेज अमेरिका’ था, जिसे बाद में ‘मिसेज वूमन औफ द वर्ल्ड’ कर दिया गया. मगर 1988 में एक बार फिर इस का नाम बदला और इस आयोजन को ‘मिसेज वर्ल्ड’ का नाम दिया गया. पहला मिसेज वर्ल्ड खिताब जीतने वाली महिला श्रीलंका की रोजी सेनानायाके थीं.

पिछले दिनों सरगम अपने शहर जम्मू पहुंचीं जहां लोगों ने उन का जोरदार स्वागत किया. सरगम ने जम्मू के एक कार्यक्रम में अपनी खुशी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘लोगों के प्यार और मातापिता के आशीर्वाद से मुझे यह खिताब मिला. मैं महिलाओं से यही कहना चाहती हूं कि अपने लिए हमेशा प्लान बी भी तैयार रखें. मैं यदि मौडलिंग के क्षेत्र में नाम नहीं बना पाती तो मेरा प्लान बी टीचर बनना था. यदि एक रास्ता बंद होता दिखे तो बिना समय बरबाद किए दूसरा रास्ता ढूंढ़ने में ही समझदारी है.’’

बच्चों को बड़ा करना आज भी मां की जिम्मेदारी मानी जाती है- डा. अरुणा अगरवाल, चाइल्ड साइकोलौजिस्ट

डा.अरुणा अगरवाल शिक्षिका, उद्यमी और बाल मनोवैज्ञानिक हैं जो 20 वर्षों से मनोविज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं. मुंबई में रहने वाली अरुणा किडजी (प्रीप्राइमरी) और माउंट लिटेरा जी स्कूल (प्राइमरी) पवई की फाउंडर हैं. वे मनोविज्ञान में मास्टर्स के साथसाथ क्वालिफाइड चाइल्ड साइकोलौजिस्ट/बिहेवियर थेरैपिस्ट भी हैं.

अरुणा अगरवाल मूल रूप से दिल्ली से हैं. 25 साल पहले शादी के बाद मुंबई चली आईं. उन की ससुराल पारंपरिक मारवाड़ी फैमिली थी जब कि वह खुद पंजाबी फैमिली से आती हैं. उन के पति बिजनेसमैन हैं.

शिक्षा और बाल मनोविज्ञान

अरुणा को बच्चों के लिए कुछ करना था. अत: उन्होंने अपने इस जनून के लिए स्टैंड लिया और पति ने भी सहयोग दिया. यही वजह है कि जैसे ही दोनों बेटे स्कूल जाने लगे तो अरुणा ने अपनी आगे की पढ़ाई कंटिन्यू कर ली और बिहेवियरल थेरैपिस्ट बन गईं. उन का मानना है कि उम्र कोई भी हो पढ़ाई और सीखना हमेशा जारी रखना चाहिए. अपडेट रहने से ही नई जैनरेशन के साथ कनैक्ट कर पाना संभव है. इस के बाद 2004 में उन्होंने अपने स्कूल की शुरुआत की.

फिलहाल उन का स्कूल 2 से 10 वर्ष की आयु के वैसे बच्चों के लिए है जो बिहेवियर, भाषा विकास या अटैंशन इशू से संबंधित चुनौतियों का सामना करते हैं.

अरुणा ‘वियोला’ नाम की एक सामाजिक ट्रस्ट भी चलाती हैं जो प्राइमरी स्कूल के छात्रों के लिए हाई क्वालिटी ऐजुकेशन प्रदान करती है. अरुणा औपटिमिस्ट हैं. उन के अनुसार आत्मविश्वास लोगों को किसी भी स्थिति को संभालने की क्षमता दे सकता है.

शिक्षा और बाल मनोविज्ञान में अरुणा के उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें कई अवार्ड्स भी मिले हैं. ‘वूमंस अचीवर्स अवार्ड’, ‘यंग ऐन्वायरन्मैंटलिस्ट अवार्ड्स’ के साथसाथ जी लर्न द्वारा भी कई और अवार्ड्स मिले हैं.

बच्चों को मोबाइल से दूर रखें

आज भी महिलाओं को समाज की स्टीरियोटाइप सोच से पार पाना कितना कठिन है? यह पूछे जाने पर अरुणा कहती हैं, ‘‘हमारे यहां आज भी बच्चे को बड़ा करना मां की ही जिम्मेदारी मानी जाती है. यह माना जाता रहा है कि अगर एक महिला कामकाजी है तो भी उसे घर भी संभालना है, बच्चों को भी देखना है और बाहर भी मैनेज करना है. मगर पुरुषों से कभी नहीं कहा जाता कि उन्हें भी बच्चों की परवरिश या किचन में योगदान देना चाहिए.’’

छोटे बच्चों को बिहेवियरल और साइकोलौजी से जुड़ी किस तरह की समस्याओं का सामना अकसर करना पड़ता है? इस सवाल के जवाब में वे कहती हैं, ‘‘छोटे बच्चों का स्क्रीन टाइम बहुत ज्यादा हो गया है. उन्हें बाहर जा कर खेलने का मौका नहीं मिलता. पेरैंट्स वर्किंग होते हैं. उन के लिए यह बहुत आसान होता है कि बच्चे के हाथ में मोबाइल दे कर उसे व्यस्त रखो. फिर धीरेधीरे वह इस का आदी हो जाता है और उस की लैंग्वेज डेवलप नहीं हो पाती.

‘‘इस के विपरीत समय पर लैंग्वेज डैवलप होने से यह समस्या नहीं आती. कोविड-19 के बाद इस तरह की समस्याएं काफी आ रही हैं. ऐसे हालात में मैं पेरैंट्स को गाइड करती हूं कि आप क्या करें ताकि बच्चा नौर्मल बिहेव करना शुरू करे. यदि छोटा बच्चा पूरा समय मेड के सहारे है तो वह अकेलापन फील करता है और उस में साइकोलौजिकल प्रौब्लम आ सकती हैं.’’

अवेयरनैस जरूरी है

अरुणा कहती हैं, ‘‘महिलाओं की सब से बड़ी ताकत यह है कि महिलाएं मल्टीटास्किंग कर सकती हैं. घरबाहर और बच्चों को भी एकसाथ देख सकती हैं. उन्हें खुद पर विश्वास रखना चाहिए. अपने बारे में सोचना न छोड़ें. कम से कम 1 घंटा खुद को जरूर दें. अकसर बच्चा महिलाओं की जिंदगी का सैंटर बन जाता है. लेकिन लाइफ में बैलेंस और टाइम मैनेजमैंट बहुत जरूरी है.’’

पैसे की कमी के कारण कई बार हौकी छोड़ने का विचार आया- रानी रामपाल, हौकी खिलाड़ी

हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के शाहबाद में एक गरीब परिवार में 4 दिसंबर, 1994 को जन्मी रानी रामपाल के पिता परिवार का पेट पालने के लिए टांगा चलाते थे. दिन भर में बमुश्किल 100 रुपए उन की कमाई होती थी जिस में पत्नी, 3 बच्चे, अपना और घोड़े का खाना जुटाना मुश्किल होता था. रानी के दोनों बड़े भाइयों ने जब होश संभाला तो पिता का हाथ बंटाने के लिए एक भाई ने एक दुकान में सेलसमैन की नौकरी कर ली और दूसरा बढ़ई बन गया.

पिता की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण रानी का स्कूल में एडमिशन बड़ी मुश्किल से हुआ. रानी स्कूल के मैदान में दूसरे बच्चों को हौकी खेलते हुए देखती थी. उस समय उन की उम्र सिर्फ 6 साल थी. हौकी का खेल उन्हें आकर्षित करती थी.

कभीकभी वे दूसरे बच्चों से हौकी स्टिक ले कर खेलने लगती थीं. धीरेधीरे हौकी पर उन का हाथ जमने लगा. स्कूल के बच्चे अकसर उन को अपने साथ खिलाने लगे.

पैसे की समस्या

एक दिन रानी ने अपने पिता से हाकी खेलने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन पिता राजी नहीं हुए. उस समय लड़कियों का हाफ पैंट पहन कर हौकी खेलना बहुत बड़ी बात थी. जिस लोकैलिटी में उन का परिवार रहता था वहां बेटियों का हाफ पैंट पहनने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था.

रानी के बहुत जिद करने के बाद उन के पिता ने रानी का दाखिला शाहाबाद हौकी ऐकैडमी में करवा दिया. एडमिशन तो मिल गया, लेकिन मुश्किल यह थी कि रानी के पिता के पास इतने पैसे नहीं होते थे कि वे उन की कोचिंग की फीस चुका सकें. कई बार भाइयों ने कुछ पैसे जमा कर बहन को दिए तो कभी पिता ने उधार ले कर फीस चुकाई. रानी ने इस कारण कई बार हौकी छोड़ने के बारे में सोचा. लेकिन जब पैसे की समस्या की बात उन के कोच बलदेव सिंह और कुछ सीनियर खिलाडि़यों के सामने आई तो उन्होंने रानी को समझाया और उन की आर्थिक मदद की.

खेल के साथ पढ़ाई

खेल के साथसाथ रानी की पढ़ाई भी चलती रही. स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने बीए में एडमिशन ले लिया लिया लेकिन अभ्यास के कारण वे ग्रैजुएशन पूरा नहीं कर पाईं.

रानी रामपाल ने 212 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले और भारतीय महिला हौकी टीम की कप्तान बनीं. रानी ने जून, 2009 में रूस के कजान में आयोजित चैंपियंस चैलेंज टूरनामैंट में खेला और फाइनल में 4 गोल कर के भारत को जीत दिलाई. उन्हें ‘द टौप गोल स्कोरर’ और ‘यंग प्लेयर औफ द टूरनामैंट’ चुना गया. नवंबर, 2009 में आयोजित एशिया कप में भारतीय टीम के लिए रजत पदक जीतने में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.

2010 राष्ट्रमंडल खेलों और 2010 एशियाई खेलों में भारत की राष्ट्रीय टीम के साथ खेलने के बाद रानी रामपाल को 2010 की एफआईएच महिला औल स्टार टीम में नामांकित किया गया. वे ‘वर्ष की युवा महिला खिलाड़ी’ पुरस्कार के लिए नामांकित हुईं. उन्हें ग्वांगझोउ में 2010 एशियाई खेलों में उन के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें एशियाई हौकी महासंघ की औल स्टार टीम में भी शामिल किया गया था. 2010 में अर्जेंटीना के रोसारियो में आयोजित महिला हौकी विश्व कप में उन्होंने कुल 7 गोल किए, जिस ने भारत को विश्व महिला हौकी रैंकिंग में 9वें स्थान पर रखा.

लाजवाब प्रदर्शन

उन्हें 2013 जूनियर विश्व कप में ‘टूरनामैंट का खिलाड़ी’ चुना गया था. 2013 के जूनियर विश्व कप में उन्होंने भारत को पहला कांस्य पदक दिलाया. उन्हें 2014 के फिक्की कमबैक औफ द ईयर अवार्ड के लिए नामित किया गया. वे 2017 महिला एशियाई कप का हिस्सा रहीं और 2017 में जापान के काकामीगहारा में दूसरी बार खिताब भी जीता था.

रानी ने भारतीय खेल प्राधिकरण के साथ सहायक कोच के रूप में भी काम किया. राष्ट्रमंडल खेलों में रानी रामपाल का प्रदर्शन लाजवाब रहा है. 2020 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया.

टैनिस की वजह से ही कुश्ती से जुड़ पाई-विनेश फोगाट, रैसलर

2006 रियो ओलिंपिक. कुश्ती के मैट पर भारत की विनेश फोगाट और चीन की सुन यान आमनेसामने थीं. मुकाबला था क्वार्टर फाइनल और विनेश फंसी थीं सुन यान के एक दांव में. भारतीय पहलवान ने अपनी प्रतिद्वंद्वी की पकड़ से बाहर निकलने की कोशिश की और इस संघर्ष में उन का दाहिना घुटना चोटिल हो गया.

ये पल विनेश फोगाट के लिए सब से ज्यादा दर्दनाक पलों में से थे क्योंकि इस के बाद वे रियो ओलिंपिक में आगे नहीं बढ़ पाई थीं. तब फूटफूट कर रोती विनेश फोगाट ने कहा था, ‘‘मुझे अभी भी पता नहीं है कि क्या हुआ था. मैं बस उठ कर जारी रखना चाहती थी, लेकिन मेरे पैर काम नहीं कर रहे थे.

‘‘मैं चाह रही थी कि कोई मुझे दर्द दूर करने की दवा दे दे. मैं फिर से वहां जाना चाहती थी. मैं ने अभी हार नहीं मानी थी. मैं हार मानने वालों में से नहीं हूं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मैं सबकुछ देख सकती थी और वहां असहाय पड़ी हुई थी.’’

खेल के प्रति लगाव

विनेश फोगाट का वह आंखों में नमी वाला गमगीन चेहरा कोई भी कुश्ती प्रेमी नहीं भूल पाएगा और शायद वह चेहरा भी नहीं भूल पाएगा, जब इस साल के जनवरी महीने में विनेश फोगाट दिल्ली के जंतरमंतर पर अपने साथी पहलवानों के साथ एक अलग ही लड़ाई लड़ने के लिए बैठी थीं. तब उन की आंखों का सूनापन साफ बता रहा था कि सर्द सड़क पर हो रही यह हक की लड़ाई उस कुश्ती से कितनी ज्यादा मुश्किल है, जहां अपने जैसे खिलाडि़यों की आवाज को अपनों के सामने ही बुलंद करना है.

विनेश फोगाट उन्हीं महिला पहलवान बबीता और गीता फोगाट की चचेरी बहन हैं, जिन के जीवन पर आमिर खान ने फिल्म ‘दंगल’ बनाई थी. अपनी बहनों से प्रेरणा पा कर और ताऊजी महाबीर फोगाट से प्रशिक्षण ले कर विनेश फोगाट ने कुश्ती खेलना शुरू किया था. लेकिन यह सब उतना आसान नहीं था, जितनी आसानी से विनेश फोगाट सामने वाली पहलवान को चित कर देती हैं.

सब से हैरत की बात तो यह कि विनेश फोगाट का पहला प्रेम कुश्ती को ले कर नहीं था, बल्कि लौन टैनिस पर वे अपनी जान छिड़कती थीं. उन का कहना है, ‘‘बचपन से ही मुझे इस खेल के प्रति लगाव था. मैं टैनिस सितारों के पोस्टर जमा करती थी. सानिया मिर्जा की मैं बहुत बड़ी फैन हूं. उन का जब भी अखबार में फोटो आता था, तो मैं उसे काट कर अपनी बुक में लगा लेती थी. पता नहीं मैं कभी टैनिस खेल पाती या नहीं, पर शायद इसी वजह से मैं कुश्ती से जुड़ पाई हूं.’’

हरियाणा के चरखी दादरी जिले के गांव बलाली की रहने वाली विनेश फोगाट की मां प्रेमलता को 2003 में बच्चेदानी में कैंसर हो गया था. यह खबर परिवार को हिला देने वाली थी, पर तभी रोडवेज विभाग में चालक विनेश फोगाट के पिता राजपाल फोगाट की मौत हो गई. विनेश तो तब नादान थीं, पर कैंसर और पति की मौत ने प्रेमलता को बुरी तरह झकझोर दिया था.

विनेश फोगाट ने उन दिनों को याद करते हुए बताया, ‘‘मेरी मां बड़े जीवट वाली महिला हैं. उन्होंने हार नहीं मानी और अपने तीनों बच्चों का भविष्य संवारने के लिए कैंसर से जंग लड़ने की ठानी. उन्होंने औपरेशन करा कर बच्चेदानी को निकलवा दिया. उस समय मेरा भाई हरविंद्र 10वीं, बड़ी बहन प्रियंका 7वीं और मैं चौथी क्लास में पढ़ती थी.’’

दर्जनों मैडल नाम किए

विनेश फोगाट ने 13 दिसंबर, 2018 को अपनी शादी में 7 के बजाय 8 फेरे लिए थे. यह 8वां फेरा ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और बेटी खिलाओ’ संदेश को समर्पित था. उन के पति सोमवीर राठी भी पहलवान हैं, जिहोंने दहेज के नाम पर एक रुपया लिया था. कुश्ती के लिए 2020 में ‘मेजर ध्यानचंद खेल रत्न अवार्ड’ और 2016 में ‘अर्जुन अवार्ड’ जीतने वाली विनेश फोगाट ने एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को सोने के तमगे दिलाने के अलावा कई दूसरे इंटरनैशनल मुकाबलों में भी दर्जनों मैडल अपने नाम किए हैं और यह साबित किया है कि असली खिलाड़ी वही है, जो अपने संघर्षों से जूझ कर बड़ी वापसी करता है.

सफल स्टार्टअप खड़ा करना है तो सबसे पहले खुद पर भरोसा करना होगा- विनीता सिंह

गुजरात के एक छोटे से गांव में जन्मीं विनीता सिंह ऐसी ही युवा व्यवसायी हैं. अपने पहले 2 स्टार्टअप में सफल न हो पाने के बावजूद विनीता का खुद पर भरोसा डगमगाया नहीं. अपनी योग्यता और मेहनत के दम पर फिर से एक ऐसी कंपनी शुरू करने का प्लान बनाया जो महिलाओं के लिए हो और जिस में महिलाएं रोजगार भी पा सकें. उन्होंने चुनौतियों के सामने कभी घुटने नहीं टेके और फिर इस तरह शुगर कौस्मैटिक्स का जन्म हुआ.

जिंदगी का सफरनामा

विनीता का जन्म 1983 में हुआ था. उन के पिता तेज पाल सिंह एम्स के साइंटिस्ट थे और मां पीएचडी होल्डर. विनीता ने दिल्ली पब्लिक स्कूल से पढ़ाई की और ग्रैजुएशन करने के लिए आईआईटी मद्रास चली गईं. इस के बाद उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए की डिगरी प्राप्त की. विनीता के पति कौशिक मुखर्जी हैं. दोनों की मुलाकात एमबीए करने के दौरान हुई थी और 2011 में दोनों ने शादी कर ली.

स्टार्टअप्स की प्लानिंग के शुरुआती दिनों को याद करते हुए विनीता कहती हैं, ‘‘मुझे और कौशिक को यह एहसास हो गया था कि अब युवतियां बंधनों से आजाद हो कर बाहर भी निकल रही हैं और अपना रास्ता भी खुद बना रही हैं. फिर हम ने फैबबैग की शुरुआत की.’’

शुगर की शुरुआत

अपने व्यवसाय के अनुभवों से विनीता को यह एहसास हो गया था कि महिलाएं आखिर ब्यूटी इंडस्ट्री से किस बात की उम्मीद रखती हैं. उन्होंने फैबबैग के दौरान मिले कंज्यूमर फीडबैक को आधार बना कर यह समझ लिया कि ब्यूटी इंडस्ट्री में ट्रांसफर प्रूफ और लंबे समय तक टिकने वाले मेकअप की डिमांड ज्यादा है. विनीता ने ब्यूटी वर्ल्ड में पाई जमाने की शुरुआत की क्रेयौन लिपस्टिक्स से.

विनीता ने स्टार्टअप शुरू करने की चाह रखने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए एक बार ट्वीट किया था, ‘‘यदि आप अपनी कौरपोरेट जौब को छोड़ कर स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं तो सफल होने के लिए सब से जरूरी है खुद पर भरोसा करना. यदि खुद पर भरोसा न हो तो उतारचढ़ाव भरे इस सफर में आप डगमगा सकते हैं.’’

आज शुगर कौस्मैटिक्स भारत के टौप 3 ब्यूटी ब्रैंड्स में शामिल है और देशभर में इस के 45 हजार से भी ज्यादा आउटलेट्स हैं.

शुगर ब्रैंड शुरू करने के उद्देश्य के बारे में विनीता कहती हैं, ‘‘मैं हमेशा से ऐसा काम करना चाहती थी जिस में मेरी मुख्य ग्राहक महिलाएं ही हों. जब मेरे पहले 2 स्टार्टअप सफल नहीं हुए तो मैं ने अपने पति कौशिक के साथ 2012 में सब्सक्रिप्शन मौडल पर आधारित ब्यूटी ब्रैंड शुरू करने का प्लान बनाया. धीरेधीरे हमारे पास लगभग 2 लाख महिलाओं ने अपनी ब्यूटी से जुड़ी प्राथमिकताएं भेजीं और फिर 2015 में कंज्यूमर ब्यूटी ब्रैंड शुगर कॉस्मेटिक्स लौंच हुआ.’’

अब जज करने की बारी

स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने वाले ‘शार्क टैंक’ के बारे में आज हरकोई जानता है. ‘शार्क टैंक’ के सफर के बारे में बात करते हुए विनीता कहती हैं, ‘‘लगभग 15 साल पहले तक स्टार्टअप व्यवसायी को बेरोजगार ही माना जाता था. अब ‘शार्क टैंक’ की वजह से यह सोच बदल रही है. खुद के लिए फंड रेज करने से ले कर इनवैस्टर बनने तक की राह थोड़ी मुश्किल भरी थी, लेकिन खुश हूं कि अपने आत्मविश्वास के बलबूते मैं यह सब कर सकी.’’

अपने दम पर पहचान बनाने की चाह रखने वाली महिलाओं के लिए विनीता का कहना है, ‘‘आज जो भी महिला स्टार्टअप शुरू करने की सोच रही है उसे सब से पहले खुद की स्किल्स पर अटूट भरोसा करना होगा. माना कि आज भी महिलाओं का नंबर स्टार्टअप की दुनिया में बेहद कम है, लेकिन जिस तरह से महिलाएं आगे आ रही हैं उस से साफ है कि वह दिन दूर नहीं जब इस क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों से आगे निकल जाएंगी.’’

छोटे भाई को खेलते देख 9 साल की उम्र में ही बल्ला उठा लिया- स्मृति मंधाना, क्रिकेटर

बेहद स्टाइलिश, खूबसूरत और शानदार बल्लेबाज स्मृति मंधाना क्रिकेट के क्षेत्र में अपने आदर्श विराट कोहली के नंबर की जर्सी 18 पहन कर जब पिच पर उतरती हैं तो विरोधियों के छक्के छुड़ा देती हैं.

बांएं हाथ की इस आक्रामक बल्लेबाज का औफ साइड में खेलने का अंदाज बिलकुल सौरव गांगुली की तरह आकर्षक है. वहीं लेग साइड में वे युवराज सिंह की तरह शानदार शौट खेलती हैं. वे गौतम गंभीर की तरह स्टेट ड्राइव भी लगाती हैं. क्रिकेट के क्षेत्र में बहुत कम ऐसे खिलाड़ी हैं जो औन साइड और औफ साइड दोनों तरफ एक समान शानदार खेलने के दक्षता रखते हैं.

बचपन में अपने बड़े भाई श्रवण मंधाना को क्रिकेट खेलते देख स्मृति ने 9 साल की छोटी सी उम्र में बल्ला उठा लिया था. उन के पिता श्रीनिवास मंधाना भी डिस्ट्रिक्ट लैवल पर क्रिकेट के खिलाड़ी रह चुके हैं. पिता और भाई ने जोश दिलाया तो स्मृति का बल्ला देखते ही देखते चौकेछक्के जड़ने लगा. प्रैक्टिस इतनी जबरदस्त कि मात्र 11 साल की उम्र में उन का अंडर-19 टीम में चयन हो गया.

कैरियर का टर्निंग पौइंट

2013 में गुजरात के खिलाफ वनडे घरेलू मैच में स्मृति ने 150 गेंदों में 224 रन बना कर सब को प्रभावित किया. स्मृति मंधाना इस दोहरे शतक से भारत की पहली महिला क्रिकेट खिलाड़ी बनीं जिस ने दोहरा शतक बनाया. इस शतक ने स्मृति को रातोंरात भारतीय महिला क्रिकेट का स्टार खिलाड़ी बना दिया.

इसी साल मंधाना ने भारत के लिए वनडे और टी-20 में डेब्यू किया और फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. 2013 स्मृति के क्रिकेट कैरियर का टर्निंग पौइंट रहा.

स्मृति मंधाना अपने शानदार खेल से न केवल भारत में बल्कि आस्ट्रेलिया और इंगलैंड में भी काफी लोकप्रिय हैं. स्मृति आस्ट्रेलियाई बिग बैश लीग में खेलने वाली भारत की दूसरी खिलाड़ी हैं. स्मृति बिग बैश ब्रिस्बेन हीट वूमन के लिए खेलती हैं. अपने शानदार खेल से उन्होंने बिग बैश लीग में भी कमाल का खेल दिखाया है. इंगलैंड के ‘द हंड्रेड क्रिकेट लीग’ में भी स्मृति का बल्ला जम कर बोला. साउथर्न ब्रेव से खेलते हुए स्मृति ने काफी बेहतरीन पारियां खेलीं. स्मृति में यह खूबी है कि वे मैच की स्थिति के अनुसार अपने खेल को ढाल लेती हैं. जब आक्रामक खेलना होता है तो लंबेलंबे छक्के लगाती हैं और जब रक्षात्मक खेलना होता है तब फील्डर्स के बीच से खूबसूरत चौके लगाती हैं.

स्मृति मंधाना पहली भारतीय महिला क्रिकेटर हैं जिन्होंने वनडे में दोहरा शतक जमाया. स्मृति ने घेरलू क्रिकेट में गुजरात के खिलाफ खेलते हुए दोहरा शतक लगाने का करिश्मा किया था. इस महिला बल्लेबाज ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ पिंक बौल टैस्ट क्रिकेट में भी शतक जमाया था. पिंक बौल टैस्ट में शतक जमाने वाली वे पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं.

बड़ा योगदान

2017 महिला वर्ल्ड कप में स्मृति ने शानदार खेल दिखाते हुए 2 शतक जड़े और भारत को फाइनल तक ले जाने में बड़ा योगदान दिया.

2018 में स्मृति मंधाना को उन के बेहतरीन प्रदर्शन के लिए बीसीसीआई ने ‘वूमन इंटरनैशनल क्रिकेट अवार्ड’ से नवाजा. 2019 में भारत सरकार ने अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया. 2019 में ही स्मृति को इंटरनैशनल क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन के लिए ‘आईसीसी वूमन वनडे प्लेयर औफ द ईयर’ से भी सम्मानित किया गया. इसी साल स्मृति मंधना को आईसीसी ‘वूमन क्रिकेटर औफ द ईयर अवार्ड’ से भी नवाजा गया. स्मृति 2022 में भी सभी प्रारूपों में उत्कृष्ट खेल दिखने के लिए आईसीसी द्वारा ‘क्रिकेटर औफ द ईयर’ 2022 अवार्ड के लिए चुना गया.

26 साल की मेधावी क्रिकेटर स्मृति मंधाना सब से कम उम्र में कप्तानी संभालने वाली भारतीय कप्तान रही हैं. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय महिला क्रिकेट टीम को एक स्तर पर पहुंचने में उन का बहुत बड़ा योगदान है.

मीठी परी: भाग 2- सिम्मी और ऐनी में से किसे पवन ने अपनाया

संजना के मायके वाले उसे डिलीवरी के लिए अपने पास रखना चाहते थे. पर नयन यह कह कर कि उसे यहां हर तरह का आराम है और फिर मां भी गोदभराई की रस्म के लिए आएंगी, तो रुकेंगी, उस का जाना टाल दिया. सब ठीक रहा और संजना ने एक स्वस्थ बेटे को जन्म दिया. सब ओर से बधाई का आदानप्रदान हुआ. चाचा पवन को नई पदवी की विशेष बधाई मिली. बच्चे के 4 महीने के होते ही मां असम से लौट आईं, नयन स्वयं छोड़ने आया.

‘यह कैसे हो गया, कहां गलती हुई, क्यों नहीं ध्यान दिया?’ ऐनी यह सब सोचते हुए परेशान थी. वह प्रैग्नैंट थी. ‘नहीं, वह झंझट नहीं ले सकती, उसे नौकरी करनी है.’ सब आगापीछा सोचते हुए पवन से अबौर्शन की जिद करने लगी. पवन थोड़ा तो परेशान हुआ पर तसल्ली दी कि वह पूरी तरह से सहयोग करेगा ऐनी व बच्चे का ध्यान रखने में.

ऐनी की मां अब अपनी छोटी बेटी के पास स्कौटलैंड में रहती थी. समय पर मां को बुलाने पर बात अटकी तो पवन ने कहा, ‘देखेंगे.’ पहले वाले लड़के ने मां के कारण ही ऐनी से किनारा किया था और अब वह वही मुसीबत मोल ले ले, नहीं. ऐनी को यह मंजूर न था.

अपनी गर्भावस्था के दौरान ऐनी स्वस्थ व चुस्त रही और काम पर जाती रही. बस, डिलीवरी होने से पहले 3 दिन ही घर पर रही थी और 9 महीने पूरे होते ही उस ने सुंदर, स्वस्थ बेटे को जन्म दिया. उस के गोल्डन, ब्राउन, घुंघराले बालों को देखते ही चहकी, ‘‘यह तो अपने नाना जैसा है.’’ अपने पिता की याद में उस की आंखें भर आईं. वे दोनों बहनें छोटी ही थीं जब उस के पिता का कार दुर्घटना में निधन हो गया था और पिता के काम की जगह ही मां को काम दे दिया गया था.

ऐनी को नौकरी से 3 महीने की छुट्टी मिल गई और पवन भी कोशिश कर उस की हर संभव सहायता करता. छोटे बेबी को पालना आसान नहीं. मां के फोन आते रहते. पर इस बार पवन ने पक्का इरादा कर ऐनी के बारे में बता दिया, लेकिन बच्चे का जिक्र नहीं किया.

मां यह सुन सन्नाटे में आ, पूछना भूल गई कि कौन है, कब यह सब हुआ? पवन हैलोहैलो ही कहता रह गया, फोनलाइन कट गई. बिना शादी एकसाथ रहना, बच्चे होना और फिर साथ रहने की गारंटी, क्या कहा जा सकता है.

पवन दोबारा फोन करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाया. लेकिन, भाभी का फोन आ गया. ‘‘मां अस्पताल में हैं. उन की अचानक तबीयत खराब होने की खबर सुनते ही वे लोग फौरन मां के पास पहुंच गए. अभी नयन मां के पास अस्पताल में हैं.’’

भाभी ने उस की शादी के बारे में पूछा तो पवन ने रोंआसा हो बताया कि यह अचानक किया फैसला है और झूठ का सहारा ले यह कह दिया कि यहां सैटल होने के लिए यहां की लड़की से शादी करने से मदद मिल जाती है.

पवन का मन परेशान हुआ कि बच्चे के बारे में जानेंगे तो क्या सोचेंगे. भाभी ने कहा कि मां उस के लिए यहां लड़कियां देख रही थीं. अचानक खबर से उन्हें काफी धक्का लगा है. पर अब क्या हो सकता है. तसल्ली दी कि जब तक मां पूरी तरह ठीक नहीं हो जाएंगी, वह यहां रह उन की देखभाल करेगी. नयन भी आतेजाते रहेंगे. बाद में वे मां को अपने साथ असम ले जाएंगे.

पिछली बार जब रमा असम गई थी तो कुछ दिनों के बाद ही कहना शुरू कर दिया था कि यहां बहुत अकेलापन है. वह वापस जाना चाहती है. नयन ने समझाने की बहुत कोशिश भी की थी कि आप की बहू, बेटा, पोता हैं, यहां अकेलापन कैसा और फिर यह भी आप का घर है. पर नहीं, वह जल्दी लौट आई थी.

इधर, ऐनी बच्चे क्रिस को अकेले संभालने में परेशान हो जाती थी. पवन रात में बच्चे के लिए कई बार जागता था. अब ऐनी के काम पर वापस जाने का समय हुआ. क्रिस को घर से दूर एक डेकेयर में छोड़ना तय हुआ. क्रिस को सुबह पवन छोड़ आता था, शाम को ऐनी ले आती थी. आसान नहीं था यह सब. अब आएदिन दोनों में किसी न किसी बात पर बहस होने लगी. बच्चे के कारण दोनों का बाहर घूमनाफिरना, मौजमस्ती कम हो गई थी. ऐनी जैसी मौजमस्ती में रहने वाली के लिए यह सब बदलाव मुश्किल सा हो गया था जबकि पवन ने बहुत सी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी.

अचानक एक दिन ऐनी को पता नहीं क्या सूझी, जो सीधा ही पवन से कह दिया कि वह नौकरी छोड़ बेबी क्रिस को ले अपनी मांबहन के पास स्कौटलैंड चली जाएगी.

पवन हैरत में था कि अपनी ओर से वह और क्या करे कि ऐनी अपना इरादा बदल ले. अभी इस बात को एक सप्ताह ही बीता था कि पवन को डेकेयर से फोन पर बताया गया कि मिस ऐनी का उन्हें फोन आया था कि आज आप क्रिस को लेने आएं, वे नहीं आ पाएंगी. ‘‘ठीक है,’’ कह कर पवन ने सोचा कि ऐनी यह बात सीधे उस से भी कह सकती थी. फिर यह सोच कर मन को तसल्ली दी कि वह आजकल बहुत परेशान व नाराज सी रहती है. इसलिए शायद उस से नहीं कहा.

पवन औफिस से जल्दी निकल, क्रिस को डेकेयर से घर लाया, उसे दूध पिलाया. ऐनी को कई बार फोन किया पर उस का फोन स्विच औफ था. उस का मन भयभीत होने लगा कि कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया. जब ऐसे करते रात के 12 बजने को आए तो चिंतित पवन कहां फोन करे, उस के पास तो ऐनी के किसी जानपहचान वाले या उस की मांबहन का नंबर तक नहीं था. कैसा बेवकूफ है वह, कभी उन से बात ही नहीं हुई.

रात 2 बजे फोन बजा तो उस ने लपक कर फोन उठाया, फोन ऐनी का ही था. उस ने सीधा कहा, ‘‘मैं अपनी मां के पास आ गई हूं. तुम्हें क्रिस को स्वयं पालना है, मुझे कुछ नहीं चाहिए. मेरा कोई पता या फोन नंबर नहीं है.’’

‘‘ऐनीऐनी’’ कहता रह गया पवन, और फोन कट गया. सिर धुन लिया पवन ने और सोते क्रिस को देख बेहाल हो गया. क्या कुसूर है उस का या इस नन्हे बच्चे का.

दिन बीतते गए. सब रोज के ढर्रे पर चलता रहा. ऐसा कब तक चलेगा? हताश हो कर सोचा, मां या भाई को बताऊं. पहले ऐनी के साथ रहने का बता मां को सदमा दिया था, अब उस से बड़ा सदमा देने के बारे में सोच कर ही डर गया.

कुछ तो करना होगा, यह सोच कर हिम्मत जुटा भाई को फोन किया तो पता चला वह 1 महीने के लिए दूसरी जगह पोस्ंिटग पर है. फोन पर पवन के रोने की आवाज सुन, भाभी डर गई, ‘‘पवन, क्या हुआ, ऐनी तो ठीक है?’’

‘‘भाभी, ऐनी मुझे छोड़ कर चली गई.’’

भाभी ने कुछ और समझा, ‘‘कैसे हुआ, क्या हुआ, तुम साथ नहीं थे क्या?’’

‘‘भाभी, वो अब मेरे साथ रहना नहीं चाहती. अपने बेटे को छोड़ कर, अपनी मां के पास चली गई है.’’

‘‘बेटे को, यानी तुम्हारा बेटा या केवल उस का?’’ भाभी कुछ अंदाजा लगा चुकी थी, ‘‘तुम ने पहले क्यों नहीं बताया?’’

‘‘जब पहली बार ऐनी के बारे में बताया था, तब हमारा बेटा क्रिस 2 महीने का था.’’

‘‘अब क्या करोगे?’’

‘‘भाभी, कुछ समझ नहीं आ रहा.’’

संजना ने कहा, ‘‘सुनो, बच्चे को ले सीधा हमारे पास चले आओ, तब तक तुम्हारे भाई भी आ जाएंगे. सब मिल कर कुछ उपाय सोचेंगे.’’

तुरंत बच्चे का पासपोर्ट बनवा, वीजा लगवा, काम से एक महीने की छुट्टी ले पवन वापस इंडिया चल पड़ा. भाई के घर वापस आने से 4 दिन पहले पहुंच गया. भाभी को पूरी बात बता, थोड़ा सहज हुआ.

‘‘कुछ गलत तो नहीं किया तुम ने ऐनी से शादी कर. अगर बच्चा पैदा हो गया तो विदेश में ऐसी बातें होती ही हैं.’’

‘‘भाभी, शादी नहीं की थी, सोचा था, कुछ समय इकट्ठा गुजारेंगे. पर उसी बीच वह प्रैग्नैंट हो गई. उस के बाद भी शादी कर लेता तो ठीक होता.’’

भाभी ने कहा, ‘‘अब अपने देश में भी अजीब सा चलन हो गया है लिवइन रिलेशनशिप का. लगता है लगाव, जिम्मेदारी, ममता केवल शब्द ही रह गए हैं, कोई भावना नहीं.’’

अगली सुबह नयन आ गए. अचानक पवन को वहां देख हैरान हुए और फिर घर में बच्चे के रोने की आवाज सुन और भी हैरान से हो गए. संजना ने जल्दी से कहा, ‘‘मैं चाय बनाती हूं. आप पहले अपने बेटे रोहन को जगाएं, आप को आया देख खुश होगा. फिर सब बात होगी.’’

नयन कुछ समझ नहीं पा रहा था. रोहन उठ, पापा से मिला और फिर भाग, दूसरे कमरे में ताली बजा नन्हे क्रिस को रोते से चुप कराने की कोशिश करने लगा. पवन ये सब देख अपने आंसू नहीं रोक पाया.

पत्नी संजना से सब जान नयन ने किसी को कुछ नहीं कहा.

नाश्ता करते नयन ने देखा पवन चुपचाप खाने की कोशिश कर रहा पर जैसे खाना उस के गले से नहीं उतर रहा था. नयन के कहने पर कि नाश्ते के बाद हमारे कमरे में मिलते हैं,

उस की घबराहट और बढ़ गई. क्रिस दूध पीने के बाद सो गया. रोहन को उस की पसंद का टीवी पर प्रोग्राम लगा दूसरे कमरे में बिठाया और फिर तीनों कमरे में मिले.

आगे पढ़ें- पवन ने वापस लौट कुछ समय के बाद…

लेखिका- वीना त्रेहन

चाय के साथ करें अपने दिन की बेहतरीन शुरुआत

हम भारतीयों के जीवन से जुड़ी एक अहम चीज है चाय जिसका मतलब है हमारे लिए सवेरा. दिन की शुरुआत हम हिंदुस्तानी चाय के साथ करते हैं. चाय के बगैर मानों दिन ही अधूरा है. हमारे हर रिश्ते के साथ चाय का एक खास कनेक्शन हैं, आइए जानते हैं कुछ ऐसे ही रिश्तों के बारे में जिनमें चाय का अहम रोल है.

1- फैमिली के साथ चाय-

आज कल लोग बिजी होने के कारण सुबह अपने परिवार के साथ ज्यादा समय नहीं बिता पाते है और फॅमिली टाइम एंजॉय नहीं कर पाते है लेकिन शाम को वो जरूर अपने परिवार के साथ चाय पीकर अपना टाइम बेस्ट बनाते है. ऐसे में आप सुगंध टी की मसाला चाय के साथ रिश्तों में लगा सकते हैं प्यार का तड़का.

2- दोस्तों के साथ चाय-

चाय की बात हो और दोस्तों का जिक्र न हो ऐसा कैसे हो सकता है जी हां, दोस्तों और चाय एक दूसरे के साथी ही तो है. दोस्त चाहे नया हो या पुराना, चाय हर नए रिश्ते मे अपना स्वाद घोलती हैं और पुरानी दोस्ती को और मजबूत करती हैं. अपने ऐसे ही खास दोस्तों के लिए आप बना सकते हैं सुगन्ध की गोल्ड टी.

ये सभी अलग अलग चाय आपको एक ही जगह बड़ी आसानी से मिल सकती हैं. ज्यादा जानकारी के लिए क्लिक करें…  shopsugandh.com 

3- ऑफिस में चाय-

ऑफिस में काम का काफी प्रेशर होता है और इसी प्रेशर को कम करने में चाय आपकी मदद करती, चाय पीने से जो ताजगी आती है उससे न सिर्फ आपको फ्रेशनेस महसूस होती है बल्कि  आप ऐक्टिव होकर दुगुनी एनर्जी से काम कर सकते हैं. ऐसे में सुगन्ध चाय की प्रीमियम टी देगी जो आपको एक एनर्जी भरा दिन.

4- कपल की रोमांटिक चाय-

आज कल के कपल डेट पर चाय पीना भी पसंद करते है सिर्फ होटल या रेस्टोरेंट में ही नहीं. बल्कि चाय की टपरी पर भी आपको कई प्यारे कपल दिख जाएंगे. जहां चाय पीते-पीते ही वो एक दूसरे के साथ अच्छा टाइम स्पेन्ड करते हैं. ऐसे में आप सुगन्ध टी की इलाइची चाय के साथ अपने प्यार भरे रिश्ते को और रोमांटिक बना सकते हैं.

चाय में पाए जाते हैं ये गुण

चाय में एंटी आक्सीडेंट के गुण पाए जाते हैं, जो दिल और कोलेस्ट्राल को सही रखते हैं, यही नहीं युवा अवस्था को बरकरार रखने में भी चाय सहायक होती है क्योंकि यह शरीर में ताजगी, त्वचा में चमक और थकान दूर करने का काम भी करती है.

महिलाओं के लिए चाय के फायदे

मेनोपाज के बाद महिलाओं में एस्ट्रोजन की मात्रा बढ़ाने में चाय मदद करती है. इस का लगातार इस्तेमाल स्ट्रोक जैसी बीमारी को भी दूर रखने में मदद करता है. महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन की मात्रा घटने से उन में चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है.

काली चाय में कैफीन मस्तिष्क को चार्ज करता है तथा नसों को सही तरीके से चलाने में मदद करता है. हमें अपने मस्तिष्क की कोशिकाओं को बचाना जरूरी होता है क्योंकि बढ़ती उम्र के साथ दिमाग में न्यूरान की मात्रा घटती जाती है. कई लोगों में इसी वजह से अल्जाइमर और पार्किंसन रोग पनपने लगते हैं.

हरी और सफेद चाय दिमाग की कोशिकाओं को सक्रिय रखने में मदद करती है. चाय, जिसे हर रोज इस्तेमाल किया जाता है, हम अपनी नासमझी की वजह से उस के महत्त्वपूर्ण गुणों का लाभ नहीं उठा पाते हैं. सही तरीके से तैयार की गई चाय स्वाद के साथसाथ सेहत को भी सही रखती है.

(आलेख में किए गए दावों की पुष्टि हम नहीं करते, किसी भी सलाह पर अमल करने से पहले डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें.)

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