सुनते ही श्लेषा का तनाव बढ़ गया. कल शाम से आई है यह मेघनी की बच्ची. पता नहीं कौनकौन सी पट्टी पढ़ा दी होगी इस ने अम्मांजी को? बाबाअम्मां शायद इसी वजह से कुछ खिंचेखिंचे से हैं. श्लेषा के लिए फिर एक पल ठहरना भी दुश्वार हो गया. वह देवरदेवरानी से मिलने का बहाना बना कर तुरंत किचन से बाहर आई.
उसे यूं एकाएक प्रगट हुआ देख अनंत और मेघा बुरी तरह सकपका गए. भैयाभाभी कब आ गए. इन के आने के बारे में तो बाबाअम्मां ने कोई जिक्र ही नहीं किया था. कहीं बाबा से कोई सांठगांठ तो नहीं कर ली है भैया ने?
आशंका से अनंत की खोपड़ी में खतरे के सायरन बजने लगे. उसी समय सुमंत नहा धोकर कमरे से निकला. गलियारे में अपने छोटे भाई को देखते ही वह तनावग्रस्त हो गया. उफ, यह क्यों आ गया? मेरी योजना में कहीं पलीता न लगा दे.
दोनों भाई एकदूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन गए. दोनों को एकदूसरे की उपस्थिति खलने लगी. अपने मन की दुर्भावनाओं को छिपा कर वे मुसकराते हुए मिले जरूर, मगर अंदर ही अंदर वे अपनेअपने जाल बुनने लगे.
दोपहर का 1 बज गया. वे सब भोजन करने बैठे. खाते हुए सुमंत का ध्यान बारबार घर की बदली हुई काया की ओर जाता. बाबा का स्टैंडर्ड काफी ऊंचा हो गया था. बेटों के घर जाने से पूर्व बाबा ने अपना फोन कटवा दिया था. बंद घर में फोन रख कर वह क्या करते? आज उन के पास 2-2 फोन थे, मोबाइल भी था. उन के फोन लगातार घनघना रहे थे.
बाबा के यहां ‘लंच पेक’ की सुविधा भी थी. अधिकांश फोन उसी के लिए आ रहे थे. खाना खाते हुए सुमंत मन ही मन हिसाब लगाने लगा. बाबा कम से कम हजार रुपया रोज छाप रहे थे.
खाना खाने के दौरान बाबा ने श्रुति को बैंक भेज दिया था. उस के साथ ऊपर छात्रावास में रहने वाला अशोक भी था.
जब तक इन का भोजन होता, श्रुति बैंक से 60 हजार रुपए ले कर आ गई. बाबा आफिस में आए. थोड़ी देर में 3 व्यापारी आ गए. बाबा ने पहले ही फोन कर दिया था.
श्रुति ने उन व्यापारियों का हिसाब निकाला. कोने की एक कुरसी पर बैठा सुमंत यह सब देख रहा था. घीतेल के व्यापारी को बाबा ने करीब 16 हजार रुपए का भुगतान किया. सुमंत फटीफटी आंखों से देखता रह गया. उस का वेतन 14 हजार रुपए माहवार था. यानी उस की पगार से ज्यादा रुपए का भुगतान बाबा एकएक व्यापारी को कर रहे थे. और यह भुगतान मात्र 19 दिनों की सप्लाई का था.
सुमंत का कंठ सूख गया. कितनी भारी तरक्की कर ली थी बाबा ने इस बुढ़ापे में.
उस ने चापलूसी करते हुए अपने पिता की तारीफ की. बाबा हौले से मुसकरा दिए, ‘‘सब दामादजी की कृपा है.’’
निखिल ने ही दिया था इस का आइडिया. निखिल का भतीजा पी.एम.टी. की तैयारी करने के लिए कोटा गया था. वहां वह एक परिवार में पेइंग गेस्ट बन कर रहा. कोटा में आजकल बहुत से मकानमालिक छात्रों को अपने घरों में रहने के साथसाथ भोजन की सुविधा भी देते हैं. घर जैसा माहौल, घर जैसा भोजन. छात्रों की पढ़ाई बहुत अच्छी तरह होती है.
निखिल ने बाबा को यही कार्य करने की सलाह दी. बाबाअम्मां हिचकिचाए कि भला इस बुढ़ापे में वे इतनी भागदौड़ कैसे करेंगे. निखिल ने मुसकराते हुए आश्वासन दिया कि सब हो जाएगा. आप बस मैनेजमेंट संभाल लेना.
निखिल पूरे 2 सप्ताह रहा. इधरउधर भाग दौड़ कर उस ने 12 कालिज छात्रों का चयन किया, यह छात्र अभी तक छोटेछोटे से एकएक कमरे में रह रहे थे. बाबा के घर उन्हें अच्छा खुला माहौल मिला. मनोरंजन के लिए नीचे बाबा के पास टी.वी. देखने आ जाते. बाबा के यहां उन्हें एक भारी फायदा और था. गांव से आने वाले उन के रिश्तेदार उन के साथ ठहर जाते. उन के होटल के खर्चे बच जाते.
छात्रों के चयन में निखिल ने विशेष ध्यान रखा. 4 छात्र मेडिकल के थे. जरूरत पड़ने पर वे बाबा और अम्मां को डाक्टरी सहायता भी तुरंत उपलब्ध करवा देते. कुछ छात्र कामर्स कालिज के थे, उन का कालिज सुबह रहने से घर में दिन भर चहलपहल रहती थी.
मेस के लिए निखिल ने 2 भोजन बनाने वाली बाइयों का इंतजाम कर दिया. अम्मां के हाथ की रसोई बहुत स्वादिष्ठ बनती थी. अम्मां सिर्फ मसाले निकालने व छौंक लगाने का काम करतीं, बाकी का सारा काम दोनों बाइयां संभालतीं.
शुरू में मेस सिर्फ उन 12 छात्रों के लिए प्रारंभ हुई थी लेकिन जब उन छात्रों के अन्य मित्रों ने भी वहां भोजन किया तो वे भी अम्मां के पास रोज गुहार करते, ‘‘दादी मां, हमें उधर होटल का खाना अच्छा नहीं लगता…पेट खराब हो रहा है…आप के यहां घर जैसा खाना मिलता है. प्लीज, दादी मां…’’
उन के अनुरोध के आगे बाबाअम्मां को झुकना पड़ा. छात्र बढ़ते गए, काम बढ़ता गया.
श्रुति इस बीच वहां से जा चुकी थी. कमरे में बाबा के अलावा और कोई नहीं था.
सुमंत असली मुद्दे पर आया. बातों की एक योजना बना उस ने अपनी नजरें बाबा के चेहरे पर गड़ा दीं, ‘‘अकेले इतना सारा काम संभालने में आप को दिक्कत आती होगी…’’
‘‘कोई दिक्कत नहीं,’’ बाबा ने बात पूरी होने के पूर्व ही काट दी. ऊपर रहने वाले सभी लड़के उन दोनों का बहुत ध्यान रखते थे. अपने दादादादी की तरह बाबाअम्मां की सेवा करते थे. उन लड़कों के कारण ही बाबा की मेस
का कारोबार बढ़ता गया था. बाबा अब उन से खानेरहने का आधा पैसा लेते. लड़के भी उन्हें दिलोजान से चाहने लगे थे. बाबाअम्मां को इस उम्र में और क्या चाहिए था.
सकपकाए सुमंत से कुछ कहते नहीं बना. थोड़ी देर की चुप्पी के बाद उस ने एक बार फिर गोटी फेंकी, ‘‘लेकिन बाबा, रुपयों का लेनदेन…हिसाबकिताब…इन कामों के लिए घर का व्यक्ति होना जरूरी है…’’
‘‘श्रुति है न, रंजन भी सहयोग करता है. मुझे देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती.’’
‘‘क्या मतलब?’’ सुमंत ने शंका का तीर छोड़ा, ‘‘आप हिसाबकिताब कभी चेक ही नहीं करते?’’
‘‘क्या जरूरत है? रंजन स्वयं बैंक में बडे़बडे़ हिसाब देखता है…’’
‘‘फिर भी, बाबा. आखिरकार वह एक पराया…’’
‘‘कौन कहता है कि वह पराया है,’’ बाबा ने अपनी कठोर नजरें उस के चेहरे पर गड़ा दीं, ‘‘इस बुढ़ापे में मुझे किस ने सहारा दिया? उसी ने तो.’’
बाबा की आंखें सुलगने लगीं. 2-3 क्षणों की खामोशी के बाद उन्होंने रूखे स्वर में कहा, ‘‘तुम लोग क्या सोचते हो, यह सारा कारोबार मैं ने जमाया है? मैं ने मेहनत और भागदौड़ की है?’’
वे सुमंत को घूरते रहे, फिर उठ कर टहलने लगे, ‘‘सिर्फ स्कीम बना देने से कोई कारोबार सफल नहीं हो जाता, उस के लिए पूंजी लगती है, मेहनत और भागदौड़ करनी पड़ती है. मेरे पास पैसा बचा था क्या? इस उम्र में रसोई का इतना सारा सामान रोजरोज ले आता? रोज सवेरे सब्जी ले आता? काम वालों का इंतजाम कर लेता?’’
और बाबा ने निखिल की तारीफ करते हुए बताया कि उस ने जब रंजन को योजाना बताई तो रंजन तुरंत तैयार हो गया. वह बाबाअम्मां की सेवा जान दे कर भी करना चाहता था. बैंक से ताबड़तोड़ लोन दिलवा दिया. गांव से उस के बाबूजी ने 2 भोजन बनाने वाली बाइयां भेज दीं. रंजन के बैंक में सैकड़ों व्यापारियों के खाते थे. थोकव्यापारियों के यहां से घी, तेल, अनाज, मसाले…सब आ जाते. सब्जीमंडी के दलालों व व्यापारियों से भी रंजन की बहुत पहचान थी.
कारोबार जमाने के लिए रंजन ने 10-12 दिनों की छुट्टी ले ली. सारी मेहनत तो रंजनश्रुति की ही थी.
‘‘…फिर क्यों न विश्वास रखूं इन दोनों पर.’’
फिर कमरे से निकलतेनिकलते बाबा ने असली तीर छोड़ा, ‘‘तुम सगों ने तो हमें खाली हाथ अपनेअपने घरों से भगा दिया था. यह रंजन ही है, जिस
ने हमें संभाला. हमारा असली बेटा तो यही है…और हमारे कारोबार का आधा भागीदार भी.’’
सुमंत और अनंत सिर झुकाए बैठे रहे. अपनी खुदगर्जी के कारण जो अंधेरा उन्होंने अपने असहाय वृद्ध मातापिता के जीवन में कर दिया था, उस की कालिमा कलंक बन कर उन के ही चेहरों पर पुत गई थी.