Winter Special: बच्चों के लिए बनाएं रोटी रोल

बच्चों के लिए स्नैक्स में अगर रोटी से बनी हेल्दी डिश परोसना चाहती हैं तो रोटी रोल की ये रेसिपी ट्राय करें.

सामग्री

–  4-5 पतली रोटियां

–  1/4 कप सोया चूरा

–  1 बड़ा चम्मच मटर उबले

–  1 बड़ा चम्मच टोमैटो प्यूरी

–  1 छोटा चम्मच अदरकलहसुन पेस्ट

–  1/2 छोटा चम्मच हरीमिर्च पेस्ट

–  1/2 छोटा चम्मच देगी मिर्च

–  1 छोटा चम्मच मैगी मसाला मैजिक

–  1 छोटा चम्मच चिली पनीर मसाला

–  1 कटोरी ब्रैडक्रंब्स

–  अंडे या चावल के आटे का घोल

–  तेल तलने के लिए

–  नमक स्वादानुसार.

विधि

सोया चूरा को थोड़ी देर के लिए गरम पानी में भिगो दें. फिर पानी निथार कर अच्छी तरह निचोड़ लें. एक पैन में तेल गरम कर अदरक, लहसुन व हरीमिर्च का पेस्ट डाल कर भूनें. टोमैटो प्यूरी मिला कर पानी सूखने तक पकाएं. सारे मसाले मिला कर कुछ देर भूनें. सोया चूरा व मटर मिला कर पानी का छींट दे कर ढक कर 2 मिनट तक पकाएं. ढक्कन हटा कर पानी सूखने तक तेज आंच पर सब्जी को लगातार चलाते हुए भून लें. रोटी में थोड़ी सी भरावन भरें. मनचाहे आकार में रोल करें. चावल के आटे के घोल में डुबो कर ब्रैडक्रंब्स लपेट कर तल लें.

मुसलिम विवाहों के झगड़े और कोर्ट

माना जाता है कि मुसलिम विवाहों के झगड़ों के मामले आपस में सुलटा लिए जाते हैं और ये अदालतों में नहीं जाते पर अदालतें शादीशुदा मुसलिम जोड़ों के विवादों से शायद आबादी के अनुपात से भरी हुई हैं. ये मामले कम इसलिए दिखते हैं कि गरीब हिंदू जोड़ों की तरह गरीब मुसलिम जोड़े भी अदालतों का खर्च नहीं उठा सके और पतिपत्नी एकदूसरे की जबरदस्ती सह लेते हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल में एक मामले में एक मुसलिम पति को पत्नी को अपने साथ रहने को मजबूर करने का हक देने से इंकार कर दिया क्योंकि उस पति ने दूसरी शादी भी कर ली थी और इसलिए पहली पत्नी अपने पिता के घर चली गर्ई थी. पहली पत्नी अपने पिता की इकलौती संतान है और उस के पिता ने मुसलिम कानून की जरूरत के हिसाब से जीते जी सारी संपत्ति बेटी को उपहार कर दी थी.

हालांकि अदालत ने कुरान का सहारा लिया, पतिपत्नी के मामलों में झगड़ों में धर्म को लिया ही नहीं जाना चाहिए क्योंकि धर्म ने जबरन एक आदमी और औरत के साथ रहने के अनुबंध पर सवार हो चुका है. शादी का न तो मंदिर से कोई मतलब है, न चर्च से, न मुल्ला से, न ग्रंथी से, शादी 2 जनों की आपसी रजामंदी का मामला है.

और जब रजामंदी से किसी की शादी की है कि दोनों किसी तीसरे को अपने संबंधों के बीच न आने देंगे तो यह माना जाना चाहिए, बिना चूं चपड़ के. कानून को पतिपत्नी के हक देने चाहिए लेकिन कौट्रैंक्ट एक्ट के हिसाब से, धर्म के हिसाब से नहीं. पति पत्नी के अधिकार एकदूसरे पर क्या हैं और वे अगर संबंध तोड़ें तो कौन क्या करेगा क्या नहीं, यह इसी तरह तय करना चाहिए जैसे पार्टनरशिप एक्ट, कंपनिज एक्ट, सोसायटीज एक्ट में तय होता है. धर्म बीच में नहीं आता. शादी न भगवानों के कहने पर होती है न भगवानों के कहने पर टूटती हैं.

एक आदमी और औरत जीवनभर एकदूसरे के साथ ही सुखी रहेंगे, यह जरूरी नहीं. शादी के बाद 50-60 या 70 सालों में बहुत कुछ बदल सकता है. पसंद बदल सकती है, स्तर बदल सकता है. शरीर बदल सकता है. जीवन साथी को हर मामले में ढोया जाए जबरन, यह गलत है. प्रेम में तो लोग एक पेड़ के लिए भी जान की बाजी लगा देते हैं, जिस के साथ सुख के हजारों पल बिताए हों, उस के साथ दुख में साथ देना कोई बड़ी बात नहीं.

मुसलिम जोड़े ने अदालत की शरण ली वह साबित करता है कि मुसलिम मर्द भी तलाक का हक कम इस्तेमाल करते हैं और जहां हक हो वहां खुला भी इस्तेमाल नहीं किया जाता. कट्टर माने जाने वाले मुसलिम जोड़े भी सेक्यूलर अदालतों की शरण में आते हैं. यह बात दूसरी कि बहुत सी अदालतों के जजों के मनों पर धार्मिक बोझ भारी रहता है, उस मामले में जज ने सही फैसला किया कि पतिपत्नी को साथ रहने घर मजबूर नहीं कर सकता, खासतौर पर तबजब उस ने दूसरी शादी भी कर रखी हो चाहे वह मुसलिम कानून समान हो.

Serial Story: लाइफ कोच – भाग 2

हंसते वक्त किरण के बायां गाल पर पड़़ते गड्ढे देख नकुल दीवाना हो जाता था.

सिर्फ यही नहीं, किरण की हर एक अदा पर नकुल दीवाना हो जाता था.

लेकिन नकुल की कुछ आदतों पर मुंह बना कर किरण कभीकभार उसे ?िड़क भी देती थी, ‘‘शादी हो जाने दो हमारी, फिर देखना कैसे बनती हूं मैं तुम्हारी लाइफ कोच… मैनर्स में रहना सिखाऊंगी मैं तुम्हें.’’

उस की बातों पर हंसते हुए नकुल ने बोला, ‘‘अब इतनी सुंदर ‘लाइफ कोच’ किसे नहीं चाहिए. मेरा तो जीवन ही सफल हो जाएगा.’’

नकुल को अच्छा लगता था किरण का उसे यों रोकनाटोकना या डांट लगाना. उसे लगता किरण उस से बहुत ज्यादा प्यार करती है तभी तो हक से उसे रोकतीटोकती है.

‘‘हां, तुम्हारा जीवन बहुत जल्दी सफल हो जाता है, अब चलो,’’ हंसते हुए नकुल के बगल वाली सीट पर बैठते हुए किरण बोली, ‘‘ऐसे क्या देख रहे हो? क्या तुम्हारे ऊपर मेरा अधिकार नहीं?’’

उस की बात पर नकुल ने उस के गाल पर एक किस करते हुए इस बात की मुहर लगा दी कि बिलकुल उस का अधिकार है.

2 साल तक रिलेशनशिप में रहने के बाद अपने मातापिता के आशीर्वाद से दोनों एक हो गए. शादी के बाद उन की जिंदगी ऐसी लगने लगी जैसे सतरंगी आकाश. बस रोमांस ही रोमांस था उन की जिंदगी में और कुछ नहीं.

शादी के 1 साल बाद ही पीहू ने उन की जिंदगी में आ कर और रोशनी बिखेर दी. पीहू को कुछ महीने तक तो उस की नानीदादी ने संभाला. पर अब उन के लिए भी यहां रहना संभव नहीं था. इसलिए किरण ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया ताकि पीहू को एक अच्छी परवरिश दे सके. सोचा, जब पीहू थोड़ी बड़ी हो जाएगी तब वह फिर से जौब करने लगेगी.

लेकिन ऐसा हो नहीं पाया, क्योंकि पीहू हमेशा बीमार रहने लगी थी. वह जन्म से ही कमजोर बच्ची थी और डाक्टर का कहना था कि उसे चौबीसों घंटे एक आदमी की जरूरत है जो उस की अच्छी तरह देखभाल कर सके और मां से बेहतर एक बच्चे की देखभाल तो कोई कर ही नहीं सकता, इसलिए किरण ने जौब न करने का फैसला ले लिया. धीरेधीरे पीहू तंदुरुस्त होने लगी. लेकिन फिर किरण का जौब करने का मन ही नहीं हुआ, क्योंकि अब वह अपना पूरा वक्त अपने घरपरिवार पर देना चाहती थी.

नकुल औफिस के साथ बाहर का भी काम संभालता और किरण घर के साथ अपनी बेटी पीहू का भी ध्यान रखती. सबकुछ व्यवस्थित चल रहा था जिंदगी में. वैसे तो किरण की शुरू से ही आदत थी हर बात पर टोकाटाकी करने की जिसे नकुल बुरा भी नहीं मानता था. लेकिन पीहू के जन्म के बाद से ये सब कुछ ज्यादा ही होने लगा था. किरण का दूसरा ही रूप नकुल के सामने आने लगा था. बातबात पर वह उसे झड़प देती. लोगों के सामने ही उसे अपमानित करने लगती. उस के लाए सामान में मीनमेख निकालती और गुस्सा तेज होता तो सामान उठा कर फेंकने लगती थी.

इस पर भी नकुल उस की बातों का बुरा नहीं मानता था. सोचता जब शांत होगी तब खुदबखुद अपनी गलती का एहसास हो जाएगा. लेकिन नकुल गलत था, क्योंकि किरण को कभी अपनी गलती का एहसास हुआ ही नहीं. उसे तो यही लगता वह सही है और बाकी सब गलत.

दिनबदिन किरण का व्यवहार अपने पति और बेटी के प्रति सख्त होता जा रहा था. किसी न किसी बात को ले कर वह घर में हंगामा खड़ा कर देती और फिर बिना गलती के ही नकुल को सौरी बोलना पड़ता ताकि घर में शांति बनी रहे.

नकुल को घर में चप्पलें पहन कर चलना बिलकुल भी पसंद नहीं था. लेकिन उसे पहननी पड़ती थीं, क्योंकि किरण ऐसा चाहती थी. खाना खाने के समय मुंह से आवाज न करना, औफिस से आते ही अपने जूतेकपड़े सही जगह रखना, लोगों के सामने उतना ही बोलना, जितना किरण आंखों से इशारा करे, घर में दोस्तरिश्तेदारों को बुलाने से पहले किरण की अनुमति लेना, ये सारे रूल्स उस ने बना रखे थे जिन्हें नकुल को फौलो करना ही पड़ता था. किरण सफाई के मामले में कुछ ज्यादा ही सनकी थी. कोई गंदे पैर बिस्तर पर नहीं चढ़ सकता था. अगर कभी किसी ने ऐसी गलती कर दी तो समझ लो उस की खैर नहीं.

औफिस से आते हुए जब नकुल किरण को किचन में काम करते

देखता, तो रोमांटिक होते हुए उसे पीछे से पकड़ लेता था. तब किरण कैसे उसे धकेल देती और कहती, ‘‘उफ, दूर हटो… पहले बाथरूम से फ्रैश हो कर आओ, तब तक मैं खाना लगाती हूं.’’

उस के ऐसे व्यवहार से नकुल के रोमांटिक मूड की ऐसी की तैसी हो जाती थी. फिर उस का मन ही नहीं करता किरण के करीब जाने का. कभी बाथरूम में भीगे तौलिए को ले कर, तो कभी अपना सामान सही जगह न रखने को ले कर, तो कभी बाजार से सामान लाने को ले कर किरण उसे सुनाती ही रहती थी. यहां तक कि नकुल के बढ़ते वजन पर उसे एतराज होने लगा था. नकुल को हाई बीपी की शिकायत थी इसलिए किरण अपने हिसाब से उस के लिए डाइट फूड तैयार करती थी कम तेलमसाला वाला.

नकुल को ‘ग्रीन टी’ पीना जरा भी पसंद नहीं था. लेकिन उसे पीनी पड़ती थी क्योंकि किरण ऐसा चाहती थी. हर दूसरेतीसरे दिन नौनवैज खाने वाले नकुल की उस पर भी पाबंदी लगा दी गई. अब उबला मटनचिकन और अंडे कैसे कोई खा सकता है भला? इसलिए नकुल ने नौनवैज खाना ही छोड़ दिया. वह सबकुछ इसलिए कर रहा था ताकि किरण खुश रहे. लेकिन फिर भी किरण को उस से कोईनकोई शिकायत लगी ही रहती थी. बिंदास किस्म का इंसान था नकुल, किरण के ऐसे व्यवहार से वह दुखी रहने लगा था.

किरण के तानाशाह व्यवहार के कारण जब नकुल को अपना घर ही जेल लगने लगता, तो वह कहीं बाहर निकल जाता. खीज उत्पन्न होती यह सोच कर कि वह किरण के हाथों की कठपुतली बन कर रह गया है. सिर्फ वही नहीं, बल्कि 11 साल की पीहू भी हमेशा अपनी मां से डरीसहमी रहती थी. वह कितनी देर टीवी या मोबाइल देख सकती है, वह अपने दोस्तों के साथ खेल सकती है या नहीं और कौनकौन उस के दोस्त बनने के लायक हैं, ये सब किरण ही तय करती थी.

अगर कभी पीहू से कोई गलती हो जाती, तो किरण उसे सजा देती. उस का मानना था कि ऐसे में बच्चे दोबारा गलती नहीं करेंगे. गलती करने पर बच्चों को सजा देना जरूरी है वरना वे बिगड़ जाएंगे. एकदम कड़े अनुशासन में किरण उसे रखती थी. लेकिन किरण को यह नहीं पता कि उस के ऐसे व्यवहार से मासूम पीहू के दिलोदिमाग पर क्या असर पड़ रहा है. रिसर्च भी कहती है कि बच्चों पर ज्यादा सख्ती से उन के मस्तिष्क की संरचना बदल जाती है. हरदम खिलखिलाने वाली पीहू इसीलिए तो बहुत गुमसुम सी रहने लगी थी.

आगे पढ़ें- नकुल के घर से निकलतेनिकलते भी…

 

प्रैग्नेंट न होने के कारण क्या हमें आईवीएफ तकनीक की मदद लेनी चाहिए?

सवाल

मेरी उम्र 27 साल और पति की 30 साल है. हमारी शादी को 5 साल हो चुके हैं. हम लोगों की रिपोर्ट नौर्मल आई है. पति के शुक्राणुओं की संख्या भी लगभग 90 मिलियन आई है, बावजूद इस के हम संतान सुख से वंचित हैं. क्या हमें आईवीएफ तकनीक की मदद लेनी चाहिए?

जवाब

आप को घबराने की जरूरत नहीं है. चूंकि आप के पति के शुक्राणुओं की संख्या ठीक है, इसलिए आप को आईयूआई तकनीक की दरकार नहीं है. लेकिन आप के लिए बढि़या विकल्प आईवीएफ है. इस तकनीक की मदद से संतान सुख की प्राप्ति कर सकते हैं. हां, इस बात का ध्यान रखें कि इस तकनीक के लिए किसी अच्छे चिकित्सक से ही संपर्क करें.

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आईवीएफ प्रक्रिया के माध्यम से हर साल हजारों बच्चे जन्म लेते हैं. जो महिलाएं बांझपन जैसी समस्या से जूझ रही हैं उन के लिए आईवीएफ प्रक्रिया की यह जानकारी काफी फायदेमंद हो सकती है:

पहला चरण: मासिकधर्म के दूसरे दिन आप के ब्लड टैस्ट एवं अल्ट्रासाउंड के माध्यम से आप के अंडाशय की जांच होती है. फिर यह अल्ट्रासाउंड सुनिश्चित करता है कि आप को कितनी मात्रा में स्टिम्युलेशन दवा दी जानी चाहिए. मासिकधर्म के दौरान डाक्टर जांच के तहत हो रही प्रक्रिया पर निगरानी करते हैं. फिर जांच के बाद आप के फौलिकल्स यानी रोम को मौनिटर करते हैं. जैसे ही आप का रोम एक निश्चित आकार में पहुंच जाता है तो फिर आप उसे रोज मौनिटर कर सकते हैं. मौनिटरिंग के बाद आप को दूसरी दवा दी जाती है, जो ट्रिगर शौट के रूप में जानी जाती है.

दूसरा चरण: अंडों की पुन:प्राप्ति के बाद डाक्टर आप के गर्भाशय के स्तर के विकास के लिए प्रोजेस्टेरौन को बढ़ाने के लिए बाहरी प्रोजेस्टेरौन दवा देते हैं.

तीसरा चरण: जब अंडे पुन: बनने की प्रक्रिया में हों तब पुरुष साथी को मास्टरबेशन के माध्यम से शुक्राणु प्रदान करने के लिए कहा जाता है. डाक्टर क्लीनिक में भी निषेचन के लिए शुक्राणु तैयार करते हैं.

चौथा चरण: शुक्राणु एवं अंडे की पुन:प्राप्ति की प्रक्रिया के बाद डाक्टर शुक्राणु एवं अंडे का गठबंधन करते हैं. इस के बाद वे निषेचित अंडे को कुछ समय के लिए इनक्यूबेटर में रख देते हैं. इस अवधि के दौरान एक भ्रूण विशेषज्ञ के द्वारा भ्रूण के विकास की नियमित चैकिंग की जाती है. अगर सब कुछ सही दिशा में चल रहा हो तो स्वस्थ विकास के लिए 3 से 5 दिनों के बाद भ्रूण तैयार हो जाता है.

5वां चरण: भ्रूण के आरोपण के लिए यह एक सरल एवं दर्दरहित प्रक्रिया है. आरोपण के लिए भ्रूण को तरल पदार्थ के रूप में एक कैथेटर में रखा जाता है. इस प्रक्रिया में अच्छी खबर के लिए आप को 2 सप्ताह इंतजार करना पड़ता है, जिस में प्रैगनैंसी टैस्ट होता है. इस के बाद डाक्टर कुछ निश्चित भोजन से संबंधित एहतियात बरतने को कहते हैं. उन्हीं चीजों को खाने की सलाह देते हैं जो आप के आरोपण की प्रक्रिया में सहायक साबित हों.

इस प्रक्रिया में आप को प्रैगनैंसी का सही परिणाम जानने के लिए ब्लड टैस्ट होने तक का इंतजार अवश्य करना चाहिए, बजाय इस के कि प्रैगनैंसी किट से रिजल्ट पता किया जाए, क्योंकि कई बार प्रैगनैंसी किट से गलत रिजल्ट भी आता है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

कालिमा: भाग 1- कैसे बेटे-बहू ने समझी अम्मां-बाबूजी की अहमियत

बदरीनाथ का दिल बेहद परेशान था. एक ही प्रश्न रहरह कर उन को मथ रहा था. उम्र के इस पड़ाव पर वे दोनों, पतिपत्नी अकेले किस तरह रहेंगे? कौन भागदौड़ और सेवाटहल करेगा? फिर ब्याज व मकान किराए की सीमित आय. खर्चे कैसे पूरे होंगे? वृद्धावस्था में बीमारियां भी तो लग जाती हैं.

बहूबेटों का साथ छोड़ कर शायद उन्होंने ठीक नहीं किया. मगर वह भी क्या करते, तीनों बेटों में से एक भी उन्हें मन से रखना नहीं चाह रहा था. तीनों एकदूसरे पर डाल रहे थे. बातबात पर उन्हें जिल्लत झेलनी पड़ रही थी. उन के  लिए वहां एकएक पल काटना दूभर हो गया था.

जब इसी तरह उपेक्षा से रहना है तो अपने घर जा कर क्यों न रहें, जिसे उन्होंने अपने खूनपसीने से बनाया था. भले ही अकेले रह कर तकलीफें उठाएंगे, यह एहसास तो रहेगा कि अपने घर में रह रहे हैं.

घर की याद आते ही वे बेचैन हो उठे.

बड़ी मुश्किल से 17-18 घंटों का लंबा सफर तय हुआ. 27-28 वर्ष पूर्व, गृहप्रवेश के समय सुख की जो अनुभूति उन्हें हुई थी उस से हजार गुना ज्यादा इस वक्त हो रही थी.

उन का मकान दोमंजिला था. नीचे की मंजिल में वह स्वयं रहते थे, ऊपर वाला किराए पर उठा दिया था. उन के आने की खटरपटर सुन ऊपर छज्जे में से गुडि़या झांकने लगी. 5 साल की प्यारी सी नन्ही गुडि़या, उन के किराएदार श्रुति  और रंजन की बिटिया. उन्हें देखते ही खुशी से किलक कर वह तालियां पीटने लगी, ‘‘ओए होए, बाबा आ गए, अम्मां आ गईं.’’

वे जब तक आंगन में आते, नन्ही गुडि़या तेजी से भागती, सीढि़यां फलांगती नीचे उतरी और उन से आ कर लिपट गई. पीछेपीछे किलकता उस से छोटा चुन्नू भी था. बदरीनाथ और पारो उन दोनों को कस कर भींच बच्चों की मानिंद फूटफूट कर रो पडे़.

तब तक श्रुति व रंजन भी आ गए थे. दोनों की आंखों में आश्चर्य के भाव थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि बाबाअम्मां गए तो थे अपने बेटों के पास स्थायी रूप से रहने के लिए लेकिन इतनी जल्दी वापस क्यों आ गए…और वह भी बिना कोई सूचना दिए…अकेले…एकाएक…अपना पूरा सामान ले कर.

मगर बाबाअम्मां जिस तरह गुडि़याचुन्नू को चूमते हुए रो रहे थे, श्रुति  और रंजन कुछ न पूछ कर भी सब कुछ ताड़ गए. दोनों उन के समीप आ कर बैठ गए और उन के हालचाल पूछने लगे.

बदरीनाथ और पारो का जी हलका होने के बाद श्रुति और रंजन ने उन का सामान उठाया और ऊपर जीने में चढ़ाने लगे. बदरीनाथ ने सामान नीचे ही रखने का आग्रह किया पर श्रुति और रंजन ने स्नेहपूर्वक मना कर दिया कि इतने लंबे सफर के बाद थक गए होंगे. वैसे भी नीचे रसोई का पूरा सामान नहीं था.

वृद्ध दंपती का हृदय भर आया. वे सब ऊपर आ गए. चायनाश्ता करते हुए वे आपस में बतियाने लगे. सब से ज्यादा चहक रहे थे गुडि़या और चुन्नू. दोनों बदरीनाथ व पारो की गोद में इस तरह उछलकूद रहे थे जैसे अपने सगे दादादादी की गोद में हों.

वृद्ध दंपती को यह सब बेहद खुशगवार लग रहा था. पिछले ढाईतीन महीनों में उन्हें उन के अपनों ने जो घाव दिए थे, इन चंद मिनटों में ही उन की सारी कसक वे भूल गए.

मगर नियति ने शायद कुछ और सोच रखा था. इस से पहले कि वे आश्वस्त हो कर चैन की सांस लेते, तभी गुडि़या ने बातों के प्रवाह में अपनी यह

सूचना दे डाली कि उस के पापा ने एक घर खरीद लिया है, वे अब वहीं जा

कर रहेंगे.

सुनते ही बदरीनाथ और पारो जड़वत रह गए. एक पल को उन्हें सूझा ही नहीं कि इस शुभ उपलब्धि पर वे अपनी प्रतिक्रिया किस तरह व्यक्त करें. एक ओर सुख की अनुभूति हो रही थी कि उन के निश्छल सेवाभावी किराएदार का सपना पूरा होने जा रहा है, दूसरी ओर दिल भी बैठा जा रहा था कि जिन के सहारे वे अपनी जिंदगी का कुछ हिस्सा काटना चाहते थे वे ही उन्हें छोड़ कर चले जाएंगे.

उधर श्रुति और रंजन अजीब पसोपेश में पड़ गए थे. अपना घर खरीदने की उन्हें खुशी तो थी, यह जानकारी वे अपने वृद्ध मकान मालिक को देना भी

चाहते थे, मगर अपनों से ठुकरा कर आए इन वृद्धजनों की जो नाजुक मनोस्थिति इस वक्त थी उसे देखते हुए इस बात को वह 1-2 दिन और छिपाना चाहते थे.

श्रुति ने तो मन ही मन निश्चय कर लिया था कि भले ही 2-3 माह का किराया और देना पडे़, 4 दिन बाद होने वाला गृहप्रवेश वह आगे बढ़ा देगी. बाबाअम्मां का वह दिल से सम्मान करती थी. उस की दोनों प्रसूतियां अम्मांजी ने स्वयं इसी घर में करवाई थीं. हालांकि दोनों बार उस की सासूमां गांव से यथासमय आ गई थीं, मगर अम्मांजी ने उन के आने से पहले ही सारी तैयारियां करवा दी थीं. बाद में भी सगी दादी की तरह वह गुडि़या और चुन्नू की देखभाल करती रही थीं.

अब ऐसी स्नेहमयी अम्मां से वह भला एकदम कैसे कह देती कि हम 4 दिन बाद आप को छोड़ कर अपने मकान में जा रहे हैं.

उस की आंखों से बरबस आंसू ढुलक पडे़.

पथराई सी बैठी अम्मांजी ने जल्दी से अपने मनोभावों को नियंत्रित किया. गुडि़या के शुभ समाचार देने के साथ ही वह सोफे से उठीं और आगे बढ़ कर श्रुति को वात्सल्य से भींच लिया, ‘‘अरी पगली, ऐसी खुशखबरी ऐसे रोते हुए देते हैं,’’ साथ ही उन्होंने बटुवे से 100 का नोट निकाल उस के हाथों में जबरदस्ती ठूंस दिया.

बाबा ने भी रंजन व बच्चों को बधाई के रुपए दिए.

रंजन और श्रुति के गलेरुलाई से भर आए.

अगले दिन पौ फटने से पहले ही अम्मांजी उठ गईं. नीचे आ कर वह अपने बंद घर की साफसफाई करने लगीं. खटरपटर सुन कर रंजन व श्रुति भी आ गए और अम्मांजी के काम में हाथ बंटाने लगे. उन का यह अपनत्व देख अम्मांजी का हृदय भर आया.

अम्मांजी अपनी रसोई भी आरंभ करना चाह रही थीं मगर श्रुति ने अधिकारपूर्वक मना कर दिया. रसोई का लगभग सारा सामान बाजार से लाना था. बाबा तुरतफुरत अकेले इतनी भागदौड़ कैसे करेंगे? रंजन के सहयोग से 2-3 दिनों में सारा इंतजाम हो जाएगा. तब तक बाबाअम्मां उन्हीं के संग भोजन करें. वैसे भी अम्मांजी के हाथ का जायकेदार भोजन किए 3 महीने बीत गए थे. गुडि़या तो रोज मुंह फुलाती थी, ‘अम्मांजी जैसी सब्जी आप क्यों नहीं बनातीं, मम्मी?’

आखिर अम्मांजी को हार माननी पड़ी. दोपहर का भोजन कर बाबाअम्मां नीचे आराम करने चले गए. रंजन 10 बजे बैंक जा चुका था. गुडि़या भी स्कूल गई थी. चुन्नू को थपकी देती श्रुति सोच में डूब गई.

रहरह कर बाबाअम्मांजी के भावी जीवन की त्रासदी की कल्पना उसे झकझोर देती, ‘कैसे रहेंगे वे दोनों? क्या बीत रही होगी इस वक्त उन दोनों के दिलों पर? जिन बेटों को पालपोस कर इतना बड़ा किया वे ही पराए हो गए…उन के खर्चे कैसे चलेंगे? रिटायर होने के बाद उन की आय के साधन ही क्या थे? पी.एफ., ग्रेच्युटी का कुछ भाग वे पिछले वर्ष बड़ी पोती की शादी में खर्च कर चुके थे. शेष बचा फंड अन्य पोते- पोतियों के नाम कर दिया था. अपने लिए उन्होंने कुछ नहीं बचाया. मुश्किल से 70-80 हजार रुपयों की एफ.डी. थी बैंक में और था यह मकान. एफ.डी. के ब्याज और मकान के किराए से कैसे चलेगा उन का खर्च. हमारे जाने के बाद पता नहीं कैसे किराएदार आएं. यदि हमारी तरह घर जैसा समझने वाले न आए तब? बाबाअम्मां की बीमारी में सेवाटहल कौन करेगा?’

आगे पढ़ें- श्रुति की उड़ी रंगत देख वे..

Valentine’s Day: नया सवेरा- भाग 2

पिछला भाग- Valentine’s Day: नया सवेरा (भाग-1)

छोटी मां को कभी मैं ने पापा की कमाई पर ऐशोआराम करते नहीं देखा. वे तो घर से बाहर भी नहीं जाती थीं. चुपचाप अपने कमरे में रहतीं. धीरेधीरे मेरी उन के प्रति नफरत कम होती गई, लेकिन अभी भी मैं उन को मां मानने को तैयार नहीं थी. कभीकभी दिल जरूर करता कि मैं उन से पूछूं कि क्यों उन्होंने मेरे उम्रदराज पापा से शादी की जबकि उन्हें तो कोई भी मिल सकता था. आखिर इतनी खूबसूरत थीं और इतनी जवान. लेकिन हमारे बीच बहुत दूरी बन गई थी जिसे न मैं ने कभी दूर करना चाहा, न उन्होंने. ऐसा लगता था मानो घर के अलगअलग 2 कमरों में 2 जिंदा लाशें हों.

घड़ी की घंटी ने सुबह के 3 बजाए. मैं कमरे से बाहर गई और फ्रिज से पानी निकाल कर पिया. तभी मेरी नजर छोटी मां पर पड़ी जो बाहर बालकनी में बैठी थीं और बाहर की तरफ एकटक देख कर कुछ सोच रही थीं.

मु झे अनायास ही हंसी आ गई. मु झे दया आ रही थी इस बंगले पर जहां की महंगी दीवारों और महंगे कालीनों ने महंगे आंसुओं का मोल नहीं सम झा. मैं अपने कमरे में रो रही थी और छोटी मां इसी अवस्था में सुबह के 3 बजे बालकनी में बैठी हैं. खैर, मैं अपने कमरे में जाने के लिए जैसे ही मुड़ी, आज मेरे दिल ने मु झे रोक लिया.

दिमाग ने फिर उसे जकड़ा, कहा कि तु झे क्या मतलब है. यहां सब अपनी जिंदगियां जी रहे हैं. तू भी जी. क्या तु झे तेरी छोटी मां ने कभी कुछ कहा? जब तू उदास थी तब कभी तु झ से उदासी का कारण पूछा? जब कभी तू परेशान थी, कभी तेरे पास आ कर बैठीं वो? यह तो छोड़, कभी तु झ से कुछ बात भी करने की कोशिश की इन्होंने? तेरी जिंदगी में कभी कोई दिलचस्पी दिखाई इन्होंने? नहीं न, फिर तू किस बात की सहानुभूति दिखाना चाहती है? तो सब जैसा सब चल रहा है सदियों से इस घर में, वैसा ही चलने दे. अब और कुछ नए रिश्ते न बना. लेकिन पता नहीं क्या हुआ, आज तो मेरा मन मेरे दिमाग से हारने वाला नहीं था.

कदम वापस अपने कमरे की तरफ बढ़ ही नहीं रहे थे. मैं ने एक नजर फिर छोटी मां पर डाली. उन के गालों से आंसुओं का सैलाब बह रहा था. न जाने मु झे उस वक्त क्या हुआ, मेरे कदम उन की तरफ बढ़ने लगे. मैं उन के पास जा कर खड़ी हो गई.

मैं ने उन से पूछा, ‘‘आप ठीक तो हैं न? इस वक्त अकेले में यहां?’’ छोटी मां ने आंसुओं को पोंछते हुए कहा, ‘‘मैं तो अकसर यहां बैठ कर खुद से बात कर लेती हूं

प्रीति, और अकेले रहना तो इस घर की नियति ही है. तुम भी तो अकेली ही रहती हो. हां, आज बात कुछ और है. प्रीति, कल रात 11 बजे मेरे पिता चल बसे.’’ यह कह कर छोटी मां चुप हो गईं. मु झे सम झ में नहीं आ रहा था मैं क्या कहूं. मैं ने पहली बार ठीक से उन से बात की थी. मैं तो शायद दूसरों से बात करना, उन्हें सांत्वना देना भी भूल गई थी.

मैं कुछ देर चुप रही. फिर छोटी मां ने खुद कहा, ‘‘मेरे पापा बहुत शराब पीते थे. हम 3 बहनें ही थीं. उन्हें बेटा नहीं था. वे कुछ कमाते भी नहीं थे. हमारी मां थोड़ाबहुत जो कमातीं उसी से गुजर चलता था. मां ने उस हालत में भी मेरी बड़ी 2 बहनों को तो पढ़ाया. परंतु जब मेरा स्कूल में दाखिले का समय आया तो वे किसी अनजान बीमारी से ग्रसित हो गईं. हालांकि, मैं 6 वर्ष की थी, मां मु झे बस थोड़ीथोड़ी याद हैं. हां, एक बार पापा ने मां को बहुत मारा था. मैं उस वक्त बहुत डर गई थी.

‘‘मां की मृत्यु के बाद मेरी बड़ी बहनों ने घर की जिम्मेदारी ले ली. वे खुद भी पढ़तीं और मु झे भी पढ़ातीं. मैं स्कूल नहीं जाती थी. उतना पैसा नहीं था हमारे पास. मेरी बहनें मु झे घर पर ही पढ़ातीं. मैं ने पढ़ाई काफी देर से शुरू की थी, परिणामस्वरूप 20 वर्ष की आयु में मैं ने मैट्रिक की परीक्षा ओपन स्कूल से दी. मैं पास तो हो गई, लेकिन अच्छे अंक नहीं आए. फिर घर का खर्चा भी चलाना मुश्किल होता जा रहा था. दोनों बहनों की शादी हो चुकी थी. पापा तो पहले की तरह शराब के नशे में ही डूबे रहते.

‘‘कभीकभी सोचती हूं कि यदि दादाजी ने अपना घर नहीं बनाया होता, तब हमारा क्या होता. कम से कम सिर छिपाने की जगह तो थी. खैर, यही सब देखते हुए मैं ने अस्पताल में नौकरी करने की सोची. तनख्वाह बहुत कम थी, परंतु दालरोटी का खर्च निकल ही आता था. अस्पताल में मु झ पर बुरी नजर डालने वाले बहुत थे. कभीकभी खूबसूरती भी औरत की दुश्मन बन जाती है.

‘‘एक दिन तुम्हारे पिता किसी काम से अस्पताल आए. उन्होंने मु झे वहां देखा. मेरे बारे में पूछताछ की. मेरे घर का पता लिया और मेरे पापा से मिले. औरों की तरह उन्हें भी मेरी खूबसूरती भा गई और गरीब की खूबसूरती को खरीदना अमीरों के लिए शायद ही कभी मुश्किल रहा हो. उन्होंने मेरे पिता के सम्मुख शादी का प्रस्ताव रखा.

‘‘मेरे पिता तो जैसे खुशी से फूले नहीं समाए. 20 साल की बेटी को 42 साल के उम्रदराज से ब्याहने में उन्हें जरा सी भी तकलीफ नहीं हुई, बल्कि उन की खुशी की तो कोई सीमा ही नहीं थी. उन्हें तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उन की बेटी शहर के जानेमाने रईसजादे के साथ ब्याही जाएगी. पैसों में बहुत बल होता है. बहुत बुरा लगा मु झे. मेरी राय तो कभी ली ही नहीं गई. पापा किस अधिकार से मेरी जिंदगी का निर्णय कर सकते थे? कभी बाप होने का कोई फर्ज निभाया था उन्होंने? मैं बहुत रोई, चिल्लाई लेकिन मेरी कौन सुनने वाला था. मैं ने अपनी बहनों को यह बात कही, परंतु वे भी अपनी घरगृहस्थी के  झमेलों में इस तरह लिप्त थीं कि ज्यादा कुछ कर न सकीं. वे खुद भी इस स्थिति में नहीं थीं कि मेरी कोई सहायता कर सकें.

‘‘परंतु मेरा मन नहीं माना. मैं ने सोच लिया कि कुछ भी हो जाए, मैं यह शादी नहीं करूंगी. लेकिन, तभी मेरी बड़ी बहन के साथ एक दुर्घटना हो गई. वे बस से कहीं जा रही थीं और वह बस खाई में गिर गई. वे बच तो गईं लेकिन इलाज में बहुत पैसा लगता. तब मैं ने ठंडे मन से सोचा. बहन को बचाना जरूरी था. आखिर उन्होंने मां की तरह पाला था मु झे. पैसों की ताकत को मैं ने उस वक्त पहचाना. मैं ने चुपचाप तुम्हारे पापा से शादी करने का मन बना लिया. मु झे पता चला कि उन की एक 12 वर्ष की बेटी भी है परंतु फिर भी मैं ने सिर्फ अपनी बड़ी बहन को बचाने की खातिर यह सब किया.

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Serial Story: कोई अपना – भाग 1

स्थानांतरण के बाद जब हम नई जगह आए तो पिछली भूलीभटकी कई बातें अकसर याद आतीं. कुछ दिन तो नए घर में व्यवस्थित होने में ही लग गए और कुछ दिन पड़ोसियों से जानपहचान करने में. धीरेधीरे कई नए चेहरे सामने चले आए, जिन से हमें एक नया संबंध स्थापित करना था. मेरे पति बैंक में प्रबंधक हैं, जिस वजह से उन का पाला अधिकतर व्यापारियों से ही पड़ता. अभी महीना भर ही हुआ था कि एक शाम हमारे

घर में एक युवा दंपती आए और इतने स्नेह से मिले, मानो बहुत पुरानी जानपहचान हो. ‘‘नई जगह पर दिल लग गया न, भाभीजी? हम ने तो कई बार सुनीलजी से कहा कि आप को ले कर हमारे घर आएं. आप आइए न कभी, हमारे साथ भी थोड़ा सा समय गुजारिए.’’ युवती की आवाज में बेहद मिठास थी, जो कि मेरे गले से नीचे नहीं उतर रही थी. इतने प्यार से ‘भाभीभाभी’ की रट तो कभी मेरे देवर ने भी नहीं लगाई थी.

मेरे पति अभी बैंक से आए नहीं थे, सो मुझे ही औपचारिकता निभानी पड़ रही थी. नई जगह थी, सो, सतर्कता भी आवश्यक थी. शायद? उन्होंने मेरे चेहरे की असमंजसता पढ़ ली थी. युवक बोला, ‘‘मुझे सुनीलजी से कुछ विचारविमर्श करना था. बैंक में तो समय नहीं होता न उन के पास, इसलिए सोचा, घर पर ही क्यों न मिल लें. इसी बहाने आप के दर्शन भी हो जाएंगे.’’

‘‘ओह,’’ उन का आशय समझते ही मेरे चेहरे पर अनायास ही एक बनावटी मुसकान चली आई. शीतल पेय लेने जब मैं भीतर जाने लगी तो वह युवती भी साथ ही चली आई, ‘‘मैं आप की मदद करूं?’’

मेरे चेहरे पर खीझ उभर आई कि अपना काम हो तो लोग किस सीमा तक झुक जाते हैं.

लगभग 4 साल पहले जब नएनए लुधियाना गए थे, तब भी ऐसा ही हुआ था. मधु कैसे घुसी चली आई थी हमारी जिंदगी में. दोनों पतिपत्नी कितने प्यार से मिले थे. मधु के पति केशव ने कहा था, ‘भाभीजी, आप आइए न हमारे घर. मधु आप से मिल कर बहुत खुश होगी.’ ‘जी, जरूर आएंगे,’ मैं कितनी खुश हुई थी, कोई अपना सा लगने वाला जो मिला था. परिवार सहित पहले वे लोग हमारे घर आए और उस के बाद हम उन के घर गए. मधु मुझ से जल्दी ही घुलमिल गई थी जैसे पुरानी दोस्ती हो.

‘ये साहब आप को कैसे जानते हैं?’ मैं ने पति से पूछा. ‘हमारे बैंक की ही एक पार्टी है. अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए बेचारा दौड़धूप कर रहा है. बड़ी फैक्टरी खोलने का विचार है,’ पति ने लापरवाही से टाल दिया था, मानो उन्हें मेरा प्रश्न बेतुका सा लगा हो.

एक दिन मधु ऊन लाई और जिद करने लगी कि मैं उस के बेटे का स्वेटर बुन दूं. काफी मेहनत के बाद मैं ने रंगबिरंगा स्वेटर बुना था. उसे देख कर मधु बहुत खुश हुई थी, ‘भाभी, बहुत सफाई है आप के हाथ में. अब एक स्वेटर अपने देवर का भी बुन देना. ये कह रहे थे, इतना अच्छा स्वेटर तो उन्होंने आज तक नहीं देखा.’

‘मुझे समय नहीं मिलेगा,’ मैं ने टालना चाहा तो वह झट बोल पड़ी, ‘अपना भाई कहेगा तो क्या उसे भी इसी तरह इनकार कर देंगी?’ मधु के स्वर का अपनापन मुझे भीतर तक पुलकित कर गया था.

वह आगे बोली, ‘माना कि हम में खून का रिश्ता नहीं है, फिर भी आप को अपनों से कम तो नहीं जाना. मुझे ऊन से एलर्जी है, तभी तो आप से कह रही हूं.’ आखिर मुझे उस की बात माननी पड़ी. लेकिन मेरे पति ने मुझे डांट दिया था, ‘यह क्या समाजसेवा का काम शुरू कर दिया है? उसे ऊन से एलर्जी है तो पैसे दे कर कहीं से भी बनवा लें. तुम अपनी जान क्यों जला रही हो?’

‘वे लोग हम से कितना प्यार करते हैं, और कुछ बना दिया तो क्या हुआ.’ मेरे पति खीझ कर चुप रह गए थे.

हमारा आनाजाना लगा रहता और हर बार वे लोग ढेर सारा प्यार जताते. धीरेधीरे उन का आना कम होने लगा. 2 महीनों की छुट्टियों में हम अपने घर गए थे. जब वापस आए, तब भी वे हम से मिलने नहीं आए.

एक दिन मैं ने पति से कहा, ‘मधु नहीं आई हम से मिलने, वे लोग कहीं बाहर गए हुए हैं?’ ‘पता नहीं,’ पति ने लापरवाही से उत्तर दिया.

‘क्या, केशव भाईसाहब आप से नहीं मिले?’ ‘कल उस का भाई बैंक में आया था.’

‘तो आप ने उन का हालचाल नहीं पूछा क्या?’ ‘नहीं. इतना समय नहीं होता, जो हर आनेजाने वाले के परिवार का हालचाल पूछता रहूं.’

‘कैसी रूखी बातें कर रहे हैं.’ किसी तरह पति मुझे टाल कर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गए और मैं यही सोचने लगी कि आखिर मधु आई क्यों नहीं?

15-20 दिनों बाद बच्चों के स्कूल में ‘पेरैंट्स मीटिंग’ थी. मधु का घर रास्ते में ही पड़ता था. अत: सो, वापसी पर मैं उस के घर चली गई. ‘ओह, आप,’ मधु का स्वर ठंडा सा था, मानो उसे मुझ से मिलना अच्छा न लगा हो. जब भीतर आई तो उस की सखियों से मुलाकात हुई. उस ने उन से मेरा परिचय कराया, ‘इन से मिलो, ये हैं मेरी रेखा और निशी भाभी, और आप हैं शालिनी भाभी.’

थोड़ी देर बाद 15-20 वर्ष का लड़का मेरे सामने शीतल पेय रख गया. सोफे पर 4-5 सूट बिछाए, वह अपनी सखियों में ही व्यस्त रही. वे तीनों महंगे सूटों और गहनों के बारे में ही बातचीत करती रहीं. मैं एक तरफ अवांछित सी बैठी, चुपचाप अपनी अवहेलना और उन की गपशप सुनती व महसूस करती रही. शीतल पेय के घूंट गले में अटक रहे थे. कितने स्नेह से मैं उस से मिलने गई थी बेगाना सा व्यवहार, आखिर क्यों?

‘अच्छा, मैं चलूं,’ मैं उठ खड़ी हुई तो वहीं बैठेबैठे उस ने हाथ हिला दिया, ‘माफ करना शालिनी भाभी, मैं नीचे तक नहीं आ पाऊंगी.’ ‘कोई बात नहीं,’ कहती हुई मैं चली आई थी.

मैं मधु के व्यवहार पर हैरान रह गई थी कि कहां इतना अपनापन और कहां इतनी दूरी.

दिनभर बेहद उदास रही. रात को पति से बात की तो उन्होंने बताया, ‘उन्हें बैंक से 2 करोड़ रुपए का कर्ज मिल गया है. नई फैक्टरी का काम जोरों से चल रहा है. भई, मैं तो पहले ही जानता था, उन्हें अपना काम कराना था, इसलिए चापलूसी करते आगेपीछे घूम रहे थे. लेकिन तुम तो उन से भावनात्मक रिश्ता बांध बैठीं.’ ‘लेकिन,’ अनायास मैं रो पड़ी, क्योंकि छली जो गई थी, किसी ने मेरे स्नेह को छला था.

‘कई लोग अधिकारी के घर तक में घुस जाते हैं, जबकि काम तो अपनी गति से अपने समय पर ही होता है. कुछ लोग सोचते हैं, अधिकारी से अच्छे संबंध हों तो काम जल्दी होता है और केशव उन्हीं लोगों में से एक है,’ पति ने निष्कर्ष निकाला था. उस के बाद वे लोग हम से कभी नहीं मिले. मधु का वह दोगला व्यवहार मन में कांटे की तरह चुभता है. कोई ज्यादा झुक कर ‘भाभीजी, भाभीजी’ कहता है तो स्वार्थ की बू आने लगती है.

इसी कारण मैं ने उस युवती को टाल दिया. फिर शीतल पेय उन के सामने रख, पंखा तेज कर दिया क्योंकि गरमी बहुत ज्यादा थी. वे दोनों बारबार पसीना पोंछ रहे थे.

आगे पढ़ें- चंद क्षणों के बाद उस युवक ने पूछा…

कालिमा: भाग 4- कैसे बेटे-बहू ने समझी अम्मां-बाबूजी की अहमियत

सुनते ही श्लेषा का तनाव बढ़ गया. कल शाम से आई है यह मेघनी की बच्ची. पता नहीं कौनकौन सी पट्टी पढ़ा दी होगी इस ने अम्मांजी को? बाबाअम्मां शायद इसी वजह से कुछ खिंचेखिंचे से हैं. श्लेषा के लिए फिर एक पल ठहरना भी दुश्वार हो गया. वह देवरदेवरानी से मिलने का बहाना बना कर तुरंत किचन से बाहर आई.

उसे यूं एकाएक प्रगट हुआ देख अनंत और मेघा बुरी तरह सकपका गए.  भैयाभाभी कब आ गए. इन के आने के बारे में तो बाबाअम्मां ने कोई जिक्र ही नहीं किया था. कहीं बाबा से कोई सांठगांठ तो नहीं कर ली है भैया ने?

आशंका से अनंत की खोपड़ी में खतरे के सायरन बजने लगे. उसी समय सुमंत नहा धोकर कमरे से निकला. गलियारे में अपने छोटे भाई को देखते ही वह तनावग्रस्त हो गया. उफ, यह क्यों आ गया? मेरी योजना में कहीं पलीता न लगा दे.

दोनों भाई एकदूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन गए. दोनों को एकदूसरे की उपस्थिति खलने लगी. अपने मन की दुर्भावनाओं को छिपा कर वे मुसकराते हुए मिले जरूर, मगर अंदर ही अंदर वे अपनेअपने जाल बुनने लगे.

दोपहर का 1 बज गया. वे सब भोजन करने बैठे. खाते हुए सुमंत का ध्यान बारबार घर की बदली हुई काया की ओर जाता. बाबा का स्टैंडर्ड काफी ऊंचा हो गया था. बेटों के घर जाने से पूर्व बाबा ने अपना फोन कटवा दिया था. बंद घर में फोन रख कर वह क्या करते? आज उन के पास 2-2 फोन थे, मोबाइल भी था. उन के फोन लगातार घनघना रहे थे.

बाबा के यहां ‘लंच पेक’ की सुविधा भी थी. अधिकांश फोन उसी के लिए आ रहे थे. खाना खाते हुए सुमंत मन ही मन हिसाब लगाने लगा. बाबा कम से कम हजार रुपया रोज छाप रहे थे.

खाना खाने के दौरान बाबा ने श्रुति को बैंक भेज दिया था. उस के साथ ऊपर छात्रावास में रहने वाला अशोक भी था.

जब तक इन का भोजन होता, श्रुति बैंक से 60 हजार रुपए ले कर आ गई. बाबा आफिस में आए. थोड़ी देर में 3 व्यापारी आ गए. बाबा ने पहले ही फोन कर दिया था.

श्रुति ने उन व्यापारियों का हिसाब निकाला. कोने की एक कुरसी पर बैठा सुमंत यह सब देख रहा था. घीतेल के व्यापारी को बाबा ने करीब 16 हजार रुपए का भुगतान किया. सुमंत फटीफटी आंखों से देखता रह गया. उस का वेतन 14 हजार रुपए माहवार था. यानी उस की पगार से ज्यादा रुपए का भुगतान बाबा एकएक व्यापारी को कर रहे थे. और यह भुगतान मात्र 19 दिनों की सप्लाई का था.

सुमंत का कंठ सूख गया. कितनी भारी तरक्की कर ली थी बाबा ने इस बुढ़ापे में.

उस ने चापलूसी करते हुए अपने पिता की तारीफ की. बाबा हौले से मुसकरा दिए, ‘‘सब दामादजी की कृपा है.’’

निखिल ने ही दिया था इस का आइडिया. निखिल का भतीजा पी.एम.टी. की तैयारी करने के लिए कोटा गया था. वहां वह एक परिवार में पेइंग गेस्ट बन कर रहा. कोटा में आजकल बहुत से मकानमालिक छात्रों को अपने घरों में रहने के साथसाथ भोजन की सुविधा भी देते हैं. घर जैसा माहौल, घर जैसा भोजन. छात्रों की पढ़ाई बहुत अच्छी तरह होती है.

निखिल ने बाबा को यही कार्य करने की सलाह दी. बाबाअम्मां हिचकिचाए कि भला इस बुढ़ापे में वे इतनी भागदौड़ कैसे करेंगे. निखिल ने मुसकराते हुए आश्वासन दिया कि सब हो जाएगा. आप बस मैनेजमेंट संभाल लेना.

निखिल पूरे 2 सप्ताह रहा. इधरउधर भाग दौड़ कर उस ने 12 कालिज छात्रों का चयन किया, यह छात्र अभी तक छोटेछोटे से एकएक कमरे में रह रहे थे. बाबा के घर उन्हें अच्छा खुला माहौल मिला. मनोरंजन के लिए नीचे बाबा के पास टी.वी. देखने आ जाते. बाबा के यहां उन्हें एक भारी फायदा और था. गांव से आने वाले उन के रिश्तेदार उन के साथ ठहर जाते. उन के होटल के खर्चे बच जाते.

छात्रों के चयन में निखिल ने विशेष ध्यान रखा. 4 छात्र मेडिकल के थे. जरूरत पड़ने पर वे बाबा और अम्मां को डाक्टरी सहायता भी तुरंत उपलब्ध करवा देते. कुछ छात्र कामर्स कालिज के थे, उन का कालिज सुबह रहने से घर में दिन भर चहलपहल रहती थी.

मेस के लिए निखिल ने 2 भोजन बनाने वाली बाइयों का इंतजाम कर दिया. अम्मां के हाथ की रसोई बहुत स्वादिष्ठ बनती थी. अम्मां सिर्फ मसाले निकालने व छौंक लगाने का काम करतीं, बाकी का सारा काम दोनों बाइयां संभालतीं.

शुरू में मेस सिर्फ उन 12 छात्रों के लिए प्रारंभ हुई थी लेकिन जब उन छात्रों के अन्य मित्रों ने भी वहां भोजन किया तो वे भी अम्मां के पास रोज गुहार करते, ‘‘दादी मां, हमें उधर होटल का खाना अच्छा नहीं लगता…पेट खराब हो रहा है…आप के यहां घर जैसा खाना मिलता है. प्लीज, दादी मां…’’

उन के अनुरोध के आगे बाबाअम्मां को झुकना पड़ा. छात्र बढ़ते गए, काम बढ़ता गया.

श्रुति इस बीच वहां से जा चुकी थी. कमरे में बाबा के अलावा और कोई नहीं था.

सुमंत असली मुद्दे पर आया. बातों की एक योजना बना उस ने अपनी नजरें बाबा के चेहरे पर गड़ा दीं, ‘‘अकेले इतना सारा काम संभालने में आप को दिक्कत आती होगी…’’

‘‘कोई दिक्कत नहीं,’’ बाबा ने बात पूरी होने के पूर्व ही काट दी. ऊपर रहने वाले सभी लड़के उन दोनों का बहुत ध्यान रखते थे. अपने दादादादी की तरह बाबाअम्मां की सेवा करते थे. उन लड़कों के कारण ही बाबा की मेस

का कारोबार बढ़ता गया था. बाबा अब उन से खानेरहने का आधा पैसा लेते. लड़के भी उन्हें दिलोजान से चाहने लगे थे. बाबाअम्मां को इस उम्र में और क्या चाहिए था.

सकपकाए सुमंत से कुछ कहते नहीं बना. थोड़ी देर की चुप्पी के बाद उस ने एक बार फिर गोटी फेंकी, ‘‘लेकिन बाबा, रुपयों का लेनदेन…हिसाबकिताब…इन कामों के लिए घर का व्यक्ति होना जरूरी है…’’

‘‘श्रुति है न, रंजन भी सहयोग करता है. मुझे देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती.’’

‘‘क्या मतलब?’’ सुमंत ने शंका का तीर छोड़ा, ‘‘आप हिसाबकिताब कभी चेक ही नहीं करते?’’

‘‘क्या जरूरत है? रंजन स्वयं बैंक में बडे़बडे़ हिसाब देखता है…’’

‘‘फिर भी, बाबा. आखिरकार वह एक पराया…’’

‘‘कौन कहता है कि वह पराया है,’’ बाबा ने अपनी कठोर नजरें उस के चेहरे पर गड़ा दीं, ‘‘इस बुढ़ापे में मुझे किस ने सहारा दिया? उसी ने तो.’’

बाबा की आंखें सुलगने लगीं. 2-3 क्षणों की खामोशी के बाद उन्होंने रूखे स्वर में कहा, ‘‘तुम लोग क्या सोचते हो, यह सारा कारोबार मैं ने जमाया है? मैं ने मेहनत और भागदौड़ की है?’’

वे सुमंत को घूरते रहे, फिर उठ कर टहलने लगे, ‘‘सिर्फ स्कीम बना देने से कोई कारोबार सफल नहीं हो जाता, उस के लिए पूंजी लगती है, मेहनत और भागदौड़ करनी पड़ती है. मेरे पास पैसा बचा था क्या? इस उम्र में रसोई का इतना सारा सामान रोजरोज ले आता? रोज सवेरे सब्जी ले आता? काम वालों का इंतजाम कर लेता?’’

और बाबा ने निखिल की तारीफ करते हुए बताया कि उस ने जब रंजन को योजाना बताई तो रंजन तुरंत तैयार हो गया. वह बाबाअम्मां की सेवा जान दे कर भी करना चाहता था. बैंक से ताबड़तोड़ लोन दिलवा दिया. गांव से उस के बाबूजी ने 2 भोजन बनाने वाली बाइयां भेज दीं. रंजन के बैंक में सैकड़ों व्यापारियों के खाते थे. थोकव्यापारियों के यहां से घी, तेल, अनाज, मसाले…सब आ जाते. सब्जीमंडी के दलालों व व्यापारियों से भी रंजन की बहुत पहचान थी.

कारोबार जमाने के लिए रंजन ने 10-12 दिनों की छुट्टी ले ली. सारी मेहनत तो रंजनश्रुति की ही थी.

‘‘…फिर क्यों न विश्वास रखूं इन दोनों पर.’’

फिर कमरे से निकलतेनिकलते बाबा ने असली तीर छोड़ा, ‘‘तुम सगों ने तो हमें खाली हाथ अपनेअपने घरों से भगा दिया था. यह रंजन ही है, जिस

ने हमें संभाला. हमारा असली बेटा तो यही है…और हमारे कारोबार का आधा भागीदार भी.’’

सुमंत और अनंत सिर झुकाए बैठे रहे. अपनी खुदगर्जी के कारण जो अंधेरा उन्होंने अपने असहाय वृद्ध मातापिता के जीवन में कर दिया था, उस की कालिमा कलंक बन कर उन के ही चेहरों पर पुत गई थी.

कालिमा: भाग 3- कैसे बेटे-बहू ने समझी अम्मां-बाबूजी की अहमियत

भोजन करने के बाद वह रंजन से मिलने चला गया. 4 माह बीत गए. दोपहर के 12 बज रहे थे. बाबाअम्मां बेहद व्यस्त थे.

तभी बाहर एक रिकशा रुका.

रिकशे में बाबा के बड़े बेटेबहू सुमंत और श्लेषा थे. श्लेषा ने अपनी भेदी नजरें चौराहे से ही घर पर गड़ा दी थीं. रिकशा रुकने के साथ ही उस ने घर का जायजा ले लिया. बाहर ढेर सारे स्कूटर मोटरसाइकिलें, अंदर लोगों की चहलपहल. यदि पहले से उसे यह जानकारी नहीं होती कि बाबा ने ‘ढाबा’ खोल लिया है तो घर पर लोगों की ‘भीड़’ देख वह यही समझती कि सासससुर में से कोई एक ‘खिसक’ गया है.

ईर्ष्या से उस ने दांत पीस लिए. पास बैठा सुमंत भी चोर नजरों से सब ताड़ रहा था. पिछले 4 महीनों में उस ने एक बार भी मातापिता की खोजखबर नहीं ली थी. वह आज भी यहां नहीं झांकता, मगर पिछले हफ्ते एक रिश्तेदार के यहां शादी में किसी परिचित ने उसे जानकारी दी कि उस के बाबा रिटायर्ड लाइफ में भी भरपूर कमाई कर रहे हैं, सर्विस लाइफ से भी ज्यादा.

उसे सहसा विश्वास नहीं हुआ था. श्लेषा की तो छाती पर सांप लोट गया था. ऐसा कौन सा तीर मारा होगा बुढ़ऊ ने? कहीं मकान बेच कर ऐश तो नहीं कर रहे बुड्ढेबुढि़या? हिस्सा हमारा भी है उस में. श्लेषा ने तुरंत मोबाइल पर अपने मायके बात की और सारी जानकारियां जुटाने को कहा.

4-5 दिन में उस के भैया ने हैरतअंगेज जानकारियां दीं, ‘‘बाबा ने ऊपरी मंजिल पर दर्जन भर लड़कों का छात्रावास बना दिया…नीचे मेस चालू कर दी…इन छात्रों के कारण मेस में बीसियों और छात्र आने लगे. रंजन के परिचय की वजह से बिना परिवार के रहने वाले बैंककर्मी व अन्य लोग भी. ढाबा ही खोल लिया बाबा ने. टिफिन सर्विस भी है. 200 से ज्यादा परमानेंट मेंबर बन गए हैं.’’

‘‘200 मेंबर…?’’ सुमंत की आंखें आश्चर्य से 2 सेंटीमीटर फैल गईं. यदि प्रति मेंबर कमाई 100 रुपए भी हो तो महीने के 20 हजार…

‘‘बाप रे,’’ वह स्वयं महीने के 14 हजार कमाता था. श्लेषा गरदन तान कर रिश्तेदारों में इस का बखान करती थी. मगर बाबा की कमाई तो…इस बुढ़ापे में…हायहाय…

उस के अंगअंग में ईर्ष्या की आग लग गई. उस का युवा पुत्र सलिल साल भर से अपना व्यापार जमाने का यत्न कर रहा था. 2-3 लाइनें बदल ली थीं. सफलता दूरदूर तक नजर नहीं आ रही थी. उलटे 30-35 हजार रुपयों का घाटा हो गया था.

सुमंत के स्वार्थी जेहन में फौरन एक स्कीम आई. क्यों न सलिल को बाबा के साथ फिट कर दिया जाए? वैसे भी बाबा को सहारे की जरूरत होगी. थक जाते होंगे बेचारे.

निर्णय लेने में फिर उस ने एक मिनट की भी देरी नहीं की. श्लेषा को साथ ले कर वह तुरंत यहां आ धमका.

रिकशे से उतर दोनों लोहे के गेट तक आए, अंदर का दृश्य साफ दिख रहा था. बडे़ हाल को बाबा ने भोजनकक्ष बना दिया था. देसी ढंग से नीचे बैठ कर ग्राहक भोजन ग्रहण कर रहे थे. बाबा की आवाज बाहर तक आ रही थी. बाबा पारिवारिक वात्सल्य से आग्रह करकर के ग्राहकों को भोजन करवा रहे थे. वे घूमघूम कर परोसियों (बेयरों) को निर्देश भी दे रहे थे.

तभी एक नौकर की नजर सुमंत और श्लेषा पर पड़ी, अंगोछे से हाथ पोंछता वह इन की ओर लपका.

करीब आ कर उस ने पूछा, ‘‘भोजन करना है?’’ फिर सूटकेस आदि देख उस ने कहा, ‘‘लेकिन साहब, हमारे यहां ठहरने की व्यवस्था नहीं है. ठहरने के वास्ते आप को किसी होटल में…’’

‘‘अबे,’’ गुस्से से सुमंत ने दांत पीसे, ‘‘बेवकूफ, हमें पहचानता नहीं. हम यहां के मालिक हैं.’’

‘‘मालिक?’’ होंठों में बुदबुदा कर वह सिर खुजाने लगा. मालिक तो अंदर बैठे हैं, फिर फूलगोभी के कीडे़ की तरह  यह कौन एकाएक प्रगट हो गया.

सुमंत ने गुर्रा कर उसे सामान उठाने का हुक्म दिया. नौकर अनसुना कर के खड़ा रहा.

तभी अंदर से बाबा की आवाज आई, ‘‘फतहचंद? पानी लाना, बेटा.’’

‘‘जी, लाया, बाबा,’’ फतहचंद बिना सामान उठाए अंदर भागा. सुमंत सामान उठाने का निर्देश देता रह गया. इस अपरोक्ष अपमान ने सुमंत का चेहरा लाल कर दिया. इच्छा हुई अभी अंदर जा कर इस फत्तू को तड़ातड़ 2-4 थप्पड़ जमा दे. तभी उसे ध्यान आया कि फिलहाल गरज उस की है और यह नौकर बाबा का है. बाबा के नौकरों को डांटने पर बाबा नाराज हो सकते हैं.

दोनों बरामदे में आ कर ठिठक गए. घर में प्रवेश पहले बडे़ हाल से करते थे. वहां ग्राहक भोजन कर रहे थे इसलिए उधर से जाना उचित नहीं रहेगा. जूतेचप्पल उतार कर वे साइड वाले छोटे कमरे में आए. बाबा ने उसे आफिस बना दिया था. कमरे में कोई नहीं था. इस कमरे में अंदरूनी द्वार से वे गलियारे में आए. तभी बाबाअम्मां ने उन्हें देख लिया.

बाबा और अम्मां से नजरें मिलते ही सुमंत और श्लेषा ने अपने होंठों पर गजभर की मीठीमीठी आत्मीय मुसकान बिखेर ली और बेटे ने आगे बढ़ कर आदरपूर्वक अपने मातापिता के चरण स्पर्श किए. बाबाअम्मां मन ही मन मुसकरा दिए. बहुत मानसम्मान उमड़ रहा है बुड्ढेबुढि़या पर (श्लेषा उन्हें यही संबोधन देती थी).

वैसे उन्होंने सुमंत  और श्लेषा को रिकशे से उतरते ही देख लिया था. जानबूझ कर वे अपनेआप को व्यस्त दिखलाते रहे. उन के प्रणाम करने पर बाबाअम्मां ने भावशून्य चेहरे से आशीर्वाद दिया, फिर कुशलक्षेम की 2-3 बातें पूछ कर औपचारिकता निभाई और अपने काम में व्यस्त हो गए. बाबा हाल में चले गए, अम्मां किचन में.

रह गए सुमंत और श्लेषा. उन्हें सूझ नहीं रहा था कि अपना सामान घर के किस कोने में रखें, स्नानादि कहां करें. अपने ही घर में वे उपेक्षित से खडे़ थे.

अचानक श्लेषा को वे दिन याद आ गए जब बाबाअम्मां उस के घर रहने के लिए आए थे. दोनों बूढे़ इनसान अपने ही पुत्र के घर में किस तरह टुकुरटुकुर…बेबसी से अपनेआप में सिमटेदुबके रहते थे. ‘धरती का बोझ’ बोलता था सुमंत उन्हें.

3-4 मिनट बीत गए. बाबा, अम्मां, नौकर किसी ने भी उन की ओर ध्यान नहीं दिया. आखिरकार सुमंत अम्मां के पास गया, ‘‘अम्मां, तैयार होने के लिए हम ऊपर जाते हैं.’’

‘‘ऊपर तो कालिज के लड़के रहते हैं. अभी उन की परीक्षाएं चल रही हैं.’’

फिर सुमंत ने याचक दृष्टि अपनी जननी पर टिका दी.

अम्मां ने फतहचंद को इशारा किया. फतहचंद उन्हें किचन के बाजू वाले कमरे में ले गया.

4-5 माह पूर्व, जब बाबाअम्मां सुमंत के घर रहने गए थे, श्लेषा किचन में झांकती तक नहीं थी. बेचारी अम्मां अकेली खटती रहतीं. मगर आज अम्मां के घर, श्लेषा को किचन में जाने की बहुत जल्दी हो रही थी. आधे घंटे में नहाधो कर वह किचन में पहुंच गई.

अम्मांजी उस वक्त वहां 2 नौकरों से टिफिन भरवा रही थीं. श्लेषा बिना कहे नौकरों के संग काम में जुट गई. अम्मांजी ने इसरार भी किया कि ‘यहां का काम तुम्हें समझ नहीं आएगा,’ मगर श्लेषा ने उन की बात को अनसुना कर दिया और सुघड़ बहू की तरह सास के काम में हाथ  बंटाती रही. भोजन बनाने वालियों के संग रोटियां बेलने में भी उसे संकोच नहीं हुआ.

अम्मां मन ही मन मुसकरा कर स्टोर रूम की तरफ चली गईं. श्लेषा रसोईवाली बाइयों के संग बतियाते हुए फटाफट हाथ चलाने लगी. तभी अचानक उस के कान खडे़ हो गए. बाहर से अनंत और मेघा की आवाज आ रही थी.

देवरदेवरानी की आवाज सुनते ही वह चौंक पड़ी. तुरंत गरदन उचका कर गलियारे में झांका. अनंत और मेघा बतियाते हुए गलियारे में आ रहे थे. उन को देख श्लेषा सकते में आ गई. ये दोनों भला क्यों आए, कहीं इन की भी कोई प्लानिंग तो नहीं है? इन के अंकित ने इसी वर्ष ग्रेजुएशन किया है.

आशंका से श्लेषा की सांस जहां की तहां थम गई. अनंत और मेघा उसे अपने ‘दुश्मन नंबर वन’ नजर आने लगे. इधर रोटी बेल रही गोमतीबाई ने बतलाया, ‘‘दोनों कल शाम को आए थे. अभी कालोनी में शर्माजी से मिलने गए थे.’’

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कालिमा: भाग 2- कैसे बेटे-बहू ने समझी अम्मां-बाबूजी की अहमियत

सोचसोच कर श्रुति का कलेजा मुंह को आने लगा. श्रुति को बेटी समझ कर रखा था बाबाअम्मां ने. दरअसल, उन की स्वयं की बेटी का नाम श्रुतकीर्ति था. नाम की इस समरूपता ने बाबाअम्मां को कुछ ज्यादा ही जोड़ दिया था श्रुति से. अब ऐसे स्नेहिल मातापिता को छोड़ कर वह कैसे चल दे.

तभी नीचे टाटा सूमो के रुकने की आवाज आई. गांव से उस के सासससुर (मांबाबूजी) आने वाले थे. श्रुति उठी और आंसू पोंछतीपोंछती नीचे आई.

मांबाबूजी ही थे. श्रुति की उड़ी रंगत देख वे घबरा गए. श्रुति ने हाथ के इशारे से चुप रहने का संकेत किया और ऊपर आ कर उन्हें सब हाल कह सुनाया. सुन कर उन्हें गहरा सदमा लगा.

बाबा को अपना बड़ा भाई मानने लगे थे बाबूजी. बाबाअम्मां की आत्मीयता देख मांबाबूजी निश्चिंत रहते थे. गांव में रहते हुए उन्हें अपने बेटेबहू की चिंता करने की कभी जरूरत महसूस नहीं हुई.

उन्होंने फौरन निर्णय लिया, रंजन उस मकान को बेच देगा और यहीं रह कर बाबाअम्मां की सेवा करेगा.

बाबा को जब इस निर्णय की जानकारी हुई, उन्होंने इस का विरोध किया. उन्होंने समझाया, ‘‘गहने और मकान बनवा लिए तो बन जाते हैं, वरना योजनाएं ही बनती रहती हैं, इसलिए भावनाओं में बह कर अब हो रहे कार्य को टालो मत.’’

बाबा की दूरंदेशी भरी सलाह के आगे सब को झुकना पड़ा और रंजन के घर का गृह- प्रवेश हो गया.

रंजन अपने घर चला गया. वह तो 2-3 माह बाद जाना चाहता था, पर  बाबाअम्मां ने समझाया, ‘‘गृहप्रवेश के बाद घर सूना नहीं छोड़ते.’’

बाबा का घर खाली हो गया. उस पर ‘किराए से देना है’ की तख्ती लग गई. पूरे 7-8 वर्षों बाद लगी थी यह तख्ती.

रंजन के जाने के बाद बाबाअम्मां को बेहद सूनापन लगने लगा. एक सहारा था उस से. पता नहीं अब जो किराएदार आएं, उन का स्वभाव कैसा हो?

बाबा रोज अगले किराएदार का इंतजार करते. सुबह से शाम हो जाती पर कई दिन तक एक भी किराएदार नहीं आया. अब उन्हें घबराहट होने लगी. एफ.डी. के ब्याज के बमुश्किल 400 रुपए मिलने वाले थे. यदि कोई किराएदार नहीं आया तब? अगले माह का खर्च कहां से निकलेगा? इस किराए की आमदनी का ही तो सहारा था उन्हें? पास की नकदी अब चुकने लगी थी. बचत  खाते में भी कोई विशेष रकम नहीं थी. तो क्या अगले माह एफ.डी. तुड़वानी पड़ेगी?

सोचसोच कर वे परेशान  हो जाते. उन की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगता.  कितनी भारी गलती कर बैठे थे वे? उन के एक सहयोगी मित्र ने समझाया भी था, ‘जमाना बहुत खराब है, बदरीनाथ. मांबाप को अपनी मुट्ठी बंद रखने का दौर आ गया है. सब कुछ बच्चों के नाम मत करो.’

घबरा कर वे ऊपरी मंजिल में आए. खाली कमरे भांयभांय कर रहे थे. उन कमरों में घूमते हुए, उस की दीवारों पर हाथ फेरते हुए उन्हें वे दिन याद आ गए जब वह अपने सपनों के इस घर को बनवा रहे थे. इस की एकएक ईंट उन की जानीपहचानी थी. इसे बनवाते समय कितने रंगीन सपने देखे थे उन्होंने. तीनों बेटे बड़े होंगे. उन की शादियां होंगी. नीचे एक बेटा रहेगा, ऊपर दो. कितना अच्छा लगेगा उस वक्त. पूरा घर गुलजार रहेगा. उन का बुढ़ापा चैन से कट जाएगा.

नंगे फर्श पर बैठ वह फफकफफक कर रो पडे़. बुढ़ापे में ये दिन भी देखने थे.

नीचे किसी कार के रुकने की आवाज आई. आंसू पोंछ वह फुरती से उठे और भाग कर गैलरी में आए. श्रुतकीर्ति और निखिल कार से उतर रहे थे. बेटीदामाद को देखते ही उन का जी हरा हो गया.

उन की बूढ़ी थकी रगों में जान आ गई. जवानों की सी चपलता से वह दौड़ते हुए नीचे आए. पारो तब तक द्वार खोल चुकी थी.

श्रुतकीर्ति अंदर आई. मातापिता की दयनीय हालत देख उस का कलेजा मुंह को आ गया. हाय, 3 माह में ही बेचारे कितने बुढ़ा गए हैं.

श्रुतकीर्ति को अपनी रुलाई रोकना दुश्वार हो गया. उसे तो मालूम ही नहीं था कि बाबाअम्मां यहां आ चुके हैं? कल उन से बात करने के लिए उस ने बडे़ भैया के घर फोन लगाया था, भाभी से मालूम पड़ा, ‘बाबाअम्मां का मन नहीं लग रहा था तो वापस चले गए.’

रोरो कर श्रुतकीर्ति का बुरा हाल हो गया. तो इसलिए ‘मन नहीं लग रहा’ था. वह बारबार उलाहना देती. 3 माह में कम से कम 6 बार उस ने फोन पर बात की थी, बाबाअम्मां ने एक बार भी इशारा नहीं किया.

‘‘करते कैसे, बेटी?’’ बाबा का गला रुंध गया, ‘‘जब रहना उन्हीं के संग था… कैसे करते शिकायत?’’

‘‘यहां आने के बाद तो करते?’

अब कैसे कहें बाबा, कैसे बतलाएं अपनी दुर्दशा. आज महज 1 रुपया खर्च करने से पहले भी कईकई बार सोचना पड़ रहा है उन्हें. दूध तक तो बंद कर दिया है. सब्जी भी कंजूसी से खाते हैं.

कितने आशंकित मन से जी रहे थे वे दोनों. एक ही चिंता खाए जा रही थी, अगले माह एफ.डी. न तुड़वानी पडे़.

निखिल की तो क्रोध से मुट्ठियां भिंच गईं. जेब से मोबाइल निकाल लिया, ‘‘अभी लताड़ता हूं तीनों को.’’

श्रुतकीर्ति ने रोक दिया, ‘‘जाने दो, क्या फायदा ऐसे निठल्लों से कुछ कहने का. मातापिता के प्रति लेशमात्र भी दर्द होता तो क्या इस तरह व्यवहार करते.’’

निखिल कसमसा कर रह गया.

श्रुतकीर्ति रसोईघर में गई. वहां एक सरसरी नजर डालते ही सब ताड़ गई. पलट कर उस ने आंखोंआंखों में निखिल को इशारा किया. निखिल भी समझ गया. वह तुरंत बाहर निकल गया.

बाबाअम्मां कनखियों से यह सब देख रहे थे. बेटीदामाद का मंतव्य भांपते ही वे संकोच में पड़ गए. हाय, उन की रसोई का खर्च एक दिन बेटी उठाएगी, ऐसी बदहाली की कल्पना तो उन्होंने सपने में भी नहीं की थी. बुढ़ापा कैसेकैसे दिन दिखला रहा है. शर्मिंदगी से वह व्याकुल हो उठे.

अलमारी में 400 रुपए पडे़ थे. देने के लिए वह उठ कर दरवाजे की ओर लपके. श्रुतकीर्ति ने हाथ पकड़ कर वापस बैठा दिया, ‘‘कहां भागे जा रहे हो? कहीं रेस लगानी है?’’

‘‘बेटी,’’ बाबा का चेहरा एकदम कातर हो गया, ‘‘दामादजी पैसे ले कर तो गए ही नहीं?’’

‘‘आप भी बाबा,’’ श्रुतकीर्ति ने थोड़ा झुंझला कर कहा, ‘‘क्या निखिल आप के बेटे नहीं हैं?’’

‘‘हैं क्यों नहीं…लेकिन, बेटी…जरा सोच…दामाद से यह सब…अच्छा लगेगा हमें?’’

‘‘और घुटघुट कर मन मार कर रहते हुए अच्छा लग रहा है आप को?’’ श्रुतकीर्ति का गला रुंध गया, ‘‘इन पुराने रिवाजों को छोड़ो, बाबा. 3-3 कमाऊ बेटे जब मुंह मोड़ लें तो क्या बेटीदामाद भी आंखकान बंद कर के बैठ जाएं? छोड़ दें मातापिता को लावारिसों की तरह?’’

चायनाश्ता करवा कर श्रुतकीर्ति रसोई बनाने लगी. निखिल और बाबाअम्मां भी वहीं बैठ कर हाथ बंटाने लगे. निखिल बाबाअम्मां को अपने संग चलने के लिए मनाने लगा. बाबाअम्मां संकोच में पड़ गए. बेटी के घर रहने की कल्पना वह कैसे कर सकते थे. उन्होंने दबे स्वर में अपनी लाचारगी जाहिर की. उन की मनोदशा समझ कर निखिल ने फिर और जिदद् नहीं की. वह एक दूसरी योजना पर विचार करने लगा. यदि यह योजना सफल हो गई तो बाबाअम्मां पूरे मानसम्मान से रह सकेंगे. इस में उसे रंजन का पूरा सहयोग चाहिए था, विशेषकर श्रुति का. श्रुति को ही अधिक समय देना पडे़गा इस में.

आगे पढ़े- रिकशे में बाबा के बड़े बेटेबहू…

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