अर्चना को मारने के लिए दौड़े एमसी स्टेन, यह देखकर फूटेगा बिग बॉस का गुस्सा

बिग बॉस 16′ में वैसे तो आए दिन कोई न कोई बड़ा झगड़ा या हंगामा देखने को मिला है, लेकिन 3 जनवरी के एपिसोड में हंगामा हो गया. अर्चना गौतम और एमसी स्टेन के बीच गंदी लड़ाई छिड़ गई. मामला इस हद तक बढ़ गया कि दोनों ने एक-दूसरे के माता-पिता को लड़ाई में खींच लिया. घर में झाड़ू न लगाने को लेकर अर्चना और एमसी स्टेन का झगड़ा हुआ था, जो कैप्टेंसी टास्क के दौरान बढ़ गया. बात यहां तक ​​पहुंच गई कि एमसी स्टेन ने न सिर्फ खुद को बाथरूम में बंद कर लिया बल्कि अर्चना गौतम को थप्पड़ मारने को भी सोच लिया.

 

 

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अर्चना को थप्पड़ मारने जाएंगे स्टेन

दरअसल, बिग बॉस 16 का नया प्रोमो सामने आया है, जिसमें एमसी स्टेन खूब तोड़फोड़ मचाते नजर आ रहे हैं. बीते एपिसोड में देखा गया था कि अर्चना से लड़ाई के बाद एमसी स्टेन अपनी मंडली के पास बैठ जाते हैं. इस दौरान साजिद खान उन्हें समझाते हैं लेकिन स्टेन साफ बोलते हैं कि गलती उसकी भी है. वहीं, अब नए प्रोमो में देखने को मिल रहा है कि एमसी स्टेन अचानक उठ जाते हैं और बोलते हैं कि वह घर से वालंटियर एग्जिट लेंगे. यह बात सुनकर सब हैरान रह जाते हैं. इस दौरान वह घर में तोड़फोड़ करते हैं. तब अचानक ही साजिद बीच में बोल पड़ते हैं कि अगर बाहर ही जाना है तो अर्चना को एक थप्पड़ मार और बाहर हो जा. स्टेन भी इस बात को सुनकर आगे बढ़ जाते हैं और अर्चना के रूम में जाते हैं. तब शिव उन्हें रोकते हैं.

 

 

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बिग बॉस का फूटेगा गुस्सा

इस पूरे बवाल के बाद बिग बॉस 16 में एमसी स्टेन सारा सामान तोड़ते हुए नजर आएंगे, जिसके बाद बिग बॉस को बीच में आना होगा. बिग बॉस घर के सभी सदस्यों को गार्डन एरिया में लाइन से खड़ा करेंगे और सबसे पहले अर्चना-एमसी स्टेन को फटकार लगाएंगे. इसी बीच, बिग बॉस द्वारा घरवालों पर एक सख्त एक्शन भी लिया जाएगा, जिसके बाद घरवाले बिग बॉस को सॉरी बोलते हुए नजर आएंगे.

सेक्स में पति की जबरदस्ती

श्वेता खाना खाकर सोने चली गयी थी. उसका पति प्रदीप अभी घर नहीं लौटा था. पहले श्वेता रात के खाने पर पति का देर तक इंतजार करती थी. कुछ दिनों के बाद प्रदीप ने कहा कि अगर वह 10 बजे तक घर न आये तो खाने पर उसका इंतजार न करे. इसके बाद देर होने पर श्वेता खाना खाकर लेट जाती थी. इसके बाद भी उसको नंीद नहीं आ रही थी. वह अपने संबंधें के बारे में सोच रही थी. उसको लग रहा था जैसे वह पति की जबरदस्ती का शिकार हो रही है. प्रदीप ज्यादातर देर रात से घर लौटता था. इसके बाद कभी सेा जाता था तो कभी श्वेता को शारीरिक संबंध् बनाने के लिये मजबूर करने लगता था. नींद के आगोश में पहुच चुकी श्वेता को इस तरह संबंध बनाना अच्छा नहीं लगता था. कभी तो श्वेता को लगता जैसे पति प्यार न करके बलात्कार कर रहा हो.

श्वेता अपने को यह सोचकर समझाती कि पति की शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिये ही शायद शादी होती है. इसलिये उसको पति की जरूरतों को पूरा करना चाहिये. इस जोर जबरदस्ती में श्वेता को 4 साल के विवाहित जीवन में एक दो बार ही ऐसा लगा था कि प्रदीप प्यार के साथ भी संबंध् बना सकता था . ज्यादातर बार श्वेता जोरजबरदस्ती का ही शिकार बनी थी. इसका प्रभाव श्वेता के उफपर कुछ इस तरह पडा कि वह शारीरिक संबंधें से चिढने सी लगी. श्वेता और प्रदीप को एक बेटा था. श्वेता जब कभी अपनी सहेली से बात करती तो उसको पता चलता कि उनका पतिपत्नी का रिश्ता ज्यादा मजे में चल रहा है. श्वेता ने अपनी परेशानी सहेली शालिनी को बतायी . वह श्वेता को लेकर सेक्स कांउसलर के पास गयी.

सेक्स को लेकर बातचीत में रूखापन

कांउसलर ने बातचीत करके यह जानने की कोशिश की कि श्वेता की परेशानी क्या है ? श्वेता ने काउंसलर को बताया कि पति प्रदीप उस समय सेक्स संबंध् बनाने की कोशिश करता है जब उसका मन नहीं होता है. कई बार जब वह इसके लिये मना करती है तो जोरजबरदस्ती पर उतर आता है. इससे श्वेता को सेक्स संबंधे से ही मन हट गया है. काउसंलर रेखा पाण्डेय ने श्वेता को सलाह देते हुये कहा कि इस बारे में पति से आराम से बात करे. यह बातचीत सेक्स संबंधे के समय न करके बाद में की जाये. इसके लिये प्यार से पति को मनाने की कोशिश की जाये. अगर पति कभी नशे की हालत में इस तरह के सेक्स संबंध् बनाने का काम करते हो तो उनका नशा उतरने के बाद ही बात करे.

नशे की हालत में लोगो को बात समझ में नहीं आती उल्टे कभी कभी लडाई झगडे से मामला बिगड जरूर जाता है. पति हर समय गलत होता है यह भी नहीं मान लेना चाहिये. सेक्स पति कर जरूरत होती है. उसको इसके लिये टालना सही नहीं होता है. हो सकता है कि कभी आपका मन न हो इसके बाद भी आपको सकारात्मक रूख रखना चाहिये. सेक्स पति और पत्नी दोनो की जरूरत होती है. इसलिये इससे जुडी किसी भी परेशानी को हल करने के लिये आप दोनो को मिलकर ही सोंचना चाहिये. जब आप खुलकर एक दूसरे से बात करेगें तो तमाम सारी गलतपफहमियां अपने से दूर हो जायेगी. ज्यादातर पति पत्नी के साथ सेक्स को लेकर बातचीत कम करते है. जबरन सेक्स के चक्कर में रहते है. इस वजह से पति पत्नी के बीच दूरियां भी बढती है और पत्नी सैक्स को इन्जाव भी नहीं कर पाती है.

कम नहीं होती पत्नियों में बहानेबाजी

सेक्स दाम्पत्य जीवन की सबसे अहम चीज होती है. यह बात पति पत्नी दोनो को पता होती है. सवाल उठता है कि सेक्स संबंध् के लिये जबरदस्ती क्यो करनी पडती है. कभी पति पत्नी दोनो को कुछ ऐसी बीमारियां लग जाती है जिससे सेक्स संबंधें से मन उचट जाता है. ऐसे में बहुत ही ध्ैर्य और समझदारी की जरूरत होती है. सबसे पहले अपनी साथी की जरूरत को समझने की कोशिश करे. अगर कोई शारीरिक परेशानी है तो उसका इलाज किसी योेग्य डाक्टर से कराये. सेक्स की ज्यादातर बीमारियों की वजह मानसिक ही होती है. इसके लिये आपस में बात करे अगर बात न बने तो मनोचिकित्सक से भी बातचीत कर सकती है.

सेक्स के प्रति पत्नी की निगेटिव सोंच ही पति को कभी कभी जबरदस्ती करने के लिये मजबूर करती है. कुछ पत्नियां सेक्स को गंदा काम मानकर उससे संकोच करती है. अगर आप भी इसी तरह के विचार रखती है तो सही नहीं है. आपके इस तरह के विचार पति को जबरदस्ती करने के लिये उकसाते है. पति की जबरदस्ती से बचने के लिये इस तरह की निगेटिव मानसिकता से बचना चाहिये. इस मानसिकता के चलते न आप कभी खुश रह सकती है और न पति को खुश रख पायेगी. ऐसा करके आप कभी सेक्स का आनंद न ले पायेगी और न कभी आप अपने पति को ही यह सुख दे पायेगी.  जबरदस्ती से बचने के लिये सेक्स के प्रति अपनी सोंच को सकरात्मक बनाये.

बहाने बनाने से बचे

आमतौर पर पतियों को यह शिकायत होती है कि पत्नी बहाने बनाती है जिसके चलते जबरदस्ती करनी पडती है. इन शिकायतों में सबसे बडी शिकायत बच्चों के बडे होने , मूड ठीक न होने और घर में एकांत की कमी होना होता है. रमेश का कहना है कि मै जब भी अपनी पत्नी के साथ सेक्स करने की पहल करता था वह बच्चो और परिवार का बहाना कर टाल जाती थी. इसका मैने हल यह निकाला सप्ताह में एक बार पत्नी को लेकर आउफटिंग पर जाने लगा. इसके बाद पत्नी से हमारे संबंध् सही रूप से चलने लगे. अब पत्नी को यह अच्छा लगने लगा है. उसके साथ हमारे संबंध् सहज हो गये.

पत्नी के बहाना बनाने का असर यह होता है कि जब कभी पत्नी को हकीकत में कोई परेशानी होगी तब भी पति को लगेगा कि वह बहाना ही बता रही है. मूड न होने पर भी साथी को सहयोग देने की कोशिश करे इससे उसकी जबरदस्ती से बच सकती है. पति का समीप आना पत्नी की अंदर की भावनाओं को जगा देता है. इससे पत्नी भी उत्तजित हो जाती है. पति जबरदस्ती करने से बच जाता है. आपको मूड न हो तो उसको बनाया जा सकता है. आपको पति को बताना पडेगा कि मूड बनाने के लिये वह क्या करे.

समझदारी से सुखद संबंध

साथ रहते रहते पति पत्नी को एक दूसरे के बारे में बहुत सारी बातों का पता चल जाता है. शालिनी का कहना है कि जब उसके पति नहाने के बाद अच्छा सा परपयूम लगाकर सोने के लिये आते है तो उसको पता चल जाता है कि आज की रात वह कुछ चाहते है. रेखा कहती है कि उसके पति कोई न कोई बहाना बनाकर अपनी बात कह देते है. काउंसलर रेखा पांडेय कहती है कि इस तरह के लोगो के साथ समाजस्य बठाना आसान होता है. मुश्किल में वह लोग पत्नी को डालते है जो बिना किसी तैयारी के सेक्स संबंध् बनाने की कोशिश उस समय करते है जब पत्नी इसके लिये तैयार नहीं होती है. सुमन की कहानी से यह बात समझ में आ जाती है. सुमन का पति जब तक वह जागती थी अपना काम करता रहता था . जब वह सो जाती थी तब वह जबरदस्ती करने लगता था. ऐसे मामलो में पति को समझाकर ही काम चलाया जा सकता है.  पति पत्नी में ऐसे हालत से बचना चाहिये कि जबरन संबंध् बनाये जाये. अगर कभी पति जबरदस्ती करे तो आपको उन्दी से सहयोग देकर जबरदस्ती से बचना चाहिये. पति जबरदस्ती करे और आपने भी उसको उसी तरह से जवाब दिया तो संबंधे में दरार पड सकती है.

खामोशी की दीवार: बेटे ने कैसे जोड़ा माता-पिता का रिश्ता

रेखा और रमन की शादीशुदा जिंदगी को पूरे पैंतीस बरस हो गए थे. एक आम गृहस्थ जिस तरीके से जीवनभर रिश्तों में बंध कर अपनी गृहस्थी चाहेअनचाहे खींचते हैं, उसी तरह से उन्होंने भी अपनी जिंदगी घसीटी. कहने को तो वे  दोनों स्वभाव से सीधे और सरल थे, लेकिन जब भी वे एकसाथ होते पता नहीं क्यों उन दोनों को एकदूसरे में कोई अच्छाई दिखाई ही नहीं देती और वे एकदूसरे की कमियां गिनाने लगते. अन्य लोगों के साथ उन का व्यवहार बहुत अच्छा रहता.

रमन को शुरू से ही रेखा का हर किसी से खुल कर बात करना बहुत खटकता. किसी भी बाहर वाले से वह  जब इतमीनान से बात करती तो रमन को बहुत  बुरा लगता. वह अपनी मंशा उसे कई बार जता भी चुके थे, लेकिन रेखा अपनी आदत से मजबूर थी. जो कोई घर आता, वह उस के साथ आराम से बतियाने  लगती.

रमन इस बात को ले कर बहुत कुढ़ते और नाराज होते. रेखा थी कि उन की एक न सुनती. लोगों से बातें करने में उसे बहुत रस आता था. यही वजह थी कि वह जीवन में अपने लिए तनाव कम लेती और दूसरों को  देती ज्यादा थी.

रमन स्वभाव से अंतर्मुखी थे. उन्हे किसी से ज्यादा बोलना पसंद न था. वे अपने काम से काम रखना ज्यादा पसंद करते. एक रेखा ही थी, जिस से वह पहले दिल की बात कह लेते थे. अब पता नहीं क्यों उन्हें उस के किरदार पर शक होने लगा था. जब भी वे उन के सामने पड़ती अच्छी बात भी बहस पर जा कर खत्म होती. यह बात उन का बेटा आशु और बेटी रिया छुटपन में ही समझ गए थे कि मम्मीपापा दोनों स्वभाव से अच्छे होते हुए भी अपनीअपनी आदतों से मजबूर हैं.

वक्त गुजर रहा था. आशु और रिया बड़े हो गए. एमएससी करते ही रिया के लिए अच्छा रिश्ता आया तो रमन ने उस के हाथ पीले कर दिए. बी. टैक कर के आशु नौकरी के लिए शहर से बाहर चला गया था.

बिटिया के ससुराल जाते ही घर सूना हो गया. घर पर रेखा से बात करने वाला  अब कोई नहीं रह गया था. पहले वह रिया से बात कर मन हलका कर लेती थी. उन का घर ज्यादा बड़ा न था. कुल मिला कर इस घर में तीन बैडरूम थे. जब कोई घर पर आता तो आशु या रिया में से किसी को अपना बेडरूम उस के साथ साझा करना पड़ता.

रोज सुबह उठने से रात  सोतेसोते तक रेखा और रमन में नोंकझोंक होती ही रहती. कुछ समय बाद आशु की शादी हो गई और वह भी परिवार के साथ बेंगलुरु शिफ्ट हो गया.

अब घर पर केवल रेखा और रमन रह गए थे. उम्र के साथ उन की आदतें भी और पक्की हो गई थीं. आशु ने अपने कमरे में एक बड़ा सा टीवी लगा रखा था. दोपहर में उस की अनुपस्थिति में रमन उसी टीवी पर अपने पसंदीदा कार्यक्रम देखना पसंद करते.

जब आशु घर पर रहता तो रेखा और रमन को एकसाथ एक ही कमरे में बैठ कर टीवी देखना पड़ता. यहां पर भी अपने पसंद के प्रोगाम को ले कर दोनों में अकसर बहस हो जाती. रेखा को धारावाहिक देखना पसंद था तो रमन को खबरें. किसी तरह से बहुत बहस  करने के बाद आपस में सामंजस्य बिठा कर उन दोनों ने टीवी देखने का समय निश्चित कर लिया था कि रात 9 बजे तक रमन खबरें देखेंगे और उस के बाद रेखा अपने मनपसंद धारावाहिक.

आशु के बैंगलुरू जाने के बाद सूने घर में अब केवल दोनों की नोंकझोंक की आवाजें सुनाई देतीं. एक दिन रेखा बोली, “घर पर बच्चे  नहीं हैं. अब तुम आशु के कमरे में बैठ कर आराम से टीवी देख सकते हो.”

रमन ने घूर कर रेखा को देखा, तो वह बोली, “ऐसे क्यों घूर रहे हो?” “तुम से ऐसी समझदारी वाली बात की उम्मीद नहीं थी. वैसे, तुम यह इसीलिए कह रही हो, जिस से तुम्हें भी टीवी देखने में परेशानी न हो और मुझे भी.”

रमन उसी दिन से आशु के कमरे में बैठ कर आराम से टीवी देखने लगे और रेखा अपने कमरे में धारावाहिकों का आनंद लेती. धीरेधीरे रमन ने आशु के कमरे में अपना और  सामान भी व्यवस्थित कर दिया. कई बार टीवी देखतेदेखते वे वहीं सो जाते. रेखा रात ठीक 10 बजे टीवी और लाइट बंद कर के लेट जाती.

एक दिन रमन बोले, “मैं ने सोच लिया है कि अब मैं टीवी वाले कमरे में ही सोया करूंगा.” “क्यों ऐसी क्या बात हो गई, जो नौबत यहां तक आ गई?” रेखा ने पलट कर पूछा. “कई बार रात को देर तक क्रिकेट मैच चलता रहता है. उसे देखने में मुझे सोने में देर हो जाती है.”

“जैसा तुम्हें ठीक लगे. तुम ने जो सोच लिया है, वह तो कर के रहोगे,” रेखा बोली. रमन ने इस समय उस से उलझना ठीक नहीं समझा और अपना बिस्तर आशु के कमरे में शिफ्ट कर दिया.

इस घर पर रहने वाले दो लोगों ने अब अपने को अलगअलग कमरे में व्यवस्थित कर लिया था. इस की वजह से अब दोनों का एकदूसरे से सामना कम ही होता. रमन चाय नहीं पीते थे. रेखा सुबह उठ कर पहले अपने लिए चाय बनाती और आध्यात्मिक प्रवचन सुनते हुए उस का आनंद लेती और रमन बरामदे में बैठ कर मजे से अखबार पढ़ते.

सुबह मेज पर नाश्ता करने के लिए दोनों साथ बैठ कर नाश्ता करते. अब रमन ने रेखा के बनाए खाने में मीनमेख निकालना कम कर दिया था. रेखा नाश्ता करने के बाद अपने कामों में लग जाती और रमन टीवी पर व्यस्त हो जाते. दोपहर में खाने की मेज पर लंच करते हुए उन में कभी किसी बात को ले कर थोड़ीबहुत नोंकझोंक जरूर हो जाती, लेकिन अब उस में उतना तीखापन  नहीं रह गया था, जितना पहले हुआ करता था.

लंच के बाद वे फिर अपनेअपने कमरे में आ कर इतमीनान से टीवी देखते और आराम करते. कुछ ही महीने में उन दोनों को एकदूसरे से दूरी बना कर जिंदगी जीने की आदत सी पड़ गई. रेखा ज्यादा सुकून में थी. अब रमन उस की हर बात में दखलअंदाजी नहीं करते.  उन्हें अब इस बात से भी ज्यादा मतलब नहीं था कि वह अपने कमरे में बैठ कर फोन पर किस से बातें करती है? रमन को भी घर पर अपने लिए एक अलग जगह मिल गई थी जिस में वह अखबार पढ़ने, टीवी देखने और मोबाइल फोन के साथ बहुत खुश थे. पूरे सात महीने बाद आशु घर आया. उस ने देखा कि पापा ने उस का सामान ऊपर की मंजिल में दीदी के कमरे में शिफ्ट कर दिया था और खुद उस के कमरे में रह रहे थे.

यह देख कर आशु बोला, “पापा, आप ने बहुत अच्छा किया. कम से कम इसी बहाने इस घर के 2 कमरे तो आबाद रहते हैं.” “हां बेटा, मुझे भी लगा कि कमरे खाली पड़े हैं, तो क्यों न उस का सदुपयोग कर खुल कर रहा जाए?”

आशु ऊपर कमरे में जा कर सो गया. सुबह उठ कर उस ने महसूस किया कि घर में एकदम शांति थी. पहले जैसी बात होती तो सुबह उठते ही मम्मीपापा की जोरजोर की आवाजें सुनाई देतीं. आज पहली बार सुबह के समय घर पर एकदम सन्नाटा पसरा हुआ था. बचपन से ले कर हमेशा इस घर में सुबह उठते ही  मम्मीपापा की आवाज सुनाई देने लगती थी. सो कर उठते ही वे दोनों बहस पर उलझे रहते. उन्होंने कभी किसी की परवाह नहीं  की कि कोई उन के बारे में क्या सोचता है? लेकिन इस बार माहौल बिलकुल बदला हुआ था. मेज पर नाश्ता करते हुए भी मम्मीपापा एकदूसरे से उलझने के बजाय उसी से बात कर रहे थे. अब उन के लिए एकदूसरे की उपस्थिति कोई मायने नहीं रख रही थी.

आशु को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अचानक इतना बड़ा परिवर्तन कैसे आ गया? नाश्ता करने के बाद पापा कमरे में जा कर टीवी देखने लगे. मम्मी भी थोड़ी देर उस से बात करने के बाद घर के कामों में व्यस्त हो गईं. जब उन्हें फुरसत मिली, तो वे अपनी पसंद का धारावाहिक देखने लगीं.

दोपहर में खाने पर वे तीनों साथ बैठे थे. आशु बोला, “मम्मी, अब घर कितना सूना लगता है.””हां बेटे, घर पर रौनक तो बच्चों से रहती है. तुम दोनों अब बाहर चले गए हो, तो घर भी सूना हो गया.” आशु के जी में आया कि कह दे, ‘मम्मी रौनक तो आप दोनों की बहस से रहती थी. अब आप लोग शांत हो गए हैं, तो घर की रौनक ही चली गई.’

असली बात मन में दबा कर वह बोला, “मैं और दीदी तो वैसे भी पढ़ाई में लगे रहते थे. हमें इतना सब बोलने की फुरसत कहां थी?” इस बार घर आ कर आशु ने महसूस किया कि पहले आपसी मतभेदों के बावजूद मम्मीपापा के मध्य हमेशा एक आत्मीयता का रिश्ता बना रहता था. नोंकझोंक के बावजूद आत्मीयता अपनी जगह पर बनी रहती थी.  इस सन्नाटे में वह भी कहीं गुम हो  गई थी. अब दोनों को एकदूसरे से ज्यादा।मतलब न था. केवल खाना खाने और किसी से मिलने जाने के लिए दोनों साथ उठतेबैठते, वरना वे दोनों अपनी अलग जिंदगी जी रहे थे और उसी में खुश भी लग रहे थे.

आशु ने होश संभालने पर कई बार महसूस किया था कि मम्मी के मन में हमेशा इस तरह की ही जिंदगी जीने की तमन्ना थी. आज  वह उसी जिंदगी का मजा ले रही थीं, पर उन्हें इस की कीमत भी चुकानी पड़ रही थी. इन सब में वह पापा से काफी दूर होती जा रही थीं.  दोनों अपने में खोए हुए थे. एकदूसरे की भावनाओं से अब उन्हें ज्यादा मतलब न था. पहले वह साथ बैठ कर बहस करते हुए आत्मीयता की बातें भी कर लिया करते थे. भले ही उन दोनों की बातों मे छत्तीस का आंकड़ा रहता, लेकिन वे एकदूसरे का भी पूरा खयाल रखते थे. मम्मी को जरा सा कुछ हो जाता, तो पापा बड़े परेशान हो जाते. पापा की तबीयत थोड़ा भी खराब होती, तो मम्मी बड़बड़ करते हुए भी उन्हें ढेरों नसीहतें दे डालती और उन की पूरी देखभाल करती थी.

अब उन के रिश्ते की ताजगी और गरमाहट कहीं खो गई थी और उस में बहुत ठंडापन आ गया था. जीवन के इस पड़ाव में जब उन्होंने एकदूसरे के सुखदुख का सब से ज्यादा खयाल रखना था, तब वे अपनीअपनी दुनिया में ज्यादा व्यस्त हो कर एकदूसरे के प्रति उदासीन हो गए थे.

आशु को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था. उस ने यह बात रोमा को भी बताई. दोनों ने इस बारे में विचार किया. बहुत सोचसमझ कर वह बोला, “मम्मी, मैं चाहता हूं कि आप दोनों कुछ दिन के लिए हमारे साथ रहें.”

“लेकिन बेटा, यहां घर छोड़ कर जाना भी तो ठीक नहीं है.””घर कौन से कोई उठा कर ले जाएगा. थोड़ा सामान है उस की देखभाल के लिए बगल में शर्मा आंटी से कह देंगे. वे कभीकभी घर खोल कर देख लेंगी. बाकी यहां ऐसा है भी क्या ?”

“अपना घर तो अपना होता है बेटे.””आप की बात सही है मम्मी. मेरा घर भी तो आप का ही घर है. बच्चे भी आप को मिस कर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि कुछ समय के लिए मेरे साथ चलें. मैं आप को ले जाने आया हूं.”

“यह बात तुम पहले बता देते, तो अच्छा रहता बेटे.””मैं आप को सरप्राइज देना चाहता था.”रेखा और रमन बेटे की बात को न टाल सके. उस ने एक हफ्ते की छुट्टी और बढ़ा ली और उस के बाद घर को ताला डाल कर आशु मम्मीपापा को ले कर बैंगलुरू आ गया. वहां  उस के पास 3 बैडरूम वाला फ्लैट था. एक कमरे में वह और उस की पत्नी रीमा, तो दूसरे में बच्चे ऊधम मचाते. आशु ने तीसरे बैडरूम में मम्मीपापा की व्यवस्था कर दी थी.

महीनों से खुले घर में स्वछंद रहने की आदत के बाद रेखा और रमन को यह कमरा बहुत छोटा लगा. पर यहां मजबूरी थी. वे बेटे से कुछ कह भी नहीं सकते थे. वे  अपने को इस कमरे में  किसी तरह एडजस्ट कर रहे थे. आशु ने  पूछा, “मम्मी कोई तकलीफ तो नहीं है?”

” नहीं बेटा. अपनों के बीच में कैसी तकलीफ? बच्चों के साथ बहुत अच्छा लग रहा है.””उन्हें भी आप का साथ बहुत अच्छा लगता है मम्मी.””बेटा, एक बात कहनी थी.””कहो ना पापा, यहां कोई परेशानी है?””मैं चाहता था कि एक टीवी इस कमरे में भी लगा देते. समय काटना आसान हो जाता.”

“पापा, यहां पर समय काटने की दिक्कत कहां है? बच्चे हैं, मैं और रीमा हैं और साथ में मम्मी. इतने लोगों के साथ कमरे में टीवी की जरूरत क्या है? बैठक में लगा तो है. आप जब मरजी हो, वहां पर बैठ कर टीवी देख सकते हैं.”

“वहां पर बच्चे अपने पसंद के कार्टून देखते रहते हैं.” “तो क्या हुआ? दिनभर आप टीवी देख लेना. शाम को बच्चे अपनी पसंद के प्रोगाम देख लेंगे. हम भी तो बचपन में ऐसा ही किया करते थे. क्यों मम्मी?”आशु बोला.

“तुम ठीक कहते हो बेटा. उस के बाद रमन ने आगे कुछ नहीं कहा. यही परेशानी रेखा को भी हो रही थी. वह रात को अपने पसंद के धारावाहिक बहुत मिस करती, लेकिन कुछ कह नहीं पा रही थी.

समय काटने के लिए शाम होते ही वे दोनों थोड़ी देर नीचे टहलने चले जाते और उस के बाद खाना खा कर रात को अपने कमरे में आ जाते. शुरुआत में दोनों को एक ही बैड पर एकदूसरे से काफी परेशानी हो रही थी. कभी रमन के खर्राटे तो कभी पेट की गैस रेखा को  परेशान कर रहे थे, लेकिन मजबूरी थी यहां पर इतनी जगह नहीं थी कि वह कहीं और जा कर सो पाती. यह बात वह बहू को भी नहीं कह सकती थी.

शाम के समय रमन को टीवी के बिना समय काटना मुश्किल हो रहा था. मजबूरन अब वे एकदूसरे से बातें कर के अपना समय गुजारने की कोशिश करने लगे. वर्षों की चिकचिक और आपसी बहस कुछ महीनों पहले लगभग खत्म हो गई थी. बेटेबहू के सामने वह फिर से उसी राह पर नहीं जा सकते थे. अब वे नए सिरे से शुरुआत कर एकदूसरे से अच्छी तरह बात करने की कोशिश कर रहे थे. बेटे के घर पर  लड़ने के लिए कोई मुद्दा भी न था.

रमन यहां बहू के बनाए खाने में कोई कमी भी नहीं निकाल सकते थे. बेटे के घर पर रहते हुए उन्हें काम की भी कोई परेशानी नहीं थी. आशु और रीमा उन्हें यहां कुछ काम न करने देते. बस यहां परेशानी एक ही बात की थी, वह थी समय काटने की. बच्चे दिन में थोड़ी देर उन के साथ बातें करते और खेलते. उस के बाद वे अपना होमवर्क निबटाते. आशु शाम को थकाहारा घर लौटता. थोड़ी देर मम्मीपापा के साथ बात कर के फिर वह अपने बीवीबच्चों के साथ अपना वक्त गुजारता.

रेखा और रमन को यहां आए हुए एक महीना हो गया था. उन्हें अपने पुराने घर की याद सताने लगी थी. एक दिन रमन ने दबी जबान में यह बात आशु से कह भी दी, “बेटा, हमें यहां आए बहुत समय हो गया है.” “कहां पापा… अभी एक महीना ही तो हुआ है.” “बेटा, एक महीने का समय कम नहीं होता भला.”

“जानता हूं पापा, पर इतना ज्यादा भी नहीं होता कि आप यहां हमारे साथ न रह सकें.” अब आगे बोलने की कोई गुंजाइश न थी. मजबूरन रमन और रेखा को यहां पर एक महीना और रहना पड़ा. इतने समय में रमन और रेखा आपसी मनमुटाव भुला कर एकसाथ एक कमरे में रहने के अभ्यस्त हो गए.

वे शाम को एकसाथ टहलते और साथ बैठ कर अपनी सुखदुख की बातें किया करते. यह देख कर आशु को बहुत अच्छा लगता. खाना खाने के बाद भी वे आपस में देर तक बतियाते रहते.

2 महीने बाद आशु उन्हें छोड़ने खुद घर आया. इतने समय बाद बच्चों और बेटेबहू से दूर जाना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था. आशु के पास ज्यादा छुट्टी नहीं थी. 2 दिन घर की साफसफाई में बीत गए थे. मम्मीपापा के साथ मिल कर उस ने सारा घर व्यवस्थित कर दिया था. जाने से पहले उस ने दोपहर में उन के लिए टीवी भी चालू करवा दिए थे. उन से विदा लेते समय उसे बहुत बुरा लग रहा था. आशु के परिवार के साथ 2 महीने बिताने के बाद अब रमन और रेखा को यहां अकेले रहने का अवसर मिल रहा था.

आशु की रात की ट्रेन थी. वह घर से खाना खा कर निकला था. आशु के जाते ही रमन अपने कमरे में आ गए और रेखा अपने. इतने समय बाद उन्होंने अपनेअपने कमरे में टीवी चलाए. आज अकेले टीवी देखने में रमन का मन नहीं लगा. जरा देर बाद टीवी बंद कर के वे रेखा के कमरे में आ गए और बोले, “आज बच्चों के बगैर बड़ा खराब लग रहा है.”

“तुम ठीक कह रहे हो. इस उम्र में परिवार का साथ बहुत जरूरी होता है. अब हमें उन के साथ ही रहना चाहिए.””तुम्हारी बात सही है, लेकिन जब तक हाथपैर चल रहे हैं, तब तक हमें उन के ऊपर पूरी तरह आश्रित नहीं होना चाहिए. उन्हें भी जिंदगी अपने ढंग से जीने का मौका देना चाहिए,” रमन बोले.

वे दोनों साथ बैठ कर आपस में बातें करने लगे, तो टीवी देखने का खयाल ही दिमाग से उतर गया. रेखा बोली, “घड़ी देखो, 10 बजने वाले हैं. अब हमें सो जाना चाहिए.”रमन उठ कर दूसरे कमरे में आ गए. थोड़ी देर में वे वापस रेखा के कमरे में आ गए.

” क्या हुआ?””अकेले कमरे में अच्छा नहीं लगा. क्या मैं भी यहीं सो जाऊं?””कैसी बातें करते हो? यह घर तुम्हारा है. इस में पूछने की क्या जरूरत है ?” रेखा बोली, तो रमन खुश हो गए और वहीं लेट गए. कुछ ही देर में उन के खर्राटे गूंजने लगे. अब रेखा को उन के खर्राटे जरा भी नहीं अखर रहे थे.

बैंगलुरू वापस आ कर आशु भी आश्वस्त हो गया था. उस ने मम्मीपापा के बीच खड़ी हो रही खामोशी की दीवार को तुरंत गिरा दिया. रेखा और रमन को अब एकदूसरे से कोई शिकायत न थी. इस उम्र में एकदूसरे से नजदीकियां उन्हें नई ऊर्जा दे रही थी.

प्यार पर पूर्णविराम: जब लौटा पूर्णिमा का अतीत

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पायरिया की वजह से मेरा एक दांत निकल गया, क्या मुझे नया दांत लगाना चाहिए?

सवाल

मेरी उम्र 70 साल है. पायरिया की वजह से मेरा एक दांत हिलने लगा और बाद में निकल गया. अब मुझे खाना खाने में परेशानी होती है. क्या नया दांत लगाया जा सकता है?

जवाब 

जी हांनया दांत 2 प्रकार से प्रतिस्थापित किया जा सकता है- रिमूवेबल पार्शियल डेंचर या फिक्स्ड प्रौस्थीसिस रिमूवेबल डैंचर प्लेट के साथ होता है जो अंदर की ओर से कवर करती है. इसे हर खाने के बाद निकाल कर साफ कर पहनना होता है व रात को उतार कर सोते हैं. फिक्स दांत ब्रिज या इंप्लांट की मदद से लगा सकते हैं. ब्रिज में 2 या अधिक स्वस्थ दांतों का सहारा ले कर एक प्रोस्थेटिक पुल प्रत्यारोपित करते हैं. डैंटल इंप्लांट एक कृत्रिम रूट है जिस की मदद से फिक्स दांत लगा सकते हैं.

Welcome 2023: नए साल का वेलकम करें इन 12 देसी लुक के साथ

नये साल में हर कोई भीड़ से अलग अपने अंदाज में सजना पसंद करता है. नए साल के जश्न को मनाने के लिए वेस्टर्न आउटफिट पहनना जरुरी नहीं. असल में कुछ लोगों को लगता है कि इंडियन आउटफिट उन्हें बोरिंग और देसी टाइप फील कराती है, लेकिन अगर आपने इंडियन आउटफिट को अच्छी तरह से कैरी किया है, तो सबकी नजर आपके परिधान से हटाना मुश्किल है. इस बारें में अविश्य डौट कौम के हैंडलूम एक्सपर्ट जवाहर सिंह बताते है कि वो दिन गए जब साड़ी को इंडियन ट्रेडिशनल ड्रेस में गिना जाता था. समय के साथ-साथ उसके पहनने के तरीके, स्टाइल,रंग और उसके मेकिंग में डिजाइनरों ने काफी परिवर्तन किया है. साड़ी को कई अलग अंदाज में भी पहना जा सकता है, यह आपको देसी दिवा का लुक दे सकती है.

 1. घाघरा के साथ लेयर

घाघरा के ऊपर साड़ी की एक लेयर बनाकर पहनने से ये फैंसी फ्यूजन साड़ी लुक नए साल के लिए बहुत ही आकर्षक लगती है. इसके लिए आप सिर्फ एक घाघरा ट्रंक से निकाले या खरीद लें. साड़ी को पल्लू के रूप में कमर के चारों तरफ से घुमाकर एडजस्ट करें और पिन से सेट कर लें.

2. इंडो वेस्टर्न धोती पेंट स्टाइल

इसे बोहेमियन ट्विस्ट के साथ अलग लुक दिया जा सकता है. इस स्टाइल को कैरी करना बहुत आसान होता है, इसके लिए मौडर्न लुक की एक साड़ी, धोती पैंट और एक क्रौप टाप की जरुरत होती है, साड़ी को धोती पैंट के इर्द-गिर्द घुमाकर सेंटर में लायें और प्लीट्स बनाकर अच्छी तरह से खोस लें, अधिक आकर्षक बनांने के लिए एक पतली बेल्ट कमर के चारों ओर बाँध लें.

3. पहने स्ट्रक्चर्ड ड्रेस

अगर आप पूरी तरह से एथनिक वियर नहीं पहनना चाहते है तो निराश होने की कोई जरुरत नहीं, बाजार में कुछ ऐसे बने बनाये डिजाइनर ड्रेस मिल जाते है जिसे आप आसानी से पहन सकती है. इसे अलग लुक देने के लिए फिटेड पैंट्स और हाफ साड़ी का सहारा ले सकती है, इसके अलावा मेटेलिक बेल्ट की सहायता से इसे एक्स्ट्रा स्टाइलिस्ट बना सकती है.

4. क्रौप टाप स्टाइल अपनाए

क्रौप टाप आजकल बहुत प्रसिद्ध है,साड़ी के साथ हैवी ब्लाउज पहनने का रिवाज अब कम हो चुका है,ऐसे में क्रौप टाप ट्विस्ट के साथ साड़ी पहनने से ड्रेस का लुक पूरी तरह से बदल जाता है, ब्लैक कलर की क्रौप टाप हर साड़ी के साथ अलग-अलग ढंग से पहना जा सकता है, इसके साथ कम से कम एक्सेसरीज का उपयोग करें.

5. दे अलग अंदाज नेहरु जैकेट के साथ

नेहरु जैकेट हर तरह के परिधान के साथ जैसे कि वेस्टर्न हो या इंडियन हर किसी के साथ नया लुक देती है. इसे साड़ी पहनने के बाद में या पहले किसी भी तरह से पहन सकती है, जाड़े के मौसम में इस स्टाइल को अपनाना अधिक उपयोगी होता है, अगर आप नेहरु जैकेट नहीं पहनना चाहती हैं तो कौलर वाले किसी शर्ट को भी पहनकर एक अलग लुक दे सकती है.

6. स्किनी जीन्स साड़ी ड्रेप

अगर आप कुछ अलग तरह की करना चाहती है तो अपने स्किनी जींस के साथ कंट्रास्ट साड़ी ले और जींस के उपर ड्रैप करें.

7. बेल्ट स्टाइल

नार्मल तरीके से साड़ी पहनने के बाद इसके उपर कमरबंद या बेल्ट का प्रयोग कर नया लुक दें.

8. नैक ड्रैप स्टाइल

इसके लिए साड़ी के पल्लू को गर्दन के चारो तरफ स्कार्फ के रूप में लपेट लें,ऐसी परिधान सर्दी के मौसम में काफी लाभदायक होता है, इस स्टाइल के लिए पल्लू को थोडा लम्बा रखना पड़ता है,इसके अलावा इस स्टाइल में स्कार्फ का भी प्रयोग किया जा सकता है.

9. मुमताज स्टाइल

ये स्टाइल रेट्रो जमाने का है,जिसमें अभिनेत्री मुमताज की फिल्म ‘राम और श्याम’ की साड़ी स्टाइल को कौपी किया जाता है,इसमें साड़ी के कई लेयर्स बनाकर अलग लुक दिया जाता है,ये देखने में आकर्षक होने के साथ-साथ ग्लैमरस भी होती है.

10. फ्रंट पल्लू स्टाइल

इसमें पल्लू को लेफ्ट में लेने के बजाय पीछे से लेकर राईट कंधे पर लिया जाता है.

11. मरमेड स्टाइल

इसमें लोअर पार्ट में प्लीट्स अधिक दिया जाता है, जिसका लुक मरमेड की पूंछ की तरह होता है,इसे पहनना कठिन है,पर अधिक टक्स और प्लीट्स के द्वारा इसे पहना जा सकता है.

12. पैंट स्टाइल

ये आसान,आरामदायक और अधिक फैशनेबल पहनावा नए साल के लिए अधिक उपयुक्त होता है,इसे कोई भी आसानी से कैरी कर सकता है.

Welcome 2023: नए साल पर लें नए संकल्प, जो समाज को भी कुछ दे सकें

नए साल का मतलब केवल पार्टी, धूमधड़ाका और कैलेंडर बदलना भर नहीं होता. नए साल से नई शुरुआत होती है. जीवन समय की गणना नए साल से होती है. नए साल में ही जन्मदिन आता है. नए साल के अवसर पर पार्टी, धूमधड़ाका और शुभकामनाओं की शुरुआत के साथ हम कुछ न कुछ ऐसा संकल्प लें जो केवल हमारे भविष्य के लिए ही अच्छा न हो, बल्कि हम समाज को कुछ अलग दे भी सकें.

देश में युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है. दुनियाभर की बात करें तो सब से अधिक युवा हमारे देश में हैं. यह संख्या लगातार बढ़ रही है. युवा देश की सब से बड़ी ताकत हैं. इस के बाद भी युवाओं की ऊर्जा का सही प्रयोग नहीं किया जा रहा है. ऐसे में जरूरी है कि युवाओं को खुद अपना रास्ता तय करना चाहिए. नए संकल्प से युवा एक बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं.

आज के दौर में युवाओं के लिए नौकरियों के अवसर बदल रहे हैं. केवल पढ़ाई कर के सरकारी नौकरी के बल पर आगे बढ़ने का साधन सीमित रह गया है. युवाओं की मुख्य परेशानी यह है कि वे खुद को काबिल नहीं बनाना चाहते. वे जल्दी से जल्दी नौकरी हासिल कर के अपने सुखद भविष्य का सपना देखते रहते हैं.

हाल के कुछ सालों को देखें तो युवाओं में नौकरियों के लिए चाहत बढ़ रही है. इस कारण ही वे आरक्षण का विरोध, नौकरियों के लिए धरनाप्रदर्शन, सबकुछ करने को तैयार रहते हैं. नौकरियों की चाहत के चलते युवाओं को तरहतरह के शोषण का शिकार होना पड़ता है. ऐसे में अगर युवा अपने कैरियर की दिशा पहले से ही तय कर लें तो बेहतर रहता है. नए साल के संकल्प ऐसे में बहुत काम के होंगे.

  1. कैरियर से समाज का भला करना

निफ्ट यानी नैशनल इंस्टिट्यूट औफ फैशन टैक्नोलौजी से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही आशा दीक्षित कहती हैं कि आज के समय में फैशन डिजाइनिंग की डिमांड बहुत बढ़ रही है. नौकरियों से अलग लोग अपने ब्रैंड शुरू कर रहे हैं. इस के जरिए युवा अपने कैरियर को जल्द ही एक पहचान दिला पा रहे हैं. हम केवल खुद का नाम ही नहीं रोशन कर रहे, तमाम लोगों को नौकरियां भी दे रहे हैं. नए फैशन ब्रैंड का ही प्रभाव है कि आज के समय में बड़ेबड़े फैशन ब्रैंड तक बजट के अंदर अपने डिजाइन सैल करने को मजबूर हो रहे हैं. पहले यही डिजाइनर केवल बड़े फिल्मस्टार और बिजनैस सैलिब्रिटी के लिए ही कपड़े डिजाइन करते थे. तब इन की कीमत भी बहुत होती थी. युवा डिजाइनरों के आने से आज यह बदलाव हुआ है कि कम बजट में भी लोग डिजाइनर वियर पहन रहे हैं. एक डिजाइनर के रूप में उन का संकल्प है कि वे छोटेबड़े हर बजट के डिजाइन तैयार करें.

आशा दीक्षित आगे कहती हैं, ‘‘आज के युवा पहले से अधिक सामाजिक होते जा रहे हैं. वे अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को भी समझ रहे हैं. पढ़ाई के साथ उन का प्रयास होता है कि वे दूसरे बच्चों को भी शिक्षा दे सकें. मैं भी ऐसे लोगों को खासकर अपनी उम्र के लड़केलड़कियों को फैशन का मतलब समझाना चाहती हूं जिस से कि वे भी नए दौर के साथ खुद को अपडेट रख सकें. शिक्षा के जरिए ही युवाओं को अपडेट रखना चाहती हूं.

‘‘मेरा प्रयास यह होगा कि मैं अपनी पहचान से अपने परिवार को गर्व करने लायक कुछ दे सकूं. मेरे परिवार में लड़कालड़की का कोई भेदभाव नहीं है. यही मैं हर घर में होते देखना चाहती हूं. बच्चे पेरैंट्स के साथ अपने ग्रैंड पेरैंट्स को भी महत्त्व दें, उन के साथ सामंजस्य बना कर रखें, यह संकल्प नए साल में हमें लेना है. इस से बच्चों को ग्रैंड पेरैंट्स के अनुभवों का लाभ मिल सकता है. ग्रैंड पेरैंट्स को भी खालीपन नहीं लगेगा. उन के अनुभव और युवाओं की सोच नई राह दिखा सकते हैं.’’

2. लोगों को जागरूक करना

मौडलिंग के क्षेत्र में अपना कैरियर संवार रही संजना मिश्रा कहती हैं, ‘‘मौडलिंग और ऐक्ंिटग के क्षेत्र में कदम रखने से पहले मैं ने यह सोच लिया कि मुझे क्या करना है और क्या नहीं? यह मैं ने अपने बायोडाटा पर साफ लिख भी दिया है. आमतौर पर इस फील्ड में आने वाली लड़कियों में इस बात को ले कर कंफ्यूजन रहता है कि वे क्या करें और क्या न करें? इस का लाभ दूसरे लोग उठा कर बरगलाते हैं.’’ संजना साल 2015 में मिस यूपी रनरअप, मिस मौडल 2016 विनर रही हैं. ब्यूटीफुल स्माइल और ‘चार्मिंग फेस’ जैसे अवार्ड भी हासिल किए. इस के बाद प्रिंट शूट और रैंप शो भी किए. कई कार्यक्रमों में ऐंकर की भूमिका निभा चुकी संजना अपने नए साल के संकल्प को ले कर कहती है कि उन्हें अपने काम पर फोकस करना है जिस गति से उन्होंने अपने काम को आगे बढ़ाया है उसे और आगे ले जाना है.

संजना कहती हैं, ‘‘मैं अपने क्षेत्र में काम करने वाली लड़कियों को जागरूक करना चाहती हूं ताकि वे पूरी तैयारी के साथ यहां आएं. फैशन की दुनिया में खराबी नहीं है. यहां आने वाले को तय करना होता है कि वह अपनी मेहनत से आगे बढ़ना चाहता है या शौर्टकट रास्ते से. शौर्टकट रास्ते में शुरुआती सफलता दिखती है पर यह चमक चार दिन की होती है. कई बार इस में उलझ कर लोग सबकुछ खत्म कर बैठते हैं. ऐसे में अपनी मेहनत से आगे बढ़ें, यही सब से मजबूत रास्ता होता है.

‘‘आज के समय में फैशन का क्षेत्र बहुत बढ़ा हुआ है. फिल्मों में वैब सीरीज का चलन बढ़ा है. टीवी में ऐक्ंिटग की जरूरतें बढ़ी हैं. रैंप शो और डिजाइनर शूट बढ़ गए हैं. ऐसे में, यह कैरियर पहचान और पैसा दोनों दिलाने में सक्षम है.’’

3. अलग पहचान बनाने का संकल्प

फैशन के क्षेत्र में ही कैरियर बना चुकी साक्षी शिवानंद कहती हैं, ‘‘मैं पढ़ाई और ऐक्टिंग एकसाथ करना चाहती हूं. मेरा फोकस फैशन शो के अलावा ऐक्ंिटग पर है. मेरा संकल्प है कि मैं अपने कैरियर में ऐक्टिंग को आगे बढ़ाऊं. छोटे शहरों में फैशन फील्ड को ले कर रूढि़वादी सोच हावी रहती है. हमें इस से बाहर निकलना है. तभी हम कुछ नया सोच सकते हैं. छोटे शहरों की लड़कियां भी किसी से पीछे नहीं हैं, यह साबित करने का संकल्प इस साल लेना है. मैं छोटे शहरों की लड़कियों को मैसेज देना चाहती हूं कि जब वे फैशन के फील्ड में आएं तो सारे हालात को समझ कर आएं. जिस से उन के सामने असहज हालात न बनें. लड़कियों के साथ उन के पेरैंट्स को भी यह समझ लेना चाहिए. अगर पेरैंट्स समझ लेंगे तो वे अपने बच्चों के सही फैसलों में साथ खड़े होंगे और गलत फैसलों में उन को राह दिखाएंगे.’’

अंशिका वर्मा शेफ बनना चाहती हैं. वे कहती हैं, ‘‘मेरा संकल्प है कि इस साल हर माह में एक नई डिश पर काम करूं और उस को नए रूप में सामने लाऊं. आज के समय में लड़कियों के सामने कई अवसर मौजूद हैं. वे खुद की पहचान बना सकती हैं. पेरैंट्स भी आजकल जागरूक हैं. वे बच्चों की उम्मीदों  का खयाल रखते हुए उन को सहयोग करते हैं. ऐसे में बच्चों की भी जिम्मेदारी है कि  वे पेरैंट्स की उम्मीदों को तोड़ें नहीं. किसी भी क्षेत्र में सफल होने के लिए मेहनत के साथ नए इनोवेशन की जरूरत होती है. ऐसे में युवाओं का ज्ञान बढ़ाना चाहिए. आज के समय में युवाओं में सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ गया है. सोशल मीडिया का अपना एक दायरा है. यह सूचना क्रांति का दौर है. सोशल मीडिया का प्रयोग सूचनाओं के आदानप्रदान तक ठीक है. नए प्रयोगों, जानकारियों और विचारों के लिए पढ़ना व समझना जरूरी होता है, तभी आगे बढ़ा जा सकता है.’’

अंशिका आगे कहती है, ‘‘नए साल में हमारा संकल्प है कि हम अपने विचारों के आदानप्रदान के लिए पढ़ना शुरू करें. किसी भी विषय में बिना तर्क के उस का अनुसरण नहीं करना चाहिए. सोशल मीडिया तर्क से बचता है और अफवाहों को फैलाता है, ऐसे में अपने तर्कसंगत विचारों के साथ किसी घटना को हम समझेंगे तो अफवाहों के दौर से बाहर निकल सकेंगे.’’

यह सच है कि आज हर कोई युवाओं को केवल सोशल मीडिया के प्रचार से भरमाना चाहता है. ऐसे में जरूरी है कि युवा अफवाहों से बचें और तर्कसंगत विचारों के साथ आगे बढ़ें.

Welcome 2023: नए साल में मंडे ब्लूज से बचने के लिए अपनाएं ये 7 मेकअप रूल्स

रविवार के बाद आने वाला सोमवार अपने साथ सुस्ती, अरुचि, नीरसता जैसे कितने ही भाव ले कर आता है. इस का असर चेहरे पर साफ नजर आता है. नतीजतन खिला और निखरा चेहरा भी डल और मुरझाया दिखता है.

मंडे ब्लूज के इस इफैक्ट को कम करने के लिए आजमाइए मेकअप के न्यू रूल्स ताकि मंडे को भी आप का चेहरा तरोताजा नजर आए और आप न्यू मेकअप लुक के साथ औफिस जाने के लिए बेताब हो जाएं.

  1. आईकैची आईलाइनर

फुल मेकअप करने के बजाय आईलाइनर पर फोकस करें. इस के लिए जैट ब्लैक, डार्क ब्राउन या रौयल ब्लू शेड का आईलाइनर चुनें. अब आउटफिट से मेल खाता (ब्लैक, ब्राउन, ब्लू में से कोई एक) आईलाइनर आंखों की सिर्फ ऊपरी आईलिड पर थोड़ा चौड़ा लगाएं ताकि यह उभर कर नजर आए.

इसे और भी आकर्षक बनाने के लिए आईलाइनर के पिछले छोर को ऊपर की तरफ ले जा कर छोड़ दें. इसी तरह फिश स्टाइल आईलाइनर से भी आंखों को अट्रैक्टिव इफैक्ट दे सकती हैं. इस के लिए आंखों की ऊपरी आईलिड पर थिक आईलाइनर लगाएं और इन के छोर को ऊपर की तरफ ले जाएं.

अब निचली आई लिड के ठीक बीच से आईलाइनर लगाना शुरू करें और इसे छोर पर ले जा कर नीचे की तरफ मोड़ दें. इस आई मेकअप के साथ आईशैडो, मसकारा और डार्क लिपस्टिक लगाने से बचें वरना लुक गौडी नजर आ सकता है.

2. आईकैंडी आईशैडो

आईलाइनर के बजाय आईशैडो का इफैक्ट भी मंडे ब्लूज की डलनैस को कम कर सकता है, लेकिन तब जब आप सही आईशैडो के शेड के साथ उसे अप्लाई करने का भी सही तरीका अपनाएंगी. आईशैडो के लिए शैंपेन, ब्रौंज या व्हाइट शेड का चुनाव करें. इन दिनों ये तीनों ही शेड्स फैशन में हैं.

आईकैंडी लुक के लिए शैंपेन शेड का आईशैडो पलकों पर अप्लाई करें. अगर व्हाइट कलर का आईशैडो यूज करना चाहती हैं तो पूरी पलकों पर आईशैडो लगाने के बजाय ब्रश की सहायता से सिर्फ आंखों के दोनों पिछले छोरों पर लगाएं.

इस से आप की आंखों को व्हाइट इफैक्ट मिलेगा. इसी तरह ब्रौंज शेड आईशैडो को भी सिर्फ आंखों की पिछले छोरों पर ऊपर की तरह कोना निकालते हुए लगाएं. इस से आप की आंखें और भी आकर्षक नजर आएंगी. इस के बाद आईलाइनर, मसकारा या बोल्ड लिपस्टिक न लगाएं वरना लुक बिगड़ सकता है.

3. मसकारा मैजिक

अगर आप मिनिमल आई मेकअप करना चाहती हैं, तो आईशैडो और आईलाइनर के बजाय आई मेकअप के लिए सिर्फ मसकारे का इस्तेमाल करें. जी हां, आकर्षक लुक के लिए मसकारा भी काफी है. इस के लिए ब्लैक, ब्राउन, ब्लू या फिर ट्रांसपैरेंट शेड का मसकारा खरीद सकती हैं. आंखों के ऊपरी आईलैशेज पर मसकारा लगाते वक्त उन्हें ऊपर की तरफ कर्ल करें और निचली आईलैशेज पर मसकारा लगा कर नीचे की तरफ कर्ल करें.

इससे आप की पलकें घनी और आंखें आकर्षक नजर आएंगी. अगर आप की नैचुरल आईलैशेज की ग्रोथ बहुत कम है, तो आर्टिफिशियल आईलैशेज लगा कर भी मसकारा लगा सकती हैं. इस से लोगों की निगाहें आप की आंखों पर टिकी रहेंगी. मसकारे के साथ न्यूड शेड की लिपस्टिक आप को आकर्षक लुक देगी.

4. बोल्ड लिप कलर

आप चाहें तो आई मेकअप के बजाय लिप मेकअप को भी हाईलाइट कर सकती हैं. बोल्ड लुक के लिए ब्राइट शेड की लिपस्टिक चुनें जैसे ब्राइट औरेंज, ब्राइट पिंक, हौट रैड, मजैंटा आदि. ये शेड्स काफी अट्रैक्टिव नजर आते हैं.

परफैक्ट लिप मेकअप के लिए पहले होंठों पर मौइश्चराइजर लगाएं, फिर लिपलाइनर से आउटलाइन दें और फिर लिपस्टिक लगा लें. ग्लौसी के बजाय मैट टैक्स्चर वाली लिपस्टिक खरीदें. यह काफी स्टाइलिश नजर आती है.

यह जरूरी नहीं कि आप सिर्फ डार्क ऐंड बोल्ड शेड की लिपस्टिक लगा कर ही अपने लिप्स को हाईलाइट करें. लिपस्टिक के न्यूड शेड भी आप को सैक्सी लुक दे सकते हैं. इन्हें भी जरूर ट्राई करें.

5. लिक्विड फाउंडेशन

वीकैंड की थकावट के बाद त्वचा रूखी और मुरझाई सी नजर आती है. ऐसे में बेस मेकअप के लिए त्वचा पर पाउडर फाउंडेशन लगाने की भूल न करें वरना इस से आप का चेहरा और भी रूखा और पैची नजर आ सकता है.

फ्रैश लुक के लिए लिक्विड फाउंडेशन का चुनाव करें. यह चेहरे पर बहुत जल्दी और अच्छी तरह सैट हो जाता है और लंबे समय तक टिका भी रहता है.

6. ब्यूटीफुल ब्लशर

अगर आप आई और लिप मेकअप दोनों नहीं कर रही हैं, तो चीक मेकअप से भी आकर्षक लुक पा सकती हैं. चीक मेकअप को हाईलाइट करने के लिए पीच, पिंक, रोज, कोरल शेड का ब्लश औन खरीदें. लेकिन पाउडर के बजाय क्रीम बेस्ड ब्लशर लगाएं.

इस का इफैक्ट काफी फ्रैश नजर आता है, जबकि पाउडर ब्लशर से त्वचा रूखी नजर आती है. लेकिन ध्यान रहे अगर आप ब्लशर लगा रही हैं, तो डार्क लिपस्टिक और हैवी आईलाइनर न लगाएं.

7. स्मार्ट आइडियाज

मंडे ब्लूज से बचने के लिए सप्ताह की शुरुआत हौट और स्टाइलिश आउटफिट से करें जैसे वी नैक टौप, मिनी स्कर्ट, स्लीवलैस कुरती, स्किनी जींस आदि.

हैवी इयररिंग्स, लौंग नैकपीस, बिग रिंग और कफ में से किसी एक ज्वैलरी को अपना स्टाइल स्टेटमैंट बनाएं और मंडे ब्लूज को बीट करें.

फौर्मल फुटवियर के बजाय मंडे को हाई हील के सैक्सी सैंडल पहनें या फिर वैजेस भी ट्राई कर सकती हैं.

कोई भी स्टाललिश हेयरस्टाइल ले कर भी आप मंडे ब्लूज को मात दे सकती हैं जैसे हाई पोनी, हाई बन आदि.

रैग्यूलर लैदर या लैपटौप बैग के बजाय स्टाइलिश और ट्रैंडी हैंड बैग कैरी करें. मंडे ब्लूज खुदबखुद छूमंतर हो जाएगा.

आउटफिट से ले कर कोईर् भी न्यू ऐक्सैसरीज मंडे को पहनें. इस से औफिस जाने के लिए आप खुद ऐक्साइटेड रहेंगी.

Welcome 2023: नए साल में ग्रैंड पेरैंट्स के साथ ग्रैंड पार्टी

नए साल का आरंभ आपसी रिश्तों को सुधारने का सब से अच्छा समय साबित हो सकता है. पुरानी पीढ़ी के पास अनुभव की कमी नहीं होती और नई पीढ़ी के पास ऊर्जा भरपूर होती है. अगर अनुभव और ऊर्जा का समावेश एक जगह पर हो जाए तो तरक्की पक्की हो जाती है. कई बार बाप और बेटे के बीच रिश्ते उतने अच्छे नहीं होते जितने दादा और पोते के बीच होते हैं. ऐसी ही दूरियां दूसरे रिश्तों में भी आ रही हैं. ऐसे में जरूरी है कि नए साल पर परिवार के साथ ग्रैंड पार्टी करें. जिस में हर पीढ़ी के लोग शामिल हों. आमतौर पर पुरानी पीढ़ी ऐसी ग्रैंड पार्टी से दूर रहती है, इसलिए उस को पार्टी में जरूर शामिल करें.

बुढ़ापे में दादा के साथ थोड़ी बात कर उन के अनुभव के विषय में जानकारी ले ली जाए तो दादा का दिल खुश हो जाएगा. बुढ़ापे का खाली समय डिप्रैशन की भावना को जन्म देता है. अगर दादा और पोते के बीच संबंध बेहतर हों, पोते के पास दादा को देने के लिए कुछ समय हो तो दादा के अंदर डिप्रैशन का जन्म ही नहीं होगा. केवल दादा और पोते की ही बात नहीं है. मां और दादी के बीच भी बेटी एक कड़ी हो सकती है. पेरैंट्स और ग्रैंड पेरैंट्स के साथ नए साल की ग्रैंड पार्टी से पीढि़यों के बीच रिश्ते सुधारने में मदद मिलती है. पूरा परिवार सालभर नई एनर्जी को महसूस करेगा.

बीकौम कर रही नेहा बताती है, ‘‘मैं अपनी मम्मी से ज्यादा अपनी दादी के करीब हूं. वे मेरी बात ज्यादा अच्छे से समझ लेती हैं. वे मेरी बात को समझ कर मां को भी मेरी बात समझा देती हैं, जिस से मुझे अपने काम के लिए मम्मी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता.’’

प्रेरणा की शादी तय हुई थी. प्रेरणा की मां के पास इतना समय नहीं था कि वे उसे कुछ अच्छे से समझा पातीं. प्रेरणा कहती है, ‘‘मेरी नानी ने मुझे ससुराल में रिश्ते निभाने के कुछ टिप्स दिए. मैं हैरान रह गई जब उन्होंने पति के साथ शारीरिक संबंधों को ले कर बहुत ही सहज तरीके से मुझे समझा दिया, इस से मेरी कई तरह की भ्रांतियां दूर हो गईं.’’

करीब होते हैं ग्रैंड पेरैंट्स

दादी के पास हर समस्या का समाधान होता है. हालांकि नई पीढ़ी की लड़कियों को लगता है कि वृद्ध दादी के पास उन की समस्या का समाधान कैसे होेसकता है. बेटियां तब आश्चर्यचकित रह जाती हैं जब दादी, मां के मुकाबले अधिक व्यावहारिक सलाह दे देती हैं. यही वजह है कि प्रचारप्रसार यानी विज्ञापनों की दुनिया में भी बेटी और दादी के रिश्तों को ले कर ज्यादा विज्ञापन बनते हैं. दादी की सलाह केवल सेहत और खानपान तक से ही जुड़ी नहीं रहती, वे रिश्तों को ले कर भी बहुत सटीक सलाह देती हैं.

असल में दादी और दादा, जिन को पुरानी पीढ़ी का मान कर दरकिनार कर दिया जाता है, वे आज भी मातापिता से ज्यादा आधुनिक सोच वाले होते हैं. दादी और दादा की पीढ़ी के पास समय अधिक होता है. उन के पास करने को ज्यादा काम नहीं होता. वे अपनी आधुनिक सोच किसी पर दिखाएं तो लोग उन का मजाक उड़ाते हैं. ऐसे में अगर बेटा या बेटी उन के पास कुछ समय गुजारते हैं तो उन्हें दोहरा लाभ होता है. एक तो वे लोग खुद में व्यस्त हो जाते हैं. उन को लगता है कि परिवार में उन की पूछ बनी हुई है. बेटा न सही, उस के बच्चे उन की सलाह तो ले रहे हैं. परिवार को यह लाभ मिलता है कि बेटे और बाप के बीच आईर् दूरी को कम करने के लिए एक सेतु मिल जाता है. ग्रैंड पेरैंट्स जब परिवार के साथ नए साल की पार्टी में शामिल होंगे तो उन का उत्साह बढ़ जाएगा. इस से परिवार के बीच सामंजस्यभरा माहौल बनेगा.

सब की रुचि का खयाल रखें

नए साल में तमाम तरह की पार्टियों का आयोजन होता है. ऐसे आयोजन को तैयार करते समय घर की पुरानी पीढ़ी को ध्यान में रखें, इस बात की जरूरत बड़े स्तर पर महसूस की जा रही है. यही वजह है कि अच्छी सोच वाले स्कूल अब ग्रैंड पेरैंट्स मीटिंग भी कराने लगे हैं, जिस में बच्चे अपने ग्रैंड पेरैंट्स के साथ आते हैं. बच्चों को अपनी कमी या समस्याएं मांबाप से साझा करने में संकोच होता है. वे ग्रैंड पेरैंट्स से बात को शेयर करने में हिचक का अनुभव नहीं करते. अगर नए साल में ग्रैंड पेरैंट्स के साथ पार्टी सैलिब्रेशन होगा तो उस की खुशियां पूरे साल घरपरिवार को नई ऊर्जा देती रहेंगी.

नए साल में सर्दी बहुत होती है, ऐसे में पार्टी का आयोजन करते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि दादादादी किस तरह से उस में हिस्सा लेंगे. उन के खाने, ड्रैस कोड से ले कर मनोरंजन तक के अलग इंतजाम करने जरूरी होंगे. पार्टी इस तरह की न हो कि दादादादी केवल कोने में बैठे नजर आएं. आप उन की रुचियों को देखते हुए आयोजन करें ताकि वे लोग भी शामिल हो सकें. पार्टी का असली मजा तभी आता है जब सभी सक्रियता से शामिल हों. परिवार के सभी लोगों का पार्टी में हिस्सा लेना संबंधों को नई ऊर्जा देता है. घरपरिवार के माहौल को बेहतर बनाने के लिए ऐसे उत्सव जरूरी हो जाते हैं.

सुधरेंगे रिश्ते, बदलेगा माहौल

आमतौर पर नए साल की पार्टी में घर के बुजुर्ग लोगों को हाशिए पर रखा जाता है. इस का प्रमुख कारण यह होता है कि नए साल की पार्टी में शराब और जुआ जैसी बुराइयों वाले आयोजन होते हैं. ऐसे में बुजुर्गों के बीच यह संभव नहीं होता. इस कारण उन को घर पर ही छोड़ दिया जाता है. जब नए साल की पार्टी में घर के बुजुर्गों को शामिल किया जाएगा तो पार्टी के आयोजन में शराब और जुआ जैसी चीजें बाहर हो जाएंगी, आपसी रिश्तों में ऊर्जा आएगी. कई बार घरपरिवार के विवाद भी ऐसे आयोजनों से खत्म हो जाते हैं. इसलिए नए साल की ग्रैंड पार्टी में ग्रैंड पेरैंट्स को जरूर शामिल करें. इस से रिश्ते सुधरेंगे और घरपरिवार का माहौल बदलेगा.

पीढि़यों में दूरी को कम करने के लिए पार्टी का अपना अहम रोल होता है. यह नए साल के जश्न से ले कर फैमिली आउटडोर डिनर कुछ भी हो सकता है. आज के समय में पुरानी पीढ़ी केवल सोच के आधार पर ही नहीं, पहनावे और फैशन के लिहाज से भी नईर् पीढ़ी का मुकाबला करने को तैयार है. पार्टियों में ऐसे लोगों को संगीत पर थिरकते देखा जा सकता है. कई बार नई पीढ़ी उन से पीछे रह जाती है. नई पीढ़ी की सोच अब बदल रही है. वह पुरानी पीढ़ी के बीच सामंजस्य बैठा कर चलती है. ऐसे में यह चलन बढ़ रहा है और यह चलन आपसी रिश्तों को मजबूत भी कर रहा है.

डाक्टर बन चुका गौरव अपनी पसंद की लड़की से शादी करना चाहता था. उस के पिता चाहते थे कि वह रिश्तेदार की लड़की से शादी करे. वे लड़की भी पसंद कर चुके थे. बाप और बेटे के बीच विचारों का टकराव था. जिस के चलते गौरव शादी ही नहीं कर रहा था. ऐसे में गौरव के दादा ने पहल की और पिता को समझाया. जिस के बाद गौरव की शादी उस की पसंद की लड़की से हो गई. केवल शादी तक ही नहीं, गौरव के दादा ने शादी के बाद भी घरपरिवार, नातेरिश्तेदारों के बीच गौरव की पत्नी की ऐसी इमेज बना दी कि सभी उस की प्रशंसा करने लगे. ग्रैंड पेरैंट्स बच्चों के लिए बहुत जरूरी होते हैं. उन के बीच की कड़ी को जोड़ने के लिए नए साल की पार्टी जैसे अवसरों का लाभ उठाना चाहिए.

केवल कलैंडर का पन्ना बदलने या घड़ी की सूई की जगह बदलने से जीवन में खुशियां नहीं आतीं. जीवन में खुशियों को भरने के लिए सोच बदलने की जरूरत है. ऐसे आयोजन इस में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ग्रैंड पेरैंट्स के पास समय अधिक होता है. उन के समय का सदुपयोग करें और जीवन में नई ऊर्जा भरें. नए साल की शुरुआत की यह ऊर्जा पूरे साल बनी रहेगी.

ताकि रिश्तों में मिठास घुले

पार्टी किसी भी तरह की हो, उस से ऊर्जा मिलती ही है. परिवार के साथ नए साल की पार्टी में पूरे परिवार के लोग शामिल होंगे तो आपस में संबंध बेहतर होंगे. आमतौर पर नए साल की पार्टी को लोग अकेले सैलिबे्रट करना चाहते हैं. ऐसे में परिवार उपेक्षित रहते हैं. जिस से कई तरह की दूरियां आपस में पैदा हो सकती हैं. जब पूरा परिवार साथ रह कर पार्टी करेगा तो संबंध बेहतर होते हैं. खासकर हम ग्रैंड पेरैंट्स को इस में शामिल कर सकते हैं. एकसाथ कई पीढि़यां इस में तालमेल के साथ हिस्सा ले सकती हैं जो पूरे परिवार के लिए लाभकारी हो सकता है.

— रीना गुप्ता, समाजसेविका

पार्टी के नाम पर लोग कई तरह की बुराइयों के शिकार हो जाते है. केवल आदमी ही नहीं, औरतें भी पार्टी में शराब और जुए का शौक पूरा करती हैं. यह जीवन के लिए बहुत अच्छा नहीं होता. परिवार के साथ पार्टी करने से ऐसी बुरी आदतों से लोग बचे रहेंगे. परिवार के साथ होने से नशे और जुए जैसी आदतों से दूर रहेंगे. एकसाथ कई परिवार मिल कर भी ऐसे आयोजन कर सकते हैं. ऐसे में उस उम्र के लोगों में आपसी बातचीत से संबंध सुधरेंगे. पार्टी में परिवार के करीबी लोगों के शामिल होने से लोगों का एकदूसरे की रुचियों को समझना आसान हो जाता है.

— विनोद, बिजनैसमैन

हैप्पी न्यू ईयर: नए साल में आखिर क्या करने जा रही थी मालिनी

दिसंबर का महीना था. किट्टी पार्टी इस बार रिया के घर थी. अपना हाऊजी का नंबर कटने पर भी किट्टी पार्टी की सब से उम्रदराज 55 वर्षीय मालिनी हमेशा की तरह नहीं चहकीं, तो बाकी 9 मैंबरों ने आंखों ही आंखों में एकदूसरे से पूछा कि आंटी को क्या हुआ है? फिर सब ने पता नहीं में अपनाअपना सिर हिला दिया. सब में सब से कम उम्र की सदस्या थी रिया. अत: उसी ने पूछा, ‘‘आंटी, आज क्या बात है? इतने नंबर कट रहे हैं आप के फिर भी आप चुप क्यों हैं?’’

फीकी हंसी हंसते हुए मालिनी ने कहा, ‘‘नहींनहीं, कोई बात नहीं है.’’

अंजलि ने आग्रह किया, ‘‘नहीं आंटी, कुछ तो है. बताओ न?’’

‘‘पवन ठीक है न?’’ मालिनी की खास सहेली अनीता ने पूछा.

‘‘हां, वह ठीक है. चलो पहले यह राउंड खत्म कर लेते हैं.’’

हाऊजी का पहला राउंड खत्म हुआ तो रिया ने पूछा, ‘‘अरे, आप लोगों का न्यू ईयर का क्या प्लान है?’’

सुमन ने कहा, ‘‘अभी तो कुछ नहीं, देखते हैं सोसायटी में कुछ होता है या नहीं.’’

नीता के पति विनोद सोसायटी की कमेटी के मैंबर थे. अत: उस ने कहा, ‘‘विनोद बता रहे थे कि इस बार कोई प्रोग्राम नहीं होगा, सब मैंबर्स की कुछ इशूज पर तनातनी चल रही है.’’ सारिका झुंझलाई, ‘‘उफ, कितना अच्छा प्रोग्राम होता था सोसायटी में… बाहर जाने का मन नहीं करता… उस दिन होटलों में बहुत वेटिंग होती है और ऊपर से बहुत महंगा भी पड़ता है. फिर जाओ भी तो बस खा कर लौट आओ. हो गया न्यू ईयर सैलिब्रेशन. बिलकुल मजा नहीं आता. सोसायटी में कोई प्रोग्राम होता है तो कितना अच्छा लगता है.’’

रिया ने फिर पूछा, ‘‘आंटी, आप का क्या प्लान है? पवन के पास जाएंगी?’’

‘‘मुश्किल है, अभी कुछ सोचा नहीं है.’’

हाऊजी के बाद सब ने 1-2 गेम्स और खेले, फिर सब खापी कर अपनेअपने घर आ गईं.मालिनी भी अपने घर आईं. कपड़े बदल कर चुपचाप बैड पर लेट गईं. सामने टंगी पति शेखर की तसवीर पर नजर पड़ी तो आंसुओं की नमी से आंखें धुंधलाती चली गईं…

शेखर को गए 7 साल हो गए हैं. हार्टअटैक में देखते ही देखते चल बसे थे. इकलौता बेटा पवन मुलुंड के इस टू बैडरूम के फ्लैट में साथ ही रहता था. उस के विवाह को तब 2 महीने ही हुए थे. जीवन तब सामान्य ढंग से चलने ही लगा था पर बहू नीतू अलग रहना चाहती थी. नीतू ने उन से कभी इस बारे में बात नहीं की थी पर पवन की बातों से मालिनी समझ गई थीं कि दोनों ही अलग रहना चाहते हैं. जबकि उन्होंने हमेशा नीतू को बेटी जैसा स्नेह दिया था. उस की गलतियों पर भी कभी टोका नहीं था. बेटी के सारे शौक नीतू को स्नेह दे कर ही पूरे करने चाहे थे.

पवन का औफिस अंधेरी में था. पवन ने कहा था, ‘‘मां, आनेजाने में थकान हो जाती है, इसलिए अंधेरी में ही एक फ्लैट खरीद कर वहां रहने की सोच रहा हूं.’’ मालिनी ने बस यही कहा था, ‘‘जैसा तुम ठीक समझो. पर यह फ्लैट किराए पर देंगे तो सारा सामान ले कर जाना पड़ेगा.’’

‘‘क्यों मां, किराए पर क्यों देंगे? आप रहेंगी न यहां.’’

यह सुन मालिनी को तेज झटका लगा, ‘‘मैं यहां? अकेली?’’

‘‘मां, वहां तो वन बैडरूम घर ही खरीदूंगा. वहां घर बहुत महंगे हैं. आप यहां खुले घर में आराम से रहना… आप की कितनी जानपहचान है यहां… वहां तो आप इस उम्र में नए माहौल में बोर हो जाएंगी और फिर हम हर हफ्ते तो मिलने आते ही रहेंगे… आप भी बीचबीच में आती रहना.’’

मालिनी ने फिर कुछ नहीं कहा था. सारे आंसू मन के अंदर समेट लिए थे. प्रत्यक्षत: सामान्य बनी रही थीं. पवन फिर 2 महीने के अंदर ही चला गया था. जाने के नाम से नीतू का उत्साह देखते ही बनता था. मालिनी आर्थिक रूप से काफी संपन्न थीं. उच्चपदस्थ अधिकारी थे शेखर. उन्होंने एक दुकान खरीद कर किराए पर दी हुई थी, जिस के किराए से और बाकी मिली धनराशि से मालिनी का काम आराम से चल जाता था. मालिनी को छोड़ बेटाबहू अंधेरी शिफ्ट हो गए थे. मालिनी ने अपने दिल को अच्छी तरह समझा लिया था. यों भी वे काफी हिम्मती, शांत स्वभाव वाली महिला थीं. इस सोसायटी में 20 सालों से रह रही थीं. अच्छीखासी जानपहचान थी, सुशिक्षित थीं, हर उम्र के लोग उन्हें पसंद करते थे. अब खाली समय में वे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी थीं. उन का अच्छा टाइम पास हो जाता था.

नीतू ने बेटे को जन्म दिया. पवन मालिनी को कुछ समय पहले ही आ कर ले गया था. नीतू के मातापिता तो विदेश में अपने बेटे के पास ही ज्यादा रहते थे. नन्हे यश की उन्होंने खूब अच्छी देखरेख की. यश 1 महीने का हुआ तो पवन उन्हें वापस छोड़ गया. यश को छोड़ कर जाते हुए उन का दिल भारी हो गया था. पर अब कुछ सालों से जो हो रहा था, उस से वे थकने लगी थीं. त्योहारों पर या किसी और मौके पर पवन उन्हें आ कर ले जाता था. वे भी खुशीखुशी चली जाती थीं. पर पवन के घर जाते ही किचन का सारा काम उन के कंधों पर डाल दोनों शौपिंग करने, अपने दोस्तों से मिलने निकल जाते. जातेजाते दोनों उन से कह चीजें बनाने की फरमाइश कर जाते. सारा सामान दिखा कर यश को भी उन के ही पास छोड़ जाते. यश को संभालते हुए सारे काम करते उन की हालत खराब हो जाती थी. काम खत्म होते ही पवन उन्हें उन के घर छोड़ जाता था. यहां भी वे अकेले ही सब करतीं. उन की वर्षों पुरानी मेड रजनी उन के दुखदर्द को समझती थी. उन की दिल से सेवा करती थी. इस दीवाली भी यही हुआ था. सारे दिन पकवान बना कर किचन में खड़ेखड़े मालिनी की हिम्मत जवाब दे गई तो नीतू ने रूखे धीमे स्वर में कहा पर उन्हें सुनाई दे गया था, ‘‘पवन, मां को आज ही छोड़ आओ. काम तो हो ही गया है. अब वहां अपने घर जा कर आराम कर लेंगी.’’

जब उन की कोख से जन्मा उन का इकलौता बेटा दीवाली की शाम उन्हें अकेले घर में छोड़ गया तो उन का मन पत्थर सा हो गया. सारे रिश्ते मोहमाया से लगने लगे… वे कब तक अपने ही बेटेबहू के हाथों मूर्ख बनती रहेंगी. अगर उन्हें मां की जरूरत नहीं है तो वे क्यों नहीं स्वीकार कर लेतीं कि उन का कोई नहीं है अब. वह तो सामने वाले फ्लैट में रहने वाली सारिका ने उन का ताला खुला देखा तो हैरान रह गई, ‘‘आंटी, आज आप यहां? पवन कहां है?’’ मालिनी बस इतना ही कह पाई, ‘‘अपने घर.’’ यह कह कर उन्होंने जैसे सारिका को देखा था, उस से सारिका को कुछ पूछने की जरूरत नहीं थी. फिर वही उन की दीवाली की तैयारी कर घर को थोड़ा संवार गई थी. बाद में थाली में खाना लगा कर ले आई थी और उन्हें जबरदस्ती खिलाया था.

उस दिन का दर्द याद कर मालिनी की आंखें आज भी भर आई हैं और आज जब वे किट्टी के लिए तैयार हो रही थीं, तो पवन का फोन आया था, ‘‘मां, इस न्यू ईयर पर मेरे बौस और कुछ कुलीग्स डिनर र घर आएंगे, आप को लेने आऊंगा.’’दीवाली के बाद पवन ने आज फोन किया था. वे बीच में जब भी फोन कर बात करना चाहती थीं, पर पवन बहुत बिजी हूं मां, बाद में करूंगा, कह कर फोन काट देता था.

नीतू तो जौब भी नहीं करती थी. तब भी महीने 2 महीने में 1 बार बहुत औपचारिक सा फोन करती थी. अचानक फोन की आवाज से ही वे वर्तमान में लौट आईं. वे हैरान हुईं, नीतू का फोन था, ‘‘मां, नमस्ते. आप कैसी हैं?’’

‘‘ठीक हूं, तुम तीनों कैसे हो?’’

‘‘सब ठीक हैं, मां. आप को पवन ने बताया होगा 31 दिसंबर को कुछ मेहमान आ रहे हैं. 15-20 लोगों की पार्टी है, मां. आप 1 दिन पहले आ जाना. बहुत सारी चीजें बनानी हैं और आप को तो पता ही है मुझे कुकिंग की उतनी जानकारी नहीं है. आप का बनाया खाना सब को पसंद आता है, आप तैयार रहना, बाद में करती हूं फोन,’’ कह कर जब नीतू ने फोन काट दिया तो मालिनी जैसे होश में आईं कि बच्चे इतने चालाक, निर्मोही क्यों हो जाते हैं और वे भी अपनी ही मां के साथ? इतनी होशियारी? कोई यह नहीं पूछता कि वे कैसी हैं? अकेले कैसी रहती हैं? बस, अपने ही प्रोग्राम, अपनी ही बातें. बहू का क्या दोष जब बेटा ही इतना आत्मकेंद्रित हो गया. मालिनी ने एक ठंडी सांस भरी कि नहीं, अब वे स्वार्थी बेटे के हाथों की कठपुतली बन नहीं जीएंगी. पिछली बार बेटे के घरगृहस्थी के कामों में उन की कमर जवाब दे गई थी. 10 दिन लग गए थे कमरदर्द ठीक होने में. अब उतना काम नहीं होता उन से.

अगली किट्टी रेखा के घर थी. न्यू ईयर के सैलिब्रेशन की बात छिड़ी, तो अंजलि ने कहा, ‘‘कुछ प्रोग्राम रखने का मन तो है पर घर तो वैसे ही दोनों बच्चों के सामान से भरा है मेरा. घर में तो पार्टी की जगह है नहीं. क्या करें, कुछ तो होना चाहिए न.’’

रेखा ने पूछा, ‘‘आंटी, आप का क्या प्रोग्राम है? पवन के साथ रहेंगी उस दिन?’’

‘‘अभी सोचा नहीं,’’ कह मालिनी सोच में डूब गईं.

उन्हें सोच में डूबा देख रेखा ने पूछा, ‘‘आंटी, आप क्या सोचने लगीं?’’

‘‘यही कि तुम सब अगर चाहो तो न्यू ईयर की पार्टी मेरे घर रख सकती हो. पूरा घर खाली ही तो रहता है… इसी बहाने मेरे घर भी रौनक हो जाएगी.’’

‘‘क्या?’’ सब चौंकी, ‘‘आप के घर?’’

‘‘हां, इस में हैरानी की क्या बात है?’’ मालिनी इस बार दिल खोल कर हंसीं.

रिया ने कहा, ‘‘वाह आंटी, क्या आइडिया दिया है पर आप तो पवन के घर…’’

मालिनी ने बीच में ही कहा, ‘‘इस बार कुछ अलग सोच रही हूं. इस बार नए साल की नई शुरुआत अपने घर से करूंगी और वह भी अच्छे सैलिब्रेशन के साथ. डिनर बाहर से और्डर कर मंगा लेंगे, तुम लोगों में से जो बाहर न जा रहा हो वह सपरिवार मेरे घर आ जाए… कुछ गेम्स खेलेंगे, डिनर करेंगे… बहुत मजा आएगा. और वैसे भी हमारा यह ग्रुप जहां भी बैठता है, मजा आ ही जाता है.’’

यह सुन कर रिया ने तो मालिनी के गले में बांहें ही डाल दीं, ‘‘वाह आंटी, क्या प्रोग्राम बनाया है. जगह की तो प्रौब्लम ही सौल्व हो गई.’’ सारिका ने कहा, ‘‘आंटी, आप किसी काम का प्रैशर मत लेना. हम सब मिल कर संभाल लेंगे और खर्चा सब शेयर करेंगे.’’

मालिनी ने कहा, ‘‘न्यू ईयर ही क्यों, तुम लोग जब कोई पार्टी रखना चाहो, मेरे घर ही रख लिया करो, तुम लोगों के साथ मुझे भी तो अच्छा लगता है.’’

‘‘मगर आंटी, पवन लेने आ गया तो?’’

‘‘नहीं, इस बार मैं यहीं रहूंगी.’’

फिर तो सब जोश में आ गईं और फिर पूरे उत्साह के साथ प्लान बनने लगा. कुछ दिनों बाद फिर सब मालिनी के घर इकट्ठा हुईं. सुमन, अनीता, मंजू और नेहा तो उस दिन बाहर जा रही थीं. नीता, सारिका, रिया, रेखा और अंजलि सपरिवार इस पार्टी में आने वाली थीं. सब के पति भी आपस में अच्छे दोस्त थे. मालिनी का सब से परिचय तो था ही… जोरशोर से प्रोग्राम बन रहा था. 30 दिसंबर को सुबह पवन का फोन आया, ‘‘मां, आज आप को लेने आऊंगा, तैयार रहना.’’

‘‘नहीं बेटा, इस बार नहीं आ पाऊंगी.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘कुछ प्रोग्राम है मेरा.’’

पवन झुंझलाया, ‘‘आप का क्या प्रोग्राम हो सकता है? अकेली तो हो?’’

‘‘नहीं, अकेली कहां हूं. कई लोगों के साथ न्यू ईयर पार्टी रखी है घर पर.’’

‘‘मां आप का दिमाग तो ठीक है? इस उम्र में पार्टी रख रही हैं? यहां कौन करेगा सब?’’

‘‘उम्र के बारे में तो मैं ने सोचा नहीं. हां, इस बार आ नहीं पाऊंगी.’’

पवन ने इस बार दूसरे सुर में बात की, ‘‘मां, आप इस मौके पर क्यों अकेली रहें? अपने बेटे के घर ज्यादा अच्छा लगेगा न?’’

‘‘अकेली तो मैं सालों से रह रही हूं बेटा, उस की तो मुझे आदत है.’’

पवन चिढ़ कर बोला, ‘‘जैसी आप की मरजी,’’ और गुस्से से फोन पटक दिया. पवन का तमतमाया चेहरा देख कर नीतू ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘मां नहीं आएंगी.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘उन्होंने अपने घर पार्टी रखी है.’’

‘‘क्या? क्यों? अब क्या होगा, मैं तो इतने लोगों का खाना नहीं बना पाऊंगी?’’

‘‘अब तो तुम्हें ही बनाना है.’’

‘‘नहीं पवन, बिलकुल नहीं बनाऊंगी.’’

‘‘मैं सब को इन्वाइट कर चुका हूं.’’

‘‘तो बाहर से मंगवा लेना.’’

‘‘नहीं, बहुत महंगा पड़ेगा.’’

‘‘नहीं, मुझ से तो नहीं होगा.’’

दोनों लड़ पड़े. जम कर बहस हुई. अंत में पवन ने सब से मां की बीमारी का बहाना कर पार्टी कैंसिल कर दी. दोनों बुरी तरह चिढ़े हुए थे. पवन ने कहा, ‘‘अगर तुम मां के साथ अच्छा संबंध रखतीं तो मुझे आज सब से झूठ न बोलना पड़ता. अगर मां को यहां अच्छा लगता तो वे आज अलग वहां अकेली क्यों खुश रहतीं?’’ नीतू ने तपाक से जवाब दिया, ‘‘मुझे क्या समझा रहे हो… तुम्हारी मां हैं, बिना मतलब के जब तुम ही उन्हें फोन नहीं करते तो मैं तो बहू हूं.’’

दोनों एकदूसरे को तानेउलाहने देते रहे. दूसरे दिन भी दोनों एकदूसरे से मुंह फुलाए रहे.

हाऊजी, गेम्स, म्यूजिक और बढि़या डिनर के साथ न्यू ईयर का जश्न तो मना, पर कहीं और.

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