Story in hindi
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मषहूर लेखक,कवि व निर्देषक गुलजार 1982 में षेक्सपिअर के नाटक ‘‘द कॉमेडी आफ एरर्स’’ पर आधारित फिल्म ‘‘अंगूर’’ लेकर आए थे.जिसमें संजीव कुमार व देवेन वर्मा की मुख्य भूमिका थी.इस फिल्म में दो जुड़वाओं की जोड़ी बचपन में बिछुड़ जाती है.युवावस्था में पहुचने पर यह जोड़ी मिलती है,तो कई तरह की उलझनें पैदा होती हैं.अब 40 साल बाद उसी अंगूर’ फिल्म के अधिकार लेकर ‘गोलमाल’ सीरीज फेम निर्देषक रोहित षेट्टी टैजिक कौमेडी फिल्म ‘‘सर्कस’’ लेकर आए हैं और उन्होने एक क्लासिक फिल्म का बंटाधार करने में कोई कसर नही छोड़ी है.
यूं तो फिल्म के ट्रेलर से ही आभास हो गया था कि फिल्म कैसी होगी? इसके अलावा जब कुछ दिन पहले हमने फिल्म के पीआरओ से पूछा था कि फिल्म के कलाकारों के इंटरव्यू कब होगे,तो उसने जवाब दिया था-‘‘अब कलाकारों का इंटरव्यू से विष्वास उठ गया है.इसलिए कोई इंटरव्यू नहीं होगे.’’ फिल्म देखकर समझ में आया कि जब निर्देषक व कलाकारों को पता था कि उन्होने बहुत घटिया फिल्म बनायी है,तो इंटरव्यू क्या देते. पर ‘सर्कस’ सफल नही होगी,इसका अहसास निर्देषक रोहित षेट्टी को था,इसीलिए कुछ दिन पहले उन्होने कहा था कि हर वर्ष सिर्फ चार फिल्में ही सफल होती हैं.’
कहानीः
फिल्म की षुरूआत में कुछ डाॅक्टरों को संबोधित करते हुए डाक्टर राय बच्चों के ख्ूान की बजाय परवरिष की बात करते हुए एक नए प्रयोग की बात करते हैं.जिससे अन्य डाक्टर सहमत नही होते.पर वह अपना प्रयोग जारी रखने की बात करते हैं.पता चलता है कि डाक्टर राॅय अपने मित्र जाॅय के साथ मिलकर ‘जमनादास अनाथालय’’ चला रहे हैं.इसी अनाथालय में चार जुड़वा बच्चे हैं,इनमें से दो एक घर से और दो दूसरे घर से हैं.जब उन्हें गोद लेने के लिए एक परिवार उटी से आता है जो कि बहुत बड़े सर्कस के मालिक हैं और दूसरा परिवार बंगलोर का उद्योगपति है.तब डॉक्टर रौय (मुरली शर्मा) अपने प्रयोग को सही साबित करने के लिए दोनों जुड़वा बच्चों की अदला बदली कर देते हैं.वह दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि एक बच्चे के लिए उसका वंश नहीं, बल्कि उसकी परवरिश जरूरी होती है.
दोनों परिवार अपने बच्चों का नाम रौय (रणवीर सिंह) और जौय (वरुण शर्मा) रखते हैं.चारों सुकुन से अपनी जिंदगी गुजार रहे होते हैं.इस बीच सर्कस के मालिक की मौत के बाद रौय व जौय अपने पिता केव्यवसाय को आगे बढ़ाते हैं.और माला (पूजा हेगड़े ) से रौय की षादी को पांच साल हो जाते हैं.उधर बंगलोर में राय बहादुर (संजय मिश्रा ) की बेटी बिंदू (जैकलीन फर्नाडिष ) से रौय प्यार कर रहे हैं और षादी करना चाहते हैं.राय बहादुर को लगता है कि उनकी बेटी बिंदू गलत युवक से षादी करना चाहती है.एक दिन उटी में एक चाय बागान को खरीदने के लिए बैंगलौर वाले रौय और जौय लाखों रूपए लेकर ऊटी आते हैं.उन्हे लूटने के लिए पाल्सन (जौनी लीवर ) के गंुडे उनके पीछे लग जाते हैं.ऊटी शहर पहुॅचते ही कन्फ्यूजन षुरू होता है. अब उटी षहर में दो रौय और दो जौय. हैं. कभी लोग एक से टकराते हैं तो कभी दूसरे से.परिणामतः उलझनें बढ़ती हैं और यह भी फंसते जाते हैं.वहीं अब डाॅक्टर रौय भी छिप्कर सारामाजरा देख रहे हैं.जब यह चारो सामने आएंगे,तब क्या होगा?
लेखन व निर्देषनः
किसी क्लासिक कृति को कैसे तहस नहस किया जाए,यह कला रोहित षेट्टी व रणवीर सिंह से बेहतर कोई नहीं बता सकता.फिल्म में कहानी का कोई अता पता नहीं,उपर से संवाद भी अति बोझिल.बतौर निर्देषक जमीन’,‘गोलमाल’,‘सूर्यवंषी’ के बाद रोहित षेट्टी की यह 15 वीं फिल्म हैं,जहां वह बुरी तरह से चूक गए हैं.इस फिल्म से साफ झलकता है कि उनका जादू खत्म हो गया.रोहित षेट्टी के कैरियर की यह सबसे ज्यादा कमजोर फिल्म है. फिल्म का नाम सर्कस है,मगर फिल्म में सर्कस ही नही है.युनूस सजावल लिखित पटकथा बेदम है.
फिल्म षुरू होने पर लगता है कि कुछ मजेदार फिल्म होगी,लेकिन पंाच मिनट बाद ही फिल्म दम तोड़ देती है.इंटरवल के बाद संजय मिश्रा,जौनी लीवर, सिद्धार्थ जाधव अपनी कौमेडी से फिल्म को संभालने का असलप्रयास करते नजर आते हैं,मगर अफसोस इन्हें पटकथा व संवादों का सहयोग नही मिलता. यह पहली बार है,जब रोहित शेट्टी फिल्म के किसी भी किरदार के साथ न्याय नहीं कर पाए.सभी किरदार काफी अधपके से लगते हैं.मुरली षर्मा का किरदार उटी में आकर क्या करता है और फिर अचानक कहंा गायब हो जाता है,किसी की समझ में नही आता.फिल्म का क्लायमेक्स तो सबसे घटिया है.रोहित षेट्टी जैसा समझदार फिल्मकार इतनी घटिया फिल्म बना सकता है,इसकी तो कल्पना भी नही की जा सकती. कहानी तीस साल आगे बढ़ जाती है,मगर डाॅक्टर रौय यानी कि मुरली षर्मा की उम्र पर असर नजर नही आता.अमूमन देख गया है कि जुड़वा बच्चों में से एक को दर्द होता है, तो दूसरे को भी होता है.पर यहां उसका उल्टा दिखाया गयाहै.
रोहित षेट्टी ने कुछ क्लासिकल गीतों के अधिकार खरीदकर फिल्म में पिरोए हैं,मगर कहानी का काल गानों से मेल ही नही खाता.यहां तक कि दीपिका पादुकोण का गाना ‘करंट लगा..’भी फिल्म को नही बचा पाता. बंटी नागी की एडीटिंग और जोमोन टी जॉन की सिनेमैटोग्राफी प्रभावित नहीं करती है.
अभिनयः
दोहरी भूमिका में रणवीर सिंह और वरूण षर्मा हैं.फिल्म देखकर लगता है कि दोनो अभिनय की एबीसीडी भूल चुके हैं.जैकलीन ने यह फिल्म क्यों की,यह बात समझ ेसे परे हैं.पूजा हेगड़े के अभिनय मंे ंभी दम नजर नहीं आता.मुरली षर्मा को मैने छोटे किरदारों से लेकर बड़े किरदारों तक में देखा है और हर बार उनका अभिनय निखरता रहा है.मगर इस फिल्म में वह भी मात खा गए.राय बहादुर के किरदार में संजय मिश्रा कुछ हद तक फिल्म को संभालते हैं.मगर उनके अभिनय में भी दोहराव ही नजर आता है.इसफिल्म में संजय मिश्रा जिस अंदाज में अंग्रेजी बोलते नजर आते हैं,उस तरह से वह कई फिल्मों में कर चुके हैं.उनके अभिनय नयापन नही है.पर यह कहना गलत नही होगा कि संजय मिश्रा,रणवीर सिंह पर भारी पड़ गए हैं.मुकेष तिवारी को इस तरह की फिल्म व इस तरह के फालतू किरदारों को निभाने से बचना चाहिए.सुलभा आर्या,अष्विनी कलसेकर,टीकू तलसानिया,ब्रजेष हीरजी,ब्रजेंद्र काला तो महज षोपीस’ ही हैं.सिद्धार्थ जाधव ओवरएक्टिंग ही करते है.
षान्तिस्वरुप त्रिपाठी
मांजी सोच रही थीं कि डाक्टर सच ही कह रहे हैं. अनुज्ञा, जिसे पुत्र न दे पाने के लिए वे सदा कोसती रहीं आज उसी ने बेटा बन कर उन की सेवा की तथा जिस रामू को सदा हिकारत की नजर से देखती रहीं, उसी के खून से उन की जान बच पाई.
दूसरे दिन वे अस्पताल से डिस्चार्ज हो कर घर आ गईं.
रामू अपने नियत समय पर काम करने आया, उसे देख कर पलंग पर लेटी
मांजी ने कहा, ‘आ बेटा, इधर आ, मेरे पास आ.’
‘नहीं मांजी, कहां आप कहां हम, अपने पास बुला कर हमें और शर्मिंदा न कीजिए. वह तो मेमसाहब अकेली परेशान हो रही थीं, इसलिए हमें आप को छूना पड़ा वरना…’ कह कर वह चला गया.
आशा के विपरीत मां का रामू के प्रति सद्व्यवहार देख कर सभी हतप्रभ रह गए किंतु रामू की प्रतिक्रिया सुन कर मेरे मन में मंथन चलने लगा, सदियों से चले आ रहे इस भेदभाव को मिटाने में अभी बहुत वक्त लगेगा. जब तक अशिक्षा रहेगी तब तक जातिपांति की इस खाई को पाट पाना मुश्किल ही नहीं असंभव सा है.
रामू जैसे लोग सदा हीनभावना से ग्रस्त रहेंगे तथा जब तक हीनभावना रहेगी उन का उत्थान नहीं हो पाएगा. उन की इस हीनता को आरक्षण द्वारा नहीं बल्कि शिक्षा द्वारा ही समाज में जागृति पैदा कर दूर किया जा सकता है.
आश्चर्य तो इस बात का है कि आरक्षण के बल पर इन का उत्थान चाहने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि आरक्षण के द्वारा इन दबेकुचले लोगों का नहीं बल्कि इन के उन भाइयों का ही फायदा हो रहा है जो पहले से ही इस का लाभ प्राप्त कर अच्छी स्थिति में आ गए हैं. इन में से कुछ लोगों को तो यह भी नहीं पता होगा कि सरकार के द्वारा इन के लिए क्याक्या सुविधाएं दी जा रही हैं.
दूसरे दिन से मांजी के व्यवहार में गुणात्मक परिवर्तन आ गया था. कमली उन के कमरे में सफाई के लिए गई तो उस से उन्होंने कहा, ‘कमली, मेरे लिए एक गिलास पानी ले आ.’
कमली को अपनी ओर आश्चर्य से देखते देख बोलीं, ‘अरे, ऐसे क्या देख रही है, मैं ने कहा, एक गिलास पानी ले आ.’
‘अभी लाई, मांजी.’
‘तेरी बेटी काजल क्या कर रही है,’ पानी पी कर गिलास पकड़ाते हुए पूछा.
‘क्या करेगी मांजी. पढ़ना चाहती है पर हम गरीबों के पास पैसा कहां? लड़के को तो उस के बापू ने स्कूल में डाल दिया पर इस को स्कूल में डालने के लिए कहा, तो कहता है, लड़की है इस पर पैसा खर्च करने से क्या फायदा.’
‘लड़की है तो क्या हुआ, अगर यह पढ़ना चाहेगी तो इस की पढ़ाई का खर्चा मैं दूंगी.’
‘सच, मांजी?’
‘हां कमली, एक लड़की का शिक्षित होना बहुत आवश्यक है क्योंकि वह अपने बच्चे की पहली शिक्षक होती है, अगर वह पढ़ीलिखी होगी तभी वह अपने बच्चे को उचित संस्कार दे पाएगी.’
हम सभी मांजी में आते परिवर्तन को देख कर अतिप्रसन्न थे. उन की टोकाटाकी कम होने से शीतल और शैलजा भी काफी प्रसन्न थीं. स्कूल से आने के बाद वे अपना काफी समय दादी के साथ बिताने लगी थीं. यहां तक कि एक दिन उन्होंने अनुज्ञा से भी कहा, ‘अनुज्ञा, अगर तू कोई काम करना चाहती है तो कर ले, घर मैं देख लूंगी, कमली तो है ही.’
‘ठीक है मांजी, प्रयत्न करती हूं.’
रामू से भी अब वे सहजता से बातें करने लगी थीं. एक दिन रामू खुशीखुशी घर आया, बोला, ‘मेमसाहब, आज मैं काम नहीं करूंगा. बहू को अस्पताल ले जाना है. वह पेट से है. दर्द उठ रहे हैं.’
शाम को उस ने पुत्र होने की सूचना दी तो मांजी ने उस के हाथ में 100 रुपए का नोट पकड़ाते हुए कहा, ‘जा, महल्ले में मिठाई बंटवा देना.’
उस के जाने के पश्चात अनुज्ञा को 500 रुपए देते हुए सासूमां ने कहा,
‘बहू, इन रुपयों से बच्चे के लिए कपड़े ले आना.’
एक दिन उन्होंने अमित से कहा, ‘बेटा, रामू के लिए तो मैं कुछ कर नहीं पाई पर सोचती हूं, उस के पोते के लिए ही कुछ करूं.’
‘आप क्या करना चाहती हैं?’
‘मैं चाहती हूं कि इस की पढ़ाई का खर्चा भी मैं उठाऊं. इस का दाखिला भी किसी ऐसेवैसे स्कूल में नहीं बल्कि अच्छे स्कूल में हो तथा तुम स्वयं समयसमय पर ध्यान दो.’
‘ठीक है मां, जैसा आप चाहती हैं वैसा ही होगा. पर…’
‘पर क्या, बेटा, तू सोच रहा होगा कि मेरे अंदर इतना परिवर्तन कैसे आया. बेटा, मानव मन जितना चंचल है उतना ही परिवर्तनशील. उस दिन की घटना के बाद से मेरे मन में हर दिन उथलपुथल होने लगी है. जितना सोचती हूं उतने ही मुझे अपने कर्म धिक्कारते प्रतीत होते हैं. जिस बहू को सदा नकारती रही, उस ने मेरी बेटी की तरह सेवा की. रामू, जिसे सदा तिरस्कृत करती रही, उस ने मेरी जान बचाने के लिए अपना खून तक दिया और जिन नातिनों को लड़की होने के कारण कभी प्यार के लायक नहीं समझा, उन्होंने मेरा प्यार पाने के लिए क्याकुछ नहीं किया पर अपनी मानसिकता के कारण उन के निस्वार्थ प्यार को नकारती रही. मैं प्रायश्चित्त करना चाहती हूं, बेटा.
‘तुम ने ठीक कहा था बेटा, सभी इंसान एक जैसे ही होते हैं. हम स्वयं ही अपनी सोच के अनुसार उन्हें अच्छा या बुरा, उच्च या नीच मान बैठते हैं. मेरे मन में आजकल कबीरदासजी की वाणी रहरह कर गूंजने लगी है : पोथी पढ़पढ़ जग मुआ, भया न पंडित कोय. ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय,’ वास्तव में जीव मात्र से प्रेम करना तथा अपने सांसारिक कर्तव्यों को निभाना ही इंसानियत है.
‘जब से मुझे सहज मानव धर्म समझ आया तब से मैं ने मन ही मन निश्चय किया कि मैं स्वयं में बदलाव लाने का प्रयत्न करूंगी. व्यर्थ के रीतिरिवाज या ढकोसलों को, जिन की वजह से दूसरों को दुख पहुंचता है, अपने मन से निकालने का प्रयत्न करूंगी. मैं प्रायश्चित्त करना चाहती हूं. काजल की पढ़ाई का खर्चा देने की बात तो तुम से पूछे बिना ही मैं ने कर दी. एक नेक काम और. अगर तुम ठीक समझो तो, क्योंकि मेरे बाद तुम्हें ही मेरी यह जिम्मेदारी पूरी करनी होगी.’
‘मां, प्लीज, ऐसा मत कहिए. हमें आप के साथ और आशीर्वाद की सदा आवश्यकता रहेगी पर इतना अवश्य विश्वास दिलाते हैं कि जैसा आप चाहेंगी वैसा ही होगा,’ अमित ने कहा था.
चाय के उबलते पानी की आवाज ने अनुज्ञा के विचारों के भंवर में विघ्न डाल कर उसे अतीत से वर्तमान में ला दिया. विचारों को झटक कर शीघ्रता से नाश्ता निकाला, चाय बना कर कप में डाली तथा कमरे की ओर चल दी.
मांजी को चंदू को अपने हाथों से मिठाई खिलाते देख कर वह सोच रही थी, रिश्ते खून के नहीं, दिल के भी होते हैं. अगर ऐसा न होता तो इतने वर्षों बाद हम सब एकदूसरे से जुड़े नहीं होते. कासिमपुर में तो हम सिर्फ 5 वर्ष ही रहे. पहले पत्रों के जरिए तथा बाद में मोबाइल के जरिए आपस में जुड़े रहे. पिछले महीने ही काजल का विवाह हुआ. हम सभी गए थे. हमें देख कर कमली की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा. काजल और उस का पति विक्रम एक ही स्कूल में अध्यापक हैं.
रामू तो नहीं रहा पर चंदू के जरिए उस परिवार से भी हम सब जुड़े रहे. पिछले वर्ष जब शीतल का विवाह हुआ तो कमली और काजल के साथ चंदू के मातापिता ने विवाह की तैयारियों में काफी मदद की थी. शीतल जहां सौफ्टवेयर इंजीनियर है वहीं शैलजा मैडिकल के अंतिम वर्ष में. आज मांजी दोनों की प्रशंसा करते हुए अघाती नहीं हैं. दोनों ही उन को बेहद प्रिय हैं.
मांजी ने जो निश्चय किया उसे क्रियान्वित भी किया. लोग कहते हैं कि बढ़ती उम्र के साथ इंसान अडि़यल या जिद्दी होता जाता है पर मांजी ने यह सिद्ध कर दिया अगर इंसान चाहे तो हर उम्र में स्वयं को बदल सकता है पर इस के लिए उसे अपने झूठे अहंकार को त्याग कर प्यार के मीठे बोलों को अपनाना पड़ेगा.
16 साल की उम्र में एक भारतीय मॉडल के रूप में अपना करियर शुरू करने वाली अमायरा दस्तूर एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री हैं.जिन्होंने हिंदी, तमिल, अंतर्राष्ट्रीय और तेलुगु फिल्मों में अभिनय किया है.
और क्लीन एंड क्लियर, एयरटेल, गार्नियर और माइक्रोमैक्स जैसे बड़े ब्रांडों का समर्थन करके अपना नाम बनाया.इंटरव्यू के दौरान उन्होंने अपने बारे में कुछ खास बातें बताई वो क्या है आइए जानते है.
1.फ़िल्म इंडस्ट्री में जाने की प्रेरणा किससे मिली?
मुझे फिल्में हमेशा से पसंद रही हैं. बड़े होने के दौरान भी मैंने हमेशा फिल्म निर्माण और अभिनय की प्रशंसा की है. एक फिल्म आपको 2-3 घंटों के लिए एक अलग दुनिया में ले जा सकती है और इस दौरान परदे पर अभिनय करते कुछ अजनबी आपकी गहरी भावनाओं को सामने ला सकते हैं, यह कुछ ऐसा है जिससे मैं हमेशा प्रभावित और प्रेरित रही हूं.
2. त्योहारों के मौसम के लिए आप अपनी त्वचा और बालों को कैसे तैयार करती हैं?
मैं बिना चूके सप्ताह में एक बार हेयर एंड केयर ट्रिपल ब्लेंड ऑइल अपने बालों में लगाती हूं. मैं त्योहार से पहले अपने बालों पर एलोवेरा जेल और होममेड हेयर मास्क जैसे बहुत सारे प्राकृतिक उत्पादों का भी उपयोग करती हूं ताकि इस दौरान की गई सभी स्टाइलिंग मेरे बालों को नुकसान न पहुंचाएं या उन्हें रूखा न बनाएं.
शुक्र है, मेरी त्वचा के मामले में मुझे कभी कोई समस्या नहीं हुई. मुझे बस मीठे व्यंजनों से दूर रहना पड़ता है. हालाँकि, उस तरह का अनुशासन वास्तव में कठिन होता है जब सभी आंटियाँ मुझे खिलाने आती हैं. लेकिन मैं अपनी पूरी कोशिश करती हूं.
3.आप फेस्टिवल्स को कैसे सेलिब्रेट करती है?
यह मेरा अपने परिवार के साथ बिताने का समय है और मैं वास्तव में इस समय को संजोती हूं. मेरा शेड्यूल बहुत ही अनियमित है और यह केवल त्योहारों के दौरान ही है कि पूरा भारत काम के लिहाज से बंद हो जाता है.यह समय मुझे वह वक़्त मिलता है जो मुझे अपने प्रियजनों के साथ बिताने की जरूरत है. हम आमतौर पर ताश खेलते हैं और बातें करते हैं और निश्चित रूप से कुछ स्वादिष्ट भोजन करते हैं .
4.आपका फिटनेस रिजीम क्या है? फेस्टिव सीजन में आप अपनी डाइट कैसे मेंटेन करती हैं?
मैं वास्तव में कुछ नहीं करती.मैं अपने आप को जो कुछ भी चाहती हूं खाने के लिए देती हूं. मैं पूरी कोशिश करती हूं कि मीठा खाना छोड़ दूं क्योंकि यह मेरी दुखती रग है लेकिन इसके अलावा ऐसा कुछ नहीं है. त्योहारों के बाद मैं बहुत मेहनत करती हूं और एक हफ्ते में मैं अपनी आइडियल बॉडी में वापस आ जाती हूं.
मुझे लगता है कि यह एक वादा है जो मैं खुद से करती हूं कि मैं जश्न के दौरान सबसे ज्यादा आनंद लूंगी और काम के बाद अतिरिक्त वजन कम करूंगी .
5. आप हमें अपने खूबसूरत बालों का राज बताएं?
यह बहुत सरल है. हफ्ते में एक बार ऑयलिंग जरूर करनी चाहिए.हमारी दादी-नानी इस बारे में सही थीं और अब मैं अपने सभी दोस्तों को भी ऐसा करने की सलाह देती हूं. मैं हफ्ते में एक बार अपने बालों में तेल लगाती हूं, हर हफ्ते हेयर एंड केयर ट्रिपल ब्लेंड ऑयल का इस्तेमाल जरूर करती हूं और इसे रात भर के लिए लगा रहने देती हूं. यह मेरे बालों को रिपेयर करता है और साथ ही मेरे बालों की इलास्टिसिटी में सुधार करता है और मेरे बालों को टूटने से बचाता है.यहां तक कि मैं अपने बालों को धोने से पहले सिरों पर तेल लगाती हूं ताकि यह सूखें नहीं और नमी बनी रहे. इसने मुझे दोमुंहे बालों को रोकने में मदद की है. मैंने हमेशा सरल और आसान तरीकों में विश्वास किया है.
6. यदि आपके पास हमारे देश को एक बेहतर स्थान बनाने के लिए एक महाशक्ति होती, तो आप क्या बदलती?
जिस तरह से हम अपने गली के जानवरों के साथ व्यवहार करते हैं, मैं वह बदलना चाहूंगी. मैं वास्तव में विश्वास करती हूं कि अगर हम उनसे डरते नहीं हैं या उन्हें चोट नहीं पहुंचाते हैं और इसके बजाय उनसे प्यार करते हैं और उनकी देखभाल करते हैं, तो हमारा देश एक बेहतर जगह होगी. प्यार सब ठीक कर देता है. हम जितना अधिक प्रेम देंगे, उतना ही अधिक हमें प्राप्त होगा. दया से दया उत्पन्न होती है. इसलिए, मैं एक जादू से लोगों को जानवरो के प्रति अधिक प्यार करने वाला बनाऊंगी.जानवरों को खिलाने और उनकी देखभाल करने से मुझे लगता है कि हम और अधिक इंसान और अच्छे इंसान बन गए हैं.अगर आपके देश के लोग खुश और संतुष्ट हैं, तो आपका देश अपने आप सभी के लिए एक बेहतर जगह बन जाता है.
टीवी का मशहूर सीरियल ‘अनुपमा’ इन दिनों मीडिया की सुर्खियो में है. रुपाली गांगुली के शो में आए दिन ऐसे ट्विस्ट और टर्न्स आ रहे हैं, जिसने लोगों को भी हैरान कर दिया है. अपने इन ट्विस्ट के कारण अनुपमा लगातार सोशल मीडिया पर भी ट्रेंड हो रहा है. बीते दिन ‘अनुपमा’ में दिखाया गया कि पाखी को अपनी गलती का एहसास होता है. लेकिन अनुज पूरे कपाड़िया हाउस को याद दिलाता है कि अनुपमा उनकी हर आवाज पर वहां नहीं पहुंच सकती है. वह घर आकर अनुपमा को छोटी अनु की जिम्मेदारियां भी याद दिलाता है. लेकिन ‘अनुपमा’ में आने वाले मोड़ यहीं नहीं खत्म होते हैं.
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अनुपमा में आगे दिखाया जाएगा कि काव्या, वनराज और किंजल अपने काम के कारण बाहर जाते हैं. किंजल अपनी परी को घर पर ही छोड़कर चली जाती है. वहीं जब रात में परी रोना शुरू करती है तो बा और बापूजी उसे संभाल नहीं पाते हैं और वे तुरंत अनुपमा को फोन करके बुला लेते हैं. अनुपमा भी परी को संभालने में बिजी हो जाती है.
‘अनुपमा’ में आगे दिखाया जाएगा कि छोटी अनु को पैनिक अटैक आता है और वह जोर-जोर से रोना शुरू कर देती है. अधिक इस बारे में तुरंत अनुपमा और अनुज को बताता है. अनुज तो तुरंत भागकर अपनी बेटी के पास चला जाता है, लेकिन अनुपमा परी को संभालने में बिजी रहती है. ऐसे में छोटी अनु अपने पिता के गले लगकर पूछती है, “मम्मी नहीं आईं, क्या वो मेरी मम्मी नहीं हैं. मुझे मेरी मम्मी चाहिए.”
अनुपमा’ में एंटरटेनमेंट यहीं खत्म नहीं होता है. रुपाली गांगुली के शो में आगे दिखाया जाएगा कि बा और बापूजी कपाड़िया मेंशन में डेरा डाल लेंगे.वहीं अनुज अनुपमा को समझाएगा कि वह जिम्मेदारी सबको बनाए, लेकिन प्राथमिकता छोटी अनु को दे.शो को लेकर यह भी खबर आ रही है कि अनुपमा इन जिम्मेदिरायों के बोझ तले दब जाएगी और डप्रेशन का शिकार हो जाएगी.
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कलर्स टीवी का रिएलिटी शो बिग बॉस 16 (Biggboss16) इन दिनों मीडिया की सुर्खियों में बना हुआ है जहां कंटेस्टेंट एक -दूसरे से लड़ते नज़र आ रहे है तो वही सलमान खान भी इऩके साथ अपना आपा खोते दिख रहे है. जी हां, बीते दिन शालीन भनोट और एम सी स्टेन की बीच लड़ाई हो गई थी. जहा बात बात मार पिटाई तक पहुंच गई थी.
आपको बता दे, कि नॉमिनेशन के टास्क के दौरान एम सी स्टेन और शालीन भनोट के बीच काफी विवाद हो गया था.जिसमें उन्होंने गालीगलोच की थी और बात मार पिटाई तक पहुंच गई थी हालांकि लडाई होते होते घर वालों ने बात सभांल ली थी. इसके बाद सलमान खान इस मुद्दे पर दोनो की क्लास लगाई.
बता दें, कि वीकेंड के वार में सलमान खान कई बार कंटेस्टेंट्स की उनकी हरकतों के लिए क्लास भी लगाते हैं. प्रोमो वीडियो के मुताबिक, दोनों को समझाते-समझाते सलमान खान अपना ही आपा खो बैठे बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब कंटेस्टेंट्स की हरकतों ने सलमान खान का दिमाग खराब कर दिया था. कुशाल टंडन से लेकर करिश्मा तन्ना तक, कई कंटेस्टेंट्स सलमान खान के आपा खोने का कारण बने हैं. सलमान खान एक नहीं बल्कि कई बार शालीन भनोट की क्लास लगा चुके हैं. इस वीकेंड का वार पर वह गाली-गलौज करने के लिए शालीन भनोट की क्लास लगाते दिखाई देंगे. वीडियो में एक्टर उन्हें समझाते वक्त काफी गुस्से में नजर आए.
गौरतलब है कि सलमान खान ने एमसी स्टेन को पहले भी गाली-गलौज करने के लिए खूब डांटा था.वहीं शालीन संग हुई लड़ाई में एमसी स्टैन ने न केवल अपशब्द कहे, बल्कि एक्टर को मारने की धमकी भी दी. उनकी इस हरकत के लिए सलमान खान भड़के नजर आए.
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इससे पहले सीजन में प्रियंका जग्गा को सलमान खान ने उनके दुर्व्यवहार को लेकर काफी बार समझाया था. लेकिन प्रियंका जग्गा ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया, उल्टा सलमान खान से भी बदतमीजी की. इस बात के लिए सलमा ने गुस्से में प्रियंका को घर से बाहर निकाल दिया.
स्वामी ओम ने अपनी हरकतों से न केवल सलमान खान का बल्कि घरवालों का भी दिमाग खराब कर दिया था. कई बार समझाने के बाद भी वह नहीं सुधरे थे, जिसपर सलमान ने उन्हें शो से बाहर जने तक के लिए कह दिया था. प्रतीक सहजपाल ने ‘बिग बॉस 15’ में विधी पंड्या के लिए गलत शब्दों का इस्तेमाल किया था. यहां तक कि उन्होंने अपनी गलती भी नहीं मानी थी. ऐसे में सलमान खान ने न केवल प्रतीक को लताड़ लगाई थी, बल्कि यह भी कहा था, “तुम ये सब करते हुए बिल्कुल बेवकूफ लग रहे हो.
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करिश्मा तन्ना ने वीकेंड का वार के दौरान करिश्मा तन्ना का नाम प्रीतम के साथ जोड़ा था.उनकी इस बात से एक्ट्रेस भड़क गई थीं. वहीं करिश्मा का व्यवहार देख सलमान खान भी आपा खो बैठे थे और स्टेज तक छोड़ दिया था.
बॉलीवुड हो या टीवी अदाकाराएं, अपनी शादी के दिन को खास बनाने के लिए सभ्यसांची डिजाइनर के लहंगों का चुनाव करती नजर आती हैं. वहीं सभ्यसांची ब्रांड भी ब्राइडल लहंगों के लिए पौपुलर ब्रांड में से एक हैं. लेकिन कुछ ऐसी बॉलीवुड और टीवी की एक्ट्रेसेस भी हैं, जिन्होंने सभ्यसांची ब्रांड का ब्राइडल लहंगा पहनने की बजाय दूसरे डिजाइनर्स को चुनने का फैसला किया. आइए आपको दिखाते हैं उन 6 एक्ट्रेसेस की झलक, जिन्होंने सभ्यसांची को छोड़कर दूसरे डिजाइनर्स का लहंगा या साड़ी पहनने का ट्रैंड शुरु किया है.
1. खास था यामी गौतम का वेडिंग लुक
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अचानक फैंस को शादी का तोहफा देने वाली यामी गौतम (Yami Gautam) का वेडिंग लुक काफी चर्चा में रहा था. दरअसल, अपनी मां की 33 साल पुरानी साड़ी को यामी गौतम ने अपनी शादी का जोड़ा बनाया था, जिसे फैंस ने काफी पसंद किया था. गोल्डन वर्क का काम किए गए यामी गौतम की वेडिंग साड़ी के साथ फ्लोरल ब्लाउज बेहद खूबसूरत लग रहा था. वहीं इस लुक के साथ यामी ने हिमाचली ज्वैलरी कैरी की थी, जो सोशलमीडिया पर काफी ट्रैंड हुई थी.
2. सोनम कपूर की बहन का लुक था ट्रैंडी
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एक्ट्रेस सोनम कपूर की बहन रिया कपूर (Rhea Kapoor) एक फिल्म प्रौड्यूर हैं. हालांकि वह अपनी बहन के साथ मिलकर एक फैशन ब्रैंड चलाती हैं. वहीं रिया कपूर के वेडिंग लुक की बात करें तो वह बेहद खास था. दुल्हन के लाल जोड़ा आज की तारीफ में जरुरी नहीं रह गया है, जिसका एहसास रिया कपूर के वेडिंग लुक ने करवाया था. दरअसल, रिया कपूर ने अपने वेडिंग लुक के लिए ऑफ व्हाइट कलर की साड़ी पहनी थी, जिसे डिजाइनर अनामिका खन्ना ने डिजाइन किया था, जिसे फैंस ने काफी पसंद किया था.
3. मौनी रॉय का मलयाली वेडिंग लुक
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टीवी एक्ट्रेस मौनी रॉय (Mouni Roy) अपने फैशन के लिए अक्सर सुर्खियों में रहती हैं. हौट लुक से फैंस का दिल जीतने वाली मौनी रॉय ने अपनी मलयाली वेडिंग के लिए ट्रैडिशनल वाइट साड़ी कैरी की थी, जिसे उनकी दोस्त और डिजाइनर Anuradha Khurana ने चुना था. वहीं उन्होंने इस लुक को ट्रैडिशनल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. इसके अलावा मौनी रॉय के बंगाली वेडिंग लुक की बात करें तो वह सभ्यसांची का लहंगा था, जिसमें भी वह बेहद खूबसूरत लग रही थीं. फैंस को मौनी रॉय के दोनों वेडिंग लुक पसंद आए थे.
4. लाल की जगह करिश्मा तन्ना ने चुना ये जोड़ा
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टीवी एक्ट्रेस करिश्मा तन्ना (Karishma Tanna) का वेडिंग लुक भी खास था. एक्ट्रेस ने अपनी शादी के खास दिन के लिए लाल रंग की बजाय पेस्टल पिंक कलर का चुनाव किया था. सभ्यसांची की बजाय डिजाइनर फाल्गुनी शेन पीकॉक ने करिश्मा तन्ना का शादी का जोड़ा डिजाइन किया था. वहीं अनीता श्रॉफ अदजानिया ने एक्ट्रेस के खास वेडिंग लुक को स्टाइल किया था. करिश्मा तन्ना का वेडिंग लुक बेहद खास था, जिसे फैंस ने काफी पसंद किया था.
5. अनुष्का रंजन का ब्राइडल लुक था खास
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बौलीवुड एक्ट्रेस अनुष्का रंजन (Anushka Ranjan) ने बीते दिनों एक्टर आदित्य सील से शादी की थी, जिसमें बौलीवुड की पौपुलर एक्ट्रेस आलिया भट्ट समेत कई सितारे नजर आए थे. बौलीवुड की बिग फैट वैडिंग सोशलमीडिया पर काफी चर्चा में रही थीं. वहीं एक्ट्रेस अनुष्का रंजन के ब्राइडल लुक की भी काफी सुर्खियों में रहा था. अनुष्का रंजन ने अपने वेडिंग लुक के लिए लैवेंडर रंग का जोड़ा चुना था. डिजाइनर Mohini Chabria द्वारा डिजाइन किए गए हैवी एम्ब्रौयडरी वाले इस लहंगे में सीक्वन, बीड और मिरर वर्क किया गया था, जो बेहद खूबसूरत लग रहा था. खबरों की मानें तो अनुष्का रंजन ने इस लहंगे के साथ असली हीरे से बनी ज्वैलरी कैरी की थी.
6. टीवी की बहू भी नहीं थी पीछे
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बौलीवुड हसीनाएं ही नहीं टीवी की बहूएं भी अपने वेडिंग लुक को खास बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती. बीते दिनों कुंडली भाग्य फेम एक्ट्रेस श्रद्धा आर्या (Shraddha Arya) ने भी अपने वेडिंग लुक से फैंस का दिल जीता था. एक्ट्रेस श्रद्धा आर्या ने अपने वेडिंग लुक के लिए सभ्यसाची का जोड़ा चुनने की बजाय डिजाइनर एजाज कोचर का डिजाइन किया गया लहंगा पहना था. लहंगे की बात करें तो एक्ट्रेस ने महरुन रंग का गोल्डन जरी वर्क वाला लहंगा चुना था. इस लुक को फैंस ने काफी पसंद किया था. टीवी हसीना का ये लुक सोशलमीडिया पर तेजी से वायरल हुआ था.
एक पत्रिका में एक समस्या छपी थी, ‘‘मेरी शादी को 3 साल हो गए हैं. मेरे मोटे पेट के कारण मेरे पति मेरी तरफ देखते भी नहीं. कृपया बताएं कि मैं क्या करूं, जो पति मेरे पेट को भूल कर मेरे करीब आ जाएं और मैं फिर से वैवाहिक सुख का आनंद ले पाऊं?’’
इसी तरह एक और समस्या थी. एक लड़की की 1 महीने बाद शादी होने वाली थी और वह अपना वजन घटाना चाहती थी. शादी के दिन वह अपने मोटापे को ले कर हंसी का पात्र नहीं बनना चाहती थी. इस के लिए उस ने टीवी में कैलोग्स स्लिम फैट का ऐड देख कर उसे नाश्ते में लेना शुरू कर दिया, जिस से वह बीमार पड़ गई. तब डाक्टर ने दुलहन बनने जा रही उस मुहतरमा को सही सलाह दी.
क्या आप भी दुलहन बनने जा रहीं और छरहरा बनना चाहती हैं? क्या यह सिर्फ विवाह तक के लिए करना चाह रही हैं? विवाह के बाद का क्या? उस के बाद जब भी आप खुद को आईने में देखेंगी तो आप को अपने थुलथुल बदन पर क्या शर्म महसूस नहीं होगी?
ऐसी कई लड़कियां होंगी, जो लड़का देखने आने तक से शादी तक स्लिम होना चाहती हैं. शादी के 1-2 साल बाद या कहें मां बन जाने के बाद इन सारे फौर्मूलों को बायबाय कह देती हैं.
रील लाइफ: शरत कटारिया द्वारा निर्देशित फिल्म ‘दम लगा कर हईशा’ में फिल्म की बेमेल जोड़ी की चर्चा है. ऐक्टर आयुष्मान खुराना उर्फ प्रेम निखट्टू की बीवी विशाल शरीर वाली इंटैलीजैंट दिखाई गई है. पति 10वीं फेल है पर पत्नी के मोटापे को ले कर बेहद शर्मिंदा रहता है. उसे फिक्र रहती है कि उस के दोस्त व बाकी लोग उस की मोटी बीवी के बारे में पता नहीं क्या सोचते होंगे. खैर, फिल्म के बीच में विवाद होने के बाद हैप्पी ऐंडिंग हो जाती है.
रीयल लाइफ: रोहन एक मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत था. आए दिन कंपनी की गैटटूगैदर पार्टियां होती रहती थीं. ऐसे में जब रोहन औफिस की गैटटूगैदर में अपनी पत्नी मालिनी को ले जाता तो सामने व पीठ पीछे उस पर लोग मंदमंद मुसकराते. कारण था, बीवी का प्रैगनैंसी के बाद मोटा हो जाना. ‘जिस की बीवी मोटी उस का भी बड़ा नाम है.’ रोहन को इस तरह के न जाने कितने जुमले सुनने को मिलते. रोहन को पहले इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था, पर बाद में उसे भी मालिनी के साथ पार्टी में जाने पर शर्मिंदगी महसूस होने लगी. फिर उस ने अकेले पार्टियों में जाने का फैसला लिया.
सैक्स और वजन: मोटे पेट वाली महिलाएं और पुरुष दोनों ही घर से बाहर भी और भीतर भी शर्मिंदगी का कारण बनते हैं. एक अध्ययन से पता चला है कि बाहर निकले पेट का संकोच सिर्फ बैडरूम में ही नहीं, बल्कि बाहर भी रहता है. प्यार की बात पर शरीर का जो पहला हिस्सा झिझक व अनफिट दिखता है, वह है बड़ा पेट. यह बड़ा पेट आप के प्यार के पलों का मजा कम कर देता है. ऐसे में आप जल्दी थक जाते हैं या आप की सांसें फूलने लगती हैं, प्यार करने की इच्छा नहीं होती और बाहर मन डोलने लगता है. इतना ही नहीं साथी को खुश न कर पाना तनाव को भी जन्म देता है.
मनचाही ड्रैस न दे पाना: शादी के बाद या फिर बच्चा हो जाने के बाद यह तो नहीं कि रोमांस खत्म हो जाए पर अगर बीवी मोटी हो तो पति की कई इच्छाएं मर जाती हैं जैसे अगर वह आप को कोई मनचाही ड्रैस देना भी चाहे तो या तो आप का साइज नहीं मिलेगा या फिर आप पर वह फबेगी नहीं. इस चक्कर में पति चाह कर भी पत्नी को अपनी मनचाही ड्रैस का सरप्राइज नहीं दे पाता.
कौंप्लैक्स का भाव: अगर आप की फिगर 36-24-36 से डबल हो जाए तो आप उम्र से भी बड़ी दिखने लगेंगी. ऐसे में आप के पति की उम्र भले ही आप से ज्यादा हो पर वह जवां दिखेगा. तब आप को कौंप्लैक्स फील होगा कि आप अपनी उम्र से बड़ी दिख रही हैं. इसलिए वेट लौस कर बन जाएं स्लिम ऐंड ट्रिम, पति की तरह एकदम फिट. ऐसा नहीं है कि औरत को मोटा होना अच्छा लगता है पर शादी हो जाने के बाद वह मान लेती है कि मोटी हो भी जाए तो क्या पति का प्यार कम थोड़े होगा. यह सोच गलत है.
2. लाइफस्टाइल है पेट पर भारी
यूनानी चिकित्सक हिप्पोक्रैट्स के अनुसार, सारी बीमारियां पेट से ही शुरू होती हैं. 2 दशक पहले हुए शोध के अनुसार पूरी तरह से फिट व हैल्दी रहने के लिए आंतों का स्वस्थ रहना बहुत जरूरी है. हमारे लाइफस्टाइल की वजह से हमारी आंतें प्रभावित होती हैं, क्योंकि हम हाई कैलोरी फूड और जंक फूड का सेवन बहुत ज्यादा करने लगे हैं. ऐसे में आंतों को स्वस्थ बनाए रखना बहुत आवश्यक है. मोटापा, लिवर में फैट जमना, सूजन होना, इरिटेबल बौवेल सिंड्रोम, अल्सर जैसी बीमारियां लाइफस्टाइल से जुड़ी होती हैं.
3. क्यों बढ़ता है मोटापा
नोवा स्पैश्यलिटी हौस्पिटल बैंगलुरु की डाइट ऐंड न्यूट्रीशियन कंसलटैंट डा. शीला कृष्णनन स्वामी ने बताया कि तनाव के कारण हमारी बौडी में एड्रीनेलिन और कार्टिसोल हारमोंस का स्तर बढ़ जाता है. इस से शरीर की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है और पाचनतंत्र बिगड़ जाता है. प्रैगनैंसी के दौरान, हारमोंस असंतुलन आदि के कारण भी डिप्रैशन, नींद न आना या गर्भनिरोधक गोलियों के सेवन और मेनोपौज के कारण महिलाओं में हारमोंस के स्तर में तेजी से बदलाव आता है, जिस कारण पेट के आसपास चरबी बढ़ जाती है. इस के अलावा आजकल महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन करती हैं, स्टेराइड हारमोन, डायबिटीज, अवसाद और ब्लडप्रैशर को कंट्रोल करने वाली दवाओं के कारण भी वजन बढ़ जाता है. नींद की कमी भी मोटापे का कारण हो सकती है. आजकल गैजेट्स का ज्यादा इस्तेमाल, शारीरिक सक्रियता में कमी, लिफ्ट का इस्तेमाल, बाहर खेलने के बजाय लैपटौप या टीवी से चिपके रहने से भी मोटापे का शिकार हो सकते हैं. आनुवंशिकता भी मोटापे की एक बड़ी वजह है.
4. मोटापे से होने वाली बीमारियां
यूनिवर्सिटी औफ मौंट्रियल के शोधकर्ताओं के अनुसार मोटे लोगों को वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों का ज्यादा खतरा रहता है, क्योंकि ऐसे लोगों को सांस लेने के लिए ज्यादा हवा की जरूरत होती है. जिन लोगों का बीएमआई यानी बौडी मास इंडैक्स 18.5 से 25 तक हो उन्हें रोजाना 16.4 क्यूबिक मीटर हवा की जरूरत पड़ती है जबकि 35 से 40 बीएमआई वालों को 24.6 क्यूबिक मीटर हवा की. ऐसे में ज्यादा बीएमआई वालों को वायु प्रदूषण का ज्यादा प्रभाव पड़ता है. यह अध्ययन 2000 लोगों पर किया गया था. इस के अलावा मोटापे से शरीर पर वसा की ज्यादा परतें जम जाती हैं. आज दुनिया की 20 फीसदी आबादी मोटापे से ग्रस्त है. मोटापे से होने वाली बीमारियों में डायबिटीज, जोड़ों में दर्द, बांझपन, हार्ट फेल्योर, अस्थमा, कोलैस्ट्रौल, ज्यादा पसीना आना, हाइपरटैंशन आदि का खतरा बढ़ जाता है. खानपान की गलत आदतें या फिर लाइफस्टाइल में आए बदलाव और शारीरिक सक्रियता में कमी के चलते भी यह परेशानी हो रही है.
5. मोटापे के फायदे
6. कैसे घटाएं वजन
7. सर्जरी
पुष्पांजलि क्रासले हौस्पिटल दिल्ली, के सर्जन डा. दीपक कुमार के अनुसार बेहद मोटे यानी जिन्हें अपना वजन कम से कम 35 से 40 किलोग्राम तक घटाना है तो वे बैरिएट्रिक सर्जरी करा सकते हैं. लेकिन जिन्हें मधुमेह या फिर ब्लडप्रैशर हो उन्हें 32.5 या उस से ज्यादा बीएमआई होने पर सर्जरी की सलाह दी जाती है. अगर कोई बीमारी नहीं है तो 37.5 या उस से ऊपर के बीएमआई वालों की सर्जरी की जा सकती है. बैरिएट्रिक सर्जरी के 2 प्रकार हैं- पहली गैस्टिक स्लीव, इस में पेट के साइज को स्टैप्पल कर के कम दिखाया जाता है. इस सर्जरी से 80 फीसदी मोटापा कम कर दिया जाता है. इस सर्जरी के कराने के बाद पेट भराभरा सा लगेगा. यह परमानैंट सर्जरी है. दूसरा प्रकार है गैस्टिक बाईपास. इस में पेट के छोटेछोटे पाउच बना कर उन्हें सीधे इंटेस्टाइन से जोड़ा जाता है. यह सर्जरी कराने पर कम खाने से पेट भर जाता है. पेट का इस में कोई पार्ट रिमूव नहीं होता. चाहें तो बाद में पाउच की हटवा भी सकते हैं. एक अच्छी बात यह भी है कि इस सर्जरी को कराने के बाद मधुमेह के रोगियों को मधुमेह से छुटकारा पाने के चांसेज बढ़ जाते हैं.
मेरी सहेली कंचन के घर में अकसर पंचायत होती है जिस में उस के घर का छोटे से बड़ा हर सदस्य भाग लेता है. मुद्दा चाहे पड़ोसी का हो या किसी रिश्तेदार का, किसी परिचित के बेटे के किसी लड़की के साथ भाग जाने का हो या घर की आर्थिक स्थिति का.
विनोद ने औफिस से आ कर जैसे ही अपने घर की घंटी बजाई, पास में खेल रहा पड़ोसी मिश्राजी का 8 वर्षीय सोनू आ कर बोला, ‘‘अंकल, आप आंटी के साथ झगड़ा क्यों करते हो? आप को पता है, बेचारी आंटी ने आज सुबह से खाना भी नहीं खाया है.’’ इतने छोटे बच्चे के मुंह से यह सब सुन कर विनोद सन्न रह गया. आज सुबह पत्नी रीना से हुए उस के झगड़े के बारे में सोनू को कैसे पता? वह समझ गया कि पत्नी रीना ने झगड़े की बात पड़ोसिन अनुभा को बताई होगी जिसे सुन कर उन का बेटा सोनू उन से प्रश्न कर रहा था.
‘‘पता है, रैना आंटी की यह तीसरी शादी है और सामने वाली स्नेहा दी का किसी से अफेयर चल रहा है. वे रोज उस से मिलने भी जाती हैं,’’ 10 वर्षीय मनु अपनी पड़ोस की आंटी को दूसरे पड़ोसी के घर के बारे में यह सब बड़ी सहजता से बता रही थी. ‘‘मेरी दादी ने मेरी मम्मी को कल बहुत डांटा, बाद में मम्मी नाराज हो कर फोन पर मौसी से कह रही थीं कि बुढि़या पता नहीं कब तक मेरी छाती पर मूंग दलेगी,’’ 9 वर्षीय मोनू अपने दोस्त से कह रहा था.
उपरोक्त उदाहरण यों तो बहुत सामान्य से लगते हैं परंतु इन सभी में एक बात समान है कि सभी में बातचीत करते समय बच्चों की उपस्थिति को नजरअंदाज किया गया. वास्तव में बच्चे बहुत भोले होते हैं. वे घर में जो भी सुनते हैं उसे उसी रूप में ग्रहण कर के अपनी धारणा बना लेते हैं और अवसर आने पर दूसरों के सामने प्रस्तुत कर देते हैं. इसलिए मातापिता बच्चों से सदैव उन के मानसिक स्तर की ही बातचीत करें और उन्हें ईर्ष्या, द्वेष, आलोचना या दूसरों की टोह ?लेने जैसी भावनाओं से दूर रखें क्योंकि उन की यह उम्र खेलनेकूदने और पढ़ाई करने की होती है, न कि इस प्रकार की व्यर्थ की दुनियादारी की बातों में पड़ने की.
बचपन में बच्चों को जब इस प्रकार की बातों में भाग लेने और अपना मत व्यक्त करने की आदत पड़ जाती है तो यह आदत उन के चरित्र का एक निगेटिव पौइंट बन जाती है. इसलिए ध्यान रखें. दरअसल, मातापिता, अभिभावक व घरपरिवार के बड़ेबूढ़े बच्चों को बेहतरीन इंसान बनाना चाहते हैं लेकिन उन में से कुछ की गलतियों के चलते उन के बच्चे बिगड़ जाते हैं. वे समझदारी से बच्चों को प्यार व उन की देखभाल करें तो वे बिगड़ नहीं सकते. इस प्रकार, बच्चों को बिगड़ने, न बिगड़ने का सारा दारोमदार बड़ों पर ही निर्भर है.
काले सघन बरसते बादलों के बीच मचलती हुई दामिनी के साथ शिव ने जया की कलाई को क्या थामा कि बेटेबहू के साथ अमेरिका में रह रही जया के भीतर मानो सालों सूखे पर सावन की बूंदें बरस उठीं. शिव के अपनेपन से उस की आंखें ऐसे छलकीं कि कठिनाइयों व दुखों से भरे उस के पहले के सारे बरस बह गए.
जया को सियाटल आए 2 हफ्ते हो गए थे. जब तक जेटलैग था, दिनभर सोती रहती थी. जब तक वह सो कर उठती, बहू, बेटा, पोतापोती सभी आ तो जाते पर रात के 8 बजते ही वे अपने कमरों में चले जाते. वे भी क्या करें, औफिस और स्कूल जाने के लिए उन्हें सुबह उठना भी तो पड़ता था.
जब से जेटलैग जाता रहा, उन सबों के जाते ही उतने बड़े घर में वह अकेली रह जाती. अकेलेपन से ही तो उबरने के लिए 26 घंटे की लंबी यात्रा कर वह अपने देश से इतनी दूर आई थी. अकेलापन तो बना ही रहा. बस, उस में सन्नाटा आ कर जुड़ गया जिसे उन का एकाकी मन झेल नहीं पा रहा था. सूई भी गिरे तो उस की आवाज की अनुगूंज उतने वृहत घर में फैल जाती थी.
कितना यांत्रिक जीवन है यहां के लोगों का कि आसपास में ही संवादहीनता बिखरी रहती है. नापतोल कर सभी बोलते हैं. उस के शैया त्यागने के पहले ही बिना किसी शोर के चारों जन अपनेअपने गंतव्य की ओर निकल जाते हैं. जाने के पहले बहू अणिमा उस की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति कर जाती थी. अपनी दिनचर्या के बाद पूरे घर में घूम कर सामान को वह इधरउधर ठीक करती. फिर घर के सदस्यों की असुविधा का खयाल कर यथावत रख देती. हफ्तेभर की बारिश के बाद बादलों से आंखमिचौली करता हुआ उसे आज सूरज बहुत ही प्यारा लग रहा था.
अपने देश की चहलपहल को याद कर उस का मन आज कुछ ज्यादा ही उदास था. इसलिए अणिमा के मना करने के बावजूद वह लेक समामिस की ओर निकल गई. ऊंचीनीची पहाड़ी से थक कर कभी वह किसी चट्टान पर बैठ कर अपनी चढ़तीउतरती सांसों पर काबू पाती तो कभी आतीजाती गाडि़यों को निहारते हुए आगे बढ़ जाती. कहीं गर्व से सिर उठाए ऊंचेऊंचे पेड़ों की असीम सुंदरता उसे मुग्ध कर देती. सड़क के इस पार से उस पार छलांग लगाते हिरणों का झुंड देख कर डर जाती.
झुरमुटों से निकल कर फुदकते हुए खरगोश को देख कर वह किसी बच्ची की तरह खुश हो रही थी. झील के किनारे कतारों में बने घरों की सुंदरता को अपलक निहारते हुए वह अपनी धुन में आगे बढ़ती जा रही थी. उसे इस का आभास तक नहीं हुआ कि कब आसमान में बादल छा गए और तेज हवाओं के साथ बारिश होने लगी थी. अचानक इस आई मुसीबत से निबटने के लिए वह एक पेड़ के नीचे खड़ी हो गई.
अपना देश रहता तो भाग कर किसी घर के अहाते में खड़ी हो जाती. पर इस देश में यह बहुत बड़ा जुर्म है. आएदिन लालपीलीनीली बत्तियों वाली कौप की गाडि़यां शोर मचाती गुजरती थीं. पर आज इस मुसीबत की घड़ी में उन का भी कोई पता नहीं है.‘‘अरे आप तो पूरी तरह से भीग गई हैं,’’ अचानक उस के ऊपर छतरी तानते हुए किसी ने कहा तो जया चौंक कर मुड़ गई. सामने 60-65 वर्ष के व्यक्ति को देख कर वह संकुचित हो उठी.
‘‘मैं, शिव, पटना, बिहार से हूं. शायद आप भी भारत से ही हैं. आइए न, सामने ही मेरी बेटी का घर है. बारिश रुकने तक वहीं रुकिए.’’मंत्रमुग्ध सी हुई जया शिव के साथ चल पड़ी. पलभर को उसे ऐसा लगा कि इस व्यक्ति से उस की पहचान बहुत पुरानी हो. बड़े सम्मान व दुलार के साथ शिव ने उसे बैठाया. जया को टौवेल थमाते हुए वे तेजी से अंदर गए और
2 कप कौफी बना कर ले आए.‘‘अभी घर में बेटी नहीं है, वरना उस से पकौड़े तलवा कर आप को खिलाता. पकौड़े तो मैं भी बहुत करारे बना सकता हूं. साथ छोड़ने से पहले मेरी पत्नी पद्मा ने मु झे बहुत काबिल कुक बना दिया था,’’ कहते हुए शिव की पलकों पर स्मृतियों के बादल तैर गए.
शिव अपने बारे में कहते गए और मौन बैठी जया आभासी आकर्षण में बंधी उन के दुखसुख को आत्मसात करती रही. अचानक शिव का धाराप्रवाह वार्त्तालाप पर विराम लग गया. हंसते हुए वे बोले, ‘‘आप को तो कुछ बताने का अवसर ही नहीं दिया मैं ने, अपने ही विगत को उतारता रहा. क्या करूं, बेटी की जिद से आ गया. आराम तो यहां बहुत है पर किस से बात करूं.
यहां तो किसी को फुरसत ही नहीं है जो पलभर के लिए भी पास बैठ जाए. पटना में बातचीत करने के लिए जब कोई नहीं मिलता है तो नौकर के परिवार से ही इस क्षुधा को शांत कर लेता हूं. जातेजाते पद्मा ने उन सबों को कह दिया था कि बाबूजी को भले ही नमकरोटी दे देना खाने के लिए, लेकिन बातचीत हमेशा करते रहना. बालकनी में उन का किचन बनवा कर फ्लैट का एक रूम रामू को दे दिया था जिस में वह अपनी पत्नी और
2 बच्चों के साथ रहता है.’’शिव कुछ आगे कहते कि जया ने रोक लगाते हुए कहा, ‘‘मेरी सम झ से बारिश रुक गई है और मु झे चलना चाहिए.’’‘‘क्यों नहीं, चलिए मैं आप को छोड़ आता हूं. इसी बहाने आप का घर भी देख लूंगा. जब भी अकेलापन महसूस करूंगा, आप को परेशान करने चला आऊंगा,’’ कहते हुए शिव साथ हो लिए तो जया उन्हें मना न कर सकी. रास्तेभर शिव अपनी रामकहानी कहते रहे और जया मूक श्रोता बनी सुनती रही.
शिव पटना के बिजली विभाग के रिटायर्ड चीफ इंजीनियर हैं. पिछले साल ही कैंसर से इन की पत्नी की मृत्यु हुई है. बातोंबातों में ही जया कब अपने घर पहुंच गई, उसे पता ही न लगा. यह बात और थी कि ऊंचेनीचे कटाव पर जब भी वह लड़खड़ाती, शिव उस की बांहों को थाम लेते. एक दशक बाद किसी पुरुष और स्पर्श उस के तनमन को भले ही कंपित कर के रख देता रहा पर अपनेपन के खूबसूरत सुखद एहसास को उन में भरता भी रहा.
औपचारिकता निभाते हुए जया ने शिव को अंदर आ कर एक कप चाय पी कर जाने को कहा तो प्रत्युत्तर में उन्होंने अपनी बच्चों सी मुसकान से उसे मोहते हुए कहा, ‘‘नहीं जयाजी. अब आप को और बोर नहीं करूंगा. किसी और दिन आ कर चाय के साथ पकौड़े भी खाऊंगा.’’ यह कहते हुए शिव जाने के लिए मुड़ गए. जब तक वे दिखते रहे, सम्मोहित हुई जया उसी दिशा में ताकती रही.