त्रिकोण- भाग 3 : शातिर नितिन के जाल से क्या बच पाई नर्स?

सोनल का मन नितिन की हरकतें देख कर छटपटा रहा था. वह बच्चों को देखना चाहती थी. वह बहुत कोशिश
कर रही थी, क्योंकि उसे पता था कि उस के बाद यह चालाक इंसान बच्चों पर ध्यान नहीं देगा. पर कुदरत को
कुछ और ही मंजूर था, सोनल कोरोना के आगे जिंदगी की जंग हार गई थी.

नितिन जब सोनल का अंतिम संस्कार कर के घर पहुंचा तो श्रेया और आर्यन का विलाप देख कर पहली बार
उस का दिल भी भावुक हो उठा था. वह भी बच्चों को गले लगा कर फफकफफक कर रो पड़ा. पर नितिन को पता था कि सोनल इस घर की गृहिणी ही नहीं, बल्कि अन्नदाता भी थी.

बैंक में बस ₹10 हजार शेष थे. सोनल के जाने के बाद एक बंधी हुई इनकम का सोर्स बंद हो गया था. नितिन की आदतें इतनी खराब थीं कि उस के घर वाले और दोस्त उस की मदद करने को तैयार नहीं थे. ऐसे में ललिता के अलावा नितिन को कोई नजर नहीं आ रहा था.

सब मुसीबतों के बाद भी बस एक अच्छी बात यह थी कि यह घर नितिन और सोनल ने बहुत पहले बनवा लिया था. अब नितिन ने तिकड़म लगाया और ललिता को अपने घर पेइंगगैस्ट की तरह रहने को बोला. ललिता की हिचकिचाहट देख कर नितिन बोला,”मेरे बच्चों की खातिर आ जाओ ललिता, वे सोनल को बहुत मिस करते हैं. तुम जितना किराया देती हो, उस से आधा दे देना, मुझे तुम्हारे साथ की जरूरत है.”

ललिता के आंखों पर तो जैसे पट्टी बंधी हुई थी. वह अपना सामान ले कर नितिन के घर आ गई थी. दोनों बच्चे ललिता को देख कर अचकचा गए मगर कुछ बोल नहीं पाए. एक रूम में ललिता, दूसरे में बच्चे और ड्राइंगरूम में नितिन रहता था.
ललिता ने धीरेधीरे पूरे घर का काम अपने जिम्मे ले लिया था. नितिन रातदिन ललिता की तारीफों में कसीदे
पढ़ता था. ललिता को लगने लगा था कि उस से ज्यादा सुंदर शायद इस दुनिया में कोई नहीं है. ललिता
आखिर एक औरत थी और वह भी निपट अकेली, उस का दिल भी पिघल ही गया. ललिता और नितिन की शादी नहीं हुई थी पर वे दोनों अब पतिपत्नी की तरह ही रहने लगे थे.
ललिता का पूरा वेतन अब नितिन की जेब में जाता था. श्रेया और आर्यन अपने पापा और ललिता की चुहलबाजी देख कर अंदर ही अंदर चिढ़ते रहते थे. एक दिन तो हद हो गई जब नितिन और ललिता बेशर्मी की सारी सीमा लांघते हुए बच्चों के सामने ही कमरे में बंद हो गए.

ललिता के हौस्पिटल जाने के बाद आर्यन और श्रेया ने नितिन को आङे हाथों ले लिया था. आर्यन बोला,”पापा, आप को शर्म नहीं आती, मम्मी को अभी गए हुए 2 माह भी नहीं हुए हैं…”

नितिन गुस्से में बोला,”क्या तुम्हारी मम्मी के जाने के बाद मुझे अकेलापन नहीं लगता है? ललिता मेरी बहुत
अच्छी दोस्त है. उसी के कारण हमें यह रोटी नसीब हो रही है. तुम लोगों को अच्छा नहीं लगता तो जहां जाना चाहते हो चले जाओ. और फिर बेटा, मैं कोई ललिता आंटी को तुम्हारी मम्मी की जगह थोड़े ही दूंगा, वह बस हमारे यहां रह रही हैं और रहने का किराया दे रही हैं.”

दोनों बच्चे उस दिन अपनी मम्मी को याद कर के रोते रहे. नानानानी से तो कोई मतलब नहीं था और दादा के
जाने के बाद दादी ने भी चाचा के डर से रिश्ता खत्म कर दिया था.

देखते ही देखते 1 साल बीत गया. अब ललिता नितिन पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी. नितिन एक शातिर खिलाड़ी था. उस ने ललिता को यह कह कर चुप करा दिया था कि उस के बच्चे उसे छोड़ कर चले जाएंगे और वह उन के बिना नहीं रह पाएगा.”

ललिता गुस्से में बोली,”ठीक है तो मैं चली जाती हूं. नितिन ललिता को बांहों में भरते हुए बोला,”मैं आत्महत्या कर लूंगा, अगर तुम ने मुझे छोड़ने की बात भी सोची.”

3 साल हो गए थे. ललिता आत्मनिर्भर और आकर्षक थी पर नितिन उस का मानसिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से शोषण कर रहा था. पर अब ललिता चाह कर भी इस जाल से निकल नहीं पा रही थी. नितिन के झूठ को भी वह सच मान कर जी रही थी. कम से कम सोनल के पास उस के 2 बच्चे तो थे पर ललिता के तो इस रिश्ते में…

ललिता पिछले 3 सालों में 2 बार गर्भपात करा चुकी थी. ललिता अकेली थी पर अपने अकेलेपन को भरने के लिए उस ने गलत साथी चुन लिया था.

उधर नितिन बेहद खुश था कि वह किसी भी कीमत पर शादी कर के एक और बच्चे का खर्च नहीं बढ़ाना चाहता था. वह खुश था कि अब उसे पूरी आजादी थी और साथ ही ललिता के ऊपर हक भी था. स्वार्थ में
नितिन को ना ललिता का खयाल था और न ही बच्चों की फिक्र थी. ललिता सोच रही थी कि कोरोना ने सोनल की तो जिंदगी छीन ली थी पर उसे जीतीजागती लाश बना दिया था.
श्रेया, आर्यन और ललिता तीनों ही एक त्रिकोण में ना चाहते हुए भी बंधे हुए थे और इस त्रिकोण के हर
कोण को नितिन अपने हिसाब से घटता या बढ़ाता रहता था.

फिल्म समीक्षाः एन एक्शन हीरो- आयुष्मान खुराना की अविश्वसनीय कहानी

रेटिंगः दो स्टार

निर्माताः आनंद एल राय व टीसीरीज

निर्देशकः अनिरूद्ध अय्यर

कलाकारः आयुष्मान खुराना, जयदीप अहलावत,हर्ष छाया, मिराबेल स्टुअर्ट, रचित जोडाॅन, अलेक्झेंडर गर्सिया,अमरो

मोहम्मद, हितेन पटेल,मो.  तालिब, जॉन बायरन, गौरव कंडोई,जीतेंद्र राय,टाइगर रूड व अन्य.  

अवधिः दो घंटे दस मिनट

‘तनु वेड्स मनु’ व ‘रांझणा’ जैसी कुछ बेहतरीन फिल्मों के निर्देशक व ‘निल बटे सन्नाटा’ जैसी फिल्म के निर्माता आनंद एल राय अब बतौर निर्माता फिल्म‘एन एक्शन हीरो’लेकर आए हैं,जिसका निर्देशन अनिरूद्ध अय्यर ने किया है.

कहानीः

कहानी के केंद्र में देश का मशहूर व घमंडी एक्शन हीरो मानव ( आयुष्मान खुराना) है,जिसे लोगों को इंतजार कराने में आनंद आता है.  वह लोगों को इंतजार कराकर अपनी शोहरत को नापता रहता है.  एक फिल्म की शूटिंग के लिए हरियाणा जाते समय एअरपोर्ट पर अंडरवल्र्ड के खिलाफ बयानबाजी करता है.  हरियाणा में शूटिंग के लिए इजाजत दिलाने वाला स्थानीय गांव के निगम पार्षद भूरा सोलंकी (जयदीप अहलावत) का भाई विक्की सोलंकी शूटिंग के सेट पर मानव के साथ फोटो खिंचाने जाता है. मगर मानव शूटिंग में व्यस्त रहता है. पूरा दिन बीत जाता है.

 

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शूटिंग खत्म होने के बाद मानव अपनी नई मुस्टैंग कार में बैठकर ड्ाइव पर निकल जाता है,यह देख कर विक्की अपनी कार से उसका पीछा करता है. सुनसान जगह पर विक्की,मानव की कार को रोकता है. दोनों में बहस होती है और विक्की की मौत हो जाती है. मानव डर कर चार्टर्ड प्लेन से लंदन चला जाता है. भूरा सोलंकी भी अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए लंदन पहुंच जाता है. लंदन पहुॅचते ही भूरा ,मानव के घर पहुॅचता है. उस वक्त मानव घर पर नही होता,पर मानव की तलज्ञश में यूके पुलिस जब पहुॅचती है तो भूरा ,उन यूके पुलिस अफसरों को मौत के घाट उताकर इस बात का परिचय देता है कि वह कितना खतरनाक है.

इधर मानव अपने सेके्रटरी रोशन (हर्ष छाया) व वकील की मदद से खुद को सुरक्षित करने में लगा हुआ है.  पर हालात कुछ और हो जाते हैं. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. भारत मंे मानव के खिलाफ एक माहौल बन गया है. इधर जब भूरा व मानव आमने सामने होते हैं,तो भूरा,मानव को मार कर अने भाई की मौत की बजाय लड़ने ़की बात करता है.

पूरी फिल्म मंे दोेनो एक दूसरे को पछाड़ते या भागते नजर ओत हैं. अचानक अंडरवल्र्ड डाॅन मसूद अब्राहम काटकर आ जाता है,जो कि मानव को अपनी नवासी की शादी में नाचने के लिए विवश करता है. काटकर के अड्डे पर भूरा भी पहुॅच जाता है. काटकर,मानव के साथ तस्वीर खिंचवाकर वायरल कर देता है. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंत मे मानव हीरो बनकर भारत वापस लौटता है.

कहानी व निर्देशनः

फिल्म ‘एन एक्शन हीरो’ के निर्माता आनंद एल राय मशहूर निर्माता व निर्देशक हैं. उन्होने ‘तनु वेड्स मनु’,‘तनु वेड्स मनु रिर्टन’, ‘रांझणा’ जैसी फिल्में निर्देशित कर अपनी एक अलग पहचान बनायी. उसके बाद वह निर्देशन से तोबा कर सिर्फ निर्माता बन गए.  फिर ‘निल बटे सन्नाटा’,‘तुम्बाड़’जैसी बेहतरीन फिल्मों के अलावा ‘मेरी निम्मो’ जैसी कुछ घटिया फिल्मों का निर्माण कर खूब पैसा कमाया.

2018 में आनंद एल राय ने शाहरुख खान को लेकर फिल्म ‘जीरो’ निर्देशित की,जिसने बाक्स आफिस पर पानी तक नही मांागा.  जब आनंद एल राय ने मुझे बताया था कि वह शाहरुख खान को लेकर एक फिल्म निर्देशित करने जा रहे हैं,तभी मैने उनसे फिल्म की कहानी के आधार पर कहा था कि वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जा रहे हैं.  उस वक्त आनंद एल राय ने अपनी बातों से खुद को भगवान और दर्शकों की नब्ज को समझने वाला सबसे बड़ा फिल्मकार साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. पर हर कोई जानता है कि ‘जीरो’ अपनी लागत भी वसूल नही कर पायी.

यहीं से आनंद एल राय के बुरे दिनों की शुरूआत भी हो गयी थी. उसके बाद से उनकी किसी भी फिल्म को सफलता नही मिल रही है. लेकिन आनंद एल राय आज भी अहम के शिकार हैं. वह ख्ुाद को ही सबसे बड़ा समझदार इंसान समझते हैं. बतौर निर्माता अपनी नई फिल्म ‘एन एक्शन हीरो’ के प्रदर्शन से कुछ दिन पहले पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत के दौरान आनंद एल राय ने कहा था-‘‘हम फिल्में अच्छी बना रहे हैं, मगर दर्शक हमसे नाराज चल रहा है.

’’बहरहाल,फिल्म ‘एन एक्शन हीरो’ की कहानी भी एक अति घमंडी अभिनेता की है,जो कि बेसिर पैर के काम करता है. पर फिल्म में उसे विजेता दिखा दिया गया है. मगर हकीकत में इस फिल्म से बतौर निर्माता आनंद एल राय के विजेता बनकर उभरने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती. फिल्म के निर्देशक व कहानीकार अनिरूद्ध अय्यर एक बेसिरपैर की कहानी वाली फिल्म ‘एन एक्शन हीरो’ लेकर आए हैं.

फिल्म की कहानी व पटकथा दोेनों गड़बड़ है. हर मशहूर अभिनेता अपनी नई कार की डिलिवरी अपने शहर में लेता है,किसी गांव मंे नहीं और हर हीरो जहां भी जाता है, उसके साथ अब बाउंसरों की टोली होती है. मगर यह बात फिल्म के निर्माता,निर्देशक व लेखक को पता ही नही है.

एक सफल फिल्म कलाकार,जिसके पास भारत व लंदन में अपने आलीशान मकान व अकूट संपत्ति हो,तो उसके संबंध बड़े बड़े लोगों तक होते हैं. फिर भी दुर्घटना वष विक्की की मौत होेने पर मानव सीधे चार्टर्ड प्लेन पकड़कर लंदन भागता है. फिल्मकार ने लंदन की पुलिस को भी घटिया दिखा दिया. पुलिस कमिश्नर अपने आफिस में बैठकर सीसीटीवी पर सब कुद देखते रहते हैं. फिर भी अंडरवल्र्ड डाॅन काटकर के आदमी खुलेआम मानव को बीच सड़क से उठा ले जाते हैं.

 

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हरियाणा के गांव में रहने वाला जाट भूरा सोलंकी लंदन पहुॅचकर मानव के घर में यू के पुलिस वालों की हत्या कर घूमता रहता है,उसे पुलिस पकड़ती नही. पूरी फिल्म इसी तरह के अविश्वसनीय घटनाक्रमों से भरी हुई है.  मानव लंदन भगते समय मास्क पहनकर चेहरा नही छिपाता और कोई उसे पहचान नही पाता.

अभिनेता अक्षय कुमार प्लेन मंे मानव से मिलते हैं और कहते है कि वह किसी को न बताए कि प्लेन में अक्षय मिले थे.  वाह क्या पटकथा है. भारत में ऐसा कौन सा एक्शन हीरो है,जो अपनी निजी जिंदगी में भी एक्शन के कारनामंे करता हो,पर एक्शन सुपर स्टार मानव तो निजी जिंदगी में भी एक्शन मंे माहिर है. वाह क्या सोच है निर्माता,निर्देशक व लेखक की.

फिल्म में संजीदगी तो कहीं है ही नही.  मीडिया को मसखरा,भारतीय पुलिस इतनी निकम्मी है कि वह निगम पार्षद के इषारे पर उसके घर में बिना वस्त्र खड़े रहते हैं.  अंडरवल्र्ड डाॅन जिसके पास भारत का राॅ विभाग तीस वर्षों से नही पहुॅच पाया,उस तक भूरा आसानी से पहुॅच जाता है. फिल्मकार तो न्यायपालिका का मजाक उड़ाने से भी नहीं चूके.   फिल्म में इमोशन तो कहीं नजर ही नही आता. विक्की की मौत के बाद उसके भाई भूरा या परिवार के किसी सदस्य का दुःख नजर नही आता.  रिष्ते तो है ही नहीं. मानव भी अपने सेक्रेटरी व मैनेजर रोशन के अलावा पूरी फिल्म में किसी को फोन नही करता.

अभिनयः

मानव के किरदार को निभाने के लिए आयुष्मान ख्रुराना ने अपनी तरफ से कड़ी मेहनत की है.  पर सच यह है इस किरदार में वह फिट नही बैठते.  जयदीप अहलावत का अभिनय भी काफी मोनोटोनस नजर आता है. हर्ष छाया जरुर अपने अभिनय की छाप छोड़ जाते हैं.

महुए की खुशबू – भाग 2

चाय की तलब बड़ी ज़ोर से उठ रही थी. पास खड़े एक बुजुर्ग से इच्छा बताई और वे पता नहीं कहां से एक पीतल के लोटे में चाय भर लाए और बहुत आग्रह से ग्रहण करने को कहने लगे.

उन से बोला कि मुझे स्कूल ले चलो, तो वे बड़ी खुशी से चल पड़े. छोटा सा गांव एकमुश्त ही दिख गया. दो मिनट बाद ही वे बोले, ‘जेई है तुमाओ इस्कूल.’  मुझे कुछ समझ नहीं आया कि किस घर की तरफ इशारा किया.  वे और आगे बढ़े. दो झोपड़ियों के बीच से रास्ता था जो आगे हाते में खुल गया. खपरैल वाले 2 जीर्णशीर्ण कमरे में दरवाज़े थे जिन में पल्ले नहीं थे. खिड़कियों के नाम पर दीवार में छेद भर थे. आगे बरामदा था. न तो वहां पेड़ था न ही हैंडपंप और न ही कोई घंटा लटका था.

“प्राइ…री पाठ ..ला , ..टका पु ..” पीले बैकग्राउंड पर काले रंग से पहले कभी पूरा नाम लिखा गया होगा, पर अब इतना ही बचा था. वक़्त के साथ कुछ अक्षर मिट गए, कुछ शायद बजट की भेंट चढ़ गए. क्लासरूम में कटीफटी दरियां पड़ी थीं. दीवार पर ब्लैकबोर्ड था ज़रूर, पर उस का काला रंग दीवार का सफेद चूना खा गया था. अब यह ब्लैक एंड व्हाइट बोर्ड बन गया था.

एक कमरे पर ताला था, शायद, औफिस होगा. बुजुर्ग ने गर्व से कहा, “देखो माटसाब, कितेक नीक है जे इस्कूल बीसबाइस बच्चा आत पढबे ख़ातिर. दुई माटसाब और हैं. अब आप तीसरे हो गए. आराम से कट जे इते.”

11 बज रहे थे, गरमी तेज़ थी और स्कूल में सन्नाटा पसरा था. तभी एक कुत्ता क्लास से निकल कर मुझे घूरने लगा और अनजान देख गुर्राने भी लगा. बुजुर्ग के पत्थर उठाने की ऐक्टिंग करते ही वह भाग गया, अनुभवी था.

“चाचा, बाकी स्टाफ़ कहां हैं, बुलवाइए ज़रा, मुझे रिपोर्ट करना है ड्यूटी पर.” मुझे यह वातावरण असहनीय लग रहा था, पाठशाला ऐसी भी हो सकती है. इस बीच बुजुर्ग हंस कर बोले, “आइए मेरे साथ, आप को गांव दिखाते हैं.”  मैं बेमन से चल पड़ा.

कुछ खुले में आ कर उन्होंने उंगली से इशारा किया और मैं ने उस दिशा में देखा, खेतों में कटाईमड़ाई चल रही थी. सारा गांव ही वहां जमा था. लोगलुगाई, बड़ेबूढ़े. गांव इस समय बहुत व्यस्त था. यह भी पता चला कि दोनों सहशिक्षक भी इसी भीड़ का हिस्सा थे.

मैं ढूंढ रहा था कि स्कूल के बच्चे कहां थे. बुजुर्ग से पूछा, तो उन का जवाब सुन कर चकित रह गया. वे बोले, “बच्चे महुआ बीनने गए हैं. गांव के जमींदार के हाते में महुआ के कई पेड़ इस समय फूलों से लदे पड़े थे. सवेरे से फूलों की बिछायत बिछ जाती है और बच्चे उन्हीं पेड़ों के नीचे काम पर लग जाते हैं.”

यह भी  बताया गया कि उन पेड़ों के मालिक-जमींदार  ऊंची जाति के थे. गांव का कोई आदमी हाते में घुसने की भी हिम्मत नहीं कर सकता था. फूल उठाना तो दूर की बात. फिर बच्चे कैसे घुस आते थे? मेरा प्रश्न जायज था. पता चला कि जमींदार का मानस कहता है कि बच्चों की जाति नहीं होती, यानी, वे पवित्र होते हैं.

जमींदार की कोई औलाद नहीं थी शायद, इसलिए उस की भावनाओं ने धर्म को अपने हिसाब से परिभाषित कर दिया था. अंतिम सवाल था कि बच्चे महुए का करेंगे क्या? बुजुर्गवार ने मेरी यह जिज्ञासा भी शांत कर दी, “माटसाब, महुआ की शराब भट्टी लगी है गांव के बाहर. बच्चे  फूल बीन कर निहोरे को दे आते हैं और वह उस की देसी शराब खींचता है. बदले में, बच्चों को रेवड़ी मिलती है.”  मतलब वे यह भी बता गए कि गांव में नशेड़ियों की कमी नहीं थी, जो मेरे लिए एक और बुरी खबर भी थी.

गरीबी में यह नशा मिल जाए, तो घर, बकरी, खेत बिकवा दे, बच्चो की पढ़ाईलिखाई का नंबर तो बाद में आता. मुझे कुछ सोचता देख बुजुर्ग मुसकराए, “वह तो सुधा बहन जी लगी हैं गांव सुधारने में, वरना यह गांव तो कब का शराब की भट्ठी में जल, डूब जाता.”

सुधा बहनजी…मेरे चेहरे पर प्रश्न देख वे बोले, “माटसाब, यह समझिए कि ऊपर वाले ने ही बहनजी को भेजा. वखत पर हम मिलवा देंगे नहीं तो वे खुद्दई फेरा मारती रहती हैं. हो सकता है आप के आने की ख़बर उन को मिल भी चुकी हो. आसपास के गांवों के लोगलुगाई उन्हें ख़ूब जानते व मानते हैं.”  मुझे लगा जैसे गांव में कोई तो एक चेतनापुंज था.

बहनजी आसपास की  होंगी और खबर लग गई, मतलब, उन का अपना सूचनातंत्र भी विकसित लग रहा था और उन की अपनी एक साख भी गांव में थी, यह भी स्पष्ट हो गया था.

इतनी भद्दर जगह में गांव के लोगों की भलाई के लिए सोचने वाली बहनजी से मिल कर अपने स्कूल के लिए क्याक्या किया जा सकता है, मैं इन विचारों में खोया हुआ उस कमरे पर आ गया जिस में मेरा सामान रखवा दिया गया था. एकडेढ़ दिन की रोटी, अचार, सब्ज़ी का राशन साथ लाया था, वह काम आ गया.

मालिक मकान ने खुले में खटिया डाल कर गद्दा फैला दिया था और पास एक घड़ा व कुल्हड़ भी धर दिया था. गरमी की रातों में तारोंभरा खुला आकाश, चांद, टूटते तारे और स्पुतनिक को आतेजाते देखना मेरे लिए स्वप्निल अनुभव था. चारों तरफ़ से कभी सियार, तो कभी गीदड़ व उल्लू, तो कभी न जाने किस पशु की आवाज़ मेरे कानों में पड़ती रहीं और मैं ठीक से सो नहीं पाया. एक कहावत सुनी थी कि गांव की सुबह और शाम जितनी चित्ताकर्षक होती है उतनी ही दोपहर और रात डरावनी. उस कहावत को सच होते देख रहा था.

Bigg Boss 16: #Priyankit की लव स्टोरी में दरार, एक्ट्रेस ने मुंह पर फेंका कीचड़

बिग बॉस 16 इन दिनों हर साल की तरह टॉप पर चल रहा है, सलमान खान के विवादित शो में हर दिन नए टिवस्ट सामने आ रहे है. हालिया, एपिसोड़ में एक टास्क के दौरान निमृत कौर और शालीन भनोट लड़ते हुए नज़र आए थे. इस दौरान निमृत ने शालीन को जमकर खरी-खोटी सुनाई थी. वही लड़ाई खत्म होने के बाद निमृत भावुक हो उठी थी और फूट-फूट कर रोने लग जाती थी. फिलहाल दोनों के बीच अब सब ठीक है.

आपको बता दे, कि बिग बॉस16 का एक प्रोमो वीडियो सामने आया है जो कि सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. इस वीडियो में देखा जा रहा है कि प्रियंका और अंकित के बीच लड़ाई हो रही है. दोनो लव कपल के बीच किसी बात को लेकर झड़प हो गई.जिसके बाद प्रिंयका ने अंकित के मुंह पर कीचड फेंक मारा.

 

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ये प्रोमो वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया है, वही बिग बॉस के अपकमिंग शो में घरवालों को एक टास्क देंगे. जिसमें कंटेस्टेंट एक-दूसरे के बारें में खुलासा करेंगे. इस टास्क के दौरान, अंकित, प्रिंयका के बारें में ऐसी बात कह देंगे कि एक्ट्रेस का पारा हाई हो जाएगा. इसके बाद वो अंकित के मुंहपर कीचड़ फेंक देगी. इस किल्प को देखने के बाद फैंस काफी निराश है कि दोनो कपल के बीच में दरार आ गई है.इस प्रोमो को देखने के बाद फैंस अब इसके अपकमिंग एपिसोड का इंतजार कर रहे है.

 

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शाली भनोट और अर्चना गौतम के बीच भी हुई लड़ाई

बीते दिनों शालीन भनोट और अर्चना गौतम के बीच में किसी बात को लेकर लड़ाई हुई थी.दरअसल, अर्चना, शालीन को किचन में सफाई करने के लिए कहती है , इसके बाद ही अर्चना, शालीन पर बुरी तरह भड़क जाती है. जिसके बाद दोनों के बीच जमकर विवाद होता है. इतना ही नहीं, शालीन, अर्चना को गंदी औरत तक कह देते है.

अनुपमा और डिंपल को गुंडो ने घेरा, शाह परिवार में कदम रखेंगी पाखी

अनुपमा शो हर बार की तरह ही टीआरपी के रेस में शामिल है. स्टार प्लस का धमाकेदार शो अनुपमा में हर दिन नए मोड़ आ रहे है, वही, रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर शो में नए टिवस्ट को लेकर फैंस काफी उत्सुक है.शो मीडिया की लाइमलाइट में बना हुआ है. जी हां, बीते दिन अनुपमा शों में दिखाया गया था कि अनुपमा और डिंपल गुंडो की पहचान के लिए पुलिस थाने जाती है. वही, डिंपल आरोपी को थप्पड़ और लात मारती है.

आपको बता दें, कि अनुपमा डिपंल को अपनी डांस अकेडमी में नौकरी तक दे देती है, लेकिन रुपाली गागुंली स्टारर अनुपमा में आने वाले मोड़ यही खत्म नहीं होते है. शो में आगे दिखाया गया कि अनुपमा डिंपल को अपने साथ शाह हाउस लेकर जाती है जहा पाखी उसके सामने आ जाती है और सभी आस-पडोस के सामने कहती है कि मेरी मां को दूसरी बेटिंयों की चिंत है, लेकिन अपनी नहीं.वही, जब अनुपमा उसका हाल-चाल पूछने उसके घर जाती है तो वहां. वो अपनी ही मां को आंटी कह पुकारती है, साथ ही कहती है कि “आज तक आपने मां वाली कोई भी काम किया है”

 

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अनुपमा में आगे दिखाया जाएगा कि गुंडो अग्रिम जमानत मिल जाएगी. ये बात पुलिस ऑफिसर अनुज को बताते है, जिससे वह परेशान हो जाता है और डिपंल व अनुपमा को ढूंढने के लिए निकल पड़ते है. वही, अनुपमा और डिंपल डांस अकेडमी की तरफ जा रहे होते है लेकिन, तभी रास्ते में वो गुड़े फिर से वापस  जाते है और डिंपल व अनुपमा को परेशान करना शुरु कर देते है. और आसपास के लोग तमाशा देखने लग जाते है उनकी कोई मद नहीं करता है.

 

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शाह परिवार में दोबारा गई पाखी

शो यही खत्म नहीं होता है शो में आगे दिखाया जाता है कि अनुपमा, डिंपल को अपने साथ शाह हाउस ले आती है और बापूजी उसे अंदर ले जाने के लिए कहते है, ये सब देखकर पाखी कहने लगती है कि “डिंपल के लिए दोनों घर के रास्ते खुले हुए है और मेरे लिए एक भी नहीं, वही वनराज से कहती है मैं उन लोगों के लिए आसान टार्गेट हूं और मम्मी से बदला लेने के लिए वे मुझे नुकसान पंहुचा सकते है.”

शादी के बाद घर बना जेल खाना

शादी के बाद अगर पत्नी को घर में घुटन होने लगे और पति को एहसास न हो या कुछ न करे तो पत्नी के पास सिवाए बिमार पडऩे के कोई छुटकारा का उपाय नहीं रहता. जिन घरों में पतिपत्नी के प्रति बेहद बेरुखी अपनाता है वहां औरतें तनाव में रहती हैं, उन्हें बारबार डाक्टरों के पास जाना पड़ता है, पतिपत्नी में लड़ाई होती है, और अन्य कोई विकल्प न होने की वजह से पत्नी का घर जेल लगने लगता है.

यह स्थिति खतरनाक होती है. कम संख्या में औरतें इस तरह के घुटन के लक्षण दिखाती है पर कितनों के होते होंगे इस का कुछ कहना आसान नहीं है.

इस का एक  बड़ा कारण है कि जब से परिवार छोटे हुए हैं, चाचा, ताऊ, मौसा, मामा नहीं रहने लगे हैं विवाहित औरतों को अनजानी लगती किट्टी फ्रैंड्स के अलावा किसी से संपर्क नहीं रहता. व्हाट्सएप और फेसबुक हैं पर उस पर अपना दर्द नहीं जाहिर कर सकते. किसी भी समस्या को हल करने का उपाय क्याक्या हो सकता है, यह ज्यादातर को मालूम ही नहीं होता.

अब बौडी शेङ्क्षपग के लिए जिम हैं. चेहरे की चमक के लिए पालर हैं, ढलते बदन को दोबारा जबान करने के कोसमेटिक डाक्टर हैं पर मानसिक धावों को ठीक करने के जो थोड़ेबहुत विशेषज्ञ हैं, वे अधकचरे हैं. वैसे भी वे केवल आप की बात सुन सकते हैं. कोई सलाह दे पाएं, कोई बना बनाया फार्मूला पकड़ा दें, यह संभव नहीं है.

जीवन जीने का पाठ असल में बचपन से सीखना होता है पर आज के कंपीटीशन वल्र्ड में दूसरे से बेहतर बनने के चक्कर में दूसरे से सीखने का रिवाज खत्म हो गया है. मातापिता बस घर और पैसा देने वाले एटीएम बन कर रह गए हैं. दोस्त लायक नहीं. वैसे भी वे खुद नहीं जानने कि क्या करना चाहिए क्योंकि पिछले 60-70 सालों से जीवन शिक्षा के नाम पर सिर्फ पूजापाठ करना सिखाया जा रहा है. लोग तो पर्यटन पर कम तीथ पर ज्यादा जाते हैं.

जीवन ली….. सैट की तरह होता है जिस में हजारों टुकड़े लगे होते हैं. उस की स्टेबिलिटी कहीं भी कोई खराब पति बिगाड़ सकता है. उस की जानकारी पहले से होनी जरूरी है पर उस की शिक्षा न किताबों से मिल रही है, न फिल्मों से, न पड़ोसियों से, न रिश्तेदारों से. दोस्त भी ईष्र्यालु हैं. तो कहां जाए. घुटें और सहें. इस का जो परिणाम हो रहा है वह अब दिख रहा है.

देश की उत्पादकता घट रही है. हम विभाजित हुए जा रहे हैं. अदालतों में मामले भर रहे हैं. पुलिस को बेबात के मामलों में पूनावाला और श्रद्धा जैसे मामलों में उलझाना पड़ रहा है. जो श्रद्धा के साथ हुआ किसी भी पत्नी के साथ हो सकता है हो रहा है, यह भी सब को मालूम है, पर ज्यादातर घावों को छिपाते घूमते है क्योंकि लोग, समाज, सरकार घाव पर मजाक उड़ाते है. मरहम नहीं लगाते, घाव न हो उस का पाठ नहीं पढ़ाते.

यादों के साए : क्या थी मां-बाप की ज़रुरत?

डोरबैल बजी. थके कदमों से नलिनी ने उठ कर देखा, रोज की तरह दूध वाला आया था. आज देखा तो उस का 15 साल का लड़का दूध देने आया था. एक चिंता की लकीर उस मासूम चेहरे पर झलक रही थी.

नलिनी आखिर पूछ ही बैठी, “क्या बात है, आज तुम्हारे पिताजी नही आए?”

“वो…वो…मैडम, कल रात अचानक पाप की तबीयत खराब हो गई, वे अस्पताल में भरती हैं. अब जब तक पापा ठीक नहीं हो जाते, रोज मैं ही दूध देने आऊंगा,” कह कर वह दूध देने लगा.

नलिनी के शरीर में अजीब सी उदासी की लहर दौड़ गई. वह गहरी सांस भर कर अंदर आ गई. अकेलेपन का नाग रहरह कर उसे डस रहा था. वह अपने पुराने दिनों को याद कर अकसर उदास रहती. वह चाय प्याले में ले कर और दूध गैस पर रख खिड़की के पास आ खड़ी हो गई. खिड़की से आते ठंडे झरोखों को अंतर्मन में महसूस करती नलिनी अतीत के साए में खो सी गई. उसे वो दिन याद आने लगे जब अस्पताल के चक्कर लगा कर नरेंद्र कभी थकते नहीं थे.

नलिनी की हंसी से घर हमेशा खिलखिलाहट से भरा रहता. जैसे कल ही कि बात हो नरेंद्र जैसे ही अस्पताल से घर आए, तो उन का उतरा चेहरा देख कर नलिनी घबरा गई. रिपोर्ट हाथ में पकड़े नरेंद्र ख़ामोशी से सोफे पर बैठ गए. उन की सांसों का वेग इतना तेज था, मानो वे अभीअभी मीलों दौड़ कर आ रहे हों.

नलिनी ने पानी का गिलास देते हुए पूछा, ‘क्या बात है, क्या लिखा है रिपोर्ट में, सब नौर्मल ही होगा, तुम भी न…?’

‘नहीं नलिनी, कुछ भी नौर्मल नहीं है.’

‘क्या कहा डाक्टर ने, रिपोर्ट क्या कहती हैं? बताओ न प्लीज़?’

‘थोड़ा दम तो लेने दो, कहां भागा जा रहा हूं,’ निस्तेज सी सांस छोड़ते हुए नरेंद्र ने कहा, ‘नलिनी, क्या तुम्हारा दर्द बढ़ता जा रहा है?’

नलिनी चहकती हुई बोली, ‘नहीं तो, आप यों क्यों पूछ रहे हैं?’

लिफाफे से रिपोर्ट निकाल कर टेबल पर पड़े चश्मे की धूल पोंछते हुए नरेंद्र रिपोर्ट को ध्यान से नजर डाल कर उदास आंखों से नलिनी को देखते हुए कहते हैं, ‘नलिनी, तुम्हें ब्रेस्ट कैंसर है. और जल्दी ही इसे रिमूव करवाना होगा, वरना पूरे शरीर में इस के बैक्टीरिया फैलने के चांस हैं.’

‘क्या..??’

नलिनी के चेहरे पर आई चिंता की लकीरें साफ बयां कर रही थीं कि वह अपने लिए चिंतित नहीं है. उम्र का पड़ाव उस की परीक्षा ले रहा था. नरेंद्र को हार्ट प्रौब्लम थी. पिछले साल ही औपरेशन करवाया था. उन को पेसमेकर लगवाया था. डाक्टर ने आराम करने की सलाह दी थी. ऊपर से खानपान का परहेज भी चल रहा था. बड़ी मुश्किलों से तो वह अपनेआप को योगा वौक के जरिए स्वस्थ रखना चाहती थी ताकि नरेंद्र की देखभाल अच्छे से हो सके.

विनय तो आज से 7 साल पहले ही लंदन में सैट हो गया था. व्हाट्सऐप और वीडियोकौल के जरिए क्या यहां की समस्याएं हल हो सकती हैं, उम्र के ढलते दोनों के शरीर बीमार हो गए. यह सोच कर नलिनी वहीं कुरसी पर जड़ हो गई. दोनों एकदूसरे को देख रहे थे. कुछ देर के लिए यों ही मौन ने अपना आतंक जमा लिया था.

कुछ देर में नरेंद्र ने मौन तोड़ा, ‘इस तरह घबरा कर काम नहीं चलेगा, नलिनी. हमें अपने बचे हुए लमहों को खुद ही संभालना होगा. मैं कल ही तुम्हारे औपरेशन करने की बात कर आया हूं. आज ही सारे काम निबटा लो. मैं ने ग्रेच्युटी में से पैसे भी निकाल लिए हैं. खर्चे का कुछ कहा नहीं जा सकता,’ हांफतेहांफते एक ही सांस में नरेंद्र और न जाने क्याक्या कह गए.

नलिनी को कुछ सुनाई ही नहीं दिया. वह रात होने का इंतजार करने लगी. उसे विनय से बात करनी थी.

नलिनी को उदास देख कर नरेंद्र ने वहां पड़ी एक कैसेट लगा दी. गीत बज रहा था, ‘कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन…’ अचानक उन्हें लगा कि इस गीत को सुन कर नलिनी और परेशान हो जाएगी, तभी वहां पड़ी एक नई फिल्म की कैसेट उस में डाली तो गाना बज उठा- ‘ओ मेरी छम्मक छल्लो…’ यह गाना सुनते ही नलिनी के चहरे पर स्मित मुसकान उभर आई.

विनय को जब पता चला, उस ने कहा, ‘पापा के इलाज के लिए अभी पिछले साल ही तो 20 लाख रुपए के आसपास खर्चा हो चुका है.’ और अब मां की बीमारी सुन कर वह कुछ ज्यादा न बोल सका, ‘मां, आप खर्चा बता दो, मैं भेज दूंगा.’

नरेंद्र पास बैठे उस की बातें सुन रहे थे. रिश्तों से बढ़ कर तो पैसा है. यदि पैसा नहीं होता, तो शायद आज मैं जीवित ही न होता. कुछ देर बात कर नलिनी ने राहत की सांस ली.

नलिनी का औपरेशन सक्सैस हुआ. लेकिन नरेंद्र की इस उम्र में अकेले ही भागदौड़ ज्यादा हो चुकी थी. जब रूम में शिफ्ट किया तो नलिनी से ज्यादा नरेंद्र ही थके लग रहे थे. नर्स ने आ कर कहा कि बाबूजी अब घबराने की कोई बात नहीं, आप के साथ कोई है क्या? कुछ दवाएं मंगवानी हैं, ये दवाएं इमरजैंसी हैं, प्लीज जल्दी ले आइए.

नरेंद्र की शारीरिक क्षमता भी अब दम तोड़ चुकी थी. गहरी सांस ले कर वे खांसने लगे. तभी वहां का वार्ड बौय आया. उसे नरेंद्र की हालत पर तरस आया, बोला, ‘बाबूजी, आप माताजी के पास बैठिए, मैं आप को दवाई ला कर देता हूं. मगर यहां किसी से कहिएगा मत, हमें ड्यूटी पर दूसरे काम करने की अनुमति नहीं है.’

नरेंद्र संतोष की सांस ले कर नलिनी के पास बैठे रहे.

नलिनी ठीक हो चुकी थी. उसे हर 15 दिन में कीमो के लिए जाना पड़ता था. उस के बाद उसे दोचार दिनों की कमजोरी का सामना करना पड़ता था. नरेंद्र ने उस की देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ी थी.

कुछ दिनों बाद रात को नरेंद्र की तबीयत अचानक बिगड़ गई. वे नलिनी का साथ छोड़ गए. नलिनी इस सदमे को सहन नहीं कर पा रही थी. धीरेधीरे अकेलेपन से उस की हालत गिर रही थी. विनय ने आ कर अपना पुत्रधर्म निभा दिया था. कुछ महीनों के लिए मां को साथ ले गया था. लेकिन नलिनी को वहां का हवापानी रास नहीं आ रहा था. एक कैदी की भ्रांति जीवन व्यतीत हो रहा था.

नलिनी वापस अपने घर आ गई. उस छोटे से घर में नरेंद्र के साथ बीते दिनों की यादें उसे बहुत सुकून दे रही थीं. उसे प्रतीत हो रहा था जैसे वह अपनी पुरानी दुनिया में वापस आ गई हो, अकेलेपन ने नलिनी को जीना सिखा दिया था. बेटा परिदों की तरह परदेश उड़ चुका था. उस के वापस आने की उम्मीद के दीये का तेल अब धीरेधीरे कम होता जा रहा था. उस ने कभी सोचा नहीं था कि जिंदगी कभी इस मोड़ पर ला कर अकेला छोड़ देगी.

आज वह दूध वाले के बेटे को देख मन में उपजे विचारों के नन्हे कपोलो को खिलते देख सोच रही थी, काश, हम ने भी अपने बच्चों को बड़े सपने न दिखाए होते. लेकिन यह भी सच था कि बच्चे जब बड़े हो कर स्वनिर्णय लेने लगते हैं तो मांबाप उस घर के किसी स्टोररूम के दरवाजे की तरह हो जाते हैं जो सारा समय बंद रहते हैं, जरूरत पड़ने पर ही खुलते हैं.

चाय का कप ले कर नलिनी चाय पीने लगी. उसे याद ही नहीं रहा, गैस पर रखा दूध उफन चुका था. उस ने जल्दी से गैस बंद की. अब उस के विचारों का सैलाब भी थम चुका था. कैसेट लगाई तो वही आखरी गीत बज उठा- ‘ओ मेरी छम्मक छल्लो…’ यह गीत सुन वह मुसकराती हुई बालकनी से आती सुबह की हवा का आनंद लेने लगी. आखिर, उसे अब जीना आ गया था.

विचित्र मांग- संजीव ने अमिता के सामने क्या शर्त रखी थी

“अमिता, एक बात मेरे मन में है, कहूं?” संजीव ने अमिता के होठों पर चुंबन अंकित करते हुए कहा.

“तुम तो मना करते हो इन क्षणों में कुछ बात करने को. इन क्षणों में सिर्फ और सिर्फ ऐसी ही बातें करने के लिए कहते हो,” अमिता ने शोखी से संजीव के पीठ पर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए कहा.

“इन क्षणों में जो बातें करने के लिए कहता हूं वही बात है,” संजीव ने कहा.

“कहो,” अमिता ने संजीव को चूमते हुए कहा.

“हम दो के अलावा कोई तीसरा हो तो कैसा रहे…? काफी मजा आएगा. मेरी दिली ख्वाइश है इस की.”

“छीः, कैसी बातें कर रहे हो? मुझे तो शादी के पहले यह सब करना ही उचित नहीं लगता. सिर्फ तुम्हारे कहने से मैं तैयार हो जाती हूं,” अमिता ने कहा.

“तीसरे के जगह पर कोई तीसरी भी हो तो चलेगा. तुम्हारी कोई फ्रेंड हो तो उस से बातें कर सकती हो,” संजीव ने कहा.

अमिता संजीव की बातों से विस्मित हो गई. उसे इस तरह की बात की जरा भी आशा नहीं थी.

वह संजीव के साथ लगभग दो वर्षों से रिलेशनशिप में रह रही थी. वह संजीव से प्यार करती थी और संजीव भी उस से बेइंतिहा प्यार करता था. दोनों शादी करने का विचार रखते थे. शादी के बारे में उन दोनों ने प्लानिंग भी कर रखी थी.
शायद अति उत्साह में आ कर संजीव ने ऐसी बात कह दी थी. यह सोच कर अमिता ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था.

पर, दूसरे दिन उस ने फिर उस से पूछा, “अमिता वो तीन वाली बात पर तुम ने कुछ विचार किया? कहो तो मैं अपने मित्र जीवन से बात करूं.”

“नहीं संजीव. मुझे यह बिलकुल भी पसंद नहीं है. यह मेरे मूल्यों के खिलाफ है,” अमिता ने कहा.

“कम औन अमिता. क्या तुम भी दकियानूसी बातें कर रही हो…? हम आधुनिक समाज में रह रहे हैं. सैक्स भी एक मनोरंजन है. इस का आनंद उठाने में क्या हर्ज है. तुम चाहो तो सपना से बात कर लो. वह तुम्हारे साथ काफी घुलीमिली भी है. मुझे थ्रीसम का कांसेप्ट बहुत भाता है. यह मेरे वर्षों की तमन्ना है. प्लीज अमिता,”
संजीव ने अमिता को समझाने की कोशिश की.

“बिलकुल नहीं,” अमिता ने कहा.

अमिता काफी उलझन में पड़ गई. संजीव से वह प्यार करती थी. उस से शादी करना चाहती थी. उस के कहने पर वह कभीकभार उस के साथ शारीरिक संबंध भी बना लिया करती थी. पर उस की नई मांग अजब थी. यह अमिता के नैतिक मूल्यों के खिलाफ था. उस के नैतिक मूल्यों के खिलाफ तो शादी के पहले शारीरिक संबंध बनाना भी था. पर सुरक्षात्मक उपाय अपना कर ऐसा वह सिर्फ अपने प्रेमी संजीव के साथ कर सकती थी. और संजीव अब किसी और को भी इस में शामिल करना चाहता था. यहां तक कि कोई लड़की भी हो तो उसे स्वीकार्य था. पहले उसे लगा कि उत्तेजना में उस ने ऐसा कह दिया है. परंतु पिछले कई महीनों से वह इस बात पर जोर दे रहा था. खासकर अंतरंग क्षणों में वह जरूर इस मुद्दे को उठा देता था.

क्या करे उस की समझ में नहीं आ रहा था. वैसे, हर बार उस की इस मांग पर उस ने अपनी असहमति जताई थी. कई बार वह उस के स्थान पर खुद को रख कर उस की मांग के औचित्य को समझने की कोशिश करती थी. उसे यह आइडिया बिलकुल भी पसंद नहीं था. फिर यदि ऐसा करने के लिए वह राजी हो जाती है तो जो तीसरा या तीसरी होगा या होगी, उस के साथ कैसा रिश्ता बनेगा. संजीव हमेशा उसे ओपेन माइंडेड होने की सलाह देता था. पर ओपेन माइंडेड होने का यह मतलब तो नहीं कि नैतिक मूल्यों को ताक पर रख दिया जाए. जो लोग ऐसे कृत्य में खुद को सहज पाते हैं, वे भले ही ऐसा करें. पर वह इस के लिए सहज नहीं हो पा रही थी.

एक दिन वह बैठी अखबार के पन्ने पलट रही थी कि एक स्तंभ पर उस की निगाह गई. इस में पाठक अपनी प्रेम से संबंधित समस्याओं की सलाह विशेषज्ञ से लेते थे. एक बड़ी ही विचित्र समस्या इस में उस ने पढ़ी. इस में एक लड़की ने अपने प्रेमी की कम आय होने के कारण आत्महीनता की भावना से ग्रसित होने के कारण सलाह मांगी थी. विशेषज्ञ ने बड़ा ही व्यावहारिक सुझाव दिया था. उसे उस का सुझाव बहुत ही अच्छा लगा था. उस ने देखा, स्तंभ के नीचे एक ईमेल पता दिया हुआ था और स्पष्ट आमंत्रण था पाठकों से शारीरिक और प्रेम से संबंधित समस्या का हल पाने के लिए.

उस ने ईमेल पता नोट किया और अपनी समस्या को विस्तार से लिख कर ईमेल कर दिया. अखबार औनलाइन उपलब्ध था. दूसरे दिन से ही प्रतिदिन वह अखबार को औनलाइन खोलती और उस कौलम को पढ़ने लगी. इस क्रम में अन्य कई लोगों की समस्याओं से वह रूबरू हुई. उसे आश्चर्य हुआ कि लोगों के पास अलगअलग तरह की समस्याएं हैं, कुछ तो बिलकुल ही विचित्र.

एक सप्ताह के बाद उस ने अपनी समस्या का समाधान अखबार में छपा पाया. समाधान कुछ इस प्रकार था-
“आप का बौयफ्रेंड आप से बहुतकुछ चाह सकता है. लेकिन आप को देखना है कि आप किस बात में सहज हैं. सही रिलेशनशिप वही है, जिस में दोनों पक्ष एकदूसरे का सम्मान करें. आप के बौयफ्रेंड को उस सीमा को मानना चाहिए, जो आप ने अपने लिए और उस के साथ अपने भविष्य के लिए तय कर रखा है. आप स्पष्ट रूप से उस से बात करें. उसे स्पष्ट रूप से बताएं कि आप उस की बात को क्यों नहीं मान सकतीं. ओपेन माइंडेड होने का मतलब यही है कि किसी भी मुद्दे के पक्ष और विपक्ष को समझा जाए और फिर उस पर सोचविचार कर सही निर्णय लिया जाए.”

अमिता को यह सुझाव पसंद आया. पहले उस ने विचार किया कि क्यों उसे उस का तिकड़ी वाला प्रस्ताव स्वीकार नहीं है. सब से पहले तो उस के मन में खयाल आया कि सैक्स सिर्फ दो पार्टनर के बीच होना चाहिए. तीसरा कोई भी बीच में नहीं आना चाहिए. यही कारण है कि सैक्स बिलकुल एकांत में किया जाता है. फिर यदि तीसरा या तीसरी को शामिल किया जाए तो आपसी संबंधों में दरार आ सकती है. हो सकता है कि उस के और संजीव में से कोई तीसरे की ओर आकर्षित हो जाए और फिर पूरा समीकरण बिगड़ जाए. पर ज्यादा महत्वपूर्ण उसे नैतिक आधार ही लगा.

अगली बार जब संजीव ने इस बारे में चर्चा की, तो उस ने स्पष्ट रूप से उसे अपना विचार बता दिया. साथ ही, यह भी बता दिया कि यदि उसे यह आइडिया आजमाना है, तो वह उस का साथ नहीं दे सकती. उसे डर था कि शायद संजीव नाराज हो कर उस का साथ छोड़ देगा. परंतु संजीव समझदार निकला. उस ने उस के तर्क को सुना और बात उस की समझ में आई. उस ने अपनी विचित्र मांग को तज कर अपनी प्रेमिका के साथ जीवन बिताने का निर्णय लिया.

बीच राह में : क्या डॉक्टर की हो पाई अनिता?

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आशा का दीप- भाग 2 : किस उलझन में थी वैभवी

‘‘हैलो विनोद, हाऊ आर यू?’’ प्रत्युत्तर में वैभवी का औपचारिकताभरा संबोधन सुन कर विनोद चौंका. उस ने गौर से सैलफोन की स्क्रीन पर नजर डाली, कहीं गलती से किसी और का नंबर तो प्रैस नहीं कर दिया था. प्यार से विक्की कह कर बुलाने वाली वैभवी उसे अपरिचित या गैर के समान संबोधन कर रही थी.

‘‘विनोद, परसों संडे है, आप पार्क व्यू होटल के ओपन रैस्टोरैंट में आ जाना,’’ कहते हुए वैभवी ने फोन काट दिया.

असमंजस में पड़ा विनोद हाथ में पकड़े सैलफोन को देख रहा था.

पार्क व्यू होटल के रैस्टौंरैंट को एक बड़े तालाब को सुधार कर पिकनिक स्पौट का रूप दिया गया था. कई बार दोनों वहां जा चुके थे.

आमनेसामने बैठ कर चप्पू चलाते किश्ती  झील के बीचोंबीच ला कर किश्ती रोक कर विनोद ने गंभीर स्वर में पूछा, ‘‘क्या बात है? इतनी सीरियस क्यों हो? तुम्हारा लहजा भी एकदम एब्नौर्मल है?’’

वैभवी ने अपने छोटे वैनिटी पर्स से एक लिफाफा निकाल कर बढ़ाया. एक बड़े अस्पताल का लिफाफा देख कर विनोद चौंका.

उस ने लिफाफा निकाला और उस में रखे कागजों को निकाल कर एक नजर डाली और प्रश्नवाचक नजरों से वैभवी की तरफ देखा.

‘‘विनोद, मु झे कैंसर है. मेरे वक्षस्थल में ट्यूमर है. मैं ब्रेस्ट कैंसर ग्रस्त हूं. आई एम सौरी,’’ कहते हुए वैभवी ने अपना चेहरा  झुका लिया. विनोद को ऐसा लगा जैसे किसी ने उस को ऊंची पहाड़ी के शिखर से नीचे की ओर की धक्का दे दिया हो.

वह भौचक्का सा कभी हाथ में पकड़े मैडिकल रिपोर्ट के कागजों को, कभी सामने बैठी अपनी मंगेतर, अपनी भावी पत्नी को देख रहा था. उस ने एक बार फिर सरसरी नजर मैडिकल रिपोर्ट पर डाली और कागज लिफाफे में डाल कर लिफाफा वैभवी की तरफ बढ़ा दिया. दोनों खामोश थे.

दोनों जानते थे कि ऐसे हालात में खामोशी ही ठीक है. थोड़ी देर बाद वैभवी ने चप्पू थामे और नाव को किनारे की तरफ धकेलना शुरू कर दिया.

किनारे पर किश्ती लगी. वैभवी उतरी. उस ने एक नजर अपने मंगेतर की तरफ डाली और फिर मुड़ कर स्थिर कदमों से बाहर चली गई.

विनोद उस को जाता देखता रहा. वह थोड़ा हकबकाया सा, थोड़ा लुटालुटा सा था. इस बदले हालात की वह क्या समीक्षा करे, क्या बोले.

यदि वैभवी ने कोई अन्य कारण बता कर शादी से मना कर दिया होता, रिश्ता तोड़ने की बात कही होती तब वह इस आघात को सहजता से  झेल लेता, मगर ऐसी स्थिति.

मात्र 10 दिन विवाह को बचे थे. भावी दुलहन में जानलेवा कैंसर की बीमारी के लक्षण उभर आए थे.

धीमे कदमों से चलता विनोद अपनी कार में बैठा. घर चला आया. अपने मम्मीपापा को क्या बताए? बताए या न बताए?

‘‘विनोद, ज्वैलर का फोन आया था. सारे जेवरात तैयार हैं. थोड़ी देर में उन का आदमी ले कर आने वाला है,’’ सोफे पर चुपचाप बैठे विनोद से उस की मम्मी ने कहा.

ऐसे हालात में विनोद क्या कहे? कैसे कहे? वैभवी उस को अपनी असाध्य सम झी जाने वाली अकस्मात उभरी बीमारी का कारण बता रिश्ता तोड़ने का इशारा कर चुकी है.

खुशी के मौके को सैलिब्रेट करने के लिए दोनों पक्षों से जुड़ी सभी सैरेमनी समयसमय पर की जा रही थीं. पहले रोका सैरेमनी, फिर रिंग सैरेमनी. अब समय था बधाई सैरेमनी और साथ ही लेडीज संगीत सैरेमनी का जो कि विवाह से मात्र 2 दिन पहले तय थी और संयुक्त समारोह था.

ऐसे आघात, जो कि कुदरती था, का आभास न वैभवी को था न विनोद को. वैभवी के परिवार वाले तो आ पड़ी इस आसन्न विपत्ति से आगाह थे मगर विनोद के परिवार वाले अनजान थे.

विनोद का परिवार पूरे उत्साह से शादी की तैयारियों में मग्न था. मगर वैभवी का परिवार असमजंस  में था. क्या करें? क्या न करें?

‘‘विनोद को बताया?’’ मम्मी ने वैभवी से पूछा.

‘‘हां, मैडिकल रिपोर्ट उस को दिखा कर सब बता दिया,’’ ठंडे, स्थिर स्वर में वैभवी ने कहा.

‘‘उस ने क्या कहा?’’

‘‘फिलहाल कुछ नहीं. मामला ही ऐसा है, कोई भी एकदम क्या जवाब दे सकता है.’’

अगले दिन औफिस में सब व्यवस्थित था, सुचारु था. कंपनी के मामलों में मार्केटिंग मैनेजर और सेल्समेन में सामान्य तौर पर डिस्कशन हुआ. भविष्य की योजनाएं बनाई गईं.

शाम को विनोद घर लौटा. उस की मम्मी ने उस को पानी का गिलास थमाते कहा, ‘‘आज हमारी सोसाइटी में रहने वाले 2 परिवारों के सदस्यों के  साथ दुर्घटनाएं हुई हैं.’’

‘‘किस के साथ?’’

‘‘साथ वाले अपार्टमैंट में रहने वाले अमन सीढि़यों से फिसल कर गिरने पर रीढ़ की हड्डी तुड़वा बैठे हैं. जबकि सामने वाले बैरागीजी की पत्नी बस की चपेट में आ कर कुचल गई हैं. दोनों सीरियस हैं.’’

विनोद सोच में पड़ गया. क्या कभी उस ने इस बात पर गौर किया था. उस का अड़ोसीपड़ोसी कौन था?

महानगरीय सभ्यता का अनुकरण करते अब बड़े शहर या मध्यम श्रेणी के महानगर भी अपरिचय की सभ्यता या संस्कृति का अनुकरण कर रहे थे. क्या उस ने कभी अपने साथ वाले फ्लोर में रहने वाले अड़ोसीपड़ोसी से परिचय किया? हालचाल पूछा? क्या उन्होंने भी ऐसा किया?

अगले 2 दिनों में दोनों दुर्घटनाग्रस्त पड़ोसी चल बसे. उन की अंतिम विदाई में विनोद भी शामिल हुआ.

जिस से जानपहचान थी उन से विनोद को पता चला कि हाउसिंग सोसाइटी में रहने वाले कई पड़ोसी तरहतरह की बीमारियों से ग्रस्त थे. मगर अपनी असाध्य बीमारियों को सहजता से अपनी नियति सम झ वे अपना जीवन जी रहे थे.

रिटायर्ड प्रिंसिपल मिस्टर अस्थाना 80 वर्ष के थे. पिछले 50 साल से, कैंसरग्रस्त थे. मगर परहेजभरा जीवन अपना कर सहजता से जी रहे थे.

उन की रिटायर्ड पत्नी भी असाध्य बीमारी से ग्रस्त थी, मगर बीमारी को अपने जीवन का अंग मान कर 70 बरस पार कर अपना जीवन सहजता से जी रही थी.

एक परिवार का बच्चा 5 बरस का था. एक टांग पोलियोग्रस्त थी, मगर वह कृत्रिम टांग से खेलताकूदता था. मग्न रहता था.

एक 12 साल का बच्चा खुद ही मधुमेह के इंजैक्शन लगाता था.

मनुष्य का दिमाग सुख की अवस्था में इतना चैतन्य नहीं होता जितना दुखपरेशानी या विपत्ति पड़ने पर.

अपनी भावी पत्नी पर आ पड़ी आसन्न विपत्ति ने विनोद का मस्तिष्क चैतन्य कर दिया. आसपड़ोस, अनेक मित्रों, संबंधियों पर गौर फरमाने से उस को आभास हुआ, संसार में पूर्ण सुखी कोई नहीं था.

‘‘वैभ,’’ आईपौड की नईर् शैली के सैलफोन पर विनोद का फोन नंबर उभरा.

‘‘कहिए?’’

‘‘शाम को ओपन रैस्टौरैंट में आना है.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘तुम्हारी मैडिकल रिपोर्ट का जवाब देना है.’’

‘‘ओके, विनोद, शाम 7 बजे.’’

‘‘विनोद नहीं, विक्की. जरा नई शैली की कोई अट्रैक्टिव ड्रैस डालना,’’ और खट से फोन कट गया.

अनबू झी पहेली के समान हाथ में पकड़े सैलफोन को देखती वैभवी कुछ न सम झ सकी.

‘‘दीदी, जीजाजी से मिलने जा रही हो?’’ बड़ी बहन को ड्रैसिंग टेबल के सामने बैठा देख छोटी बहन अनुष्का ने पूछा.

वैभवी खामोश रही. असाध्य बीमारी का छोटी बहन को पता नहीं था. मम्मी खामोश थीं. वरपक्ष क्या पता कब रिश्ता तोड़ने के लिए फोन कर दे या पर्सनल मैसेज भेज दे.

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