ठुड्डी के पास मेरा चेहरा आकार खोता जा रहा है, इसे रोकने के लिए मैं क्या कर करूं? 

सवाल 

मेरी उम्र 50 वर्ष है. मैं ने नोट करना शुरू किया कि ठुड्डी के पास मेरा चेहरा आकार खोता जा रहा है. इस प्रक्रिया को रोकने के लिए मैं क्या कर करूंबढ़ती उम्र में आंखों के आसपास की त्वचा का कैसे खयाल रखूं कृपया मार्गदर्शन करें?

जवाब

इस उम्र में आप को ऐंटीएजिंग फेशियल जैसे कोलाजनट्रिप्पल आर ष्शश्चश्चद्गह्म् श्चद्गश्चह्लद्बस्रद्ग जैसे फेशियल करवाने चाहिए. बढ़ती उम्र के कारण या किसी भी वजह से त्वचा लूज हो कर लटकना शुरू हो गई है या त्वचा में इलास्टिसिटी की कमी हो गई है तो इन सभी स्थितियों में ये फेशियल काफी कारगर व फायदेमंद हैं. इन फेशियल में शामिल प्रोडक्ट्स त्वचा को साइन्स औफ ऐजिंग से प्रोटैक्ट करते हैं. घर पर भी आप कुछ चीजें कर सकती हैं जैसे अंडे की सफेदी अपने फेस पर लगाएं. 20 मिनट बाद धो लें. इस से कुछ फर्क पड़ेगासाथ में हर आमंड औयल या देशी घी से मसाज करें. इस से भी स्किन को नरिशमैंट मिलती है और वह टाइट होनी शुरू हो जाती है. यह मैंटेनैंस के लिए सही उपाय हैमगर स्किन को ट्रीट कर के ?ार्रियों को कम करने के लिए क्लीनिक में ही जाना पड़ेगा. बाद में उसे मैंटेन करती रहें.

खुशियों के फूल – भाग 1 : किस बात से डर गई अम्बा

मिस्टर निनाद, आप और आपकी वाइफ कोरोना पोजिटिव आए हैं, लेकिन आपके सिम्टम्स बहुत माइल्ड हैं. इसलिए आप दोनों को अपने घर पर ही सेल्फ क्वॉरेंटाइन में रहना होगा. यह रही शहर की कोरोनावायरस हैल्प लाइन का नंबर. अगर आपकी तबीयत खराब लगे तो आप इस नंबर पर फोन करिएगा.आपको हॉस्पिल ले जाने का पूरा इंतजाम हो जाएगा. अभी आपको हौस्पिटलाइजेशन की कोई जरूरत नहीं. अब आप घर जा सकते हैं. गुड लक.”

निनाद और अम्बा  डॉक्टर की बातें सुनकर सदमे  में थे.कोरोना और उनको? दोनों के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी. करोना के खौफ से दोनों के चेहरों से मानो रक्त निचुड़ सा गया था.उन्हें लग रहा था, मानो उनके पांव तले जमीन न रही थी.

हॉस्पिटल से बाहर निकल कर निनाद ने अपनी पत्नी अम्बा  से कहा ,”प्लीज़ अम्बा, घर  चलो, तुम्हारी भी तबीयत ठीक नहीं है. कोरोना का नाम सुन कर मैं हिल गया हूं. कोरोना से मौत की इतनी कहानियाँ सुन सुन कर मुझे दहशत सी हो रही है. बहुत  घबराहट हो रही है. तुम साथ होगी तो मेरी हिम्मत बनी रहेगी. प्लीज अम्बा, ना मत करना. फिर घर जाओगी तो मां को भी तुमसे बीमारी लगने का डर होगा.”

निनाद के मुंह से  प्लीज और  घर जाने की रिक्वेस्ट सुन अम्बा  बुरी तरह से चौंक गई थी. वह मन ही मन सोच रही थी, “इस बदज़ुबान और हेकड़ निनाद  को क्या हुआ? शायद तीन  महीने मुझसे अलग रहकर आटे दाल का भाव पता चल गया है इन्हें. इस बीमारी की स्थिति में किसी और परिचित या रिश्तेदार के घर जाना भी ठीक नहीं. कोई घर ऐसा नहीं जहां मैं इस मर्ज के साथ एकांत में रह सकूं. इस बीमारी में माँ के पास भी जा सकती. फिर निनाद की उसे अपने घर ले जाने की रट देख कर मन में कौतुहल जगा था, देखूं, आखिर माजरा क्या है जो ज़नाब इतनी मिन्नतें कर रहें हैं मुझे घर ले जाने के लिए. मन में दुविधा का भाव था, निनाद के घर जाये या नहीं. उससे तलाक की बात भी चल रही है. कि तभी हॉस्पिटल की ऐम्बुलेंस आगई और निनाद ने ऐम्बुलेंस का दरवाज़ा उसके लिए खोलते हुए उसे कंधों से उसकी ओर लगभग धकेलते से हुए उससे कहा, “बैठो अम्बा, क्या सोच रही हो,’’ और वह विवश ऐम्बुलेंस में बैठ गई.’’

घर पहुंचकर निनाद अम्बा  से बोला, “मैं पास  की दुकान को दूध सब्जी की होम डिलीवरी के लिए फोन करता हूं.”

“ओके.”

दुकान को फोन कर निनाद  नहा धोकर अपने बेडरूम में लेट गया और अम्बा  घर के दूसरे बेडरूम में. अम्बा  को तनिक थकान हो  आई थी और उसने आंखें बंद कर लीं. उसकी बंद पलकों में बरबस निनाद के साथ गुज़रा समय मानो सिनेमाई रील की मानिंद ठिठकते ठहरते चलने लगा  और वह बीते दिनों की भूल भुलैया में अटकती भटकती खो गई.

वह सोच रही थी, जीवन कितना अनिश्चित होता है. निनाद  से विवाह कर वह कितनी खुश थी, मानो सातवें आसमान में हो. लेकिन उसे क्या पता था, निनाद  से शादी उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल होगी.

एक सरकारी प्रतिष्ठान में वैज्ञानिक अम्बा  और एक बहुराष्ट्रीय प्रतिष्ठान में वैज्ञानिक निनाद  का तीन वर्षों पहले विवाह हुआ था. निनाद ने उस दिन  अपने शहर की किसी कॉन्फ्रेंस में अपूर्व  लावण्यमयी अम्बा  को बेहद आत्मविश्वास  से एक प्रेजेंटेशन  देते सुना था, और वह उसका मुरीद हो गया. शुष्क, स्वाभाव के निनाद को अम्बा  को देखकर शायद पहली बार प्यार जैसे रेशमी, मुलायम जज़्बे का एहसास हुआ था. कॉन्फ्रेंस से घर लौट कर भी अम्बा  और उसका ओजस्वी धाराप्रवाह भाषण उसके चेतना मंडल पर अनवरत छाया रहा. उसके कशिश भरे, धीर गंभीर सौंदर्य ने सीधे उसके हृदय पर दस्तक दी थी और उसने लिंकडिन पर उसका प्रोफाइल ढूंढ उसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त की थी. उसके माता पिता की बहुत पहले मृत्यु हो चुकी थी.इसलिए उसने स्वयं  उसे फोन कर और फ़िर उससे मिलकर उसे विवाह का प्रस्ताव दिया था.

अम्बा  की विवाह योग्य उम्र हो आई थी. सो मित्रों परिचितों से निनाद  की नौकरी, घर परिवार और चाल चलन की तहकीकात कर उसने निनाद  से विवाह करने की हामी भर दी.

अम्बा  की मात्र मां जीवित थी. वह  बेहद गरीब परिवार से थी. पिता एक पोस्टमैन थे. उनकी मृत्यु उसके बचपन में ही हो गई थी. तो प्रतिष्ठित पदधारी निनाद  का विवाह प्रस्ताव अम्बा  और उसकी मां को बेहद पसंद आया.शुभ मुहूर्त में दोनों का परिणय  संस्कार संपन्न हुआ .

विवाह  के उपरांत सुर्ख लाल जोड़े में सजी, पायल छनकाती अम्बा  निनाद के घर आ गई, लेकिन यह विवाह उसके जीवन में खुशियों के फूल कतई न खिला सका. निनाद एक बेहद कठोर स्वाभाव  का कलह  प्रिय इंसान था. बात-बात पर क्लेश  करना उसका मानो  जन्म सिद्ध अधिकार था. फूल सी कोमल तन्वंगी अम्बा  महीने भर में ही समझ गई  कि यह विवाह कर उसने जीवन की सबसे गुरुतर  भूल की है. दिनों दिन पति के क्लेश से उसका  खिलती कली सा मासूम मन और सौंदर्य कुम्हलाने  लगा.

निनाद  बात बात पर उसे अपने से कम हैसियत के परिवार का तायना देता.गाहे बगाहे  वह मां से मिलने जाती तो उस से लड़ता. मामूली बातों पर उससे उलझ पड़ता. बात बात पर उसे झिड़कता.

अम्बा  एक बेहद सुलझी हुई, समझदार और मैच्योर युवती  थी. वह भरसक निनाद को अपनी ओर से कोई मौका नहीं देती कि वह क्रुद्ध  हो लेकिन दुष्ट निनाद  किसी न किसी बात पर उससे रार  कर ही बैठता.

निनाद अम्बा  के विवाह को तीन  वर्ष बीत  चले.पति के खुराफ़ाती स्वभाव से त्रस्त अम्बा  कभी-कभी सोचती, पति से अलग होकर उसे इस यातना से मुक्ति मिल जाएगी.जिस दिन गले तक निनाद के दुर्व्यवहार से भर जाती, मां से अपनी व्यथा कथा साझा  करती.उससे अलग होने की मंशा जताती. लेकिन पुरातनपंथी मां हर बार उसे धीरज रखने की सलाह देकर चुप करा कर वापस अपने घर भेज देती.

महुए की खुशबू – भाग 3

तड़के चारों तरफ की हलचल ने मेरी आंख खोल दी. साढे 5 बजे थे, पर लग रहा था जैसे पूरा गांव काम पर लग गया था. गाय भैंसों के तबेले में काफ़ी काम चल रहा था. महिलाएं भी चूल्हेचौके की तैयारी में थीं. कहीं हैंडपंप चल रहा था तो कहीं कुओं से पानी खींचा जा रहा था. कोई कपड़े धो रहा था तो कोई मिट्टी से पीतल के बरतन रगड़ रहा था. गांव जाग चुका था.

मैं भी लोटा ले कर खेत हो आया. आदत नहीं थी आड़ देख कर खुले में बैठने की. अपने घर, कसबे और गांव का अंतर मुझे दिखने लगा और पहली बार मुझे लगा कि इस वातावरण में खुद को ढालने के लिए खासी मेहनत ही नहीं, बहुत सारा त्याग भी करना पड़ेगा. उस पुस्तक वाले चित्रकार के चित्र में लोटा, आड़ थोड़ी न दिखाया गया था.

कुंए पर पहली बार पानी ख़ुद खींच कर स्नान कर के कपड़े पहन कर रेडी होते ही चाय की तलब ने अपना काम करना शुरू कर दिया था. जीभ चाय का जुगाड़ ढूंढने लगी थी. पर गांव में कोई होटल नहीं था. इधरउधर देखा, बेचैनी बढ़ती जा रही थी.

तभी वही कल वाले बुजुर्ग आते दिखाई दिए और अभिवादन कर आत्मीयता से निकट आ बैठे, “’और सुनाओ  माटसाब, कैसी रही रात, कौनो दिक्कत?” के साथ ही उन्होंने किसी राधे को आवाज़ दी जो कुंए पर कपड़े पटक रहा था. राधे कपड़े वैसे ही छोड़ कर पास आ गया.

बुजुर्ग उस से बोले, “जल्दी से नहा लेयो और दिनभर माटसाब के साथ रहो काहे से कि आज इन का पहला दिन है. अब जे गांव में रहेंगे, यहीं. कौनो दिक्कत न होय के चाही समझे, जाओ चाय ले आओ पहले.” राधे तुरंत बोला, “आप बैठा, हम गुड़ की चाय बनाये लात.”

बुजुर्ग ने मेरा चार्ज जवान राधे को सौंप दिया था. बुजुर्ग कुछ देर उसे अलग ले जा कर समझाते रहे और मुझ से विदा लेते हुए बोले. “हम इसे सहेज दिए हैं आप को. जो चाहिए, इसे बता दीजिए. अपना आदमी है.”  मैं ने झुक कर बुजुर्ग का आभार माना. वे हंसते हुए खेतों की तरफ़ चले गए.

मुझे कुछ रिलैक्स फील हुआ कि चलो, मैं अकेला नही हूं और लोग जुड़ते जा रहे हैं. राधे कुछ ही देर में आ गया और हम दोनों खेतों की तरफ़ निकल पड़े. अभी 8 ही बजे थे. स्कूल तो 10 बजे खुलना था.

ज़ाहिर था कि ये खेत बुजुर्ग के ही थे. राधे सब बताता चल रहा था- कौन तिकड़मी है, कौन सज्जन, कौन नेता है और कौन सरपंच. प्रधानजी, पटवारीजी, पेशकारजी, पुलिस चौकी के मुंशी जी, दारोगा जी, वक़ील साहब, फौजदारी-दीवानी तहसील, ब्लौक दफ़्तर, नहर दफ़्तर, बिजली औफिस, मंडी, आढ़त और पता नहीं क्याक्या…राधे की बातें चलती ही जा रही थीं.

गांव का वह बाल पुस्तक चित्र अब स्वच्छता छोड़ छींटदार होता जा रहा था और अचानक चित्र के रंग मुझे उतने चटक नहीं लग रहे थे. अब मुझे यह भी लगा कि गांव शब्द चित्र को शहरी बच्चों के मन में अतिशुद्ध रूप में ही दिखाया गया था.

हम दोनों बात करते हुए एक खाद की दुकान के सामने आ खड़े हुए, जिस के  बाहर एक टप्पर में चाय बनती दिखाई दी. चाय में शक्कर डलते देख मेरी जान में जान आई क्योंकि सवेरे वाली गुड़ की चाय से मेरा मूड और मुंह कसैले हो गए थे. सुनी तो थी पर गुड़ की चाय आज पी पहली बार. पर 2 कुल्हड़ शक्कर  वाली चाय पीने से लगा जैसे जीभ पर चीनी चिपक गई हो. कुल्ला कर के जब  हैंडपंप का खारा पानी पिया तब जा कर राहत महसूस हुई.

अचानक खाद की दुकान का शटर उठने की घड़घड़ाहट ने मेरा ध्यान खींचा. एक सज्जन दुकान खोल कर अंदर जाने की तैयारी कर रहे थे. उन्हें देखते ही लगा कि इन्हें अभीअभी कहीं देखा है. राधे ने ‘प्रसाद बाबू’ आवाज़ दे कर उन्हें बुलाया. प्रसाद बाबू ने राधे के साथ मुझ अजनबी को देख हम दोनों को दुकान में आने का इशारा किया.

“आप तो कल ही बस से उतरे थे न तिगाला पर?” ओहहो, तो मेरे आने की ख़बर फैल चुकी थी. गांव का सूचनातंत्र इतना चुस्त होता है, आज आंखों से देख लिया. बातचीत में अनोखी बातें पता चलीं. ये सज्जन मेरे स्कूल में ही सहायक शिक्षक थे. बगल के गांव में रहते थे. ख़ुशी हुई अपने एक सहकर्मी से मिल कर, पर इस वक़्त तो उन्हें स्कूल के लिए तैयार होना था, हालांकि, वे खाद भंडार खोल रहे थे…

दुसरी खबर जो उन्होंने दी, उस ने मुझे चौंका दिया. मेरे कल सवेरे बस से उतरने की ख़बर उन्हें कल दोपहर को मिली थी सुधा बहनजी से. ये बहनजी के गांव के ही थे जो आधे कोस पर था. सुधा बहनजी को खबर लग चुकी होगी, कल ही मुझे बताया गया था, यह बात सही निकली. कौन हैं ये सुधा बहनजी? मैं उत्सुक हो चला.

“आप नाश्ता कर लीजिए, मिलते हैं स्कूल में,”  बोल कर वे दुकान की गद्दी सहेजने लगे और मैं व राधे सड़क पर निकल गां की तरफ चल पड़े. मुझे यह समझते देर न लगी कि स्कूल की नौकरी यहां साइड बिजनैस था. स्कूल की नौकरी पर गए, नहीं गए, सब चलता है. घर की दुकान छोड़ कर कोई नौकरी करता है क्या?

राधे मुझे स्कूल में छोड़ कर चला गया और मैं स्कूल का चक्कर मार कर एक क्लासरूम में आ गया. ज़मीन पर बिछी बेतरतीब दरियों को झटक कर उन पर जमीं धूल उड़ाई और आलों में रखी अगड़मबगड़म चीजों की साफसफाई में जुट गया. दीवारों पर मकड़ी के जाले लगे पड़े लटक रहे थे और पूरे फर्श पर किताबकौपियों के पन्ने, टूटी पैंसिल, चाक,  और बकरी व कुत्ते की लीद भी बिखरी पड़ी थी. गंदगी देख कर मुझे जनून सा चढ़ गया कि क्लासरूम को आज साफ कर के ही रहूंगा. मेरे स्कूल में आने का असर कम से कम यह ख़ाली कक्षा ही देख ले.

“नमस्ते जी, मैं सुधा.” मेरे पीछे एक महिला की आवाज़ सुनाई दी और मैं मुड़ कर देखने लगा. औसत ऊंचाई और मध्यम कदकाठी की महिला दरवाज़े पर हाथ जोड़े खड़ी थी.  मेरे हाथ में झाड़ू देख वह मुसकरा उठी और मैं थोड़ा झेंप कर उस के सामने आ कर खड़ा हो गया. अभिवादन के बाद परिचय हुआ और अचानक मुझे ध्यान आया कि महिला तो वही थी जो कल बस से उतरते ही दिखी थी और मेरे बारे में किसी को कुछ बता रही थी.

वह भी मुझ से यही बोली कि कल देखते ही वह समझ गई थी कि यह परदेसी व्यक्ति गांव के स्कूल का नया टीचर ही होना चाहिए. हम दोनों के बीच वातावरण सहज हो चला था. उस ने मेरी पूरी जानकारी ली और अपना बताना शुरू किया.

वह पड़ोस के गांव में ही रहती थी और ख़ुद से ही गांव की महिलाओं की भलाई के लिए कुछ अच्छा करने के विचार से उन्हें संगठित करने का प्रयास कर रही थी.

गरीब और अनपढ़ महिलाओं के समूह बनाने का कार्य उस ने लगभग 2 वर्ष पूर्व शुरू किया था. धीरे-धीरे  गांव की महिलाओं का आनाजाना शुरू हुआ और समूह एक मनोरंजन व मिलनेजुलने का केंद्र बन चला जहां चूल्हेचौके, सिलाईबुनाई की बातों के अलावा नियमित अति लघु बचत की बात भी सुधा जी क़रतीं.

हर महीने एक बैठक होती, जिस में हर महिला 5 या 10 रुपए एक टिन के डब्बे वाली गुल्लक में डालती और सुधा जी एक कौपी में सब का हिसाबखाता लिखती जातीं. गुल्लक में अब तक दोएक हज़ार रुपए जमा हो चुके थे जिसे महिलाओं को अतिलघु ऋण राशि यानी सौपचास रुपए के रूप में दिया जा रहा था जिस से वे कभी डलिया, बरतन खरीदतीं तो कभी झोपड़ी ठीक करवातीं.

सुधा जी का यह महिला समूह, लघुतम बैंक, आसपास काफ़ी लोकप्रिय हो चला था. उन के पति आयुर्वेद के डाक्टर थे. घर में ही दवाखाना था. सस्ती व कारगर दवाइयां देने की वजह से उन का भी इलाके में नाम था. घर की खेतीबाड़ी थी, सो, कोई आर्थिक दिक्कत नहीं थी.

उन के दोनों बच्चों के नाम मेरे ही स्कूल में लिखे थे. पर पढ़ाईलिखाई ख़ास न होने से सुधा जी दुखी थीं. मुझे समझते देर न लगी कि एक मां अपने बच्चों की शिक्षा की आशा लिए भी मेरे पास आई थी. उन्होंने बताया कि उन के 2 वर्षों के ज़मीनी  कार्य के अब अच्छे सकारात्मक परिणाम मिलने लगे थे और अब उन के लिए 2 मुख्य कार्य करने ज़रूरी थे. पहला कार्य, महिला समूह शक्ति के द्वारा गांव में लगी महुआ शराब की भट्टियों को हटाना और दूसरा, गांव के बच्चों को नियमित स्कूल भेजना ही नहीं बल्कि उन्हें वहां तीनचार घंटे बैठाना ताकि वे क़ायदे से पढ़ने की आदत डाल सकें.

ध्यान से देखने पर पता चल ही गया था कि दोनों बातों का आपस में गहरा संबंध था. सुधा जी के साथ हुई लंबी वार्त्ता ने मेरे अंदर उत्साह का संचार किया. मैं समझ गया कि अब आने वाले समय में हम दोनों को मिल कर कार्य करना होगा ताकि इस विद्यालय की शक्ल-सूरत ही नहीं, बल्कि सीरत भी बदल सके.

महुए की भट्टियां सिर्फ नशा ही नहीं बेच रही थीं बल्कि घरगांव में लड़ाईझगड़े, मारपीट, रोनाधोना मचाए रहने का भी कारण थीं. मजदूरीमेहनत का एक बड़ा हिस्सा निहोरे की जेब में जा रहा था जिस की वजह से गांव के  बच्चों पर विपरीत असर पड़ रहा था.

सच तो यह भी था कि कुछ बच्चे भी महुए का  नशा करने लगे थे. यह सब तुरंत रोकने की ज़रूरत सभी को लग रही थी पर बिल्ली के गले में घंटा बांधे कौन वाली बात थी. गांव मे फैली महुए की नशीली खुशबू को खत्म करने के लिए स्थानीय महिलाओं का लामबंद होना ज़रूरी था और यह कार्य सुधा जी ने बख़ूबी अपने हाथों में ले लिया था.

कसर थी तो बस विद्यालय से मदद मिलने की जो उन्हें अब तक मिल नहीं पाई थी क्योंकि यहां के वातावरण में भी स्थानीय महुआ घुलमिल चुका था. मेरा परदेसी होना सुधा जी को और उन का स्थानीय होना मुझे, इस मिशन के लिए वरदान ही लगा. महुए की क्यारी को हटा कर ज्ञान के केसर की पौध लगाने के लिए उचित मौसम की ज़रूरत थी जो अब बदलने वाला था.

समय बीत चला और मैं गांव के रहनसहन में ढल चला था. धीरेधीरे मेरी संगत बढ़ने लगी और मेरे दोनों सहकर्मी भी हमारे साथ जुड़ गए. सरकारी बजट का धन सही दिशा में लगने लगा. स्कूल के प्रांगण अब गुलज़ार हो चले थे और बच्चों की आमद में भारी इज़ाफ़ा हुआ. स्कूल में घंटा भी लग गया और तिपायी पर बड़ा सा मटका भी आ टिका और स्कूल का नाम भी नए पेंट से रंग दिया गया.

कुछ ही महीनों बाद स्कूल के मैदान में झूले भी लग गए. बचपन के उस कलाकार ने गांव के स्कूल का जो चित्र मनमस्तिष्क में चिपका दिया था, अब आंखों के सामने साकार हो चला था. सुधा जी की जीवटता के कारण स्थानीय प्रशासन भी साथ आया और महुए की भट्टियां जमींदोज हो गईं.

सुधा जी के कानों में मैं ने एक मंत्र और फूंक दिया, मुफ़्त प्रौढ़ शिक्षा का, जिसे सुनते ही उन्होंने महिला समूहों को इस का आधार बनाने की बात कर के मेरे मन की बात कर दी.

बच्चे हों या बड़ेबुजुर्ग, सभी को  जातिधर्म, अगड़ेपिछड़े की दुर्गंध वाली महुए की भट्टी से निकाल कर शिक्षा व ज्ञान की ताज़ी हवा में लाने की इच्छा अब हक़ीक़त बनती नज़र आने लगी थी. नन्हें बच्चों की फ़ितरत तो केसर के फ़ूलों की तरह खिलने और सुगंधित होने की थी, महुए के फूल की शराब बन गंधाने की नहीं.

टीना दत्ता और अर्चना गौतम के बीच छिड़ी जंग, घर वालों ने किया ट्रोल

सलमान खान का विवादित शो bigg boss16 हर साल की तरह टीआरपी रेस में शामिल है और टॉप चल रहा है. वही शो में कंटेस्टेंट की नोकं-झोंक फैंस को काफी पसंद आ रही है. फैंस बिग बॉस 16 के शो पर जमकर कमेंट बरसा रहे है. हर दिन नए मोड़ शो को ओर बेहतर बना रहा है. हालिया एपिसोड़ में एक बार फिर प्रिंयका चाहर चौधरी और अंकिचा गुप्ता एक दूसरे से लड़ते नज़र आए.

आपको बता दें, कि बिग बॉस ने घरवालों को एक टास्क दिया था, जिसमें सभी कंटेस्टेंट को एक दूसरे के बारे में खुलासा करना था.इस कार्य के दौरान अंकित और प्रिंयका के बीच भी जमकर लड़ाई हुई. इस बीच अंकित के चक्कर में प्रिंयका और सौंदर्या भी आपस में लड़ने लगे. वही, टास्क के दौरान एक और वाक्या सामने आया है. इस दौरान टीना दत्ता और अर्चना गौतम के बीच जंग छिड़ गई.

 

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टीना दत्त ने अर्चना को लगाई फटकार

बिग बॉस में टास्क के दौरान उन्हे बताया गया कि जो स्टेंटमेंट पढ़ी है उस बात को उनके लिए किसने कहा है. इस दौरान टीना दत्ता को एक स्टेटमेंट पढ़ने के लिए जब कहा गया तो उसमे लिखा था, कि “तुम्हारे केक के भूखे थोड़ी ना है हम और उसके बाद तुम ऐसी बात बोल रही हो, कि मेरा कुत्ता मर गया है अरे यार क्या हो गया उम्र हो गई थी तो मरेगा ही ना.तुम्हारे बर्थडे वाले दिन थोड़ी मरा है हद हो गई यार” यह बयान अर्चना टीना से कहती है. जिससे सुनते ही टीना का पारा हाई हो जाता है और वो समझ जाती है कि ये बात अर्चना गौतम ने बोली है. और अपने गुस्से को शांत करने के लिए वो उनके मुंह पर कीचड़ फेंक देती है.

 

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ये सब अर्चना के बोलने पर साजिद खान अर्चना को गलत ठहराते है और अर्चना के बयान की निंदा करते हुए टीना के प्रति दुख जताते है. उन्होनें कहा कि अर्चना को ये सब बातें नहीं बोलनी चाहिए. इसी बीच निमृत भी कहती है कि वो सही बोल रहे है अर्चना ने गलत कहा है.

Hansika Motwani ने पति के साथ मनाई हल्दी सेरेमनी, सूफी नाइट में की ड्रीम एंट्री

इन दिनों मशहूर एक्ट्रेस हंसिका मोटवानी की शादी मीडियो की सुर्खियों में बनी हुई. जी हां, हंसिका अपने बॉयफ्रेंड और बिजनेस पार्टनर सोहेल खतुरिया के साथ शादी करने जा रही है जिसकी तैयारियां भी जोर-शोर से शुरु हो चुकी है. एक्ट्रेस 4 दिसंबर को सोहेल के साथ सात फेरे लेंगी और शादी के बंधन में बंध जाएगी.

आपको बता दे, कि सोशल मीडिया दोनों का हल्दी और महंदी का वीडियो शेयर किया गया है. जिसमें दोनों हल्दी सेरेमनी एन्जॉए करते दिख रहे है. दोनों की वीडियो के साथ कुछ तस्वीरें भी मीडिया की लाइलाइट में बनी हुई है. बीते शुक्रवार की रात हंसिका मोटवानी और सोहेल खतुरिया का संगीत सेरेमनी मनाई थी.जिसमें कपल ने सूफी नाइट का आयोजन करवाया था. इससे जुड़ा वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है. सूफी नाइट में दोनों शानदार एंट्री करते दिख रहे है. वीडियो में हंसिका मोटवानी का लुक देखने लायक है.

 

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संगीत सेरेमनी से जुडे वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया है जिसमें हंसिका मोटवानी पति का हाथ पकड़कर वहां एट्री करती दिख रही है. इस खास मौके पर हंसिका ने गोल्ड़न शरारा कैरी किया है साथ ही माथे पर टीके के साथ एक झूमर भी पहना हुआ है. जिसमें एक्ट्रेस बेहद खूबसूरत लग रही है. दूसरी ओर सोहेल खतुरिया का लुक भी देखने लायक है जिसकी तारीफें फैंस जमकर कर रहे है. इस वीडियो के साथ कैप्शन में सोहेल ने “ड्रीम एंट्री” लिखा है

वेडिंग प्लानिंग

 

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बता दें, कि शादी से पहले और हेल्दी, मंहदी , संगीत सेरेमनी के आलावा दोनों कपल ने शनिवार की रात एक कोकटेल पार्टी रखी थी. जिस को दोनों काफी एन्ज़ॉय किया. वहीं दोनों की शादी भी बेहद ही ग्रैंड होनें वाली है हालांकि हंसिका और सोहेल की शादी में परिवार और खास दोस्त ही शामिल होंगे. इसके अलावा मुंबई में ग्रैंड वेडिंग रिसेप्शन को भी आयोजन किया जाएगा, जिस पार्टी में तमाम हस्तियां शामिल होगी.

आशा का दीप- भाग 3 : किस उलझन में थी वैभवी

वही ओपन रैस्टोरैंट, मध्यम रोशनी से आभासित गोल मेज व कुरसियां.

‘‘क्या पियोगी?’’ वैभवी की आंखों में प्यार से  झांकते विनोद ने पूछा.

‘‘प्लीज कम टू द पौइंट,’’ वैभवी ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘अरे भई, ठंडागरम तो पी लो. जब कोई समस्या होती है तब समाधान भी होता है.’’

‘‘मेरी बीमारी लाइलाज है. साधारण समस्या नहीं है.’’

‘‘ठीक है, फर्ज करो, यही ट्रबल मु झे हो जाता तो?’’

‘‘वह सब बाद की बात है. आप क्या कहना चाहते हैं?’’

‘‘कैंसर आजकल के जमाने में लाइलाज नहीं है. धैर्य रख कर इलाज करवाने से कैंसर ठीक हो जाता है,’’ विनोद ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘विनोद, बी प्रैक्टिकल. आप सर्वगुण संपन्न हैं. आप को अनेक रिश्ते मिल जाएंगे.’’

‘‘कल का क्या भरोसा है? किसी और लड़की से शादी करने पर भविष्य में वह भी किसी गंभीर बीमारी की शिकार हो सकती है.’’

‘‘वह सब बाद की बात है.’’

‘‘कैंसर के लक्षण अभी न उभर कर शादी के बाद उभरते तो?’’

इस सवाल पर वैभवी खामोश रही. विनोद उठ कर उस के समीप आया, ‘‘वैभ, प्लीज मेरे पास आओ,’’ उस के कंधों पर हाथ रखते उस ने कहा. स्नेहस्निग्ध, प्रेमभरे स्पर्श से वैभवी की आंखें भर आईं. वह उठ कर अपने मंगेतर के सीने से लग गई. धीमेधीमे सुबकने लगी.

विनोद ने वैभवी को बाहुपाश में भर लिया. वैभवी की आंखों से गिरते आसुंओं से उस की शर्ट भीग गई. भावनाओं का ज्वार मंद पड़ा.

वैभवी ने अपनी पसंद के डिनर का और्डर दिया. एक ही प्लेट में दोनों ने एकदूसरे को खिलाया. वैभवी के साथ विनोद को आया देख वैभवी की मां चौंकी. दोनों के चेहरे से वे सम झ गईं कि रिश्ता टूटने के बजाय और ज्यादा पक्का हो गया लगता है.

अगले दिन विनोद और वैभवी ने अपने औफिस से छुट्टी ले ली. विनोद वैभवी को नगर के बड़े मल्टीस्पैशलिटी अस्पताल में ले गया.

बहुत बड़ा अस्पताल था. सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त था. पूरे देश में इस की कई शाखाएं थीं. इस का संचालन एक बड़ा व्यापारी घराना करता था. चिकित्सा व्यवस्था भी अब बड़े कौर्पाेरेट घराने अपना चुके थे.

एक अस्पताल में मैडिक्लेम के आधार पर भी चिकित्सा प्रदान की जाती थी.

फीस और अन्य औपचारिकताएं पूरी करने के बाद चिकित्सा दल ने सिलसिलेवार वैभवी के कई टैस्ट किए.

‘‘देखिए सर, कैंसर की कई किस्में होती हैं. पहले जमाने में अधिकांश कैंसर लाइलाज थे, मगर मैडिकल सांइस में तरक्की होने से अब अधिकांश कैंसर का इलाज संभव है,’’ वरिष्ठ कैंसर विशेषज्ञ डा अभिनव बनर्जी ने स्थिर स्वर में कहा.

वैभवी और विनोद को आशा का संचार महसूस हुआ.

‘‘बाई द वे, ये आप की क्या हैं?’’ डा. साहब ने पूछा.

‘‘जी, मेरी मंगेतर हैं. हमारी अगले सप्ताह शादी है. बाईचांस वक्षस्थल में तीव्र दर्द उठने से यह स्थिति सामने आ गई,’’ विनोद ने डा. साहब का आशय सम झते कहा.

‘‘मंगेतर…और अगले सप्ताह शादी,’’ डा. साहब ने गौर से सामने बैठे जोड़े की तरफ देखा. दोनों पतिपत्नी होते तो स्थिति सहज थी. मगर मंगेतर…

विनोद और वैभवी डाक्टर साहब के चेहरे के भाव सम झ कर हलके से मुसकराए. डा. साहब के चेहरे पर भी मृदु मुसकान उभर आई. उन्होंने प्रशनात्मक नजरों से विनोद बतरा की तरफ देखा.

विनोद सुंदर, सजीला नौजवान था. सर्वगुण संपन्न था. आम युवक भावी पत्नी के कैंसरयुक्त होने का पता चलने पर तत्काल रिश्ता तोड़ देता.

‘‘मिस्टर, आई विश यू औल द बैस्ट.’’

‘‘आप की भावी पत्नी का इलाज हो जाएगा. थोड़ा धैर्य और हौसला रखना पडे़गा,’’ डा. साहब ने तसल्लीभरे स्वर में कहा.

‘‘कितना खर्चा पड़ सकता है?’’ वैभवी ने पूछा.

‘‘खर्च तो काफी होगा मगर आप पूर्णतया रोगमुक्त हो जाएंगी.’’

‘‘अंदाजन?’’

‘‘देखिए, नई तकनीक की लेजर एवं बर्न सर्जरी द्वारा पहले कैंसरग्रस्त कोशिकाओं को नष्ट करना पड़ेगा. फिर दोबारा कैंसर की कोशिकाएं न पनपें, इस के लिए रेडिएशन तकनीक द्वारा तमाम वक्षस्थल की विशेष सर्जरी करनी पड़गी. फिर आप का एक वक्ष निकालना पड़ेगा.’’

‘‘एक वक्ष?’’

‘‘जी हां, कैंसर आप के बाएं वक्ष में है. दूसरा वक्ष निरापद है. निकाले गए वक्ष के स्थान पर स्पैशल पौलिमर और प्लास्टिक सर्जरी द्वारा कृत्रिम वक्ष का निर्माण कर स्थायी तौर पर लगा दिया जाएगा. कृत्रिम वक्ष बिलकुल कुदरती महसूस होगा. बस, आप स्तनपान नहीं करवा सकेंगी. आप का दायां वक्ष पूरी तरह सक्षम है. उस से आप भावी संतान को सहजता से स्तनपान करवा सकेंगी.’’

‘‘अस्पताल में कितना समय लग सकता है?’’

‘‘औपरेशन में 4 से 6 घंटे और रिकवर होने में लगभग 3-4 सप्ताह. रेडिएशन थेरैपी से आप के शरीर के बाल अस्थायी तौर पर  झड़ सकते हैं. दोबारा उगने में कोई दिक्कत नहीं होगी.’’

‘‘और सारा खर्च?’’

‘‘लगभग 20 लाख रुपए.’’

‘‘जी,’’ वैभवी का चेहरा बु झ गया.

‘‘डियर, हैव पेशेंस,’’ विनोद ने आश्वासन देते वैभवी के कंधे पर हाथ रखा.

‘‘डा. साहब, मैडिक्लेम इंश्योरैंस पौलिसी के आधार पर भी इस इलाज का खर्चा क्लेम हो सकता है?’’ विनोद ने पूछा.

‘‘जी हां, हमारे यहां यह सुविधा भी है. क्या आप के पास मैडिक्लेम बीमा पौलिसी है?’’

‘‘आजकल मल्टीपरपज बीमा पौलिसी का जमाना है. मेरे पास और इन के पास मल्टीपरपज बीमा पौलिसी है. हम दोनों का 30 साल का 50-50 लाख रुपए का बीमा है.’’

‘‘फिर कोई दिक्कत नहीं है,’’ डा. साहब ने हर्षभरे स्वर में कहा. तभी कमरे का दरवाजा खोल कर एक लेडी डाक्टर दाखिल हुईं. उन के गौरवर्ण चेहरे और ललाट पर गहन बुद्धिमता की छाप थी. उन्होंने हलके नीले रंग की साड़ी और मैच करता ब्लाउज पहन रखा था. उन के ऊपर डाक्टरों वाला लंबा सफेद कोट था और दोनों कंधों पर  झूलता स्टैथस्कोप.

‘‘मीट माई वाइफ डा. आभा बनर्जी,’’ लेडी डाक्टर के समीप आ कर साथ रखी खाली कुरसी पर बैठने के बाद डा. साहब ने परिचय कराते कहा, ‘‘ ये हैं मिस्टर विनोद ऐंड मिस वैभवी.’’ और आभा ने बारीबारी से हाथ मिलाया.

‘‘शी इज औल्सो मेलाइन सारकोमा ट्रीटमैंट सर्जरी स्पैशलिस्ट ऐंड मिडीलिशन थेरैपी विशेषज्ञ,’’ डा. साहब ने कहा, फिर अपनी पत्नी से बंगाली भाषा में कुछ कहा.

डा. आभा के चेहरे पर मृदु मुसकान उभरी. उन्होंने विनोद की तरफ प्रशंसात्मक नजरों से देखते कहा, ‘‘विनोद, आई ऐप्रिशिएट यौर जनरस ऐंड काइंड स्पिरिट. नेचर विल शौवर औल ब्लैसिंग्स औन बोथ औफ यू.’’

विनोद बतरा ने मूक अभिवादन की मुद्रा में सिर हिलाया.

डा. साहब ने अपने लैटरहैड पर कुछ दवाएं लिखीं और बताया, ‘‘हर मरीज को औपरेशन से पहले शरीर को औपरेशन के लिए तैयार करने की बाबत कुछ दिन जरूरी दवाएं लेनी पड़ती हैं.’’

डा. दंपती ने स्नेह से भावी कपल की तरफ देखा और गर्मजोशी से हाथ मिलाया.

विवाह पूरे धूमधाम से हुआ. दोनों हनीमून के लिए चले गए.

दोनों ने एक महीने की छुट्टी ले ली. डाक्टर ने वैभवी का औपरेशन दूसरी शाखा के अस्पताल में किया.

औपरेशन सफल रहा. काटे गए वक्ष की जगह नया कृत्रिम वक्ष भी लग गया. बीमा कंपनी ने सहृदयता दिखाते सारे खर्च का भुगतान किया.

विनोद के मातापिता अपने सुपुत्रकी विशाल सहृदता पर अभिभूत थे. वहीं, वैभवी के मातापिता भी ऐसा दामाद पा कर हर्षमग्न थे.

सालभर बाद वैभवी ने चांद सी सुंदर बच्ची को जन्म दिया, जो अपनी माता के समान सुंदर थी और स्वस्थ भी.

Winter Special: रस्मों का जंजाल महिला है बेहाल

हमारे देश में पूरे वर्षभर किसी न किसी त्योहार की धूम रहती है. 4 बड़े मुख्य त्योहारों के अतिरिक्त विभिन्न राज्यों में कई छोटेछोटे त्योहार भी मनाए जाते हैं. त्योहारों के अतिरिक्त कई व्रत एवं उपवास भी होते हैं जिन्हें कुंआरी एवं विवाहित दोनों ही तरह की शिक्षित, अल्पशिक्षित एवं अशिक्षित सभी प्रकार की महिलाएं करती हैं. यों तो ये व्रतत्योहार, उपवासउद्यापन  एक प्रकार से सामाजिक मेलमिलाप का एक माध्यम हैं, किंतु इन के पीछे छिपी कई समस्याएं भी हैं. इस विषय पर कुछ महिलाओं से की गई बात के कुछ अंश यहां साझोकर रही हूं.

फिफ्टीफिफ्टी सी बात

45 वर्षीय अर्चना से जब इस विषय पर बात हुई तो वह कहने लगी, ‘‘हम तो मारवाड़ी हैं, हमारे यहां कई प्रकार के त्योहार एवं व्रतउपवास होते हैं, जिन में अपने रिश्तेदारों से सजधज कर मेलमिलाप होता है. खानाखिलाना भी खूब होता है. फिर घरेलू महिला हूं तो इस बहाने सजधज भी लेती हूं वरना वही रोज का चूल्हाचौका एवं साफसफाई. अकसर ये सारे व्रत विवाहोपरांत पति की लंबी आयु, परिवार में समृद्धि एवं शांति के लिए किए जाते हैं.

‘‘18 वर्ष की उम्र में मेरा विवाह हुआ था और मैं इतने बरसों से ये सब कर रही हूं. लेकिन मेरे पति विवाह पूर्व ही लड़कियों से बहुत आकर्षित होते थे. मातापिता ने इन का 23 वर्ष की उम्र में ब्याह कर दिया कि लड़का कहीं हाथ से न निकल जाए. लेकिन विवाहोपरांत भी ये नहीं सुधारे. और तो और हमारा फैमिली बिजनैस था जो ससुरजी ने जमाया हुआ था, वह भी नहीं संभाला. ससुरजी तो चल बसे और ये ठहरे इकलौते बेटे, इन से न तो घर संभाला न ही व्यापार. बस जहां कोई भी लड़की खूबसूरत या बदसूरत देखी  कि लगे मुंह मारने.

‘‘अब तो जी चाहता है कि करवाचौथ का व्रत ही छोड़ दूं क्योंकिजो पति जिम्मेदारी न उठाए उस के लिए व्रत कैसा. लेकिन लोकलाज के चलते कर रही हूं क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो मेरी सास तो मानो जीतेजी ही मर जाएगी.

‘‘घर में दुकान है, जिसे मैं संभालती हूं, साथ ही सिलाईकढ़ाई भी करती रहती हूं. विवाह होते ही मैं ने कहा था मु?ो बुटीक खुलवा दो पर किसी ने सुनी नहीं. मैं फालतू के रीतिरिवाजों में लगी रही इस के बजाय आय का कोई साधन जुटाती तो अच्छा रहता.’’

औफिस में मैनेजर थी अब घर की गुलाम   

39 वर्षीय विपाशा कहती है, ‘‘31 वर्ष की उम्र में मेरा विवाह हुआ. एक अच्छी कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत थी. जब विवाह हुआ तो मेरी आय पति के बराबर थी. पति एवं ससुर भी अच्छी कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत हैं. इसलिए अपनी नौकरी छोड़ कर जब इन के शहर और परिवार में आई तो शायद इन्हें मेरी नौकरी से कोई वास्ता नहीं था. मैं ने नए शहर में नौकरी के लिए खोज शुरू कर दी.

‘‘कुछ अवसर प्राप्त भी हुए तो ससुर बोले कि हम लगवा देंगे कहीं अच्छी जगह. इधर सास बहुत  ही कम पढ़ीलिखी एवं अंधविश्वासी महिला हैं. सो मु?ो न जाने कितने रस्मोरिवाज में उल?ाए रखती हैं. साथ में यह भी कहती हैं कि तू तो पहले पढ़तीलिखती, नौकरी ही करती रही तो घर संभालना क्या होता है तू क्या जाने. पहले तु?ो मैं  वह सब सिखाऊंगी.’’

3 वर्ष इसी तरह बीत गए और एक बेटा भी पैदा हो गया. न तो वह बच्चे की जिम्मेदारी लेते हैं और न ही पति मेरा साथ देते हैं. बच्चे को भी वे पुराने ढर्रे के अनुसार ही रखते हैं. कई बार पति से कहा भी कि यह कैसा माहौल है, किंतु वे चाहते हैं कि मैं उन की मां के अनुसार चलूं. यदि उन की किसी बात की अनदेखी करूं तो घर में कुहराम मच जाता है. जैसे उन के द्वारा किए गए ढकोसले ही उन के पति की तरक्की की जड़ हैं.

कई बार महसूस होता है कि फिर इतना पढ़नालिखना किस काम का. विवाहपूर्व भी  मौजमस्ती नहीं की कि पढ़ाई करनी है और विवाह उपरांत ये ढकोसले. ऐसा महसूस होता है कि इन्हें जगत दिखावे के लिए पढ़ीलिखी लड़की चाहिए थी बस, पर रखते तो मु?ो अनपढ़ों जैसे ही हैं. वर्षभर के व्रतत्योहार, उपवास आदि में लगी

रहती हूं.

‘‘दुख की बात यह है कि बड़ी विचित्र महिला हैं मेरी सास. कहती हैं कि साड़ी तो जरीगोटा की पहनो बहू. पर यदि अपने ब्याह के गहने पहनना चाहूं तो कहती हैं कोई खींच लेगा आर्टिफिशियल पहन लो. किसी भी तरह का अपना शौक तो पूरा कर ही नहीं सकती हूं. हालांकि मु?ो ये सब पसंद नहीं पर परिवार की शांति के लिए करना पड़ रहा है. कभीकभार ऐसा महसूस होता है जैसे पूरा परिवार अपनी मनमरजी से रहता है और मैं यहां इन की गुलाम हूं.’’

आंख फूटी पीड़ा मिटी

मुंबई में रहने वाली स्मिता कहती हैं,

‘‘50 वर्षीय हूं. जब विवाह हुआ तो 7 वर्ष इंजीनियर के पद पर नौकरी कर चुकी थी. पिताजी के घर में न तो कोई बंदिश थीं और न ही अंधविश्वासी मान्यताएं. मुंबई जब रिश्ते की बात चली तो सोचा बड़ा शहर है, नौकरी के अवसर भी ज्यादा मिलेंगे. पति भी बहुत खुले विचारों के मिले. लेकिन परिवार के अन्य सदस्य बहुत ही दकियानूसी विचारों के थे. मजे की बात यह कि उन के स्वयं के लिए कोई नियम कायदाकानून नहीं था और मेरे लिए एक लंबी सूची थी रस्मोंरिवाजों और नियमों की.

‘‘मेरी सास रोज सुबह 9 बजे सो कर उठती. 12 बजे नहाती, चार बजे लंच बनता और रात को 1 बजे हम खाना खा कर सोते. परिवार में ससुर, देवर, पति 3 जने नौकरी वाले थे, जिन के टाइमटेबल के अनुसार मु?ो रसोई और घर की व्यवस्था भी करनी होती जिस में सास का कोई सहयोग न मिलता. लेकिन अमावस के दिन सास सुबह जल्दी नहाधो कर खीर बना लेती और कोई भोग लगाती.

‘‘मु?ो यह अमावस, पूनम तिथियां ध्यान नहीं रहती थीं क्योंकि मायके में ये सब ज्यादा देखासुना नहीं था. दुख की बात यह थी कि सास मु?ो पहले से बताती भी नहीं और फिर बाद में ताना मारती. सालभर के कुछ व्रतउपवास मैं ने किए भी, लेकिन वह हरेक में कुछ न कुछ कमी  निकाल कर घर में ?ागड़ा करती.

‘‘मैं कोशिश करती कि घर में इन बातों को ले कर कोई ?ागड़ा न हो तो सास से पहले से ही पूछती कि यह कैसे करना है. तो भी वे ताने देती और एक दिन ससुर ने मु?ो 12 मास के व्रतत्योहार की पुस्तक ला दी. मैं ने वह पुस्तक पढ़ कर व्रत रख कर रस्में करना शुरू किया. लेकिन फिर भी सास का मुंह तो बना ही रहता.

‘‘मु?ो मन ही मन बहुत अखरता कि कहां इन जंजालों में फंसी हूं. सब से ज्यादा बुरा तब लगा जब करवाचौथ थी. सास ने मु?ो मेहंदी लगाने का भी समय नहीं दिया. हर दिन घर का सारा कम मुझोपर डाल देती और त्योहारों पर भी सजधज करने का जैसे कोई मतलब ही न होता. हर त्योहार पर रीतिरिवाजों को ले कर घर में ?ागड़ा होता. यदि मैं कुछ पूछती तो ब्लैकमेल करती कि मैं तु?ो बताऊंगी ही नहीं, फिर तू कैसे करेगी. जबकि वह स्वयं ही नवरात्रों में प्याज की टोकरी रसोई  से बाहर करवाती.’’ और पानीपूरी के शौकीन मेरे पति और देवर जब घर में हे पानी पूरी का इंतजाम कर लेते तो उनसे रहा न जाता और खा लेतीं. इतना कह वे ठहाका मार कर हंसने लगीं.

‘‘मेरे लिए तो वैसे भी इन ढकोसलों की कोई अहमियत नहीं थी सो पलट कर जवाब दे दिया कि आप क्या नहीं बताएंगी, मैं करूंगी ही नहीं. सो मैं ने वही किया न व्रतउपवास करूंगी और न ही रस्में होंगी. तो फिर सास कमी भी कैसे निकलेगी.

‘‘सब छोड़छाड़ दिया और अपने पति के व्यापार में हाथ बंटाना शुरू किया. जब बेटा पैदा हुआ तो उस के साथ व्यस्त रही और उस के बड़े होने पर अपना फैमिली बिजनैस देखने लगी.’’

महिलाएं अपना समय उत्पादक काम में दें

इन उदाहरणों से यह समझोआता है कि जो व्रतउपवास या त्योहार मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के फायदे के लिए बनाए गए हैं उन में झठे रीतिरिवाज के ढकोसले घुसेड़ कर सिर्फ महिला ही नहीं अपितु पूरे परिवार के लिए तनाव का माध्यम बना दिए क्योंकि पुरुषों को तो करने नहीं पड़ते इसलिए उन्हें इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. वे सोच लेते हैं सासबहू की आपसी लड़ाई है. लेकिन यह सिर्फ लड़ाई नहीं होती है बल्कि परिवार में आई नई बहू को दबा कर रखने की चालें होती हैं.

इस तरह की हरकतों से न सिर्फ उन का मोरल डाउन किया जाता है बल्कि यह भी दिखाया जाता है कि जैसे ससुराल वाले तो सर्वगुणसंपन्न हैं और बहू तो जैसे उन पर कलंक है जिसे समाज की रीतियां नहीं आतीं, जबकि हरेक प्रांत एवं जाति के रीतिरिवाजों में जगह, पसंद एवं समय के अनुसार बदलाव हुए हैं. लेकिन परिवार के बड़े जिन्हें अपने से छोटों को बरगद की सी छांव देनी चाहिए इन ढकोसलों के माध्यम से उन्हें अपनी आकांक्षाओं का शिकार बनाते हैं.

महिलाएं इतनी मेहनत इन रूढि़यों एवं फालतू की रस्मों को सीखने एवं निभाने में करती हैं उस के बजाय कुछ उत्पादक कार्य करे जैसे यदि पढ़ीलिखी है तो व्यापार या नौकरी, अनपढ़ या कम पढ़ीलिखी है तो कोई हाथ का काम करे तो घर में कुछ आर्थिक मदद मिले. यदि ये सब न करे तो अपने बच्चों की परवरिश अच्छे तरीके से करे. उन के साथ समय बिताए, उन के साथ खेलेकूदे, उन्हें स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दे तो निश्चितरूप से वे बच्चे एवं परिवार स्वस्थ, सुंदर एवं शांतिपूर्ण होगा और फिर 1-1 परिवार मिलकर ही तो देश का निर्माण करता है.

Winter Special: मेकअप के लैटेस्ट ट्रेंड

रेखा, सिमी ग्रेवाल, मैडोना, प्रसिद्ध सिंगर/अभिनेत्री डेम जूली एंड्रयूज आदि कई ऐसे नाम हैं, जिन पर बढ़ती उम्र का कोई निशान या प्रभाव नजर नहीं आता. अपनी खूबसूरती के दम पर ये हस्तियां हर पार्टी में सब के लिए आकर्षण का केंद्र होती हैं. बेशक यह कास्मेटिक सर्जरी का कमाल हो सकता है, पर इस में परफेक्ट मेकअप का भी बहुत बड़ा हाथ होता है. मेकअप करना एक कला है, जिस से आप अपने चेहरे की खामियां छिपा कर उसे और अधिक आकर्षक बना सकती हैं. गए वे दिन जब मेकअप का अर्थ सिर्फ चेहरे पर ड्रेस से मेल खाते ब्लशर, आई शैडो और लिप कलर लगाना ही होता था. अब इस में भी आप की रचनात्मकता और कल्पनाशीलता का विशेष महत्त्व है.

क्या है लैटेस्ट ट्रेंड मेकअप के

मिनरल मेकअप आजकल का नवीनतम ट्रेंड है. इस मेकअप में ज्यादातर पाउडर फार्म में कास्मेटिक्स का प्रयोग किया जाता है. बेहद ही कम नजर आने वाला यह मेकअप मैट फिनिश वाला होता है. इस में इस्तेमाल होने वाले कास्मेटिक्स स्किन को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाते और ये स्किन में आसानी से मिल जाते हैं.

यह मेकअप खासतौर से 30 वर्ष से ऊपर की महिलाओं पर खूब फबता है. किसी भी ग्लौसी या क्रीमी फाउंडेशन के प्रयोग से चेहरे की झुर्रियां साफ नजर आती हैं जबकि सौफ्ट मैट फिनिश से नजर चेहरे की झुर्रियों के बजाय हाइलाइट हुए नैननक्श पर टिक जाती है.

नैचुरल व न्यूनतम मेकअप इस सीजन का एक अन्य ट्रेंड है. मेकअप आप की प्राकृतिक सुंदरता को उभारने के लिए किया जाता है, इसलिए इस सीजन में कम से कम कास्मेटिक्स के प्रयोग से सिर्फ चेहरे के फीचर्स को हाइलाइट किया जाएगा. ब्लशर और लिप कलर्स बेहद सौफ्ट एवं हलके रहेंगे और आई शैडो भी न के बराबर यानी न्यूट्रल रहेगा. ब्राउन, ब्लू या ग्रीन जैसे कलर ड्रामेटिक इफेक्ट के लिए प्रयोग किए जाएंगे. आइलाइनर और मस्कारा भी बेहद कम मात्रा में लगाया जाएगा, सिर्फ उतना कि आंखों का आकार सुंदर लगे. फिर भी मेकअप इफेक्ट में आंखों का मेकअप आकर्षण का मुख्य केंद्र होगा.

आई शैडो लगाते समय ऊपरी आई लिड पर व बाहर की ओर किनारे पर बोल्ड कलर लगाएं और फिर उसे ब्रश की सहायता से ऊपर की ओर फैला कर स्किन के साथ मिला लें. इस से न सिर्फ आप का मेकअप सौफ्ट होगा बल्कि ड्रामेटिक फिनिश भी मिलेगी.

नकली आईलैशेज लगाने का फैशन भी अब खत्म हो गया है. इस की जगह आई लाइन के बाहरी किनारे पर डार्क शेड की पेंसिल लगा कर इन की कमी पूरी करें. कुछ मेकअप आर्टिस्ट कलरलैस व स्किन कलर्स वाली आइब्रो भी काफी पसंद कर रहे हैं. आंखों के अलावा गालों को भी इस सीजन में हलके गुलाबी, पिंक ब्लू, नैचुरल टैन व पेल कलर्स जैसे हलके बेज से सजाया जाएगा. इस साल मेकअप करते समय ध्यान रखें कि आप के ब्लशर का कलर आई मेकअप से मैच करे.

लिप कलर्स में इस बार हलके पिंक, वायलेट, फुशिया जैसे लाइट कलर्स से ले कर बिलकुल हलके त्वचा से मेल खाते रंग फैशन में रहेंगे. लिप ग्लौस से इस सीजन में दूर रहें. मैट लिपस्टिक का चलन फिर से आएगा. इस से आंखों का मेकअप हाइलाइट करने का मौका ज्यादा मिलेगा.

हलके और ब्राइट के कंट्रास्ट के फैशन का जादू इस बार सिर चढ़ कर बोलेगा जैसे यदि आंखों का मेकअप ब्राइट है तो लिप कलर हलका रखें और यदि लिप कलर ब्राइट लगाया है तो आंखों का मेकअप कम से कम रखें.

Winter Special: इस ठंड बचें जानलेवा बीमारियों से

दिसंबर का महीना आते ही पूरे उत्तर भारत में ठंड का प्रकोप बढ़ना शुरू हो गया है. इसके साथ ही आ गई हैं कई तरह की बीमारियां भी. सर्दियां आते ही जुकाम, खांसी और बुखार के अलावा अस्थमा, हाई ब्लड प्रेशर और ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों की तादाद भी बढ़ने लगी हैं. खासकर दिल के मरीजों की संख्या में तो करीब 25 फीसदी तक इजाफा हुआ है.

डॉक्टर्स का कहना है कि सर्दी के मौसम में विशेष सावधानी की जरूरत है. डॉक्टर्स की मानें तो सर्दी में स्वस्थ बने रहने के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि सर्दी में होने वाली बीमारियों के लगातार बढ़ने और पनपने का खतरा बना रहता है. ऐसे में जरूरी है सही समय पर सही इलाज. सर्दी के मौसम में शरीर को जितना बचकर चलेंगी, उतना ही आप बिमारियों से दूर रहेंगी.

सर्दियों में होने वाली बीमारियां

इस मौसम में लकवे की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि सर्दी में खून की नलियां सिकुड़ जाती हैं, जिससे खून का प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है. इससे हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों में लकवे का खतरा बढ़ जाता है.

ऐसे रखें अपना ध्यान

हृदय रोग विशेषज्ञ सर्जन डॉ. राकेश वर्मा ने बताया दिल और ब्लड प्रेशर के मरीज सुबह एकदम से ठंड में बाहर न जाएं. बिस्तर से उठने से पहले गर्म कपड़े पहनें और थोड़ा एक्सरसाइज करते हुए उठें. सर्दी के मौसम में सिर, हाथ पैर को पूरी तरह से ढंक कर चलें, ताकि सर्द हवाएं आपके शरीर के भीतर न जा सकें.

इससे बचने के लिए समय-समय पर ब्लड प्रेशर की जांच कराते रहना जरूरी है. अस्थमा के मरीजों को भी विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है. ठंड के चलते अस्थमा के मरीजों में दौरे पड़ने की संभावना बढ़ जाती है. ऐसे मरीज अपनी दवाएं और इन्हेलर हमेशा अपने साथ रखें. ठंड के चलते धमनियां के सिकुड़ने से हार्ट अटैक का भी खतरा बना रहता है.

इन छोटे-छोटे उपायों को अपनाकर आप दिल की बीमारियों, अस्थमा और हाई ब्लड प्रेशर से होने वाली परेशानियों से बच सकते हैं.

सर में रुखी रुसी के लिए क्या करें?

सवाल 

मेरी उम्र 26 वर्ष है. समस्या यह है कि मेरे सिर में रूखी रूसी हो गई है. सिर की त्वचा पर कई जगह खुश्की जमा हो गई है. मैं डैंड्रफप्रूफ शैंपू इस्तेमाल कर रही हूंफिर भी कोई फर्क नहीं पड़ा. कोई उपाय बताए?

जवाब

अपने बालों को स्वच्छ रखने के लिए सप्ताह में कम से कम 2 बार किसी अच्छे ऐंटीडैंड्रफ शैंपू से बाल अवश्य धोएं और जब भी बाल धोएं तब अपनी कंघीतौलिया व तकिए को भी किसी अच्छे ऐंटीसैप्टिक के घोल में डुबो कर धोएं और धूप में सुखा कर ही दोबारा इस्तेमाल कीजिए. इस के अलावा नारियल के तेल में कपूर मिला कर बालों की जड़ों में मालिश करें. 4-5 घंटे बाद बाल धो लें. यदि फिर भी कोई लाभ न मिले तो किसी अच्छे कौस्मैटिक क्लीनिक में जा कर ओजोन ट्रीटमैंट या बाई औप्ट्रौन की सिटिंग्स ले सकती हैं. इस से डैंड्रफ तो कंट्रोल होगा हीसाथ ही उस की वजह से हो रहे हेयरफौल पर भी नियंत्रण होगा. रूसी की समस्या से बचने के लिए घरेलू उपचार के लिए सेब कद्दूकस कर के रस निकाल लें. रूई के फाहे से उसे बालों की जड़ों में लगाएं. सूख जाने पर बालों को धो लें.

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