Sonam Kapoor ने दिखाई बेटे वायु की पहली झलक, शेयर किया क्यूट वीडियो

बॉलीवुड की फेशन क्वीन कही जाने वाली एक्ट्रेस हाल ही मां बनी थी. जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर काफी ट्रेंड में थी. बता दें, हम बात कर रहे है सोनम कपूर अहूजा की, जो कि मां बनने के बाद बेहद ही खुश है और उनसे जुड़ी कुछ सोशल मीडिया पर फोटो शेयर हुई है.

शादी के चार साल बाद मां बनी सोनम कूपर

आपको बता दे, कि सोनम कपूर और आंनद अहूजा की शादी साल 2018 में हुई थी, कपल की शादी काफी धूमधाम से हुई थी. शादी के चार साल बाद 30 अगस्त 2022 को सोनम कपूर अहूजा को एक बेटा हुआ था. जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर पहले कभी नहीं देखी गई, लेकिन अब तीन महीने बीत जाने के बाद, पहली बार सोशल मीडिया बेटे वायु की फोटो वायरल हो रही है. जी हां, कपल ने पहली बार अपने बेटे वायु की वीडियो शेयर की है. एक्ट्रेस ने बेटे की सोशल मीडिया पर पहली झलक दिख लाई है.

 

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सोनम ने ये वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर की है. जिसमे वो अपने पति आनंद कपूर आहूजा के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड करती दिखाई दे रही है. वीडियो को शेयर करते हुए अपने पिता अनिल कपूर और मां सुनीता कपूर को भी टैग किया है. उन्हे वायु के पैरेंट्स बताया गया है. 

मुंबई में हुआ था, बेटा वायु

 

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सोनम कपूर और आंनद अहूजा काफी समय से मुंबई में रह रहे थे. फिल्म स्टार ने अपनी डिलीवरी भी मुंबई मे की थी. कपल माता-पिता मुबंई में ही बना थे और बेटे का वेलकम किया था. बता दें, कि बेटे के जन्म के करीब दो महीने बाद एक्ट्रेस वापस अपने पति आंनद अहूजा के साथ लंदन के लिए रावाना हो गई. वर्क फ्रंट की बात करें तो सोनम अपने काम से छुट्टी ले चुकी है और बेटे के साथ टाइम स्पेंड कर रही है.

दूसरों की नकल करके मेकअप करने का प्रयास कभी न करें- आकांक्षा रंजन कपूर

लगभग हर बच्चा बड़ा होकर उसी पेश को अपना कैरियर बनाता है, जिस माहौल व परिवेश में उसकी परवरिश होती है. यही वजह है कि फिल्मी माहौल में पली बढ़ी सभी संताने फिल्म उद्योग में ही सक्रिय हैं. ऐसी ही संतानों में से एक आकांक्षा रंजन कपूर हैं, जो कि इन दिनों ‘नेटफ्लिक्स’ पर स्ट्रीम हो रही फिल्म ‘‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’’ में राज कुमार राव, राधिका आप्टे व हुमा कुरेशी के संग निक्की अधिकारी के किरदार में नजर आ रही हैं. आकांक्षा रजन कपूर के पिता अपने समय के अभिनेता व टीवी सीरियल निर्माता व निर्देशक शशि रंजन हैं. उनकी मां अनु रंजन एक पत्रिका की संपादक व प्रकाशक रही हैं. आकांक्षा रंजन कपूर की बड़ी बहन अनुश्का रंजन भी अभिनेत्री हैं. वैसे आकांक्षा रंजन कपूर का कहना है कि उन्हे तो नर्सरी कक्षा से ही अभिनय का चस्का रहा है, तब तक उन्हे इस बात का अहसास ही नहीं था कि उनके माता पिता क्या करते हैं.

प्रस्तुत है आकांक्षा रंजन कपूर से हुई बातचीत के अंश. . .

आपकी परवरिश फिल्मी महौल मे हुई. इसके अलावा जब आपकी बड़ी बहन अनुश्का ने अभिनय में कैरियर बना लिया, तो इससे आपका हौसला बढ़ा होगा?

-जी हॉ!ऐसा आप कह सकते हैं. पर उस वक्त मैं इतनी समझदार भी नही थी. मैं तो करिश्मा कपूर को ेदेखकर सोचती थी कि मुझे भी यही करना है. मै तो यही कहती थी कि यदि करिश्मा कपूर कर सकती है, तो मैं भी कर सकती हूं. इतना ही नही मुझे जिस अभिनेत्री का काम पसंद आ जाता, मैं उसी की तरह बनने की बात करने लगती थी. तो आप मान लीजिए, कि मुझे बचपन से ही अभिनय का चस्का था. मैने नर्सरी में भी नाटकों में अभिनय किया था.

आपको अभिनय का प्रशिक्षण लेने की जरुरत पड़ी या नहीं?

-मेेरे अंदर अभिनय के गुण थे. लेकिन उन्हे पॉलिश करने के मकसद से मैने स्कूल की पढ़ाई पूरी होने के बाद अभिनय व फिल्म विधा को समझने के लिए मंुबई के गोरेगांव स्थित ‘व्हिशलिंग वूड स्कूल’ से दो साल का कोर्स किया. फिर परफार्मिंग आर्ट्स के आईटीए स्कूल से भी चार माह का कोर्स किया. मैने बौलीवुड डांस के साथ ही कत्थक नृत्य भी सीखा. मैने विकास सर से डिक्शन क्लासेस ली. पूरे तीन साल तक मैंने खुद को इस तरह से तैयार किया.

आपने म्यूजिक वीडियो ‘हम ही हम थे’ से कैरियर शुरू किया था. इसकी कोई खास वजह थी?

-अभिनय व नृत्य का प्रशिक्षण पूरा होने के बाद मैने संघर्ष शुरू किया. लंबे संघर्ष के बाद मुझे फिल्म ‘गिल्टी’ मिली. मैने इस फिल्म के लिए आवश्यक तैयारी शुरू की. लेकिन फिल्म ‘गिल्टी’ की शूटिंग शुरू होने से एक माह पहले ही मुझे इस गाने के म्यूजिक वीडियो के लिए बुलाया गया. मुझे गाना बहुत पसंद आया. गाना इतना संुदर था कि मैने सोचा कि इसे कर लेती हूं, इससे कैमरे के सामने काम करने की प्रैक्टिस हो जाएगी. क्योंकि तब तक मैं कैमरे के सामने गयी नहीं थी. इसके अलावा इसमें आपरशक्ति खुराना भी थे.  इस म्यूजिक वीडियो में काम करके मुझे काफी कुछ सीखने को मिला. कैमरा एंगल की समझ बढ़ी.

हर कलाकार की तमन्ना होती है कि उसकी प्रतिभा बड़े परदे पर नजर आए. पर आपकी पहली फिल्म ‘गिल्टी’ तो ओटीटी प्लेटफार्म ‘नेटफ्लिक्स’ पर आयी. इससे कुछ मायूसी हुई होगी?

-बिलकुल नही. मैं कई वर्षों से अभिनय में कैरियर शुरू करने के लिए कोशिशें कर रही थी. कोई बात नही बन रही थी. मेरी तमन्ना हीरोईन बनना और खुद को बड़े परदे पर देखने की थी. पर शुरूआत नहीं हो पा रही थी. ऐसे में जब मेरे पास ‘गिल्टी’ का आफर आया, तो मैने लपक लिया. आखिर मुझे अभिनय करने का अवसर जो मिल रहा था. मैं चाहती थी कि फिल्म इंडस्ट्री को अहसास हो कि मैं लोगो के सामने अभिनय कर सकती हूं. इसलिए बुरा नही लगा था. बल्कि खुशी हुई थी कि आखिरकार मुझे अभिनय करने का अवसर मिला. पर इच्छा है कि मेरा काम बड़े परदे पर नजर आए. मुझे उम्मीद है कि वक्त आने पर ऐसा भी होगा. ‘गिल्टी’ के बाद मैने ओटीटी पर वेब सीरीज ‘रे’ की.  अब ओटीटी प्लेटफार्म ‘नेटफ्लिक्स’ पर ही मेरी फिल्म ‘मोनिका ओ माई डार्लिंग’ स्ट्रीम हो रही है.

‘गिल्टी’ के स्ट्रीम होने के बाद किस तरह की प्रतिक्रियाएं मिली थीं?

-नेटफ्लिक्स ने इसके स्ट्रीम होने से एक दिन पहले  पत्रकारों को यह फिल्म दिखायी थी, उस वक्त हम सभी कलाकार वहां पर थे. तब जिस तरह से पत्रकारों के अलावा अन्य कलाकारों व क्रिएटिब लोगो ने मेरे काम की तारीफ की थी, उससे मैं  अंदर ही अंदर अति उत्साहित हो गयी थी. मेरे लिए वह पहला मौका था, जब मैं अपने काम की तारीफ सुन रही थी. मेरी समझ मेंे नही आ रहा था कि मैं क्या कहूं.  पर मुझे अच्छा लग रहा था कि पहली बार में ही मेरे काम को पसंद किया जा रहा है.

हालिया फिल्म ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’’ करने की क्या वजह रही?

-मैने निर्देशक वासन बाला के साथ वेब सीरीज ‘रे’ की थी. फिर एक दिन उनका फोन आया कि एक मल्टीस्टारर फिल्म है, क्या मैं करना चाहूंगी? जब उन्होने मुझे राजकुमार राव, राधिका आप्टे व हुमा कुरेशी के नाम बताए, तो मैं उत्साहित हो गयी. तो मैने तुरंत कह दिया कि सोचने वाली क्या बात है. जब ऐसे बेहतरीन कलाकार हैं. फिर श्रीराम राघवन सर हों, तो मैं मना नही कर सकती. और जब पटकथा सुनायी, तो वह भी कूल और बहुत ही अलग तरह की थी. मेरे दिमाग में आया कि अगर मैं अच्छा काम कर पायी, तो लोग जरुर पसंद करेंगें. मैने इससे पहले डार्क व गंभीर किरदार निभाए थे और पहली बार मुझे इसमें कॉमेडी करने को मिला. कॉमेडी करना कठिन होता है. इतना ही नही अब लोग देख रहे हैं, और उन्हे भी अहसास हो रहा है कि इसमें मेरे किरदार का कोई एक डायमेंशन नही है. कुछ ग्रे है. कुछ कन्फ्यूजन है. मतलब इसमें मुझे अपने अंदर की प्रतिभा को निखारने के पूरे अवसर मुझे नजर आए थे. वही हुआ.

फिल्म ‘‘मोनिका ओ माय डार्लिंग ’’ में आपके अभिनय के संदर्भ किस तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं?

-देखिए, मैं फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों, अपने पारिवारिक सदस्यों और अपने दोस्तों की प्रतिक्रियाओं पर ज्यादा ध्यान नही देती. मैं यह मानकर चलती हूं कि यह लोग तो मेरा हौसला बढ़ाने के लिए मेरे काम की प्रशंसा ही करेंगें. मुझे उम्मीद कम थी कि फिल्म आलोचक मेरे बारे में कुछ लिखेंगें. मुझे लग रहा था कि आलोचक केवल राज कुमार राव, राधिका आप्टे और हुमा कुरेशी के बारे में ही लिखेंगे. पर हर किसी को हमारी फिल्म पसंद आयी. बड़े से बड़े फिल्म आलोचक ने मेरे बारे में लिखा और सोशल मीडिया पर पोस्ट भी डाली. कई आलोचकों ने मेरे अभिनय को स्पेशल मेंशन किया. यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात है. मैं इसें अधिक पाने की उम्मीद भी नही कर सकती थी. कई फिल्म निर्देशक,  जिनके साथ काम करने का मैं सपना देख रही हूं, वह भी मेरे अभिनय की प्रशंसा करते हुए ट्वीट कर रहे हैं. इससे मैं अति उत्साहित हूं. मैने हर किसी की पोस्ट के जवाब में उनका शुक्रिया अदा करने के साथ ही उनके साथ काम करने की ख्वाहिश व्यक्त की.  देखिए, इतने वर्षों से मैं कह रही थी कि मैं काबिल हूं. . मैं काबिल हूं, पर उसकी सुनवाई नहीं थी. लेकिन अब मेरा काम देखकर लोगों को अहसास हो रहा है कि मैं काबिल हूं. यह बात मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाती है.

आपने वासन बाला के निर्देशन में फिल्म ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग ’के अलावा वेब सीरीज ‘रे’ की है. उनमें आपको क्या खासियत नजर आयी?

-वासन बाला मास्टर माइंड और जीनियस निर्देशक हैं. उनके काम करने का तरीका बहुत अलग है. उन्हे सिनेमा बहुत पसंद है. उनके सिनेमा में अनचाहे ही दर्शकों के लिए कुछ न कुछ नयापन आ ही जाता है.

आपने कत्थक नृत्य का प्रशिक्षण हासिल किया है. यह आपको अभिनय में किस तरह से मदद करता है?

-जब मेरे पापा ने मुझे कत्थक नृत्य सीखने की सलाह दी थी. तो मुझे उनकी बात समझ में नहीं आयी थी. मैने उनसे कहा था कि मुझे बौलीवुड में काम करना है. इसलिए मैं बौलीवुड डांस सीखती हूं. पर उन्होंने मुझ पर कत्थक नृत्य सीखने का दबाव डाला. और मैने सीखा. पर इस नृत्य को सीखने के बाद मुझे अहसास हुआ कि इस नृत्य की वजह से मेरे अभिनय व डांस में जो ‘ग्रेस’ आता है, वह बौलीवुड डांस से नहीं आ सकता. हमारे हाथ के हाव भाव, आंखे सभी अभिनय में मदद करते हैं. कत्थक नृत्य के प्रशिक्षण के चलते हम बहुत ठहराव के साथ अभिनय करते हैं. हम हाथ भी स्टाइल में हिलाते हैं. कत्थक नृत्य ने मुझे आंखों से बात करना सिखाया. अब मुझे लगता है कि कत्थक के चलते अभिनय में मुझे बड़ी मदद मिल रही है.

क्या आपने व्हिश्लिंग वुड एक्टिंग स्कूल में ट्रेनिंग के दौरान स्टूडेंट जो फिल्में बनाते हैं, उनमें अभिनय किया था?

-जी हॉ! किया था. मगर कई वर्ष हो गए, उन फिल्मों को देखा नहीं है. वहां पर निर्देशन का प्रशिक्षण ले रहे स्टूडेंट को हर दह माह में फिल्म बनानी होती थी. म्यूजिक वीडियो निर्देशित करने होते थे. मैने कई लघु फिल्में की हैं. जिनमें से एक यूट्यूब पर मौजूद है. जिसमें में सिगरेट पीने की एक्टिंग करती हूं.

जब आपने स्टूडेंट की फिल्मों में अभिनय किया था, उस वक्त आपने किस तरह की फिल्में करने का सपना देखा था?

-सच कहूं तो उस वक्त ज्ञान कम था. उन दिनों जिस तरह की फिल्में बन रही थी और मै जिस तरह की फिल्में में देख रही थी, उसी तरह की फिल्में करने के बारे में सोच रही थी. लेकिन तब से अब तो सिनेमा काफी बदल गया है. उन दिनों ‘गिल्टी’ या ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ जैसी फिल्में करने के बारे में सोच ही नहीं सकती थी. उन दिनों इस तरह का सिनेमा बनता ही नहीं था. उन दिनों बौलीवुड मसाला फिल्में बन रही थीं, जिनमें बौलीवुड डांस का बोलबाला था.

आपको लगता है कि ओटीटी के आने से सिनेमा बदल गया है?

-जी हॉ! सौ प्रतिशत. . . अन्यथा हम ‘गिल्टी’ या ‘ रे ’ या ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग’ जैसी फिल्मों की बात सोच नही सकते थे. ओटीटी के आने से पहले तो वही डांस युक्त बौलीवुड मसाला फिल्में ही बन रही थीं. अब तो हर प्रतिभाशाली कलाकार,  निर्देशक,  लेखक व संगीतकार को काम मिल रहा है.

पर सुना है कि ओटीटी पर कलाकार को काम उसके सोशल मीडिया के फालोवअर्स के आधार पर मिलता है?

-मुझे लगता है कि आज कल यह हर जगह लागू हो गया है. फिर चाहे हम किसी ब्रांड को साइन करे या ओटीटी या फिल्म साइन करें. मुझे फालोवअर्स का गेम समझ में नहीं आता, मगर यह है. फिर भी ओटीटी पर टैंलेंट की कद्र ज्यादा हो रही है. ओटीटी पर हम छोटे और बड़े कलाकार के साथ काम कर सकते हैं. वहां पर छोटे बड़े का कोई अंतर नही है. मेरा कहना है कि अब लोगों के सामने अवसर काफी हो गए हैं.

लेकिन आपको नही लगता कि फालोवअर्स के आधार पर जब काम दिया जाता है, तो कई बार टैलेंट की अनदेखी भी हो जाती है?

-आपने एकदम सही कहा. एक प्रतिभाशाली कलाकार को कई वजहों से काम नहीं मिलता. इनमें से फालोवअर्स की संख्या भी एक मुद्दा है. फालोवअर्स की वजह से मेरी दीदी को भी एक फिल्म नहीं मिली थी. तब हम सभी कान्फ्यूज थे कि ऐसा भी होने लगा है. महज इंस्टाग्राम के फालोवर्स की वजह से काम नही मिला? यहां हर इंसान की किस्मत अलग है. इसके बावजूद मैं कहती हूं कि ओटीटी पर काम करने के अवसर ज्यादा हैं. यदि ओटीटी न होता तो मेरे कैरियर की शुरूआत न हो पाती. मैं तो उसके पहले से फिल्मों के लिए कोशिश कर रही थी. पर काम मिला तो ओटीटी पर ही.

कहते है कि एक किरदार को निभाते समय कलाकार को दो चीजों की जरुरत पड़ती है. पहला उसके अपने जीवन के अनुभव और दूसरा उसकी अपनी कल्पना शक्ति. आप किसे कितना महत्व देती हैं?

-मैं तो हर किरदार को निभाते समय दोनों का उपयोग करती हूं. फिल्म‘ गिल्टी’ के किरदार को निभाने के लिए मेरे अपने जीवन के अनुभव नही थे. वहां मैने कल्पना शक्ति का उपयोग ज्यादा किया. किरदार को समझने के बाद मेरे अपने जीवन के जो अनुभव थे,  उनके बीच मैंने उस किरदार को निभाया, तो कल्पना श्क्ति उसमें ज्यादा थी. वैसे भी मै हर किरदार को निभाते समय किरदार को समझने के बाद अपने जीवन के अनुभवों को याद कर फिर दोनों के बीच उस किरदार को रखकर निभाती हूं. शायद यही वजह है कि एक ही किरदार को हर कलाकार अलग अलग ढंग से निभाता है. क्योंकि हर किसी का अनुभव अलग होता है. लेकिन मैं बीच मे पटकथा में लिखे किरदार के अनुभव को भी लाना पसंद करती हूं.

इंसान जितना अधिक पढ़ता है, उतना ही अधिक वह कलपना शील होता है. आप कितना पढ़ती हैं?

-मैं बहुत ज्यादा पढ़ती हूं. मुझे लोगो की बायोग्राफी पढ़ना पसंद है. मैं फिक्शन बिलकुल नही पढ़ती. सेल्फहेल्प वाली किताबें पढ़ती हूं. इंसान अपने जीवन में, अपने आस पास जो कुछ देखता है, उससे भी उसकी कल्पनाशक्ति बढ़ती है. इतना ही नहीं मेरी समस्या यह है कि मैंजो कुछ करती हूं,  उस पर भी नजर रखती हूं. जब कभी मेरी दोस्त किसी तकलीफ में हो या रो रही हो तो मैं उसे आब्जर्व करती हूं कि वह रोेते समय चेहरा कैसा बना रही है. उसकी नाक बह रही है या नहीं. . . वह अपने हाथ किस तरह से चला रही है या नही चला रही है. वगैरह वगैरह. . . इस तरह का आब्जर्वेशन भी कल्पना शक्ति को बढ़ाने में मदद ही करता है. इसके लिए पढ़ना,  आब्जर्वेशन, फिल्में देखना, लोगों से मिलना, उनसे बातें करना फायदा ही देता है.

आपका फिटनेस मंत्रा क्या है?

-मेरा मानना है कि अभिनय करने के लिए कलाकार का फिट रहना बहुत जरुरी है. इसलिए मैं फिट रहने के लिए सब कुछ करती हूं. फिटनेस को लेरक में बहुम पैशिनेट हूं. मैं बचपन से ही बहुत ज्यादा स्पोर्टस खेलती आयी हूं. मैं बैडमिंटन बहुत अच्छा खेलती हूं. टेनिस खेलती हूं. हर दिन योगा करती हूं. मैं जिम जाती हूं. रनिंग करती हूं.

आपके लिए दोस्ती के क्या मायने हैं?

-मेरे लिए मेरे दोस्त बहुत मायने रखते हैं. मेरे दोस्त बहुत हैं. मेरे सभी दोस्त मुझसे पूछते है कि तुम सबसे इतनी अच्छी दोस्ती कैसे निभाती हैं?पर मुझे लोग पसंद हैं. मुझे मेरी गर्लफ्रेंड पसंद हैं. गर्लफेंड बनाना भी मेरा शौक है. मेरी कुछ बचपन की दोस्त आज भी मेरी दोस्त हैं. मेरी पहली कक्षा की दोस्त आज भी मेरे साथ जुड़ी हुई है. मैं अपनी नई दोस्तों से भी जुड़ी हुई हूं. मेरे लिए दोस्ती को बरकरार रखना बहुत जरुरी है. मेरे दोस्त मेरे लिए परिवार की तरह हैं. मैं उनसे फोन पर बात करती हूं. या फेशटाइम करती हूं.  अपनी दोस्तो के लिए समय निकालती हूं.

दोस्ती को मेनटेन करने के लिए क्या जरुरी है?

-पहली जरुरत होती है दोस्त के लिए समय देना. मगर मेरे ज्यादातर दोस्त काफी व्यस्त रहते हैं. दूसरी बात दोस्ती में लॉयालिटी बहुत जरुरी है. हमें इतना यकीन होना चाहिए कि हमें कोई समस्या आएगी, तो मेरे साथ मेरी यह दोस्त खड़ी नजर आएगी. दोस्ती में विश्वास बहुत जरुरी है. हम हर दिन भले न मिले, हर दिन भले न बात कर पाएं, पर तीन चार माह बाद भी मिलने पर बात करने पर यह अहसास नही होता कि हमने इतने समय से बात नही की है.

निजी जिंदगी में अभिनय के अलावा कुछ करने की इच्छा है?

-अभिनय कैरियर शुरू करने से पहले मैं एक पी आर कंपनी में काम कर रही थी. कुछ समय मैंने ईवेंट भी किया. अभिनय में जब मेरे दिल की भड़ास पूरी तरह से निकल जाए, तब पुनः पी आर में या मेकअप के क्षेत्र मंे कुछ करने के बारे में सोचूं. मेकअप में भी मेरी काफी रूचि है.

मेकअप के संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगी? दूसरी लड़कियों को मेकअप टिप्स देना चाहेंगी?

-जब इंस्टाग्राम बड़ा होने लगा, तभी मेरा मेकअप के प्रति झुकाव बढा. उन दिनों इंस्टाग्राम पर कई मेकअप इंफ्यूलांसर थे , जिन्हे में फालो करती थी. मेकअप के साथ मेरा इंस्टेंट कनेक्शन था. मैं कई तरह के मेकअप के प्रोडक्ट खरीदती थी और उनका अपने उपर इस्तेमाल कर नए न प्रयोग किया करती थी. मैं हर ईवेंट पर खुद ही अपना और अपने दोस्तों का मेकअप किया करती थी. मेकअप करना मुझे काफी रोचक लगात है. मैं हर लड़की को यही सलाह देना चाहूंगी कि आप दूसरों की नकलकर वैसा ही मेकअप करने का प्रयास कभी न करें. आप हमेशा वैसा मेकअप करें, जो आपके उपर शूट करता हो. ऐसा मेकअप जो आपकी स्किन के लिए उपयुक्त हो. मसलन , भारतीय लड़कियों को पता नही है कि उन्हे अपनी आंखों के नीचे के धब्बे ढंकने के लिए आरेंज मेकअप करना चाहिए. क्योंकि लगभग हर भारतीय की स्किन डार्क है. इसी तरह मेकअप के कई नुस्खे हैं. हर लड़की को सबसे पहले अपनी स्किन के बारे में बेहतर ढंग से जानना चाहिए, फिर उसके अनुरूप ही मेकअप करना चाहिए. अक्सर होता यह है कि लड़कियों देखती हैं कि इस मेकअप इंफ्यूलेंसर ने ऐसा किया है, तो हम भी करते हैं. पर हम भूल जाते हैं कि उनकी स्किन अलग है. वह अपनी फोटो को ‘फोटो शॉप’ करके इंस्टाग्राम या फेशबुक पर डालती हैं. उनकी स्किन अलग प्रकार की होती है. सभी को समझना होगा कि हर स्किन, हर चेहरा अलग है, और उसी के अनुरूप मेकअप करना चाहिए.

क्या आप मानती हैं कि उम्र के अनुसार भी मेकअप में बदलाव होता है?

-जी हॉं! पहले मैं बहुत डार्क काला मेकअप करती थी. उस वक्त चेहरे पर मेकअप ढोंपना अच्छा लगता था. लेकिन मैच्योर होने के साथ ही स्टाइल बदल जाती है. वैसे मेकअप की स्टाइलें समय के साथ बदलती रहती है. फैशन भी मेकअप को डिक्टेट करता है. इन दिनों बहुत नेच्युरल चेहरा, बिना मेकअप या कम मेकअप वाला लुक ज्यादा लोकप्रिय है.  पहले हर लड़की काजल बहुत लगाती थीं. ओठों पर भी डार्क लिपस्टिक उपयोग करती थी. अब हल्के रंग की लिपस्टिक का चलन है.

Anupama और अनुज की जाएगी याद्दाश्त! काव्या-वनराज की जिंदगी पर पड़ेगा असर

एक्ट्रेस रुपाली गांगुली स्टारर सीरियल अनुपमा के बीते दिनों टीआरपी चार्ट से पहले नंबर से हटने के कारण मेकर्स सीरियल (Anupamaa) की कहानी में बड़ा ट्विस्ट लाने की तैयारी कर रहे हैं. जहां हाल ही में प्रोमो वायरल हो रहा था कि अनुपमा और अनुज  के साथ वेकेशन पर जाते समय हादसा हो जाता है. वहीं अब खबरें हैं कि इस हादसे के बाद सीरियल की कहानी उलट-पुलट होते हुए दिखने वाली है. आइए आपको बताते हैं क्या होगा सीरियल में आगे…

अनुपमा-अनुज के साथ हुआ हादसा

 

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हाल ही में पाखी के ड्रामे के बाद अनुज-अनुपमा वेकेशन के लिए निकलते हुए नजर आए थे. जहां पर उनकी मुलाकात एक कपल से होती है, जिनके साथ वह अपना सफर बिताते हुए दिखते हैं. लेकिन कुछ गुंडे एक लड़की के पीछे पड़ जाते हैं. वहीं बात इतनी बढ़ जाती है कि गुंडे कपल पर हमला कर देते हैं. हालांकि अनुपमा और अनुज उन्हें बचाने की कोशिश करते हैं. इसी दौरान गुंडे अनुपमा और अनुज के सिर पर हमला कर देंगे. वहीं खबरों की मानें तो अनुज और अनुपमा के साथ हुआ हादसा उनकी पूरी जिंदगी बदल देगा. दरअसल, कहा जा रहा है कि एक्सीडेंट के बाद दोनों अपनी याद्दाश्त गवा बैठेंगे, जिसके चलते जहां अनुपमा, अनुज को भूल वनराज के साथ शादीशुदा जिंदगी में चलेगी तो वहीं दूसरी तरफ अनुज भी अनुपमा को भुला बैठेगा, जिसका फायदा बरखा और अंकुश उठाते दिखेंगे.

 

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फैंस हुए निराश

सोशलमीडिया पर अनुज-अनुपमा की याद्दाश्त जाने का ट्रैक सुनकर जहां दर्शक अपकमिंग ट्विस्ट के लिए बेकरार दिख रहे हैं तो वहीं #MaAn फैंस अनुपमा-अनुज को साथ ना देख पाने के कारण नए ट्रैक से नाराज नजर आ रहे हैं. वहीं मेकर्स से ऐसा ना करने की गुजारिश करते दिख रहे हैं. हालांकि अगर खबरों को सच मानें तो नए ट्रैक में दर्शकों काव्या का भी नया रुप देखने को मिलेगा. क्योंकि अनुपमा, वनराज के अफेयर और तलाक की बातें भी भूल जाएगी.

बेटा मेरा है तुम्हारा नही: क्या थी संजना की गलती

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चित्र अधूरा है – भाग 1 : क्या सुमित अपने सपने साकार कर पाया

फोन की घंटी लगातार बज रही थी, किचन में काम करतेकरते उमा झुंझला उठी थी, ‘फोन उठाने भी कोई नहीं आएगा, एक पैर पर खड़ी मैं इधर भी देखूं, उधर भी देखूं-..’ गैस का रेगुलेटर कम कर के वह दौड़ी

और रिसीवर उठाया, हैलो– कहते ही सुमित की आवाज सुनाई पड़ी, जो बहुत खुश हो कर कह रहा था, ममा, आप के आशीर्वाद से मेरा भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन हो गया है- मैरिट सूची में नाम ऊपर होने के कारण आशा है कि मुख्य सेवा में मेरा नाम आ जाएगा- मैं 1-2 दिन में घर पहुंचूंगा-

उमा कुछ कहती कि फोन कट गया-

उमा ने सोचा कार्तिकेय को जा कर खुशखबरी सुना दूं, शयनकक्ष में गई तो देखा कार्तिकेय गहरी नींद में सोए हुए हैं- कल रात 1 बजे, 3 दिन के टूर के बाद लौटे थे- थके होंगे वरना 6 बजे के बाद तो बिस्तर पर रह ही नहीं सकते- साढे़ 6 से 7 बजे तक उन का ‘योगा’ करने का समय है और 7 बजे से आसपास के एरिया की फोन के द्वारा जानकारी हासिल करने का, क्योंकि सभी एरिया के स्टाफ अफसरों को नित्य अपने एरिया के कामों की जानकारी देने के निर्देश दिए हुए हैं, ताकि कहीं कोई समस्या होने पर तुरंत उस का समाधान किया जा सके- एक पब्लिक अंडरटेकिंग कंपनी में चीफ इंजीनियर जो हैं-

अनुज ट्यूशन गया है और पिताजी सुबह की सैर के लिए- सन, सन की आवाज आई तो, याद आया कि गैस पर, दही जमाने के लिए दूध गरम करने के लिए रखा था- दोपहर के खाने में सब को खाने के साथ ताजा दही चाहिए इसलिए रोजाना सुबह उठ कर पहले यही काम करना पड़ता है- जल्दी से जा कर गैस का रेगुलेटर बंद किया- अनुज ने आज नाश्ते में आलू के परांठे खाने की फरमाइश की थी इसलिए कुकर में आलू रख कर आटा गूंधने लगी.

उसे याद आया, पिताजी ने उसे एक बार समझाते हुए कहा था, ‘उमा, तुझ में धैर्य क्यों नहीं है? जीवन में प्रत्येक वस्तु, पलक झपकते ही हासिल नहीं हो जाती बल्कि उस के लिए धीरज के साथ प्रयत्न करना पड़ता है- यह बात और है कि किसीकिसी को अपने मकसद में सफलता कम प्रयास करने पर ही मिल जाती है और किसी को बहुत ज्यादा मेहनत करने के बाद, लेकिन सच्ची लगन, धैर्य और विश्वास हो तो कोई वजह नहीं कि मानव अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर पाए- पता नहीं इनसान जरा सी असफलता से बेकार ही इतना विचलित क्यों हो उठता है.?’ और आज सचमुच पिताजी की कही बात सत्य सिद्ध हुई थी, बेवजह ही इतने मानसिक तनाव झेलने के बाद यह खुशी का क्षण आ ही गया— हाथ आटा गूंध रहे थे किंतु अनायास ही दिमाग में आज से 6 साल पहले का दिन चलचित्र की भांति मंडराने लगा.

उस दिन सुबह से ही मन बेचैन था, 12वीं का परीक्षाफल निकलने वाला था- सुमित शुरू से ही पढ़ाई में अच्छा था- हमेशा ही कक्षा में प्रथम आता था, अतः सभी शिक्षक उसे प्यार करते थे और उस से बहुत खुश रहते थे- 10वीं की बोर्ड की परीक्षा में मैरिट सूची में आ कर उस ने न केवल अपना बल्कि अपने स्कूल का नाम भी रोशन किया था और इस साल भी सभी उस से यही आशा कर रहे थे.

महाराष्ट में तो प्रवेश परीक्षा होती नहीं है, केवल 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर ही मेडिकल और इंजीनियरिंग कालिज में एडमीशन मिल जाता है, इसलिए शहर के नामी कालिज में सुमित का दाखिला करा कर हम भविष्य के लिए आश्वस्त हो गए थे.

सुमित के मौसा, दिवाकर काफी दिनों से बीमार चल रहे थे. बेचारी अनिला 2 छोटेछोटे बच्चों के साथ परेशान थी. दिवाकर अपने मातापिता की एकलौती संतान थे, इसलिए अनिला को ससुराल पक्ष से भी कोई मदद नहीं मिल पाती थी- सुमित को अपने मौसामौसी से बेहद लगाव था इसलिए उस ने स्वयं ही दिल्ली मौसी के पास जाने की इच्छा जताई तो उमा ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ जाने की आज्ञादे दी. वैसे उमा ने कभी बच्चों को अकेले नहीं भेजा था, इसलिए वह थोड़ी झिझक रही थी, किंतु कार्तिकेय का विचार था कि एक उम्र के पश्चात बच्चों को स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता आनी चाहिए और यह तभी संभव है जब बच्चों को अकेले रहने और आनेजाने की आदत डाली जाए.

1-2 दिन में सुमित आने वाला था. 10वीं का परीक्षाफल निकलने से पहले जब वह सुमित से बारबार पूछती कि क्या तुम पास हो जाओगे, तो एक दिन वह झुंझला कर बोला था, ‘ममा, आप मुझे किसी से कम क्यों आंक रही हैं. मैं मैरिट में अवश्य आ जाऊंगा.’

सचमुच मैरिट लिस्ट में उस का नाम देख कर घर भर की छाती गर्व से फूल उठी थी. वह सब की आशाओं का केंद्र बिंदु बन बैठा था. दादी कहतीं, ‘डाक्टर बनाऊंगी अपने पोते को, कम से कम बुढ़ापे में मेरी सेवा तो करेगा. दूसरों के पास तो दिखाने नहीं जाना पड़ेगा— उन का वश चले तो एक ही बार में मरीज का खून चूस लें.’

दादा कहते, ‘डाक्टर नहीं, मैं अपने पोते को अपनी तरह कलक्टर बनाऊंगा ताकि वह समाज में फैले भ्रष्टाचार को दूर करने में सहायक बन कर समाज के उत्थान हेतु काम कर सके.’

तनाव को कहें बायबाय

एक मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत उमा को शादी के बाद तनाव इसलिए हुआ, क्योंकि उस की ससुराल में भिंडी की सब्जी बनती थी, जिसे वह खाना पसंद नहीं करती थी. दूसरी समस्या यह थी कि पति के घर में भैंस का दूध आता था, जबकि उस ने बचपन से गाय का दूध पिया था. बात इतनी बढ़ी कि उमा ने अपने पति को तलाक देने की ठान ली, क्योंकि इन हालात की वजह से उसे नींद नहीं आती थी और वह हमेशा घबराहट में रहती थी. ऐसा होने से उस का काम में मन नहीं लगता था. ऐसी और भी कई समस्याएं आने लगीं तो वह मनोरोग चिकित्सक के पास गई, जिस से उसे अपनी समस्या का समाधान मिला. इस तरह की कई बड़ी अजीबोगरीब समस्याएं कभीकभी तनाव या डिप्रैशन का कारण बनती हैं.

महिलाओं में तनाव ज्यादा

यह देखा गया है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं तनाव की शिकार अधिक होती हैं, जिस का अनुपात 2:1 का होता है. इस के बारे में हुए शोध से पता लगा है कि करीब 87 प्रतिशत महिलाएं भारत में तनावग्रस्त रहती हैं. इस के बारे में मुंबई के फोर्टिस हौस्पिटल और एशियन हार्ट इंस्टिट्यूट की मनोरोग विशेषज्ञा डा. पारुल टौक कहती हैं कि महिलाओं में तनाव कई अवस्थाओं में आता है. जिस की वजह उन की शारीरिक संरचना होती है. मसलन, ‘एडौल्सन पीरियड’ जब माहवारी शुरू होती है. इस के बाद ‘पोस्टपार्टम डिप्रैशन’ और तीसरी अवस्था ‘मेनौपोज’ के बाद होती है. इन सभी अवस्थाओं में महिलाएं तनाव या डिप्रैशन का शिकार होती हैं और बारबार उन में होने वाला हारमोंस का बदलाव तनाव को अधिक बढ़ाता है. इस के अलावा बदलती हुई जीवनशैली, जिस में आज की महिलाएं घर और बाहर दोनों को संभालती हैं, की वजह से डबल स्ट्रैस उन में हो रहा है, लेकिन समय रहते अगर डाक्टरी परामर्श ले लिया जाए, तो तनाव का शिकार होने से महिलाएं बच सकती हैं.

तनाव के लक्षण

  • हमेशा थकान व चिड़चिड़ापन महसूस करना.
  • किसी काम का निर्णय न ले पाना, काम में मन न लगना.
  • जीवन के प्रति नकारात्मक सोच, खानपान में बदलाव, आत्महत्या की प्रवृत्ति का होना.
  • वजन का बढ़ना या घटना, एकाग्रता खोना और अनिद्रा का शिकार होना.

पारुल बताती हैं कि आजकल की महिलाओं में सहनशीलता का अभाव हो चुका है. इस की वजह उन का वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर होना है. पहले महिलाएं घर पर रह कर बच्चे और परिवार को संभालती थीं, जबकि आज घर और बाहर दोनों संभालने पड़ते हैं. ऐसे में तनाव कम करने के लिए परिवार और समाज की सोच को बदलना आवश्यक है.

ऐसे बचें तनाव से

  • तनाव ही धीरेधीरे डिप्रैशन का रूप ले लेता है, इसलिए समय रहते मानसिक रोग विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है और ऐसी नौबत न आने देने के लिए कुछ बातें अगर महिलाएं दैनिक जीवन में शामिल करें तो वे तनाव से बच सकती हैं.
  • व्यायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल करें. अगर ऐसा संभव न हो तो सुबहशाम टहलने की कोशिश करें.
  • जीवन में घटित हुई नकारात्मक बातों से अपनेआप को हमेशा दूर रखें. उन के बारे में न सोचें.
  • दिमाग का अधिक से अधिक उपयोग करें. इस के लिए समाचारपत्र व पत्रिकाएं नियमित रूप से पढ़ें. टीवी से अधिक समय  किताबें पढ़ने में दें, क्योंकि पढ़ने से कल्पनाशीलता बढ़ती है, जिस से दिमाग का व्यायाम हो जाता है.
  • आर्थिक परेशानी आने पर तनाव के बजाय शांत दिमाग से सोचें कि आप की आय कितनी है. फिर वैधानिक तरीके से कैसे, क्या करें इस की सलाह ऐक्सपर्ट से लें.
  • पतिपत्नी के रिश्ते में अगर तनाव चल रहा हो तो करीबी मित्र या घर वालों से इस बारे में बात करें. मैरिज काउंसलर से भी सलाह ली जा सकती है.
  • किसी शारीरिक बदलाव या बीमारी को ले कर तनाव में हैं, तो विशेषज्ञ से संपर्क करें.
  • सहकर्मी या बौस की वजह से तनाव होता हो तो समस्या की चर्चा संबंधित व्यक्ति से करें.
  • आजकल अधिकतर लोग कंप्यूटर और मोबाइल का प्रयोग करते हैं. काम खत्म होने पर उन्हें अपने से दूर रखें, क्योंकि कई बार गैजेट्स भी तनाव बढ़ाते हैं.
  • कुछ भोजन ऐसे हैं, जो हमारे शरीर को तनाव से लड़ने की शक्ति देते हैं. संतरे व सूखे मेवे में पोटैशियम की मात्रा अधिक होने से दिमाग को शक्ति मिलती है. आलू में विटामिन बी अधिक मात्रा में होता है, जो हमारी चिंता और खराब मूड को ठीक करता है.
  • अगर आप अकेली हैं तो ‘पैट्स’ या ‘बर्ड्स’ रख सकती हैं. उस से भी तनाव कम होगा.
  • हमेशा याद रखिए जिंदगी खुल कर आनंद के साथ जिएंगी तो स्वस्थ और सुखी रहने के साथसाथ तनावमुक्त भी रहेंगी.

11 टिप्स: फालतू पड़ी चीजों का ऐसे करें उपयोग

घर में ऐसी कई चीजें होती हैं जो पुरानी हो चुकी होती हैं. लेकिन इन चीजों को फेंके नहीं इनको फिर से इस्‍तेमाल करने के तरीके कुछ आसान से तरीके हैं जिन्हें अपना कर देखिए.

1. बेबी फूड जार

जब आपका बेबी जार यूज में ना आ रहा हो तो खाना बाहर निकालें और इस जार को एट-होम-स्पा के लिए यूज करें. इस जार में एक स्पॉन्ज डालें. अब इस स्पॉन्ज में नेल पॉलिश रिमूवर डाल दें. नेल पॉलिश हटाने के लिए अपनी अंगुली इसमें डिप करें.

2. प्लास्टिक बैग्स

पेंट ट्रे कवर करने के बजाए एक प्लाटिक बैग से इसे लाइन कर दें. अब इसके ऊपर पेंट डालें. हार्डवेयर स्टोर्स वाले लाइनर्स तो महंगे पड़ेंगे लेकिन ये ट्रिक पूरी तरह से फ्री है.

3. कैचप बॉटल

कैचप की बॉटल में आप अपने पैनकेक बनाने का बैटर रख सकते हैं. ऐसा करने से आपके पैनकेक हमेशा एक ही साइज के बनेंगे और साथ ही गोल भी बनेंगे. इस तरह आप अपने बैटर-पोरिंग स्किल को नया रूप  दे पाएंगी.

4. एग कार्टन

फैंसी कप-केक होल्डर अलग से खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी अगर आपके पास खाली हो चुके एग-कार्टन रखे हुए हैं. इस तरह से आप एक समय में 12 ट्रीट्स तैयार कर सकते हैं.

5. पेपर बिन

अपने मेल और पुरानी मैगजीन के लिए कॉर्नफ्लेक्स के खाली हो चुके पेपर बॉक्स को यूज किया जा सकता है. सबसे पहले तो इस बॉक्स पर अपने पसंद का गिफ्ट पेपर चिपका लें. अब पीछे वाली साइड पर एक मैग्नेट अटैच कर दें जिससे इसे फ्रिज के साइड में लटकाया जा सके.

6. टिशू बॉक्स

जब आपके टिशू बॉक्स खाली हो जाए तो इन्हें फेंके नहीं. इन्हें अन्य ग्रोसरी आइटम रखने के लिए यूज करें. जैसे प्लास्टिक बैग्स वगैरह.

7. चॉक्लेट बॉक्स

चॉकलेट बॉक्स के वे कम्पार्टमेंट जिनमें कुछ समय पहले तक आपकी फेवरेट कैंडी रखी हुई थीं अब आपके सुई-धागे और बटन वगैरह रखने के काम आ सकते हैं. यहां इन चीजों को रखने का फायदा यह है कि सभी चीजें अलग-अलग रखी रहती हैं तो किसी के हाथ में चुभेगी नहीं और आपस में मिक्स भी नहीं होंगी.

8. मोजे का इस्तेमाल

बबल रैप और पैकिंग पेपर बेहद कॉमन पैकिंग हो चुके हैं और ओवररेटेड भी. कुछ नया ट्राय करना चाहते हैं तो मोजे का इस्तेमाल करें. अपने नाजुक क्रॉकरी आइटम या महंगा क्रिस्टल और कैंडल स्टैंड, वाज वगैरह पैक करके स्टोर करना है तो मौजे में लपेट कर स्टोर करें. ये चीजें इस तरह ज्यादा सुरक्षित रहेंगी.

9. कंटेनर्स

चाय, कॉफी और कुकीज के कंटेनर्स को भी आप चाहें तो दूसरा जीवन दे सकते हैं. खाली होने के बाद इन पर अपनी पसंद का कलरफुल कपड़ा या पेपर चिपकाएं और पेंटिंग करके डेकोरेट करने के बाद इसे अपनी स्टडी टेबल पर पेन स्टैंड की तरह यूज करें.

ज्यादा बड़े टिन हों तो आप इन्हें किड्स रूम में डस्टबिन की तरह भी यूज कर सकते हैं. इस पर मिक्की-डॉनल्ड या अन्य कोई पॉप्युलर कार्टून कैरेक्टर का स्केच बना दें. इसके अलावा आप इन टिन के डिब्बों में घी या तेल भी भरकर रख सकते हैं.

10. टिक टैक बॉक्स

अगर आप वेकेशन पर हैं और रूम या घर रेंट पर लिया है तो आप अच्छी तरह जानते हैं कि सात दिन के लिए किचन स्टॉक करके ले जाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है. आपके टिक टैक के खाली बॉक्स इस वक्त बहुत काम आते हैं. इनमें आप सभी तरह के मसाले भर कर रख सकते हैं.

11. वाइन कॉर्क्स

अपने फालतू पड़े हुए कॉर्क्स को की-चेन में तब्दील कर लें. आप चाहें तो हर कॉर्क पर स्टाइलिश अंदाज में नाम भी लिख सकते हैं.

खुश रहेंगी, तभी दूसरों को खुश रख पाएंगी

गृहिणी हूं और एक लेखिका भी. मैं सुबह 5.30 बजे उठती हूं. पति के लिए चाय बनाती हूं, और फिर हर सुबह एक भाग का काम मैं ब्रेकफास्ट से पहले कर लेती हूँ. 10.30 बजे नाश्ता करने के बाद फिर से काम पर लग जाती हूं.  आप सोच रही होंगी मैं आपको अपनी डेली रूटीन किसलिये बता रही हूं? क्योंकि मैंने दोस्तों को कहते सुना है, कि वे काम और घर में बराबर ध्यान नहीं दे पा रहीं हैं और शायद ये आपकी भी समस्या हो सकती है, इसलिए निराश ना हों.

1. खुद को दोषी मानना बंद करें

अगर काम और घर के बीच सामंजस्य सम्भव नहीं है, तो खुद को अपराधी मानने की जरूरत नहीं. आप काम कर रहे हैं यह कोई गलत बात नहीं है, इसके लिए सबसे पहले आप घर में हो रही समस्याओं के लिए खुद को दोषी मानना बंद करें.

2. बनाएं टाइमटेबल

खुद के लिए एक टाइम टेबल बनाएं. दिन में 24 घंटे होते हैं, और अगर आप सही तरीके से टाइम-टेबल के हिसाब से चलेंगे, तो सारे काम आराम से हो जाएंगे. पर एक समय सीमा के हिसाब से चलना जरूरी है, अगर किसी एक काम पर आप जरुरत से ज्यादा वक्त जाया करेंगे, या सुस्ती दिखाएंगे, तो संतुलंत कभी नहीं बना पाएंगे.

3. आपसी समझ है जरूरी

जो काम ज्यादा जरूरी हैं, उसे पहले करें. अगर सुबह आपको औफिस में प्रोजेक्ट सबमिट करना है, तो पहले उसका काम खत्म करें, क्योंकि आप वर्किंग वुमन हैं, अगर बच्चों को ऐसी स्थिति में आप कम समय दे पा रहीं हैं तो, घर के सदस्यों के मदद लें, और प्यार और सहयोग के साथ अपना कार्य पूर्ण करने के बाद बच्चों और परिवार के साथ समय व्यतीत करें. हां एक बात का ध्यान रखें, कार्य बढ़ने की स्थिति में अपने परिवार के जिम्मेदार लोगों को सूचित करें, और आपसी समझ से घर परिवार की जिम्मेदारी निभाएं.

4. अपने मनपसंद काम को दे ज्यादा समय

आपको क्या चाहिए ये तय करें. ज्यादा पैसों के लिए ज्यादा काम करना पड़ता है, ऐसी स्थिति में आप जो काम पसंद से कर रही हैं वही करें. अगर घर में ज्यादा वक़्त देने से आप को ख़ुशी मिल रही है, तो उसे अधिक महत्व दें.

5. मन से करें काम

काम से प्रेम होना बहुत ज़रूरी है. कम काम करें लेकिन अच्छा काम करें, तो आप खुश रहेंगी, मानसिक रूप से स्वस्थ रहेंगी.

6. खुद के लिए निकालें समय

खुद के लिए समय रखें. अपने लिए समय होना भी ज़रूरी है, इस वक़्त में आप सिर्फ वह करें, जो आपको अच्छा लगता हो. ये आराम का वक़्त भी हो सकता है. इस समय अन्य कोई कार्य न करें.

7. आसान तरीका ढूंढे

यह ध्यान रखें, की आप वर्किंग होते हुए सभी जिम्मेदारियों को नहीं निभा सकती, ऐसी स्थिति में आप वही जरूरी कार्य करें जो आप के अलावा और दूसरा नहीं कर सकता, आधुनिकता के दौर में औनलाइन शौपिंग का महत्त्व समझें, घर के समान आर्डर करना, कपडे खरीदना, बिल जमा करना आदि कार्य आप औनलाइन भी कर सकती हैं. इससे आप थकेंगी कम, और वही समय आप परिवार को दे सकती हैं.

अगर सोचें, तो ऐसा कोई क्षेत्र  नहीं, जहां महिलाओं ने अपनी छाप न छोड़ी हो.अपनी लगन, मेहनत, और दृढ़ता से महिला खुद में साफ़ सोच लाती हैं, जिससे वह फैसला ले पाती है. तभी आज हमारे बीच इंद्रा नूई (सी इ ओ पेप्सिको),  हेलेन केलर, और बुला चौधरी जैसी महान महिलाएं हैं.

ऐसी महिलाएं हमें भविष्य में भी प्रेरित करती रहेंगी. खुद खुश रहेंगी, तभी दूसरों को खुश रख पाएंगी. अपनी सोच समझ पर टिके रहे. इस तरह से आप अपनी सभी जिम्मेदारियों को सही से निभा पाएंगी.

शादीशुदा जिंदगी से जुड़ी बातों के बारे में बताएं?

सवाल-

मेरी सगाई हो चुकी है और कुछ ही महीनों में शादी होने वाली है. मेरी चिंता यह है कि मुझे सैक्स के बारे में बिलकुल जानकारी नहीं है. कहीं इस वजह से मेरा दांपत्य जीवन प्रभावित तो नहीं होगा? मेरी कोई बड़ी बहन या भाभी भी नहीं है, जिस से मैं कुछ पूछ सकूं. मुझे यह जानकारी कहां से प्राप्त हो सकती है?

जवाब-

सैक्स के बारे में प्राय: सभी युवाओं की स्थिति अमूमन आप जैसी ही होती है, जो थोड़ीबहुत जानकारी होती भी है वह इधरउधर से सुनीसुनाई और अधकचरी होती है, बावजूद इस के उन्हें कोई परेशानी नहीं आती. फिर भी आप सैक्स पर किसी अच्छे लेखक की किताब पढ़ कर जानकारी हासिल कर सकती हैं.

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पश्चिमी देशों में ‘फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स’ का चलन कोई नया नहीं है. लेकिन भारत में जरूर इस टर्म को अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल और निभाया जाता है. जब साल 2011 में जस्टिन टिम्बरलेक और मिल्ला कुनिस की फिल्म ‘फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स’ आई थी तो इस टर्म का मोटामोटी अर्थ यही निकला गया कि जब दो दोस्त अपने रिश्ते का इस्तेमाल सेक्सुअल रिलेशन के तौर पर करते हैं तो वो फ्रेंडशिप ‘फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स’ के दायरे में आ जाती है. यानी जब दोस्ती से अन्य फायदे लिए जाने लगे तो यह फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स वाला रिश्ता बन जाता है.

अब आप सोचेंगी कि दोस्ती में क्या फायदा उठाना. लेकिन अगर आप मैरिड या एंगेज्ड होने के बावजूद अपनी बेस्टफ्रेंड के साथ सेक्स करना चाहती हैं तो यह दोस्ती से बेनिफिट लेने जैसा ही है. क्योंकि उक्त लड़की आपकी फ्रेंड हैं तो फिर बिस्तर पर जाने से पहले उसके साथ न तो किसी भी तरह की रोमांटिक इन्वोल्व्मेंट की जरूरत है और न भरोसा कायम रखने की. आप दोनों एकदूसरे को पहले से जानते हैं और आपसी सहमति है तो अपनी फ्रेंडशिप को बेनिफिट के साथ कायम रख सकती हैं.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स : दोस्त से सेक्स या सेक्स से दोस्ती?

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

चौथापन- भाग 1 : मुन्ना के साथ क्या हुआ

वह एक कोने में कुरसी पर बैठे कोई किताब पढ़ रहे थे. अचानक उन्होंने ऊब कर किताब एक ओर  रख दी. आंखों  से चश्मा उतार कर मेज पर रख दिया. रूमाल से आंखें साफ कीं और निरुद्देश्य खिड़की  से बाहर की चहलपहल देखने लगे.

‘‘दादाजी, यह कामिक्स पढ़ कर सुनाइए जरा,’’ उन की 10 वर्ष की नातिन अंजू रंगबिरंगी पुस्तकें लिए कमरे में पहुंच गई.

‘‘लाओ, देखें,’’ उन्होंने बड़े चाव से  पुस्तकें ले लीं.

वह पुस्तकों के चित्र तो देख पा रहे थे, किंतु चश्मा लगाने के बाद भी उन पुस्तकों को पढ़ पाना उन्हें बड़ा कठिन लग रहा था. फिर नाम भी क्या थे पुस्तकों के, ‘आग का दरिया’, ‘अंतरिक्ष का शैतान’.

‘‘छि: छि:… ये क्या हैं? अच्छी पुस्तकें पढ़ा करो, बेटे.’’

‘‘अच्छी कौन सी, दादाजी?’’

‘‘जिस पुस्तक से कोई अच्छी बात सीखने को मिले. बच्चों के लिए तो आजकल बहुत सी पत्रपत्रिकाएं  निकलती हैं.’’

‘‘आप नहीं जानते, दादाजी, ये थ्री डायमेंशनल कामिक्स हैं. इन को पढ़ने के लिए अलग से चश्मा मिलता है. यह देखिए.’’

‘‘अरे, यह कोई चश्मा है? लाल पन्नी लगी है इस में तो. इस से आंखें खराब हो जाएंगी. फेंको इसे.’’

‘‘आप को कुछ नहीं मालूम, दादाजी,’’ अंजू ने उपेक्षा से कहा और पुस्तकें ले कर तेजी से बाहर चली गई.

वह अकुलाए से अपनी जगह पर बैठे रह गए और सोचते रहे. शायद वह वर्तमान से कट चुके हैं. उन का जमाना लद चुका था. उन के सिद्धांत, आदर्श ओैर विचार अब अप्रासंगिक हो चुके थे.

अभी कुछ ही दिन पहले की तो बात थी. उन के बेटे मुन्ना  ने भी यही कहा था. हुआ यों था कि उस दिन वह कारखाने में मौजूद थे. नौकर ने एक ग्राहक को बिल दिया तो उन्हें वह बहुत ज्यादा लगा. वह एक प्रकार से ग्राहक को लूटने जैसा ही  था. उन्होंने नौकर को डांट दिया और जोर दे कर उस से बिल में परिवर्तन करने को कहा.

उसी दिन मुन्ना रात को घर आने के बाद  उन पर बहुत बिगड़ा था, ‘बाबूजी, आप तो बैठेबिठाए नुकसान करवा देते हैं. क्या जरूरत थी आप को  कारखाने में जा कर कीमत कम करवाने की?’

‘मैं ने तो उचित दाम ही लगाए थे, बेटा. वह नौकर बहुत ज्यादा  बिल बना रहा था.’

‘आप बिलकुल नहीं समझते, बाबूजी. इतना बड़ा कारखाना चलाना आज के जमाने में कितना मुश्किल काम है. अब कामगारों को वेतन कितना बढ़ा कर देना पड़ता है, जानते हैं आप? नई मशीन की किश्त हर माह देनी पड़ती है सो अलग. फिर आयकर भी इसी महीने में भरना है.’

उन की दृष्टि में ग्राहकों से मनमाना पैसा वसूल करने का यह कोई उचित तर्क नहीं था, लेकिन वह चुप ही रह गए.

एक बार वह बीमार पड़ गए थे. 2-3 महीने तक कारखाने नहीं जा सके. बस, तभी अचानक मुन्ना ने उन की गद्दी हथिया ली. फिर मुन्ना यह सिद्ध करने की कोशिश करने लगा कि वह व्यापार में उन से अधिक कुशल है.

जहां उन्हें ग्राहक से 4 पैसे वसूल करने में कठिनाई होती थी वहां मुन्ना बड़ी आसानी से 6 पैसे वसूल कर लेता था. उस ने बैंकों से ऋण ले कर अल्प समय में ही नई मशीनें मंगवा ली थीं. किस आदमी से कैसे काम लिया जा सकता है, इस काम में मुन्ना खुद को उन से कहीं अधिक दक्ष होने का दावा करता था.

जब वह स्वस्थ हो कर कारखाने पहुंचे तो उन्होंने देखा कि कारखाने का शासन सूत्र मुन्ना अपने हाथों में दृढ़ता से थामे हुए है. एक बार हाथों में शासन सूत्र  आने के बाद कोई भी उसे सरलता से वापस नहीं करना चाहता.

अब मुन्ना कारखाने के तमाम कार्य अपनी मरजी से करता था. उन की ठीक सलाह भी उसे अपने मामलों में दखलंदाजी लगती थी. मुन्ना अकसर उन्हें एहसास दिलाता था, ‘बाबूजी, डाक्टर ने आप को पूरी तरह आराम करने के लिए कहा है. आप घर पर रह कर ही आराम किया करें. कारखाने का सारा कारोबार मैं संभाल लूंगा. आप बेकार उधर की चिंता किया करते हैं.’

जब उन की पत्नी इंदू जिंदा थी तो उस का भी यही विचार था. वह प्राय: कहा करती थी, ‘आज नहीं तो कल, मुन्ना को ही तो संभालना है कारखाना. वह व्यापार को बढ़ा ही रहा है, घटा तो नहीं रहा? वैसे भी अब लड़का बड़ा हो गया है. बाप का जूता उस के पैर में आने लगा है. उन्हें खुद आगे हो कर मुन्ना को कारोबार सौंप देना चाहिए. शास्त्रों के अनुसार आदमी को चौथेपन में सांसारिक झंझटों से संन्यास ले लेना चाहिए.’

और इस तरह बीमारी के दौरान अकस्मात ही उन की इच्छा के विरुद्ध कारखाने से उन का निष्कासन हो गया था.

उन्होंने एक नजर नाश्ते की प्लेट पर डाली. आज फिर घर का नौकर बड़ी उपेक्षा से उन के सामने सिर्फ मक्खन लगे स्लाइस रख गया था. उन के अंदर ही अंदर कुछ घुटने सा लगा था, ‘यह भी कोई नाश्ता है? बाजार से डबलरोटी मंगवाई और चुपड़ दिया उस पर जरा सा मक्खन.’

जब इंदू थी तब उन के लिए बीसियों तरह के तो लड्डू ही बनते थे घर में. मूंग के, मगज के, रवे के वगैरहवगैरह. मठरी, सेव और कई तरह के नमकीन भी परोसे जाते थे उन के आगे. पकवानों का तो कोई हिसाब ही नहीं था और अब मात्र मक्खन लगे डबलरोटी के टुकड़े.

वह खीज उठे और उठ कर सीधे अंदर गए, ‘‘बरसात में डबलरोटी क्यों मंगवाती हो, बहू? घर में ही कुछ मीठा या नमकीन बना लिया करो. कल जो डबलरोटी आई थी उस में फफूंद लगी हुई थी.’’

‘‘डाक्टर ने उन्हें अधिक घीतेल खाने की मनाही कर दी है. अगर आप को डबलरोटी पसंद नहीं है तो आप के लिए दूसरा इंतजाम हो जाएगा,’’ बहू ने रूखेपन से जवाब दिया.

दूसरे दिन उन के लिए जो नाश्ता लगाया गया वह होटल से मंगवाया गया था. एक प्लेट में बेसन का लड्डू तथा थोड़ा सा चिड़वा था. बरसात के कारण चिड़वा बिलकुल हलवा बन गया था. लड्डू बेशक स्वादिष्ठ था, परंतु उस में वनस्पति घी इतनी अधिक मात्रा में था कि खाने के बाद उन्हें बहुत देर तक खट्टी डकारें आती रही थीं.

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