आर्टिफिशियल प्रक्रिया से मां बनना हुआ आसान

आर्टिफिशियल प्रक्रिया की मदद से गर्भधारण करना कोई नई बात नहीं है. नई बात तो यह है कि नए जमाने की नई सोच की वजह से समाज ने इसे अपना लिया है. फिर इनफर्टिलिटी के तमाम केसों और कारणों को देखते हुए आज कई तकनीकों की मदद से गर्भधारण कराया जा रहा है. जैसे इक्सी, आईवीएफ, लेजर असिस्टिड हैचिंग, ब्लास्टोसिस्ट कल्चर आदि.

47 वर्षीय जेनिफर जब 2004 में भारत आईं, तब उन का उद्देश्य ताज की खूबसूरती देखना नहीं, बल्कि यहां आ कर गर्भधारण करना था जोकि फ्रांस में नहीं कर पा रही थीं. उन्होंने भारत में डाक्टर से संपर्क किया और अपने पति के साथ यहां आ कर 10 दिन बिताए. यहां डोनर एग की सहायता से वे न सिर्फ गर्भधारण कर पाईं, बल्कि बच्चे को भी जन्म दिया.

उदयपुर स्थित इंदिरा इनफर्टिलिटी एवं टैस्ट ट्यूब बेबी सैंटर के निदेशक डा. अजय मुर्डिया के अनुसार इनफर्टिलिटी उपचार के क्षेत्र में तो भारत सब की पहली पसंद बनता जा रहा है. इस का एक बड़ा कारण है कम पैसों में अच्छी मैडिकल सुविधा का उपलब्ध होना.

अब ऐसी कोई चिकित्सा पद्धति नहीं बची है, जो विदेशों में हो रही है मगर भारत में नहीं हो सकती. दांतों की समस्या, नी कैप और हिप रिप्लेसमैंट और आईवीएफ व ओपन हार्ट सर्जरी तक के लिए पश्चिमी देशों से मरीज भारत की ओर रुख कर रहे हैं. कम खर्च में अच्छी चिकित्सा व आनेजाने की सुविधा के अलावा इंटरनैट क्रांति ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. विश्व स्तरीय चिकित्सा को मामूली खर्च पर मुहैया करने में भारत को अच्छी सफलता मिली है.

आर्टिफिशियल प्रक्रिया की मदद से गर्भधारण करना कोई नई बात नहीं है. नई बात तो यह है कि नए जमाने की नई सोच की वजह से समाज ने इसे अपना लिया है. फिर इनफर्टिलिटी के तमाम केसों और कारणों को देखते हुए आज कई तकनीकों की मदद से गर्भधारण कराया जा रहा है. जैसे इक्सी, आईवीएफ, लेजर असिस्टिड हैचिंग, ब्लास्टोसिस्ट कल्चर आदि.

47 वर्षीय जेनिफर जब 2004 में भारत आईं, तब उन का उद्देश्य ताज की खूबसूरती देखना नहीं, बल्कि यहां आ कर गर्भधारण करना था जोकि फ्रांस में नहीं कर पा रही थीं. उन्होंने भारत में डाक्टर से संपर्क किया और अपने पति के साथ यहां आ कर 10 दिन बिताए. यहां डोनर एग की सहायता से वे न सिर्फ गर्भधारण कर पाईं, बल्कि बच्चे को भी जन्म दिया.

उदयपुर स्थित इंदिरा इनफर्टिलिटी एवं टैस्ट ट्यूब बेबी सैंटर के निदेशक डा. अजय मुर्डिया के अनुसार इनफर्टिलिटी उपचार के क्षेत्र में तो भारत सब की पहली पसंद बनता जा रहा है. इस का एक बड़ा कारण है कम पैसों में अच्छी मैडिकल सुविधा का उपलब्ध होना.

अब ऐसी कोई चिकित्सा पद्धति नहीं बची है, जो विदेशों में हो रही है मगर भारत में नहीं हो सकती. दांतों की समस्या, नी कैप और हिप रिप्लेसमैंट और आईवीएफ व ओपन हार्ट सर्जरी तक के लिए पश्चिमी देशों से मरीज भारत की ओर रुख कर रहे हैं. कम खर्च में अच्छी चिकित्सा व आनेजाने की सुविधा के अलावा इंटरनैट क्रांति ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. विश्व स्तरीय चिकित्सा को मामूली खर्च पर मुहैया करने में भारत को अच्छी सफलता मिली है.

आईवीएफ तकनीक

90 के दशक में जब आईवीएफ तकनीक लौंच की गई थी, तब से ले कर अब तक इस तकनीक के माध्यम से 50 हजार से ज्यादा बच्चों का जन्म हो चुका है. आईवीएफ तकनीक में अंडाशय से अंडे को शल्य चिकित्सा के द्वारा निकाल कर शरीर के बाहर शुक्राणु द्वारा निषेचित कराया जाता है. 40 घंटे के बाद यह देखा जाता है कि शुक्राणुओं द्वारा अंडा निषेचित हुआ या नहीं और कोशिकाओं में विभाजन हो रहा है या नहीं. इस के बाद निषेचित अंडे को वापस महिला के गर्भाशय में डाल दिया जाता है.

लगभग सभी प्रक्रियाओं में प्रयोगशाला में ही अंडे को शुक्राणु के साथ मिला कर फर्टिलाइज कराया जाता है. लेकिन यह सुनने और कहने में जितना आसान लगता है, प्रयोग के समय उतना ही जटिल होता है, क्योंकि इस प्रक्रिया के दौरान एकएक बारीकी का खासतौर पर खयाल रखना पड़ता है. इन सभी तकनीकों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रयोगशाला में तैयार किए हुए भू्रण का गर्भाशय में सही ढंग से प्रत्यारोपण हुआ है या नहीं.

डा. अजय मुर्डिया के अनुसार दरअसल, प्रयोगशाला में जब शुक्राणु और अंडे को मिलाया जाता है, तो फर्टिलाइज अंडे की ऊपरी परत जिसे जोना पेलुसिडा कहते हैं, कई बार कठोर हो जाती है जिस से भू्रण को प्रत्यारोपित करने में परेशानी होती है. लेकिन इस समस्या का समाधान अब लेजर तकनीक के द्वारा ढूंढ़ लिया गया है जिसे लेजर असिस्टिड हैचिंग अथवा लेजर तकनीक कहते हैं. यह प्रयोगशाला में ही की जाने वाली एक तकनीक है. जोना पेलुसिडा परत एक बार में एक ही शुक्राणु को अंडे के भीतर प्रवेश करने देती है. साथ ही यह भू्रण को इम्यून सिस्टम के सेलों के अटैक से भी बचाती है. यह परत भू्रण को तब तक संरक्षित करती है जब तक वह ब्लास्टोसिस्ट की अवस्था तक नहीं पहुंच जाता है.

लेजर असिस्टिड हैचिंग तकनीक में एक बारीक लेजर की मदद से जोना पेलुसिडा को थोड़ा सा खोल दिया जाता है ताकि भू्रण की ऊपरी सतह कुछ कमजोर हो जाए. इस से भू्रण को जोना पेलुसिडा से निकलने और सही तरह से प्रत्यारोपित होने में मदद मिलती है. इस में भू्रण को माइक्रोस्कोप के भीतर रखा जाता है जिस का जोना यानी सतह आसानी से देखी जा सकती है. इसे लेजर की मदद से खोला जाता है. यह लेजर नौन कौंटैक्ट होता है यानी भू्रण का लेजर से सीधे तौर पर कोई कौंटैक्ट नहीं होता है. लेजर से भू्रण की ओपनिंग के आकार को बढ़ाया जाता है. यह बेहद बारीकी और विशिष्टता से किया जाता है.

लेजर को दोबारा फायर किया जाता है ताकि पूरा जोना खुल जाए, जिस से प्रत्यारोपण के दौरान भू्रण आसानी से जोना से निकल सके. लेकिन लेजर को इतनी दूर से इस्तेमाल किया जाता है ताकि भू्रण नष्ट न होने पाए. ऐसा करने के बाद प्रत्यारोपण की सफलता के आसार बढ़ जाते हैं. हालांकि यह हैचिंग की प्रक्रिया पहले भी की जाती थी, लेकिन इसे ऐसिड से किया जाता था, जिस से भू्रण के नष्ट होने का खतरा बना रहता था. लेकिन आज लेजर की मदद से भू्रण को बिना नुकसान पहुंचाए हैचिंग की जा सकती है.

यह तकनीक उन केसों में अपनाई जाती है जहां आईवीएफ या इक्सी द्वारा असफलता हाथ लगी हो. इस के अलावा जिन मरीजों में कम भू्रण बने हों तथा अधिक उम्र की औरतों में व कुछ बीमारियों में, जिन में भू्रण की बाहरी परत कठोर पाई जाती है. उन में यह तकनीक करने से सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है.

इनफर्टिलिटी की समस्या

इन्फर्टिलिटी कई प्रकार की होती है. विशेष तौर पर जन्म से ही होने वाली और कुछ केसों में गर्भ ठहरने में समस्या आती है. कई केसों में पहला बच्चा ठीक से हो जाता है, लेकिन दूसरा बच्चा होने में दिक्कत आती है. आज के समय में 20% शादीशुदा दंपतियों को इनफर्टिलिटी की समस्या है. जिस में 40% औरतें हैं और 30% पुरुष हैं. ऐसे में हमारा उद्देश्य है कि अधिक से अधिक दंपती इस आधुनिक तकनीक एवं नवीनतम उपकरणों की सहायता से संतान प्राप्ति कर पाएं.

अब इंस्ट्रा साइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजैक्शन (इक्सी) की तकनीक से जिन पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या न के बराबर है, उन का भी पिता बनना संभव हो गया है. इस में मरीज की पत्नी को विशेष दवाएं दी जाती हैं, जिस से वह बहुत सारे अंडे पैदा कर सके. फिर वैजाइनल सोनोग्राफी की बहुत ही सरल तकनीक से उन अंडों को उस महिला के शरीर से अलग कर लिया जाता है. इस दर्दविहीन प्रक्रिया से मरीज को जनरल ऐनेस्थीसिया के साथ पूरा किया जाता है.

एक बार अंडों को अलग करने के बाद पति से अपने वीर्य का नमूना जमा करने को कहा जाता है. फिर माइक्रोमैनियूलेटर नाम की एक विकसित विशेष मशीन की सहायता से हर अंडे को पति द्वारा जमा किए गए अकेले शुक्राणु से इंजैक्ट किया जाता है. इस के बाद अंडों को 2 दिनों तक अंडा सेने की मशीन में रखा जाता है. 2 दिनों के बाद भू्रण (अविकसित बच्चा) तैयार हो जाता है तो उसे एक पतली नलिका में डाल कर गर्भाशय में रख दिया जाता है.

90 के दशक में जब आईवीएफ तकनीक लौंच की गई थी, तब से ले कर अब तक इस तकनीक के माध्यम से 50 हजार से ज्यादा बच्चों का जन्म हो चुका है. आईवीएफ तकनीक में अंडाशय से अंडे को शल्य चिकित्सा के द्वारा निकाल कर शरीर के बाहर शुक्राणु द्वारा निषेचित कराया जाता है. 40 घंटे के बाद यह देखा जाता है कि शुक्राणुओं द्वारा अंडा निषेचित हुआ या नहीं और कोशिकाओं में विभाजन हो रहा है या नहीं. इस के बाद निषेचित अंडे को वापस महिला के गर्भाशय में डाल दिया जाता है.

लगभग सभी प्रक्रियाओं में प्रयोगशाला में ही अंडे को शुक्राणु के साथ मिला कर फर्टिलाइज कराया जाता है. लेकिन यह सुनने और कहने में जितना आसान लगता है, प्रयोग के समय उतना ही जटिल होता है, क्योंकि इस प्रक्रिया के दौरान एकएक बारीकी का खासतौर पर खयाल रखना पड़ता है. इन सभी तकनीकों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रयोगशाला में तैयार किए हुए भू्रण का गर्भाशय में सही ढंग से प्रत्यारोपण हुआ है या नहीं.

डा. अजय मुर्डिया के अनुसार दरअसल, प्रयोगशाला में जब शुक्राणु और अंडे को मिलाया जाता है, तो फर्टिलाइज अंडे की ऊपरी परत जिसे जोना पेलुसिडा कहते हैं, कई बार कठोर हो जाती है जिस से भू्रण को प्रत्यारोपित करने में परेशानी होती है. लेकिन इस समस्या का समाधान अब लेजर तकनीक के द्वारा ढूंढ़ लिया गया है जिसे लेजर असिस्टिड हैचिंग अथवा लेजर तकनीक कहते हैं. यह प्रयोगशाला में ही की जाने वाली एक तकनीक है. जोना पेलुसिडा परत एक बार में एक ही शुक्राणु को अंडे के भीतर प्रवेश करने देती है. साथ ही यह भू्रण को इम्यून सिस्टम के सेलों के अटैक से भी बचाती है. यह परत भू्रण को तब तक संरक्षित करती है जब तक वह ब्लास्टोसिस्ट की अवस्था तक नहीं पहुंच जाता है.

लेजर असिस्टिड हैचिंग तकनीक में एक बारीक लेजर की मदद से जोना पेलुसिडा को थोड़ा सा खोल दिया जाता है ताकि भू्रण की ऊपरी सतह कुछ कमजोर हो जाए. इस से भू्रण को जोना पेलुसिडा से निकलने और सही तरह से प्रत्यारोपित होने में मदद मिलती है. इस में भू्रण को माइक्रोस्कोप के भीतर रखा जाता है जिस का जोना यानी सतह आसानी से देखी जा सकती है. इसे लेजर की मदद से खोला जाता है. यह लेजर नौन कौंटैक्ट होता है यानी भू्रण का लेजर से सीधे तौर पर कोई कौंटैक्ट नहीं होता है. लेजर से भू्रण की ओपनिंग के आकार को बढ़ाया जाता है. यह बेहद बारीकी और विशिष्टता से किया जाता है.

लेजर को दोबारा फायर किया जाता है ताकि पूरा जोना खुल जाए, जिस से प्रत्यारोपण के दौरान भू्रण आसानी से जोना से निकल सके. लेकिन लेजर को इतनी दूर से इस्तेमाल किया जाता है ताकि भू्रण नष्ट न होने पाए. ऐसा करने के बाद प्रत्यारोपण की सफलता के आसार बढ़ जाते हैं. हालांकि यह हैचिंग की प्रक्रिया पहले भी की जाती थी, लेकिन इसे ऐसिड से किया जाता था, जिस से भू्रण के नष्ट होने का खतरा बना रहता था. लेकिन आज लेजर की मदद से भू्रण को बिना नुकसान पहुंचाए हैचिंग की जा सकती है.

यह तकनीक उन केसों में अपनाई जाती है जहां आईवीएफ या इक्सी द्वारा असफलता हाथ लगी हो. इस के अलावा जिन मरीजों में कम भू्रण बने हों तथा अधिक उम्र की औरतों में व कुछ बीमारियों में, जिन में भू्रण की बाहरी परत कठोर पाई जाती है. उन में यह तकनीक करने से सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है.

इनफर्टिलिटी की समस्या

इन्फर्टिलिटी कई प्रकार की होती है. विशेष तौर पर जन्म से ही होने वाली और कुछ केसों में गर्भ ठहरने में समस्या आती है. कई केसों मे पहला बच्चा ठीक से हो जाता है, लेकिन दूसरा बच्चा होने में दिक्कत आती है. आज के समय में 20% शादीशुदा दंपतियों को इनफर्टिलिटी की समस्या है. जिस में 40% औरतें हैं और 30% पुरुष हैं. ऐसे में हमारा उद्देश्य है कि अधिक से अधिक दंपती इस आधुनिक तकनीक एवं नवीनतम उपकरणों की सहायता से संतान प्राप्ति कर पाएं.

अब इंस्ट्रा साइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजैक्शन (इक्सी) की तकनीक से जिन पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या न के बराबर है, उन का भी पिता बनना संभव हो गया है. इस में मरीज की पत्नी को विशेष दवाएं दी जाती हैं, जिस से वह बहुत सारे अंडे पैदा कर सके. फिर वैजाइनल सोनोग्राफी की बहुत ही सरल तकनीक से उन अंडों को उस महिला के शरीर से अलग कर लिया जाता है. इस दर्दविहीन प्रक्रिया से मरीज को जनरल ऐनेस्थीसिया के साथ पूरा किया जाता है.

एक बार अंडों को अलग करने के बाद पति से अपने वीर्य का नमूना जमा करने को कहा जाता है. फिर माइक्रोमैनियूलेटर नाम की एक विकसित विशेष मशीन की सहायता से हर अंडे को पति द्वारा जमा किए गए अकेले शुक्राणु से इंजैक्ट किया जाता है. इस के बाद अंडों को 2 दिनों तक अंडा सेने की मशीन में रखा जाता है. 2 दिनों के बाद भू्रण (अविकसित बच्चा) तैयार हो जाता है तो उसे एक पतली नलिका में डाल कर गर्भाशय में रख दिया जाता है.

चौथापन- भाग 3 : मुन्ना के साथ क्या हुआ

मुन्ना के पहले उन की 2 बेटियां और थीं. वह सोचते थे कि बेटियां तो पराया धन होती हैं. दूसरे घर चली जाएंगी. उन का बेटा मुन्ना ही बुढ़ापे में उन की सेवा करेगा. उस की बहू आ जाएगी तो वह उन की सेवा करेगी. फिर नातीनातिन हो जाएंगे तो वे बाबाबाबा कहते हुए उन के आगेपीछे घूमेंगे. मुन्ना बचपन में आए- दिन बीमार पड़ जाता था. उन्होंने उस की बड़ी सेवा की थी और धन भी खूब लुटाया था. न जाने कितने दवाखानों की धूल छानी थी. न जाने कितनी मनौतियां मानी थीं. न जाने कितनी रातें जागते हुए गुजार दी थीं. अब उस का रवैया देख कर लगता था कि उन्होंने कितना बड़ा भ्रम पाल लिया था. वह भी कैसे पागल थे.

उन का शरीर बुखार से तप रहा था. कुछ देर तक मुन्ना के कमरे से डिस्को संगीत का शोर और बच्चों के हंगामे की कर्णभेदी आवाजें आती रहीं और उन का सिर दर्द से फटता रहा. फिर खामोशी छा गई. कमरे के सन्नाटे में छत के पंखे की खड़खड़ाहट गूंजती रही. उन्हें लेटेलेटे बारबार यह खयाल सताता रहा कि बहू बेटे को उन से कोई हमदर्दी नहीं है. बहू ने तो एक बार भी आ कर नहीं पूछा उन की तबीयत के विषय में.

एकाएक उन्हें अपना गला सूखता सा महसूस हुआ. लो, कमरे में पानी रखवाना तो वह भूल ही गए थे. अब क्या करें? वह उस बुखार में उठ कर रसोई तक कैसे जा सकेंगे? अचानक उन की नजर शाम को पानी से भर कर खिड़की पर रखे गिलास पर गई. उन्होंने उठ कर वही पानी पी लिया.

वह मन की घबराहट को दूर करने के लिए खिड़की के पास ही खड़े हो गए और सूनी सड़क पर चल रहे इक्कादुक्का लोगों को देखने लगे. काश, वह उन्हें आवाज दे पाते, ‘‘आओ, भाई, मेरे पास बैठो थोड़ी देर के लिए. मेरा मन बहुत घबरा रहा है. कुछ अपनी कहो, कुछ मेरी सुनो.’’

सहसा वह पागलों की तरह हंस पड़े अपने पर. ‘अरे, जिसे छोटे से बड़ा किया, पढ़ायालिखाया, अपने जीवन भर की कमाई सौंप दी, वह बेटा तो चैन की नींद सो रहा है. भला ये अपरिचित लोग अपना काम- धंधा छोड़ कर मेरे पास क्यों बैठने लगे? वह फिर से पलंग पर आ कर लेट गए.’

उन्हें याद आया कि कैसे दिनरात मेहनत कर के उन्होंने कारखाना खड़ा किया था, किस तरह मशीनें खरीदी थीं, किस तरह कारखाने की नई इमारत तैयार की थी, धूप में घूमघूम कर, भूखेप्यासे रहरह कर, देर रात तक जागजाग कर वह किस तरह काम में लगे रहते थे. किस के लिए? मुन्ना के लिए ही तो. अपने परिवार के सुख के लिए ही तो? जिस में वह खुद भी शामिल थे.

अब कहां गया वह सुख? उन के परिवार ने क्या कीमत रखी है उन की या उन के सुख की? वह सब के सामने इतने दीनहीन क्यों बन जाते हैं? क्या वह मुन्ना की कमाई पर पल रहे हैं? क्यों खो दी उन्होंने अपनी शक्ति? नहीं, बहुत हो चुका, वह अब और नहीं सहेंगे.

वह आवेश में उठ कर बैठ गए. क्षण भर में ही उन का शरीर पसीने से लथपथ हो गया. दूसरे दिन सुबह मुन्ना सपरिवार नाश्ता कर रहा था, तभी गोपाल ने आ कर सूचना दी, ‘‘भैयाजी, नाश्ते के बाद आप को दादाजी ने अपने कमरे में बुलाया है.’’

मुन्ना ने नाश्ते के बाद उन के कमरे में जा कर देखा कि वह पलंग पर बैठे कोई किताब पढ़ रहे हैं.

‘‘आओ, मुन्ना बैठो,’’ उन्होंने सामने पड़ी कुरसी की ओर संकेत किया. जाने कितने वर्षों के बाद उन्होंने उसे ‘मुन्ना’ कह कर एकदम सीधे संबोधित किया था.

‘‘कैसी तबीयत है आप की?’’

‘‘तबीयत तो ठीक है. मैं ने एक दूसरी ही चर्चा के लिए तुम्हें बुलवाया था.’’

‘‘कहिए.’’

‘‘यहां इस घर में पड़ेपड़े अब मेरा मन नहीं लगता. स्वास्थ्य भी बिगड़ता रहता है. बेकार पड़ेपडे़ तो लोहा भी जंग खा जाता है, फिर मैं तो हाड़मांस का आदमी हूं. मैं चाहता हूं कि घर से निकलूं और…’’

‘‘इन दिनों मैं भी यही सोच रहा था, बाबूजी,’’ मुन्ना ने उन की बात पूरी होने से पहले ही उचक ली और बड़े निर्विकार भाव से बोला, ‘‘आप का चौथापन है. इस उम्र में लोग वानप्रस्थी हो जाते हैं, घरसंसार को तिलांजलि दे देते हैं. आप भी हरिद्वार चले जाइए और वहां किसी आश्रम में रह कर भगवान की याद में बाकी जीवन बिता दीजिए.’’

सुनते ही उन्हें जोरों का गुस्सा आ गया. वह क्रुद्ध शेर की तरह गरज उठे, ‘‘मुन्ना, क्या तू ने मुझे उन नाकारा और निकम्मे लोगों में से समझ लिया है, जिन के आगे अपने जीवन का कोई महत्त्व ही नहीं है. अभी मेरे हाथपांव चलते हैं. दुनिया में बहुत से अच्छे काम हैं करने के लिए. मैं घर में निठल्ला नहीं पड़ा रहना चाहता. घर से बाहर निकल कर समाज- सेवा करना चाहता हूं.’’

‘‘तो फिर कीजिए समाजसेवा. किस ने रोका है?’’

‘‘हाथपैरों से तो करूंगा ही समाज- सेवा, मगर उस के लिए कुछ धन भी चाहिए, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम कम से कम 1 हजार रुपए महीना मुझे जेब- खर्च के तौर पर देते रहो.’’

मुन्ना के कान खड़े हो गए, ‘‘1 हजार रुपए, किसे लुटाएंगे इतने पैसे आप?’’

हमेशा की तरह वह कमजोर नहीं पड़े, झुके भी नहीं, बल्कि वह मुन्ना से आंखें मिला कर बोले, ‘‘इस से तुम्हें क्या? त्रिवेणी को भी मैं अपने साथ रखना चाहता हूं. दे सकोगे न तुम मुझे मेरा खर्च?’’

‘‘कैसे दे पाऊंगा, बाबूजी, इतना पैसा? अभी जो मुंबई से नई मशीन मंगवाई हैं, उस का पैसा भी भेजना बाकी है.’’

‘‘तुम खुद मुझे इन झगड़ों से दूर कर चुके हो. यह देखना तुम्हारा काम है. मैं भी कोई मतलब नहीं रखना चाहता कारोबारी बखेड़ों से. मैं इतना जानता हूं कि यह कारखाना मेरा है और मैं चाहूं तो इसे बेच भी सकता हूं या किसी के भी सुपुर्द कर सकता हूं, लेकिन मैं ऐसा नहीं करना चाहता. मेरा तो इतना ही कहना है कि जब तुम लोगों के खर्च के लिए हजारों रुपए महीना निकल सकते हैं तो क्या मेरे लिए 1 हजार रुपए महीना भी आसानी से नहीं निकल सकते? आखिर मैं ने भी बरसों कारखाना चलाया है और अभी भी चलाने की हिम्मत रखता हूं. तुम से नहीं संभलता तो मुझे सौंप दो फिर से.’’

मुन्ना कोई उत्तर नहीं दे सका. वह सिर झुकाए बैठा रहा. कमरे का वातावरण बोझिल हो चला था. फिर मुन्ना ने ही धीरे से कहा, ‘‘अच्छा होता, बाबूजी, आप हरिद्वार…’’

‘‘नहीं, बेटा, मैं जिंदा इनसान हूं. कोई मुरदा नहीं कि हरिद्वार जा कर किसी आश्रम की कब्र में दफन हो जाऊं या घर में समाधि ले कर बैठा रहूं. तुम अपने ढंग से जीना चाहते हो, तो मैं अपने ढंग से.’’

‘‘अच्छा,’’ मुन्ना उठ कर बाहर जाने लगा. उन्होंने उन्नत मस्तक को उठा कर देखा कि वह अब भी सिर नीचा किए कमरे से बाहर जा रहा था.

GHKKPM: जगताप संग शादी करेगी सई! एक्टर ने कही ये बात

स्टार प्लस शो के सीरियल “गुम है किसी के प्यार में” ने दर्शकों को काफी एंटरटेन किया है, जिसकी वजह से शो हिट चल रहा है शो में सवि की कहानी दर्शकों को काफी पसंद आ रही है. दरअसल, कहानी में ये पता चल गया है कि सवि ही विराट की बेटी है, जिसकी वजह से विराट सई के भी नज़दिक आ  रहा है. बता दें, कि शो में ऐसे अनुमान लगाए जा रहे है कि सई और जगताप शादी करेंगे. जिस पर एक्टर सिद्धार्थ ने चुप्पी तोड़ी है। उन्होनें बताया है कि शो में सई और जगताप शादी करेंगे की नहीं, आईए बताते है पूरी कहानी…..

आपको बता दें, कि कि सिद्धार्थ बोडके ने कई सवालों पर चुप्पी तोड़ी है। उन्होनें ने बताया है कि क्या कभी जगताप और सई शादी करेंगे की नहीं! उनका मानना है कि ये “शो का स्तर अलग ही है. आपको अंदाजा नहीं कि सई और जगताप शादी भी करेगेंय़ अभी जगताप अपनी दोस्ती पर ध्यान दे रहे है वह सई से प्यार तो करता है लेकिन उसे कोई उम्मीद नहीं रखता है. लेकिन भविष्य में क्या हो सकता है इस पर अभी कहना मुश्किल है ये कहानी आगे और भी खूबसूरत मोड़ लेगी  

 

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सिद्धार्थ बोडके ने आयशा संग काम करने का शेयर किया अनुभव

एक इंटरव्यू के दौरान सिद्धार्थ ने बताया कि आयशा के साथ काम करना और टीम बनाना बहुत ही खुशनुमा अनुभव रहा है इतना ही नहीं, फैंस कई बार कह चुके है कि वह शो जगताप को देखने के लिए देखते है. और एक्टर आयशा को बेशुमार प्यार देते है.

सिद्धार्थ बोडके के वर्क फ्रंट की बात करें तो “सिद्धार्थ गुमं है किसी के प्यार में” में काफा पॉपुलर हो चुके है साथ ही उन्होंने दृश्यम 2 में भी अजय देवगन और एक्ट्रेस तबु के साथ काम किया है. फिल्म में उनके किरदार को खूब पसंद किया गया था.

चित्र अधूरा है – भाग 2 : क्या सुमित अपने सपने साकार कर पाया

कार्तिकेय चाहते थे कि उन का बेटा उन की तरह इंजीनियर बन कर देश के नवनिर्माण में सहयोग करे. 12वीं में उसे गणित और जीवविज्ञान दोनों विषय दिलवा दिए गए ताकि जिस ग्रुप में उस के अंक होंगे उसी में उसे दाखिला दिलवा दिया जाए. मगर परिवार का कोई भी सदस्य उस मासूम की इच्छा नहीं पूछ रहा था कि उसे क्या बनना है. उस की रुचि किस में है? मैं तो मूकदृष्टा थी. डर था तो केवल इतना कि वह कहीं दो नावों में सवार हो कर मंझधार में ही न गिर जाए? बस, मन ही मन यही सोचती कि जो भी अच्छा हो, क्योंकि आज प्रतियोगिताओं के दायरे में कैद बच्चे अपनी सुकुमारता, चंचलता और बचपना खो बैठे हैं. प्रतियोगिताओं में उच्च वरीयताक्रम के बच्चे ही सफल माने जाते हैं बाकी दूसरे सभी असफल. हो सकता है कि उन की तथाकथित असफलता के पीछे मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक कारण रहे हों, लेकिन आज उन की समस्याओं के समाधान के लिए समय किस के पास है? असफलता तो असफलता ही है, उन के मनमस्तिौक पर लगा एक अमिट कलंक.

घंटी बजने की आवाज सुन कर मैं ने दरवाजा खोला तो अनुज को खड़ा पाया. परीक्षाफल के बारे में पूछने पर वह बोला, ‘मालूम नहीं, ममा, बहुत भीड़ थी इसलिए देख ही नहीं पाया.’

दोपहर में कार्तिकेय उस के कालिज जा कर मार्कशीट ले कर आए. मुंह उतरा हुआ था, देख कर मन में खलबली मच गई. किसी अनहोनी की आशंका से मन कांप उठा, ‘क्या हुआ? कैसा रहा रिजल्ट?’ बेचैनी से मैं पूछ ही उठी.

‘पानी तो पिलाओ, मुंह सूखा जा रहा है,’ कार्तिकेयने पानी मांगते हुए कहा था.

पानी ले कर आई तो कार्तिकेय ने सुमित की मार्कशीट मेरे सामने रख दी. सभी विषयों में कम अंक देख कर मुंह से निकल गया, ‘यह मार्कशीट अपने सुमित की हो ही नहीं सकती. रोल नंबर उसी का है न?’ अविश्वास की मुद्रा में मुंह से निकल गया.

‘क्यों बेवकूफों जैसी बातें करती हो, मार्कशीट भी उसी की है, नाम और रोल नंबर भी,’ वह फिर थोड़ा रुक कर बोले, ‘अच्छा हुआ, मांपिताजी कानपुर दीदी के पास गए हैं वरना ऐसे नंबर देख उन के दिल पर क्या गुजरती?’

‘रिचैकिंग करवाएंगे,’ उन की बात अनसुनी करते हुए उमा ने कहा.

‘रिचैकिंग से क्या होगा? हर सब्जेक्ट में तो ऐसे ही हैं. गनीमत है पास हो गया, लेकिन ऐसे भी पास होने से क्या फायदा?’ कार्तिकेय, फिर थोड़ा रुक कर बोले, ‘तुम्हारी सोशल विजिट भी बहुत हो गई थी उन दिनों, उसी का परिणाम है यह रिजल्ट.’

कार्तिकेय का इस समय उस पर आरोप लगाना पता नहीं क्यों उमा को बेहद अनुचित लगा था किंतु स्थिति की गंभीरता को समझ कर, उस के आरोपों पर ध्यान न देते हुए उमा ने पूरे भरोसे के साथ किंतु धीमे स्वर में कहा, ‘यह रिजल्ट उस का है ही नहीं. क्या आप सोच सकते हो कि वह एकाएक इतना गिर जाएगा?’

‘तुम्हारे कहने से क्या होता है, जो सामने है वही यथार्थ है,’ कार्तिकेय ने एकएक शब्द पर बल देते हुए कहा. वह अनुज को सामने पा कर फिर बोल उठे, ‘इन को तो हीरो बनने से ही फुरसत नहीं है. एक ने तो नाक कटा दी और दूसरा शायद जान ही ले ले,’ कह कर वह आफिस चले गए.

अनुज सिर नीचा कर के अपने कमरे में चला गया. मां को गुस्से में उलटासीधा बोलते तो उस ने जबतब सुना था, किंतु पिताजी को इतना अपसेट नहीं देखा था. मां पहले कभी उन के सामने कभी कुछ कहतीं तो वह उन का पक्ष लेते हुए कहते, ‘बच्चे हैं, अभी शैतानी नहीं करेंगे तो फिर कब करेंगे, रोनेपीटने के लिए तो सारी जिंदगी पड़ी है.’

तब मां बिगड़ कर कहतीं, ‘चढ़ाओ, और चढ़ाओ अपने सिर. कभी अनहोनी हो जाए तो मुझे दोष नहीं देना.’ तो वह कहते, ‘अनहोनी कैसे होगी? मेरे बच्चे हैं, देखना नाक ऊंची ही रखेंगे.’ फिर हमारी तरफ मुखातिब हो कर कहते, ‘बेटा, कभी मुझे शर्मिंदा मत करना, मेरे विश्वास को ठेस मत पहुंचाना.’

आज वही डैडी सुमित भैया के परीक्षाफल को देख कर इतने दुखी हैं? वैसे उन के रिजल्ट पर तो उसे भी भरोसा नहीं हो रहा था. ‘कभी किसी दिन यदि कोई पेपर खराब भी होता तो उसे अवश्य बताते, कहीं कुछ गड़बड़ तो अवश्य हुई थी, कहीं कंप्यूटर में तो माव्फ़र्स फीड करने में किसी ने गड़बड़ी तो नहीं कर दी—?’ सवाल मस्तिष्क में कुलबुला तो रहे थे किंतु कोई समाधान उस के पास न था.

तभी फोन की घंटी बज उठी. फोन अमिता आंटी का था. अनुज मम्मी के कमरे में गया तो देखा, मम्मी सुबक रही हैं, उन को फोन देना उचित न समझ कर कह दिया कि वह सो रही हैं. परीक्षाफल पूछने पर कह दिया कि ‘पता नहीं’. वह जानता था कि वह कालोनी की इनफारमेशन सेंटर हैं. हर घर के समाचार उन के पास रहते हैं और पल भर में ही सब के पास पहुंच भी जाते हैं. पता नहीं उन को सब की घरेलू जिंदगी में इतनी दिलचस्पी क्यों रहती है? वैसे जब से उन की एकलौती पुत्री ने घर से भाग कर लव मैरिज की है तब से वह थोड़ा शांत जरूर हो गई हैं, लेकिन आदत तो आदत ही है, फोन रखने के बाद मम्मी ने अनुज से पूछा, ‘किस का फोन था?’

‘अमिता आंटी का.’

‘क्या कहा तू ने?’

‘कह दिया अभी पता नहीं चला है, डैडी ने किसी को भेजा है.’

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Winter Special: फटी एड़ियों को मुलायम बनाएं

सर्दियों में हमारी त्वचा को खास देखभाल की जरूरत होती है. त्वचा के लिए तो हम एकबार फिर भी मॉइश्चराइजर, कोल्ड क्रीम खरीद लेते हैं लेकिन एड़ियों की हिफाजत का ख्याल भी बहुत कम लोगों को ही आता है. नतीजा यह होता है कि सर्दियां बढ़ने के साथ ही एड़ियों की दरारें भी बढ़ने लग जाती हैं और एक समय ऐसा आता है कि चलना-फिरना भी मुश्किल हो जाता है.

ऐसे में बेहतर यही है कि समय रहते एड़ियों की देखभाल शुरू कर दी जाए ताकि आगे जाकर यह तकलीफ बढ़े नहीं. एड़ियों की देखभाल से पहले यह जानना जरूरी है कि एड़ियां फटती क्यों हैं.

क्यों फटती हैं एड़ियां

सही देखभाल न मिल पाना और गंदगी तो एक वजह है ही साथ ही अनियमित खानपान भी इसका एक मुख्य कारण है.

बनाएं एड़ियों को खूबसूरत और मुलायम

1. नारियल का तेल

रात को सोने से पहले पैरों को अच्छी तरह से साफ कर लें. इसके बाद साफ तौलिए से सुखाकर तेल लगाएं. इसके बाद मोजे पहन लें. इससे पैरों को गर्माहट मिलेगी और मॉइश्चर उड़ेगा भी नहीं. इस उपाय को सिर्फ 10 दिन करके देखें, फायदा होगा.

2. शहद

शहद एक बहुत अच्छा मॉइश्चराइजर है. एक बर्तन में इतना पानी ले लें कि उसमें आपके पैर डूब जाएं. इसमें आधा कप शहद मिलाकर पैर डुबोकर बैठ जाएं. कुछ देर बाद पैर धो लें. कुछ बार के ही इस्तेमाल से आपके पैर सॉफ्ट हो जाएंगे.

3. ग्लिसरीन

गुलाब जल और ग्लिसरीन का एक मिश्रण तैयार कर लें. इसे एड़ियों पर लगाकर कुछ देर के लिए छोड़ दें. इसके बाद पैरों को पानी से धो लें. कुछ दिनों में ही आपको असर नजर आने लगेगा.

4. पेट्रोलियम जेली

इसके अलावा पेट्रोलियम जेली का इस्तेमाल करके भी फटी एड़ियों की तकलीफ से राहत पायी जा सकती है. सिर्फ एक बात का ख्याल रखें कि गंदे पैर न रहें और अच्छी क्वालिटी के ही जूते-चप्पल पहनें.

Winter Special: नाश्ते में बनाएं पेरिपेरी पालक बड़ी

सर्दियां प्रारम्भ हो चुकीं हैं इन दिनों पालक, मैथी, सरसों का साग और धनिया जैसी हरी सब्जियां भी अच्छी खासी मात्रा में उपलब्ध रहतीं हैं. नाश्ता अक्सर हर गृहिणी के लिए बहुत बड़ी समस्या रहती है क्योंकि हर दिन नया नाश्ता बनाना सच में बहुत बड़ी चुनौती होता है. आपकी इसी समस्या को आज हमने हल किया है हरी पालक से बनाई जाने वाली तीखी और चटपटे स्वाद वाली अपनी इस रेसिपी के साथ, आप इसे नाश्ते में घर में उपलब्ध सामग्री से बड़ी आसानी से बना सकतीं हैं तो आइए देखते हैं कि इसे कैसे बनाया जाता है-

कितने लोगों के लिए                   4

बनने में लगने वाला समय             20 मिनट

मील टाइप                                वेज

सामग्री

हरी पालक                             250 ग्राम

बेसन                                     1 कप

चावल का आटा                      1/4 कप

पानी                                      ढाई कप

नमक                                    स्वादानुसार

अदरक, हरी मिर्च पेस्ट             1 टीस्पून

हींग                                     चुटकी भर

जीरा                                   1/4 टीस्पून

हल्दी पाउडर                        1/4 टीस्पून

लाल मिर्च पाउडर                 1/4 टीस्पून

नीबू का रस                         1 टीस्पून

शकर                                 1 टेबलस्पून

तिल                                  1 टीस्पून

मूंगफली दाना                      2 टीस्पून

घी                                    1 टेबलस्पून

राई के दाने                         1/4 टीस्पून

तेल                                    तलने के लिए

पेरी पेरी मसाला                 1 टीस्पून

विधि

पालक को साफ करके धोकर बारीक काट लें. एक कटोरे में बेसन और चावल के आटे को एक साथ मिलाएं. अब इसमें 1 कप पानी धीरे धीरे पानी मिलाकर गाढ़ा घोल तैयार कर लें. तैयार घोल में तेल, तिल, राई और मूंगफली दाने  को छोड़कर कटी पालक व अन्य समस्त सामग्री को एक साथ अच्छी तरह मिलाएं. अंत में बचा डेढ़ कप पानी भी मिला दें. अब एक पैन में 1 टीस्पून तेल गरम करके राई तड़काकर तिल और मूंगफली को अच्छी तरह भून कर तैयार बेसन का घोल डालकर लगातार चलाते हुए तेज आंच पर गाढ़ा होने तक पकाएं. जब मिश्रण एकदम गाढ़ा हो जाये तो गैस बंद कर दें और मिश्रण को चिकनाई लगी ट्रे में आधे इंच की मोटाई में फैलाएं. आधे घण्टे तक ठंडा होने के लिये छोड़ दें. आधे घण्टे के बाद 1 इंच के चौकोर टुकड़ों में काट लें. अब इन्हें गर्म तेल में तेज आंच पर सुनहरा होने तक तलकर बटर पेपर पर निकाल लें. गर्म में ही बड़ी में  पेरी पेरी मसाला अच्छी तरह मिलाएं और हरे धनिये की चटनी के साथ सर्व करें.

क्या करें लिव इन रिलेशन में रहने से पहले

करीब 4 साल तक लिव इन रिलेशनशिप में रहने के बाद स्मृति ने जब देखा कि उस के बौयफ्रैंड सूरज ने किसी और लड़की से शादी कर ली है, तो उस के पैरों तले धरती खिसक गई.

पिछले कुछ दिनों से वह सूरज के हावभाव में बदलाव देख रही थी. पूछने पर वह अलगअलग बहाने बना देता था. कभी कहता कि औफिस में समस्या है, तो कभी कहता कि तबीयत ठीक नहीं है. एक दिन जब उस ने जोर दिया तो उस ने बताया कि जब वह अपने शहर गया, तो मातापिता ने उस की जबरदस्ती शादी करवा दी. वह अपनी और स्मृति की बात उन्हें इसलिए नहीं बता पाया, क्योंकि वे दोनों के अलगअलग जाति के होने की वजह से इस रिश्ते को मंजूरी नहीं देते.

स्मृति उस की सहजता से कह गई इस बात से हैरान हो गई. फिर उसी दिन वहां से अपनी मां के पास चली गई. फिर वह एक सामाजिक संस्था से मिली और कोशिश कर रही है कि सूरज उसे अपना ले. वह कोर्ट नहीं गई, क्योंकि उसे लगा कि इस से उस की बदनामी होगी. उस का कहना है कि सूरज कोशिश कर रहा है. वह अपनी पत्नी को तलाक दे कर उसे अपनाएगा, क्योंकि यह शादी उस ने अपने मातापिता की जिद से की है.

यहां सवाल यह उठता है कि अब तक सूरज अगर अपने रिश्ते को परिवार की नहीं बता पाया है, तो आगे कैसे बता कर स्मृति के साथ रहेगा? और अपनी पत्नी को छोड़ेगा कैसे? उस के लिए वजह क्या बनाएगा?

लिव इन रिलेशनशिप आज के समय में तेजी से बढ़ रहा है. एक समय ऐसा था जब ऐसे संबंध होने पर लोग खुल कर बात करना पसंद नहीं करते थे. लेकिन आजकल लोग खुल कर इस रिलेशनशिप में रहते हैं खासकर युवा इस रिश्ते को अपनाने में सहजता का अनुभव करते हैं, क्योंकि इस में दायित्व कम होता है.

सैक्स की आजादी

इस बारे में मुंबई की सोशल ऐक्टिविस्ट नीलम गोरहे कहती हैं, ‘‘यह रिश्ता तब तक ठीक रहता है जब तक महिलाओं को कोई समस्या नहीं आती. महिलाएं मेरे पास तब आती हैं जब उन का बौयफ्रैंड उन्हें छोड़ कर चला गया हो या चोरीछिपे शादी कर ली हो. ऐसे में हरेक महिला यही चाहती है कि रिश्ते को मैं ठीक कर दूं. उस लड़के से कहूं कि उसे अपना ले.

‘‘असल में इस रिश्ते के लिए अधिकतर लड़के ही आगे आते हैं, क्योंकि प्यार से अधिक इस में सैक्स की आजादी होती है. यह रिश्ता जितनी आजादी देता है, उतना ही खतरनाक भी होता है. मेरे पास एक मातापिता ऐसे आए जिन की लड़की का मर्डर हो चुका था पर कोई पू्रफ नहीं था. उसे मारने वाला उस का बौयफ्रैंड ही था.

3-4 साल से वह लड़की उस लड़के के साथ लिव इन रिलेशनशिप में थी, जिस का पता उस के मातापिता को नहीं था. जब पता चला तो मातापिता ने लड़की से उस से शादी करने के लिए कहा. लेकिन वह लड़का तब आनाकानी करने लगा, जिसे देख लड़की ने उस रिश्ते से बाहर निकलना चाहा. यह बात लड़के को जब पता चली तो उस ने उस का मर्डर कर दिया. उस का शव बाथरूम में मिला.

‘‘दरअसल, लड़के को यह लगा था कि अलग होने के बाद लड़की कोर्ट जा सकती है, क्योंकि वह पढ़ीलिखी थी. पू्रफ के अभाव में लड़का अभी बाहर है.’’

लिव इन रिलेशनशिप के अधिकतर मामले महानगरों में पाए जाते हैं, जहां काम या पढ़ाई के लिए युवा घर से दूर रहते हैं. उन के बीच अकसर इस तरह के रिश्ते हो जाते हैं. दरअसल, फ्लैट कल्चर में घर शेयर करने यानी साथ रहने में इन्हें फायदा भी नजर आता है.

इन रिश्तों को लड़के ही अधिकतर तोड़ते हैं, लेकिन रिश्ता टूटने पर भावनात्मक से सहज हो जाना कई बार लड़कियों के लिए मुश्किल हो जाता है, क्योंकि इस में लड़की के परिवार की भूमिका न के बराबर होती है.

नीलम कहती हैं, ‘‘इस तरह के रिश्ते को बढ़ावा देने में धर्म भी कम नहीं. अधिकतर लोग विपरीत धर्म या जाति में शादी करने के लिए इजाजत नहीं देते, इसलिए रिश्ते को छिपाना पड़ता है. कई बार तो लोग दोहरी जिंदगी भी जीते हैं, जो डिप्रैशन, मर्डर, आत्महत्या जैसी कई घटनाओं को जन्म देती है.

‘‘इस रिश्ते को शादी का नाम देने के लिए मातापिता, परिवार व समाज के सहयोग की आवश्यकता होती है, जो आमतौर पर नहीं मिलता. इस रिश्ते में बड़ी समस्या तब आती है जब दोनों के बीच में बच्चा आ जाता है. बच्चा जब स्कूल जाने लगता है तब उत्तरदायित्व समझ में आता है. हालांकि आजकल डी.एन.ए. टैस्ट का प्रावधान हो चुका है, जिस से महिला को काफी राहत मिल रही है.

‘‘शादी करना आजकल काफी खर्चीला भी होता है. इस के लिए समय और संसाधन की भी जरूरत होती है. वहीं अगर शादी असफल हो जाए तो तलाक के लिए कानूनी झंझट से गुजरना पड़ता है. लिव इन रिलेशन दरअसल शादी का प्रिव्यू है जिस से व्यक्ति यह अंदाजा लगा सकता है कि शादी सफल होगी या नहीं.

ठगी की शिकार महिलाएं

सीनियर ऐडवोकेट आभा सिंह कहती हैं कि लिव इन रिलेशनशिप बड़े शहरों में अधिक है और इसे सामाजिक कलंक अभी भी हमारे समाज में माना जाता है. बहुत कम महिलाएं हिम्मत कर अपना कानूनी अधिकार पाती हैं, क्योंकि कोर्ट, वकील की बातें बहुत कठोर होती हैं. उन्हें सह पाना आसान नहीं होता.

बहुत सारी ऐसी घटनाएं हैं जिस में महिलाएं ठगी गईं पर उन्होंने रिपोर्ट नहीं लिखवाई. बौलीवुड के सुपरस्टार राजेश खन्ना की मौत के बाद उन के बंगले का विवाद सामने आया. उन के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली अनिता आडवाणी को परिवार के लोगों ने धक्के मार कर घर से बाहर निकाल दिया. जबकि वे 8 साल से राजेश खन्ना के साथ रह रही थीं. जब वे मेरे पास आईं, तो मैं ने पहली बात यही पूछी कि आप इतने दिनों तक कहां थीं? पहले क्यों नहीं आईं जब राजेश खन्ना जीवित थे? दरअसल, उन के पास ऐसा कोई पू्रफ यानी सुबूत नहीं था कि वे उन के साथ रह रही थीं, ऐसे केस में पू्रफ के लिए निम्न जगहों पर साथ रहने वाली का नाम होना चाहिए:

– जौइंट अकाउंट में.

– बिजली या मोबाइल बिल में.

– राशन कार्ड में.

ऐसा होने पर ही आप सिद्ध कर सकती हैं कि आप उस व्यक्ति से कुछ पाने की हकदार हैं.

अनिता आडवाणी को 200 करोड़ की प्रौपर्टी में से कुछ भी नहीं मिला. हाई कोर्ट में भी उन की अर्जी खारिज कर दी गई. अब वे सुप्रीम कोर्ट जा रही हैं.

इन शर्तों को जानें

गुजारा भत्ता पाने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि लिव इन रिलेशन में निम्न 4 शर्तें पूरी होना जरूरी हैं:

– ऐसे युगल समाज के सामने पतिपत्नी के तौर पर आएं.

– वे शादी की कानूनी उम्र पूरी कर चुके हों.

– उन के रिश्ते कानूनी रूप से शादी करने के लिए वर्जित न हों.

– दोनों स्वेच्छा से लंबे वक्त तक यानी कम से कम 6 साल साथ रहे हों.

रिश्ता खराब नहीं

26 नवंबर 2013 को एक अदालती आदेश में रिलेशनशिप को क्राइम नहीं माना गया. इस से इस रिश्ते को अपनाने वाले युवाओं को काफी राहत मिली. मैरिज काउंसलर संजय मुखर्जी कहते हैं कि ऐसे केसेज में दिनोंदिन बढ़ोतरी हो रही है. यह रिश्ता खराब नहीं है. कई बार शादी के बाद पतिपत्नी में अनबन हो जाती है, इसलिए बहुत से यूथ इसे अपनाते हैं. अधिकतर आत्मनिर्भर महिलाएं ही इस रिश्ते को पसंद करती हैं, क्योंकि इस में सासससुर, ननद, देवर आदि का झंझट नहीं रहता.

यह रिश्ता एक तरह से ऐक्सपैरिमैंटल होता है, जिस में 3-4 महीने तो ठीक ही चल जाते हैं. समस्या 1 साल बाद आती है. मेरे हिसाब से 1 साल तक इस रिश्ते में रहने के बाद महिलाओं को शादी करने के बारे में सोचना चाहिए. इस के अलावा कुछ बातों पर उन्हें खास ध्यान देना चाहिए:

– अगर लड़का शादी न करना चाहे, तो वजह पता करें.

– दोनों अपनी कमाई जौइंट अकाउंट में साथसाथ डालें और दोनों उसी से खर्च करें.

– अगर शादी नहीं करनी है, तो पहले ही वकील से परामर्श कर स्टैंप पेपर पर अपने हिस्से को सुनिश्चित करवा लें.

इस के अलावा संजय कहते हैं कि लिव इन रिलेशन में बच्चे की प्लानिंग न करें ताकि आगे चल कर आने वाले बच्चे को अपराधबोध न हो.

वैसे हर रिश्ते की अपनी अलग अहमियत होती है. लेकिन जहां शादी एक महिला को सुरक्षित जीवन देती है, वहीं लिव इन रिलेशनशिप में असुरक्षा अधिक रहती है. सही यही होगा कि आप अपने रिश्ते को समझने की कोशिश करें और अपने भविष्य में आने वाली परेशानियों से अपनेआप को बचाएं.

सोच समझकर इस्तमाल करें क्रेडिट कार्ड

क्रेडिट कार्ड से शॉपिंग सुविधाजनक है और कैश हाथ में न होने पर भी जरूरत का सामान आसानी से लिया जा सकता है. लेकिन समझदारी से इसका यूज नहीं करने पर आप बहुत बड़ी परेशानी में फंस सकती हैं. 500-1000 के नोट बैन के बाद तो क्रेडिट कार्ड और भी महत्वपूर्ण हो गया है.

हालांकि यह भी सच है कि क्रेडिट कार्ड से खरीदारी के दौरान थोड़ा लालच बढ़ जाता है और तब खुद पर कंट्रोल करना मुश्किल होता है. ऐसे में थोड़ी समझदारी दिखाना जरूरी है. ऐसा न हो कि आप एक ही बार में क्रेडिट कार्ड की सारी लिमिट खत्म कर दें और फिर बाद में इंस्टॉलमेंट देने पर आपको परेशानी हो या जरूरी खर्चे तक रोकने की नौबत आ जाए.

क्रेडिट कार्ड फायदे की चीज है. तो जानते हैं ऐसे 5 टिप्स, जो अच्छी खरीदारी के साथ ही क्रेडिट कार्ड को समझदारी से इस्तेमाल करने का तरीका भी बताएंगे.

1. क्रेडिट कार्ड से शॉपिंग करते समय हर बार आप रिवार्ड पॉइंट्स कमाते हैं. अक्सर 100-250 की खरीद पर आपको 1 पॉइंट मिलता है. हालांकि यह अलग-अलग कार्ड और बैंक पर डिपेंड करता हैं. समझदारी इसी में है कि आप अपने जुटाए हुए पॉइंट्स से अपडेट रहें और शॉपिंग की पेमेंट करने के दौरान इनको भी यूज कर लें. इस तरह आपको खासी बचत मिल सकती है.

2.  क्रेडिट कार्ड से खरीदारी के बाद अपने मोबाइल में सारी पेमेंट डीटेल और इंस्टालमेंट के रिमाइंडर लगा लें, जिससे आपको याद रहे कि ड्यू डेट से पहले ही आपको इसे क्लीयर कर देना है ताकि बाद में ब्याज का ज्यादा बोझ न पड़ें. कोशिश करें कि जब तक आप पहले वाली पेमेंट न कर दें, तब तक और शॉपिंग न करें.

3. फालतू के खर्च से बचने की कोशिश करें. कभी भी बंपर ऑफर्स या सेल को देखकर यह न सोचें कि सारा फायदा अभी ही उठा लें. हमेशा ध्यान रखें कि कंपनियां और ब्रांड्स अक्सर कोई न कोई ऑफर लेकर आते ही रहते हैं. ऐसे में लालच में न पड़े. वरना बाद में ब्याज समेत इसका ज्यादा बोझ आपकी जेब पर पड़ सकता है.

4. बजट से थोड़ा कम ही खर्च करने का टारगेट बनाएं. अगर आपके क्रेडिट कार्ड की लिमिट 1 लाख है तो कोशिश करें कि आप 80 हजार में ही अपनी शॉपिंग निपटा लें. ऐसा करने से जरूरत के समय आप इस बचाए हुए क्रेडिट का इस्तेमाल कर पाएंगे.

5. हर महीने अपने क्रेडिट कार्ड की स्टेटमेंट सावधानी से चेक करने की आदत डालें. एक अच्छा तरीका यह भी है कि आप क्रेडिट कार्ड के जरिए खरीदे गए सामान का बिल हमेशा पेमेंट क्लीयर होने तक संभाल कर रखें. इससे आप आसानी से स्टेटमेंट के साथ बिल को वैरिफाई कर पाएंगे कि कहीं कोई एक्सट्रा चार्ज तो नहीं लगा या कोई और गड़बड़ी तो नहीं है.

इसके अलावा साइबर सिक्योरिटी भी एक बड़ा मुद्दा है. कभी भी अपने क्रेडिट कार्ड का पिन नंबर और सिक्योरिटी कोड किसी को न दें. इसमें आपके पैसे की ही सुरक्षा है.

चौथापन- भाग 2 : मुन्ना के साथ क्या हुआ

वह अपने हालात से परेशान हो कर कई बार सोचते थे कि त्रिवेणी उन के पास रहती तो बड़ा सुविधाजनक होता. वह उन के खानेपीने का कितना खयाल करती थी. भैयाभैया कहते उस की जबान नहीं थकती थी.

सच  पूछो तो अपनी पत्नी इंदू की मौत का आघात वह उसी के सहारे सहन कर गए थे. त्रिवेणी के रहते उन्हें कभी एकाकीपन का एहसास नहीं सालता था.

सब से बड़ी बात यह थी कि तब मुन्ना के उपेक्षित रूखेपन, बहू की अपमानजनक तेजमिजाजी और नाती- नातिनों की बदतमीजियों की ओर उन का ध्यान ही नहीं जाता था. वह तो त्रिवेणी को भेजना ही नहीं चाहते थे, लेकिन बहू ने मुन्ना के ऐसे कान भरे कि उस का घर में रहना असंभव कर दिया.

एक दिन वह शाम की सैर को पार्क की दिशा में जा रहे थे कि मुन्ना ने कार उन के सामने रोक दी, ‘‘आइए, बाबूजी, मैं छोड़ दूं आप को पार्क तक.’’

वह कहना चाहते थे, ‘भाई, पार्क है ही कितनी दूर? मैं घूमने ही तो निकला हूं. खुद चला जाऊंगा,’ पर चाह कर भी कुछ न बोल सके और चुपचाप कार में बैठ गए.

मुन्ना ने जोर से कार का दरवाजा बंद किया. फिर कार चल दी. मुन्ना ने अचानक पूछ लिया, ‘‘बाबूजी, बूआ यहां कब तक रहेंगी?’’

वह चौंके, ‘‘क्यों बेटा? उस से तुम्हें क्या तकलीफ है?’’

‘‘तकलीफ की बात नहीं है, बाबूजी. मां के मरने पर बूआजी आईं तो फिर वापस गईं ही नहीं.’’

‘‘वह तो मैं ही उसे रोके हुए हूं बेटा. फिर उस पर ऐसी कोई बड़ी जिम्मेदारी अभी नहीं है. सो वह हमारे यहां ही रह लेगी.’’

‘‘लेकिन हम उन की जिम्मेदारी कब तक उठाएंगे? उन के अपने बेटाबहू हैं. उन्हें उन के पास ही रहना चाहिए. फिर वह यहां तरीके से रहतीं तो कोई बात नहीं थी पर वह तो हमेशा आप की बहू ममता पर रोब गांठती रहती हैं.’’

मुन्ना के शब्दों ने ही नहीं उस के स्वर ने भी उन्हें आहत कर दिया था. वह जानते थे कि त्रिवेणी पर लगाया गया आरोप झूठा है. आखिर त्रिवेणी उन की एकमात्र बहन है. वह उसे बचपन से जानते हैं. ममता उस के विषय में ऐसी बात कह ही नहीं सकती थी. लेकिन वह चाह कर भी मुन्ना से अपना विरोध प्रकट नहीं कर सके थे. वह जानते थे कि मुन्ना और बहू अब त्रिवेणी को घर में शांति से नहीं रहने देंगे. उसी को ले कर हर समय कलह मची रहेगी. बातबात पर त्रिवेणी को अपमानित किया जाता रहेगा. वह यह ज्यादती सहन नहीं कर सकेंगे. इसीलिए उन्होंने त्रिवेणी को भेज दिया था.

त्रिवेणी चली गई थी. जिस दिन वह गई, उस दिन उन्हें ऐसा लगा मानो इंदू की मौत अभीअभी हुई हो. कितने ही दिनों तक वह अनमने से रहे थे. अब उन्हें पूछने वाला कोई न था. सुबह की चाय के लिए भी तरस जाते थे. वह बारबार बच्चों द्वारा बहू के पास संदेश भेजते रहते, पर वह संदेश अकसर बीच में ही गुम हो जाता था. थक कर वह खुद रसोईघर के द्वार पर जा कर दस्तक देते. जवाब में बहू का तीखा स्वर सुनाई देता, ‘‘आप को चाय नहीं मिली? अंजू से कहा तो था मैं ने. ये बच्चे ऐसे बेहूदे हो गए हैं कि बस… अकेला आदमी आखिर क्याक्या करे? मैं तो काम करकर के मर जाऊंगी, तब ही शांति मिलेगी सब को.’’

वह अपराधी की तरह मुंह लटकाए अपने कमरे में लौट आते थे.

भोजन के समय भी अकसर ऐसा ही तमाशा होता था. कई बार उन के मुंह का कौर विष बन जाता था. पर उस जहर को निगल लेने की मजबूरी उन की जिंदगी की विडंबना बन गई थी.

सुबह के समय वह कितनी ही देर तक गरम पानी के अभाव में बिना नहाए बैठे रहते थे. अब त्रिवेणी तो घर में थी नहीं कि सुबह जल्दी उठ कर गीजर चला देगी. बहू उठती थी पूरे 7 बजे के बाद और नौकर 8 बजे तक आता था.

जब तक पानी गरम होता था, स्नानघर में पहले ही कोई दूसरा व्यक्ति स्नान के लिए घुस जाता था. भला उन्हें कौन सा काम था? उन के जरा देर से नहाने से कौन सा अंतर पड़ जाता. बहू, बच्चे, मुन्ना सब को जल्दी थी, सब कामकाजी आदमी थे. बस, वही बेकार थे.

वह इंतजार में इधरउधर टहलते हुए बारबार नौकर से पूछते रहते थे, ‘‘गोपाल, क्या स्नानघर खाली हो गया?’’

‘‘स्नानघर खाली हो जाएगा तो मैं खुद बता दूंगा आप को, दादाजी,’’ नौकर भी मानो बारबार एक ही प्रश्न पूछे जाने पर उकता कर कह देता था.

और केवल नहानेखाने की ही तो बात नहीं थी. घर की हर गतिविधि में उन्हें पंक्ति के सब से आखिर में खड़ा कर दिया जाता था. घर में उन के दुखसुख का साथी कोई नहीं था.

एक दिन अचानक उन के सिर में भयंकर पीड़ा होने लगी. बड़ा नाती मुकेश कमरे में अपना बल्ला रखने आया. उन्होंने उसे पकड़ कर चापलूसी की, ‘‘बेटे, जरा मेरा सिर तो दबाना. बड़ा दर्द हो रहा है.’’

मुकेश ने अनिच्छा से 2-4 हाथ सिर पर मारे और तत्काल उठ खड़ा हुआ. वह घबरा कर कराहे, ‘‘अरे बस, जरा और दबा दे.’’

‘‘मेरे हाथ दुखते हैं, दादाजी.’’

वह दंग रह गए. फिर दूसरे ही क्षण तमक कर बोले, ‘‘बूढ़े दादा की सेवा करने में तुम्हारे हाथ टूटते हैं? आने दे मुन्ना को.’’

मुकेश ढिठाई से मुसकराता हुआ चला गया. वह पड़ेपड़े मन ही मन कुढ़ते रहे थे. उन्हें अपना बचपन याद आने लगा था. वह कितनी सेवा करते थे अपने बाबा की. रोजाना रात को नियम से उन के हाथपैर दबाया करते थे. बाबा उन्हें अच्छीअच्छी कहानियां सुनाया करते थे.

बाबा की याद आई तो उन्हें एहसास हुआ कि आज जमाना कितना बदल गया है. मजाल थी तब परिवार के किसी सदस्य की कि बाबा की बात को यों टाल देता.

भोजन के बाद मुन्ना उन के कमरे में आया. पूछा, ‘‘बाबूजी, सुना है, आप ने खाना नहीं खाया है आज?’’

‘‘इच्छा नहीं थी, बेटा. सिर अभी तक बहुत पीड़ा कर रहा है. शायद बुखार आ कर ही रहेगा.’’

वह मुकेश की गुस्ताखी की चर्चा करना चाहते थे, लेकिन कुछ सोच कर चुप रह गए थे. वह जानते थे कि मुन्ना सब कुछ सुन कर तपाक से कहेगा, ‘‘अरे बाबूजी, क्यों बच्चों के मुंह लगते हैं? नौकर से कह दिया होता. वह दबा देता आप का सिर.’’

लेकिन प्रश्न यह था कि क्या नौकर खाली बैठा रहता था उन के लिए? दूध लाओ, सब्जी लाओ, बच्चों को ट्यूशन पढ़ने के लिए छोड़ कर आओ, बहू और बच्चों के कमरे साफ करो, रसोई धोओ. हजार काम थे उस के लिए. वह भला उन का काम कैसे करता?

‘‘दर्द निवारक टिकिया मंगवाई थी न आप ने? 2 गोलियां एकसाथ खा लीजिए. तुरंत आराम आ जाएगा. मैं सुबह डाक्टर को बुलवा कर दिखवा दूंगा. अच्छा, मैं चलता हूं. अगर रात में ज्यादा तकलीफ हो तो हमें आवाज दे दीजिएगा,’’ कह कर मुन्ना चल दिया था.

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