रमाकांत न्यूज देख रहे थे. वह जा कर चुपचाप वहां खड़ी हो गई. उन्होंने एक बार उसे देखा और न्यूज देखने लगे. वह फिर भी खड़ी रही. जब देर तक पापा ने कुछ नहीं कहा तब वह उन के पास चली गई और धीरे से बोली, ‘‘पापा.’’
रमाकांत ने सिर उठा कर देखा तो वह बोली, ‘‘पापा मैं कुछ कहना चाहती हूं.’’
‘‘अब कहने को क्या रह गया है?’’
व नाराज हो उठने ही वाले थे कि सुधा ने दौड़ कर पापा के पैर पकड़ लिए, ‘‘पापा मुझे माफ कर दीजिए. मुझ से बहुत भारी भूल हो गई पापा.’’
सुधा के रोने की आवाज सुन कर मां और दीपू दोनों पास आ कर खडे़ हो गए. सुधा जोरजोर से रो रही थी और बोल रही थी, ‘‘पापा एक बार मुझे माफ कर दीजिए. अब मैं वही करूंगी जो आप लोग कहेंगे. मुझे पता है मैं ने आप सभी लोगों का दिल दुखाया है. इस भूल के लिए मैं दिल से माफी मांगती हूं. विश्वास कीजिए अब मैं एक अच्छी बेटी…’’
रोतेरोते सुधा बेहोश हो गई. मां और पापा दोनों ने उसे पकड़ कर सोफे पर बैठाया. दीपू दौड़ कर पानी ले आया.
‘‘सुधा पानी पी लो,’’ सुधा को होश आया तो देखा पापा का हाथ सुधा के सिर के नीचे था. उस के आंख खोलने के बाद हटा लिया और उठ कर जाने लगे.
सुधा ने उन का हाथ पकड़ लिया और कातर स्वर में बोली, ‘‘पापा.’’
‘‘जाओ आराम करो… तबीयत खराब हो जाएगी,’’ बोल कर रमाकांत कमरे में चले गए.
सुधा ने मां से पूछा, ‘‘मां पापा बहुत नाराज हैं न.’’
‘‘देखो सुधा नाराजगी कोई केतली में गरम होता पानी तो नहीं न कि ढक्कन हटाए और भाप की तरह गुस्सा खत्म. पापा को तुम जानती हो उन के मन को ठेस लगी है समय लगेगा… पापा को थोड़ा समय देना होगा. जाओ सो जाओ वरना तबीयत खराब हो जाएगी.’’
सुधा बो िझल कदमों से अपने कमरे में चली गई. नींद नहीं आ रही थी पर अब वह हताशा से थोड़ा उबर रही थी. पापा नाराज हैं पर अभी भी उतना ही प्यार करते हैं. वह कितनी बेवकूफ थी जो सबकुछ भूल कर उस धोखेबाज के साथ चल दी. कहीं गलती से शादी हो जाती तब? अब तो उस के बारे में सोचना भी गुनाह है. बस एक बार पापा माफ कर दें. कुदरत मेरे मांपापा को हमेशा खुश रखना, वह मन से प्रार्थना करने लगी.
सभी सामान्य होने की कोशिश कर रहे थे. सुधा को वापस आए अब कुछ समय हो गया था. एक दिन रात के खाने के समय रमाकांत ने सुधा से पूछा, ‘‘कितने दिनों तक कालेज नहीं जाना है.’’
‘‘अगर आप कहेंगे तभी जाऊंगी,’’ खुश हो कर सुधा ने धीरे से कहा, ‘‘कल आधार दे देना. नया नंबर लेना है,’’ सुधा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.वह कालेज जाने की बात से खुश थी.
सुबह तैयार हो कर पापा के साथ जाने को थी कि भारती आ गईं बोली, ‘‘कितने दिन मैं कालेज नहीं गई… मु झे अपने नोट्स दे देना.’’
सुधा क्या बोले. तब तक मां ने कह दिया, ‘‘यह भी नहीं जा पाई. पहले मेरी तबीयत खराब हो गई, फिर इस की. देखो न चेहरा कैसे सूख गया है.’’
मां देवी है कैसे बात संभाल लेती है. उसे अपनी मां पर गर्व हो रहा था. सुधा की मां के मन से चैन गायब हो गया था. मां को अभी मोबाइल देना नहीं जंच रहा था. थोड़ी निगरानी रखनी पडेगी. विश्वास रखना अच्छी बात है, लेकिन एकदम से खुला छोड़ देने में खतरा है. कहीं वह लड़का रास्ते में आया तब.
सुधा एक अच्छी लडकी थी. साफ मन की थी बस थोड़ी नादान बेवकूफ थी. इस उम्र में लड़कियां सपनों की दुनिया में रहती हैं. उन्हें वरदी वाला लड़का बहुत भाता है, फिर नौर्थ बिहार में तो आईएएस और आईपीएस का बड़ा बोलबाला होता है. हर मां सोचती है कि काश उस का दामाद आईएस या आईपीएस हो. उसी तरह हर लड़की का भी यही सपना रहता है.
सुधा उम्र के जिस दौर से गुजर रही थी उस में सपनों में जीने में मजा आता है. वह हकीकत की दुनिया से परे दुनिया है. कुछ लोग इस उम्र को बडे़ सलीके से लेते हैं. कुछ सपनों की दुनिया बना कर खुद को बरबाद कर डालते हैं. अब लीला देवी को सुधा के विवाह की चिंता सताने लगी. वह स्वयं कम शिक्षित थी. पहले मां की इच्छा थी कि वह सुधा को उच्य से उच्य शिक्षा दिलाए पर अब परिस्थितियां बदल गई थीं. मन में शंकाओं ने डेरा जमा लिया था कि कहीं वह लफंगा सुधा को हानि न पहुंचाने की कोशिश करे. सुधा की मां ने अपना फैसला सुना दिया.
सुधा का जीवन अब सामान्य हो चला था. वह अपने व्यवहार से सभी को संतुष्ट करने के प्रयास में सफल हो रही थी. वह सब से अधिक कालेज जाने से खुश थी. सुधा एक अच्छी छात्रा थी. अच्छे नंबरों से पास होती थी. वह अर्थशात्र में बी.ए. कर रही थी. उस का सपना प्रोफैसर बनने का था. परीक्षा भी नजदीक है. मात्र 2 महीने ही बचे हैं. बस एक बात उसे खटक रही थी कि मांपापा जल्दी उस की शादी कराना चाहते हैं. इतना सम झ में तो आ गया कि यह शीघ्रता किस कारण से हो रही है. मां तो उस के उच्य शिक्षा के पक्ष में थी. उस का मन कचोट उठा कि अभी तो उस का मन मांपापा के साथ रहने को कर रहा था.
वक्त बीतते देर नहीं लगती. सुधा की परीक्षा खत्म हो गई थी. खाली समय काटते नहीं कटता. पहले स्कैचिंग पेंटिंग का शौक था, लेकिन उस छिछोरे के कारण सबकुछ छूट गया था. उस ने स्कैचिंग फिर शुरू की. उस के पापा ने उसे स्कैच करते देखा तो लीला देवी की नाराजगी की परवाह न करते हुए उस का नाम पेंटिंग स्कूल में लिखा दिया.
विवाह के लिए लड़के की खोज जारी थी किसी परिचित ने एक अच्छा रिश्ता बताया. लड़का जमशेदपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर के बैंगलुरु में कार्यरत था. उस की एक बड़ी बहन है जिस की शादी हो चुकी है. वह कोलकाता में रहती है. मातापिता पटना में हैं. रमाकांत ने पत्नी लीला से चर्चा की. लीला देवी को बैंगलुरु का नाम सुन कर थोड़ा दुख लगा कि बेटी दूर चली जाएगी. पर एक बात की खुशी थी कि ससुराल पटना में है तब बेटी से मिलना हो पाएगा. बातचीत शुरू हुई. सारी बात तय हो गई. कुंडली भी अच्छी मिली. बस अब इंतजार लड़के का था. लीला देवी ने लडके की तसवीर सुधा को दिखाना चाही.
सुधा देखने के लिए तैयार नहीं थी, ‘‘मां मुझे नहीं देखनी है तुम लोगों ने देखी मेरे लिए यही काफी है… तुम लोगों से ज्यादा मेरा भला कौन सोच सकता है.’’
1 महीने बाद खबर आई कि लड़का 1 सप्ताह के लिए आने वाला है लड़की को दिखा दिया जाए. बहुत डांटफटकार के बाद सुधा पार्लर गई. शाम को सुधा तैयार हो रही थी. वह बहुत घबराई हुई थी. जब किसी लडकी की शादी की बात चलती है तब उस के दिल में कितनी तमन्नाएं, कितने अरमान, हसरतें अंगड़ाइयां लेने लगती हैं. पर सुधा के साथ ऐसा कुछ नहीं था. रोमांच का तो नामोनिशान नहीं था. अतीत की घटना, आने वाले पल की आशंका सब मिल कर उसे खुश नहीं होने दे रहे थे. मां तैयार हो कर सुधा को देखने आई सुधा को तैयार देख कर बोली, ‘‘काजल नहीं लगाया,. लगा ले आंखें सुना लग रही हैं.’’