सच के फूल- भाग 4: क्या हुआ था सुधा के साथ

रमाकांत न्यूज देख रहे थे. वह जा कर चुपचाप वहां खड़ी हो गई. उन्होंने एक बार उसे देखा और न्यूज देखने लगे. वह फिर भी खड़ी रही. जब देर तक पापा ने कुछ नहीं कहा तब वह उन के पास चली गई और धीरे से बोली, ‘‘पापा.’’

रमाकांत ने सिर उठा कर देखा तो वह बोली, ‘‘पापा मैं कुछ कहना चाहती हूं.’’

‘‘अब कहने को क्या रह गया है?’’

व नाराज हो उठने ही वाले थे कि सुधा ने दौड़ कर पापा के पैर पकड़ लिए, ‘‘पापा मुझे माफ कर दीजिए. मुझ से बहुत भारी भूल हो गई पापा.’’

सुधा के रोने की आवाज सुन कर मां और दीपू दोनों पास आ कर खडे़ हो गए. सुधा जोरजोर से रो रही थी और बोल रही थी, ‘‘पापा एक बार मुझे माफ कर दीजिए. अब मैं वही करूंगी जो आप लोग कहेंगे. मुझे पता है मैं ने आप सभी लोगों का दिल दुखाया है. इस भूल के लिए मैं दिल से माफी मांगती हूं. विश्वास कीजिए अब मैं एक अच्छी बेटी…’’

रोतेरोते सुधा बेहोश हो गई. मां और पापा दोनों ने उसे पकड़ कर सोफे पर बैठाया. दीपू दौड़ कर पानी ले आया.

‘‘सुधा पानी पी लो,’’ सुधा को होश आया तो देखा पापा का हाथ सुधा के सिर के नीचे था. उस के आंख खोलने के बाद हटा लिया और उठ कर जाने लगे.

सुधा ने उन का हाथ पकड़ लिया और कातर स्वर में बोली, ‘‘पापा.’’

‘‘जाओ आराम करो… तबीयत खराब हो जाएगी,’’ बोल कर रमाकांत कमरे में चले गए.

सुधा ने मां से पूछा, ‘‘मां पापा बहुत नाराज हैं न.’’

‘‘देखो सुधा नाराजगी कोई केतली में गरम होता पानी तो नहीं न कि ढक्कन हटाए और भाप की तरह गुस्सा खत्म. पापा को तुम जानती हो उन के मन को ठेस लगी है समय लगेगा… पापा को थोड़ा समय देना होगा. जाओ सो जाओ वरना तबीयत खराब हो जाएगी.’’

सुधा बो िझल कदमों से अपने कमरे में चली गई. नींद नहीं आ रही थी पर अब वह  हताशा से थोड़ा उबर रही थी. पापा नाराज हैं पर अभी भी उतना ही प्यार करते हैं. वह कितनी बेवकूफ थी जो सबकुछ भूल कर उस धोखेबाज के साथ चल दी. कहीं गलती से शादी हो जाती तब? अब तो उस के बारे में सोचना भी गुनाह है. बस एक बार पापा माफ कर दें. कुदरत मेरे मांपापा को हमेशा खुश रखना, वह मन से प्रार्थना करने लगी.

सभी सामान्य होने की कोशिश कर रहे थे. सुधा को वापस आए अब कुछ समय हो गया था. एक दिन रात के खाने के समय रमाकांत ने सुधा से पूछा, ‘‘कितने दिनों तक कालेज नहीं जाना है.’’

‘‘अगर आप कहेंगे तभी जाऊंगी,’’ खुश हो कर सुधा ने धीरे से कहा, ‘‘कल आधार दे देना. नया नंबर लेना है,’’ सुधा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.वह कालेज जाने की बात से खुश थी.

सुबह तैयार हो कर पापा के साथ जाने को थी कि भारती आ गईं बोली, ‘‘कितने दिन मैं कालेज नहीं गई… मु झे अपने नोट्स दे देना.’’

सुधा क्या बोले. तब तक मां ने कह दिया, ‘‘यह भी नहीं जा पाई. पहले मेरी तबीयत खराब हो गई, फिर इस की. देखो न चेहरा कैसे सूख गया है.’’

मां देवी है कैसे बात संभाल लेती है. उसे अपनी मां पर गर्व हो रहा था. सुधा की मां के मन से चैन गायब हो गया था. मां को अभी मोबाइल देना नहीं जंच रहा था. थोड़ी निगरानी रखनी पडेगी. विश्वास रखना अच्छी बात है, लेकिन एकदम से खुला छोड़ देने में खतरा है. कहीं वह लड़का रास्ते में आया तब.

सुधा एक अच्छी लडकी थी. साफ मन की थी बस थोड़ी नादान बेवकूफ थी. इस उम्र में लड़कियां सपनों की दुनिया में रहती हैं. उन्हें वरदी वाला लड़का बहुत भाता है, फिर नौर्थ बिहार में तो आईएएस और आईपीएस का बड़ा बोलबाला होता है. हर मां सोचती है कि काश उस का दामाद आईएस या आईपीएस हो. उसी तरह हर लड़की का भी यही सपना रहता है.

सुधा उम्र के जिस दौर से गुजर रही थी उस में सपनों में जीने में मजा आता है. वह हकीकत की दुनिया से परे दुनिया है. कुछ लोग इस उम्र को बडे़ सलीके से लेते हैं. कुछ सपनों की दुनिया बना कर खुद को बरबाद कर डालते हैं. अब लीला देवी को सुधा के विवाह की चिंता सताने लगी. वह स्वयं कम शिक्षित थी. पहले मां की इच्छा थी कि वह सुधा को उच्य से उच्य शिक्षा दिलाए पर अब परिस्थितियां बदल गई थीं. मन में शंकाओं ने डेरा जमा लिया था कि कहीं वह लफंगा सुधा को हानि न पहुंचाने की कोशिश करे. सुधा की मां ने अपना फैसला सुना दिया.

सुधा का जीवन अब सामान्य हो चला था. वह अपने व्यवहार से सभी को संतुष्ट करने के प्रयास में सफल हो रही थी. वह सब से अधिक कालेज जाने से खुश थी. सुधा एक अच्छी छात्रा थी. अच्छे नंबरों से पास होती थी. वह अर्थशात्र में बी.ए. कर रही थी. उस का सपना प्रोफैसर बनने का था. परीक्षा भी नजदीक है. मात्र 2 महीने ही बचे हैं. बस एक बात उसे खटक रही थी कि मांपापा जल्दी उस की शादी कराना चाहते हैं. इतना सम झ में तो आ गया कि यह शीघ्रता किस कारण से हो रही है. मां तो उस के उच्य शिक्षा के पक्ष में थी. उस का मन कचोट उठा कि अभी तो उस का मन मांपापा के साथ रहने को कर रहा था.

वक्त बीतते देर नहीं लगती. सुधा की परीक्षा खत्म हो गई थी. खाली समय काटते नहीं कटता. पहले स्कैचिंग पेंटिंग का शौक था, लेकिन उस छिछोरे के कारण सबकुछ छूट गया था. उस ने स्कैचिंग फिर शुरू की. उस के पापा ने उसे स्कैच करते देखा तो लीला देवी की नाराजगी की परवाह न करते हुए उस का नाम पेंटिंग स्कूल में लिखा दिया.

विवाह के लिए लड़के की खोज जारी थी किसी परिचित ने एक अच्छा रिश्ता बताया. लड़का जमशेदपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर के बैंगलुरु में कार्यरत था. उस की एक बड़ी बहन है जिस की शादी हो चुकी है. वह कोलकाता में रहती है. मातापिता पटना में हैं. रमाकांत ने पत्नी लीला से चर्चा की. लीला देवी को बैंगलुरु का नाम सुन कर थोड़ा दुख लगा कि बेटी दूर चली जाएगी. पर एक बात की खुशी थी कि ससुराल पटना में है तब बेटी से मिलना हो पाएगा. बातचीत शुरू हुई. सारी बात तय हो गई. कुंडली भी अच्छी मिली. बस अब इंतजार लड़के का था. लीला देवी ने लडके की तसवीर सुधा को दिखाना चाही.

सुधा देखने के लिए तैयार नहीं थी, ‘‘मां मुझे नहीं देखनी है तुम लोगों ने देखी मेरे लिए यही काफी है… तुम लोगों से ज्यादा मेरा भला कौन सोच सकता है.’’

1 महीने बाद खबर आई कि लड़का 1 सप्ताह के लिए आने वाला है लड़की को दिखा दिया जाए. बहुत डांटफटकार के बाद सुधा पार्लर गई. शाम को सुधा तैयार हो रही थी. वह बहुत घबराई हुई थी. जब किसी लडकी की शादी की बात चलती है तब उस के दिल में कितनी तमन्नाएं, कितने अरमान, हसरतें अंगड़ाइयां लेने लगती हैं. पर सुधा के साथ ऐसा कुछ नहीं था. रोमांच का तो नामोनिशान नहीं था. अतीत की घटना, आने वाले पल की आशंका सब मिल कर उसे खुश नहीं होने दे रहे थे. मां तैयार हो कर सुधा को देखने आई सुधा को तैयार देख कर बोली, ‘‘काजल नहीं लगाया,. लगा ले आंखें सुना लग रही हैं.’’

शायद बर्फ पिघल जाए- भाग 1

‘‘हमारा जीवन कोई जंग नहीं है मीना कि हर पल हाथ में हथियार ही ले कर चला जाए. सामने वाले के नहले पर दहला मारना ही क्या हमारे जीवन का उद्देश्य रह गया है?’’ मैं ने समझाने के उद्देश्य से कहा, ‘‘अब अपनी उम्र को भी देख लिया करो.’’

‘‘क्या हो गया है मेरी उम्र को?’’ मीना बोली, ‘‘छोटाबड़ा जैसे चाहे मुझ से बात करे, क्या उन्हें तमीज न सिखाऊं?’’

‘‘तुम छोटेबड़े, सब के हर काम में अपनी टांग क्यों फंसाती हो, छोटे के साथ बराबर का बोलना क्या तुम्हें अच्छा लगता है?’’

‘‘तुम मेरे सगे हो या विजय के? मैं जानती हूं तुम अपने ही खून का साथ दोगे. मैं ने अपनी पूरी उम्र तुम्हारे साथ गुजार दी मगर आज भी तुम मेरे नहीं अपने परिवार के ही सगे हो.’’

मैं ने अपना सिर पीट लिया. क्या करूं मैं इस औरत का. दम घुटने लगता है मेरा अपनी ही पत्नी मीना के साथ. तुम ने खाना मुझ से क्यों न मांगा, पल्लवी से क्यों मांग लिया. सिरदर्द की दवा पल्लवी तुम्हें क्यों खिला रही थी? बाजार से लौट कर तुम ने फल, सब्जी पल्लवी को क्यों पकड़ा दी, मुझे क्यों नहीं बुला लिया. मीना अपनी ही बहू पल्लवी से अपना मुकाबला करे तो बुरा लगना स्वाभाविक है.

उम्र के साथ मीना परिपक्व नहीं हुई उस का अफसोस मुझे होता है और अपने स्नेह का विस्तार नहीं किया इस पर भी पीड़ा होती है क्योंकि जब मीना ब्याह कर मेरे जीवन में आई थी तब मेरी मां, मेरी बहन के साथ मुझे बांटना उसे सख्त नागवार गुजरता था. और अब अपनी ही बहू इसे अच्छी नहीं लगती. कैसी मानसिकता है मीना की?

मुझे मेरी मां ने आजाद छोड़ दिया था ताकि मैं खुल कर सांस ले सकूं. मेरी बहन ने भी शादी के बाद ज्यादा रिश्ता नहीं रखा. बस, राखी का धागा ही साल भर बाद याद दिला जाता था कि मैं भी किसी का भाई हूं वरना मीना के साथ शादी के बाद मैं एक ऐसा अनाथ पति बन कर रह गया जिस का हर कोई था फिर भी पत्नी के सिवा कोई नहीं था. मैं ने मीना के साथ निभा लिया क्योंकि मैं पलायन में नहीं, निभाने में विश्वास रखता हूं, लेकिन अब उम्र के इस पड़ाव पर जब मैं सब का प्यार चाहता हूं, सब के साथ मिल कर रहना चाहता हूं तो सहसा महसूस होता है कि मैं तो सब से कटता जा रहा हूं, यहां तक कि अपने बेटेबहू से भी.

मीना के अधिकार का पंजा शादी- शुदा बेटे के कपड़ों से ले कर उस के खाने की प्लेट तक है. अपना हाथ उस ने खींचा ही नहीं है और मुझे लगता है बेटा भी अपना दम घुटता सा महसूस करने लगा है.

‘‘कोई जरूरत नहीं है बहू से ज्यादा घुलनेमिलने की. पराया खून पराया ही रहता है,’’ मीना ने सदा की तरह एकतरफा फैसला सुनाया तो बरसों से दबा लावा मेरी जबान से फूट निकला.

‘‘मेरी मां, बहन और मेरा भाई विजय तो अपना खून थे पर तुम ने तो मुझे उन से भी अलग कर दिया. मेरा अपना आखिर है कौन, समझा सकती हो मुझे? बस, वही मेरा अपना है जिसे तुम अपना कहो…तुम्हारे अपने भी बदलते रहते हैं… कब तक मैं रिश्तों को तुम्हारी ही आंखों से देखता रहूंगा.’’

कहतेकहते रो पड़ा मैं, क्या हो गया है मेरा जीवन. मेरी सगी बहन, मेरा सगा भाई मेरे पास से निकल जाते हैं और मैं उन्हें बुलाता ही नहीं…नजरें मिलती हैं तो उन में परायापन छलकता है जिसे देख कर मुझे तकलीफ होती है. हम 3 भाई, बहन जवान हो कर भी जरा सी बात न छिपाते थे और आज वर्षों बीत गए हैैं उन से बात किए हुए.

आज जब जीवन की शाम है, मेरी बहू पल्लवी जिस पर मैं अपना ममत्व अपना दुलार लुटाना चाहता हूं, वह भी मीना को नहीं सुहाता. कभीकभी सोचता हूं क्या नपुंसक हूं मैं? मेरी शराफत और मेरी निभा लेने की क्षमता ही क्या मेरी कमजोरी है? तरस आता है मुझे कभीकभी खुद पर.

क्या वास्तव में जीवन इसी जीतहार का नाम है? मीना मुझे जीत कर अलग ले गई होगी, उस का अहं संतुष्ट हो गया होगा लेकिन मेरी तो सदा हार ही रही न. पहले मां को हारा, फिर बहन को हारा. और उस के बाद भाई को भी हार गया.

‘‘विजय चाचा की बेटी का  रिश्ता पक्का हो गया है, पापा. लड़का फौज में कैप्टन है,’’ मेरे बेटे दीपक ने खाने की मेज पर बताया.

‘‘अच्छा, तुझे बड़ी खबर है चाचा की बेटी की. वह तो कभी यहां झांकने भी नहीं आया कि हम मर गए या जिंदा हैं.’’

‘‘हम मर गए होते तो वह जरूर आता, मीना, अभी हम मरे कहां हैं?’’

मेरा यह उत्तर सुन हक्काबक्का रह गया दीपक. पल्लवी भी रोटी परोसती परोसती रुक गई.

‘‘और फिर ऐसा कोई भी धागा हम ने भी कहां जोड़े रखा है जिस की दुहाई तुम सदा देती रहती हो. लोग तो पराई बेटी का भी कन्यादान अपनी बेटी की तरह ही करते हैं, विजय तो फिर भी अपना खून है. उस लड़की ने ऐसा क्या किया है जो तुम उस के साथ दुश्मनी निभा रही हो.

खाना पटक दिया मीना ने. अपनेपराए खून की दुहाई देने लगी.

‘‘बस, मीना, मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि कल क्या हुआ था. जो भी हुआ उस का इस से बुरा परिणाम और क्या होगा कि इतने सालों से हम दोनों भाइयों ने एकदूसरे की शक्ल तक नहीं देखी… आज अगर पता चला है कि उस की बच्ची की शादी है तो उस पर भी तुम ताना कसने लगीं.’’

‘‘उस की शादी का तो मुझे 15 दिन से पता है. क्या वह आप को बताने आया?’’

‘‘अच्छा, 15 दिन से पता है तो क्या तुम बधाई देने गईं? सदा दूसरों से ही उम्मीद करती हो, कभी यह भी सोचा है कि अपना भी कोई फर्ज होता है. कोई भी रिश्ता एकतरफा नहीं चलता. सामने वाले को भी तो पता चले कि आप को उस की परवा है.’’

‘‘क्या वह दीपक की शादी में आया था?’’ अभी मीना इतना ही कह पाई थी कि मैं खाना छोड़ कर उठ खड़ा हुआ.

मीना का व्यवहार असहनीय होता जा रहा है. यह सोच कर मैं सिहर उठता कि एक दिन पल्लवी भी दीपक को ले कर अलग रहने चली जाएगी. मेरी उम्र भर की साध मेरा बेटा भी जब साथ नहीं रहेगा तो हमारा क्या होगा? शायद इतनी दूर तक मीना सोच नहीं सकती है.

दुविधा – भाग 3 : किस कशमकश में थी वह?

‘‘आप की बहन और जीजाजी इतनी लड़कियां दिखा चुके हैं, आप को एक भी पसंद नहीं आई? आखिर आप को लड़की में ऐसा क्या चाहिए?’’

मेरे स्वर में थोड़ी तलखी थी, शायद भीतर का कोई डर था. हालांकि यह बेवजह था लेकिन धुआं उठता देख कर मैं डर गई थी, कहीं भीतर कोई चिनगारी न दबी हो जो मेरी घरगृहस्थी को जला कर राख कर दे.

‘‘घर जा कर आईना देखिएगा, स्वयं समझ जाएंगी,’’ सुबोध धीरे से फुसफुसाया था.

इतना सुनते ही मैं वहां उस की नजरों के सामने खड़ी न रह सकी. मैं लौट तो आई लेकिन मेरा दिल इतनी जोर से धड़क रहा था मानो सीने से उछल कर बाहर आ जाएगा.

मैं सुबोध के बारे में सोचने पर मजबूर हो गई. ऊपर से शांत दिखने वाले इस समुद्र की तलहटी में कितना बड़ा ज्वालामुखी छिपा था. अगर कहीं यह फूट पड़ा तो कितनी जिंदगियां तबाह हो जाएंगी.

भले ही मेरी और प्रखर की पहचान 10 वर्ष पुरानी है. मैं ने आज तक कभी उसे शिकायत का कोई मौका नहीं दिया है, फिर भी अगर कभी कहीं से कुछ यों ही सुबोध के बारे में सुनेगा तो क्या होगा? अनजाने में ही अगर सुबोध ने अपनी दीदीजीजाजी से मेरे बारे में या अपनी पसंद के बारे में कुछ कह दिया तो क्या रवि वह सब प्रखर को बताए बिना रहेगा? तब क्या होगा? पतिपत्नी का रिश्ता कितना भी मजबूत, कितना भी पुराना क्यों न हो, शक की आशंका से ही उस में दरार पड़ जाती है. फिर भले ही लाख यत्न कर लो उसे पहले रूप में लाया ही नहीं जा सकता.

हालांकि मुझे लगता था कि सुबोध ऐसा कुछ नहीं करेगा फिर भी मेरा दिल बैठा जा रहा था. मैं सुबोध से कुछ कह भी तो नहीं सकती थी. क्या कहती, किस अधिकार से कहती? हमारे बीच ऐसा था भी क्या जिस के लिए सुबोध को रोकती. मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. मैं इतनी परेशान हो गई कि हर समय डरीसहमी, घबराई सी रहने लगी.

एक दिन अचानक प्रखर की तबीयत बहुत बिगड़ गई. कई दिनों से उस का बुखार ही नहीं उतर रहा था. उसे अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा लेकिन बीमारी पकड़ में ही नहीं आ रही थी. हालत बिगड़ती देख कर उसे शहर के बड़े अस्पताल में भेज दिया. वहां पहुंचते ही प्रखर को आईसीयू में भरती कर लिया गया. कई टैस्ट हुए, कई बड़े डाक्टर देखने आए. उस की बीमारी को सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन निकल गई. प्रखर की दोनों किडनियां बेकार हो गई थीं.

घरपरिवार तथा मित्रों की मदद से उस के लिए 1 किडनी की व्यवस्था करनी थी, वह भी एबी पोजिटिव ब्लड ग्रुप वाले की. किस का होगा यह ब्लड ग्रुप? कौन भला आदमी अपनी किडनी दान करेगा और क्यों? रेडियो, टीवी, अखबार तथा स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से हम हर कोशिश में जुट गए.

2 दिनों बाद डाक्टर ने आ कर खुशखबरी दी कि किडनी डोनर मिल गया है. उस के सब जरूरी टैस्ट भी हो गए हैं. आशा है प्रखर जल्दी ठीक हो जाएगा.

मैं पागलों की भांति उस फरिश्ते से मिलने दौड़ पड़ी. डाक्टर के बताए कमरे में जाते ही मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं. मेरे सामने पलंग पर सुबोध लेटा था. मेरे कदम वहीं रुक गए. मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थी. प्रखर के जीवन का प्रश्न था जो पलपल मौत की तरफ बढ़ रहा था. मुझे इस तरह सन्न देख कर वह बोला, ‘‘वह तो रवि जीजाजी से पता लगा कि उन के दोस्त, प्रखर बहुत सीरियस हैं. सौभाग्य से मेरा ब्लडग्रुप भी एबी पौजिटिव है इसलिए…’’

‘‘आप को पता था न, प्रखर मेरे पति हैं?’’ पता नहीं मैं ने यह सवाल क्यों किया था.

‘‘मेरे लिए आप की खुशी माने रखती है, बीमार कौन है यह नहीं.’’

शब्द जैसे उस के दिल की गहराइयों से निकल रहे थे. एक बार फिर उस ने मुझे निरुत्तर कर दिया था. मैं भारी कदमों, भारी दिल से लौट आई थी. प्रखर उस समय ऐसी स्थिति में ही नहीं था कि पूछता कि उसे जीवनदान देने वाला कौन है, कहां से आया है, क्यों आया है?

औपरेशन हो गया. औपरेशन सफल रहा. दोनों की अस्पताल से छुट्टी हो गई. प्रखर स्वस्थ हो रहा है. उसे पता लग चुका है कि उसे किडनी दान करने वाला कोई और नहीं रवि का साला सुबोध ही है, जो मेरे ही औफिस में काम करता है. वह दिनरात तरहतरह के सवाल पूछता रहता है फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जो वह पूछना तो चाहता है लेकिन पूछ नहीं पाता.

सवाल तो अब मेरे अंदर भी सिर उठाते रहते हैं जिन के जवाब मेरे पास नहीं हैं या मैं उन्हें तलाशना ही नहीं चाहती. डरती हूं, यदि कहीं मुझे मेरे सवालों के जवाब मिल गए तो मैं बिखर ही न जाऊं.

आजकल प्रखर बहुत बदल गया है. डाक्टरों के इतना समझाने के बावजूद वह फिर से पीने लग गया है. कभी सोचती हूं एक दिन उस से खुल कर बात करूं. फिर सोचती हूं क्या बात करूं? किस बारे में बात करूं? हमारे जीवन में किस का महत्त्व है? उन 2-4 वाक्यों का जो इतने वर्षों में सुबोध ने मुझ से बोले हैं या उस के त्याग का जिस ने प्रखर को नया जीवन दिया है?

मैं अजीब सी कशमकश में घिरती जा रही हूं. प्रखर के पास होती हूं तो यह एहसास पीछा नहीं छोड़ता कि प्रखर के बदन में सुबोध की किडनी है जिस के कारण प्रखर आज जीवित है. हमारे न चाहते हुए भी सुबोध हम दोनों के बीच में आ गया है.

जबजब सुबोध को देखती हूं तो एक अनजाना सा डर पीछा नहीं छोड़ता कि उस के पास अब एक ही किडनी है. हर सुबह औफिस पहुंचते ही जब तक उसे देख नहीं लेती, मुझे चैन नहीं आता. उस के स्वास्थ्य के प्रति भी चिंतित रहने लगी हूं.

मेरा पूरा वजूद 2 भागों में बंट गया है. ‘जल बिन मछली’ सी छटपटाती रहती हूं. आजकल मुझे किसी करवट चैन नहीं. मैं जानती हूं प्रखर को मेरी खुशी प्रिय है इसीलिए मुझ से न कुछ कहता है, न कुछ पूछता है. बस, अंदर ही अंदर घुट रहा है. दूसरी तरफ बिना किसी मांग, बिना किसी शर्त के सुबोध को मेरी खुशी प्रिय है लेकिन क्या मैं खुश हूं?

सुबोध को देखती हूं तो सोचती हूं काश, वह मुझे कुछ वर्ष पहले मिला होता तो दूसरे ही पल प्रखर को देखती हूं तो सोचती हूं काश, सुबोध मिला ही न होता. यह कैसी दुविधा है? मैं यह कैसे दोराहे पर आ खड़ी हुई हूं जिस का कोई भी रास्ता मंजिल तक जाता नजर नहीं आता.

न्यूडिटी क्लॉज़ से लेकर मेलोड्रामा आखिर क्या कहते हैं टीवी क्वीन एकता कपूर के शोज

टीवी क्वीन कही जाने वाली एकता कपूर को हमेशा सुर्ख़ियों में रहने की आदत है. इसके लिए वह कुछ भी करने से पीछे नहीं हटती, फिर चाहे वह फिल्म हो या वेब सीरीज या टीवी धारावाहिक, हर कहानी को कहने में उन्हें एक अलग नजरिया रखती है. इतना ही नहीं उनके सभी शोज में पूजा-पाठ, धर्म-कर्म, सांप-बिच्छू आदि न जाने क्या-क्या बनाकर परोसती है.उन्हें कई बार इसकी वजह पूछने पर वह कहती है कि उनका काम सबको शो के जरिये मनोरंजन कराना है, दर्शकों के पसंद के अनुसार ही वह कंटेंट बनाती है, अगर इसमें किसी को कोई आपत्तिजनक बात दिखती है, तो वे टीवी या शो देखना बंद कर दें, लेकिन देखते भी वही है, जो आपत्ति करते है.

ट्रिपल एक्स 2 बनी गले की फांस 

पिछले दिनों ओटीटी पर XXXसीजन 2 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एकता कपूर को फटकार लगाई और कहा कि उन्हें किसी भी प्रकार की आपत्तिजनक दृश्य दर्शकों को दिखाना उचित नहीं है. एक नामचीन निर्माता होने के नाते उन्हें इसका ख्याल रखना जरुरी है. इससे पहले भी बिहार के बेगूसराय के जिला कोर्ट में एक पूर्व सैनिक शम्भू कुमार ने एकता कपूर और उनकी मां के खिलाफ वारंट जारी कर दिया था. दोनों के खिलाफ आरोप है कि उन्होंने वेब सीरीज ट्रिपल एक्स में सैनिकों की पत्नियों की आपत्तिजनक तस्वीर पेश की है. इस मामले में मां और बेटी दोनों के खिलाफ बेगूसराय में केस दर्ज किया गया था.

साईन न्यूडिटी क्लॉज़ पर

ये पहली बार नहीं है, जब एकता कपूर को ऐसी कंट्रोवर्सी का सामना करना पड़ा हो, इससे पहले भी उन्होंने कई बार ऐसी बातों का सामना किया है. वह अपने कॉन्ट्रैक्ट में हमेशा ‘न्यूडिटी क्लॉज़’ शामिल कर आर्टिस्ट से साइन करवाती है. ऐसा उन्होंने साल 2015 में ट्रिपल एक्स के लिए एक्ट्रेस क्यारा दत्त से करवाई थी. सभी कलाकार को उनके साथ काम करने से पहले ऐसे कॉन्ट्रैक्ट को साईन करना पड़ता है, ताकि वे शूटिंग के समय कुछ आपत्तिजनक शूट करने से मना न कर पाए. मॉडल और अभिनेत्री क्यारा ही ऐसी कॉन्ट्रैक्ट को साईन करने वाली पहली महिला थी.

तथ्यों से करती है छेड़छाड़

जोधा अकबर शो के दौरान भी कहानी में तथ्यों को छेड़छाड़ कर अलग तरीके से पेश करने के आरोप एकता पर लगे है. उन्होंने इस शो में जोधा अपने पिता के साम्राज्य को बचाने के लिए अकबर से शादी अपनी मर्जी से की थी. कई बड़े आर्टिस्ट भी कह चुके है कि उन्हेंसफलता हासिल करने के लिए एकता की बैनर की जरुरत नहीं है. कईयों ने तो एकता कपूर द्वारा बनाई गई शो में काम करना तो दूर, देखना भी पसंद नहीं करते. धारावाहिक ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ में अभिनेत्री स्मृति ईरानी से एकता की कहासुनी होने के बाद वह शो को छोड़ गयी, जिसे गौतमी ने रिप्लेस किया, जिससे शो की टीआरपी घटी और शो को बंद करना पड़ा था.

GHKKPM: पाखी के सामने सई को जेल भेजेगा विराट, प्रोमो वायरल

सीरियल गुम हैं किसी के प्यार में (Ghum Hai Kisi key Pyaar Meiin) की कहानी को दिलचस्प बनाने के लिए मेकर्स कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. जहां हाल ही में विराट के सामने सवि के पिता होने का सच सामने आने का प्रोमो वायरल हुआ था तो वहीं अब शो का नया प्रोमो सामने आ गया है, जिसमें वह सई को पाखी के सामने जेल भजता हुआ दिख रहा है. आइए आपको दिखाते हैं शो का नया प्रोमो…

प्रोमो में सई हुई गिरफ्तार

नए प्रोमो की बात करें तो मेकर्स ने सई के फैंस को नाराज कर दिया है. दरअसल, प्रोमो में विराट अपनी टीम को सई को गिरफ्तार करवाते दिख रहा है. वहीं सई को कह रहा है कि उसे जेल भिजवाने का कारण उसका जबरदस्ती उसके चौह्वाण निवास में घुसने और औन ड्यूटी पुलिस ऑफिसर पर थप्पड़ मारने के लिए गिरफ्तार किया जा रहा है. इसी के साथ वह आगे कह रहा है कि उसने एक लड़की का अपहरण करके उसे उसके पिता से दूर रखा. अपनी बात कहने के बाद विराट पुलिस को सई को ले जाने के लिए कहता है, जिसे देखकर भवानी और सोनाली जहां खुश होती दिख रही हैं तो वहीं पाखी को सई के लिए बुरा लगता हुआ नजर आ रहा है.

विनायक को सपोर्ट करती है सई

 

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सीरियल की बात करें तो अब तक आपने देखा कि विनायक को स्कूल की रेस प्रतियोगिता में जीत दिलाने के लिए सवि और सई उसे सपोर्ट करने पहुंचते हैं. वहीं विराट इस बात से काफी नाराज होता है. लेकिन पाखी उसे चुप रहने के लिए कहती है. दूसरी तरफ, सवि और सई का साथ मिलने से विनायक अपनी रेस पूरी करता है, जिसके लिए उसे सम्मानित किया जाता है.

बता दें, सीरियल गुम हैं किसी के प्यार में के मेकर्स आए दिन ट्रोल होते रहते हैं. जहां हाल ही में नील भट्ट अपनी एक्टिंग के चलते ट्रोलिंग के निशाने पर आए थे तो वहीं शो के मेकर्स सई को परेशान करने के चलते और नए ट्रेक के चलते फैंस काफी गुस्से में थे. हालांकि लेटेस्ट ट्रैक को देखकर फैंस काफी एक्साइटेड दिख रहे हैं.

संपेरन- भाग 2: क्या था विधवा शासिका यशोवती का वार

आज्ञा का तुरंत पालन हुआ. बंद खिड़कियों वाली अंधेरी पालकी में पड़ा हुआ कपिल अपनी भयंकर भूल पर पश्चात्ताप करने लगा. सारे संसार को कूटनीति का पाठ पढ़ाने वाला स्वयं अपनी मूर्खता को कोसने लगा. उसे शासन की ओर से किसी ऐसे कदम की आशा प्रारंभ में तो थी, पर जनआक्रोश की तीव्र लहर के कारण उस ने अपनेआप को अपराजेय मान लिया था.

केवल नारी होने के कारण उसे यशोवती की ओर से असावधान नहीं होना चाहिए था. जब उस के मित्रों ने ही उस का साथ छोड़ दिया तो जनता तो निश्चित रूप से मैदान छोड़ भागेगी.

अपने अनुयायियों पर उसे भयंकर क्षोभ उत्पन्न हुआ. वे लोग वास्तव में यशोवती के विरोधी न थे, प्रत्युत अंधानु- भक्ति के कारण वे कपिल का साथ दे रहे थे. सचमुच उस ने यशोवती का विरोध कर मृत्यु को आमंत्रित कर लिया था.

अब उसे अपने प्राणों के बचने की कोई आशा नहीं रही थी. अब उसे स्पष्ट हो गया था कि साधारण हाड़मांस की पुतली, भोली और कमजोर प्रतीत होने वाली नारी भी आवश्यकता पड़ने पर साक्षात काल बन सकती है. स्पष्टतया बाजी उस के हाथों से निकल कर यशोवती के हाथों में पहुंच चुकी थी.

सहसा अपने विश्वस्त साथी द्वारा यशोवती के संबंध में एकत्र की गई सूचना उस के मस्तिष्क में कौंध उठी. उस दिन का वार्त्तालाप उस की स्मृति में ताजा हो उठा.

‘यह समस्या अचानक कश्यपपुर में क्योंकर उत्पन्न हो गई. यशोवती के पति सम्राट दामोदर ने बैठेबिठाए मथुरा के यादवों से वैर क्यों मोल ले लिया?’ उस के इस प्रश्न पर उस के साथी ने एक लंबी सांस ले कर प्रत्युत्तर दिया था.

‘पुरोहितजी, मेरी सूचनाओं के अनुसार हमारे कश्यपपुर के सम्राट गोनंद प्रथम के काल में ही इस समस्या के कंटीले बीज इस धरती में डाल दिए गए थे. राजगृह के राजा जरासंध की सहायता के लिए गोनंद प्रथम कश्मीर से बड़ी सेना सहित बिहार में जा पहुंचे थे. जैसी आशा थी, मथुरा के यादवों ने जरासंध पर आक्रमण कर दिया. यादव बलराम के हाथों गोनंद प्रथम का प्राणांत हुआ.

‘समस्या यहीं नहीं समाप्त हो सकती थी,’ उस  ने बात आगे चलाई, ‘हारनाजीतना तो युद्ध में होता ही रहता है. गौरवपूर्ण बात यह थी कि कश्यपपुर का राजा भारत के एक संकटग्रस्त शासक की सहायता करते हुए शहीद हो गया. कटोचवंशीय गोनंद प्रथम का यह अमर बलिदान हमें हमेशा प्रेरणा प्रदान करता रहेगा. यह गौरवगाथा भारत से हमारे घनिष्ठ व अटूट संबंधों की भी साक्षी है.’

‘रानी यशोवती फिर कश्यपपुर की शासिका बनने कैसे आ पहुंची?’ कपिल ने प्रश्न किया.

‘श्रीमन, गोनंद प्रथम का पुत्र राजा दामोदर जिस पल से कश्यपपुर के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ, अपने पिता की असमय मृत्यु उस के हृदय को दग्ध करती रही. उन के प्राणहंता से प्रतिशोध लेना उस के जीवन का मूलमंत्र बन गया. आठों पहर उस के मनोमस्तिष्क पर केवल एक नाम ‘बलराम’ अंकित रहने लगा. प्रतिशोध लिए बिना उसे अपने पिता की पीड़ायुक्त अंतिम आकृति कल्पना में और भी अधिक करुणाजनक प्रतीत होती थी. वह स्पप्न में भी अपने पितृहंता का मुख देखतेदेखते असंतुलित हो उठता.

‘सहसा राजा दामोदर की मनोवांछित इच्छा लगभग पूर्ण हुई. गांधार शासक की पुत्री का स्वयंवर उन्हीं दिनों आयोजित हुआ और देशविदेश के राजाओं सहित मथुरा के बलराम यादव को भी आमंत्रित किया गया. कश्यपपुर के राजा दामोदर ने स्वयंवर के बहाने अपने शत्रु बलराम पर तुरंत चढ़ाई कर दी. उस का यह कार्य कूटनीति के साथसाथ शालीनता के भी विरुद्ध था.

‘पर दामोदर का मस्तिष्क इस समय  पूर्णतया असंतुलित था. बलराम ने दामोदर को परास्त ही नहीं किया, अपितु उस के प्राण भी ले लिए. अब सुना है कि दामोदर के पुत्र गोनंद द्वितीय के वयस्क होने तक उस की मां यशोवती को कश्यपपुर की शासिका घोषित किया गया है.’

‘ओह, तो यों कहो कि यह सब स्थिति बलराम यादव के कारण पैदा हुई है,’ कपिल बोला.

‘और क्या, बलराम यादव ने दामोदर के प्राण ले कर कश्यपपुर के माथे पर यशोवती रूपी घिनौना, काला तिलक अंकित कर दिया है.’

‘तुम चिंता मत करो,’ उस ने कहा था, ‘मैं अपने प्राण रहते तक विधवा यशोवती को कश्यपपुर की गद्दी पर नहीं बैठने दूंगा. किसी विधवा स्त्री को गद्दी पर बैठाने की अपेक्षा कश्यपपुर की गद्दी का खाली रहना ही उचित है.’

वह इन्हीं विचारों में लीन था कि अचानक पालकी रुक गई और 2 व्यक्तियों ने उसे पालकी से बाहर निकलने का आदेश दिया. उस ने आंखें टिमटिमा कर देखा, बाहर भयावह अंधेरा था. हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. यशोवती को ढेर सारी गालियां देते हुए वह कल्पना के सहारे राजधानी पुरानाधिष्ठान के राजमहल के सम्मुख पालकी से उतर कर आगे बढ़ा.

मुख्यद्वार व कई सीढि़यों को पार करने के पश्चात सहसा ही उसे एक रत्नमंडित दीवारों व स्तंभों वाले कक्ष में तीव्र चौंधियाते प्रकाश में खड़ा कर दिया गया. तीव्र प्रकाश के कारण स्तंभों व दीवारों के रत्नों से इंद्रधनुषी आभा फूट रही थी. उसे लगा जैसे वह कई इंद्रधनुषों के बीच खड़ा हो.

‘‘पुरोहित कपिल का विधवा यशोवती के कक्ष में स्वागत है.’’

कपिल कुछ पल स्तब्ध खड़ा रह गया. उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. प्रकाश की सहस्रों किरणों के बीच जो युवती उस के सम्मुख बैठी हुई थी, वह उसे परिचिता प्रतीत हो रही थी. अपने मस्तिष्क पर जोर डालने पर भी वह युवती का परिचय ज्ञात नहीं कर सका.

उस के चेहरे पर बड़ेबड़े 2 नेत्र सागर के समान गहरे और सम्मोहनयुक्त लगे. इन नयनों की गंभीरता उस के हृदय में सीधी पैठ रही थी. विधवा यशोवती इतनी आकर्षक, सुकुमार और कोमलांगी होगी इस की तो उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. धीरेधीरे उस के प्रति उस का सारा रोष, आक्रोश और विरोध न जाने क्यों हवा होता प्रतीत हुआ.

‘‘आइए,  पुरोहितजी, इस आसन पर विराजिए.’’

‘‘नहीं…नहीं, महिषी, मैं आप के समकक्ष कैसे बैठ सकता हूं.’’

स्वयं कपिल को अपने शब्दों पर आश्चर्य हो रहा था कि वह क्या बोल रहा है. सचमुच यशोवती ने उसे सम्मोहित कर लिया था. कुतर्क, हठधर्मिता व धार्मिक श्रेष्ठता का गर्व धीरेधीरे उस का साथ छोड़ते प्रतीत हो रहे थे.

‘‘देखिए पुरोहितजी, प्रकृति ने हमें रूप, समृद्धि व सम्मान सभी कुछ प्रदान किया, पर आप के ढोंगी समाज ने, जानते हैं, मुझे क्या भेंट दी? यह देखिए…’’ उस ने अपनी सूनी कलाइयां तथा पैर की नंगी उंगलियां प्रदर्शित कर दीं, ‘‘और देखिए…’’ उस ने अपने सूने ललाट व लंबे, धरती को छूते बालों को हटा कर, सीधीसपाट सूनीसूनी मांग की ओर इंगित किया.

‘‘यह इस बात का दंड है कि मैं अपने पति को जीवित नहीं रख सकी. दूसरे शब्दों में, मैं अपने पति को खा गई. सर्वविदित है कि गांधार में उन का प्राणांत हुआ. मैं आप से पूछना चाहती हूं कि क्या यह मेरी इच्छा थी कि मैं विधवा हो जाऊं? पुरुष अपनी पत्नी के देहांत के पश्चात कुछ भी नहीं खोता, तो फिर नारी ही विधवा बनने के लिए बाध्य क्यों है?’’ यशोवती की मुखमुद्रा क्रोध व आक्रोश से भरी हुई थी.

कपिल क्या प्रत्युत्तर देता? आज तक कुतर्कों से वह अपने विरोधियों को जीतता रहा था, पर यशोवती को कुतर्कों से बहलाना सरल नहीं था. अपने सामाजिक नियमों का खोखलापन उसे स्पष्ट महसूस हुआ.

आग और धुआं- भाग 1: क्या दूर हो पाई प्रिया की गलतफहमी

करीब 2 साल तक अमित और मेरा रोमांस चला और फिर हम ने शादी कर ली. सुखद वैवाहिक जीवन के लिए दोनों तरफ के परिवारजनों ने अपने आशीर्वाद हमें खुश हो कर दिए.

जिंदगी में रोमांस करने का अपना मजा है. बहुत खूबसूरत थे वे दिन जब हम घंटों घूम कर ढेर सारी बातें करते. भविष्य के रंगीन सपने तब हमारे मन को रातदिन गुदगुदाते थे.

‘‘मैं तुम्हें बहुत खुश और सुखी रखूंगा, प्रिया. कितनी प्यारी, कितनी सुंदर और समझदार हो तुम,’’ अमित की ऐसी बातें सुन कर मैं हवा में उड़ने लगती.

‘‘जिंदगी के सफर में तुम हर कदम पर मेरे साथ बने रहोगे, तो मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए,’’ दिल की गहराइयों से ऐसे शब्द मेरे होंठों तक आते.

शादी के बाद मैं ने रंगीन सपनों को सचाई बनते देखा. अमित की मजबूत बांहों के घेरे में मैं ने आनंद और मस्ती की असीम ऊंचाइयों को छुआ. मेरे रात और दिन महक उठे. मैं उन के साथ चलती तो प्रतीत होता मानो नाच रही हूं. उन्हें छू कर, निहार कर भी दिल नहीं भरता.

‘‘शादी से पहले मुझे कभी अंदाजा तक नहीं हुआ कि तुम जादूगर भी हो,

अमित. मुझे पूरी तरह से वश में कर के दिल जीत लिया है तुम ने,’’ मैं ने अपने दिल की यह बात मनाली में बिताए 10 दिनों के हनीमून के दौरान शायद 100 से ज्यादा बार अमित से कही होगी.

शादी के करीब 2 महीने बाद ससुराल छोड़ कर दिल्ली से हम नोएडा के छोटे से किराए के फ्लैट में रहने चले आए. ट्रैफिक जाम के कारण अमित को घर से आफिस तक आनेजाने में बहुत ज्यादा वक्त लगता था. उन्हें थकावट और चिड़चिड़ेपन से बचाने के लिए सब बड़ों की सलाह पर हम ने यह कदम उठाया था.

नोएडा में बिताए पहले 2 महीनों में मेरी वैवाहिक जिंदगी के सारे सुख और खुशियां धीरेधीरे तबाह होती चली गईं. मेरी जिंदगी में तबाही मचाने वाला यह तूफान निशा के रूप में आया.

निशा अमित के साथ काम करती थी. हमारे फ्लैट में अकसर अमित के सहयोगी दोस्त छुट्टी वाले दिन इकट्ठे हो कर मौजमस्ती करते थे. निशा ऐसे मौकों पर हमेशा उपस्थित रहती. निशा के मातापिता सहारनपुर में रहते थे. नौकरी के लिए उसे नोएडा आना पड़ा तो आरंभ में वह अपने एक रिश्तेदार के घर में रही.

कुछ दिनों में आपसी अनबन के कारण उसे वह जगह छोड़नी पड़ी. अब वह अपनी एक सहेली के साथ आफिस के पास ही हमारे जैसा फ्लैट किराए पर ले कर रह रही थी. घर  पासपास होने की वजह से वह अकसर मार्केट जाते समय फ्लैट के सामने से गुजरती तो बस हाय, हैलो ही हो पाती.

मुझे उस का व्यक्तित्व से बड़ा दिलचस्प लगता. उस का कद लंबा और फिगर बड़ी जानदार थी. मैं ने उसे हमेशा टाइट जींस और टीशर्ट पहने देखा. साधारण नैननक्श होने के बावजूद वह खूब खुल कर सब से हंसनेबोलने वाले दोस्ताना स्वभाव के कारण काफी आकर्षक नजर आती.

विवाह के तोहफे के रूप में उस ने हमें सैल से चलने वाला एक सुंदर शोपीस दिया. उस में एक प्रेमीप्रेमिका बालरूम डांस की मुद्रा में सट कर खड़े थे. ‘औन’ करने पर वे गोलगोल घूमने लगते और हलके कर्णप्रिय संगीत की लहरें हर तरफ बिखर जातीं.

‘‘प्रिया, तुम कितनी सुंदर हो. काश, मैं भी तुम जैसी होती तो कोई अमित मुझे भी अपने दिल की रानी बना लेता,’’ मेरी यों प्रशंसा कर के निशा ने पहली मुलाकात में ही मेरा दिल जीत लिया.

उस के पास वक्त की कमी नहीं थी. कार्य दिवसों मेें भी वह शाम को घूमते हुए हमारे घर पर दूसरेतीसरे दिन चली आती. कुछ दिनों में हम अच्छी सहेलियां बन गईं. किसी भी विषय पर अगर अमित और मेरे नजरिए में अंतर होता तो वह हमेशा मेरा पक्ष लेती. हम दोनों मिल कर अमित की खूब टांग खींचते.

हमारे बीच दोस्ती की जडें मजबूत हो जातीं, उस से पहले ही मुझे उस के असली रूप व मकसद की जानकारी मिल गई.

अमित के एक सहयोगी ने अपने प्रमोशन की पार्टी बैंक्वेट हाल में दी. इसी पार्टी के दौरान कविता और शिखा ने मुझे निशा के प्रति खबरदार किया. ये दोनों अमित के आफिस में ही काम करती थीं और हम पहले भी कई बार मिल चुके थे.

‘‘मैं ने सुना है कि निशा तुम्हारे घर खूब आतीजाती है,’’ कविता ने जब यह चर्चा की तब हमारे आसपास ऐसा कोई न था जो हमारी बातें सुन सके.

‘‘उस के साथ हमारा समय अच्छा गुजर जाता है,’’ मैं ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘प्रिया, जो तुम्हारे वैवाहिक जीवन की खुशियों को उजाड़ने पर तुली है, उस लड़की को तुम्हें अपने घर में कदम नहीं रखने देना चाहिए,’’ शिखा की आंखों में चिंता व गुस्से के मिलेजुले भावों को पढ़ कर मैं बेचैन हो उठी.

‘‘ऐसा क्यों कह रही हैं आप?’’ मैं ने परेशान लहजे में पूछा.

‘‘सारा आफिस जानता है कि अमित उस के चक्कर में फंसा हुआ है. उस का

तो शौक है दूसरों के पतियों पर डोरे डालने का. तुम बहुत भोली हो और तभी हम ने आज तुम्हें आगाह करने का फैसला किया.’’

‘‘मैं ने तो आज तक अमित के साथ उसे कुछ गलत ढंग से व्यवहार करते कभी नहीं देखा,’’ मैं ने अपने पति व निशा का पक्ष लिया.

‘‘तुम्हारे सामने उन्हें कुछ करने की जरूरत ही क्या है, यार. अरे, निशा का फ्लैट है न और तुम्हारा अमित शादी के बाद भी उस से मिलने वहां जाता रहता है, प्रिया.’’

‘‘मुझे अमित ने बताया है कि कभीकभी आफिस समाप्त होने के बाद वह उस के फ्लैट पर चाय पीने निशा के साथ चले जाते हैं, लेकिन ऐसा करने में बुराई क्या है?’’

मेरे इस सवाल के जवाब में वे दोनों कुछ ऐसे अंदाज में हंसी कि अमित पर मेरा विश्वास एकदम डगमगा गया. अचानक ही मेरे मन में असुरक्षा और डर के भाव पैदा हो गए.

‘‘प्रिया, इस निशा ने जो सुंदर गोल्ड के टौप्स पहन रखे हैं, ये कुछ महीने पहले अमित ने उसे उस के जन्मदिन पर दिए थे. अब तुम ही बताओ कि कोई युवक क्या अपनी सहयोगी युवती को सोने के टौप्स उपहार में देता है?’’

‘‘निशा ने जो शोपीस तुम्हें दिया है, उस में जो लड़का है, वह अमित है, पर लड़की तुम नहीं हो. निशा सब को बताती फिरती है कि वह खुद ही वह लड़की है, क्योंकि तुम्हारा कद उस शोपीस वाली लड़की की तरह लंबा नहीं है. अमित उस शोपीस को देख कर उसे याद करता रहे, इसलिए दिया है उस ने वह उपहार.’’

कविता और शिखा की इन बातों को सुन कर मेरे मन की सुखशांति उसी वक्त खो गई. उन के जाने के बाद मैं ने अमित को ढूंढ़ने के लिए अपनी दृष्टि हाल में चारों तरफ घुमाई. अमित जिस समूह में खड़ा हो कर बातें कर रहा था, उस में निशा भी उपस्थित थी. मेरे देखते वे सब लोग अचानक किसी बात पर हंस पड़े. शायद निशा की टांग खींची थी अमित ने, क्योंकि मैं ने उसे अपने पति की पीठ पर नकली नाराजगी के साथ हलकी ताकत से घूंसे मारते देखा. उस की इस हरकत पर एक और सामूहिक ठहाका सब ने लगाया.

तेजाब- भाग 2: प्यार करना क्या चाहत है या सनक?

‘‘प्यार नहीं तो साथ रहने की क्या तुक? आज मु झे अपने पिता की रत्तीभर याद नहीं आती. उम्र के इस पड़ाव पर मैं सोचती हूं मेरी जिंदगी है, चाहे जैसे जिऊं. उन्होंने भी अपने समय में यही सोचा होगा? पर तुम इतना सीरियस क्यों हो?’’

‘‘क्रिस्टोफर, मैं तुम से शादी करना चाहता हूं. ताउम्र तुम्हारा साथ चाहिए मु झे,’’ मैं भावुक हो गया. क्रिस्टोफर हंसने लगी.

‘‘मैं भाग कहां रही हूं? इंडिया आतीजाती रहूंगी. अभी तो मेरा प्रोजैक्ट अधूरा है.’’

‘‘यह मेरे सवाल का जवाब नहीं है. तुम्हारे बगैर जी नहीं सकूंगा.’’

‘‘तुम इंडियन शादी के लिए बहुत उतावले होते हो. शादी का मतलब भी जानते हो?’’ क्रिस्टोफर का यह सवाल मु झे बचकाना लगा. अब वह मु झे शादी का मतलब सम झाएगी? मेरा मुंह बन गया. मेरा चेहरा देख कर क्रिस्टोफर मुसकरा दी. मैं और चिढ़ गया.

‘‘क्यों अपना मूड खराब करते हो. यहां हम लोग एंजौय करने आए हैं. शादी कर के बंधने से क्या मिलने वाला है?’’

‘‘तुम नहीं सम झोगी. शादी जिंदगी को व्यवस्थित करती है.’’

‘‘ऐसा तुम सोचते हो, मगर मैं नहीं. मेरी तरफ से तुम स्वतंत्र हो.’’

‘‘तुम अच्छी तरह सम झती हो कि मैं सिर्फ तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘तब तो तुम को इंतजार करना होगा. जब मु झे लगेगा कि तुम मेरे लिए अच्छे जीवनसाथी साबित होगे, तो मैं तुम से शादी कर लूंगी. मैं किसी दबाव में आने वाली नहीं.’’

‘‘मैं तुम पर दबाव नहीं डाल रहा.’’

‘‘फिर इतनी जल्दबाजी की वजह?’’

‘‘मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता. क्या तुम मु झ से प्रेम नहीं करतीं?’’

‘‘प्रेम और शादी एक ही चीज है?’’

‘‘प्रेम की परिणति क्या है?’’

‘‘शादी?’’ वह हंस पड़ी. जब रुकी तो बोली, ‘‘मैं तुम्हें एक अच्छा दोस्त मानती हूं. एक बेहतर इंडियन दोस्त.’’

‘‘और कुछ नहीं?’’

‘‘और क्या?’’

‘‘हमारे बीच जो शारीरिक संबंध बने उसे किस रूप में लेती हो?’’

‘‘वे हमारी शारीरिक जरूरतें थीं. इस को ले कर मैं गंभीर नहीं हूं. यह एक सामान्य घटना है मेरे लिए.’’

क्रिस्टोफर के कथन से मेरे मन में निराशा के भाव पैदा हो गए. इस के बावजूद मेरे दिल में उस के प्रति प्रेम रत्तीमात्र कम नहीं हुआ. वह भले ही मु झे पेरिस न ले जाए, मैं ने कभी भी इस लोभ में पड़ कर उस से प्रेम नहीं किया. मैं ने सिर्फ क्रिस्टोफर की मासूमियत और निश्च्छलता से प्रेम किया था. आज के समय में वह मेरे लिए सबकुछ थी. मैं ने उस के लिए सब को भुला दिया. मेरे चित्त में हर वक्त उसी का चेहरा घूमता था. एक क्षण वह आंखों से ओ झल होती तो मैं भाग कर उसे खोजता.

‘‘यहां हूं बारामदे में,’’ क्रिस्टोफर बोली तो मैं तेजी से चल कर उस के पास आया और उसे बांहों में भर लिया.

‘‘बिस्तर पर नहीं पाया, इसलिए घबरा गया था,’’ मैं बोला.

‘‘चिंता मत करो. मैं पेरिस में नहीं, तुम्हारे साथ नैनीताल के एक होटल में हूं. तुम्हारे बिना लौटना क्या आसान होगा?’’ वह हंसी.

‘‘आसान होता तो क्या अकेली चली जाती?’’ मेरा चेहरा बन गया. क्रिस्टोफर ने मेरे चेहरे को पढ़ लिया.

‘‘उदास मत हो. वर्तमान में रहना सीखो. अभी तो मैं तुम्हारे सामने हूं, डार्लिंग.’’ क्रिस्टोफर ने मु झे आलिंगनबद्ध कर लिया. मेरे भीतर का भय थोड़ा कम हुआ. एक हफ्ते बाद हम दोनों बनारस आए. 2 दिनों बाद क्रिस्टोफर ने बताया कि उसे पेरिस जाना होगा. 10 दिनों बाद लौटेगी. सुन कर मेरा दिल बैठ गया. उस के बगैर एक क्षण रहना मुश्किल था मेरे लिए. 10 दिन तो बहुत थे. क्रिस्टोफर अपना सामान बांध रही थी. इधर मैं उस की जुदाई में डूबा जा रहा था. क्या पता क्रिस्टोफर न लौटे? सोचसोच कर मैं परेशान हुआ जा रहा था. जब नहीं रहा गया तो पूछ बैठा, ‘‘लौट कर आओगी न,’’ कहतेकहते मेरा गला भर आया.

‘‘आऊंगी, जरूर आऊंगी,’’ उस ने आऊंगी पर जोर दे कर कहा.

वह चली गई. मैं घंटों उस की याद में आंसू बहाता रहा. 10 दिन 10 साल की तरह लगे. न खाने का जी करता न ही सोने का. नींद तो जैसे मु झ से रूठ ही गई थी. ऐसे में स्कैचिंग का प्रश्न ही नहीं उठता. मेरी दुर्दशा मेरे मम्मीपापा से देखी नहीं गई. उन्होंने मु झे सम झाने का प्रयास किया. उसे भूलने को कहा. क्या यह संभव था? मैं ने अपनेआप को एक कमरे में बंद कर लिया था. क्रिस्टोफर की फोटो अपने सीने से लगाए उस के साथ बिताए पलों को याद कर अपना जी हलका करने की कोशिश करने लगा.

पूरे एक महीने बाद एक सुबह अचानक क्रिस्टोफर ने मेरे घर पर दस्तक दी. उसे सामने पा कर मैं बेकाबू हो गया. उसे बांहों में भर कर चूमने लगा. क्रिस्टोफर को मेरा यह व्यवहार अमर्यादित लगा.

‘‘यह क्या बदतमीजी है?’’ क्रिस्टोफर ने खुद को मु झ से अलग करने की कोशिश की.

‘‘क्रिस्टोफर, अब मु झे छोड़ कर कहीं नहीं जाओगी,’’ मेरा कंठ भर आया. आंखें नम हो गईं.

‘‘क्या हालत बना रखी है. बेतरतीब बाल, बढ़ी दाढ़ी. जिस्म से आती बू.’’ क्रिस्टोफर मु झ से छिटक कर अलग हो गई. यह मेरे लिए अनापेक्षित था. होना तो यह चाहिए था कि वह भी मेरे प्रति ऐसा ही व्यवहार करती.

‘‘तुम पहले अपना हुलिया ठीक करो.’’ मैं भला क्रिस्टोफर का आदेश कैसे टाल सकता था. थोड़ी देर बाद जब मैं उस के पास आया तो वह खुश हो गई.

‘‘आई लव यू,’’ कह कर उस ने मु झे चूम लिया. उस शाम हम दोनों खूब घूमे. घूमतेघूमते हम दोनों अस्सी घाट पर आए. वहां बैठे शाम का नजारा ले रहे थे कि उस का फोन बजा. क्रिस्टोफर उठ कर एकांत में चली गई. थोड़ी देर बाद आई.

‘‘किस का फोन था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘पेरिस के मेरे एक दोस्त का था. मेरे पहुंचने की खबर ले रहा था.’’ क्रिस्टोफर के कथन ने एक बार फिर से मु झे सशंकित कर दिया. मैं भी दोस्त वह भी दोस्त. वह भी इतना अजीज कि उस का हाल पूछ रहा था. क्या वह मु झ से भी ज्यादा करीबी था जो क्रिस्टोफर ने एकांत का सहारा लिया. बहरहाल, मैं इस वक्त को पूरी तरह से जी लेना चाहता था. रात 10 बजने को हुए तो क्रिस्टोफर ने घर चलने के लिए कहा. घर आ कर उस ने मु झे गुडनाइट कहा. उस के बाद हम दोनों अपनेअपने कमरे में चले गए.

सर्दियों में ड्राय स्किन के साथ रंग काला पड़ने से हमेशा परेशान रहती हूं?

सवाल-

मैं सर्दियों में ड्राई स्किन के साथ रंग के काला पड़ने से हमेशा परेशान रहती हूं. क्या कोई ऐसा घरेलू उपाय है जिसे अपना कर मेरी स्किन सर्दियों में भी ग्लो कर सके?

जवाब-

अगर आप त्वचा को मौइस्चराइज रखने के साथसाथ उस का रंग भी निखारना चाहती हैं, तो यह मौइस्चराइजर आप के लिए बैस्ट है. इसे बनाना भी आसान है. इस में विटामिन ई का प्रयोग किया जाता है, जिस से त्वचा को पोषण मिलता है.इसे बनाने के लिए आप को 1/2 कप और्गेनिक कोकोनट औयल, 1 चम्मच विटामिन ई औयल या 3 विटामिन ई के कैप्सूल लें.एक कटोरी में नारियल के तेल को धीमी आंच पर पिघलाएं. फिर उस में विटामिन ई कैप्सूल फोड़ कर डालें और चम्मच से अच्छी तरह मिलाएं. इस मौइस्चराजर का प्रयोग दिन में 2 बार करें.

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सर्दियों का मौसम फिर से दस्तक दे रहा है और इस मौसम में जरूरी है हम अपनी त्वचा की देखभाल अच्छी तरह से करें. सर्दियों में त्वचा को चमकदार बनाए रखने के लिए विशेष देखभाल की जरूरत होती है. हम आप को कुछ ऐसे उपाय बता रहे हैं, जो आप की त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद हो सकते हैं:

मौइश्चराइजर का इस्तेमाल करें

सर्दियों में हमें क्रीम बेस्ड थिक मौइश्चराइजर का इस्तेमाल करना चाहिए. इस के साथसाथ ऐसे सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें, जो त्वचा की नमी को भी बरकरार रखें.

ऐलो वेरा युक्त स्किन क्रीम लगायें

ऐलो वेरा युक्त स्किन क्रीम का प्रयोग आप की त्वचा को स्वस्थ और चमकदार बनाता है. देश विदेश के कई शाही परिवारों में सदियों से ऐलो वेरा का इस्तेमाल खूबसूरती के लिए किया जाता रहा है. माना जाता है कि क्लियोपैट्रा अपनी खूबसूरती को बरकरार रखने के लिए हर दिन ऐलो वेरा का इस्तेमाल करती थीं. इस में ऐसे गुण हैं, जो आप की त्वचा को प्राकृतिक चमक देते हैं.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- इस सर्दी रखें अपनी स्किन का खास खयाल

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

टीनेएजर्स के ऐसे हों इनरवियर

इनरवियर चाहे पुरुषों के हों या महिलाओं के विशेष महत्त्व रखते हैं. लेकिन जब बात महिलाओं द्वारा इस्तेमाल होने वाले इनरवियर की हो तो बहुत ज्यादा सचेत रहने की जरूरत होती है. पहनावा बुटीक की गुरलीन संधू की सलाह है कि आमतौर पर 13-14 साल की होते ही लड़की को अपने शारीरिक बदलावों के चलते इनरवियर का चुनाव करते समय विशेष ध्यान रखने की जरूरत होती है, क्योंकि यदि उन की फिटिंग और आकार ठीक नहीं होगा तो उन्हें पहनने पर असुविधा होगी. इस की हर मां को जानकारी होनी चाहिए कि उस की बेटी के लिए क्या ठीक रहेगा. शरीर के सही विकास के लिए भी सही फिटिंग के इनरवियर का चुनाव जरूरी है.

सही इनरवियर चुनें ऐसे

इनरवियर में ब्रा और लिंजरी के चुनाव में खास सावधानी बरतनी चाहिए. वैसे यह साधारण बात लगती है लेकिन है नहीं. यह एक जटिल काम है. इस के लिए सब से पहले तो अपनी नाप का सहीसही पता होना जरूरी है. विकसित होेते शरीर के लिए तो उचित नाप का पता होना बहुत आवश्यक है. सही नाप पता होने पर ही सही ब्रा का चुनाव हो पाता है. कहने को तो यह मात्र अंडरवियर ही होता है, लेकिन यदि इस का आकार गलत हो तो इस से कमर में दर्द, मांसपेशियों में खिंचाव हो सकता है, जो अंत में सिरदर्द तक जा पहुंचता है. यदि कपड़ा अनावश्यक रूप से टाइट होगा तो सारे शरीर में दर्द कर सकता है. शारीरिक बदलाव के दौर में विकसित होती लड़कियों को ट्रेनिंग ब्रा की जरूरत होती है. ट्रेनिंग ब्रा परफैक्ट फिटिंग वाली नहीं होती, लेकिन उसे पहनने से शरीर का विकास सही होता है. यह दुबलीपतली लड़कियों के लिए होती है जिन का कप साइज कम होता है. लेकिन शहरी माहौल में पलीबढ़ी लड़कियों का शरीर भराभरा होता है, अत: उन का कप साइज रैग्युलर होता है. उन्हें रैग्युलर ब्रा पहननी चाहिए. लेकिन टीनएजर्स के लिए स्पोर्ट्स ब्रा ही ठीक रहती है क्योंकि इसे पहनने से खेलकूद के दौरान ब्रैस्ट पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ता.

अमूमन 50% स्त्रियां गलत साइज की ब्रा पहनती हैं. इस से उम्र के बढ़ने के साथ ब्रा का ढलकना आम बात हो जाती है. लेकिन यदि शुरू से ही कप साइज ठीक रखेंगी तो ब्रैस्ट की शेप काफी उम्र तक ठीक रहेगी.

लिंजरी के प्रकार

स्ट्रैपलेस: अगर आप बस्टियर नहीं पहनना चाहतीं तो स्ट्रैपलेस ब्रा फिगर को उभारने के लिए उचित चुनाव होगा.

बस्टियर: यह ब्रा बस्ट और वेस्ट दोनों को सपोर्ट करती है.

सीमलेस: लाइट कलर्स और लाइट फैब्रिक के साथ सीमलेस ब्रा ठीक रहती है क्योंकि उस की स्टिचिंग नजर नहीं आती.

निपल कवर: बैकलैस ड्रैस के साथ इन का उपयोग अच्छा लगता है. ये ड्रैस के भीतर रखे जा सकते हैं.

पारदर्शी बैकलेस ब्रा: स्किन कलर की होने की वजह से यह नजर नहीं आती. इसे बैकलेस ड्रैस के साथ पहन सकती हैं.

लिंजरी आमतौर पर हौजरी कौटन की बनी होती है, लेकिन पहनने वाली अगर स्पोर्ट्स में हिस्सा लेती है तो उस के लिए सिंथैटिक फाइबर से बनी लिंजरी ठीक रहेगी. ट्रैक ऐक्टिविटीज, वर्कआउट, ऐरौबिक्स करने वाली अंडरगारमैंट का चयन बहुत ध्यान से करें. मोटी लाइनिंग या चौड़ी लाइनिंग वाले अंडरगारमैंट पहनने से बचें क्योंकि ये वर्कआउट के दौरान लोअर से झलकते रहेंगे यदि बस्ट लाइन और टमी एरिया हैवी है तो ऐसी लिंजरी का चुनाव करें, जो भारी हिस्सों को छिपाए. टू पीस लिंजरी और पारदर्शी लिंजरी पहनने से बचें.

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