सवाल-

मैं 34 साल और 2 बच्चों की मां हूं. मैं स्कूल टीचर हूं. मुझे हर समय मरने के खयाल आते हैं अगर मेरी तबीयत हलकी सी भी खराब हो जाए तो मुझे ऐसा लगता है कि मैं मरने वाली हूं. बस से सफर करते समय ऐसा लगता है जैसे बस का ऐक्सिडैंट हो जाएगा और मैं मर जाऊंगी. ये खयाल मेरे दिमाग में हमेशा रहते हैं. जो मुझे मैंटल स्ट्रैस में डाल रहे हैं. इस डर से मैं ने बाहर आनाजाना भी छोड़ दिया है. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब-

सबसे पहले तो इस बात पर गौर करें कि आप को ये थौट्स कब और किस सिचुएशन में आते हैं. जब भी आप को ये थौट्स परेशान करें आप उन्हें डायरी में रिकौर्ड करें. जब आप को वे थौट्स समझ आ जाएं और कि किस सिचुएशन में आते हैं यह समझ आ जाए तो फिर उन्हें पौजिटिव थौट्स से बलदने की कोशिश करें. अपना ध्यान उन चीजों पर लगाएं जो आप के नियंत्रण में हों. मैडिटेटिंग ऐक्टिविटीज का सहारा लें. अगर फिर भी सिचुएशन कंट्रोल में न आए तो थेरैपिस्ट की मदद लें.

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एकल परिवारों में जहां मातापिता दोनों नौकरीपेशा होते हैं वहां बच्चे अपनी समस्या का हल खुद ही निकालने की कोशिश करते हैं और जब वे इस में कामयाब नहीं हो पाते हैं तब कई बार आत्महत्या जैसा कदम भी उठा लेते हैं.

रंजना एक सिंगल पेरैंट हैं. अपनी बेटी श्रेया को ले कर वे बहुत महत्त्वाकांक्षी रही हैं. वे उसे डाक्टर बनाना चाहती थीं, परंतु श्रेया की साइंस में बिलकुल दिलचस्पी नहीं थी. यह बात वह कभी रंजना को खुल कर नहीं बता पाई. धीरेधीरे वह कुंठित होती गई. घंटों कमरे में बंद रहती. धीरेधीरे डिप्रैशन में चली गई.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- जब हों डिप्रैशन की शिकार

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