Diwali Myths : हमारे समाज में त्योहारों की शुरुआत सामाजिक जुड़ाव, ऋतु परिवर्तन और खुशी मनाने के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन समय के साथ इन के साथ कई कर्मकांड और अंधविश्वास जुड़ते चले गए. जब हम दीवाली को धार्मिक मान्यताओं, टोटकों और अलौकिक दावों के चश्मे से हटा कर तर्कशास्त्र और विज्ञान की कसौटी पर कसते हैं, तो इस के पीछे छिपे अंधविश्वासों की परतें खुलने लगती हैं.

तार्किक नजरिया किसी परंपरा को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करता क्योंकि वह सदियों से चली आ रही है, बल्कि वह पूछना सिखाता है. ‘क्या’, ‘क्यों’ और ‘कैसे…’

अगर केवल अनुष्ठान से समृद्धि संभव होती, तो देश में आर्थिक असमानता और गरीबी का अस्तित्व ही नहीं होता. पूजापाठ के जरीए वित्तीय लाभ की उम्मीद करना पूरी तरह से अतार्किक और अंधविश्वास पर आधारित है.

लक्ष्मीगणेश पूजन से धन वैभव मिलता है

धार्मिक मान्यता क्या है : कार्तिक अमावस्या की रात को विशिष्ट शुभ मुहूर्त में लक्ष्मी और गणेश की पूजा करने, मंत्रोच्चार करने और अनुष्ठान करने से घर में धन, संपत्ति और समृद्धि आती है.

तर्क क्या कहता है : धन और आर्थिक रूप से संपन्न होने का सीधा संबंध इस बात से है कि आप ने कितनी शिक्षा प्राप्त की है, आप कितने मेहनती हैं, कितना समय के साथ चल कर नए चीजों को सीखते हैं और अपने काम में माहिर हैं?

किसी मूर्ति पर मिठाई, फूल या अक्षत चढ़ाने से बैंक बैलेंस या अर्थव्यवस्था में बदलाव नहीं आ सकता. यह केवल एक मिथक है जिस का सचाई से दूरदूर तक कोई नाता नहीं है.

अगर अनुष्ठान और पूजा से धन प्राप्त होना संभव होता, तो दुनिया या देश में कोई भी गरीब नहीं होता. केवल धार्मिक अनुष्ठान के जरीए आर्थिक लाभ की उम्मीद करना अतार्किक और अंधविश्वास पर आधारित है.

दीवाली की रात यानी तंत्रमंत्र, टोटके और शुभ मुहूर्त

धार्मिक मान्यता क्या है : कहा जाता है कि दीवाली की रात को किया गया पूजन या टोटका विशेष फलदायी होता है और ग्रहों की स्थिति बदल कर किस्मत चमका सकता है. यही वजह है दीवाली की रात खुद को तांत्रिक बता आम जनता से पैसा लूटने वाले विशेष रूप से ऐक्टिव हो जाते हैं.

तर्क क्या कहता है : समय का कोई भी हिस्सा (मुहूर्त) दिन का कोई भी पहर हो, चाहे दिन हो या रात अपनेआप में शुभ या अशुभ नहीं होता. ऐसा कहा अवश्य जाता है ताकि धर्म का धंधा करने वाले लोगों की दुकानदारी चमकती रहें. समय केवल पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने से बनने वाली एक भौतिक इकाई है.

साथ ही ग्रहों और तारों की स्थिति का किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत सफलता या असफलता से कोई संबंध नहीं होता. यह अवधारणा पूरी तरह से गैर वैज्ञानिक है. ऐसा नहीं है कि पूजापाठ कर के कोई नाकारा व्यक्ति जिसे किसी भी काम को करने का अनुभव न हो और वह करना भी न चाहता हो तो उस का कामधंधा रातोंरात पूजापाठ से चमक उठेगा.

धनतेरस पर झाड़ू खरीदना शुभ होता है

दीवाली खासकर धनतेरस या दीवाली के दिन नई झाड़ू खरीदना ‘अत्यंत शुभ’ माना जाता है. धार्मिक विश्वास है कि झाड़ू में माता लक्ष्मी का वास होता है और इसे घर लाने से दरिद्रता (अलक्ष्मी) बाहर निकल जाती है और घर में सुखसमृद्धि आती है.

तर्क क्या कहता है : अगर इस तर्क में कोई भी सचाई होती तो पूजा भी हम हमेशा करते ही हैं और झाड़ू भी खरीदते ही रहते हैं तो फिर अब तक तो हमे अमीरों की लिस्ट में आ जाना चाहिए था.

एक झाड़ू का काम केवल फर्श पर जमी धूलमिट्टी के कणों को हटाना है. उस में किसी देवीदेवता का निवास मानना पूरी तरह से एक काल्पनिक और भावुक अवधारणा है.

झाड़ू केवल खजूर की पत्तियों, प्लास्टिक या घास से बना एक साधारण सफाई का उपकरण है. आप झाड़ू को चाहे दीवाली पर खरीदें या फिर साल के किसी भी दिन, उस का काम केवल सफाई करना है और वह केवल अपना वही काम करेगी. आप का धन झाड़ू खरीदने से नहीं बल्कि सही समय पर बचत और निवेश करने से होता है.

बाजार से ₹50 या ₹100 की झाड़ू खरीद कर घर में रख लेने से किसी व्यक्ति की आय या बैंक बैलेंस में 1 रूपए की भी वृद्धि नहीं हो सकती.

दीए और प्रकाश से अदृश्य शक्तियों या अलक्ष्मी को भगाना

धार्मिक मान्यता क्या है : तेल या घी के दीए जलाने से घर की दरिद्रता और अलक्ष्मी दूर भागती है और नकारात्मक या बुरी शक्तियां नष्ट होती हैं.

दरअसल, बुरी शक्ति नाम की कोई चीज होती ही नहीं है. यह बस अपने मन का वहां और पैसा लूटने वाले तांत्रिको का धंधा है जिस में भोलेभाले लोग फंस जाते हैं. क्योंकि जब दीवाली की रात को दीया जलने से भी उन की समस्या दूर नहीं होती तो उन्हें लगता है कि किसी बाबा के पास ही अब इस समस्या का हल मिलेगा.

तर्क क्या कहता है : हालांकि दीया जलाना केवल एक रासायनिक प्रक्रिया है, जिस से ऊष्मा और प्रकाश (उत्पन्न होते हैंप्रकाश केवल अंधेरे को दूर कर सकता है. इस का किसी अमूर्त अवधारणा जैसे दरिद्रता या बुरी शक्तियों को मिटाने से कोई भौतिक संबंध नहीं है.अलबत्ता, दीया जलाने से हमारा मन खुश जरूर होता है और इस की भी एक मनोवैज्ञानिक वजह है जैसे कि मानव मस्तिष्क का सीधा संबंध प्रकाश से है. जब आंखें रोशनी को ग्रहण करती हैं, तो दिमाग में सेरोटोनिन नाम का न्यूरोट्रांसमीटर रिलीज होता है, जो मूड को बेहतर बनाता है और खुशी का एहसास कराता है.

दूसरा, इस से सामाजिक सद्भावना भी पनपती है. जब पूरा समाज या मोहल्ला एकसाथ दीए जलाता है और जगमगाता है, तो इस से व्यक्ति के भीतर अकेले न होने की भावना पैदा होती है. यह अकेलापन दूर करने में मदद करता है.

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