Domestic Violence : चाहे 2026 हो या कोई और हो पत्नी पर हाथ उठाने को किसी भी तरह से जस्टिफाई नहीं किया जा सकता. पति के द्वारा पत्नी पर हाथ उठाना घरेलू हिंसा के अंतर्गत आता है और घरेलू हिंसा को ले कर कड़े कानून हैं. लेकिन दुख इस बात का है पत्नियों को इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती है और उन्हें लगता है अगर पति का घर छोड़ा तो हम कहां जाएंगी इसलिए वे पिटने को मजबूर होती हैं. उन्हें लगता है इस घर को छोड़ा तो उन का और कोई आसरा नहीं है.

आज हम यहीं बताने जा रहे हैं कि अगर पति हाथ उठा रहा है तो आप क्या करें? आप के क्या अधिकार हैं? कानून ने आप को इस के तहत सुरक्षा दी है. बस जरूरत है अपने उस अधिकार को जानने और उस का फायदा लेने की.

आइए, जानें क्या करें जब पति मारे:

पहली बार भी चुप न रहें

अगर आप के साथ मारपीट हो रही हो तो लोग क्या कहेंगे यह सोच कर चुप न बैठें बल्कि पहली बार में ही पति की हिम्मत तोड़ दें. इस के लिए परिवार के बड़ेबुजुर्गों, रिश्तेदारों या किसी ऐसे व्यक्ति को शामिल करें जिस की बात पति सुनता हो. उन्हें स्पष्ट शब्दों में बता दें कि आप इस तरह की चीजें कतई सहन नहीं करेंगी.

मैरिज काउंसलिंग लें

अगर पति गिल्टी फील कर रहा है तो भी तुरंत माफ न करें बल्कि दोनों को मिल कर किसी अच्छे काउंसलर से मिलना चाहिए. पेशेवर लोग ?ागड़े की जड़ तक पहुंचने में मदद करते हैं क्योंकि ऐसा हुआ है तो उस की कोई वजह तो होगी ही. इसलिए उस वजह की जड़ में जाएं और समस्या को दूर करें.

रिहैब की हैल्प लें

कई मामलों में नशा घरेलू हिंसा की वजह बनता है. नशे में पत्नी पर जानलेवा हमला करने के केस आए दिन सुनने को मिलते हैं. यदि पति शराब या किसी अन्य नशे की वजह से पीटता है तो परिवार या किसी करीबी की हैल्प ले कर उसे नशामुक्ति केंद्र ले जाना ही सब से बड़ा समाधान है.

ऐंगर मैनेजमैंट

पति को अपना गुस्सा नियंत्रित करने के लिए थेरैपी लेने की न केवल सलाह दें बल्कि आप उन के साथ जाएं या फिर परिवार के किसी सदस्य को बोलें कि इन की यह प्रौब्लम दूर कराएं तभी आप उन के साथ रहेंगी.

वार्निंग दें

पति को स्पष्ट रूप से बताएं कि उन का व्यवहार गलत है और यदि यह दोबारा हुआ तो आप कानूनी कदम उठाएंगी. कई बार कानूनी काररवाई का डर व्यवहार बदल देता है. मगर यह तभी हो सकता है जब आप अपने अधिकारों के बारे में जानती हों, इसलिए पहले यह जानें कि आप को कानूनन अधिकार क्या हैं?

क्या है कानूनी अधिकार

अकसर पत्नियों को ये डर रहता है कि कहीं शिकायत करने पर पति ने घर से बहार निकाल दिया तो वे कहां जाएंगी. इसी वजह से वे सहती रहती हैं. लेकिन हम आप को बता दें कि पति आप को घर से बाहर नहीं निकाल सकता, भले ही घर उस के नाम पर हो. अगर वह निकालता है तो कोर्ट उसे आप को वापस घर में रखने का आदेश दे सकता है.

दोबारा मारपीट नहीं कर सकता

कई पत्नियों को यह डर भी लगा रहता है कि अगर उन्होंने कंप्लेंट की तो वापस घर आने पर पति इस से भी ज्यादा बुरी तरह मारेगा तब वे क्या करेंगी? इस के लिए आप संरक्षण आदेश के तहत अदालत से आदेश ले सकती हैं कि पति दोबारा आप के साथ मारपीट न करे.

नुकसान का हरजाना पति से मांग सकती हैं

इस बात से भी डरने की जरूरत नहीं है कि कहीं चोट लग गई हो तो उस के इलाज के लिए अच्छे अस्पताल गए तो खर्चा कहां से आएगा. आप अपने और अपने बच्चों का खर्च, इलाज का खर्च और मारपीट के कारण हुए नुकसान की भरपाई के लिए पैसे मांग सकती हैं.

कैसे कराएं एफआईआर

आप क्रिमिनल ऐक्शन भी ले सकती हैं. आप पति और प्रताडि़त करने वाले ससुराल वालों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) (पहले आईपीसी ४९८्न) के तहत मामला दर्ज करा सकती हैं. यह धारा किसी महिला के पति या उस के रिश्तेदारों द्वारा उस से क्रूरता करने (मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक) या दहेज की मांग पूरी करने के लिए उत्पीड़न करने से संबंधित है. इस के लिए आप अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन में शिकायत (एफआईआर) दर्ज करा सकती हैं, जिसमें सभी घटनाएं और सुबूत जैसे मैडिकल रिपोर्ट, मैसेज, गवाह हों.

मानसिक या शारीरिक क्रूरता के सुबूत जैसे चोटों की तसवीरें, डाक्टर के परचे या मानसिक उत्पीड़न के मैसेज/औडियो रिकौर्डिंग जुटाएं. एक वकील से सलाह लें जो आप को प्रक्रिया और आवश्यक दस्तावेजों के बारे में बता सके.

मैडिकल एमएलसी कराएं

मारपीट होने पर तुरंत अस्पताल जा कर ‘मैडिकल एमएलसी’ कराएं. यह चोट के निशान कानूनी सुबूत के तौर पर बहुत काम आते हैं. महिला हेल्पलाइन नंबर: 1091 या 181, पुलिस आपातकालीन नंबर: 112.

घरेलू हिंसा कानून

घरेलू हिंसा कानून के दायरे में महिलाओं के खिलाफ हर तरह की हिंसा आती है. इस के तहत महिला के साथ मारपीट, जोरजबरदस्ती या चोट पहुंचाने जैसी चीजें आती हैं. वैसे महिलाओं को ज्यादातर शारीरिक हिंसा जिस में थप्पड़ मारना, धक्का देना, गला दबाना और जलाना का सामना करना पड़ता है. इस के अलावा इन्हें भावनात्मक, यौन और आर्थिक हिंसा का सामना भी करना पड़ता है.

कानून के तहत सहायता पाने के लिए लोकल पुलिस स्टेशन जाने की जरूरत होती है. वहां घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया जा सकता है. घरेलू हिंसा कानून महिलाओं के साथसाथ 18 साल की उम्र तक के बच्चों को भी संरक्षण देता है.

हालांकि पुलिस अफसर पहले मामले की पड़ताल करता है. अगर उसे लगता है कि इस का कानूनी मामला बनता है तो वह इस की एफआईआर दर्ज करता है. पुलिस वाले पहले एफआईआर दर्ज नहीं करते हैं. पहले वे शिकायत दर्ज करते हैं. ज्यादातर मामलों में महिलाएं सिर्फ शिकायत दर्ज करा देती हैं, जिस से गंभीर मामलों में उचित काररवाई नहीं हो पाती. लेकिन अगर महिलाएं चाहे तो आईपीसी 498 (ए) यानी महिला उत्पीड़न कानून के तहत सीधे थाने में भी एफआईआर दर्ज करा सकती हैं.

एफआईआर के बाद मामला अदालत में जाता है. इस के बाद अदालत इस का संज्ञान लेती है. बहुत से मामलों में महिलाएं सीधे अदालत में जा कर संरक्षण की फरियाद करती हैं. अदालत ऐसे मामलों में संरक्षण दिए जाने के लिए कह सकती हैं या फिर पीडित को सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दे सकती है.

महिलाएं घरेलू हिंसा का मामला कहीं से भी दर्ज करा सकती हैं. अगर वे पति की ज्यादती की शिकार होने के बाद पिता के पास आ कर रहने लगी हैं तो वहां से भी मामला दर्ज करा सकती हैं.

अगर महिलाएं आर्थिक रूप से पति पर आश्रित हैं तो वे अदालत में मैंटेनैंस दिए जाने के लिए भी निवेदन कर सकती हैं. इस के लिए अदालत अंतरिम आदेश में मैंटेनैंस दिए जाने का आदेश दे सकती है.

आजकल ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट की तरफ से काउंसलर की नियुक्ति की जाती है. काउंसलर दोनों पक्षों की बात सुनता है और अगर मामला बातचीत से सुल?ा सकता हो तो वह दोनों पक्षों के बीच सम?ाता कराने का प्रयास करता है. कई बार मैंटेनैंस या दूसरे मामलों पर काउंसलर के स्तर पर ही मामले में सहमति बन जाती है और आगे की अदालती प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती. लेकिन अगर काउंसलर अपनी रिपोर्ट में कहता है कि दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है तो कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है. इस के आलावा आप अदालत से आदेश भी ले सकती हैं कि पति दोबारा आप के साथ मारपीट न करे और न ही आप से संपर्क करे.

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