कहा जाता है कि भय हमें झकझोर देता है,मौत हमारी आँखें खोल देती है. लेकिन लगता है हिंदुस्तानी इस मुहावरे को भी गलत कर देंगे.क्योंकि ‘कोविड-19 के दौर में जीवन’ शीर्षक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिंकडिन पर एक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने अन्य बातों के अतिरिक्त इस तथ्य पर बल दिया है कि ‘हमला करने से पहले कोविड-19 नस्ल, धर्म, रंग, जाति, समुदाय,भाषा या सीमा नहीं देखता है’.

इसलिए, उन्होंने कहा, “हमारी प्रतिक्रिया और व्यवहार एकता व भाईचारे को प्राथमिकता दे,इसमें हम सब साथ साथ हैं.” इसी भाईचारे व आपसी सहयोग के कारण केरल अब कोरोना वायरस से लड़ने के लिए राष्ट्रव्यापी मॉडल बन चुका है. केरल ने देश में सबसे पहला कोविड-19 रोगी रिपोर्ट किया था,लेकिन इस लेख के लिखे जाने तक इस दक्षिणी राज्य में संक्रमण के सिर्फ 400 मामले हैं और अब तक केवल तीन मौतें हुई हैं; जैसा कि केन्द्रीय स्वास्थ मंत्रालय के डाटा से मालूम होता है.केरल की इस सफलता का सबसे बड़ा कारण यह रहा है कि हिन्दू, मुस्लिम व ईसाई बिना किसी भेदभाव के, एकजुट प्रयास में, एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कोरोना वायरस से लड़ रहे हैं.

लेकिन देश के कुछ बड़े राज्यों में इस आपसी भाईचारा व एकजुटता का काफी हद तक अभाव देखने को मिल रहा है.शायद इसलिए इनमें कोविड-19 से संक्रमण व मौतों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है. केन्द्रीय स्वास्थ मंत्रालय के डाटा के मुताबिक़ 22 अप्रैल सुबह 11.10 तक कोविड-19 से जो कुल 645 मौतें हुईं उनमें सबसे ज्यादा (251) महाराष्ट्र में हुई हैं और इसके बाद गुजरात (90), मध्य प्रदेश (76),  दिल्ली (47) ,राजस्थान 25 और तेलंगाना (23) हैं. देश में कुल कोविड-19 संक्रमितों की संख्या भी 20,111 से अधिक हो गई है.कोविड-19 को नियंत्रित करने के लिए प्रधानमंत्री ‘एकता व भाईचारे’ को प्राथमिकता देने के अतिरिक्त सोशल डिस्टेंसिंग (दैहिक दूरी) बनाये रखने और लॉकडाउन का सख्ती से पालन करने पर भी ज़ोर दे रहे हैं.लेकिन तर्क पर आस्था इतनी भारी पड़ रही है कि सब गुड़ गोबर होता जा रहा है.ध्यान देने की बात यह है कि तर्क पर आस्था सिर्फ भारत में ही भारी नहीं पड़ रही है बल्कि लगभग सभी देशों (और सभी समुदायों व सभी वर्गों) में यह ‘बीमारी’ मौजूद है.

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