लेखक-पूनम

80 वर्षीय विमला शर्मा एक छोटे शहर में अकेली रहती हैं. रिटायर्ड टीचर हैं. आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं. समाज कल्याण के कामों में बढ़चढ़ कर हिस्सा भी लेती हैं. घंटों बैठ कर पूजापाठ करने वालों में से भी नहीं हैं. उन की बातों से कभी किसी धर्म, जाति का भेदभाव नहीं झलकता, पर रोजाना के व्यवहार में ब्राह्मण होने का, उच्च जाति होने का मिथ्या अभियान झलक ही जाता है. कुछ दिन पहले वे अस्वस्थ थीं. घर के काम के लिए उन्होंने जिस महिला को रखा है, वह छुट्टी पर गई थी जो अपनी जगह किसी मीना को (जो उन के हिसाब से छोटी जाति की थी) काम पर रखवा गई थी.

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