प्रसन्नता की कोई परिभाषा नहीं होती. फिर भी अच्छी आय, मुख्य स्वतंत्रताओं, विश्वास, स्वास्थ्य, जीवन की औसत आयु, सामाजिक सहायता व उदारता के पैमानों पर संयुक्त राष्ट्र संघ के सस्टेनेबल डैवलपमैंट सौल्यूशन नैटवर्क ने देशों को हैप्पीनैस क्रम में डाला है. दुनिया के सब से ज्यादा खुश रहने वाले देश 10 हैं- फिनलैंड, डेनमार्क, नौर्वे, आइसलैंड, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड, स्वीडन, न्यूजीलैंड, कनाडा, और औस्ट्रिया. भारत का स्थान विशेष माना जाएगा.

5 साल के विकास, अच्छे दिनों, कुंभों, नर्मदा बचाओ, गंगा यात्राओं, बद्रीनाथ धाम के पुनरुत्थान, सरदार पटेल की मूर्ति, रातदिन नरेंद्र मोदी के तीखे व तेवर भरे भाषणों से भारत को 10 में नहीं तो 15वें 20वें स्थान पर तो होना ही चाहिए. अरुण जेटली दिन में 6 बार कहते हैं कि भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है, चीन से भी आगे.

देश के लोग तो जानते हैं कि वे खुद कितने खुश रहते हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट भारत को वर्ष 2019 में 156 देशों में से 140वें स्थान पर रखती है तो कम से कम देश में किसी को आश्चर्य न होगा. हां, इतना आश्चर्य जरूर है कि भारतीय नेताओं के बयानों के अनुसार आतंकवाद की फैक्ट्ररी पाकिस्तान 67वें स्थान पर क्यों है जबकि पाकिस्तान की प्रतिव्यक्ति आय 1,500 डौलर है.

भारत के 1,900 डौलर प्रतिव्यक्ति के मुकाबले. चीन, जो 93वें स्थान पर है, 8,000 डौलर प्रतिव्यक्ति आय वाला देश है. भूटान और बंगलादेश प्रतिव्यक्ति आय में तो भारत से पीछे हैं पर हैप्पीनैस क्रमांक में 95वें व 125वें स्थान पर हैं. भारत की स्थिति गिरी क्यों है? इसलिए कि स्वतंत्रताओं के बावजूद यहां भय का वातावरण बना दिया गया है. आम आदमी हर समय भयभीत रहता है.

अमीर को टैक्स छापेमारों का डर है, गरीब को ऊंची जातियों के कहर का. युवाओं को बेरोजगारी का डर है, औरतों को बलात्कार का. शायद अपराधी भी यहां डरे रहते होंगे क्योंकि जेलों में भी भयंकर करप्शन, आतंक है. मगर हमारे यहां पंडों की मौज है, इसलिए कि 140वें स्थान वाले भारतीय खुशी के लिए मेहनत की जगह पूजापाठ करते रहते हैं. नतीजा सामने है. बौद्ध भूटानी, इस्लामी पाकिस्तानी बेहतर हैं. जय गंगा मैया…

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