अंजू बहुत डरी-सहमी सी घर लौटी थी. आंखों में बार-बार आंसू भर आते थे. नन्हीं छवि को सीने से लगा कर वह बड़ी देर तक सन्नाटे में बैठी रही. अपने और अपनी बच्ची के लिए उसका नौकरी करना जरूरी था, मगर जबसे ये नया बौस रजत शर्मा औफिस में आया है, तब से अंजू का एक-एक दिन वहां मुश्किल से कट रहा है. वजह है उसकी खूबसूरती और ऊपर से उसका तलाकशुदा होना. खूबसूरत औरत अगर तलाकशुदा हो तो आदमी की ललचायी नजरें उसे नोंच खाना चाहती हैं. हर आदमी सहानुभूति और प्रेम जता कर उसे अपने बिस्तर तक ले जाना चाहता है.

आज तो कौन्फ्रेंस रूम में रजत शर्मा ने अंजू को लगभग अपनी बाहों में भींच ही लिया था. वह बड़ी मुश्किल से उसे धक्का देकर बाहर निकली थी. एक हफ्ता हो गया, रजत कई बार ऐसी हरकतें कर चुका है. एक दिन उसने लंच टाइम पर अंजू को अपने केबिन में बुला कर कौफी पिलायी और दफ्तर की कई बातों के साथ-साथ उनकी निजी जिन्दगी के बारे में भी कई बातें पूछ डालीं. बातों-बातों में उसे पता चल गया था कि अंजू का तीन साल पहले तलाक हो चुका है और इस शहर में वह अपनी छह साल की बच्ची के साथ अकेली रहती है. तलाकशुदा होने और अकेले रहने की बात पता चलते ही रजत के हौसले बुलंद हो गये. वह हर वक्त उसे घूरता रहता था.

किसी न किसी बहाने से उसकी सीट पर आ कर काफी देर तक उसके पीछे खड़ा रहता. अक्सर बात करते वक्त कभी उसके कंधे पर, कभी कमर पर हाथ रखने लगा था. एकाध बार तो अंजू ने उसकी इस हरकत को नजरअंदाज किया, मगर फिर वह उसकी आंखों से टपकती लोलुपता को समझ गयी थी. आज तो हद ही हो गई जब उसने कौंफ्रेंस रूम में उसे अकेली पाकर दबोच लिया. वह किसी तरह अपनी टेबिल पर आयी, इधर-उधर देखा कि किसी ने देखा तो नहीं.

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उसे समझ में नहीं आ रहा था कि रजत की शिकायत वह किससे करे. उसे अच्छी तरह पता था कि हंगामा करने से उसकी अपनी बेइज्जती होगी और हो सकता है उसे इस नौकरी से भी हाथ धोना पड़े क्योंकि कम्पनी के लिए रजत शर्मा काफी महत्वपूर्ण आदमी था. उसके आने के बाद कम्पनी का काम काफी बढ़ गया था. ऐसे में अंजू को ही समझाबुझा कर खामोश कर दिया जाता या कहा जाता कि वह नौकरी छोड़ना चाहती है तो छोड़ दे.

आज अंजू को बार-बार अपने पति शरद की याद आ रही थी. उसको महसूस हो रहा था कि अपनी मां और मामी की सलाह मानकर उसने लाइफ में कितनी बड़ी गलती कर दी. छोटी सी बात पर शरद को तलाक देना उसकी कितनी बड़ी बेवकूफी साबित हो रही थी. मां और मामी अगर उसके शादीशुदा जीवन में इतनी दखलंदाजी न करतीं और वह उनकी बातों में आकर पति से आये-दिन नाजायज मांगे न करती तो शायद उसका वैवाहिक जीवन बच भी जाता और वह सुखी भी रहती. मगर उस वक्त तो उसे अपनी मां और मामी की बातें ही ज्यादा ठीक लगती थीं.

मां उकसाती कि शरद की तनख्वाह अपने हाथ में रखो, उसे अपनी मां बहन पर खर्चा मत करने दो… मामी कहती कि पति पर नकेल डाल कर रखो, वरना सारी कमाई बहन पर लुटा देगा और तुम मुंह ताकती रह जाओगी….. और वह लग गयी शरद की कमाई की पाई-पाई का हिसाब मांगने, बिना यह समझे कि घर से बाहर निकल कर एक आदमी कितनी मुश्किल से पैसा कमाता है, कैसे वह अपनी मेहनत को परिवार के हर सदस्य के बीच बांटता है ताकि सबकी जरूरतें पूरी होती रहें. मगर मां और मामी के इशारों पर नाच रही अंजू को उस वक्त इन बातों की कोई अक्ल ही नहीं थी और जब समझाने वाले ही उकसाने में लगे हों तो अंजाम बुरा ही होता है.

अंजू और शरद के बीच छोटी-छोटी नाराजगी धीरे-धीरे बड़ी बनती गयी और एक दिन दोनों तलाक लेने के लिए अदालत में जा पहुंचे. शरद की मां ने अंजू के बहुत हाथ-पैर जोड़े थे कि वह ऐसा फैसला न करे, मगर अंजू को तो तब शरद की मां-बहन दुश्मन ही दिखती थीं, वह भला उनकी बात क्यों सुनती.

शरद से तलाक लेने के तीन साल के भीतर ही अंजू को आटे-दाल का भाव समझ में आ गया. मां और मामी की बातें मान कर उसने जीवन की कितनी बड़ी गलती की यह अब पता चल रहा था. तीन साल की बच्ची को सीने से लगाये वह मायके तो लौट आयी, मगर पिता की पेंशन पर दो और प्राणियों का बोझ पड़ा तो वही मां उसे उलाहना देने से भी नहीं चूकी जो कल तक उसे उसके पति शरद के खिलाफ भड़काती थी. अंजू का भाई अपनी मां की इन्हीं हरकतों के कारण पहले ही अपनी पत्नी और बच्चों के साथ दूसरे शहर में शिफ्ट हो चुका था.

वह अपनी तनख्वाह का एक पैसा मां-बाप को नहीं भेजता था. तलाक के बाद अंजू को मुआवजे के रूप में शरद से बहुत कम पैसा मिलता था, क्योंकि शरद की तनख्वाह ज्यादा नहीं थी. ऐसे में अपना और अपनी बच्ची का खर्च चलाने के लिए अंजू को काम के लिए घर से बाहर निकलना पड़ा. वह खूबसूरत थी, लिहाजा काम तो उसे जल्दी ही मिल जाता था, मगर उसकी खूबसूरती और तलाकशुदा होना उसके लिए बड़ी मुसीबत बनती जा रही थी.

उसके बौस या मेल कुलीग्स को जैसे ही पता चलता कि वह तलाकशुदा है, वह उससे सेक्सुअल फेवर की मांग करने लगते. उससे सहानुभूति का नाटक करके उसकी नजदीकियां पाना चाहते. बीते तीन साल में अंजू पांच जगह नौकरी छोड़ चुकी थी.

अपनी बच्ची के साथ बरेली से लखनऊ शहर में आकर रहने और काम करने के पीछे भी कई वजहें थीं. बरेली में उसके मोहल्ले के कई आवारा लड़के, जो उसकी शादी से पहले उसकी खूबसूरती पर मरा करते थे, उससे छेड़छाड़ करते थे, उससे दोस्ती करने को ललायित रहते थे, तलाक के बाद उनके हौसले और बढ़ गये थे. आये-दिन वह गली से गुजरते समय उसे तंग करते, अश्लील इशारे करते, साथ चलने के औफर देते.

अगलबगल की लड़कियां और महिलाएं अब अंजू को देखते ही मुंह फेर लेती थीं, जैसे वह उस मोहल्ले के लिए कोई अपशगुनी हो. मोहल्ले के लोग उसको लेकर बातें बनाते थे. उस पर आक्षेप लगाते कि वह गलत होगी, तभी तो पति ने छोड़ दिया.

अंजू के पिता उसकी दूसरी शादी को लेकर चिन्तित थे. वह जल्दी से जल्दी इस बोझ से छुटकारा पाना चाहते थे. मंदिर के पंडित जी उनको तमाम रिश्ते सुझाते रहते थे, जिनमें अंजू की कोई दिलचस्पी नहीं थी. रिश्ते ढंग के होते तो वह एक बार सोचती भी, मगर तलाकशुदा लड़की और फिर एक बच्ची की मां के लिए तो ढंग का रिश्ता मिलना मुश्किल ही था. ज्यादातर अधिक उम्र के लोगों के रिश्ते आ रहे थे, या फिर ऐसे जो किसी न किसी तरह की अपंगता के शिकार थे. एक तो चार बच्चों के पिता थे, जो दूसरी शादी करने के इच्छुक थे, उम्र में अंजू के दोगुने थे. अंजू को ऐसे लोगों को देखकर घिन्न आती मगर अंजू के पिता के पास इतना पैसा तो था नहीं, कि भारी भरकम दहेज का लालच देकर किसी कुंवारे हैंडसम लड़के को अंजू का हाथ थामने के लिए तैयार कर लेते.ॉ

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इन सब बातों से परेशान होकर ही अंजू अपना शहर बरेली छोड़ कर लखनऊ आ गयी थी. यहां उसकी एक सहेली थी, जिसने उसे नौकरी दिलवाने का वादा किया था. उसने वादा पूरा भी किया. अंजू को एक नामी कोरियर कम्पनी में नौकरी मिल गयी, साथ ही कम किराये पर रहने के लिए ठीक-ठाक मकान भी उसने ढूंढ लिया. मगर अब यहां उसका बौस रजत शर्मा उस पर गलत निगाह रखने लगा था.

अंजू को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. वह बौस की हरकतों के खिलाफ अगर पुलिस में जाती है तो औफिस का कोई व्यक्ति उसका साथ देने को तैयार नहीं होगा. सबको अपनी नौकरी प्यारी थी. फिर कोई चश्मदीद भी नहीं था, जो इस बात की गवाही देता कि बौस ने उसके साथ कोई गलत हरकत की है.

आज अंजू को बार-बार अपने पति की याद आ रही थी. कितना प्यार करता था वह. कितनी सुरक्षित थी वह उसके साथ. उसकी तनख्वाह कम थी, मगर उसमें भी वह इस बात का पूरा ध्यान रखता था कि अंजू को किसी बात की कमी न हो. मगर अंजू ही उसे समझ न सकी.

मां और मामी के बहकावे में आकर वह अपनी सास-ननद को अपना दुश्मन मान बैठी, जबकि उसकी ननद घर के कामों में उसकी कितनी मदद करती थी. उसकी बेटी पैदा हुई तो छह महीने तक तो उसे किचेन का काम ही नहीं करने दिया था. सास भी कैसे अपनी पोती के लिए नये-नये डिजाइन के कपड़े और स्वेटर बुनने में लगी रहती थी, मगर अंजू उन लोगों का प्यार नहीं समझ पायी. उसकी आंखों पर तो मां और मामी की बातों की काली पट्टी चढ़ गयी थी. अब वह पछता रही थी. ये नौकरी भी छोड़ दी तो बच्ची के स्कूल की फीस कहां से देगी, मकान का किराया कहां से भरेगी? जब तक नयी नौकरी नहीं मिलती, घर का खर्चा कैसे चलेगा? नयी नौकरी मिलना भी तो आसान नहीं है. इस चिन्ता में वह रात भर जागती रही. सुबह आॅफिस जाने का उसका मन ही नहीं किया. बार-बार बॉस का घृणित चेहरा आंखों के आगे आ जाता और उसकी रीढ़ की हड्डी में सिहरन सी दौड़ जाती. कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था कि क्या करे?

अंजू की तरह की नासमझी आज आधुनिकता की ताल पर झूमती महिलाओं में खूब देखी जा रही है. इसको हवा देने में टीवी चैनलों पर चलने वाले सास-बहू नाटक भी खूब भागीदारी निभा रहे हैं. वहीं रिश्तेदार भी पति-पत्नी के रिश्ते खराब करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. बहुत जरूरी है कि तलाक लेने का फैसला बहुत सोच समझ कर लिया जाये.

खासतौर पर निम्न और मध्यमवर्गीय परिवार की लड़कियों को, जो आधुनिकता और अपने परिजनों के प्रभाव में आकर नये रिश्ते की बारीकियों को नहीं समझ पातीं. यह बात शत-प्रतिशत सत्य है कि अगर लड़की के मायके वाले उसकी ससुराल में दखलअंदाजी करने वालें हों तो ऐसी लड़कियों का वैवाहिक जीवन को नरक बनते देर नहीं लगती है. लड़कियों को समझना चाहिए कि जिस घर में वे ब्याह कर जा रही हैं, अब वही उनका घर है. वहां के लोगों को समझना, उनका सम्मान करना, उनकी सेवा करना उसका फर्ज है. वह अपना फर्ज पूरा करेगी, तो उस घर में उसे प्यार-दुलार, सम्मान और सुरक्षा सब कुछ मिलेगी. पति के साथ औरत को सुरक्षा मिलती है, मगर उसके बिना वह ऐसा खिलौना बन जाती है, जिससे हर ऐरा-गैरा खेलना चाहता है.

इसलिए तलाक कोई समाधान नहीं है. तलाक थोड़ी देर के लिए आजादी का अहसास जरूर कराता है, मगर बाद में वही औरत के लिए एक दाग बन जाता है.

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