मुंबई के जुहू होटल में सामान्य तरीके से एक शादी हो रही थी. तभी वहां अफरातफरी और भगदड़ मच गई. इस से पहले दूल्हा-दुल्हन कुछ समझ पाते वहां अभिनेता रणवीर सिंह बिन बुलाए मेहमान की तरह घुस आए. चूंकि उसी होटल में उनकी फिल्म सिम्बा का प्रचार इवेंट चल रहा था. और शायद वे अभी अपनी बिग बैंग मैरिज के हैंगओवर से बाहर नहीं निकले हैं सो अपने खिलंदड़ और बिंदास नेचर के हिसाब से पराए मंडप में घुस आए. हो सकता है उस परिवार को उनकी यह सरप्राइज विजिट अच्छी लगी हो, लेकिन सीधे तौर पर यह निजता का उल्लंघन ही है. वो भी तब जब सितारे अपनी शादी को एक्सक्लूसिव अफेयर बनाने के लिए दुनिया भर की सिक्योरिटी लगाते हैं और कोई बिन बुलाया न घुस पाए, इसके लिए बार कोड वाले स्पेशली डिजाइंड इनविटेशन कार्ड, एंट्री गेट पर मेहमानों से दिखाने के लिए कहते हैं.

पर जब अपनी बारी आती है तो कहीं भी घुस आते हैं. चाहे बेडरूम हो या शादी का मंडप. फिल्म प्रचार के तरीके बाजारू और अनोखे कहे जा सकते हैं लेकिन सभ्य कतई नहीं. काम धंधे को निजी समारोहों से दूर रखने का चलन हर जगह होता है. जिस कपल की शादी हो रही थी उसने भी चुनिन्दा लोगों को बुलाया होगा लेकिन रणवीर की अनचाही घुसपैठ से सारा माहौल फिल्मी हो गया और सबका ध्यान दूल्हा दुल्हन से हटकर सेलेब्रिटी पर आ गया. सभी गेस्ट उनकी तरफ दौड़ने लगे. मेहमान सेल्फी बाजी में मसरूफ थे और सिक्योरिटी भीड़ संभालने में. रणवीर को देखकर लोगों में अफरा-तफरी ने सारा मजा किरकिरा कर दिया. क्योंकि रणवीर तो अपनी शक्ल दिखा और सिम्बा का प्रचार कर पतली गली से निकल लिए लेकिन वहां की स्थिति काफी देर बाद सामान्य हो सकी. यह व्यवधान चाहें किसी सितारे का हो या हुड़दंगी का, फर्क नहीं दिखता.

बेडरूम में घुसपैठ

ऐसे ही एक बार मुझे एक फिल्म पीआर ने ऐसा परिवार जुटाने के लिए कहा जो फिल्म वेलकम बैक की टीम को अपने घर में वेलकम करे. प्रचार के लिए अपनाए गए इस हथकंडे में यह शर्त थी कि जिस घर में यह टीम आएगी वो फर्स्ट क्लास मेंटेंड हो, खानेपीने का शाही इन्तजाम हो और कई रिश्तेदार भी जमा कर लिए जाएं. इतनी शर्तें सुन कर मैंने तो मना कर दिया लेकिन उन्हें एक ऐसा परिवार मिल ही गया जो फिल्मवालों से मिलने के लिए कुछ भी करने को तैयार था. खैर, जब लम्बा इन्तेजार कराने के बाद फिल्म कास्ट वहां पहुंची और शक्ल दिखाकर अफरातफरी में भागी तो होस्ट फैमली बड़ी निराश हुई. उन्हें कुछ ज्यादा फुटेज की उम्मीद थी और पड़ोसी भी इस तमाशे में शरीक थे. लेकिन फिल्म वाले तो अपने हिस्से की टीवी बाइट्स और फुटेज लेकर चम्पत हो चुके थे जबकि वह फैमिली अपने सजने धजने और मोटे खर्चे पर सर पीट रही थी. आजकल इस तरह की पीआर एक्टिविटीज बहुत होती है जहां आम लोगों को बिजूके की तरह इस्तेमाल किया जाता है ताकि भीड़ जुट सके और उनके प्रोडक्ट का शोर मास तक पहुंच जाए.

पहले इस्तेमाल करें फिर…

एक और वाकया याद आ रहा है. मुंबई की एक पीआर प्रोफशनल (जो नवाजुद्दीन सिद्दीकी की मैनेजर थीं और फिल्म मांझी- द माउंटेन मैन का काम भी देख रही थीं) का फोन आया. उन्हें दिल्ली में फिल्म प्रचार इवेंट के लिए ऐसे देसी माउन्टेन मैन की जरूरत थी जिसने कुछ सामजिक सरोकार वाला अलहदा काम किया हो. एक मित्र ने राजेश शर्मा का नाम सजेस्ट किया. राजेश कई सालों से एक फ्लाई ओवर के नीचे गरीब बच्चों का स्कूल चला रहे हैं. जहां बच्चों को पढ़ाई और खाना मुफ्त में दिया जाता है. उन पर कई डाक्यूमेंट्री भी बन चुकी थीं, लिहाजा उनका नाम मैंने पीआर मोहतरमा को रिकमंड कर दिया. अब उन्होंने मुझे ही राजेश शर्मा को दिल्ली के उस होटल तक लाने की जिम्मेदारी दे दी जहां इवेंट होना था. खैर, मैं तय समय पर उन्हें लेकर पहुंचा गया लेकिन वहां जाकर पता चला की नवाज और उनकी मैनेजर अभी फ्लाईट में ही हैं. होटल की लौबी में उन सज्जन को मेरे साथ काफी इन्तजार करना पड़ा और जब फिल्म टीम आई तो एक हथौड़ा और टोपी पहनकर राजेश शर्मा को मंच से चलता कर दिया. यानी पब्लिसिटी टूल्स की तरह उनका इस्तेमाल किया और फिर दरकिनार कर दिया.

जाहिर है उन्होंने मुझसे निराशा जाहिर की और फिल्मवालों को संवेदनहीन बताते हुए इस बात की शिकायत की कि उन्हें अपने काम के बारे में ज्यादा बात करने का मौका नहीं मिला, सिर्फ फिल्म का शोर मचता रहा.

आंसुओं से भरें टीआरपी का टब

तो कुछ इस तरह से फिल्म के प्रचार में आम लोगों को पब्लिसिटी टूल्स के मानिंद इस्तेमाल किया जाता है. रियल्टी शोज में सितारा जज (करन जौहर, शिल्पा शेट्टी, किरण खेर, अनुराग बासु, मलाइका अरोड़ा, सलमान खान और अमिताभ बच्चन आदि) प्रतियोगियों से उनकी गरीबी के किस्से ग्लिसरीन लगवाकर जबरन सुनाने के लिए फोर्स करते हैं. छोटे बच्चों से 18-18 घंटे की शिफ्ट करायी जाती है. उनके पैरेंट्स को जबरन भीड़ में बिठाया जाता है और प्रोमो शूट के नाम पर ये उनके घर में तामझाम लेकर घुस जाते हैं. ताकि उनकी गरीबी और बदहाली दिखाकर उनके आंसुओं के पानी से टीआरपी का टब भरा रहे. ब्रांड एंडोर्समेंट, फिल्म क्विज, मीट द स्टार्स जैसे जुमले फेंककर कभी फिल्म के टिकट तो कोई प्रोडक्ट जबरन खरीदवाए जाते हैं और काम निकलने के बात तू कौन मैं कौन. पहले ये सितारे सिर्फ सिनेमाहौल्स तक सीमित थे तो बड़े-बूढ़े बच्चों को उस जगह से दूर रखते थे. फिल्मी मैगजींस भी तब के परिवारों में प्रतिबंधित साहित्य था. फिर टीवी आया और मनोरंजन लोगों के आंगन और ड्राइंग रूम तक पहुंच गया लेकिन जब से एडवर्टाइजिंग फैक्टर्स ने फिल्म बिजनेस को ओवरटेक किया तब से यह आम लोगों के बेडरूम में घुसने के लिए बेचैन रहते हैं.

प्राइवेसी में दखल और फैनेटिक कल्चर

अब जिस तरह से दीपवीर के पेज से खुराफाती पब्लिसिटी स्टैंड के वीडियो को रणवीर और फिल्मी दुनिया के फेमस फोटोग्राफर्स शेयर कर रहे हैं, उस से ऐसे प्रचार हथकंडों को लेकर और सितारे भी आगे आ सकते हैं. वैसे इसमें सारा दोष इनका भी नहीं है. सितारों की अंधभक्ति और उनको लेकर पागलपन ऐसा है कि सितारे भी उसे भुनाना चाहते हैं. अब उसे नवविवाहित कपल की बात कर लें जो रात को शाहरुख खान के बंगले की नेमप्लेट के आगे तस्वीर खिंचवाकर उनके घर को मंदिर बता रहे हैं. फैन्स कब फैनेटिक या ट्रोलर बन जायें और सितारे कब स्टाकर बन जाएं, कहा नहीं जा सकता.

हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि जो सितारे मैगी से लेकर अचार तक, और गद्दे से लेकर कंडोम तक बेचते-बेचते लोगों की प्राइवेसी में बिन बुलाये मेहमान की तरह टपक रहे हैं, यह गलत है. क्या दूसरे की निजता का कोई मतलब नहीं. ये वही सितारे हैं जो मीडिया को पैपराजी के लिए पानी पी पी कर कोसते हैं. लेकिन उसी मीडिया को साथ लेकर आम लोगों की जिन्दगी में अपने मुनाफे की पैपराजी करने से नहीं चूकते.

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