कुछ दिन पहले अचानक बाजार में तुलारामजी से भेंट हो गई तो वे बोले, ‘‘आप का भाग्य बहुत अच्छा है, तभी तो आप यहां मिल गईं. लीजिए, गोवर्धन का प्रसाद. सच मानिए, जिस ने भी यह प्रसाद पाया है उस के कष्ट दूर हुए हैं, इच्छा पूर्ण हुई है. एक बार आप गोवर्धन जा कर देखिए, उस स्थान की महिमा देखिए,’’ कहते हुए उन्होंने मेरे हाथ में प्रसाद के रूप में पेड़ा और मिस्री दे दी.

मेरे चेहरे पर अविश्वास के भाव पढ़ कर वे कुछ तल्खी से बोले, ‘‘जो हजारोंलाखों लोग वहां जाते हैं, वे क्या मूर्ख हैं? कुछ पाते हैं, तभी तो जाते हैं. चमत्कार को नमस्कार होता है.’’

बात आईगई हो गई. कुछ समय के बाद किसी कार्य को ले कर मेरा गोवर्धन जाना हुआ और वहां की भीड़भाड़ को देख कर मुझे अनायास तुलाराम की बात याद आ गई. कार्य समाप्त होने पर मेरे मन में उस स्थान की सही जानकारी लेने की जिज्ञासा हुई. वहां घूमफिर कर जो कुछ मैं ने देखा वही बातें मैं अपने पाठकों को शेयर कर रही हूं.

अभी घूमने का कार्य- क्रम शुरू ही किया था कि मेरे कानों में किसी की क्रोधयुक्त आवाज आई, ‘‘ऐ मैडम, आप जूते पहन कर इस पवित्र स्थल को अपवित्र क्यों कर रही हैं? अगर श्रद्धा नहीं थी तो आप यहां आई ही क्यों? पता नहीं क्यों, संस्कारों का तो लोगों ने जनाजा ही निकाल दिया.’’

इस टिप्पणी पर मुझे उस व्यक्ति पर क्रोध भी आया और उस की सोच पर तरस भी. खैर, आगे बढ़ने पर मैं ने देखा कि बड़ी संख्या में वहां बैठे भिखारी अलग- अलग तरीके से भीख मांगते हुए दान देने वाले को दुआएं दे रहे थे, ‘आप का बेटा जिए’, ‘सुहाग अमर रहे’, ‘तरक्की होवे’, ‘बस, 1 रुपए का सवाल है. परिक्रमा करने आए हो तो दान भी करते जाओ बाबू.’

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