Diksha Joshi : गुजराती फिल्म इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बनाने और ‘जयेशभाई जोरदार,’ ‘कौशलजी वर्सेस कौशल’ और ‘धड़क 2’ जैसी फिल्मों के साथ बौलीवुड में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के बाद दीक्षा जोशी अब सोनी सब के लोकप्रिय शो ‘पुष्पा इंपौसिबल’ में ‘दीप्ति’ के किरदार को परदे पर उतार रही हैं और टैलीविजन के दर्शकों का दिल जीत रही हैं.
इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई के बाद ऐक्टिंग की फील्ड में मुकाम बनाने वाली दीक्षा का जन्म नवाबों के शहर लखनऊ में हुआ था. बाद में उन का परिवार अहमदाबाद चला गया. उन के पापा हेम जोशी साइंटिस्ट थे और अब वे रिटायरमैंट के बाद यंगस्टर्स को पीएचडी की तैयारी के लिए गाइड करते हैं. उन की मम्मी रश्मि जोशी सोशल वर्कर थीं और अभी वे होममेकर हैं. स्कूली पढ़ाई पूरी कर उन्होंने सेंट जेवियर्स कालेज, अहमदाबाद से इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई की. फिलहाल वे मुंबई में रह कर अपने सपने पूरे कर रही हैं. वे बचपन से ही स्कूल में थिएटर और नाटक करती थीं. उन के मातापिता अपनी इकलौती बेटी का पूरा साथ देते थे.
दीक्षा जोशी ने करीब 10 के ऊपर गुजराती फिल्म की हैं. उन्होंने 3 हिंदी फिल्में भी की हैं. अभी वे अपना पहला हिंदी सीरियल ‘पुष्पा इंपौसिबल’ कर रही हैं. दीक्षा जोशी ने 2017 में फिल्म ‘शुभ आरंभ’ से अपनी शुरुआत की. उसी वर्ष उन्होंने 2 अन्य फिल्मों में काम किया. 2018 में ‘शरतो लागु’ में अपनी भूमिका के लिए उन्हें ‘जीआईएफए बैस्ट ऐक्ट्रैस’ का अवार्ड मिला. उन की अगली फिल्म ‘धुनकी’ थी, जिस में उन्होंने प्रतीक गांधी के साथ काम किया. 2020 में दीक्षा को ‘धुनकी’ के लिए ‘क्रिटिक्स चौइस फिल्म अवार्ड्स बैस्ट ऐक्ट्रैस (गुजराती)’ का पुरस्कार मिला. दीक्षा ने 2020 में रोमांटिक कौमेडी फिल्म ‘लव नी लव स्टोरीज’ में मुख्य भूमिका निभाई. उन्होंने 2022 में रणवीर सिंंह के साथ ‘जयेशभाई जोरदार’ से बौलीवुड में ऐंट्री ली. दीक्षा जोशी को 2023 में दादा साहब फाल्के फिल्म फाउंडेशन अवार्ड से सम्मानित किया गया था जो उन्हें एक फिल्म के लिए मिला था.
आइए, जानते हैं उन के बारे में विस्तार से:
गुजराती सिनेमा से हिंदी फिल्मों तक
मैं नौनगुजराती हूं पर मुझे गुजराती फिल्में करने में लैंग्वेज की इतनी प्रौब्लम नहीं हुई. दरअसल, कालेज के बाद जब मैं गुजराती फिल्म कर रही थी तो मैं ने प्रौपर गुजराती सीखी. इसलिए गुजराती फिल्मों के लिए बहुत से औडिशन भी दिए. रही बात हिंदी की तो हिंदी मेरी मदर टंग है. बचपन से हिंदी बोलती थी इसलिए हिंदी फिल्मों या सीरियल्स में वैसे ही मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई.
इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई और थिएटर
आई थिंक मेरा मेजर जो ऐक्टिंग को ले कर प्यार है वह इंग्लिश लिटरेचर की वजह से ही है. बचपन से ही मैं इंग्लिश प्लेज बगैरा बहुत पढ़ती थी. मुझे कहानियां बहुत पसंद थीं और कहानियों के उन किरदारों में अकसर मैं खुद को पाती थी. इसलिए मैं कहूंगी कि लिटरेचर ने ऐक्ट्रैस बनने के मेरे विजन में मेरी हैल्प की है. जितनी ज्यादा मैं पढ़ती हूं उतनी ही ज्यादा क्यूरियस ऐक्टर बन जाती हूं.
चरित्र की गहराई को अहमियत
मैं स्क्रिप्ट्स इस तरह से चुनती हूं कि अगर पहले मैं ने ऐसा कुछ काम नहीं किया है और कुछ अलग रोल है जो थोड़ा सा चैलेंजिंग भी है तो वह मैं जरूर चुनती हूं क्योंकि मुझे अलगअलग लोगों से ऐंपेथाइज करना अच्छा लगता है. मैं नहीं मानती कि इस दुनिया में कोई भी पूरी तरह से विलेन है या हीरो. ऐसा नहीं होता है. हर इंसान में पौजिटिव और नैगेटिव दोनों क्वालिटीज होती हैं. मुझे लगता है कि मुझे ऐक्टिंग भी इसलिए पसंद है क्योंकि यह बहुत हिम्मत वाली जौब है. आप किसी तीसरे काल्पनिक व्यक्ति के जीवन की चीजों को ऐक्सैस करने जा रहे हैं, उस की पौजिटिव और नैगेटिव हर चीज से फैमिलियर होने जा रहे हैं. फिर आप अपने थ्रू उसे व्यक्त करने वाले हैं. इसलिए स्क्रिप्ट चुनते समय कुछ नया किरदार मेरे लिए आता है जो मैं ने कभी नहीं किया है तो उसे जरूर करने की सोचती हूं.
फिल्मों में और सीरियल्स में पहला ब्रेक
मैं थिएटर भी करती थी और फिल्म्स के लिए औडिशंस भी दे रही थी. ऐसे ही एक औडिशन के जरीए मेरा सलैक्शन एक फिल्म में हो गया और फिर अन्य फिल्मों की मौके भी मिलते गए. सीरियल में भी ऐसा ही कुछ हुआ. जेडी भाई के साथ मैं ने एक वैब सीरीज गुजराती में की है जो कि अभी तक रिलीज नहीं हुई. पर वे मुझे जानते थे. मैं ने दीप्ति के कैरेक्टर हेतु ‘पुष्पा इंपौसिबल’ के लिए औडिशन दिया था जहां मेरा सलैक्शन हो गया. मैं अभी ‘पुष्पा पौसिबल’ मैं काम कर रही हूं, जिस में मैं दीप्ति पटेल का किरदार निभा रही हूं. दीप्ति पुष्पा की पहली बहू यानी बड़ी बहू है. इस सीरियल में मुझे बहुत अच्छा ऐक्सपीरियंस हो रहा है.

आज की औरत अपनी खोज खुद करे
मैं सच में चाहूंगी कि आज की औरत अपनी खोज खुद ही करे. कोई उसे बताने वाला नहीं होना चाहिए कि आप को ऐसा होना चाहिए या ऐसा करना चाहिए. मु?ो लगता है कि एक औरत अपनी खोज खुद ही करती है और खुद अपनी जर्नी में, अपनी लाइफ में जब वह प्रोटागोनिस्ट बनती है तो अपनेआप सुंदर तरीके से बाहर निकलती है. उस की पहचान बहुत
सुंदर होती है. उस समय वह भले ही कम बोलने वाली है या ज्यादा बोलने वाली या फिर बोल्ड है, नहीं है इन सब से कोई फर्क नहीं पड़ता. मुझे लगता है कि आज की औरत को अपनेआप से मिलना, खुद को पहचानना आना चाहिए और
यह अपनेआप में बहुत बड़ी विक्ट्री है. मैं यही चाहूंगी कि हर औरत अपनी जिंदगी का सफर अपने हिसाब से तय करे. कोई और बताए तो भी न सुने.
जीवन का प्रेरणास्रोत
मुझे बचपन से ही रिवौल्यूशनरीज ने बहुत ज्यादा इंस्पायर किया है. बचपन से ही मैं ने मार्टिन लूथर किंग के बारे में पढ़ा था. उन के अलावा डाइसकू इकेडा जो एक मैंटर हैं, उन की लाइफ के बारे में पढ़ा. ऐसे लोग जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के बैटरमैंट के लिए काम करते हैं मु?ो बहुत इंस्पायर करते हैं. मैं आगे जा कर खुद ऐसा ही कुछ करना चाहती हूं.
ऐक्टिंग की फील्ड में महिलाएं
ऐक्टिंग की फील्ड महिलाओं के लिए आसान नहीं है. यह फील्ड बहुत डिफिकल्ट और बहुत ज्यादा डिमांडिंग है. डिमांडिंग इस तरह से कि आप का मैंटली, फिजिकली हर तरीके से बहुत ज्यादा फिट होना जरूरी है ताकि आप धैर्य के साथ वेटिंग गेम खेल पाएं. मुझे लगता है कि इस दुनिया में सब से ज्यादा डिफिकल्ट अगर मिलिटरी के बाद कोई काम है तो वह यही है.
पहली बात यह है कि यहां महिलाओं को ज्यादा अच्छे मौके नहीं मिलते. जरूरी है कि महिलाओं के लिए ऐसे किरदार लिखे जाएं जिन में काफी शेड्स हों न कि केवल लव इंटरैस्ट. अगर ऐसे किरदार लिखे जाएंगे तो महिलाओं को काम कर के अच्छा लगेगा वरना वे एक सा ही किरदार निभा कर चली जाएंगी और उन्हें भूलना बहुत आसान हो जाएगा. भले ही वे टैलेंटेड हूं मगर उन का पोटैंशियल ही बाहर निकल कर नहीं आ पाएगा क्योंकि अकसर स्टोरीज ऐसी ही होती हैं. मैं खुश हूं कि मुझे इस तरह की कहानियां मिली हैं जोकि इंटरैस्टिंग वूमन कैरेक्टर रहे हैं.
दूसरी प्रौब्लम महिलाओं को जनरली यह आती है कि किस तरह से अपना रास्ता बनाएं. इस फील्ड में कास्टिंग काउच करने वाले लोग भी मिलते हैं. मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ है क्योंकि मैं जब बांबे आई थी तो एक फिल्म के साथ ही आई थी और एक हलकी सी बैकिंग मेरा गुजराती फिल्म की हमेशा से रही है. गुजरात में कास्टिंग काउच जैसा मुझे कभी भी फेस नहीं करना पड़ा और न ही वहां ऐसा कुछ होते हुए मैं ने सुना है. मुझे लगता है कि हर महिला को कहीं न कहीं इस फील्ड में आते समय एक डर रहता है. वैसे यह डर आदमियों को भी रहता है क्योंकि कास्टिंग काउच उन के साथ भी होता है. मगर एक औरत का तो बाई डिफाल्ट यह सिस्टम में ही आ जाता है कि ऐसे लोग मिलेंगे ही. उन्हें हटाते हुए कैसे आगे बढ़ना है और सिर्फ मेहनत से हमें जज किया जाए इस स्थिति तक कैसे पहुंचना है यह समझना जरूरी है. इस इंडस्ट्री में सही लोगों तक पहुंचना एक बहुत बड़ा स्ट्रगल हो जाता है.
तीसरी प्रौब्लम है कि औरतों को तुरंत ही लुक्स पर जज किया जाता है. ऐसे में जरूरी है कि वे अपनेआप के साथ कंफर्टेबल हो जाएं और किसी के कुछ बोलने का जिक्र न करें. मैं ऐसी दिखती हूं और मैं बहुत खुश हूं क्योंकि मेरे अंदर कुछ तो खास बात होगी. इस सोच के साथ अपनी ऐक्टिंग पर काम करते रहना और ऐक्टिंग को नींव बना लेना जरूरी है क्योंकि अगर लुक्स से खुद को भी जज करने लग गए और बाकियों से भी जज होते रहे तो मुझे लगता है एक टाइम के बाद लुक्स की नींव जो हम ने बनाई है वह तो क्रैश होने ही वाली है लेकिन अगर हम ऐक्टिंग को अपनी नींव बना लें तो मुझे लगता है आगे जाते हुए आप ग्रो ही होते रहेंगे. आप बूढ़ी हो जाए, आप के रिंकल्स आ जाए, आप के पूरे बाल सफेद हो जाएं, आप कैसी भी दिखें पर आप की ऐक्टिंग, लर्निंग और ऐक्सपीरियंस आप से कोई नहीं छीन सकता. आप के लुक्स तो डैफिनेटली आज नहीं तो कल चेंज होने ही वाले हैं. उस चेंज के साथ आप को कंफर्टेबल होना होगा. यह मेरे खुद के लिए भी एक चैलेंज रहा है.
महिलाओं की स्थिति पर राय
मैं तो बस यही कहना चाहूंगी कि इन जनरल महिलाएं बहुत सारा ट्रामा ले कर चल रही हैं. हमारे समाज में महिलाओं का ट्रामा बहुत पुराना है. सदियों पुराना. शायद पहली जो कम्युनिटी आई होगी धरती पर मु?ो लगता है यह ट्रामा उतना ही पुराना है. आज के समय पर भी ऐसा नहीं है कि महिलाओं की सिचुएशन कुछ बहुत ज्यादा चेंज हो गई है और भयंकर इक्वैलिटी आ गई है. हां अवेयरनैस डैफिनिटेली पहले से बहुत ज्यादा है. सोशल मीडिया की वजह से और जो रिसर्च हो रही हैं उन की वजह से. अब सोशल मीडिया की वजह से एक महिला अगर कुछ बहुत बेहतरीन करती है तो 5 लाख लोगों को तुरंत पता चल जाता है. दूसरी महिलाएं भी इस से प्रेरणा लेती हैं. अवेयरनैस फैली है. पहले के मुकाबले महिलाएं थोड़ी कौन्फिडैंट भी हुई हैं. मगर अड़चनें अभी भी हैं. अलग तरीके की हैं. ऐसा नहीं है कि आज की औरतों को कोई प्रौब्लम नहीं फेस करनी पड़ रही है या हम बहुत आगे आ गए हैं. प्रौब्लम्स तो हैं बस अलग तरीके की प्रौब्लम्स हैं. गुड थिंग इज अवेयरनैस फैल रही है. इस अवेयरनैस को लेना न लेना सोसाइटी के ऊपर है.
ऐक्टिंग के साथ पर्सनल लाइफ
अभी मैं सीरियल में बिजी रहती हूं फिर भी यह कोशिश जरूर करती हूं कि जिस दिन मैं फ्री हूं उस दिन अपने फैमिली मैंबर्स और फ्रैंड्स को समय दूं और उन से कनैक्ट करूं. ऐसे दिनों में मैं अपनेआप को भी समय देने की पूरी कोशिश करती हूं. मैं अपनी हीलिंग पर काम करती हूं. अपनी मैंटल और फिजिकल हीलिंग पर काम करती हूं, साथ ही प्रयास करती हूं कि स्लो डाउन होने पर भी काम करूं क्योंकि मुंबई का जीवन खासकर इस इंडस्ट्री में ओवरऔल एक रिदम है जोकि बहुत फास्ट है. इसलिए छुट्टी वाले दिन मैं स्लो डाउन होने पर काम करती हूं और इस तरह लाइफ में एक बैलेंस बनाने की कोशिश करती हूं.
आगे और क्या करने का सपना
मेरा पीएचडी करने का बहुत मन है और मु?ो लगता है मैं करूंगी. एक ऐक्टर की आइडैंटिटी में ही पूरी लाइफ रहने का थौट ही मेरे अंदर अनइजीनैस पैदा करता है. हमेशा से मु?ो लगता था कि मैं सिर्फ ऐक्टर नहीं हूं. बहुत कुछ है मेरे अंदर. मु?ो ऐसा लगता है मैं शायद टीचर बहुत अच्छी बन पाऊंगी. शायद मैं आगे जा कर रिसर्च पेपर्स लिखूं और फिल्में भी बनाऊं. डाइरैक्शन में भी इंटरैस्ट है. सिर्फ एक इंडस्ट्री ऐक्टर की तरह अपनी पूरी लाइफ को मैं इमेजिन भी नहीं कर सकती हूं. शायद इसलिए क्योंकि मेरी एक बैकग्राउंड लिटरेचर की रही है. मैं ने 5 साल दिए हैं उस सब्जैक्ट को. मेरे ट्वैंटीज में आप मु?ा से पूछतीं तो शायद मैं आप को कहती कि हां मुझे बेहतरीन से बेहतरीन कैरेक्टर्स करने हैं और पूरा जीवन ऐक्टिंग ही करनी है. पर अब मेरा नजरिया थोड़ा बदल चुका है. मुझे सिर्फ ऐक्टिंग ही नहीं करनी है. शौकिया ऐक्टिंग शायद करती रहूं मगर मैं समाज के लिए कुछ करना चाहती हूं. मेरी फैमिली की मुझे हमेशा से सपोर्ट रही ही है. मुझे ज्यादा लाइमलाइट भी पसंद नहीं. काम करती रहूं मगर कुछ शांत जीवन ज्यादा पसंद है.
जिंदगी का इमोशनल पल
मैं तो इंसान ही बड़ी इमोशनल हूं. किसी के भी साथ कुछ भी किसी भी तरीके का अन्याय जब देखती हूं तो बड़ा बुरा लगता है. अंदर से बौडी रिएक्टिव हो जाती है. अच्छा नहीं लगता है. रोना आता है बहुत ज्यादा. इनजस्टिस एक ऐसी चीज है जिसे मैं सह नहीं पाती हूं. दूसरी चीज है कहीं न कहीं पैट्रियार्की जो मुझे बहुत गुस्सा दिलाती है. पैट्रियार्की की बहुत सी चीजें हैं जो मुझे समझ नहीं आती हैं. जब से थोड़ा दिमाग खुला है, थोड़े राइटर को पढ़ा है और जो हमारे कालेज में भी जैंडर और लिटरेचर पढ़ाते थे. जब आप वे चीजें अपनी ट्वैंटीज में पढ़ते हैं तो बात आप को इतनी गहराई से समझ नहीं आती है. वे चीजें अब अपने थर्टीज में समझ आ रही हैं. जितना मैं औथेंटिक होना चाह रही हूं अपने जीवन में और बनना चाह रही हूं उतना ही मुझे पैट्रियार्की देख कर और ज्यादा गुस्सा आ रहा है.
जीवन की चुनौतियां और संघर्ष
मेरी जो चुनौतियां रही हैं मुख्य रूप से हैल्थ से ही रिलेटेड प्रौब्लम्स रही हैं जो बड़ी अड़चनें बन कर आई हैं क्योंकि कहीं न कहीं मुझे पता है कि मेरे अंदर आगे बढ़ने का पोटैंशियल बहुत है. मुझे दूसरों को भी आगे ले कर चलने की आदत है. मेरे अंदर स्वार्थ नहीं है. दूसरों को भी आगे ले कर चलने वाली भावना है. इसलिए अड़चनें भी उतनी ही तेजी से आती हैं.
मुझे लगता है मेरे जीवन का बिगैस्ट स्ट्रगल रहा है कि हाउ टू बिकम ए स्ट्रौंग पर्सन फिजिकली, मैंटली ऐंड इमोशनली. मुझे लगता है कि जब मैं यह ओवरकम कर लूंगी और एक स्ट्रौंग इंडिविजुअल बन जाऊंगी तब पूरी औथेंटिसिटी के साथ अपने रास्ते पर चल सकूंगी. अभी तो मैं समझने वाली स्टेज पर हूं. उस समझ को प्रैक्टिस में लाना है.
जीवन का मकसद
मेरे जीवन का मकसद यही है कि जो भी 20 से 40 साल तक की लड़कियां हैं वे जब मेरी फिल्म देखें, मेरी बातें सुनें या मेरे साथ कभी बैठें तो उन्हें यह फील न हो कि उन के मन में जो एक गुस्सा है सोसाइटी के प्रति वह इनवैलिड है. मैं वह इंसान बनना चाहती हूं जो उन की फीलिंग्स को वैलिडेट करे.
मेरे भाईबहन नहीं हैं. मां का नाम रश्मि जोशी और पिता का नाम हेम जोशी है. इस फील्ड में मेरा आना इसलिए संभव हुआ क्योंकि मैं औडिशन वगैरह देती रहती थी. थिएटर तो कर ही रही थी और साथ में अहमदाबाद में औडिशन भी दे रही थी. एकाध शौर्ट फिल्म भी की. उस के बाद इस फील्ड में आ गई. मैं लखनऊ में पैदा हुई थी और बड़ी हुई गांधीनगर और अहमदाबाद में और अभी मुंबई में रहती हूं. आगे कहां जाऊंगी यह नहीं पता मगर जिंदगी में हमेशा कुछ नया करते रहना चाहती हूं.
