दिसंबर की ठंडी सुबह के7 बज रहे थे. गलन और ठंडी हवा की परवाह किए बिना सुनीता कमरे का दरवाजा खोल बालकनी में निकल गई थी. कल के धुले सारे कपड़ों को छूछू कर देखा तो सब में सिमसिमाहट बाकी थी. एकएक कर के वह सारे कपड़ों को पलटने लगी.

मन ही मन वह सोच रही थी कि सूरज की कुछ किरणें अगर इन पर पड़ जाएंगी तो ये कपड़े सूख जाएंगे. इन्हें हटा कर आज के धुले कपड़ों को फैलाने की जगह बन जाएगी. इतने में देवरानी अनामिका हाथ में 2 कप चाय ले कर आ गई. कप पकड़ाते हुए उदास स्वर में अनामिका बोली, ‘‘दीदी पापाजी की आज की हालत देख कर डर ही लग रहा है. ऐसा लगता है कभी भी कुछ भी हो सकता है.’’

सुनीता ने उस के कंधे पर सांत्वना भरा हाथ रखते हुए कहा, ‘‘हिम्मत रखो, हम ने उन की सेवा में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी है.’’

दोनों ने मुंह में चाय का कप लगाया ही था कि पापाजी के कमरे से चीखपुकार सुन कर उधर की ओर भागीं. वहां जा कर देखा तो उन के पिता तुल्य ससुर रामाशीषजी अपनी अंतिम सांस ले चुके थे. जिस अनहोनी की आशंका से उन का पूरा परिवार 2 दिन पहले से ही उन के पास इकट्ठा हो चुका था वह घटित हो चुका था.

रामाशीषजी अपने पीछे 2 बेटे और 2 बेटियों का भरापूरा परिवार छोड़ गए थे. रामाशीषजी पिछले 6 महीनों से लगातार बीमार चल रहे थे और इन 6 महीने के बीच में उन्हें 5 बार अस्पताल में ऐडमिट करना पड़ा. लेकिन इस बार भरती करने के बाद भी उन की हालत में जब किसी प्रकार का कोई सुधार नहीं हुआ तो डाक्टर ने उन्हें घर पर ही रख कर उन की सेवा करने की सलाह दी. तभी से किसी अनहोनी की आशंका से उन के चारों बच्चे उन के पास इकट्ठे हो गए थे.

सच ही कहा गया है कि घर में यदि कोई एक बीमार हो जाए तो उस की देखभाल में पूरा घर बीमार होने लगता है. रामाशीषजी के बारबार अस्पताल में भरती होने की वजह से उन के बेटेबहू की भी दिनचर्या काफी अस्तव्यस्त हो गई थी. पहले का जमाना सही था. संयुक्त परिवार हुआ करता था. घर का कोई सदस्य बिस्तर पर भी पड़ जाता था तो कब और कैसे उस की सेवाटहल हो जाया करती थी किसी को एहसास तक नहीं होता था. पर आज तो रोजीरोटी के जुगाड़ में परिवार विभाजित हो कर अलगअलग स्थानों पर रह कर गुजरबसर करने को मजबूर हो गया है. ऐसी स्थिति में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

रामाशीषजी के भी दोनों बेटे अलगअलग प्राइवेट कंपनी में काम करते थे और दिल्ली और गुरुग्राम में फ्लैट ले कर रहते थे. मां की मृत्यु के बाद रामाशीषजी को भी बेटों ने आग्रह कर के अपने पास बुला लिया था. बनारस के अपने मकान का एक हिस्सा किराए पर उठा रामाशीषजी अपनी मरजी अनुसार कभी बड़े बेटे के यहां दिल्ली तो कभी छोटे बेटे के यहां गुरुग्राम चले जाया करते थे.

जब उन की तबियत खराब होना शुरू हुई तो उस समय वे छोटे बेटे के पास गुरुग्राम में थे. अत: वहीं के एक मशहूर अस्पताल में भरती कर उन के इलाज की प्रक्रिया शुरू कर दी गई. उन की बीमारी के 6 महीने की अवधि में उन के बेटेबहुओं की संपूर्ण दिनचर्या अस्तव्यस्त हो गई थी.

घर, अस्पताल, बच्चों की पढ़ाई और औफिस के बीच सामंजस्य बैठाना मुश्किल हो गया था. पर उन के बेटेबहू बड़े धैर्य के साथ इस परिस्थित से सामंजस्य बैठा रहे थे. बहुएं बारीबारी से सुबह घर का काम जल्दी निबटा कर अस्पताल पहुंच जाती थीं और शाम को उन के पति औफिस से आने के बाद रात में पिता के साथ अस्पताल में रुकते थे.

सुनीता चूंकि दिल्ली में रहती थी और उस के पति का औफिस भी दिल्ली में था, लिहाजा उन्हें दिल्ली से गुरुग्राम पिता के पास आने के लिए अलग मेहनत करनी पड़ती थी. यह कहने की बात नहीं है कि इस अवधि में बेटेबहू शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तीनों ही रूप से धीरेधीरे टूटते जा रहे थे.

रामाशीषजी के न रहने की खबर सुनते ही अड़ोसपड़ोस के लोग इकट्ठा होने लगे. रिश्तेदारों को भी फोन के द्वारा इस दुखद घटना की सूचना दे दी गई. आसपास के शहरों में रहने वाले रिश्तेदार भी 2-3 घंटों के अंतराल में पहुंच गए और अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू कर दी गई. 12 बजतेबजते घर के सदस्य रामाशीषजी के पार्थिव शरीर को ले कर अंतिम संस्कार के लिए चले गए.

उन्हें अंतिम बिदाई दे कर भारी मन से सुनीता और अनामिका घर में दाखिल हुईं तो दुख में शरीक होने अलीगढ़ से आई ताईजी और बुआजी ने मोरचा संभाला, ‘‘बहू, अब तुम लोग बैठना मत. पूरे घर की धुलाई करनी है तुम लोगों को.’’

‘‘ठीक है ताईजी, राधा आती ही होगी. धुलवा देती हूं पूरा घर उस से,’’ अनामिका ने कहा तो ताई सास बोल पड़ीं, ‘‘अरे नहीं बहू. घर की धुलाई बहुएं ही करती हैं, कामवालियां नहीं करेंगी आज यह काम. अनामिका ने प्रश्नवाचक निगाह से जेठानी सुनीता की ओर देखा तो उस ने इशारे से ताई सास की बात मान लेने को कहा और बोली, ‘‘तू बालटी में पानी ला और मग से डालती जा. मैं वाइपर से पानी खींचती जाती हूं.’’

अनामिका का थकाहारा शरीर जवाब दे रहा था. रोआंसी हो कर सुनीता से बोली, ‘‘यह क्या है दीदी, अगर घर राधा धो देगी तो क्या बिगड़ जाएगा? रोज तो वही झाड़ती है घर. सुनीता ने उसे चुप रहने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘चुपचाप ये लोग जो कहती जा रही हैं करती चलो वरना बात का बतंगड़ बन जाएगा बिना मतलब.’’

सुबह से ही घर के बच्चेबड़े किसी के मुंह में पानी का घूंट तक नहीं गया था. घर के बच्चों को तो अनामिका की सहेली वनिता ने अपने घर ले जा कर नाश्ता करा दिया था पर अनामिका और सुनीता ने तो पानी की बूंद तक नहीं डाली थी मुंह में. उन की मानसिक और शारीरिक दशा की परवा किए बिना उपस्थित बुजुर्ग महिलाएं उन्हें विधिविधान बताने की होड़ में लग गईं.

‘‘बहू घर धुलने के बाद तुम लोग बारीबारी से नहा लो. हां, ध्यान रखना, पहले बड़ी बहू नहाएगी उस के बाद छोटी. आज से 13 दिन तक तुम लोग साबुनशैंपू नहीं लगाना और न ही सिंदूर लगाना. ऐसा करने से ‘दोष’ होता है. 13 दिन तक बेटेबहूओं को दिन में केवल फलाहार खाना होगा और रात में दालचावल और उबली सब्जी.

ध्यान रखना है कि 13 दिन तक कुछ भी छौंकना नहीं है. दूधदही और पूरीपरांठे खाना भी पूरी तरह वर्जित है. इन 13 दिनों तक इन चीजों का सेवन करना ‘दोष’ माना जाता है. आज घर के अंदर चूल्हा नहीं जलाया जा सकता है अत: तुम लोगों को अपना भोजन बनाने के लिए घर के बाहर कहीं चूल्हा जलाना पड़ेगा और वहां जो खाना बनेगा वह केवल बेटेबहू ही खाएंगे और कोई नहीं खा सकता.’’

अभी तक बुजुर्गों की बात धैर्य से सुन रही सुनीता बोल पड़ी, ‘‘ताईजी चूल्हा घर में नहीं जलेगा तो कहां जलेगा? यह गांव नहीं, गुरुग्राम है हम बहुमंजिला इमारतों में रहते हैं. यहां घरों के आगेपीछे अहाता नहीं है, जहां हम चूल्हा जला सकें. यहां अपने फ्लैट के बाहर जूतेचप्पल रखने की भी इजाजत नहीं होती. ऐसा कुछ भी करने की कोशिश भी की तो सोसायटी वाले नोटिस थमा देंगे.’’

‘‘अरे, ऐसे कैसे नोटिस थमा देंगे? मरनाजीना किसी एक के यहां की बात थोड़े ही होती है. आज हमारे यहां है कल किसी और के यहां तो क्या सोसाइटी के डर से कर्मकांड छोड़ देंगे हम? ताईजी काफी रुष्ट होते हुए बोलीं तो सुनीता ने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘‘ताईजी सोसाइटी के कुछ नियम होते हैं. उन्हें हमें मानना ही पड़ता है. जो होना है घर के अंदर ही कर सकते हैं बाहर नहीं और अगर आप चाहती हैं कि चूल्हा न जले तो हम नहीं जलाएंगे बाजार से फल मंगा लेते हैं वही खा लेंगे हम सब.

‘‘हम सब क्यों? बेटी दामाद और बच्चों के खानेपीने में कोई ‘दोष’ नहीं होता है. वे सब कुछ खापी सकते हैं. उन्हें क्यों फल खिला कर रखोगी बुआजी ने अपना ज्ञान प्रकट किया.

‘‘बुआजी, एक तरफ कहा जा रहा है कि घर में चूल्हा नहीं जलाना है, दूसरी तरफ सब को फल ही खिला कर नहीं रखना है. आखिर हम करें तो क्या,’’ सुनीता का सर भन्ना गया.

‘‘भई हमारे यहां तो पड़ोसियों और रिश्तेदारों के यहां से बनबन कर इतना खाना आ जाता है कि घर वालों को कुछ सोचने की जरूरत ही नहीं रहती,’’ बुआजी को कुछ समझ में नहीं आया तो अपना सर झटकते हुए बोलीं.

‘‘बुआ यह हमारा गांव नहीं है. यहां आसपास हमारा कौन सा रिश्तेदार है जो इतने सारे लोगों का खाना बना कर दे जाएगा और जहां तक पड़ोसियों की बात है तो यहां यह सब नहीं चलता है. यहां हर औरत कामकाजी है वह अपने घर का ही खाना बना ले यही बहुत है.’’

सुनीता की बात सुन कर बुजुर्ग महिलाएं आपस में बातें बनाने लगीं. ननद रश्मि ने सुनीता को किनारे बुला कर कहा, ‘‘भाभी आप पहले जा कर नहाइए और कुछ खाइए. आप शुगर की मरीज हैं ज्यादा देर तक बिना खाए रहने से आप के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा. आगे क्या और कैसे करना है बाद में सोचते हैं.’’

सुनीता और अनामिका बारीबारी से नहा कर आ गईं. तब तक अनामिका के बगल में रहने वाली उस की सहेली केतली में चाय और कप ले कर आ गई. कप में चाय उड़ेलते हुए बोली, ‘‘पहले तुम लोग चाय पी लो नहीं तो तबियत खराब हो जाएगी.’’

कप की ओर बढ़ता सुनता का हाथ अचानक ताईजी की आवाज सुन कर रुक गया, ‘‘अरे, क्या कर रही हो तुम लोग? अभी बताया था न कि दूधदही का प्रयोग 13 दिन तक नहीं करना है तुम लोगों को. काली चाय पीनी है तुम लोगों को. दूध वाली चाय नहीं पी सकती तुम लोग. हां, बेटीदामाद को पीने में कोई दोष नहीं होता. वे पी सकते हैं.’’

एक तो महीनों की भागदौड़ से थकाहारा शरीर, उपर से पिता तुल्य ससुरजी के गुजरने का दुख और सुबह से भूखप्यास को दबाए सुनीता और अनामिका बुजुर्ग महिलाओं के बेसिरपैर के कर्मकांडों को सुनसुन कर अंदर ही अंदर कुढ़ती जा रही थीं. लेकिन ऊपर से खुद को सहज रखने की भरसक कोशिश कर रही थीं.

भाभियों के सामने से चाय का कप हटता देख ननद रश्मि से नहीं रहा गया. अपनी ताई और बुआ के पास जा कर बोली, ‘‘ताईजी, बुआजी, क्या बेटाबहू होना कोई गुनाह है? क्या आज पापा नहीं रहे तो इस में भैया या भाभी लोगों का कोई दोष है? उन्होंने कोई गुनाह किया है? उन के खानेपीने पर क्यों इतनी पाबंदियां बता रही हैं आप लोग? आप लोगों को जरा भी एहसास नहीं है इस बात का कि पिछले 6 महीने में पापा की देखभाल में इन लोगों ने अपना कितना स्वास्थ्य गंवा दिया है? किस युग में जी रही हैं आप लोग? पर आज के समय में इन बातों को लागू करने का न ही कोई तुक दिखता है न आज की परिस्थितियां हैं उन बातों को निभाने की.’’

भतीजी की बातें बुआजी को पसंद नहीं आई. बोलीं, ‘‘सुन रश्मि, चार अक्षर पढ़ लेने से तुम लोगों का तो दिमाग ही बदल गया है. सदियों से चली आ रही परंपराओं पर ही उंगली उठाने लग गई हो तुम लोग? अरे अगर परंपराएं बनीं हैं तो उन के पीछे कोई कारण तो होगा न.’’

‘‘कौन से कारण हैं यही तो मैं जानना चाहती हूं? हर एक से पूछती हूं पर कोई भी जवाब नहीं दे पाता. बस रट्टू तोता जैसा कि ऐसा करना दोष है, ऐसा नहीं करना चाहिए ही सब की जबान पर रटा रहता है. पर क्यों नहीं करना चाहिए, इस का जवाब किसी के पास नहीं है.

‘‘बताइए बुआजी कि ये परंपराएं क्यों बनी हैं? क्यों करना चाहिए हमें यह सब? आप लोग गर अपने तर्क से मेरे प्रश्नों को संतुष्ट कर दीजिए तो मैं नहीं कहूंगी. क्यों घर की बहुओं को ही घर धुलना चाहिए? अगर कामवाली घर धुल देगी तो क्या हो जाएगा? बहुओं को बड़ेछोटे के क्रम में क्यों नहाना चाहिए? साबुनशैंपू लगा कर नहा लेने से क्या अनर्थ हो जाएगा? दूध वाली चाय पी लेने से कौन सा अनिष्ट हो जाएगा?

‘‘घर में आज चूल्हा जल जाएगा तो क्या गलत हो जाएगा? छोटेछोटे बच्चे अपनी भूख दबाए बैठे हैं. क्या हम उन का पेट भरने के लिए औरों का मुंह ताकते रहें कि कोई ला कर दे तो हमारे बच्चों का पेट भर जाए और आप लोग यह क्या नियम बता रही हैं कि बेटीदामाद कुछ भी खापी सकते हैं. उन के खानेपीने में कोई दोष नहीं है. क्या बेटीदामाद को पिता के जाने का दुख नहीं होता कि वे जो चाहे करें और बेटेबहू अपराधी की तरह 13 दिन तक सजा काटें?’’

रश्मि के तर्कों का कोई जवाब नहीं था किसी के पास. ‘‘तुम पढ़ेलिखों को हम अनपढ़गंवारों की बातें दकियानूसी लगें तो लगें पर हमें जो सही लगता है हम ने बता दिया. हम तो बस इतना जानते हैं कि मृतआत्मा की शांति और मोक्ष प्राप्ति के लिए यह सब जरूरी है. पर तुम लोगों का जो जी चाहे करो,’’ कह कर ताईजी और बुआजी रजाई ओढ़ कर सो गईं.

माहौल बिगड़ता देख सुनीता ने रश्मि को समझाते हुए कहा, ‘‘रश्मि इस में इतना नाराज होने की बात नहीं है. जो परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं उन्हें तोड़ना इतना आसान नहीं होता. कुछ ही दिनों की तो बात है. निभा लेंगे जितना निभा सकेंगे. तुम हमारे लिए परेशान मत हो.’’

‘‘यही तो त्रासदी है भाभी हम लोगों की. हमआप जैसे पढ़ेलिखे लोग भी इन परंपराओं से सहमत न होते हुए भी ‘कुछ ही दिन की तो बात है’ सोच कर निभाते चले जा रहे हैं. अगर हम साहस नहीं करेंगे इन्हें तोड़ने की शुरुआत आखिर कौन करेगा?’’ रश्मि बोली.

‘‘अच्छा अभी यह बहस करने का समय नहीं है. अभी चलो यहां से. भैया लोगों को आने दो फिर बैठ कर समस्याओं का निदान करते हैं कि क्या और कैसे करना है,’’ सुनीता ने बात बदलते हुए कहा.

5 बजतेबजते घर के पुरुष सदस्य अंतिम संस्कार कर के वापस आ गए. ताईजी और बुआजी की चलती तो वे उन्हें बाहर ही नहाए बिना घर में प्रवेश नहीं करने देतीं. मगर कोई गुंजाइश न देख कर चुपचाप बैठी रहीं.

शाम हो आई थी. बच्चे अपनीअपनी मां के इर्दगिर्द कुछ खाने की इच्छा जताते हुए घूम रहे थे. सुनीता और अनामिका असमंजस की स्थिति में पड़ी हुई थीं. चूल्हा जलाने की इजाजत है नहीं और छोटेबड़े सभी भूख से बेहाल हो रहे हैं और वे लाचार थीं कि करें तो क्या करें.

महानगरीय जीवन में सदियों पुरानी परंपराओं के साथ तालमेल बैठा पाना और उसे निभा पाना किसी हाल में संभव नहीं हो पा रहा था. इस समय गांव में होतीं तो अब तक सचमुच अड़ोसपड़ोस और आसपास के रिश्तेदारों के यहां से इतना कुछ बन कर आ गया होता कि उन्हें किसी के खाने की कोई चिंता न रहती और अपने लोगों का उबला खाना वे बना लेतीं, कैसे भी.

सुनीता और अनामिका को स्वयं ही निर्णय लेना होता तो वे परिस्थितियों के अनुसार परंपराओं से हट कर कुछ न कुछ रास्ता निकाल ही लेतीं. मगर जब घर में बुजुर्ग महिलाएं उपस्थित थीं और परंपराओं को मानने का दबाव बना रही थीं तो सामंजस्य बैठाना मुश्किल हो रहा था. पुरुष सदस्यों के आने के बाद मिलजुल कर स्थान, परिस्थिति और परंपराओं के बीच तालमेल बैठाते हुए उन सब ने यही निर्णय लिया कि बड़ेबुजुर्ग जो कह रहे हैं, जहां तक संभव हो उस का पालन करने की कोशिश कर ली जाए ताकि अपने मन में किसी तरह का पश्चाताप न रह जाए.

अत: यह निर्णय लिया गया कि चूंकि विधान के अनुसार बेटेबहुओं को उबला भोजन करना चाहिए और वह खाना घर के अन्य सदस्यों को नहीं खाना चाहिए तो ऐसी दशा में बाकी सब के लिए होटल से खाना मंगा दिया जाए और सादा खाना किचन में ही बना लिया जाए, क्योंकि इस के अलावा और कोई विकल्प नहीं है.

बात गले तो नहीं उतर रही थी पर कोई अन्य विकल्प न देख कर बुआ और ताईजी ने भी बेमन से ही अपनी सहमति दे दी. दिन भर के भूखे सुनीता और अनामिका के पति और उन के बच्चे जब रात को ताईजी के बताए विधान के अनुसार जमीन पर दक्षिण दिशा की ओर मुंह

कर के खाना खाने बैठे तो उन्हें अपने सामने परोसा उबला खाना किसी व्यंजन से कम नहीं दिख रहा था. सुनीता के बेटे ने पूछा, ‘‘मां रोटी नहीं है क्या?’’

बुआजी ने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘नहीं बेटा, अभी 13 दिन तक तुम लोग रोटी नहीं खा सकते हो.’’

‘‘लेकिन क्यों बुआ दादी? मैं तो चावल खाता ही नहीं हूं.’’

‘‘बेटा ‘दोष’ होता है.’’

‘‘दोष होता है? भला रोटी खाने में कैसा दोष? रोटी तो हम रोज ही खाते हैं.’’

‘‘वह तुम अभी नहीं समझोगे. ये बातें तुम्हें बड़े होने पर समझ में आएगी. अभी खा लो खाना चुपचाप.’’

‘‘बड़े हो कर भी कुछ समझ में नहीं आएगा बेटा. बस लकीर के फकीर की तरह लकीर पीटते चलोगे तुम भी.’’ बुआ से अब तक नाराज बैठी रश्मि उन्हें घूरते हुए बोली.

सच ने पहला कौर उठाया ही था कि ताईजी की आवाज आई, ‘‘आज तुम लोग एक बार में थाली में जितना ले लोगे उतना ही खा सकते हो. दोबारा कुछ नहीं ले सकते.’’ ताईजी की बात सुनते ही सब का बढ़ा हुआ हाथ रुक गया तो भूख से परेशान अपनेअपने पति और बच्चों को देख सुनीता और अनामिका के मुंह से एकसाथ निकल पड़ा, ‘‘हद है अंधविश्वास की.’’

‘‘देखो बेटा, जब तुम्हारी मां गुजरी थीं तब तुम्हारे पापा जीवित थे. उन्हें प्रत्येक विधिविधान की जानकारी थी. इसलिए हम निश्चिंत थे और उस ने विधिपूर्वक सारे कर्मकांड पूरे किए थे तुम्हारी मां की आत्मा की शांति के लिए. पर आज हमारी जिम्मेदारी है कि हम तुम्हें उन सारे कर्मकांडों के बारे में बता दें जो तुम लोग करोगे अपने पिता को बैकुंठ धाम में शांतिपूर्वक स्थापित करने के लिए,’’ ताईजी हिदायत देती हुई बोलीं.

‘‘बताइए ताईजी क्याक्या करना होगा हमें?’’ सुनीता के पति ने ताईजी को अपने बगल में बैठने की जगह देते हुए कहा.

‘‘बेटा, विधि के अनुसार तो जो बेटा मुखाग्नि देता है उसे उसी दिन पीपल के पेड़ पर एक घट बांधना चाहिए. उस के बाद रोज सुबहशाम उसी वृक्ष के नीचे स्नान कर के घट में पानी भरना होता है. पर यहां आज यह नहीं कर पाए हो तो कल सुबहसुबह ही तुम्हें यह काम करना पड़ेगा. फिर आज के 10वें दिन बेटे और पोतों के बाल बनवाए जाएंगे और महापात्र को भोजन करा कर उन्हें दानदक्षिणा दे कर खुश करना होगा. 13 दिन ब्रह्मभोज कराना होगा और 16 पंडितों को भोजन करा कर दानदक्षिणा दे कर विदा करना होगा,’’ ताईजी बोलीं.

‘‘ये सब करने से क्या फायदा मिलेगा ताईजी? पापा को वापस ला देंगे ये पंडित लोग?’’ सुबह से खार खाई बैठी रश्मि फिर से बोल ही पड़ी.

‘‘तू तो चुप ही कर रश्मि. पढ़लिख लेने का मतलब यह नहीं होता है कि सारी पुरानी मान्यताओं का महत्त्व मानने से इनकार करने लग जाए. तेरे पापा की जरूरत की हर चीज अगर ब्राह्मण को दान में दी जाएगी तो वह स्वर्ण में तेरे पिता को ही मिलेगी. किसी चीज के लिए उन की आत्मा भटकेगी नहीं.’’

‘‘कब आएंगी आप लोग इन अंधविश्वासों से बाहर ताईजी? इतने ही सिद्ध होते हैं ब्राह्मण और इतनी ही शक्ति है उन के अंदर तो जब पापा दर्द से तड़प रहे थे तब किसी ब्राह्मण के पास उन्हें ले जाने की सलाह क्यों नहीं देती थीं आप लोग? तब तो फोन कर के यही पूछा करती थीं कि किस डाक्टर को दिखा रहे हो?’’

‘‘ताईजी, मेरी समझ में यह बात आज तक नहीं आई कि इन ब्राह्मणों के अंदर सारी शक्तियां किसी इंसान के खत्म हो जाने के बाद ही क्यों आती हैं कि यहां उन्हें दान दो और वे अपनी शक्ति से ऊपर पहुंचा देंगे मृतआत्मा के पास.’’

रश्मि की बात सुन कर सुनीता और अनामिका तो मंदमंद मुसकराने लगीं. पर ताईजी और बुआजी नाराज हो गईं.

रात को किसी की आंखों में नींद नहीं थीं. एक तरफ पिता को खोने का दुख और बेचैनी थी तो दूसरी तरफ तमाम कर्मकांडों से निबटने की व्यवस्था की चिंता हो रही थी. 13 दिन तक औफिस और स्कूल जाना भी वर्जित था.

सब ने बैठ का खर्चों का बजट बनाया तो कुल खर्चे लाख रुपए के ऊपर जाता देख सब के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं.

सुनीता के पति ने सब को धैर्य बंधाते हुए कहा, ‘‘अब जो करना है सो करना ही है चाहे जैसे भी. मेरा एक फिक्स डिपौजिट है उसे मैं तोड़ दूंगा तो पैसों का इंतजाम हो जाएगा. उस की चिंता न करो पर यह सोचो कि अब यह घट कहां बांधेगे?’’ छोटे भाई ने हैरानी से कहा, ‘‘भैया, जरूरी है यह सब करना? आप भी जानते हैं मैं भी जानता हूं कि यह सब बेसिरपैर की बातें हैं.’’

‘‘छोटे, कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिसे यह जानते हुए भी कि ये अर्थहीन हैं हमें करना ही पड़ता है. ये कर्मकांड जैसी अनेक मान्यताएं उन में से ही एक हैं.’’

‘‘यही तो हमारी त्रासदी है भाई कि हम सब पढ़ेलिखे लोग अच्छी तरह समझ तो चुके हैं कि ये कर्मकांड, मृत्युभोज और ब्राह्मणों का दानदक्षिणा सब कुछ छलावा है. फुजूल की बातें है पर फिर भी हम इन्हें ढोए जा रहहे हैं, सिर्फ इसलिए कि लोग हम पर उंगली न उठा सकें.’’ इस बार रामाशीषजी के दामाद ने अपने मन की बात कही.

उस के बाद सब कुछ जानतेसमझते हुए और दिल से सहमत न हुए बिना भी लाखोंकरोड़ों लोगों की तरह रामशीषजी के बेटेबहू भी बनेबनाए ढर्रे पर चल पड़े और परिस्थितिनुसार क्रियाकलापों में तोड़मरोड़े कर कर्मकांड निबटाने की तैयारी में जुट गए.

दूसरे दिन घर से 3 किलोमीटर की दूरी पर पीपल का वृक्ष तलाश कर उस में घट बांध दिया गया और रोज सुबह ठंड को झेलते हुए वहां जा कर अपने ऊपर ठंडे पानी के छींटे डाल कर यह मानते हुए कि स्नान कर लिया. घट में पानी डाल कर आने का कार्यक्रम चलता रहा. इस से उन के पिता को किसी प्रकार की सुविधा या शांति मिली स्वर्ग में, यह तो वे आज तक नहीं जान पाए. मगर ठंड लगने से सुनीता के पति को तेज बुखार जरूर आ गया.

बुआजी और ताईजी ने कहा कि चूंकि रामाशीषजी का पूरा जीवन बनारस में ही व्यतीत हुआ था, इसलिए अंतिम कार्य ‘तेरही’ को बनारस से ही संपन्न कराया जाए, जिस में ब्राह्मणों को भरपेट  भोजन करा कर उन्हें दक्षिणा में चारपाई, बिस्तर, कपड़े, चप्पलें, राशन और वह हर वस्तु जो रामाशीषजी को पसंद थी या उन के जीवनकाल में उन के लिए उपयोगी थी, दे कर संतुष्ट कर के बिदा किया जाए तो ये सारी वस्तुएं स्वर्ग में रामाशीषजी को ही मिलेंगी और उन की आत्मा को असीम शांति मिलेगी.

कोई उन पर उंगली न उठा सके और उन के ‘सुपुत्र’ होने पर शक न कर सके, इस भय से रामाशीषजी के बेटे पंडितों और बड़ों द्वारा कही बातों का निर्विरोध पालन करते चले जा रहे थे.

13वें दिन बनारस में उन के घर पर सुबह से ही रिश्तेदारों का आनाजाना शुरू हो गया. बेटे सुबह से ही पंडित के निर्देशानुसार मंदिर, नदी के घाट और घर के आंगन में विधिविधान और कर्मकांड संपन्न कराने में लगे रहे. बहुएं और बेटीदामाद हर आनेजाने वाले के आवभगत में कोई कमी न रह जाए यह खयाल करते रहे.

रामाशीषजी के बेटेबहू और बेटीदामाद चूंकि पढ़लिखे और सही समझ रखने वाले थे इसलिए उन का यह मानना था कि दान गरीब और जरूरतमंद को देना चाहिए. इसलिए उन्होंने आसपास के स्थानों से गरीब और लाचार

स्त्रीपुरुष और बच्चों को इकट्ठा कर के उन्हें सम्मानपूर्वक भरपेट भोजन करा कर एकएक कंबल दान में दिया. कड़ाके की सर्दी भरपेट गरमगरम खाना खा कर और गरम कंबल पा कर वे इतने खुश हुए कि जिन्हें शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.

विधिविधान पूरा करतेकरते सुबह से दोपहर हो गई. 16 ब्राह्मणों को भरपेट भोजन कराने के बाद उन्हें दानदक्षिणा दे कर बिदा कर दिया गया और मुख्य ब्राह्मण को चारपाई, बिस्तर, कपड़े, चप्पलें, राशन, सब्जी, छाता, छड़ी आदि तमाम वस्तुओं के साथ सोने का तार भी दान में दिया गया. घर में प्रत्येक सदस्यों ने कुछ न कुछ नगद उन के चरणों में अर्पित कर उन के चरण स्पर्श किए और उन के प्रति अपनी अपनी कृतज्ञता व्यक्त की.

ब्राह्मण को बिदा करते वक्त उन के चेहरे पर असंतोष का भाव देख कर बड़े बेटे ने कारण जानना चाहा तो नाखुश होते हुए उन्होंने कहा, ‘‘इस बार आप के यहां से दानदक्षिणा से संतुष्ट नहीं हुआ. पहले इस से ज्यादा मात्रा में दक्षिणा मिला करती था मुझे इस घर से.’’

बुजुर्गों की इच्छानुसार जिन ब्राह्मणों को खुश कर के अपने पिता को तारने के प्रयत्न में बच्चों ने अपना कीमती समय और लाखों रुपए, समय बिना सोचसमझे खर्च कर डाला वे इस तरह मुंह बना कर चले गए यह देख कर सब का मुंह उतर गया.

शाम को बाजार की तरफ से वापस आ कर रामाशीषजी के घर के बुजुर्ग चौकीदार को सुनीता के पति के कान में कुछ कहते देख कर सभी उत्सुकतावश उन के पास इकट्ठे हो गए तो चौकीदार ने बताया कि उस ने अपनी आंखों से उन ब्राह्मणों को दान में मिली सामग्रियों को दुकानों पर बेच कर बदले में पैसे ले कर जाते हुए देखा है.

जानतेसमझते भी हम सब मक्खियां निगलते रहेंगे और हमें अंधविश्वास की आग में झोंकझोंक कर ये पंडित उस की आग में अपनी रोटी सेंकते रहेंगे. हम पढे़लिखे हो कर भी गलत परंपराओं का त्याग कर देने का साहस करने के बजाय कर देने में हरज ही क्या है जैसी सोच के साथ अंधविश्वासों को बढ़ावा देते रहेंगे तो हमारे जैसा दया का पात्र कोई और हो नहीं सकता.

‘आखिर बदल पाने का साहस कब कर पाएंगे हम?’ मन ही मन ऐसा सोचते हुए सब चुपचाप वापसी की तैयारी में लग गए.

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