Hindi Moral Tales  : महक की विदाई हो रही थी. मां का साया न होने की वजह से पिता उसे भरे गले से समझा रहे थे, ‘‘अपनी गृहस्थी संजो कर रखना और सभी को प्यार देना.’’

तभी रजनी भाभी ने अपनी ननद महक को गले लगाते हुए ताना सा मारते हुए कहा, ‘‘अब वही तेरा घर है. सभी को इज्जत देना और वहीं मन लगाना.’’

फिर अपने दोनों भाइयों रोहित व मोहित और दूसरे सगेसंबंधियों से मिल कर महक विदा हो गई.

मोहित को अपनी बहन से बहुत प्यार था, इसलिए वह उस के विदा होने पर उदास हो गया था. महक की यह तीसरी शादी थी. वह जानता था कि अगर महक अपने मायके रहती तो भाभियां उसे जीने न देतीं, इसलिए वह चाहता था कि उसे हर खुशी मिले.

रात को सोते समय मोहित महक की पुरानी यादों में खो गया था.

महक की पहली शादी एक अमीर परिवार में रितेश के साथ हुई थी.

2 ननदों व एक देवर से भरापूरा परिवार था. रितेश कारोबारी था. अमीर घराना था. 2 साल बाद ही महक की जिंदगी में एक नन्ही परी आई थी. समय जैसे पंख लगा कर उड़ रहा था.

8 सालों में दोनों ननदों की शादी हो गई और देवर अपने भाई के साथ कारोबार में हाथ बंटाने लगा. तभी अचानक रितेश की हार्टअटैक से मौत हो गई. महक के लिए यह दर्द सहन करना मुश्किल हो गया था. वह रितेश को बहुत प्यार करती थी, इसलिए वह डिप्रैशन में चली गई.

कुछ समय बाद सास ने महक के भाइयों को बुला कर कह दिया, ‘महक गुमसुम सी हो गई है. वह अपनी बेटी का भी ध्यान नहीं रख पाती है. तुम कुछ दिनों के लिए उसे अपने साथ ले जाओ.’

भाई महक को मायके ले आए. महक अपनी बेटी परी को भी अपने साथ लाना चाहती थी लेकिन सास ने स्कूल का वास्ता दे कर उसे अपने पास रख लिया.

तकरीबन एक महीने बाद जब मोहित अपनी बहन को छोड़ने ससुराल पहुंचा तो दरवाजे पर ताला लगा पाया. पड़ोसियों से पूछने पर मालूम हुआ कि वे लोग तो मकान बेच कर वहां से जा चुके हैं.

यह सुन कर महक रोने लगी. मोहित उसे समझाबुझा कर वापस घर लाया. इस सदमे ने उसे और भी तोड़ दिया था. बहुत ढूंढ़ने पर भी वे लोग नहीं मिले.

महक की दोनों भाभियां ऊपर से तो हमदर्दी जताती थीं, पर वे चाहती थीं कि वह जल्द ही यहां से विदा हो जाए.

एक दिन महक की भाभी रजनी के दूर के रिश्ते का भाई नीरज घर आया. वह विधुर था. वह 9 साल के एक बेटे बंटी का पिता था.

एक दिन नीरज अपनी मुंहबोली बहन रजनी से कहने लगा, ‘हमारे यहां शादी तो दोबारा नहीं होती, पर चुन्नी चढ़ा कर लड़की को विदा कर देते हैं.’

हालांकि मोहित इस शादी के लिए तैयार न था, पर रजनी भाभी के आगे किसी की एक न चली.

वहां ससुराल में बंटी ने महक को मां के रूप में स्वीकार नहीं किया. दिनरात झगड़े होने लगे. एक महीना भी न गुजरा था, महक अपने मायके लौट आई.

इस तरह एक साल बीत गया. एक दिन एक रिश्ता करवाने वाली औरत ने हर्ष नाम के लड़के की बात छेड़ी. उस ने बताया कि हर्ष प्राइवेट नौकरी करता है. घर में सिर्फ उस की मां है. वह ज्यादा अमीर नहीं है.

हर्ष ने महक को देखते ही पसंद कर लिया. उस ने बताया कि एक हादसे में उस की पत्नी व बेटे की मौत हो चुकी है. अगर महक से शादी होगी तो वह उसे खुश रखेगा.

मोहित ने भी हर्ष को महक की पिछली जिंदगी के बारे में बताया, पर हर्ष ने सभी को अपना पिछला भूल कर आगे बढ़ने की सलाह दी…

मोहित यह सब सोचतेसोचते यादों से बाहर आया और सो गया.

महक ससुराल पहुंची. 2 कमरों का छोटा सा मकान था. सास सरला पुराने विचारों की थीं, इसलिए सुबह जल्दी उठना, घर की साफसफाई करना, फिर नहाधो कर पूजापाठ के बाद ही खाना बनाना उन की दिनचर्या में शामिल था.

‘‘देख महक, तुझे भी इसी तरह जल्दीजल्दी सारे काम करने होंगे,’’ सास उसे समझाने लगीं.

हर्ष के काम पर चले जाने के बाद सास टैलीविजन पर सत्संग लगा कर महक से कहतीं, ‘‘भगवान में जितनी लगन लगाओगे उतनी ही जल्दी वह सुनता है. देखना, तुम्हारी भी कोख भगवान जल्दी भरेंगे. मुझे तो बस एक पोता चाहिए.’’

महक बेमन से सत्संग सुनने बैठ जाती.

समय बीतने लगा. हर्ष के जन्मदिन पर महक ने प्यार से कहा, ‘‘आज रविवार है और तुम्हारा जन्मदिन भी है. तुम मुझे कहीं घुमा लाओ.’’

‘‘अच्छा चलो, चलते हैं. तुम जल्दी से तैयार हो जाओ.’’

महक व हर्ष दोनों जब तैयार हो कर घर से बाहर निकलने लगे, तब सास सरला कहने लगीं, ‘‘मैं अकेली घर पर रह कर क्या करूंगी, मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूं.’’

इस पर महक खीज गई. हर्ष प्यार से उसे समझाने लगा, ‘‘देखो, वे बड़ी हैं. हमें उन्हें पूरा मानसम्मान देना होगा.

तुम्हें मुझ से बात करनी है तो कमरे में कर लेना.’’

फिर बुझे मन से महक घूमने गई.

इसी तरह कभीकभी सासबहू में बहस हो जाती तो हर्ष ही समझौता कराता.

शादी का एक साल बीतने के बाद भी जब महक मां न बनी तो सास ने कहा, ‘‘तुम कहीं बांझ तो नहीं हो? सच बताओ, अगर तुम्हें बच्चा नहीं हो सकता तो हमें बता दो, हमें कुछ और सोचना पड़ेगा.’’

‘‘पर मांजी, मेरे पहले भी बच्चा हो चुका है.’’

‘‘पर, अब तो नहीं हुआ न. देखो अगर कुछ समय और तुम्हें बच्चा नहीं हुआ तो तुम अपने मायके जा कर ही बैठना.’’

रात में महक ने रोते हुए हर्ष को सारी बात बताई.

‘‘देखो, तुम शांत रहा करो. मां से बहस मत किया करो. हो सके तो तुम कल ही अपने मायके चली जाओ.’’

‘‘मैं वहां नहीं जाऊंगी. भाभियां ताने मारती हैं.’’

‘‘अरे, समझा करो, वहां तुम किसी डाक्टर से अपना इलाज करा लेना,’’ हर्ष उसे प्यार से समझाता रहा.

सुबह घर के काम खत्म करने के बाद हर्ष महक को बसस्टौप पर छोड़ कर चला गया.

महक मायके न जा कर अपनी सहेली रितु के घर पहुंच गई.

रितु ने बड़ी गर्मजोशी के साथ महक का स्वागत किया. चाय पीते हुए रितु ने बताया कि अगर बच्चा न हुआ तो सास उसे घर से बाहर निकाल देगी.

‘‘अबे यार, विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है और तू अपना ही रोना रो रही है. मेरी पहचान की एक डाक्टर है. तू कल चल मेरे साथ. मैं तेरी समस्या का हल चुटकी में निकाल दूंगी.’’

अगले दिन महक को ले कर रितु डाक्टर के पास गई. उस ने कुछ टैस्ट किए. 3-4 दिन बाद ही डाक्टर ने बताया कि महक को बच्चा होना नामुमकिन है.

यह सुनते ही महक क्लिनिक के बाहर बैठ कर रोने लगी.

कुछ देर बाद रितु बाहर आई और बोली, ‘‘देखो, तुम्हारे रोने से बात नहीं बनेगी. तुम मुझे हर्ष का फोन नंबर दो. मुझे उस से कुछ बात करनी है.’’

शाम को हर्ष रितु के घर आया. रितु ने हर्ष को चायपानी के दौरान कुछ बातें समझाईं और इस परेशानी से निकलने का रास्ता भी समझा दिया.

हर्ष रितु की बातें समझ गया, इसलिए वह महक को कभीकभार रितु के घर छोड़ देता और मां से कहता कि वह उस का डाक्टरी इलाज करा रहा है.

एक दिन हर्ष ने महक से कहा, ‘‘तुम मां से कह दो कि खुशखबरी है. आगे मैं संभाल लूंगा.’’

महक ने सास से दादी बनने की बात कही तो वे खुशी से झूम उठीं, ‘‘देखा, मैं न कहती थी कि सत्संग से भगवान जल्दी सुनता है. अब तुम ज्यादा घूमाफिरा मत करो.’’

अब सरला अपनी बहू का ध्यान रखने लगीं. 5 महीने बीतने के बाद ही महक को अपना सामान बांधते देख सास ने पूछा, ‘‘तुम कहीं बाहर जा रही हो?

‘‘हां मां, महक अपने मायके जा रही है,’’ हर्ष ने कहा.

‘‘लेकिन बेटा, उसे अभी इस हालत में इतनी जल्दी वहां क्यों भेज रहा है? वहां इस की भाभियां ध्यान नहीं रख पाएंगी.’’

‘‘मां, मैं जानता हूं, पर तुम्हें कैसे समझाऊं. बड़ी उम्र में प्रैंग्नसी के दौरान कुछ खास इलाज की जरूरत होती है, इसलिए उसे बारबार डाक्टर के यहां जाना पड़ेगा,’’ ऐसा कह कर हर्ष महक को ले कर चला गया.

रितु ने महक को बताया, ‘‘मेरे कहने पर हर्ष ने सैरोगेट मदर की है. वह

9 महीने बाद तुम्हें बच्चा सौंप देगी. तुम पर किसी को शक न हो, इसलिए तुम्हें यहां बुलाया है.

‘‘लेकिन, इतना समय यहां रह कर मैं क्या करूंगी?’’ महक ने पूछा.

‘‘अरे, घूमोफिरो, अपनी पसंद की फिल्में देखो. यहां सास का डंडा नहीं है,’’ फिर वे दोनों हंस पड़ीं.

उधर सरला बारबार हर्ष से महक को वापस लाने को कहतीं, ‘‘देख बेटा, मैं उस से कोई काम नहीं कराऊंगी. उसे पूरा आराम दूंगी. बस, तू उसे यहां ले आ.’

‘‘मां, तुम कुछ नहीं समझती हो. डाक्टर ने उसे मुझ से दूर रहने को कहा है ताकि केस खराब न हो.’’

‘‘अच्छा, यह बात है. तू ने पहले क्यों नहीं यह बात बताई. चल, जैसी तेरी मरजी.’’

और फिर वह दिन भी आया, जब उस सैरोगेट मदर ने एक बेटे को जन्म दिया. उस ने हर्ष को फोन पर बताया. फिर हर्ष ने उसे समझौते के मुताबिक पैसे दिए.

कुछ दिन बाद हर्ष व महक अपने बेटे के साथ घर में आ गया.

सरला ने आशीर्वाद देते हुए अपनी बहू व पोते का स्वागत किया.

कमरे में जाते ही महक हर्ष लिपट गई, ‘‘तुम ने जो ये खुशी के पल मुझे दिए हैं, वे मेरे लिए अनमोल हैं.’’

लेखक- दीपा गुलाटी

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