लेखिका- अनामिका अनूप तिवारी

शाम को जब सभी भाई गली में क्रिकेट खेल रहे होते, मां, चाचियां रसोई में और

दादी ड्योढ़ी में बैठी पड़ोस की महिलाओं से बात कर होतीं, मुझे अच्छा समय मिल जाता छत पर जाने का... उम्मीद के मुताबिक सुमित मेरा ही इंतजार कर रहे होते... संकोच और डर के साथ शुरू हुई हमारी बात, उन की बातों में इस कदर खो जाती... कब अंधेरा हो जाता पता ही नहीं चलता.

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