पंडित अंबाप्रसाद सवेरे जल का लोटा ले कर सूर्य देवता को अर्पण करने जब छत पर पहुंचे तब उन के पड़ोसी केदारनाथ बेचैनी से छत पर चहलकदमी कर रहे थे. केदारनाथ यूनियन के नेता थे और यह चहलकदमी भी कोई नई बात नहीं थी. पंडित अंबाप्रसाद पड़ोसी का हाल बेहाल देख कर मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए, पर प्रकट रूप में सूर्य को नमस्कार कर, श्रद्धा से जल अर्पण कर और उच्च स्वर में ‘हरिओम’ की गुहार लगा कर पड़ोसी से बोले, ‘‘तो अभी तक कुछ फैसला नहीं हुआ आप की यूनियन का?’’

केदारनाथ, अंबाप्रसाद के मन की बात ताड़ते हुए निश्ंिचतता की मुद्रा में बोले, ‘‘फैसला भी हो जाएगा, अंबाप्रसादजी, हमारे खिलाफ तो फैसला होने से रहा. आप को तो पता ही है, यह ट्रेड यूनियन का युग है. यूनियन के आगे अच्छेअच्छे घुटने टेक देते हैं. फिर यह तो जरा सा मामला है.’’

अंबाप्रसाद भी पड़ोसी से हार मानने के लिए तैयार नहीं थे. कुछ सोचविचार कर उन्होंने आंखें गोल कर गोपनीय बात कहने के अंदाज में केदारनाथ से धीरेधीरे कहना शुरू किया, ‘‘देखो, भाई साहब, यह तो ठीक है कि ट्रेड यूनियन का जमाना है और यूनियन में बड़ा दम होता है, पर आप की नामराशि के ग्रहयोग ठीक नहीं हैं, इसलिए कुछ उपाय कर लीजिए वरना सफलता मिलने में संदेह है.’’

केदारनाथ मुसकरा कर बोले, ‘‘पंडितजी, हमारी और निदेशक महोदय की नामराशि एक ही है, हम केदारनाथ और वह केहरीसिंह. जो होगा, देखा जाएगा. उपाय करने से ही क्या होगा?’’

अंबाप्रसाद छत से नीचे उतर आए. कौन इस दुष्ट के मुंह लगे और सवेरेसवेरे अपना मन खराब करे. शाम को वैसे भी पंडित दुर्गाप्रसाद का तार आया था, आने वाले ही होंगे. संदेश में आने का प्रयोजन तो लिखा नहीं, फिर क्या पता चले कि क्या बात है? पर जरूर कोई खास बात होगी, जो तार द्वारा अपने आने की सूचना भिजवाई है.

अंबाप्रसाद अपनी गद्दी पर बैठ कर कुछ यजमानों के वर्षफल निकालने लगे. कई दिनों से हाथ बड़ा तंग चल रहा था. कोई जन्मकुंडली दिखाने वाला पहुंचे तो बात बने.

अंबाप्रसाद अभी अपना काम भी खत्म नहीं कर पाए थे कि बाहर आटोरिकशा के रुकने की आवाज हुई. उन्होंने खिड़की का परदा उठा कर बाहर झांका, पंडित दुर्गाप्रसाद आ पहुंचे थे. अपनी कागज- पोथी सब समेट कर अंबाप्रसाद ने अलमारी में रख दी और आगंतुक का स्वागत करने मुख्यद्वार की तरफ बढ़ गए.

दुर्गाप्रसाद काफी कमजोर लग रहे थे, पर उन की आवाज अभी उसी तरह जोश भरी थी. कुशलक्षेम और औप- चारिकता के पश्चात दुर्गाप्रसाद अपने आने के प्रयोजन पर पहुंच गए. वह गंभीर स्वर में बोले, ‘‘अंबाप्रसाद, अब ब्राह्मण परिषद के गठन का समय आ गया है. अब हर कोई यह जानता है कि आज का युग ट्रेड यूनियन का युग है. समाज का हर वर्ग अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित हो चुका है, सिर्फ ब्राह्मण समाज ही है जो चारों तरफ बिखरा पड़ा है और इसी लिए उसे यजमानों की दया पर निर्भर रहना पड़ता है.’’

अंबाप्रसाद, दुर्गाप्रसाद का वक्तव्य सुन कर हैरत में आ गए. मन में सोचने लगे, ‘तो क्या अब ब्राह्मणों की भी ट्रेड यूनियन बनेगी?’ पर वह सहमति में सिर हिलाते हुए बोले, ‘‘यह बात तो आप की अक्षरश: सत्य है.’’

‘‘हम ब्राह्मण सदियों से आपस में द्वेष रखते हैं. एक ब्राह्मण दूसरे को देख कर ऐसे गुर्राता है जैसे गली में दूसरे कुत्ते को देख कर कुत्ता. मुझे तो यह कहते भी शर्म आती है कि मेरा पड़ोसी मिसरा गुनगुनाता रहता है कि ‘ब्राह्मण, कुत्ता, नाऊ, जाति देख गुर्राऊ’,’’  दुर्गाप्रसाद बोले.

अंबाप्रसाद को भी अपना पड़ोसी याद आया, जो उन के पांडित्य का लोहा नहीं मानता, बस राजनीतिक जोड़तोड़ में लगा रहता है. उन्होंने दुर्गाप्रसाद की बात का समर्थन करते हुए कहा, ‘‘हमारे शहर में ब्राह्मणों ने एक ब्राह्मण परिषद बना रखी है, जिस के अध्यक्ष पंडित भवानीसिंह हैं. आप कहें तो उन के पास चल कर अखिल भारतीय ब्राह्मण सम्मेलन का आयोजन करने की चर्चा करें?’’

दुर्गाप्रसाद को यह युक्ति जंच गई. वह तुरंत चलने को तैयार हो गए. दुर्गाप्रसाद ने भवानीसिंह से हुई पहली ही मुलाकात में यह भांप लिया कि आदमी बड़े जीवट का है और असरदार भी. दुर्गाप्रसाद की हर बात भवानीसिंह ने बड़े ध्यान से सुनी और यह सुझाव दिया कि एक विशाल भारतीय ब्राह्मण सम्मेलन बुलाया जाए और ब्राह्मणों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों की एक दर सूची बना दी जाए. इस से यजमानों में भी ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा भाव उत्पन्न होगा और ब्राह्मणों की गलाकाट स्पर्धा के कारण, जो यजमान कभीकभी सत्यनारायण की कथा करवा कर दक्षिणा में चवन्नी ही टिकाते हैं, उन की भी आंखें खुलेंगी.

अंबाप्रसाद और दुर्गाप्रसाद ने इस प्रस्ताव का जोरदार स्वागत किया. भवानीसिंह ने अगले ही दिन अपनी योजना को कार्यान्वित करना शुरू कर दिया और दसों दिशाओं में ब्राह्मणों को निमंत्रण भेजे जाने लगे. सभा का आयोजन सनातन धर्म कालिज के हाल में किया गया. पहली बार ब्राह्मण सम्मेलन हो रहा था.

दूरदूर से ब्राह्मण लोग इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए पधार रहे थे. उन की छटा देखते ही बनती थी. आधुनिकता का रंग चढ़े हुए ब्राह्मण पैंटबुशर्ट में थे तो कुछ कुरतेपाजामे में. कुछ पुरातन परंपरा- वादी धोतीकुरते में थे और कुछ पगड़ी व बगलबंदी में दिखाई पड़ रहे थे.

सभा के आरंभ में संयोजक अंबाप्रसाद ने ब्राह्मण परिषद की आवश्यकता पर जोर दिया और ट्रेड यूनियन के महत्त्व को समझाया, तत्पश्चात भवानीसिंह ने अध्यक्ष पद की गरिमा को देखते हुए अपना भाषण शुरू किया, ‘‘भाइयो, दूरदूर से पधारे ब्राह्मणों का मैं हार्दिक स्वागत करता हूं. हम लोग आज यहां पर एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य से एकजुट हुए हैं. यजमानों की मनमानी से बचने के लिए विभिन्न अवसरों पर हमें यजमान से क्या शुल्क (दक्षिणा) लेना चाहिए इस के निर्धारण के लिए गठित प्रवर समिति के सभी निर्णयों पर काफी विचार हो चुका है. अब इस दर सूची की एकएक प्रतिलिपि सभी आगंतुक महानुभावों को अर्पित की जा रही है. इसे देख कर आप सब अपनीअपनी सहमति से हमें अवगत कराएं.’’

दर सूची की एकएक प्रतिलिपि सब को बंट चुकी थी. अगली पंक्ति में बैठे नवयुवक ब्राह्मण उस को पढ़ कर फूले नहीं समा रहे थे. वे प्रफुल्लित स्वर में बोल रहे थे, ‘‘वाह, इसे कहते हैं एकता में बल. देखा, नामकरण संस्कार की शुल्कदर पिता की संपत्ति का 20वां हिस्सा यानी 5 प्रतिशत, पाणिग्रहण संस्कार की दक्षिणा दहेज का 10 प्रतिशत, गृहप्रवेश का शुल्क मकान के मूल्य का 5 प्रतिशत, कथावाचन के 51 रुपए, जन्मकुंडली के 101 रुपए.’’

‘‘अरे, इसे कहते हैं यूनियन बना कर रहना. आज ट्रेड यूनियन का जमाना है. बस, भैया, गरीबी के दिन लद गए, पंडितों ने आज पहली बार अपनी आवाज उठाई है,’’ एक गद्गद स्वर उभरा.

‘‘अजी, पंडित जन्म से ले कर मृत्यु तक और उस के बाद भी पिंडदान, श्राद्ध आदि कर्म करवा कर मनुष्यों का उद्धार करवाते हैं, किंतु दानदक्षिणा की तुच्छ सी रकम पाने वाले हम लोग यजमान के आगे कैसे असहाय नजर आते हैं,’’ एक बोला.

‘‘अपनी ग्रहदशा जान कर यजमान भविष्य सुधार कर लाखों रुपया कमाते हैं और हमें चवन्नी पकड़ा देते हैं,’’ एक पंडित तलखी से बोला.

एक नवयुवक ब्राह्मण जो पुरोहिताई के धंधे में नएनए जम रहे थे, इस सूची का समर्थन करते हुए चीख रहे थे, ‘‘यह सूची ब्राह्मण कर्म के उपयुक्त है. इस में छपी हुई दरों के मुताबिक ही सब पुरोहित एक जैसी दक्षिणा यजमानों से वसूलें. जो इस कानून को तोड़ेगा उस का जातीय बहिष्कार किया जाएगा.’’

नवयुवकों के पीछे बूढ़े पुरोहित पंडित राधेश्याम ने शांति से कहा, ‘‘वत्स, दानदक्षिणा की कोई दर तय नहीं होती. यह तो यजमान की आर्थिक स्थिति और श्रद्धा पर निर्भर करती है. यह दर तालिका कोरी भावुकता है, अव्यावहारिक है.’’

पंडित द्वारिकाप्रसादजी ने भी बुजुर्ग पंडित की बात का समर्थन करते हुए कहा, ‘‘ऊंची फीस लेने वाले वैद्य, डाक्टर, वेश्या और वकील हमेशा मक्खियां ही मारा करते हैं. कोई ग्राहक उन के पास नहीं फटकता.’’

पंडित जगन्नाथप्रसाद ने कुरसी छोड़ कर खड़े होते हुए अपनी धोती की लांग ठीक की और सख्त आवाज में कहा, ‘‘ब्राह्मण सम्मेलन का उद्देश्य क्या ब्राह्मण कर्म के लिए प्रस्तावित दर सूची पारित करना ही था? ब्राह्मणों के लिए शिक्षा या अन्य सुविधाएं जुटाने का कोई प्रस्ताव इस सम्मेलन के पास नहीं है?’’

पंडित द्वारिकाप्रसाद भी आक्रोश में उठ कर खड़े हुए, ‘‘यह भवानी हमेशा अपनी नेतागीरी दिखाता है. इस तरह की दरें नियत कर यह हमें भूखों मार देगा. यजमान का मुंह देख कर ही दक्षिणा मांगी जाती है. आज के वैज्ञानिक युग में वैसे भी सारी पंडिताई धूल में मिलती जा रही है. इस तरह तो एक दिन ऐसा आ जाएगा जब पंडितों को कोई घास भी नहीं डालेगा.’’

जो नवयुवक पुरोहित दर सूची को पारित करवाने के लिए जोर दे रहे थे, ऐसे भाषण सुन कर तिलमिला उठे. उन्हें सुनहरे भवन ढहते जान पड़े. वे द्वारिकाप्रसाद की बात पर चिढ़ कर चिल्लाते हुए बोले, ‘‘आप यह घास डालने की बात किसे कह रहे हैं? हम लोग क्या कोई जानवर हैं?’’

‘‘चुप बे, सड़कछाप बरुए, हमारे आगे बोल रहा है,’’ पंडित जगन्नाथप्रसाद सब शिष्टाचार भूल कर तूतड़ाक पर उतर आए. पंडित जगन्नाथप्रसाद के बोलते ही पीछे से किसी ने फटा हुआ जूता मंच पर फेंक कर मारा. संयोजक अंबाप्रसाद मंच से चीखे, ‘‘अरे, यह कौन असामाजिक तत्त्व हाल में घुस आया? पकड़ो, पकड़ो बदमाश को.’’

घड़ी भर में ही सभाभवन का वातावरण बदल गया, ‘‘मारो इन बदमाशों को, चले हैं यूनियन बनाने. मारो…मारो.’’

तरहतरह की आवाजों के साथ मंच पर चप्पलजूतों की बौछार शुरू हो

गई. गेंदे और गुलाब के फूलों से सजा मंच क्षण भर में जूते- चप्पलों से भर गया. संयोजक अंबाप्रसाद और अध्यक्ष भवानीसिंह कब दुम दबा कर मंच से खिसक गए, यह किसी को पता नहीं चला और ब्राह्मण परिषद भंग हो गई. द्य

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