गृहशोभा विशेष

नारी के साथ बलात्कार व हत्या के मुद्दे पर एक बोल्ड व विचारोत्तेजक फिल्म ‘‘मातृ’’ में अभिनय करने के बाद से अभिनेत्री रवीना टंडन ने अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं समझ लिया है. वह इस मुद्दे पर लगातार काम करते रहना चाहती हैं. इसी के चलते हाल में रवीना टंडन ने केंद्रीय महिला विकास मंत्री मेनका गांधी को भी पत्र लिखा.

इस संबंध में खुद रवीना टंडन कहती हैं, ‘‘जिस दिन मैंने अखबार में एक ही दिन में पूरे देश के अलग अलग शहरों में पांच बलात्कार की खबरें पढ़ी, उसी दिन मैंने उन खबरों की कटिंग के साथ केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी को पत्र लिखा कि अब तो कड़क कानून बनाए जाएं. आखिर वह महिला विकास मंत्रालय की मंत्री हैं. मैंने उनसे निवदेन किया कि वह कानून में बदलाव करें, जिससे लोगों के अंदर डर पैदा हो. निर्भयाकांड होने के बाद ही हमने ज्युविनाइल लॉ में बदलाव किया. इस पर उन्होंने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है. पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकारी काम किस गति से होते हैं. देखिए, कहीं भी बलात्कार की घटना घटित होती है, तो मेरा खून खौल उठता है. इसलिए मैं लोगो में जागरूकता लाने के लिए लगातार प्रयास करते रहना चाहती हूं.’’

वह आगे कहती हैं, ‘‘निर्भया कांड से किसी ने कोई सबक नहीं सीखा. चार दिन पहले जब सुबह मैंने अखबार उठाया था, तो अलग अलग शहरों में मिलाकर पांच महिलाओं के साथ बलात्कार किए जाने की खबरें थी. कलकत्ता में आठ साल की बच्ची, बंगलुरु में तीन साल की बच्ची, दिल्ली में पांच साल की बच्ची मुंबई में तो एक पॉश कॉलनी में अधेड़ उम्र की महिला व दिल्ली में एक अस्सी साल की औरत के साथ बलात्कार हुआ. आखिर हम कब तक इस तरह की खबरे पढ़कर आंख मूंदे रहेंगे.’’ 

रवीना टंडन आगे कहती हैं, ‘‘मैं प्रचार के लिए कोई काम नहीं करती. मगर हम फिल्म बनाकर एक संदेश दे सकते हैं, पर उस संदेश को लोगों तक पहुंचाना मीडिया का काम है. पत्रकारों का काम है. यदि पत्रकार नहीं होंगे, तो मैं अपने घर में कुछ भी चिल्लाती रहूं, उसका कुछ असर नहीं होगा. मैं इसलिए लोगों से कहती हूं कि फिल्म ‘मातृ’ में मैंने जो संदेश देने की कोशिश की है, उसे आम लोगों तक पहुंचाने का काम मीडिया करे.’’

बलात्कारियों की चर्चा करेत हुए रवीना टंडन कहती हैं, ‘‘जो अपराधी होते हैं, वह बचपन से ही इस ढंग का अपराध करते हैं. वह बचपन में कुत्ते या बिल्ली को पत्थर मारकर या उनकी पूंछ पकड़कर खींचते हुए इंज्वॉय करते हैं. यह जो क्रूरता है, वह धीरे धीरे उनके दिमाग में बैठती जाती है. धीरे धीरे यही लोग अपने इंज्वॉयमेंट के लिए दूसरों को कष्ट देना शुरू करते हैं. ऐसे ही बच्चे स्कूल में अपनी कक्षा के सहपाठियों को परेशान करते हैं. फिर यह लड़कियों को छेड़ते हुए इंज्वॉय करते हैं. धीरे धीरे इनका मनोबल बढ़ता रहता है और फिर यह बलात्कार व हत्या की घटनाओें को अंजाम देने लगते हैं. इसलिए हर मां को चाहिए कि वह अपने बेटों पर बचपन से ही नजर रखते हुए उन्हें इस तरह की हरकते न करने के लिए समझाए. हमें अपने बेटों को बचपन से सिखाना चाहिए कि उसे दयालु होना है. हर इंसान खासकर लड़कियों और औरतों की इज्जत करनी है.’’

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