छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 45 किलोमीटर दूर स्थित राजिम शहर को देवालयों की नगरी भी कहा जाता है क्योंकि यहां जहां भी आप की नजर जाएगी कोई न कोई मंदिर जरूर नजर आएगा. राजिम की तुलना छत्तीसगढ़ के लोग प्रयाग से करते हैं क्योंकि यहां राज्य की 3 प्रमुख नदियों पैरी-महानदी-सोढूर का संगम होता है.

दक्षिण कोसल के नाम से भी प्रसिद्ध राजिम प्राचीन सभ्यता के लिए तो जाना ही जाता है, संस्कृति और कलाओं के महत्त्व के लिहाज से यह शहर इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और कलाप्रेमियों के आकर्षण व जिज्ञासा का विषय हमेशा से रहा है.

छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के अथक प्रयासों के चलते अब बड़ी तादाद में सैलानी भी यहां आने लगे हैं. खासतौर से हर साल आयोजित होने वाले मेले राजिम कुंभ में तो देशभर से लोग यहां आते हैं. यहां विदेशी पर्यटकों का दिखना एक सुखद अनुभूति है. यह आयोजन प्रतिवर्ष माघ महीने की पूर्णिमा से प्रारंभ हो कर महाशिवरात्रि पर संपन्न होता है.

छत्तीसगढ़ की गंगा कही जाने वाली नदी महानदी के किनारे बसे प्रमुख शहरों में से एक राजिम को ले कर किवदंतियों की भरमार है. शिलालेखों का यहां अपना अलग ऐतिहासिक महत्त्व है. रतनपुर के कलचुरी राजा नरेश जाजल्य प्रथम एवं रत्नदेव द्वितीय की युद्घविजयी गाथाएं इन शिलालेखों में उल्लिखित हैं.

भारतीय स्थापत्यकला और मूर्तिकला के इतिहास में छत्तीसगढ़ अंचल का योगदान क्या और कितना है, यह राजिम स्वयं सिद्घ करता है. सामान्य सर्वेक्षणों में राजिम में बड़ी तादाद में मृण्मय अवशेष मिलते हैं जिन के आधार पर यहां के सांस्कृतिक अनुक्रम का अनुमानित कालक्रम निर्धारित होना संभव हो पाया.

राजिम के देवालयों के निर्माण का समय 7वीं से ले कर 14वीं शताब्दी के बीच हुआ, ऐसा माना जाता है. प्रसिद्घ राजीव लोचन मंदिर का भूविन्यास महामंडप, अंतराल गर्भगृह और प्रदक्षिणापथ 4 भागों में बंटा हुआ है. राजिम के कुछ स्थानों पर शाल भंजिका की भी मूर्ति है. कहींकहीं खजुराहो जैसे आलिंगनबद्घ मूर्तियां भी दिखती हैं.

राजिम कुंभ, पर्यटकों को यहां के इतिहास के बारे में जानने का बड़ा मौका भी होता है. रायपुर से बस या टैक्सी द्वारा राजिम आसानी से पहुंचा जा सकता है.