Storytelling : चौराहे पर रैड लाइट होने पर अपने पति की नई एक्टिवा में पीछे बैठे हुए जैसे ही उस ने नजर घुमाई तो अपनी बगल वाले स्कूटर में एक हमउम्र को देख कर उस के तनमन में एक सिहरन सी उठी. मस्तिष्क पर एक लहर सी महसूस की उस ने जैसे बरसात के दिनों में आसमान में बिजली की रेखा चमकती है.
क्या यह किसी तूफान का संदेश है? यह सोचसोच कर वह पसीनापसीना हो गई. बत्ती हरी हो गई और सारे वाहन फुरती से निकलकर अपनेअपने रास्ते हो लिए. किसी अपराधी की तरह वह नजरें बचाबचा कर इधरउधर देखती. आसपास उस स्कूटर वाले को न पाकर फिर आश्वस्त हो जाती.
‘‘मैं ने उसे सही पहचाना या यह मेरी नजर का धोखा था?’’ वह अपने आप से सवाल करती. वह कामना करती कि यह उसकी नजर का धोखा ही हो पर उस का शक अब यकीन में बदल गया था.
‘‘सब्जी मंडी की ओर चलें क्या?’’ रमन 2 बार पूछ चुका था मगर उसका ध्यान कहीं और था.
ऐक्टिवा की स्पीड धीमी कर उसे साइड लगा कर जब रमन रुक गया तब उसे ध्यान आया कि रमन कुछ पूछ रहा है. हूं हां करने में उस ने अपनी पोल खुद ही खोल दी.
‘‘क्या सोच रही हो, क्या हुआ?’’
‘‘कुछ नहीं बस. कल शाम पापा की बीमारी का जो फोन आया था, वहीं ध्यान चला गया.’’
‘‘इतवार आने दो, जा कर देख आएंगे पापा को. मैं ने गगन से बात की है. वह बता रहा था कि हालत कंट्रोल में है.’’
और फिर रमन ने स्कूटर सब्जी मंडी की तरफ मोड़ दिया. दिन का समय था. भीड़भाड़ कम थी. पिछले 2 दिनों में अचानक पारा बहुत उछल गया था. लोग सुबह जल्द ही सब्जी मंडी की तरफ निकल जाते. हालांकि सुबहसुबह भीड़ बहुत होती लेकिन सब्जी ताजा मिल जाती और सब से बड़ी बात धूप का प्रकोप नहीं सहना पड़ता.
उषा के मन में पुरानी बातें चलचित्र की तरह दौड़ रही थीं. ऐसा नहीं कि उसे पुराने
दिन इस से पहले कभी याद नहीं आए. बीचबीच में किसी न किसी बहाने ये घटनाएं उस के जीवन में दखल देने को आ जाती थीं पर वह बड़ी शिद्दत से उन से बतिया कर फिर उन्हें दरवाजे से बाहर का रास्ता दिखा देती थी.
इस बार… यह एक हादसा था, एक सपना था जिसे भुला पाना इतना आसान नहीं. रातभर कई घटनाएं उसे याद आईं.
शुक्रवार की सुबह रमन ने याद दिलाया कि अगले 2 दिन बैंक बंद रहेंगे इसलिए आज ही कुछ पैसे निकाल कर लाने होंगे. पापा औनलाइन ट्रांजैक्शन के यूज टू नहीं हैं.
‘‘उषा, संडे का पापा को देखने जाना है. मैं बैंक जा रहा हूं. तुम भी चलोगी क्या?’’
‘‘टीना के स्कूल भी जाना है. पीटीएम है.’’
‘‘तो ठीक है, 9 बजे के आसपास स्कूल हो आएंगे और उस के बाद फिर बैंक चले जाएंगे.’’
आज स्कूल बस की छुट्टी थी. बच्चों को पेरैंट्स के साथ स्कूल जा कर वापस आना था. उषा और रमन दोनों टीना को ले कर स्कूल पहुंचे. क्लास टीचर से उस की पढ़ाई, व्यवहार, ऐक्स्ट्रा कैरीकुलर ऐक्टिविटीज के बारे में बातचीत हुई. सबकुछ संतोषजनक रहा. फिर टीना को ले कर वे बैंक की तरफ चल दिए.
महीने की शुरुआत होने की वजह से आज बैंक में अच्छीखासी भीड़ थी. टीना ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि वह ज्यादा देर इंतजार नहीं करेगी. वह घर जाना चाहती है.
‘‘रमन, तुम और टीना सोफे पर बैठ जाओ. मैं लाइन में लगती हूं. लेडीज की तरफ कम भीड़ है,’’ कह कर उषा फार्म भरने आगे बढ़ती है.
सुबह के 10 बजने वाले थे. काउंटर पर कर्मचारी अभी बैठ ही रहे थे. फिर भी उस के आगे 3-4 लोगों की भीड़ थी. जब उस के आगे मात्र एक महिला रह गई तो उस ने उचक कर काउंटर की तरफ देखा. वह हैरान रह गई. यह तो वही शख्स था जो कल उस की बगल वाले स्कूटर पर दिख रहा था यानी यश…?
उषा के तो होश फाख्ता हो गए. पलभर में न जाने कितने सवालों ने मन में डेरा डाल दिया.
‘‘वह फार्म में मेरा नाम देखेगा तो उस के चेहरे के रिएक्शन बदल जाएंगे. फिर वह सिर उठ कर ऊपर देखेगा. मु?ो ऊपर से नीचे तक निहारेगा. मेरे माथे की बिंदी, गले का मंगलसूत्र और मांग का सिंदूर उसे ढकोसला लगेगा. फिर भी वह मेरा नाम पुकारेगा और मेरे बारे में जानना चाहेगा. एक कप चाय पर आमंत्रित करेगा. न जाने मन ही मन क्याक्या सोच लिया उषा ने.
उषा का नंबर आया. कांपते हाथों से उस ने विदड्रौल फौर्म आगे बढ़ाया. चश्मे के अंदर से 2 चमकदार आंखें कंप्यूटर की स्क्रीन पर कुछ देर गड़ी रहीं. उन में कोई खास प्रतिक्रिया नहीं थी. वे तो बस अपना दायित्व निभा रही थीं. ऊषा के चेहरे की ओर बिना देखे ही उस ने पैसे गिन कर सामने काउंटर पर रख दिए. बहुत बड़ी तसल्ली मिली उषा को लेकिन एक कसक भी जगी मन में एक ?ालक न पाने की और नजरों के न टकराने की. शायद ऐसा ही होता है प्यार. मुलाकात न होने पर इंसान घबराता है और सामने आ जाने पर नजरें चुराता है. वक्त के साथ उषा के मन में काफी कड़वाहट हो गई. यश को ले कर लेकिन फिर भी साथ बिताया वह समय भुलाए नहीं भूलता था.
कुछ बातें उसे याद आईं. विचारों का समंदर करवट ले रहा था. जिस से कभी प्रेम किया हो उस से कितनी ही नफरत कर लो लेकिन फिर भी उसे भुलाना बड़ा मुश्किल होता है. कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं जो बारबार याद आती हैं और यादें यह कब देखती हैं कि अभी याद करने का उचित समय है या नहीं. ये तो हर जगह हावी हो जाती हैं. चाहे हम वर्कप्लेस पर हों, कहीं जा रहे हों या बैंक की कतार में ही क्यों न खड़े हों.
विचारों में निमग्न उषा वहीं खड़ी रह गई थी. तभी पीछे खड़ी महिला ने जब उसे काउंटर से हटने को कहा, तब उसे ध्यान आया. उषा काम होने के बाद भी काउंटर पर रुकी थी इसलिए पीछे खड़ी महिला की बेचैनी बढ़ गई थी और वह उसे घूरती हुई आगे बढ़ी. हमारे आपाधापी भरे जीवन में सूरज के निकलने के साथ ही नए दिन की फेहरिस्त शुरू हो जाती है और सूइयों की टिकटिक के साथ जब समय आगे बढ़ता जाता है तो किसी को भी सब्र नहीं रहता.
उस महिला को सौरी बोल कर एक नजर काउंटर पर बैठे उस कैशियर पर डालते हुए उषा तेजी से वापस लौटी.
‘‘मम्मा, बड़ी देर लगा दी आप ने. पहले मु?ो घर छोड़ कर आना था न,’’ उसे देखते ही बिटिया बोली.
‘‘हां, काउंटर पर भीड़ थी. चलो अब सीधे घर चलते हैं. पापा भी औफिस को लेट हो गए.’’
रमन ने अपने मोबाइल में समय देखा. 10: 30 बज चुके थे.
‘‘उषा, तुम दोनों को घर छोड़ता हुआ मैं उधर से ही औफिस निकल जाऊंगा.’’
‘‘वापस घर की तरफ लौटोगे? लंबा पड़ जाएगा. हम औटो से चले जाएंगे. आप औफिस चले जाओ.’’
‘‘चलो ठीक है, यह भी कर सकते हैं,’’ रमन अपने स्कूटर से औफिस की तरफ चल दिया. उषा ने भी एक औटो वाले को रोक कर घर पहुंचाने के पैसे तय कर लिए.
परिवेश में व्याप्त कुछ अनसुनी आवाजें थीं जो शादी के कई सालों तक उस का पीछा करती रहीं या कहना चाहिए कि 5 साल बाद जब टीना का जन्म हुआ तब व्यस्तता के मारे वह उन्हें थोड़ाबहुत भूल पाई थी, आज उन्होंने फिर दस्तक दी थी. रोमांस और घबराहट का एक मिलाजुला संगम उस के मन में उथलपुथल मचा रहा था.
टीना कुछ कहना चाहती मगर उषा बाहर की तरफ देखते हुए न जाने किन विचारों में खोई थी. टीना की खीज बढ़ती जा रही थी. शायद वह उसे स्कूल की कोई बात बताना चाहती थी मगर उषा थी कि उसे कोई मतलब ही नहीं. बच्ची थी, थोड़ी देर में बहल गई और आतेजाते वाहनों को देखने लगी.
औटो रुक गया मगर उषा को ध्यान नहीं था.
‘‘मैडम, यहीं उतरना था न आप को सीएनजी पंप के पास?’’
उषा हकलाती हुई बोली, ‘‘अरे भैया, बड़ी जल्दी पहुंच गए. आंख सी लग गई थी,’’ और फिर उसे पैसे दे कर विदा कर घर पहुंच कर टीना को खाना खिलाया.
‘‘टीना, आगे 2 दिन की छुट्टी है. तुम चाहो तो अपना कोई मनपसंद खेल कर लो. मम्मा के सिर में दर्द है. थोड़ी देर लेटना चाहेगी,’’ उस ने कहा.
‘‘ओके मौम,’’ कह कर बच्ची अपने खिलौने वाले कमरे में भाग गई. यही तो चाहते हैं बच्चे कि कभी उन्हें किताबों से थोड़ी मोहलत मिले तो अपने रंगीन खिलौनों की दुनिया सजा सकें.
उधर उषा भी एक ऐसी दुनिया में खो गई जो रंगीन तो जरूर थी लेकिन जरा सी असावधानी पर उस की जिंदगी को बदरंग कर सकती थी.
यश ने मु?ो पहचाना या नहीं? कैसे नहीं पहचानेगा? उस ने मु?ो पहचान लिया था. मगर न पहचानने का नाटक कर रहा था, इस तरह के कई विचार उस के मन में उमड़घुमड़ रहे थे.
रोज मिलने का वह सिलसिला, सदियों तक
साथ निभाने का वादा, प्यार में पेंग बढ़ाने की रफ्तार तभी जा कर रुकी जब अहम और अपेक्षा की भारीभरकम गाड़ी सामने से आ कर खड़ी हो गई थी. पुरानी जिंदगी का कतराकतरा उस की नजरों के सामने बिखरने लगा…
‘‘कल कहां मिलना है?’’
‘‘जहां तुम कहो.’’
‘‘तो चलो ठीक है, कल स्कूटर पर कहीं दूर घूमने जाएंगे.’’
‘‘स्कूटर पर? किस का स्कूटर है?’’
‘‘मेरे दोस्त का बजाज.’’
‘‘न बाबा, स्कूटर पर नहीं, कभी बैठी भी तो नहीं हूं.’’
‘‘तो बैठ जाओगी. कभी न कभी तो बैठना ही होगा.’’
‘‘कब आएगा वह दिन?’’
‘‘अरे बहुत जल्दी, यकीन करो.’’
‘‘चलो छोड़ो ये सब बातें. मु?ो देर हो रही है.’’
‘‘तो ठीक है कल स्कूटर की यात्रा. वहीं पर मिलना,’’ कहते हुए यश बोला.
उषा समय से पहले पहुंच गई. तभी उस ने दूर से एक स्कूटर आता देखा. पुराने से स्कूटर पर बैठा नवयुवक दूर से बड़ा स्मार्ट लग रहा था. आंखों पर सस्ता सा काला चश्मा, सिर पर कैप और गले में मफलर, अदाओं में दीवानगी लिए वह करीब आ रहा था.
पास आ कर उषा से पीछे बैठने का इशारा किया. वह ?ाट से दुपट्टा सिर पर डाल कर स्कूटर पर उस के पीछे बैठ गई. यह दुपट्टा कई मामलों में मददगार था. एक तो सिर और चेहरे को सीधी धूप से बचाता, दूसरा चेहरे की पहचान भी छिपाता. छोटेछोटे शहरों में 10 साल पहले भी अगर कोई लड़की किसी लड़के के साथ स्कूटर पर या पैदल घूमते हुए दिख जाए तो फिर उस की खैरियत नहीं थी. घर में तो खिदमत होती ही थी बाहर भी समाज और मनचले अपना जन्मसिद्ध अधिकार सम?ाकर खूब खातिरदारी कर देते थे.
ज्यादा दूर जाना दोनों के लिए संभव नहीं था. बारबार स्कूटर का पैट्रोल चैक करना पड़ता था. खैर, इस संक्षिप्त यात्रा में ही अनंत सुख छिपा था. पूरे दिन खाने के लिए चंद मूंगफली और 1-2 कप चाय. जब हमसफर साथ हो तो भूखप्यास सब गायब. नएनए प्यार का जोश था जो भूखप्यास, धूप और बारिश सब सहन करने की ताकत दे देता है.
कुछ हफ्ते बाद की ही तो बात है कि एक क्लासफैलो अपना नया स्कूटर ले कर कालेज आया था.
‘‘यश, देखा तुम ने, विवेक का स्कूटर क्या शानदार है. तुम भी अपना एक नया स्कूटर ले लो. दोस्त का स्कूटर मांग कर मुझे कब तक घुमाओगे?’’
‘‘कहती तो सही हो मैडम पर अभी तो मेरा बाप मुझे पाल रहा है. स्कूटर ले कर उस को भी पालन पड़ेगा जो उन की तनख्वाह में संभव नहीं है.’’
2-3 सौ स्टूडैंट्स की क्षमता वाला कालेज जहां पर हर छात्र की आर्थिक क्षमता अलगअलग थी. कोई कार में आता, कोई स्कूटर या बाइक में तो कोई चप्पल घिसता हुआ भी कालेज पहुंचता. उम्र का वह पड़ाव जब नएनए शौक मन को उद्वेलित करते रहते हैं और युवा उन्हें पूरा करने के सपने देखते रहते हैं. प्यार और दोस्ती की जड़ें भी इतनी गहरी नहीं होतीं कि 1-2 दिन भी सिंचित किए बिना रह जाएं. इन्हें हर रोज फुहार चाहिए. 1-2 दिन भी पानी की बौछार न हो तो सूख कर मुरझा जाएं.
इच्छाओं का सागर भी गहराता जा रहा था उषा की. इसे भरने का अनकहा दायित्व उस के प्रेमी यश के कंधों पर था जिसे पूरा करने में वह अकसर नाकाम रहता था. यह परिवर्तन का दौर था. नया पे कमीशन आ रहा था. कालेज के सभी प्राध्यापक, छात्रों के कमाऊ मातापिता, सभी में इस के प्रति एक आकर्षण था. यकीनन लोगों की आय में वृद्धि हुई थी और जीवन स्तर में आता हुआ बदलाव भी साफसाफ नजर आ रहा था. उषा भी इंसान थी. उस की भी इच्छा जागृत हो रही थी. एक ऐसा समय जब प्रेमिका की अपेक्षाएं अपने प्रेमी से रहती और प्रेमी उन्हें पूरा करना अपना फर्ज सम?ाता. यश ने भी फर्ज को जाना मगर इस के लिए कोई गलत रास्ता चुनना उसे कभी मंजूर नहीं था. उन के कईर् दोस्तों के पास मोबाइल थे पर न यश और न ही उषा के पास था. दोनों को अपनी हैसीयत का अंदाजा था. शायद यही कारण रहा कि धीरेधीरे वह उषा की नजरों से आंसुओं की तरह लुढ़कता गया.
उषा सम?ाने लगी थी कि इस शख्स से ज्यादा उम्मीद करना बेकार है. कई बार उम्मीद के इस बाजार में सरेआम दोनों का ?ागड़ा भी हुआ. यश ने हार मान लेना ही उचित सम?ा और उषा से ब्रेकअप करने में ही सब की भलाई सम?ा. लेकिन उषा यह भी नहीं चाहती थी. प्यार का भूत उसे यश से अलग होने से रोक रहा था. गुस्सा तो यश के मन में भी था मगर जब 2-4 दिन के लिए उषा कालेज नहीं आई तो वह बेचैन हो उठा. सपने वह भी सजाता था कि पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करेगा और उषा के अरमान पूरे करेगा.
लगभग 5-6 दिन बाद उषा कालेज आई, जब यश से टकराई तो दोनों तरफ
किसी तरह का गुबार नहीं था. पता चला कि अपनी मौसी की बेटी की शादी में गई थी. अपनी कजिन को पति के साथ देख इतनी रोमांचित हो गई थी कि एकाएक यश से शादी की फरमाइश कर बैठी. यह सुनकर वह स्तब्ध था. उसे आश्चर्य हो रहा था कि यह कैसी लड़की है जो पल में माशा, पल में तोला. अभी कुछ दिनों पहले ही तो शोले की तरह भड़क रही थी और आज शबनम की बूंद सी लुड़क रही है. छिपछिप कर मिलना चलता ही रहा. इस मिलन में एक सुख था जो तनहाई में बहुत तड़पाता था. दोनों इसे महसूस कर रहे थे.
खैर, समय उन के पक्ष में रहा. ग्रैजुएशन पूरा कर दोनों मास्टर्स के लिए दूसरे शहर में गए थे क्योंकि उन के कालेज में केवल स्नातक कक्षा ही चलती थी. यश ने एक छोटा सा कमरा ले लिया था जहां उषा बेरोकटोक आ जा सकती थी. नौकरी तो थी नहीं. हां, कालेज के साथसाथ वह शाम के समय किसी दुकान में अकाउंट्स का काम देखने लगा था. उषा की जिद का कोई इलाज नहीं था. यश ने 2-3 साल इंतजार करने को कहा पर वह नहीं मानी.
‘‘ठीक है, हम मंदिर में शादी कर लेंगे लेकिन तुम्हारे और मेरे मातापिता को पता नहीं चलेगा.’’
‘‘लेकिन बिना बताए साथ कैसे रह पाएंगे?’’ उषा ने सवाल दागा.
‘‘दिन में मुलाकात करेंगे. रात अपनेअपने घर में रहेंगे.’’
बेचैनी वाली बात थी पर दूसरा कोई रास्ता नहीं था इसलिए उषा ने मंजूर कर लिया. एक बहुत ही विश्वासपात्र पुजारी की उपस्थिति में दोनों का विवाह हो गया. मिलनेजुलने में नैतिक बाधा खत्म हो गई. मगर शादी तो हमारे समाज में एकदूसरे पर हक का नाम है. यह पूरा न हो तो जिंदगी नर्क बन जाती है. छिपछिप कर मिलने से अभी भी मुक्ति नहीं मिली थी. मिलन का सुख हमेशा अधूरा रह जाता. यह प्यार दोनों के ही गले की फांस बन चुका था. सूखे चने और मूंगफली से अब भूख नहीं मिटती थी.
रैस्टोरैंट में जाने की चाह, मूवी देखना, अमीर जोड़ों की तरह बांहों में बांहें डाल किसी पार्टी में थिरकना, अपने पास कार और छोटा सा घर होना, ये छोटीछोटी कितनी चाहतें हैं जिन्होंने प्यार के आईने को न जाने कितनी बार चकनाचूर कर दिया.
लग्जरी उस चिडि़या का नाम है जिसे हरकोई अपने पिंजरे में बंद करना चाहता है. ऐसा न कर पाने पर खीजता है, आपस में लड़ता?ागड़ता है और खुद ही हैरान हो जाता है. बस यही हुआ था दोनों के साथ. शायद यही कारण रहा कि धीरेधीरे यश उषा की नजरों से आंसुओं की तरह लुढ़कता गया. गुपचुप की गई शादी खुद ही अमान्य हो गई और दोनों अपनेअपने रास्ते चल दिए.
‘‘मम्मा, कितनी देर और सोओगी? मैं बोर हो रही हूं. मु?ो भूख भी लग रही है,’’ टीना की आवाज सुन कर उषा सपने से जागी.
‘‘हां बेटा मैं तुम्हें कुछ देती हूं खाने को. चलो ऐसा करते हैं सुमन आंटी के घर चलते हैं. तुम्हें बहुत अच्छी लगती है न वे?’’
‘‘हां मम्मा आंटी सचमुच बहुत अच्छी हैं. मु?ो कहती हैं कि तुम पीच कलर के फ्रौक में बहुत सुंदर लगती हो. वही पहन कर जाऊंगी आज.’’
उषा टीना के साथ अपनी सहेली सुमन के घर पहुंचती और फिर कुछ जरूरी काम बता कर टीना को सुमन के घर छोड़ कर फिर बैंक के लिए औटो पकड़ लिया.
पब्लिक डीलिंग का समय लगभग खत्म हो चुका था इसलिए गार्ड ने एक छोटा सा पैसेज अंदर जाने के लिए खोला था. उसी से अंदर घुस कर उषा सुबह वाले काउंटर पर पहुंची.
यश के पास अभी कोई भी कस्टमर नहीं था. उषा को देख कर वह अचकचा गया है.
उस ने धीरे से कहा है, ‘‘तुम ने पहचाना मुझे?’’
यश काउंटर पर बैठाबैठा थोड़ा भयभीत हो गया. सामाजिक मर्यादाओं का ध्यान महिलाओं को होता है तो थोड़ाबहुत पुरुषों को भी खासकर जब वे विवाहित हों और पुरानी कोई प्रेमिका या पत्नी सामने आ कर खड़ी हो जाए.
‘‘नमस्कार, आप मुझे 2 मिनट का समय दीजिए. मैं बाहर चल कर आप से बात करता हूं. आप चाहें तो बाहर इंतजार कर लीजिए.’’
उषा बैंक से बाहर निकल गई.
थोड़ी देर में यश बाहर आया है और उसे बैंक से थोड़ी दूर कैफे में ले गया, ‘‘क्या लेंगी लैमन सोडा या कौफी?’’
उषा ने मन ही मन सोचा कि बड़ा अजीब सा है यह आदमी. इतने बरसों बाद मुलाकात हो रही है न मेरी जिंदगी के बारे में कुछ पूछ रहा है न अपनी बता रहा है बस इसे लैमन सोडा या कौफी की पड़ी है.
‘‘कुछ नहीं. कैसे हो? कैसी चल रही है जिंदगी? न मेरे बारे में कुछ पूछा न अपने बारे में बताया.’’
‘‘यों अचानक मिल जाओगी सोचा नहीं था और इतने सालों बाद अब कहनेबताने को कुछ नहीं रहा. तुम्हें देख कर अंदाज आ गया है कि तुम्हारी शादी हो चुकी है और तुम अपनी जिंदगी से संतुष्ट हो. मेरी भी नौकरी लग गई है और शादी हो गई है. मैं भी अपनी जिंदगी से संतुष्ट हूं.
‘‘जीवन में हर चाहत पूरी नहीं होती. जब चाहो तब बारिश नहीं होती, जब चाहो धूप नहीं निकलती. बारिश और धूप के अनुसार जीवन को ढालने की कला आना ही सफलता की निशानी है, इसी में सुख और संतोष है. हम ने जो मंदिर में शादी की थी वह तो मात्र बच्चों का नाटक था. उसे भूल कर ही तुम भी अलग राह चलीं और मैं भी. जैसे भी हैं, अब मैं भी संतुष्ट हूं और शायद तुम भी. इस बात को अब यहीं खत्म कर देना चाहिए.’’
‘‘हां इतना कह सकता हूं कि मित्र होने के नाते अब मैं तुम्हें चायकौफी पिलाने में समर्थ हूं.’’
‘‘ऐसा कह कर मुझे शर्मिंदा न करो.’’
‘‘मैं शर्मिंदा नहीं कर रहा बल्कि सालों पहले मैं शर्मिंदा होता था जब तुम्हारी मांगों को पूरी नहीं कर पाता था.’’
‘‘तुम मु?ो सम?ा देते, मैं जज्बात में बह जाती थी.’’
‘‘अब इन बातों का कोई फायदा नहीं है. हमारी अपनीअपनी जिंदगी है, अपनेअपने रास्ते हैं. इस बात का ध्यान तुम्हें रखना होगा. चलता हूं घर में बच्चे इंतजार कर रहे होंगे,’’ कह कर वह सीट से उठ गया. उस के पीछेपीछे उषा भी उठ गई है और औटो ले कर सुमन के घर की तरफ बढ़ गई.
यश को देख कर एक भय जो उस के मन में था, आज वह जाता रहा. एक तसल्ली उसे हो गई थी कि अगर यश आगे कभी टकरा भी जाएगा तो उस के पति तक यह बात नहीं पहुंच पाएगी कि अल्हड़पन में उस की जिद के कारण दोनों ने मंदिर में शादी की थी जो लग्जरी के अभाव में टूट गई थी. कहानी का अंत सुखद कहा जाए या दुखद, फैसला थोड़ा मुश्किल है. प्यार हमेशा एक दर्द दे जाता है कभी कड़वा तो कभी मीठा. यह तड़प कभीकभी दोनों ही तरफ उठेगी, मगर जिस समझदारी से दोनों ने खुद को संभाल लिया, वह यकीनन एक सुखद अंत की वकालत करता है. दोनों ने कुछ खो कर कुछ पा भी लिया था. रास्ते भले जुदा थे पर एक पूरा आसमान दोनों की मुट्ठी में था.
