Pension dispute : असम के जोरहाट में 13 जून को वायुसेना के विमान हादसे में जहानाबाद के लैफ्टिनेंट शुभम कुमार शहीद हो गए थे। उन की शहादत के बाद सरकारी मुआवजे के ₹21 लाख उन के मातापिता की बजाय उन की कथित पत्नी श्रेया राय को सौंप दिए गए, जिस पर उन के परिजनों ने गंभीर विवाद खड़ा कर दिया है.
अधिकारियों का कहना है कि आधिकारिक रिकौर्ड के अनुसार श्रेया राय ही शुभम की कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त पत्नी हैं। शुभम के परिजनों का आरोप है कि उन्हें इस कोर्ट मैरिज की कोई जानकारी नहीं थी। शुभम के पिता अमरेंद्र शर्मा का आरोप है कि उन्हें बिना किसी सूचना और अनुमति के अधिकारियों ने श्रेया को मुआवजा सौंप दिया।
स्थानीय प्रशासन (जहानाबाद एसडीओ) का स्पष्ट कहना है कि सरकारी प्रक्रिया भावनाओं पर नहीं बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों पर आधारित होती है। रिकौर्ड में पत्नी का नाम दर्ज होने के कारण नियमानुसार सहायता राशि उसी को दी गई।
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इस से पहले भी इस तरह के विवाद हो चुके हैं. साल 2024 में बहादुर कैप्टन अंशुमान सिंह, जिन्होंने सियाचिन के बर्फीले बंजर इलाके में फाइबरग्लास की झोपड़ी में आग बुझाने की कोशिश करते हुए अपनी जान गंवा दी थी, उन के मातापिता की तरफ से उन की पत्नी को दी गई राशि को ले कर विवाद खड़ा किया गया था. उन की 5 महीने पहले ही शादी हुई थी।
इन दोनों ही केस में पिता ने मीडिया में आ कर कहा कि यह पैसा पत्नी को नहीं हमें मिलना चाहिए था. हमारा हक था, हमारा बेटा था। हम ने उस की पढाईलिखाई में पैसा लगाया था।
अंशुमान के केस में उन के पिता ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को फोन कर के नैक्स्ट औफ किन (NOK) पौलिसी में संशोधन के लिए कहा था. लेकिन मौजूदा नीति के अनुसार, कैप्टन अंशुमान ने सभी सैनिकों की तरह वसीयत बनवाई थी।
अंशुमान की वसीयत के अनुसार, उन की पत्नी स्मृति उन की पेंशन की हकदार थीं। इस की वजह है कि वे युद्ध में हताहत हुए हैं। स्मृति सिंह को उनके एनओके के रूप में सूचीबद्ध किया गया था।
हालांकि बाद में सेना ने स्पष्ट किया कि कैप्टन के पिता को सेना समूह बीमा निधि का आधा हिस्सा मिला था। ₹1 करोड़ में से ₹50 लाख पिता को मिले और वह भी बेटे की वसीयत के अनुसार।
इसी तरह अभी शुभम के केस में भी कहा जा रहा है पिता को भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) द्वारा शहीद शुभम कुमार की मां (पूनम शर्मा) को ₹1.50 करोड़ का चेक आर्थिक सहायता के रूप में प्रदान किया गया है |
अब सवाल यह है कि क्या इस तरह शहीद हुए बेटे के मांबाप का हंगामा मचाना सही है? जहां तक इन शहीदों की पत्नियों की बात की जाए, तो इन्होंने कोई गलत काम नहीं किया। इन्होंने रिस्क लिया शादी का. अगर वे जिंदा रहते तब भी तो पत्नी का ही अधिकार होता। तब वे पतिपत्नी रहते और अगर आज वे शहीद हो गए तो भी पत्नी को अधिकार है पेंशन का और बाकी राशि पर।
बेटे हैं तो क्या? उस पर ओनरशिप कहां से आ गई? बच्चे आप के पालतू थोड़े ही न हैं? क्या आप पैसे के लिए अपने बच्चे को पाल रहे थे? बच्चे अपनेआप में हैसियत रखते हैं। वे आप की संपत्ति थोड़े ही हैं.
18 साल की उम्र के बाद उन की अपनी इच्छा है वो जो मरजी करें। अगर उन्होंने शादी कर ली है, तो पैसा उस की पत्नी को ही मिलेगा आप कहां से बीच में आ गए? बल्कि अगर घर में बेटे के नाम कोई पैसा है या प्रौपर्टी है तो वह भी पत्नी को ही मिलेगा।
शहीद सैनिकों की सहायता राशि को लेकर परिवार के नौमिनी के नियम
भारतीय सशस्त्र बलों में ‘नेक्स्ट औफ किन’ का तात्पर्य सेना के उन नियमों के अनुसार है, जिस में यह राशि और पेंशन पूरी तरह से उस दस्तावेज पर निर्भर करती है, जिसे सैनिक ने अपनी भर्ती या शादी के समय खुद भर कर जमा किया होता है।
नेक्स्ट औफ किन के मुख्य नियम :
प्राथमिकता क्या है : जब कोई व्यक्ति सेना में भर्ती होता है, तो वह आमतौर पर अपने मातापिता या अभिभावकों को अपना एनओके नामित करता है।
विवाह के बाद क्या बदलाव आता है : सेना के वर्तमान नियमों के अनुसार, जैसे ही सैनिक का विवाह होता है, उन का जीवनसाथी (पत्नी/पति) स्वतः ही प्राथमिक एनोओके बन जाता है और मातापिता की जगह ले लेता है।
अधिकार क्या कहता है : प्राथमिक एनओके (आमतौर पर जीवनसाथी) को ही शहीद सैनिक को मिलने वाली सरकारी अनुग्रह राशि, पेंशन और अन्य आधिकारिक लाभ प्राप्त करने का कानूनी अधिकार होता है।
आश्रित पेंशन : पेंशन के नियमों में कुछ मामलों में मातापिता को भी हिस्सा मिल सकता है, यदि वे पूरी तरह से सैनिक पर आश्रित थे और उन के पास आय का कोई अन्य साधन नहीं है।
क्या है रक्षा मंत्रालय के नियम
यदि सैनिक ने शादी से पहले फौर्म भरा है और मातापिता को नौमिनी बनाया है, तो उन्हें पैसा मिलेगा। यदि शादी के बाद उस ने पत्नी को कानूनी वारिस दर्ज किया है, तो नियमों के तहत सारी सहायता राशि पत्नी को ही हस्तांतरित होती है।
रक्षा मंत्रालय के पेंशन नियमों के अनुसार, पहली प्राथमिकता शहीद की पत्नी को ही मिलती है। यदि पत्नी नहीं है या वह जीवित नहीं है, तो मातापिता को पेंशन का हक मिलता है।
क्या दूसरी शादी के बाद पेंशन बंद हो जाती है
नियमों के अनुसार, शहीद की पत्नी को मिलने वाली पारिवारिक पेंशन दूसरी शादी करने पर बंद नहीं होती है। वह आजीवन इस पेंशन की हकदार बनी रहती हैं क्योंकि यह पेंशन उन के दिवंगत पति की शहादत और सेवा के सम्मान में दी जाती है, न कि केवल उन की ‘विधवा’ स्थिति के कारण।
अगर मातापिता और पत्नी के बीच विवाद होता है तब क्या होगा
ऐसे कई मामलों में, जहां मातापिता और पत्नी के बीच विवाद होता है, अंततः सेना के आधिकारिक दस्तावेज (जो सैनिक ने खुद हस्ताक्षरित किए हों) ही मान्य होते हैं। हालांकि, कुछ मामलों में दोनों पक्षों द्वारा आपसी सहमति या अदालत के माध्यम से मुआवजे के बंटवारे का समाधान निकाला जाता है।
दरअसल, सच तो यह है कि भारतीय समाज में अकसर यह धारणा रही है कि बच्चे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे। लेकिन जब परिस्थितियां दुखद (जैसे शहादत) हो जाती है, तो यह धारणा एक कड़वे विवाद का रूप ले लेती है। माता पिता क्योंकि बेटे पर डिपेंड होते हैं, तो उन्हें लगता है कि बेटे के बाद अब हमारा सहारा यह पैसा ही होगा। लेकिन सवाल है कि मांबाप के द्वारा ऐसा सोचा ही क्यों जाता है? क्यों नहीं वह अपने भविष्य के लिए कोई धनराशि जोड़ कर रखते? अगर बेटे की पढाईलिखाई पर खर्च कर रहे हैं, तो उतना ही खर्चें कि आप अपने लिए भी अपने बुढ़ापे के लिए भी कुछ बचा कर रखें, वार्ना इस बात को समझें कि बेटा कोई एटीएम कार्ड नहीं है जिस से आप उस के जाने के बाद भी पैसा वसूलते रहेंगे जबकि सेना द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि का उद्देश्य शहीद के बाद के जीवन को सुरक्षित करना होता है। यह राशि एक प्रकार का जीवन निर्वाह (Support) है, न कि कमाई का साधन।
