Story In Hindi : 20  साल बाद शेखर को देख कर मैं बुरी तरह डर गई. रात ठीक से नींद नहीं आई. भविष्य की आशंकाओं के ले कर मन में बुरेबुरे खयाल आ रहे थे.

‘‘क्या बात है नींद नहीं आ रही है?’’ विशाल ने पूछा.

‘‘जी कुछ नहीं. आ जाएगी,’’ मैं ने टाला.

‘‘रोज की अपेक्षा आज तुम्हारे व्यवहार में बदलाव नजर आ रहा है, इसलिए पूछा,’’ विशाल ने कहा.

‘‘ऐसा कुछ नहीं है,’’ कह मैं सोने का नाटक करने लगी.

‘‘क्या शेखर का आना तुम्हें रास नहीं आया?’’ विशाल का सवाल मेरे मन पर शूल की भांति चुभ गया.

‘‘शेखर का मु झ से क्या लेनादेना? वे आप के बौस हैं.’’

‘‘तुम दिनभर उन के लिए खटती रही. क्या ज्यादा थक गई हो?’’

‘‘वे हमारे मेहमान थे. इतना तो करना ही था.’’

सुन कर विशाल को राहत मिली. मैं ने किसी तरह इस प्रसंग को खत्म करना चाहा.

सुबह जल्दी बिस्तर छोड़ कर घरेलू कामों में लग गई. मगर मन शेखर पर ही टिका रहा. बेमन से विशाल के लिए नाश्ता, खाना बनाया.

जैसे ही विशाल ने औफिस के लिए रुख किया मैं अतीत की दुखद स्मृति यों में खो गई…

शेखर दूर का चाचा था. जब पहली बार लखनऊ नौकरी करने आए तब मेरी उम्र 12 साल थी.

‘‘भाभी, 1 हफ्ते की बात है. जैसे ही पीजी मिल जाएगा मैं चला जाऊंगा,’’ शेखर ने मां से कहा.

‘‘देवरजी यह आप का ही घर है. जितने दिन रहना चाहते हो रह सकते हो,’’ मां बोली.

‘‘भाभी, मैं किसी पर बो झ नहीं बनना चाहता,’’ शेखर बोला.

‘‘इस में बो झ की क्या बात है? ऊपर एक कमरा खाली है. चाहो तो रह सकते हो,’’ मां ने कहा.

‘‘मगर मैं रहने और खाने का पैसा देता रहूंगा,’’ शेखर की साफगोई सभी को पसंद आई.

पापा को कोई एतराज नहीं था. वैसे भी किसी अपरिचित को देने से अच्छा है अपना ही रहे. कम से कम भरोसे लायक तो रहेगा. पापा के कथन से मां को तसल्ली मिली.

पूरा 1 महीना रहने के बाद शेखर ने पूरी ईमानदारी के साथ मां के हाथों पर रुपए

रख दिए. मां मना करती रही मगर शेखर ने उन की एक न सुनी. मां मन ही मन खुश थी क्योंकि इस पैसे पर उन का अधिकार था जिसे पापा ने पहले ही साफ कर दिया था.

आहिस्ताआहिस्ता मैं शेखर से घुलमिल गई. अकसर मां कोई नया डिश बनाती तो मैं खुद उन्हें देने के लिए ऊपर चली जाती. बदले में वे मु झे टौफी देते, मीठीमीठी बातें करते. अब तो अकसर मैं उन के साथ बैठ कर लूडो खेलती. एक बार उन्होंने मु झ से मेरी पसंद पूछी तो मैं ने बताया कि मु झे केक पसंद है. अगली शाम औफिस से लौटते वक्त शेखर केक खरीद लाया.

‘‘कांता,’’ घर में घुसते ही उन्होंने आवाज दी.

मैं तेजी से चल कर दरवाजे तक गई.

‘‘यह देखो मैं तुम्हारे लिए केक लाया हूं,’’ शेखर के हाथों में अपना मनपसंद केक देख कर मैं खुश थी.

तभी पीछे से मम्मी आई. बोली, ‘‘बिन वजह रुपए क्यों बरबाद करते हो देवरजी? ज्यादा लालच दोगे तो यह रोज नईनई फरमाइश करेगी.’’

शेखर हंस पड़ा, ‘‘भाभी, यह मेरी छोटी बहन की तरह है. मेरे पास कौन सा रुपयों की कमी है. अच्छीखासी तनख्वाह है. कल जब परिवार बढे़गा तब तो फूटी कौड़ी बेवजह खर्च नहीं कर पाऊंगा.’’

शेखर के तर्क के आगे मां चुप रही. शेखर हमेशा कुछ न कुछ हम सब के लिए लाता रहता. एक बार पापा के लिए कुरतापाजामा ले आया. पापा शेखर की तारीफ करते नहीं थकते. भले ही दूर का भाई था मगर उस ने खून के रिश्ते की लाज रखी वरना मां जरूर पापा से शिकायत करती कि आप के खानदान वाले सब ऐसे ही हैं.

एक रोज मैं और शेखर उस के कमरे में लूडो खेल रहे थे. पापा औफिस में थे. उस

रोज शेखर ने औफिस से छुट्टी ले रखी थी. मम्मी कमरे में आराम कर रही थी. खेलखेल में शेखर ने मेरे गालों को प्यार से चूम लिया. मैं ने जब मुंह बनाया तो मु झे खुश करने के लिए बोला, ‘‘आज शाम हम सब घूमने चलेंगे. वहीं खाना खाएंगे.’’

घूमने के नाम से मेरा चेहरा खिल गया. जब उसे लगा कि मैं ने थोड़ी देर पहले मुंह बनाया था अब सहज हो गई तो मु झे अपनी तरफ खींच कर मेरे बदन को बेतहाशा चूमने लगा.

‘‘तुम चिंता मत करो मैं तुम्हारे लिए महंगेमहंगे कपड़े खरीद कर दूंगा.’’

मैं क्षणांश घबरा गई. पीछे हटने की कोशिश की मगर असफल रही. शेखर के ऊपर हैवानियत सवार थी. एक तरफ उस की ओर से दिया गया. लालच दूसरी तरफ जब उस ने मेरे बदन को छूआ तो एक अजीब सी गुदगुदी महसूस हुई और मैं उसी में डूबनी लगी.’’

मम्मी से कुछ मत कहना. मैं तुम्हें ढेर सारे रुपए दूंगा.’’

जब तंद्रा टूटी तो लगा कुछ गलत हो गया और मैं रोने लगी. उस ने चुप कराना चाहा मगर मैं रुकी नहीं. तेजी से चल कर मां के पास आई. मां के करीब बैठ कर मैं सुबकने लगी. मेरा रुदन सुन कर मां जगी, ‘‘रो क्यों रही हो?’’

मैं ने सारी बात को विस्तार से बता दी. सुन कर मां ने माथा पकड़ लिया. उन्होंने मेरे शरीर को देखा.  देखते ही अनियंत्रित हो गई. वे चाह कर भी मु झे डांटफटकार न सकी. शाम पापा आएंगे तो क्या जवाब दूंगी. खून के रिश्ते का भी शेखर ने खयाल नहीं किया? उन की आंखों से अंगारे बरसने लगे. उन से न रोते बन रहा था न ही हंसते. उन का जी किया अभी का अभी शेखर का गला काट डाले. फिर विचार प्रक्रिया बदली.

शोर मच गया तो कोई मु झ से शादी भी नहीं करेगा. वे घुटघुट कर रोने लगीं. उन का रोना देख कर मेरी रुलाई भी बढ़ गई. शेखर सम झ चुका था कि कुछ अनहोनी होने वाली है. लिहाजा अपने कपड़े बांध कर धीरे से निकल गया. मां चाह कर उसे सबक न सिखा सकी. अगर गुस्से में चिल्लाती भी है तो सारा महल्ला जान जाएगा कि मेरे साथ क्या हुआ है? ऐसे में जो रुसवाइयां मु झे  झेलनी होगी उन का कलंक सारी उम्र न धो पाती.

शाम पापा औफिस से आए. मां ने उन से कुछ नहीं छिपाया.

‘‘उस कमीने की इतनी हिम्मत?’’ वे आपे से बाहर हो गए. वे सीढि़यों से छत पर चढ़ने लगे. मां ने रोका, ‘‘अब वह यहां नहीं है.’’

‘‘कहां भागा?’’

मां ने उन्हें नीचे उतारा.

‘‘मैं नहीं जानती. ऊपर जाने पर पता चला कि कुछ कपड़े ले कर चोरों की तरह चला गया. जरा शांत दिमाग से सोचते. आप कि चीखनेचिल्लाने से क्या होगा. सिर्फ बात बढे़गी. मगर हमारे लिए जीना हराम हो जाएगा. कांता की शादी हमारे लिए समस्या हो जाएगी,’’ मां ने किसी तरह पापा को वश में किया. उन्हें यही अफसोस होता रहा कि कुछ ज्यादा ही उस पर भरोसा किया. एक दूरी बना कर रखनी चाहिए थी. उन्हें सपने में भी भान नहीं था कि परिवार, खानदान का लड़का इस कदर गिर जाएगा. रिश्ते की भतीजी को ही हवस का शिकार बनाएगा. कैसे उस के मन ने गवारा किया. सोचसोच कर मम्मीपापा का दिल बैठा जा रहा था.

यह एक ऐसा हादसा था जिसे भूल पाना आसान न था. मु झे पुरुषों से डर लगने

लगा. उम्र के 25वें पायदान पर आने के बाद भी मु झे हर पुरुष में शेखर नजर आता. मैं हमेशा डरीसहमी सी रहती. मेरी शादी तय हो गई. मन में यही भय रहा कि अगर मेरे पति को मेरे अतीत का पता चल गया तो क्या होगा? मां सम झाती रही कि मैं भूल से भी अतीत का जिक्र अपने पति से न करे. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.

कहने को तो मां ने कह दिया मगर क्या यह इतना आसान होगा? मेरे मन पर जो जख्म शेखर न दिए वे शायद ही कभी भरें. मेरा रिश्तों पर से विश्वास उठ चुका था. जब शेखर ऐसा कर सकता है तो पति तो आखिर पति ही होता है. उसे छोड़ने में कितना वक्त लगेगा. यह सब सोच कर एकबारगी दिल हुआ शादी का खयाल दिल से निकाल दे. क्या जरूरी है शादी करें? तमाम लोग बगैर शादी किए जीवन गुजार देते हैं.

पापा बोले, ‘‘कब तक अकेले निरुदेश्य जीवन जीओगी? अभी जवान हो. कल बुढ़ी होगी तब तुम्हें सहारे की जरूरत होंगी. उस समय कौन साथ देगा?’’

पापा की आंखें भर आईं. पापा को कभी इतना कमजोर नहीं देखा. मेरी बेबसी ने उन्हें भी अंदर तक हिला दिया था. जो भी हो मैं उन की बेटी थी. कौन बाप अपनी बेटी को दुखी देखना चाहता है. मेरी हालत के लिए पापामम्मी खुद को कुसूरवार मानते.

पापा कहते, ‘‘मैं ने उस पर कुछ ज्यादा ही भरोसा किया?’’

‘‘आप खुद को क्यों अपराधी मानते हैं. शेखर का हमारा रिश्ता ही कुछ ऐसा था कि शक करने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. अब कोई अपना ही पीठ में छुरा भोंक दे तो कोई क्या कर सकता है?’’ मां सम झाती.

‘‘तुम ठीक कहती हो. एक सबक सिखा कर गया कि कोई कितना भी करीबी हो उस पर आंख मूंद कर भरेसा मत करो,’’ पापा बोले.

मैं पापा को और निराश नहीं कर सकती थी इसलिए शादी के लिए हां कह दी.

विशाल सुल झे हुए आदमी थे. धीरेधीरे मैं अपना मन घरगृहस्थी में लगाने

लगी. लेकिन जब से शेखर मेरे घर आया तब से ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने शांत जल में कंकड़ मार दिया हो. मैं फिर से उसी दुनिया में लौट गई जिसे दुस्वप्न मान कर मैं भूल चुकी थी.

‘‘बौस ने हम दोनों को खाने पर बुलाया हैं,’’ घर में घुसते ही विशाल बोले. वे काफी खुश दिख रहे थे. वे आगे बोले,’’ बौस, तुम्हारी बेहद तारीफ कर रहे थे. कह रहे थे कि तुम्हारी पत्नी बहुत स्वादिष्ठ भोजन बनाती है.’’

मेरी तारीफ का आशय मैं बखूबी सम झती थी यानी वह अब भी बदला न था. सुन कर मेरा मन तिक्त हो गया.

‘‘आप जाओ मैं जा कर क्या करूंगी,’’ मैं तुनक कर बोली.

‘‘यह हमारे लिए खुशी की बात है. बाकी स्टाफ तरसता रहता है मगर बौस किसी को घास नहीं डालते.’’

विशाल को कैसे सम झाए कि उस नीच बौस के मन में क्या चल रहा है. एक बार मेरा जीवन बरबाद करने से उस का मन नहीं भरा. उम्र के 40वें पायदान पर आ कर भी उस के भीतर का जहर जस का तस है.

‘‘तुम बौस को हलके में ले रही हो,’’ विशाल नाराज हो गया.

‘‘मैं अपनी नुमाइश नहीं करवाना चाहती.’’

‘‘इस में नुमाइश की क्या बात है? इस उम्र में वह तुम पर मरने से रहा. वैसे भी उस की बीवी किसी से कम नहीं है,’’ विशाल ने मजाक किया.

‘‘गैर की बीवी सभी को अच्छी लगती है,’’ मैं बोली.

‘‘तुम तो ऐसे कह रही हो मानो वह तुम पर फिदा है.’’

मैं संभल गई. अगर बात आगे बढ़ती है तो कहीं कुछ गलत न जबान से निकल जाए.

‘‘तुम्हें चलना ही होगा,’’ विशाल ने हुक्म सुना दिया.

मैं असमंजस में पड़ गई. एक बारगी तो किसी तरह छिपा लिया मगर इस बार तो उसी के सामने बैठना पड़ेगा. कैसे उस आदमी से नजरें मिला पाऊंगी? न जाने की वजह तो कुछ होगी या तो बीमार पड़ जाऊं या फिर कहीं चली जाऊं. इतनी जल्दी कहीं जाने का मतलब खुद को शक में डालना. आखिरकार मु झे विशाल की बात माननी पड़ी.

‘‘आओ, आओ विशाल बैठो,’’ जैसे ही हम दोनों ने उस के कमरे में दाखिला किया शेखर ने मुसकरा कर स्वागत किया. मैं बेहद सकुचाई हुई थी. बारबार मेरी नजरें शेखर की बीवी को खोज रही थीं. वह आए तो मैं उसी के साथ उस के किसी निजी कमरे में जा कर बैठ जाऊं. थोड़े इंतजार के बाद उस की बीवी नमूदार हुई तो मु झे कुछ राहत मिली. चाय की ट्रे रखते हुए वह भी मेरे साथ के सोफे पर बैठ गई.

मैं ने महसूस किया कि जितनी देर मैं शेखर के सामने बैठी रही वह मु झे चोर नजरों से देखता

रहा. उस की नजरों में मैं ने वासना की लकीरें देखीं. किसी तरह 2 घंटे बीते. वह तो चाहता था कि मैं कुछ देर और रुकूं. मगर घर का वास्ता दे कर मैं ने किसी तरह विशाल को चलने के लिए मना लिया. जैसे ही घर पहुंची मैं ने राहत की सांस ली. ऐसा लगा जैसे किसी भेडि़ए की कैद से मुक्त हो कर आई हूं. सचमुच शेखर भेडि़या ही तो था. पता नहीं उस के मन में मु झे ले कर क्या चल रहा है. मैं एक बार फिर से उसी दुनिया में चली गई जिसे ले कर मेरा मन हमेशा बेचैन रहता था. पता नहीं शेखर कौन सा खेल मेरे साथ खेले.

‘‘बौस बेहद खुशमिजाज आदमी हैं,’’ विशाल उन की शान मे कसीदे पढ़ रहा था. वहीं में अंदर ही अंदर कुढ़ रही थी. वह कितना शरीफ और खुशमिजाज आदमी है वह मु झ से बेहतर कौन जान सकता है. एक बात के लिए मैं आश्वस्त थी कि शेखर कभी भी विशाल से मेरे अतीत की चर्चा नहीं करेगा क्योंकि वह एक जिम्मेदार पद पर था. हां कोई और रास्ता अपना सकता है मु झे पाने का तो वह अलग बात थी.

बात आईगई हो गई. 15 दिन बीते होंगे. एक दोपहर अचानक शेखर मेरे घर आ

धमका. एकाएक उसे आया देख कर मैं घबरा गई. उस समय विशाल आफिस में था. फिर यह कैसे यहां आ गया? बिना किसी हिचक के वह सीधे मेरे डाइनिंगरूम में घुस कर बैठ गया.

‘‘परेशान मत होना. मैं तुम्हारा हाल लेने आया हूं. कैसी हो?’’ शेखर बोला.

‘‘ठीक हूं. आप को यहां अकेले नहीं आना चाहिए था. विशाल क्या सोचेगा?’’ मैं अंदर से डरी हुई थी.

‘‘कुछ नहीं सोचेगा. आज ही मैं उसे प्रमोशन का लैटर दे कर आया हूं. उसे वह अपने दोस्तों से सैलिब्रेट कर रहा होगा,’’ कह कर उस के चेहरे पर मादक मुसकान फैल गई.

‘‘कृपा कर के यहां से चले जाइए. एक बार आप ने मेरी जिंदगी बरबाद की. अब जब मैं संभलने लगी हूं तो कुदरत के लिए मेरी गृहस्थी में आग मत लगाइए,’’ मैं गिड़गिड़ाई.

‘‘चला जाऊंगा. एक बार मेरे करीब आ जाओ,’’ उठ कर वह मेरे करीब आने लगा. जैसे ही उस ने मेरा हाथ पकड़ा मैं ने जोर से उसे धकेल दिया. वह सोफे पर गिर पड़ा. उस ने जैसा सोचा था वैसा हुआ नहीं. उस ने सोचा था कि विशाल की प्रमोशन की खबर पा कर मैं खुद चल कर उस की अंकशायिनी बन जाऊंगी. मगर हुआ इस का उलटा. उसे अपनी ही इज्जत का भय सताने लगा.

‘‘तुम इस घटना का जिक्र किसी से नहीं करोगी,’’ शेखर सरैंडर की भूमिका में था. वह जैसे ही बाहर की तरफ बढ़ा उस का सामना विशाल से हो गया.

‘‘सर, आप यहां?’’ उसे अचरज हुआ.

‘‘मैं ने सोचा तुम्हारेप्रमोशन की खबर तुम से पहले तुम्हारी बीवी को मैं दे दूं,’’ कह कर शेखर तेजी से अपनी कार की तरफ बढ़ गया.

‘‘यह यहां क्यों आया था?’’ विशाल की त्योरियां चढ़ गईं.

‘‘मैं क्या जानूं?’’ मैं ने कहा.

‘‘सचसच बता दो तुम दोनों का क्या चक्कर है?’’ विशाल चीखा, ‘‘मैं पहले से ही देख रहा हूं कि तुम शेखर के नाम से भागती रही हो.’’

मैं फफकफफककर रो पड़ी.

‘‘आप को अपनी बीवी पर भरोसा नहीं?’’

‘‘आज तो बिलकुल नहीं करूंगा. तुम्हें बताना ही होगा कि वह यहां किसलिए आया था?’’

मेरे लिए आगे कुंआ पीछे खाई थी.  झूठ बोलती तो विशाल यकीन नहीं करेगा. सच बोलती हूं तो विशाल को खोना होगा. कोई

पति ऐसी पत्नी को नहीं रखना चाहेगा जिस का अतीत दागदार हो. अंत: मैं ने सच बोलना मुनासिब सम झा.

सुन कर विशाल का खून खौल गया, ‘‘इतना गिरा हुआ इंसान है वह?’’

‘‘मैं पहले ही उस के घर जाने से मना कर रही थी. मगर आप माने नहीं. मु झे आप की जिद के आगे  झुकना पड़ा.’’

विशाल के सामने 2 ही विकल्प थे या तो अपना तबादला करा के दूर चला

जाए जो संभव नहीं था. इस शहर में उस का खुद का मकान था. लंबे समय से वह इस शहर का बाशिंदा था. इस शहर की रगरग से वह वाकिफ था. अपरिचित शहर में जा कर फिर से खुद को जमाना आसान न था. शेखर इतनी जल्दी हार मानने वाला इंसान न था. हो सकता है वह विशाल के कामकाज में रोड़ा अटकाए. आखिरकार विशाल ने वही किया जिस के लिए उस के मन ने इजाजत दी.

‘‘मैं तुम्हें घुटघुट कर जीने नहीं दूंगा. तुम बिना कुसूर दंड भुगत रही हो. आज वक्त आ गया है कि असली अपराधी सलाखों के पीछे हो.’’

‘‘तुम ऐसा नहीं करोगे विशाल. हम यहां से बहुत दूर चले जाते हैं.’’

‘‘यह कोई समस्या का समाधान नहीं हुआ. शेखर तुम्हारा पीछा छोड़ने वाला नहीं.

वह जीवनपर्यंत तुम्हारे जेहन में रहेगा. उसे सबक सिखा कर ही तुम मुक्त हो पाओगी,’’ विशाल बोला.

‘‘बदनामी का क्या होगा?’’

‘‘कुछ नहीं होगा. समाज में ऐसे अपराध हो रहे हैं. उस का एक ही इलाज है खुल कर सामने आना और ऐसे अपराधी को दंडित करवाना.’’

‘‘क्या तुम मेरे अतीत को भूल पाओगे? क्या वह तुम्हें कांटे की तरह हमेशा चुभेगा नहीं? वह स्त्री तुम्हारी पत्नी है जिस के साथ दुष्कर्म हुआ. क्या इसे पचा पाओगे?’’

मेरे सवालों पर विशाल कहने लगा, ‘‘मेरी बहन के साथ भी ऐसा ही हुआ. समाज, रिश्तों का भय था जिस ने उसे आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया.’’

उस की स्वर बिंध गया. विशाल मेरे करीब आया, ‘‘मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता. मैं उस सोच को खत्म करना चाहता हूं जो एक बलात्कृत महिला को अभिशापित जीवन जीने के लिए मजबूर करती है. बलात्कार एक अपराध है मगर इस का मतलब यह नहीं कि वह महिला विकलांग हो गई. जब विकलांग सिर उठा कर जी सकता है तो एक बलात्कृत महिला क्यों नहीं? जब तक ऐसी महिला को सम्मान की नजर से नहीं देखा जाएगा तब तक बलात्कार करने वाले बेखौफ अपराध कर के समाज में घूमते रहेंगे. उन्हें कभी दंड नहीं मिलेगा.’’

‘‘क्या उसे दंड दिलाना आसान होगा?’’ मैं सशंकित थी.

‘‘पुरुषोचित्त समाज में स्त्री को न्याय मिलना आसान नहीं होता. इंद्र ने अहिल्या के साथ धोखे से संबंध बनाया तब बेकुसूर होने पर भी अहिल्या को ही पत्थर बन जाने का शाप मिला. मगर मैं तुम्हारे साथ ऐसा नहीं होने दूंगा. मैं तुम्हें न्याय दिलाने के लिए अंतिम सांस तक खड़ा रहूंगा.’’

‘‘नहीं विशाल, काफी समय गुजर चुका है. दूसरे वकील मु झ से अनापशनाप सवाल करेंगे, जिन का जवाब देना आसान न होगा.’’

‘‘कोशिश तो कर सकते हैं. एक वकील मेरी जानपहचान का है उस से राय लेते हैं.’’

‘‘बलात्कार के केस में मैडिकल एक महत्त्वपूर्ण सुबूत होता है.

उस के आधार पर ही एफआईआर दर्ज होती है. आप का केस काफी पुराना है. इसलिए इस में कुछ किया नहीं जा सकता,’’ वकील ने साफसाफ कहा.

सुन कर हम दोनों निराश हो गए.

‘‘शेखर मेरी अनुपस्थिति में मेरे घर में आ कर मेरी बीवी से जबरदस्ती की.’’

‘‘शेखर कह सकता है कि आप ने उसे बुलाया इसलिए आया. दूसरे जबरदस्ती करते हुए किसी ने देखा? कोई चश्मदीद गवाह है?’’

वकील के कथन ने रहीसही कसर भी पूरी कर दी.

वकील आगे कहता रहा, ‘‘आप चाहें तो एफआईआर दर्ज करवा सकती हैं मगर उसे दंड दिलवाना आसान न होगा.’’

‘‘इस का मतलब वह ऐसे ही अपराध करता रहेगा और हम महिलाएं सहती रहेंगी?’’

वकील के पास इस का कोई जवाब न था. घर आ कर हम दोनों ने इस पर काफी विचार किया. ऐसा लग रहा था मानों कुकर्म कर के शेखर हमें चिढ़ा रहा हो. बारबार शेखर की कुटिल मुसकान मेरी आंखें के सामने तैरती रही. तब मैं ने भी जिद पकड़ ली कि चाहे कुछ भी हो जाए शेखर को कोर्ट में जरूर खींचूंगी, इस विश्वास और रोशनी के साथ हम दोनों नामुमकिन से लगने वाले न्याय के लिए निकल पड़े.

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