Ek Kachori Do Samosa : दिल्ली की सड़कों पर महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों और पुरुषवादी सोच के विरोध में आयोजित एक प्रदर्शन का वीडियो सोशल मीडिया पर जबरदस्त सुर्खियों में है. इस प्रदर्शन की खास बात यह रही कि इस में पारंपरिक गंभीर नारों के साथसाथ युवतियों ने तुकबंदी और रचनात्मकता से भरे अनूठे स्लोगन का इस्तेमाल किया, जिस ने इंटरनेट पर लोगों का ध्यान खींच लिया है.

प्रदर्शन के दौरान युवतियों ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए ‘एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा’, ‘एक सुट्टा दो चाय, मर्द जात हायहाय’, ‘क्यूटी नहीं, क्रांति हूं’ और ‘शर्म नहीं है मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में…’ जैसे नारे बुलंद किए.

सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते ही कमैंट सैक्शन में नेटिजंस के बीच अनोखी स्लोगन बैटल शुरू हो गई. एक यूजर ने लिखा, ‘गरमगरम वड़ा पाव, मर्द जात सुधर जाओ’, तो जवाब में पुरुषों ने भी तुकबंदी करते हुए लिखा, ‘1 इडली, 2 डोसा, हर मर्द नहीं एकजैसा.’

गंभीर मुद्दे पर उठे इन अनोखे और मीम स्टाइल वाले नारों ने महिलाओं की सुरक्षा की बहस को एक नया मोड़ दे दिया है, जिस में महिला और पुरुष एकदूसरे पर तंज कस रहे हैं. पुरुष यह कह रहे हैं कि आप हर किसी को एकसा नहीं कह सकते हैं न, कुछ बुरे मर्दों के चलते आप पूरे मर्द जात को नहीं कोस सकते, उन के साथ एकसा व्यवहार नहीं कर सकते, सभी मर्दों को दोषी नहीं मान सकते. उन में से कुछ मर्द अच्छे भी तो होंगे. आप का बाप है, आप का भाई है, आप उन को भी उस में शामिल कर रहे हो, जबकि ये कुछ ही परसेंट हैं जो ऐसा करते हैं.

वहीं कुछ लोगों का कहना है कि अगर लड़कियां इस तरह के स्लोगन कह रही हैं तो क्या हुआ. इस में कुछ गलत नहीं है, आप लड़कों के पेट में क्यों दर्द हो रहा है? अगर बोला जा रहा है तो आप सब एक से हो, हमेशा से आप ने लड़कियों को अपनी प्रौपर्टी समझा है, जिन के साथ आप जब जो चाहे कर सकते हैं. लेकिन अब यह समझना होगा कि लड़कियां किसी की प्रौपर्टी नहीं हैं कि उन के साथ कुछ भी किया जाए.

एक नई बहस

इस तरह के स्लोगन को ले कर लोगों के बीच एक बहस भी छिड़ गई है. कुछ लोग कह रहे हैं कि ये स्लोगन आप ने खुद कमाए हैं लड़कियों से, ये आप की कमाई हैं इतने सालों की, जो आप को यह सब सुनने को मिल रहा है. आप ने यही तो कमाया है कि आप के लिए बोला जा रहा है सब मर्द एक से हैं. जो व्यवहार शुरू से महिलाओं के साथ आप का रहा है आप इस का खमियाजा भुगत रहे हो. यही तो कमाया है आप ने लड़कियों से, कि वे आप को ये सब बातें बोल रही हैं, तो अब आप सुनो, जो जैसा आप ने बोया, अब आप वैसा ही काट रहे हो, फिर क्यों बिलबिला रहे हो अगर ऐसे स्लोगंस आप को दिख रहे हैं?

क्या आप अपनेआप को ठीक करने को तैयार हो? शायद नहीं, और आप को तो ठीक कराने वाला कोई है नहीं, इन लड़कियों के अलावा. आप की जो अपनी बिरादरी है, वह आप को यह शिक्षा नहीं दे रही है कि तुम कैसे ठीक रहो? लड़कियों की कैसे इज्जत करो?

आज भी यही कहा जा रहा है कि लड़कियों को कि तुम घर के अंदर बंद रहो. लड़कों को यह भी नहीं कहा जा रहा है कि तुम लड़कियों के साथ इज्जत से पेश आओ. मतलब सड़क पर चलते हुए एक मंदिर को तो नमस्कार कर दो, लेकिन लड़की दिखाई दे तो उस को ताके बगैर और सीटी बजाए बगैर मत चलना और खासतौर पर अगर वह अकेली है तो उस के साथ कुछ भी करने का लाइसेंस मिल जाता है आप को.

इसलिए ये स्लोगंस और उन के जवाब में पुरुषों द्वारा दिए जा रहे काउंटर स्लोगंस केवल इंटरनैट का मनोरंजन भर नहीं हैं. यह सतही तौर पर भले ही एक ‘जैंडर वार’ या मीम कंटेस्ट नजर आए, लेकिन इस के पीछे सदियों से चली आ रही पितृसत्तात्मक सोच, महिलाओं के जेहन में जमा आक्रोश और बदलते सामाजिक संतुलन की गहरी कहानी छिपी है.

सवाल यह उठता है कि क्या आज की महिलाओं में यह तीखी आवाज उठाने और बराबरी का दावा करने की हिम्मत केवल एक ट्रेंड है या फिर यह 1947 के बाद बने हमारे संविधान, कड़े कानूनों, शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता का वह नतीजा है जो 79 सालों बाद समाज के सामने एक आईना बन कर खड़ा हुआ है?

जवाब है कि कम से कम आज की तारीख में औरतें इस काबिल हो गई हैं कि वे आवाज उठा सकती हैं कि हम आप की संपत्ति नहीं हैं. आज कुछ लड़कियों में इतनी हिम्मत है कि वे यह कह सकती हैं कि तुम हमारे को वह मत समझो, हम हर एक पर भरोसा करेंगे यह जरूरी नहीं है. हां, यह हमारी मरजी है. यह जो कमाल है, यह टेक्नोलौजी का है, ऐजुकेशन का है, कौंस्टिट्यूशन का है, अधिकारों का है. जिस ने औरतों को यह आवाज दी कि वे अपने लिए खड़ी हो सकी हैं और उन में अपनी बात कहने की हिम्मत आई है.

दरअसल, मीडिया पर चल रही यह बहस केवल मनोरंजन का विषय नहीं है. यह समाज में आ रहे एक बहुत बड़े वैचारिक और सांस्कृतिक बदलाव को दर्शाती है.

क्या इस तरह के स्लोगन बोलने की हिम्मत महिलाओं में कानून और संविधान से आई है और कैसे?

यह बदलाव रातोंरात नहीं आया है, बल्कि दशकों की कानूनी, संवैधानिक और शैक्षिक प्रगति का नतीजा है. कांग्रेस के कार्यकाल में जो कानून पारित हुए उस ने महिलाओं की स्थिति को लगभग पूरी तरह बदलने का काम किया है. महिलाओं का उत्पीड़न रोकने और उन्हें हक दिलाने के लिए इन कानूनों ने बहुत कुछ ऐसा किया है जिस से महिलाएं भी आज पुरुषों से कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं.

संवैधानिक समानता का अधिकार ने महिलाओं को हिम्मत दी

भारत का संविधान (1950) महिलाओं को समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14, 15) और जीवन व स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21) देता है. जब संविधान ने महिलाओं को ‘नागरिक’ के रूप में पुरुषों के बराबर दरजा दिया, तो उस ने दशकों पुरानी उस सोच को तोड़ा जिस में स्त्री को किसी की ‘संपत्ति’ या ‘संरक्षण’ में रहने वाली वस्तु माना जाता था.

इन कानूनों ने महलाओं को हिम्मत दी

कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न विरोधी कानून (POSH), घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम (2005), संपत्ति में बेटियों का समान अधिकार (2005 में हिंदू उत्तराधिकार संशोधन) और सख्त बलात्कार विरोधी कानून (2013 के बाद) इन सब ने महिलाओं को एक ‘सैफ्टी नेट’ (सुरक्षा कवच) दिया.

ऐजुकेशन और आर्थिक स्वतंत्रता ने उन्हें आवाज दी

जब लड़कियां शिक्षित हुईं, नौकरियां करने लगीं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुईं, तो उन की निर्भरता खत्म हुई. सोशल मीडिया और तकनीक ने उन्हें एक ऐसा मंच दिया जहां वे बिना किसी झिझक के अपनी बात रख सकती हैं और एकदूसरे के साथ एकजुट हो सकती हैं. कानून ने महिलाओं को केवल अधिकार ही नहीं दिए, बल्कि उन में यह विश्वास जगाया कि वे किसी की जागीर नहीं हैं और अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार या रूढ़िवादिता के खिलाफ आवाज उठा सकती हैं.

स्वायत्तता और सहमति का अधिकार

आज महिला अपनी जिंदगी, अपनी शादी, कैरियर और शरीर से जुड़े फैसले खुद लेने के लिए स्वतंत्र है. वह कमा रही है इसलिए अपनी पसंद बता सकती है और अगर कोई फैसला चाहे वह माता द्वारा लिया गया हो या पति के द्वारा, वह उस का विरोध करने का अधिकार रखती है.

आर्थिक और संपत्ति का अधिकार

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 (The Hindu Succession Act) में और 2005 में हुए संशोधन के बाद एक बेटी चाहे वह शादीशुदा हो या न हो, अपने पिता की संपत्ति को पाने का बराबरी का हक रखती है. अपने पिता और उस की पुश्तैनी संपत्ति में भी लड़कियों को अपने भाइयों और मां जितना हक मिलता है. अगर पिता ने कोई वसीयत नहीं की है तब भी उन्हें भाइयों के बराबर ही हक मिलेगा. यहां तक कि अपनी शादी हो जाने के बाद भी यह अधिकार उन्हें  मिलेगा. उस में मान लिया कि यह बराबर की हिस्सेदार है. जितना हिस्सा भाई का है उतना ही हिस्सा बहन का भी है. इसका नतीजा यह हुआ कि मायके में शादी के बाद महिलाओं की स्थिति काफी मजबूत हो गई. महिलाएं परिवार की पैतृक संपत्ति में बराबर की हकदार हैं और अपनी कमाई पर उन का पूर्ण नियंत्रण है.

शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार

चाहे घर हो, सड़क हो या औफिस किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार, तानाशाही या उत्पीड़न के खिलाफ कानूनी काररवाई करने का स्पष्ट अधिकार उन के पास है. पहले महिलाओं के साथ ससुराल में बहुत मारपीट होती थी. उन्हें अपनी हर नाजायज मांगें मनवाने के लिए मजबूर किया जाता था. लेकिन इस कानून की वजह से महिलाओं की स्थिति में बहुत बदलाव आया. आज कोई महिला अपने ऊपर हुए अत्याचार के खिलाफ आवाज उठती है, तो उस का पूरा मायका भी उस के साथ खड़ा हो जाता है क्योंकि उन्हें पता है कि कानून उन का साथ देगा. यहां तक कि लिवइन रिलेशन में रहने वाली महिला को घरेलू हिंसा कानून के तहत प्रोटेक्शन का हक मिला हुआ है. अगर उसे किसी भी तरह से प्रताड़ित किया जाता है तो वह उस के खिलाफ शिकायत कर सकती है. लिवइन में रहते हुए उसे राइट टू शेल्टर भी मिलता है.

पुरुष वर्ग अब भी बदलने को तैयार क्यों नहीं

पितृसत्तात्मक स्थिति : सदियों से पुरुषों को यह सिखाया गया है कि वे परिवार या समाज के ‘प्रमुख’ हैं. इस विशेषाधिकार को छोड़ने में कई लोगों को असुरक्षा महसूस होती है. यही वजह है कि वे खुद को महिलाओं का मसीहा समझते हैं और उन्हें अपने पैर की जूती समझते हैं फिर वह औरत उन के घर की हो या कोई भी और महिला हो.

लड़कों के पालनपोषण में कमी : आज भी कई परिवारों में बेटियों को तो ‘संस्कार’, ‘सहनशीलता’ और ‘मर्यादा’ सिखाई जाती है, लेकिन बेटों को यह नहीं सिखाया जाता कि महिलाओं की सहमति और उन की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान कैसे किया जाए? यही वजह है कि जब भी  महिलाओं के साथ कुछ गलत होता है तो उन्हें घर बैठने और औनलाइन क्लास लेने की सलाह दी जाती है लेकिन पुरुषों को अपनी सोच और नजर बदलने की नसीहत नहीं दी जाती.

साथियों का दबाव : पुरुषों के समूह में अकसर महिलाओं पर टिप्पणी करने या उन्हें वस्तु की तरह देखने को ‘कूल’ या ‘मर्दानगी’ से जोड़ कर देखा जाता है. जब तक पुरुष बिरादरी खुद एकदूसरे की गलत हरकतों को टोकना शुरू नहीं करेगी, तब तक व्यवस्थागत सुधार मुश्किल है.

इस तरह के स्लोगन से आपत्ति क्यों

यह गुस्सा केवल स्लोगन से नहीं है, बल्कि इस बात से है कि सदियों से चला आ रहा शक्ति का संतुलन अब बदल रहा है. जब महिलाएं मजाक के जरीए या सीधे तंज कस कर सवाल पूछती हैं, तो यह उस पुरुष वर्चस्व पर चोट करता है जिस की आदत समाज को रही है.

सोशल मीडिया पर चल रहे ये स्लोगन भले ही हंसनेहंसाने के लिए बनाए गए मीम्स लगें, लेकिन इन के पीछे सदियों का जमा हुआ आक्रोश और अनुभव है. महिलाओं का यह कहना गलत नहीं है कि उन्होंने यह गुस्सा ‘कमाया’ नहीं है, बल्कि समाज के रवैये के जवाब में यह बाहर आ रहा है. यह इस बात का संकेत है कि अब महिलाएं खामोश रह कर किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार को सहने के लिए तैयार नहीं हैं.

समाधान ‘एक कचौरी दो समोसा’ बनाम ‘एक इडली दो डोसा’ के टकराव में नहीं है, बल्कि इस बात को स्वीकार करने में है कि महिलाओं को बराबरी और सम्मान का पूरा हक है. इसलिए अब पुरुषों को अपनी सोच बदल कर अगली पीढ़ी को बेहतर बनाना होगा.

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