Short Story :  सरिता   बीए सैकंड ईयर की स्टूडैंट रोज बस से हरियाणा की कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी पढ़ने जाती क्योंकि पिहोवा में उस समय कालेज नहीं था.

जी हां यह बात है 1982 की. उस समय पिहोवा में एक भी कालेज नहीं था, जहां 10वीं के बाद पढ़ने के लिए मातापिता अपने बच्चों को भेज सकें. कुछ तो पास के शहरों में अंबाला, कुरुक्षेत्र या कैथल पढ़ने चले जाते और कुछ लड़कियां बेचारी चुपचाप घर का कामकाज सीखतीं और फिर उन की शादी कर दी जाती और लड़के पिता के साथ कारोबार में लग जाते. उन की भी 2-4 साल बाद शादी कर दी जाती. बस फिर वही घरगृहस्थी, बच्चे, परिवार. इसी सब में कब लड़कपन खत्म हो जाता पता ही न चलता.

सरिता ने भी 10वीं क्लास तक तो पिहोवा में ही पढ़ाई की, मगर उस का मन आगे पढ़ने का मन था. वैसे भी पढ़ाई में होशियार थी तो अध्यापकगण भी प्रोत्साहित करते कि तुम आगे पढ़ना, पढ़ाई छोड़ मत देना. इसीलिए अभी पेपर चल ही रहे थे कि सरिता ने एक दिन मां से कहा, ‘‘मम्मी, मु?ो आगे पढ़ना है, मेरी सारी सहेलियां आगे पढ़ने के लिए कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेंगी, मु?ो भी पढ़ना है. आप पापा से कह कर परमिशन दिलवा दो न.’’

‘‘बेटा तु?ो पता है तेरे पापा कितने गुस्से वाले हैं, वे तु?ो कहीं बाहर जाने की परमिशन नहीं देंगे, फिर भी मैं कोशिश करती हूं उन्हें मनाने की.’’

अगले दिन सरिता की मां, ‘‘बेटा पापा ने पढ़ने की परमिशन तो दे दी मगर कुरुक्षेत्र नहीं कैथल जाना होगा. कैथल आईजी कालेज गर्ल्स कालेज है. कुरुक्षेत्र को ऐजुकेशन है वहां के लिए पापा ने मना कर दिया है.’’

सरिता ने सोचा कि चलो पढ़ने की परमिशन तो मिली. उस की कुछ सहेलियां कैथल जा रही थीं और कुछ कुरुक्षेत्र.

उस ने सोचा कि चलो कैथल ही सही और उस ने कैथल प्रैप में एडमिशन ले लिया (उस समय हरियाणा में 10वीं के बाद प्रैप और उस के बाद ग्रैजुएशन होती थी). रोज बस द्वारा पिहोवा से कैथल जाते सब.

पिहोवा से कैथल जाते हुए रास्ते में छोटेछोटे गांवों से बहुत स्टूडैंट्स बस में चढ़ते जिस में सीवन गांव के स्टूडैंट्स भी थे जो दादागिरी करते. कभी किसी लड़की के नितंबों पर हाथ मारते तो कभी किसी के गालों को चूमते और कभी किसी की छाती अपने हाथों से इतनी जोर से पकड़ कर मसलते कि लड़की की चीख निकल जाती और वे सब लड़के खिलखिला कर हंसते.

इस तरह ये सब बस में रोज का काम था लेकिन गनीमत थी कि सरिता के साथ कोई ऐसा हादसा नहीं हुआ था. लेकिन फिर भी उसे हर वक्त यही डर लगा रहता न जाने कब उस के साथ भी यह हादसा हो जाए.

एक दिन उस ने मां से कह दिया, ‘‘मां, मैं रोज डरते हुए कालेज जाती और आती हूं ताकि मैं सहीसलामत घर पहुंच जाऊं. मैं जानती हूं पापा बहुत गुस्से वाले हैं कहीं कोई ऊंचनीच हो गई तो मु?ो मार डालेंगे. लेकिन अगर सच में ऐसा कुछ हो गया तो मैं उन के मारने से पहले ही खुदकुशी कर लूंगी. अगर मेरी सलामती चाहते हो तो मु?ो यहां कैथल के कोलज के बजाय कुरुक्षेत्र भेजें, मैं वहां सुरक्षित रहूंगी. मैं ने कुरुक्षेत्र वाली सभी सहेलियों से वहां का पता कर लिया है,’’ और उस ने मां को रास्ते में होने वाली सभी हरकतों के बारे में बता दिया.

मां समझदार थीं. बेटी की बात समझ गईं कि यहां से किसी न किसी दिन बेटी की लाश ही आएगी. इसलिए उस ने पति को समझाबुझा कर बेटी को अगले साल यानी बीए प्रथम वर्ष में कुरुक्षेत्र युनिवर्सिटी में दाखिला दिला दिया.

अब सरिता कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी आराम से पढ़ने जाती. उस की एक आदत थी, चाहे गरमी हो या कड़कती सर्दी वह हमेशा बस में खिड़की के पास बैठती और वह भी खिड़की खोल कर.

एक दिन वह बातों में इतनी मशगूल हो गई कि उस का दुपट्टा गले से निकल कर खिड़की से बाहर उड़ गया और उसे पता तक न चला. लेकिन जब बस से उतरी तो देखा गले में दुपट्टा ही नहीं. बस में देखा कहीं नजर नहीं आया.

हैरानपरेशान सहेलियों से बातें कर रही थी कि दुपट्टा कहां गया कि इतने में एक बाइक पास आ कर रुकी, ‘‘ऐक्सक्यूज मी.’’

इस से आगे बाइक वाला कुछ कहता उस से पहले ही सरिता की सहेली परवीन की नजर उस दुपट्टे पर पड़ गई. बोली, ‘‘सरिता देख यह तो तेरा दुपट्टा है.’’

‘‘हां यार, यह मेरा ही दुपट्टा है.’’

‘‘लेकिन यह आप के पास कहां से आया?’’ सरिता बाइक वाले से पूछने लगी.

‘‘मैम मैं बाइक से आ रहा था तो जैसे ही आप की बस ने मुझे ओवरटेक किया एक दुपट्टा खिड़की से उड़ कर मु?ा पर आ गिरा. यह तो गनीमत है मेरे चेहरे पर नहीं आया, वरना मेरा ऐक्सीडैंट भी हो सकता था. तब मैं ने बाइक बहुत तेज दौड़ाई ताकि आप को आप का दुपट्टा पकड़ा सकूं. मैं ने एक बार बस के नजदीक पहुंच कर आप को आवाज भी दी लेकिन आप बातों में मशगूल थीं और बस आगे निकल गई. यह लीजिए संभालिए अपनी अमानत.’’

सरिता ने दुपट्टा ले कर कहा, ‘‘शुक्रिया, आप को मेरे दुपट्टे के कारण इतनी दूर आना पड़ा.’’

‘‘जी नहीं मैम ऐसी कोई बात नहीं, मैं रोज इधर ही आता हूं. मैं यहां के ला कालेज में पढ़ रहा हूं. वैसे मैं भी पिहोवा से ही हूं. कभीकभी जब यह मेरी सहेली बाइक, गुस्सा हो जाती है तो बस से आता हूं. आप को याद नहीं एक बार बस में मैं आप के साथ वाली सीट पर ही बैठा था.’’

‘‘ओह, तो आप ला कर रहे हैं, वैरी नाइस. मैं बीए के द्वितीय वर्ष में हूं.’’

‘‘फिर तो रोज मुलाकात होती रहेगी, आप का दुपट्टा उड़ जाएगा और हम उसे लौटाने आएंगे, वैसे बंदे को साहिल कहते हैं,’’ कहते हुए बाइक वाला हंसने लगा.

सरिता भी हंस पड़ी,’’ साहिलजी अब हम अपने दुपट्टे को संभाल कर रखेंगे.’’

अकसर आतेजाते साहिल की सरिता से और सरिता की साहिल से नजरें टकरा जातीं और दोनों के चेहरों पर एक मुसकान आ जाती क्योंकि ला कालेज की बिल्डिंग ग्रैजुएशन कालेज के बाद थी. यूनिवर्सिटी के थर्ड गेट से ऐंटर करते ही पहले डिगरी कालेज उस से आगे ला कालेज, उस के बाद अन्य कालेज हैं इसलिए साहिल वहीं से हो कर गुजरता.

धीरेधीरे हायहैलो भी होने लगी. जब हायहैलो होने लगे तो बातें भी होने लगती हैं और बातें मुलाकातों में बदल जाती हैं.

इसी तरह साहिल और सरिता की भी मुलाकातों का सिलसिला चल पड़ा. कभी वे सब के साथ मिलते किसी मौके पर तो कभी अकेले में ही स्पैशल मीटिंग होने लगी. अर्थात उन की मुलाकातें प्यार में बदल गईं दोनों ने संग जीनेमरने के वादे किए.

अब तक साहिल की ला की पढ़ाई और सरिता की ग्रैजुएशन पूरी हो चुकी थी. लेकिन साहिल पिहोवा छोटा शहर होने की वजह से अपनी प्रैक्टिस कुरुक्षेत्र में ही करना चाहता था.

सरिता साहिल से दूर नहीं रह सकती थी और न ही पिहोवा जैसे छोटे शहर में वे मिल सकते थे इसलिए सरिता ने वहीं कुरुक्षेत्र में ही आगे पढ़ने का मन बनाया और मम्मी से कह कर पापा से आगे पढ़ने के लिए हां करवा ली. सरिता के बीए में भी बहुत अच्छे मार्क्स आए थे और उस के पिता दकियानूसी होते हुए भी होनहार बेटी को टोकने की हिम्मत नहीं जुटा सके.

सरिता आगे पोस्ट ग्रैजुएशन करने लगी और साहिल अपनी प्रैक्टिस. इसी तरह उन की मुलाकातों में कोई रुकावट न आई. उन का प्यार परवान चढ़ रहा था कि सरिता के घर में सरिता की शादी का जिक्र होने लगा.

‘‘साहिल मेरे घर वाले मेरी शादी की चर्चा कर रहे हैं और मैं तुम्हारे बिना किसी और की नहीं हो सकती. तुम जल्दी से कुछ करो वरना मेरी लाश ही जाएगी डोली में.’’

‘‘सरिता तुम चिंता मत करो तुम अपने पेरैंट्स से एक बार बात करने की कोशिश करो और मैं अपने पेरैंट्स से. पहले हम दोनों अपनेअपने पेरैंट्स की राय तो जान लें. फिर आगे सोचते हैं.’’

‘‘साहिल मैं अपने पापा से बात नहीं कर सकती. तुम अपने पेरैंट्स को मेरे घर भेज दो रिश्ता ले कर.’’

‘‘सरिता मेरे पेरैंट्स शायद न आएं.’’

‘‘ऐसा क्यों?’’

‘‘सरिता तुम मेरा पूरा नाम जानती हो.’’

‘‘नहीं तो? तुम ने कभी बताया नहीं, मैं ने कभी पूछा नहीं. होंगे अरोड़ाशरोड़ा. इस से क्या फर्क पड़ता है?’’

‘‘बहुत बड़ा फर्क है. मेरा पूरा नाम है ‘साहिल अलाउद्दीन.’’’

सुन कर एक पल के लिए सरिता चौंक गई, उसे काटो तो खून नहीं. लेकिन दूसरे ही पल संभल कर, ‘‘साहिल हम ने एकदूसरे से प्यार किया है, सरनेम से नहीं. हमारा प्यार सच्चा है. अब चाहे कुछ भी हो मैं किसी और के बारे में तो सोच ही नहीं सकती.’’

‘‘तो तुम क्या सोचती हो मैं तुम्हारे सिवा किसी और के बारे में सोचूंगा? जीएंगे तो साथ, मरेंगे तो साथ,’’ कहते हुए साहिल ने सरिता का हाथ अपने हाथ में ले लिया.

तभी साहिल के 2 खास दोस्त इरफान और राहुल भी आ गए. बोले, ‘‘क्या हुआ भई जो आज मरने की बातें क्यों है रही हैं?’’

साहिल ने सारी बात दोनों को बताई.

‘‘साहिल, सरिता आप दोनों चिंता न करो हम सब आप के साथ हैं. हम लोग भी आप दोनों के पेरैंट्स से बात करेंगे.’’

साहिल ने अपने अब्बू से जैसे ही सरिता के बारे में बात की, उस के अब्बू भड़क उठे, ‘‘लाहौल विला कूव्वत, तुम्हें उस पंडित की बेटी के अलावा और कोई लड़की नहीं मिली कुल जहान में? हम उस लड़की को अपने घर की शान कभी नहीं बनाएंगे.’’

‘‘अब्बू वे पंडित नहीं पंजाबी हैं.’’

‘‘कुछ भी हों, हमारी जमात से तो नहीं न.’’

‘‘अब्बू सरिता के पापा बहुत ही नेक

इंसान हैं.’’

‘‘हमें उन से क्यालेना?’’

‘‘तो फिर आप उन के पंजाबी होने के कारण सरिता को क्यों नहीं अपना रहे?’’

‘‘वह भी उन्हीं की लखतेजिगर है.’’

‘‘अब्बू मैं उस से मुहब्बत करता हूं.’’

‘‘खुदा जहन्नुम बखशे ऐसी मुहब्बत को जो अपने उसूलों के खिलाफ हो, आज के बाद उस का जिंक्र भी तुम्हारी जबां पर न हो. मैं कल ही तुम्हारी खाला जान की बेटी शर्मिला से तुम्हारा निकाह तय कर आता हूं.’’

इधर सरिता ने धीरे से मम्मी से बात करनी शुरू की, ‘‘मम्मी, क्या जरूरी है कि आप जो लड़का मेरे लिए ढूंढ़ेंगे वह सोलह आने आप की और मेरी उम्मीदों पर खरा उतरेगा?’’

‘‘बेटी उम्मीद तो हर इंसान यही करता है बाकी अपनी कुदरत जाने.’’

‘‘फिर तो कुछ दिन लड़के को देखपरख कर ही रिश्ता करना चाहिए.’’

‘‘तेरी बातों से तो लग रहा है तू ने लड़का देखपरख रखा है,’’ सरिता की मम्मी कहते हुए मुसकरा दीं.

‘‘मम्मी आप कितनी अच्छी हो, बिन कहे हर बात सम?ा जाती हो.’’

‘‘हां जैसे अब मैं यह भी सम?ा गई कि तू चाहती है मैं तेरे पापा से बात करूं.’’

‘‘मेरी प्यारी मम्मी,’’ कहते हुए सरिता उन के गले लग गई.

‘‘अच्छा बता तो कौन है, कैसा है, जिस ने हमारी बेटी को हम से दूर करने की सोची है?’’

‘‘मम्मी वह कैथल रोड पर बहुत बड़ी डेयरी है न…

‘‘क्या वह जो अब्दुल भाई की है?’’

‘‘हां, हां वही.’’

‘‘अच्छा उधर रहते हैं लड़के वाले? लेकिन उधर डेयरी के अलावा कोई बड़ा घर तो है नहीं. सब डेयरी के या भट्ठा मजदूर ही हैं शायद या कोई नया आया हो तो पता नहीं.’’

‘‘अरे नहीं मम्मी वे डेयरी वाले अंकल का बेटा.’’

सुनते ही सरिता की मम्मी का पारा 7वें आसमान पर, ‘‘क्या… आ… तू… तू

जानती भी है तू क्या कह रही है? तेरे पापा ताऊ, चाचा को पता चला तो तुम दोनों को जिंदा जमीन में गाड़ देंगे.’’

इतने में सरिता के पापा आ गए, ‘‘क्या हुआ है?’’ एक रोबीली आवाज गूंजी.

‘‘अरे… कु… कुछ भी तो नहीं हुआ, आप आज जल्दी आ गए?’’

‘‘बात बदलो मत. साफसाफ बताओ, क्या माजरा है?’’

सरिता की मम्मी उन का गुस्सा देख कर सम?ा गई कि कुछकुछ बात सुन चुके हैं इसलिए अब तो बताना ही पड़ेगा. इसलिए उन्हें सब बताना पड़ा.

सरिता के पापा सुन कर आगबबूला हो गए, ‘‘तुम जानती भी हो तुम कह क्या रही हो? अब हमारे लिए वह अब्दुल्ला ही रह गया इस जहान में रिश्ता जोड़ने के लिए? सारे जहां के लड़के मर गए हैं क्या? कान खोल कर सुन लो, इस घर में दोबारा ऐसी बात न हो. मैं अपने दोस्त रामजी को फोन करता हूं उस के बेटे के रिश्ते के लिए. उस की सहमति आते ही जल्द से जल्द इस की शादी कर देंगे.’’

इधर सरिता और उधर साहिल दोनों चिंतामग्न लेकिन उन्हें इस समस्या का को सुझाव नहीं मिल रहा. आखिर करें तो क्या करें?

एक दिन सरिता और उस की सहेलियां, साहिल और उस के दोस्ती सब एकसाथ बैठे इसी पर सोचविचार कर रहे थे लेकिन किसी के पास उन की इस समस्या का समाधान नहीं था.

अचानक सरिता की सहेली ने कहा, ‘‘अरे सुनो, क्यों न साहिल और सरिता घर से भाग जाएं और शादी कर लें और फिर कुछ दिन बाद दोनों के मातापिता के पास इन्हें अपनाने के सिवा और कोई रास्ता ही नहीं होगा.’’

‘‘तेरा दिमाग तो ठीक है, ये कैसी बातें कर रही है. तू जानती नहीं मेरे पापा को, मु?ो देखते ही मेरी गरदन काट देंगे,’’ सरिता गुस्से से बोली.

‘‘और मेरे अब्बू कौन सा किसी कसाई से कम हैं. जैसे ही पता चला कि हम दोनों ने शहर में कदम रखा है 10-12 लौंडे ले कर आएंगे और धाएंधाएं हमारे सीने में गोलियां दाग देंगे,’’ साहिल ने भी गुस्से से हाथ हिलाते हुए कहा.

‘‘दोस्त फिर और तो कोई रास्ता है नहीं या तो भाग कर शादी कर लो या तू सरिता की डोली को कंधा दे देना,’’ कह कर सभी दोस्त हंसने लगे.

इस बार साहिल के दिमाग पर यह बात असर कर गई और वे एक ?ाटके से उठा और सरिता का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘सरू अब मरना है या करना है. क्या तुम मेरा साथ दोगी?’’

सरिता ने भी हां में सिर हिला दिया और साहिल का हाथ पकड़ कर उठ खड़ी हुई.

उसी समय सभी साथी साहिल के दोस्त इरफान और राहुल और साथ में सरिता की सहेलियां परवीन और प्रियंका, सभी ने साथ जा कर उन की कोर्ट मैरिज करवा दी. साहिल अब तक छोटामोटा वकील बन चुका था और सारे कायदेकानून जानता था. स्पैशल मैरिज ऐक्ट कांगे्रस सरकार ने इन्हीं लोगों के लिए तो बनवाया था जिस में 2 धर्मों के लोग भी शादी कर सकते हैं.

राहुल के एक दोस्त के मामा का मुंबई में मौल था. उस ने साहिल को मौल में जौब दिलवा दी. साहिल और सरिता घर से भाग कर वहीं सैट हो गए.

इधर दोनों के परिवार एकदूसरे पर तोहमत लगा रहे थे और साहिल के और सरिता

के फ्रैंड्स से लगातार पूछताछ की जा रही थी. मगर सब अनजान बने रहे. किसी का भी मुंह न खुला.

आखिर कब तक ढूंढ़ते? राम मंदिर का हल्ला तब मचने लगा था पर इतना नहीं था कि लव जेहाद की बात कर के बहुतों के घर जला दिए जाएं.

6 महीने बीत गए दोनों परिवार बच्चों के न मिलने की उम्मीद ले कर चुप हो कर बैठ गए.

2 साल बाद साहिल और सरिता की एक प्यारी सी बेटी पैदा हुई, जिसे ले कर वे अपने शहर पिहोवा आई यह उम्मीद ले कर कि अब उन के मातापिता उन्हें अपना लेंगे.

मगर उस समय उन की उम्मीदों पर पानी फिर गया जब दोनों के परिवारों ने यह कहा कि साहिल और सरिता तो 2 साल पहले मर चुके हैं और वे इन दोनों को नहीं जानते.

साहिल के ही दोस्त इरफान ने पिहोवा में बहुत बड़ा मोबाइल शोरूम खोल रखा था. साहिल उस के शोरूम पर काम करने लग गया और दोनों उसी शहर में किराए का मकान ले कर रहने लगे.

अकसर कहीं बाजार में या किसी के फंक्शन में उन दोनों का जब भी अपने परिवार वालों के साथ टकराव होता है तो उन के परिवार वाले उन्हें देख कर भी अनदेखा कर देते.

इधर साहिल की बेटी बड़ी हो रही थी और वह देखती थी कि उस की सहेलियां नानी के घर जाती हैं या किसी की दादी उसे कोई तोहफा ला कर देती है तो वह भी अपने मातापिता से दादीनानी के बारे में पूछती.

एक दिन, ‘‘साहिल इस मासूम बच्ची को मैं क्या बताऊं कि इस की दादीनानी कौन हैं? अगर बता दिया तो कहीं यह बाजार में ही उन्हें आवाज दे कर न पुकार ले और अगर उन्होंने इसे ठुकरा दिया तो यह मैं बरदाश्त नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘सरिता तुम क्या सोचती हो मैं अपनी बच्ची को इस तरह देख पाऊंगा? इसलिए मैं ने फैसला किया है कि हम यह शहर फिर छोड़ देंगे. हम कहीं यहां से दूर चले जाएंगे.’’

‘‘लेकिन उस से क्या होगा साहिल बच्ची का सवाल तो फिर भी वही रहेगा न? सब से बड़ी बात है हम उसे क्या बताएं कि इस की दादीनानी कौन हैं?

‘‘हम इस से कह देंगे कि उस के कोई दादादादी और नानानानी नहीं हैं. जब बड़ी हो कर सम?ादार हो जाएगी तब बताएंगे,’’ कहते हुए साहिल की आंखें नम हो गईं.

साहिल को दोस्त राहुल और सरिता की सहेली प्रियंका की शादी उन के परिवार वालों की मरजी से हो गई थी और इत्तिफाक से वे दोनों साहिल और सरिता से मिलने के लिए आ गए और उन्होंने बाहर से इन दोनों की बातें सुन लीं.

उन्होंने दरवाजा खटखटाया तो साहिल और सरिता दोनों ने अपनी आंखें

पोंछीं और दरवाजा खोला.

‘‘आज कितने दिनों बाद आई है तू? मेरी याद नहीं आई क्या? जानती भी है कितने दिनों से तुझे गुडि़या याद कर रही थी. मौसी कब आएगी, मौसी कब आएगी, पूछपूछ कर मुझे परेशान कर दिया. तू ने उस से वादा किया था न कि तू हर हफ्ते उस से मिलने आएगी लेकिन अब देख 4 हफ्ते हो गए तुझे आए,’’ आते ही सरिता ने शिकायतों का पिटारा खोल दिया.

‘‘अरे बाबा… सांस तो ले लो और जरा मु?ो भी बोलने का मौका दो ताकि मैं तुम्हें बता सकूं कि मैं क्यों नहीं आ पाई? दरअसल राहुल के मामाजी को डैथ हो गई थी. हम सब लोग 15 दिन से दिल्ली उन्हीं के घर थे. उन के बच्चे अभी छोटे हैं, उन बेचारों को कुछ पता नहीं ऐसी बातों का तो मम्मीजी के साथ हम भी वहीं थे. अभी 2 दिन पहले लौटे हैं.’’

‘‘उफ… सौरी प्रियंका, राहुल हमें पत नहीं था यह सब.’’

‘‘कोई बात नहीं… हम ने भी तो बताया नहीं था. बस अचानक ही खबर मिली और उसी समय चले गए,’’ राहुल बोला.

सरिता सब के लिए पानी लाई और चाय इत्यादि पूछने पर प्रियंका की तरफ से कोरा सा जवाब सुन कर हैरान रह गई.

प्रियंका, ‘‘मु?ो नहीं पीनी चायवाय तेरे घर की और न ही तेरे हाथ से पानी पीना है.’’

‘‘प्रियंका, क्या हुआ तू इस तरह बात कर रही है आज…’’

‘‘और कैसे बात करूं तुम लोगों से? हम ने बाहर तुम्हारी सारी बातें सुन ली हैं. वैसे तो तू मुझे अपनी बहन कहती है, गुडि़या से कहती है मैं उस की मौसी हूं तो क्या मेरे मातापिता तेरे मातापिता नहीं और फिर वे गुडि़या के नानानानी नहीं? तू ने यह सोच भी कैसे लिया कि तुम यह शहर छोड़ कर हमेशा के लिए चली जाओगी. तू कल ही मेरे साथ मेरे मायके चल रही है और वह तेरा भी मायका है अर्थात कल हम दोनों बहनें अपने बच्चों को ले कर उन के नानानानी से मिलने जा रहे हैं, समझ या अच्छे से समझाऊं?’’

सरिता की आंखों से गंगाजमुना बहने लगी. वह कुछ भी न बोल पाई बस

चुपचाप प्रियंका के गले लग गई.

उस के चुप होने के बाद राहुल ने साहिल के गले में बांहें डाल कर कहा, ‘‘और साहिल क्या मैं तेरा भाई नहीं…?’’

‘‘क्यों नहीं यार… ऐसे क्यों बोल रहा है? तुम लोग होते तो हम कभी एक न हो पाते यार. तूने तो भाई से भी बढ़ कर किया है. गुडि़या तु?ो चाचू कहती है न? फिर तू ने यह सवाल क्यों किया?’’

‘‘वह इसलिए कि भाई के मातापिता तो अपने मातापिता होते हैं, फिर तू ने कैसे कह दिया कि गुडि़या से कह देगा कि उस के दादादादी नहीं हैं. अब से हर संडे को गुडि़या को उस के दादादादी से मिलाने लाया करना.’’

साहिल राहुल के गले लग कर फूटफूट कर रो पड़ा जैसे उस के अंदर लावा भरा हो और आज उसे बहा देना चाहता हो, सारा गुबार निकालना चाहता था. काफी देर बाद दोनों शांत हुए. आज उन दोनों को परिवार भी मिल गए थे. आज उन का सारा अधूरापन समाप्त हो गया था.

अगली सुबह गुडि़या अपनी नानानानी से मिलने के लिए तैयार हो रही थी. वह इतनी अधिक उत्साहित थी कि एक पल को चुप नहीं रही. न जाने कैसेकैसे सवाल सरिता से पूछ रही थी.

उस के सवालों से परेशान हो कर मुसकराते हुए सरिता बोली, ‘‘अब बस भी कर मेरी मां मेरा तो सिर दर्द होने लग गया है. कितने सवाल करती है. अब जो भी पूछना है नानी से पूछना.’’

‘‘ओह मम्मा, बस एक आखिरी सवाल, अगर मैं आप की मां हूं तो नानी आप की क्या हैं,’’ उस की बातें सुन कर सरिता हंसने लगी और उसे कस कर गले से लगा लिया.

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