Stories :  50 वर्षीय माधव का दिन आज बहुत व्यस्त था. इंदौर में औफिस की 2 दिन की मीटिंग थी. वे इतना थक गए थे कि होटल में डिनर के लिए भी जाने की हिम्मत नहीं थी. इस समय रात के 10 बज रहे थे. उन्होंने फोन पर ही अपने खाने का और्डर दे दिया और फ्रैश हो कर खाना आने तक अपनी पत्नी शोभा और बेटी केतकी से फैमिली काल पर बात भी कर ली.

शोभा ने टोका भी, ‘‘आज बहुत थक गए हो न?’’

‘‘हां, टूर पर तो ये सब चलता ही रहता है पर आज पता नहीं क्यों थकान लग रही है.’’

केतकी ने चिंतित स्वर में कहा, ‘‘पापा. हैल्थ के लिए इतना लेट डिनर भी ठीक नहीं है. कुछ लाइट ही खाना.’’

फिर केतकी को हंसी आ गई, ‘‘वैसे मुझे पता है कि आप ने पनीर, बटर मसाला और तंदूरी रोटी ही और्डर की होगी.’’

माधव को हंसी आ गई और हां कह दी.

तभी दरवाजे पर वेटर ने नौक किया तो शोभा और केतकी आवाज सुन कर बोलीं, ‘‘आप खाना खा लो. फिर टेक रैस्ट ऐंड गुड नाइट,’’ कह कर फोन रख दिया.

खाना खा कर रूम में ही 5 मिनट टहल कर माधव सोने लेट गए. माधव काफी ऐक्टिव, मेहनती पुरुष थे. टूरिंग जौब थी. अभी वे अपने शहर लखनऊ से इंदौर आए हुए थे. रात 2 बजे माधव की आंख कुछ बेचैनी से खुल गई. वे उठ कर बैठ गए, उन्हें सीने में दर्द होने लगा. उन्हें लगा लेट डिनर हुआ था, ऐसिडिटी होगी.

वे रूम में सीने पर हाथ रख कर इधरउधर टहलते रहे. फिर उन्हें सम?ा आ गया कि यह आम दर्द नहीं है. उन्होंने होटल की रिसैप्शन पर फोन कर के फौरन किसी को भेजने के लिए कहा और अपने जूनियर जतिन जिस के साथ उन्होंने दिनभर काम किया था, को फोन किया. उन्हें लग रहा था कि जतिन सोया होगा. वह भी थका होगा. पर उन का दर्द बढ़ता जा रहा था. रूम में अकेले उन के दिल में बुरे खयाल आने लगे.

जतिन ने फोन उठा लिया, फोरन बोला, ‘‘मैं पहुंच रहा हूं, सर डौंट वरी.’’

होटल के स्टाफ ने माधव की हालत देख कर तुरंत डाक्टर को फोन किया.

माधव को महसूस होने लगा कि उन्हें हार्ट में कोई प्रौब्लम हो रही है. उन की नजरों के आगे अपनी पत्नी और बेटी का चेहरा घूमने लगा, दिमाग में सब से पहले यही आया कि अभी तो बेटी का विवाह होना बाकी है. थोड़ी देर पहले ही हंसतीबोलती बेटी की चिंता होने लगी. शोभा के बारे में सोचते ही अजीब सी बेचैनी और बढ़ गई. पसीनापसीना हो रहे थे. उन्हें लगा, वे बचेंगे नहीं. क्या उन की मृत्यु यहां होटल के कमरे में परिवार से दूर होनी थी?

होटल का डाक्टर और जतिन साथसाथ ही पहुंचे. डाक्टर ने माधव को जल्दी हौस्पिटल ले जाने के लिए कहा, सब की हैल्प से माधव को अपनी कार में बैठा कर जतिन हौस्पिटल पहुंचा और माधव को तुरंत एडमिट कर लिया गया. चैकअप, टैस्ट होने लगे.

हार्ट अटैक ही था. उन की आर्टरीज में काफी ब्लौकेज थी, जिसे तुरंत ठीक किया जाना था पर माधव लखनऊ जा कर आगे का ट्रीटमैंट करवाना चाहते थे. पत्नी और बेटी यह सुन कर कितना परेशान होंगी, इस का अंदाजा उन्हें था.

पत्नी से पहले उन्होंने सुबहसुबह बेटी को फोन किया.

‘‘अरे पापा, सुबह 7 बजे? क्या हुआ, पापा? आप ठीक तो हैं?’’

‘‘बेटा, अभी मैं ठीक हूं. डाक्टर ने अभी मु?ो बात करने से मना किया है. लो, सारी बातें जतिन बताएगा.’’

पिता की तबीयत सुनते हुए केतकी का दिल दहल गया. कुछ हो जाता तो? फिर वह अचानक अपने ऐवरग्रीन अलर्ट मोड में आ गई, ‘‘अंकल, यहीं लखनऊ में पापा का आने का मन है तो मैं अब सब इंतजाम कर देती हूं, डाक्टर ने सफर करने के लिए कहा है?’’

‘‘हां, पर बहुत ध्यान से.’’

‘‘मैं अपने एक फ्रैंड आयुष जो वहीं रहता

है से बात कर के फ्लाइट बुक करती हूं, बस

10 मिनट में आप से बात करती हूं, आप पापा के पास ही हैं न?’’

‘‘हां, डौंट वरी.’’

केतकी और आयुष एक ही कंपनी में थे. कभीकभी औफिस की मीटिंग में मिलते थे. अच्छी दोस्ती थी. उस ने आयुष को पूरी बात बताई और साफसाफ पूछा, ‘‘मेरे पापा के पास तब तक रुक सकते हो जब तक मैं वहां पहुंच रही हूं?’’

‘‘अरे, मैं ही अंकल को ले आता हूं.’’

‘‘नहीं, मैं आ रही हूं, बस होटल जा कर उन का सामान पैक कर दो, बिल जतिन अंकल देख लेंगे. मैं उन्हें यहां ला कर सीधे हौस्पिटल ही ले जाऊंगी, ताकि उन का इलाज तुरंत शुरू हो. आ रही हूं.’’

बेटी को अफरातफरी में कुछ परेशानी में तैयार होते देख कर शोभा हैरान थी, ‘‘क्या हुआ, बेटा?’’

मां को प्यार से देखते हुए केतकी ने कहा, ‘‘बताऊं? पैनिक बटन तो नहीं दबाओगी?’’

‘‘जल्दी बताओ, किकी.’’

‘‘पापा की तबीयत रात में खराब हो गई थी, उन्हें ले कर आती हूं, सीधे हौस्पिटल ही मिलना.’’

एक चीख सी निकल गई शोभा के मुंह से, ‘‘क्या हुआ? ठीक तो हैं?’’

‘‘हां, लेट डिनर किया था, पेट में दर्द बता रहे हैं.’’

‘‘तुम ?ाठ बोल रही हो, वे पेट दर्द में काम छोड़ कर घर वापस आने वाले लोगों में नहीं हैं.’’

‘‘हां, सही है पर उन का दर्द दवाई से कम नहीं हुआ है तो यहां आ कर जल्दी दिखा लेंगे. फोन करूंगी और हां, मम्मी. सब ठीक है, देखो, मैं स्माइल कर रही हूं, स्टे स्ट्रौंग, गुड गर्ल,’’ अपने अंदाज में मां को प्यार कर के केतकी निकल गई.

शोभा को कुछ पलों तक तो कुछ सम?ा नहीं आया. उन्हें लगा, बेटी ने ठीक से पूरी

बात नहीं बताई है. फिर सोचा अगर सिर्फ पेट दर्द की ही बात है तो माधव फोन पर बात तो जरूर करेंगे. उन्होंने माधव को फोन मिलाया. माधव भी सम?ा गए कि शोभा परेशान तो होगी ही. उन्होंने इतना ही कहा, ‘‘शोभा, मैं ठीक ही हूं, बस आ कर दिखा लेता हूं, केतकी को आने के लिए मना किया था, वह मानी नहीं. शाम तक आ जाऊंगा, सब ठीक है. यहां औफिस के लोग मेरे साथ हैं, डौंट वरी.’’

पति की बात सुन कर शोभा को चैन तो आया पर फिक्र बनी रही.

रास्ते से ही केतकी ने अपनी सोसाइटी के अपने दोस्तों अंकित, ऋतु, गीतिका, मानन, अबरार और तृषा के व्हाट्सऐप गु्रप जिस का नाम ही सपोर्ट सिस्टम रखा हुआ था, को गु्रप काल लगाई. सब अपनेअपने औफिस के लिए तैयार हो रहे थे. सभी काल पर थे. मानन ने कहा, ‘‘क्या है? जल्दी बोल, लेट हो रहा हूं,’’ किकी.’’

केतकी को सब घर में किकी ही कहते थे तो दोस्त भी किकी ही कहने लगे थे. केतकी ने जल्दीजल्दी पूरी बात बता कर कहा, ‘‘तुम में से कोई 2 लोग आज मेरी मम्मी के पास रहना, जब तक हम वापस नहीं आ जाएंगे, परेशान ही रहेंगी. अबरार, तुम्हारा फ्लैट हमारी बिल्डिंग में ही है, जरा देख लेना और हां, शाम को तुम लोग ‘लाइफ केयर’ हौस्पिटल आ जाना. पापा को सीधे वहीं एडमिट करना होगा.’’

सब ने एकएक कर के कहा, ‘‘तू जा अब. आंटी की चिंता न कर. हम औफिस से छुट्टी ले लेते हैं.’’

‘‘बस अब तुम लोग देख लो, क्या करना है. सब तुम पर छोड़ती हूं, मेरा बोर्डिंग का टाइम हो रहा है.’’

‘‘तू जा, हम हैं.’’

इंदौर पहुंच कर केतकी ने सब संभाल लिया. डाक्टर से बात की. माधव के गले लग कर अपने को रोने से रोकते हुए उन्हें तसल्ली दी, ‘‘इट्स ओके पापा. वहां सब हो जाएगा,’’ और अपने खास स्टाइल में ‘लव यू.’ कहते हुए पिता का माथा सहलाने लगी. माधव के कमजोर, चिंतित चेहरे पर हलकी सी मुसकान आई.

पास खड़े जतिन को देख कर केतकी ने कहा, ‘‘अंकल थैंक यू वैरी मच.’’

जतिन ने बस सिर को हलकी सी जुंबिश देते हुए कहा, ‘‘मैं साथ चलूं?’’

‘‘नहीं अंकल मैं सब कर लूंगी.’’

तभी आयुष आ गया. वह केतकी के फोन के बाद से लगातार माधव के पास ही था.

वह डिस्चार्ज के पेपर्स बनवा चुका था. उस के हाथ में एक पैकेट था. केतकी को साइड हग करते हुए बोला, ‘‘फ्रैश हो कर यह नाश्ता कर लो, मम्मी ने पोहा बना कर भेजा है, इंदौरी पोहा. खा लो. फिर निकलना. मैं भी लखनऊ चलता हूं.’’

‘‘अरे नहीं कोई जरूरत नहीं है. मैं सब

कर लूंगी.’’

‘‘पक्का?’’

‘‘हां, तुम्हारा बौस आने वाला है न? उसे ?ोलने की तैयारी करो.’’

माधव के चेहरे पर बेटी के बोलने के ढंग पर ऐसे भाव आए कि जतिन को हंसी आ गई. आयुष और जतिन माधव और केतकी को ऐअरपोर्ट तक छोड़ आए. केतकी ने माधव के लिए व्हील चेयर बुक की थी जिस से उन्हें ऐअरपोर्ट पर चलना न पड़े. उन्हें फिलहाल थकान से बचना था. आयुष ने माधव को घर का बनाया हुआ ही हलका सा नाश्ता करवा दिया था.

फ्लाइट में भी केतकी ने पिता का पूरा ध्यान रखा. माधव बेटी को सबकुछ संभालते हुए देखते रहे. एक संतोष उन्हें सुख दे रहा था. आंखें बंद कर वे अब अपनी सोचों में डूबे थे कि 34 साल की उन की किकी शादी के लिए जब तैयार नहीं होती है तो वे और शोभा कितना परेशान हो जाते हैं कि ऐसे कैसे चलेगा. उन की किकी उन दोनों के जाने के बाद कैसे जीएगी? क्या करेगी? जब सब पूछते हैं कि बेटी की शादी कब करोगे तो उन के पास कोई जवाब नहीं होता. किकी कहती है कि वह अपनी लाइफ में बिलकुल सुखी और निश्चिंत है. शादी होना ही सैटल हो जाना क्यों सम?ाते हैं आप लोग? मैं अच्छी जौब कर रही हूं, मैं अपनेआप को सैटल्ड ही सम?ाती हूं, अच्छा कैरियर, दोस्तों का अच्छा सपोर्ट सिस्टम, लविंग फैमिली, सबकुछ तो है मेरे पास. आप लोग शादी को ही एक लड़की का सैटल हो जाना सोचना छोड़ दीजिए.

‘‘पापा कोई दिक्कत तो नहीं? ठीक लग रहा है न?’’

बेटी की आवाज से उन की तंद्रा टूटी, ‘‘हां, सब ठीक है. तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था.’’

‘‘वही बोरिंग टौपिक?’’

‘‘हां,’’ माधव हंस दिए.

‘‘स्टौप इट, प्लीज.’’

पितापुत्री में गजब की बौंडिंग थी, वैसे भी बच्चे बड़े हो जाएं तो दोस्त जैसे ही हो जाते हैं, फिर आज के समय में तो इस बात पर जोर दिया जाता है कि घरों में सख्त अनुशासन की जगह दोस्ताना माहौल हो तो वह सब के लिए अच्छा रहता है, सब का जीना आसान रहता है.

एअरपोर्ट से निकल कर माधव हैरान रह गए, केतकी का दोस्त अंकित

अपनी कार ले कर उन्हीं का इंतजार कर रहा था, साथ ही उस के और दोस्त अबरार और मानन भी थे. सब ने लपक कर उन का सामान फौरन डिक्की में रखा. माधव के हालचाल पूछे और उन्हें आराम से बैठा कर कार सीधे ‘लाइफ केयर’ हौस्पिटल की तरफ मोड़ दी.

‘‘बच्चो, तुम लोगों ने तो सब आराम से हैंडल कर लिया, थैंक यू, बच्चो.’’

‘‘अरे अंकल नो इशूज. कोई बड़ी बात नहीं. ऋ तु, आंटी को ले कर हौस्पिटल पहुंच गई है. वहां डाक्टर धीरज से बात भी कर चुके हैं. ऋतु के मम्मीपापा भी वहीं हैं. वे डाक्टर धीरज को पर्सनली जानते हैं. आप किसी चीज की चिंता मत करो, अंकल. सब मैनेज हो जाएगा.’’

‘‘किकी, मैं हौस्पिटल में रात में भी रुक जाऊंगा,’’ अबरार ने कहा तो केतकी ने मुसकरा कर कहा, ‘‘थैंक यू ब्रो.’’

माधव को हंसी आ गई, ‘‘किकी किसी को कुछ भी कहती रहती है.’’

अंकित ने कहा, ‘‘हमारी किकी इज द बैस्ट… अंकल हम सब हैं. आप बस जल्दी ठीक हो जाइए.’’

अच्छा हौस्पिटल था, साफसुथरा, सब सुविधाओं से युक्त. यहां के डाक्टर्स की इमेज भी अच्छी थी, फालतू के टैस्ट्स लिख कर मरीजों को ज्यादा लूटा नहीं जाता था. रिसैप्शन पर ही शोभा जैसे हौस्पिटल की ऐंट्री पर ही आंखें गड़ाए खड़ी थीं. वे एकदम से माधव की तरफ बढ़ीं, आंखें भर आई थीं, ‘‘अब कैसे हो?’’ पूछतेपूछते उन का गला रुंध गया.

माधव ने मुसकरा कर कहा, ‘‘ठीक हूं, चिंता मत करो. अब तो आ ही गया हूं.’’

ऋतु के मम्मीपापा, गौरव और निधि भी शोभा के साथ खड़े थे. अभिवादन के बाद माधव के हालचाल पूछ कर गौरव ने कहा, ‘‘डाक्टर आ गए हैं, अब बस यह मरीज निकले तो हम चलते हैं.’’

माधव वहीं पड़ी चेयर्स में से एक पर बैठ गए, शोभा उन से बात करती रहीं, रात में क्या हुआ था, सब पूछती रहीं.

डाक्टर धीरज करीब 65 साल के बेहद खुशमिजाज व्यक्ति थे. गौरव उन्हें

माधव के बारे में सब बता ही चुके थे, हाथ मिलाते हुए डाक्टर हंसे, ‘‘और माधवजी. इंदौर का खानापीना कैसा रहा? बड़ा मशहूर खाना है. क्याक्या खाया?’’

सब के मुंह खुले के खुले रह गए, फिर माहौल एकदम हलका हो गया. एक अच्छे डाक्टर की यह बड़ी खासीयत होती है. आधी तबीयत तो ऐसे ही डाक्टर के स्वभाव से ही ठीक हो जाती है. हार्ट के सारे टैस्ट्स हुए, इंदौर के टैस्ट की रिपोर्ट्स देखी गई. डाक्टर ने कहा, ‘‘अभी आप को एडमिट करते हैं. कल सुबह ऐंजियोप्लास्टी करूंगा. ब्लौकेज हैं.’’

शोभा एडमिट होने के नाम से घबराई पर अब तक केतकी के इतने दोस्त वहां थे कि डाक्टर धीरज भी शोभा से बोल पड़े, ‘‘आप की बेटी का सपोर्ट सिस्टम बहुत स्ट्रौंग है. आप को तो परेशान होने की जरूरत ही नहीं.’’

फिर केतकी से कहने लगे, ‘‘आई एम योर फैन नाऊ.’’

केतकी हंस पड़ी, ‘‘देखिए न अंकल. यही बात मैं बारबार मम्मीपापा से कहती हूं कि मेरी इतनी फिक्र न किया करें, मेरा सपोर्ट सिस्टम बहुत जबरदस्त है.’’

रात में अबरार ने सब को घर भेज दिया. सब के पेरैंट्स की आपस में भी अच्छी जानपहचान थी. शोभा को सब को आसपास देख कर राहत महसूस हुई. केतकी और शोभा हौस्पिटल में रुकने के लिए तैयार थीं पर सब ने कहा कि उस ने बहुत ट्रैवलिंग की है, उसे आराम करना चाहिए. शोभा का भी अगला पूरा दिन हौस्पिटल में ही बीतने वाला था. उन्हें भी माधव ने घर जाने की ही सलाह दी. गौरव और निधि अपनी कार से ही केतकी और शोभा को घर छोड़ गए. शोभा उदास और चुप थीं पर केतकी की भागदौड़ देख कर उसे अपनेआप से लिपटा लिया, ‘‘बहुत थक गई होगी न किकी?’’

‘‘नहीं मम्मी. जरा नहा लेती हूं, सुबह से ऐसे ही घूम रही हूं.’’

‘‘हां, नहा कर, आराम करो. मैं ने दिन में ही खाना बना लिया था.’’

उन की बात पूरी होतेहोते घर की घंटी बजी. अबरार की मम्मी सबा थीं. खाना ले कर आई थीं. शोभा मना करती रह गईं पर उन्होंने प्यार भरी फटकार लगाई, ‘‘जब तक भाई साहब घर नहीं आ जाते, खाना मैं बना दूंगी, भाई साहब को तो हौस्पिटल से हलका खाना ही मिलेगा. आप आराम कीजिए, आप को भी तो स्ट्रैस हो ही रहा होगा. सुबह मिलते हैं,’’ कह कर सबा चली गईं.

रात को केतकी शोभा के साथ ही सोने लेटी. माधव को ज्यादा बात नहीं करनी थी, उन्हें आराम ही करना था. अबरार केतकी के टच में था ही, बाकी दोस्त भी चैट में साथ ही थे.

शोभा कहने लगीं, ‘‘किकी, तुम्हारे दोस्तों का कितना सहारा है. किसी रिश्तेदार की कमी नहीं खलती. तुम्हारी इंदु मौसी को फोन किया था, कह रही थीं, भाई साहब को देखने आऊंगी. अभी बनारस में उन के बेटेबहू को औफिस के जरूरी काम हैं. पोते को अकेला छोड़ कर नहीं आ सकती.’’

मौसी का नाम सुनते ही केतकी बिफर गई, ‘‘आप ने उन्हें इस टाइम पापा की हैल्थ के बारे में बताया ही क्यों? हर बार आती हैं, मेरा दिमाग खाती हैं, शादीशादी का गाना खत्म ही नहीं होता. मम्मी मैं इस बार उन्हें बिलकुल अटैंड नहीं करने वाली. बैठीबैठी बस मु?ो ऊपर से नीचे तक देखती रहेंगी. हर बार मेरी उम्र पूछती हैं. जैसे उन्हें पता ही नहीं कि मैं 34 साल की हो रही हूं.’’

‘‘ठीक है, अभी शांत हो जाओ. दिमाग वैसे ही परेशान है.’’

अगले दिन सुबह ही शोभा और केतकी हौस्पिटल पहुंच गए, केतकी ने अभी

औफिस से छुट्टी ली हुई थी. अबरार को घर भेजा ही था कि ऋतु, मनन और तृषा वहां पहुंच गए. माधव कुछ घबराए से और चिंतित भी थे. वे काफी नर्म दिल और अपनी तबीयत खराब होने पर घबराने वाले इंसान थे.

केतकी और शोभा ने उन्हें काफी तसल्ली दी. डाक्टर उन्हें ओटी में ले गए, थोड़ी देर बाद आ कर बताया कि ऐंजियोप्लास्टी करनी पड़ेगी, माधव फिर घबराए पर अब तक गीतिका के पिता विनोद भी पहुंच चुके थे जिन्हें 5 साल पहले हार्ट अटैक हुआ था. वे इन सब चीजों से गुजर चुके थे और अब काफी स्वस्थ थे. उन्हें देख कर, उन की बातें सुन कर माधव को कुछ राहत हुई.

1 घंटे के अंदर वे ओटी से स्ट्रैचर पर बाहर मुसकराते हुए आए, केतकी ने विक्ट्री साइन बनाया तो उन्होंने भी साइन बना दिया. शोभा ने राहत की सांस ली. माधव को अब काफी अच्छा लग रहा था. उन्हें एक दिन और हौस्पिटल में ही रहना था. पूरा दिन केतकी के दोस्त आतेजाते रहे. शोभा और केतकी के खानेपीने का पूरा ध्यान उस के दोस्त और उन के परिवार रख रहे थे. रात को अंकित रुका और शोभा और केतकी घर वापस आ गए.

सबकुछ सामान्य था जो सब के लिए राहत की बात थी. अगले दिन इंदु भी अपने पति संजय के साथ हौस्पिटल पहुंच ही गईं. इंदु शोभा से बड़ी थीं पर बहुत पुरातनपंथी और धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं. उन से बिलकुल उलट थी शोभा. इंदु को शोभा, माधव और केतकी के जीवन जीने के रवैए से काफी शिकायतें थीं पर शोभा उन की बातें इग्नोर कर देतीं.

अब भी यही हुआ. माधव के हालचाल पूछ कर संजय ने कहा, ‘‘तुम लोग नास्तिकों की तरह जीते हो, कुछ परेशानी तो आएगी ही. न कोई पूजा, न कोई उपवास.’’

केतकी के सारे दोस्त केतकी का मुंह देखने लगे. सब को पता था कि

केतकी कोई गलत बात चुपचाप सहन नहीं कर सकती. हौस्पिटल में शोभा ने उसे चुप रहने का इशारा किया. पर केतकी ने इतना जरूर कहा, ‘‘मौसाजी, आप को भी पिछले साल हार्टअटैक हुआ था न? आप तो इतने पूजापाठी हैं, फिर?’’

शोभा ने तुरंत कहा, ‘‘चलो, अब घर चलते हैं. अंकित डाक्टर से डिस्चार्ज के पेपर्स बनाने गया था. सब हो गया?’’

‘‘हां, आंटी. बस डाक्टर अभी एक राउंड पर आएंगे, फिर चलते हैं. अभी कुछ टाइम तो लग ही जाएगा. आप लोग चाहो तो घर जा सकते हैं, मैं अंकल को ले कर आ जाऊंगा.’’

‘‘नहीं, बेटा साथ ही चलेंगे,’’ कह कर शोभा ने केतकी को देखा. केतकी ने इशारे में ही कह दिया कि उसे मौसी बिलकुल पसंद नहीं हैं. घर आने में सब को 4 बज ही गए. माधव के खानेपीने के काफी परहेज थे.

इंदु और संजय केतकी के दोस्तों और पड़ोसियों की सपोर्ट को देख कर हैरान थे. हर चीज आराम से होती चली गई थी. रात को सब का खाना ले कर विनोद और गीतिका आ गए.

शोभा हैरान सी बोलीं, ‘‘अरे भाई साहब, अब क्यों परेशान हो रहे हैं, मैं डिनर बना लेतीं.’’

‘‘भाभीजी पूरा दिन हौस्पिटल में ही बीत गया है. वहां तो ऐसे ही बैठेबैठे भी थकान हो जाती है. नीलू ने माधवजी के लिए दलिया भेजा है. आप लोगों के लिए रोटीसब्जी, राइस हैं. आप किचन कल से संभालिए. माधवजी, आप रैस्ट करें. फिर मिलते हैं,’’ कह कर वे दोनों चले गए.

इंदु को जैसे हर बात पर इतनी हैरानी हो रही थी कि उन के मुंह से निकल ही गया, ‘‘इन्हें हार्टअटैक हुआ था तो पड़ोसी और दोस्त तो छोड़ो, अपने बच्चों के पास भी टाइम नहीं था, बेटी ससुराल के काम बताती रही, बेटाबहू औफिस की मीटिंग में फोन पर ही लगे रहे. मैं अकेले ही हौस्पिटल में बैठी रही. तू तो आई थी न शोभा? देखा था न. मैं अकेले बैठी थी हौस्पिटल में.’’

‘‘हां, दीदी याद है. कोई बात नहीं, अब आप आराम करो.’’

माधव अब तक नहा कर फ्रैश हो चुके थे. कहने लगे, ‘‘अब थोड़ा ठीक लग रहा है, घर घर ही है.’’

केतकी ने पहले उन्हें दलिया खिलाया, दवाइयां दी, फिर कहा, ‘‘आप अब लेट जाओ, पापा. अभी आराम ही करना है.’’

‘‘हां, कमजोरी तो लग रही है,’’ कह कर माधव बैडरूम में चले गए. केतकी ने मां के साथ मिल कर खाना लगाया. इंदु और संजय केतकी को देखते रहे. खाते हुए पूछ लिया, ‘‘शोभा, माधव को केतकी की शादी की चिंता में तो हार्टअटैक नहीं हुआ?’’

शोभा को भी बहन पर बहुत तेज गुस्सा आया पर बोलीं कुछ नहीं. जवाब

केतकी ने दिया, ‘‘मौसी, मम्मीपापा मेरी शादी का गाना इतना नहीं गाते जितना आप लोग गाते हो. मेरे मम्मीपापा जमाने के साथ चल रहे हैं. उन्हें पता है कि जब मु?ो शादी करनी होगी, कर लूंगी.’’

‘‘अरे, कर लूंगी का मतलब क्या है? कोई पसंद है क्या?’’

‘‘नहीं, मौसी.’’

‘‘इतने लड़के दोस्त हैं, मुझे लग रहा था इन्हीं में से कोई तुम्हें पसंद होगा.’’

‘‘मौसी, मम्मीपापा ने कभी आप को कहा कि वे मेरी शादी के लिए परेशान घूम रहे हैं?’’

‘‘न इन्होंने तो नहीं कहा पर मैं तो बड़ी बहन हूं, मैं इस के दिल की बात समझती हूं.’’

‘‘अगर आप मम्मी के दिल की बात समझ रही होतीं तो इस टाइम हम शांति से खाना खा रहे होते,’’ कहतेकहते केतकी ने अपने गुस्से को कंट्रोल करते हुए हंसते हुए कहा तो इंदु चुप हो गईं.

संजय ने अपनी रट लगाई, ‘‘शोभा, माधव ठीक हो गए हैं. इसी खुशी में एक छोटी सी पूजा रख लो. तुम लोग कभी कुछ नहीं करते.’’

‘‘नहीं मौसाजी अभी हम सब पापा को आराम करने देंगे. जब उन्हें बिलकुल ठीक लगेगा, कहीं थोड़ाबहुत घूम आएंगे, हम ऐसे ही खुश हो लेते हैं. पूजापाठ वाले भी बीमार पड़ने पर हौस्पिटल ही जाते हैं न?’’

अब तक तो केतकी तय कर चुकी थी कि जब मैं औफिस के बड़ेबड़े उलटे दिमाग वाले क्लाइंट्स को ?ोल लेती हूं, तो ये क्या चीज हैं. केतकी ने कहा, ‘‘मौसाजी, आप हर चीज को धर्म और पूजापाठ से क्यों जोड़ देते हैं?’’

‘‘धर्म ही जीवन का आधार है, जिस ने धर्म को नहीं सम?ा, उस ने कुछ नहीं सम?ा.’’

केतकी को हंसी आ गई, ‘‘मैं तो बिना धर्म को सम?ो, अपने औफिस की सीनियर पोस्ट पर हूं, खुश हूं, आत्मनिर्भर हूं, अपने मम्मी पापा का हर तरीके से खयाल रख सकती हूं, साल में एक बार विदेश यात्रा पर जाती हूं, दुनिया घूमती हूं, कभी मम्मीपापा को कहीं भी घुमा लाती हूं.’’

इंदु की सूई फिर वहीं अटक गई, ‘‘तुम्हारे ये सारे दोस्त कुंआरे हैं?’’

‘‘हां, मौसी. कोई शादी के मूड में नहीं है. सब राजीखुशी जी रहे हैं. जिस का जब मन होगा, कर लेगा.’’

‘‘तुम लोग यह नहीं सोचते कि कभी कोई मुसीबत आई तो क्या होगा?’’

‘‘वही होगा मौसी जो अभी हुआ है. जैसे पापा की तबीयत खराब होने पर सब इकट्ठा हो गए. ऐसे ही सब एकदूसरे के साथ होंगे.

शोभा ने कहा, ‘‘खाना खत्म हो गया, चलो, किकी. ये बातें तो खत्म नहीं होंगी. आज टाइम से सो जाओ. कल औफिस जाना है आराम करो. तुम ही सब से ज्यादा थकी होगी.’’

शोभा ने प्यार से कहा तो केतकी भी उठ कर टेबल से बरतन उठाने लगी.

थ्री बैडरूम फ्लैट था, संजय और शोभा अगली सुबह वापस बनारस जाने वाले थे. वे भी

सोने लेट गए. केतकी भी थोड़ी देर पिता के पास लेट कर सोने चली गई.

संजय और इंदु सोने लेटे तो संजय ने धीरे से कहा, ‘‘यहां के तो रंगढंग ही अलग हैं न?’’

इंदु सोच में डूबी थी.

‘‘अरे क्या सोच रही हो?’’

‘‘यही कि यहां सब कितनी खुली हवा में सांस ले रहे हैं. मु?ो ऐसा लग रहा है कि हमारी दुनिया कितनी अलग है जहां किसी भी तरह की कोई नई मनचाही बात नहीं होती. हम कुछ नया नहीं सोचते. इस घर में जैसे सब को अपनी बात कहने का हक है. कोई किसी पर हावी नहीं है. सब जी रहे हैं, दूसरों को भी जीने दे रहे हैं. हमारे पिताजी ने हम दोनों बहनों को एकजैसी परवरिश दी थी, हम एकजैसा सोचते थे और अब हम दोनों बहनों की सोच में कितना अंतर है.’’

इंदु की बातों में आज एक ऐसी उदासी थी जिस ने संजय को ?ाक?ार कर रख दिया. इंदु कह रही थी, ‘‘पिताजी जैसा चाहते थे, शोभा ठीक वैसे ही जी रही है,’’ कह इंदु ने एक उदास सी ठंडी सांस भरी तो संजय की बोलती बंद हो गई.

‘‘मैं क्या थी, शादी के बाद क्या हो गई और केतकी को मैं बारबार उलटा बोलने के लिए उकसाती हूं, शायद यह मेरे अंदर की ही कुंठा है. उस लड़की से शादीशादी की बात ही करती रहती हूं, मन ही मन मानती हूं कि जैसी जिंदगी वह जी रही है वैसी जिंदगी लाखों में से एक लड़की को मुहैया होती है, अच्छी नौकरी, सुलझे हुए मातापिता और परेशानी के समय इतना ठोस सपोर्ट सिस्टम. वह अपने पेरैंट्स की ज्यादा अच्छी देखभाल करती है, हमारे बच्चे तो हमारी परेशानी में पास रह कर भी पास नहीं होते, अपने में ही रहते हैं. मैं अब केतकी को कभी कुछ नहीं कहूंगी,’’ कह कर इंदु करवट बदल कर लेट गईं.

संजय आज पत्नी की बातें सुन कर अवाक बैठे रह गए. शरारती, मनमौजी, समझदार केतकी को पता था कि अंदर उस की बात जरूर होगी. वह कान लगाए मौसी की बातें सुन रही थी. यह सब सुन कर उसे अपनी मौसी पर जहां एक तरफ खूब प्यार आया, वहीं दूसरी तरफ मौसा की स्थिति का अंदाजा लगा कर इतनी तेज हंसी आ रही थी कि वह अपनी मम्मी को बताने भागी जा रही थी.

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