Pigmentation Treatment : आजकल  कम उम्र की युवाओं में पिगमैंटेशन और मेलाज्मा होने का मुख्य कारण हारमोनल बदलाव, यूवी रेज का प्रभाव और आनुवंशिकी होता है. हालांकि मेलाज्मा आमतौर पर 20 से 40 वर्ष की महिलाओं में अधिक देखा जाता है, लेकिन आजकल खराब जीवनशैली और स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट के कारण यह किशोरों और युवाओं में भी तेजी से बढ़ रहा है, जिस से कई यूथ अपने चेहरे को ले कर चिंतित हो जाते हैं. इस का इलाज संभव है लेकिन सही समय पर सही ऐक्सपर्ट से सलाह ले कर.

आइए, जानते हैं ऐक्सपर्ट की राय:

पिगमैंटेशन और मेलाज्मा

इस बारे में इंदौर की कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हौस्पिटल की डर्मैटोलौजिस्ट डा. मीनल सिंह कहती हैं कि आज के यूथ में हाइपरपिगमैंटेशन या पिगमैंटेशन की समस्या उन के गलत लाइफस्टाइल की वजह से अधिक देखी जा रही है. मगर अगर इस का पहले से पता लगाया गया हो तो ठीक हो सकती है.

असल में यह एक व्यापक शब्द है, जिस का उपयोग त्वचा के उस हिस्से के लिए किया जाता है जो आसपास की त्वचा की तुलना में अधिक गहरे रंग का दिखता है. ऐसा मुख्य रूप से त्वचा में मैलानिन के अधिक उत्पादन के कारण होता है. मेलाज्मा हाइपरपिगमैंटेशन का ही एक विशेष प्रकार है. हाइपरपिगमैंटेशन शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है, विशेषकर जहां त्वचा को चोट, सूजन या धूप का अधिक संपर्क हुआ हो.

वहीं मेलाज्मा मुख्य रूप से चेहरे पर दोनों तरफ समान रूप से दिखाई देता है खासकर गालों, नाक के ऊपरी हिस्से, माथे और ऊपरी होंठ के आसपास यह अधिक दिखता है.

वजह

पिगमैंटेशन और मेलाज्मा मुख्य रूप से मैलानिन के अत्यधिक उत्पादन के कारण होते हैं. मैलानिन त्वचा को उस का प्राकृतिक रंग प्रदान करने वाला पिगमैंट है. धूप, हारमोनल बदलाव, आनुवंशिक कारण और त्वचा में होने वाली सूजन या चोट इस के प्रमुख कारणों में शामिल हो सकती है.

मेलाज्मा आमतौर पर 20 से 40 वर्ष की उम्र में देखा जाता है. यह चेहरे पर बड़े भूरे या गहरे रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देता है. आनुवंशिक कारणों, ऐस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरौन जैसे हारमोन तथा यूवी किरणों के संपर्क का इस में योगदान हो सकता है.

वैसे ही पोस्ट इनफ्लैमेटरी हाइपरपिगमैंटेशन किसी भी उम्र में हो सकता है लेकिन 12 से 30 वर्ष की उम्र में अधिक आम है. मुंहासे, रैश, चोट या त्वचा की सूजन ठीक होने के बाद त्वचा पर गहरे निशान इस में दिखाई पड़ सकते हैं.

लक्षण

पिगमैंटेशन आमतौर पर त्वचा पर धीरेधीरे सपौट और गहरे रंग के धब्बे या पैच विकसित होते हैं. यह पूरी तरह से बिना दर्द वाला होता है और इस में खुजली, पपड़ी बनना या जलन जैसे लक्षण नहीं होते.

पिगमैंटेशन शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है, जबकि मेलाज्मा मुख्य रूप से चेहरे पर दिखाई देता है, जिस में माथा, नाक का ऊपरी हिस्सा, ऊपरी होंठ के ऊपर, गाल, ठोड़ी, जौलाइन और निचला जबड़ा शामिल है.

आनुवंशिक कारण भी जिम्मेदार

डाक्टर कहती हैं कि मध्यम से गहरे रंग की त्वचा वाली महिलाओं में मेलाज्मा और चेहरे पर पिगमैंटेशन होने की संभावना अधिक होती है. मेलाज्मा के लगभग 80 से 90त्न मामले महिलाओं में देखे जाते हैं. मेलाज्मा से पीडि़त लगभग आधे लोगों में परिवार के किसी करीबी सदस्य को भी यह समस्या हो सकती है.

इलाज

पिगमैंटेशन या मेलाज्मा का निदान मुख्य रूप से त्वचा विशेषज्ञ द्वारा त्वचा की जांच के आधार पर किया जाता है. कुछ मामलों में डर्मोस्कोप या अन्य जांच की आवश्यकता भी पड़ सकती है. उपचार में टौपिकल दवाएं, विभिन्न डैर्मेटोलौजिकल प्रक्रियाएं और अच्छी सन प्रोटैक्शन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है. उपचार का विकल्प पिगमैंटेशन के प्रकार, उस की अवधि, गंभीरता पर निर्भर करता है.

मेलाज्मा विकसित होने के बाद किसी भी उम्र में इस का उपचार शुरू किया जा सकता है. यह समस्या आमतौर पर उपचार की अवधि, पिगमैंटेशन के प्रकार और इस के होने के समय पर निर्भर करती है.

मेलाज्मा के उपचार में आमतौर पर 3 से 12 महीनों में महत्त्वपूर्ण और दिखाई देने वाले परिणाम मिल सकते हैं. हालांकि मेलाज्मा एक क्रौनिक यानी लंबे समय तक रहने वाली समस्या है. इसलिए इसे नियंत्रित रखने के लिए लगातार सन प्रोटैक्शन और मैंटेनैंस ट्रीटमैंट की आवश्यकता पड़ सकती है.

ऐलर्जी की शिकायत को न करें अनदेखा

कई बार किसी को ऐलर्जी की शिकायत होती है. ऐसे में त्वचा विशेषज्ञ की सलाह के बाद ही उपचार कराना चाहिए. इस में त्वचा विशेषज्ञ त्वचा की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त स्किनकेयर और उपचार योजना तैयार कर सकते हैं. मुंहासों, धूप या ऐलर्जी के कारण होने वाले सामान्य पिगमैंटेशन या काले धब्बे अकसर पूरी तरह और स्थायी रूप से कम हो सकते हैं.

धूप से बचना जरूरी

मेलाज्मा लंबे समय तक रहने वाली त्वचा संबंधी समस्या है. यह धूप या गरमी के संपर्क में आने पर दोबारा हो सकती है, जिसे लेजर, कैमिकल पील्स और टौपिकल क्रीम जैसे उपचार दिखाई देने वाले पैच को कम कर सकते हैं लेकिन कुछ मरीजों में यह समस्या बाद में दोबारा गरमी की वजह से हो सकती है, इसलिए गरम चूल्हे के सामने लंबे समय तक खाना बनाना, स्टीम रूम, हौट योगा आदि से बचना पड़ता है. यूवी रैडिएशन भी मेलाज्मा के होने का एक प्रमुख कारण है, जिस में सनस्क्रीन न लगाना, बाहर रहने के दौरान हर

2 घंटे में इसे दोबारा न लगाना, कम एसपीएफ वाला सनस्क्रीन इस्तेमाल करना भी मेलाज्मा के दोबारा होने का कारण बन सकता है. इस के अलावा हारमोनल बदलाव, तनाव, उपचार को अधूरा छोड़ देना और मैंटेनैंस ट्रीटमैंट न करना भी इस के दोबारा होने में योगदान दे सकती है.

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