Patola Saree : गुजरात के पाटन पटोला साड़ी गुजरात राज्य के पाटन और राजकोट में हथकरघे से बनाई जाने वाली एक बेहद खास और कीमती रेशमी साड़ी है. किसी समय यह वस्त्र राजघराने या धनाढ्य लोग ही पहनने की क्षमता रखते थे.
कैसे बनाई जाती है यह साड़ी
पटोला साड़ी को टाइंग, ड्राइंग और वीविंग टैक्निक से बनाया जाता है. पटोला साड़ी की सब से बड़ी खासियत है कि इसे दोनों तरफ से पहना जा सकता है. इस में सीधे उलटे की कोई पहचान नही होती है. इसे ‘डबल इकत’ आर्ट कहते हैं. डबल इकत में धागे को लंबाई और चौड़ाई दोनों तरह से आपस में क्रौस करते हुए फंसा कर बुनाई की जाती है.
डबल इकत को मदर औफ औल इकत भी कहा जाता है. इस के चलते साड़ी में यह अंतर करना मुश्किल है कि कौन सी साइड सीधी है और कौन सी उलटी. इस पर काफी महीन काम होता है.
विदेशों में भी पसंद की जाती है
इस जटिल बुनाई के चलते यह आर्ट अभी भी देशविदेश में फेमस है और काफी महंगी भी. पटोला साड़ी की दूसरी सब से बड़ी खासियत यह है कि इस का रंग कभी फेड नहीं होता और साड़ी 100 साल तक चलती है. पाटन पटोला साड़ी का एक बड़ा खरीदार वर्ग इंडोनेशिया में भी है.
क्यों खास हैं ये साड़ियां
पूरी तरह सिल्क से बनी इस साड़ी को वैजिटेबल डाई या फिर कलर डाई किया जाता है. यह काम करीब 700 साल पुराना है. हथकरघे से बनी इस साड़ी को बनाने में करीब 1 साल लग जाता है. पटोला साड़ियां बनाने के लिए रेशम के धागों पर डिजाइन के मुताबिक वैजिटेबल और कैमिकल कलर से रंगाई की जाती है. फिर हैंडलूम पर बुनाई का काम होता है. पूरी साड़ी की बुनाई में एक धागा डिजाइन के अनुसार विभिन्न रंगों के रूप में पिरोया जाता है.
इस साड़ी के बुन कर इतने काबिल और मंझे हुए होते हैं कि उन्हें पहले से ही पता होता है कि कौन सा धागा किस जगह पर कैसा डिजाइन बनाएगा. एक भी धागा अगर इधर से उधर हुआ, तो साड़ी का पूरा डिजाइन खराब हो सकता है.
कितना समय लगता है साड़ी तैयार होने में
यही कला क्रौस धागे में भी अपनाई जाती है. इस कार्य में ज्यादा मेहनत की जरूरत होती है. अलगअलग रेंज की साड़ियों को 2 बुनकर कम से कम 15 से 20 दिन और अधिकतम 1 साल में पूरा कर पाते हैं.
बहुत कीमती होती है डबल इक्कत साड़ी
इन साड़ियों की कीमत भी बुनकरों के परिश्रम व माल की लागत के हिसाब से 5 हजार रुपए से ले कर 2 लाख रुपए तक होती है. एक असली पाटन पटोला साड़ी की कीमत 1 लाख से 10 लाख या उस से भी ज्यादा हो सकती है.
सस्ती साड़ियों में केवल एक साइड के बाने में बुनाई की जाती है, जबकि महंगी साड़ी के तानेबाने में दोनों तरफ के धागों पर डिजाइन कर बुनाई की जाती है. दोनों साइड वाली महंगी साड़ियां 80 हजार रुपए से 2 लाख रुपए तक की लागत में तैयार हो पाती है.
पटोला की चमक फीकी नहीं पड़ती
पटोला साड़ी को बनाने में कैमिकल डाई का इस्तेमाल नहीं होता, सिर्फ प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए असली पटोला साड़ी लगभग 300 साल तक बिलकुल नई जैसी रहती है, यानी एक साड़ी को 3 पीढ़ियां पहन सकती हैं.
यह बाकी साड़ियों की तरह नहीं है, जो कुछ सालों बाद काली व फीकी पड़ जाती है. इन गुजराती साड़ियों को सौफ्ट फैब्रिक से तैयार किया जाता है, जिस वजह से ये पहनने में मुलायम, हलकी और आरामदायक होती हैं. साथ ही सभी प्रकार की त्वचा के लिए अनुकूल हैं. पटोला सिल्क साड़ी में विभिन्न डिजाइन, पैटर्न और रंग मिलेंगे.
पटोला के प्रकार
पाटन पटोला : यह शुद्ध रेशम और ‘डबल इकत’ तकनीक से बनाई जाती है. यह अत्यधिक दुर्लभ, समय लेने वाली और महंगी होती है. इसे जीआई टैग (GI Tag) प्राप्त है.
राजकोट पटोला : यह आमतौर पर ‘सिंगल इकत’ तकनीक से बनाई जाती है (जिस में केवल ताने या बाने में से एक धागे को रंगा जाता है). यह पाटन पटोला की तुलना में अधिक किफायती और आसानी से उपलब्ध होती है.
पारंपरिक डिजाइन और मोटिफ पटोला : इन साड़ियों में ज्यामितीय और प्राकृतिक आकृतियों का खूबसूरत समन्वय होता है.
नारीकुंजर भात : इस में नर्तकी (स्त्री) और हाथी के चित्र होते हैं.
तोपली / छबाड़ी भात : फूलों की टोकरी का डिजाइन.
रत्नचौक भात : ज्यामितीय आकृतियों में बने फूल और हीरे के पैटर्न.
पान भात : पीपल या पान के पत्ते की आकृति. हाथी, पोपट (तोता) और बाघ मोटिफ.
पटोला साड़ी को कैसे संभाल कर रखें
-पटोला साड़ी को हमेशा ड्राईक्लीन ही करवाएं. इसे घर में धोने की गलती न करें.
-यदि साड़ी पर कोई दाग लग जाएं, तो उसे तुरंत कपड़े से रगड़ें नहीं. इस से रेशम का धागा घिस सकता है या रंग फैल सकता है. दाग वाली जगह पर हलका कौटन ब्लौट करें और ड्राईक्लीन करवाएं.
-इसे किसी सूती या मलमल के कवर में लपेट कर रखें. पटोला साड़ी को कभी भी प्लास्टिक बैग या पौलिथीन कवर में न रखें. प्लास्टिक में हवा की आवाजाही बंद होने से रेशम की प्राकृतिक चमक कम हो जाती है और कपड़े में नमी आ सकती है.
-साड़ी के सीधे संपर्क में कभी भी नेफ्थलीन बौल्स या तेज परफ्यूम/स्प्रे न आने दें. कीड़ों से बचाव के लिए अलमारी में सूखी नीम की पत्तियां या कपूर को एक अलग कपड़े की थैली में बांध कर रखें.
-साड़ी की तह को समयसमय पर बदलती रहें ताकि रेशम के धागे कटें नहीं.
पटोला साड़ी पर कभी भी सीधे गरम प्रेस (Iron) न लगाएं
-भारी पटोला साड़ियों को लंबे समय तक हैंगर पर लटका कर रखने से साड़ी का आकार बिगड़ सकता है और कंधों की तरफ से धागे खिंच सकते हैं. इसे अलमारी के शेल्फ में ही बिछा कर रखें.
-पहनने के बाद साड़ी को तुरंत अलमारी में बंद कर के न रखें. इसे छायादार और हवादार कमरे में कुछ घंटों के लिए फैला कर छोड़ दें ताकि पसीने की नमी पूरी तरह सूख जाएं.
असली पटोला साड़ी की पहचान
आजकल बाजार में पटोला प्रिंटेड साड़ियां भी खूब बिकती हैं, जो असली बुनाई की नहीं होतीं. साड़ी को उलटा कर के देखें. असली बुने हुए पटोला साड़ी के पीछे भी वही रंग और धागे दिखेंगे. यदि साड़ी का उलटा हिस्सा सफेद या बहुत हलका दिखता है, तो वह डिजिटल प्रिंट है, बुनाई नहीं.
सिल्क मार्कसर्टिफिकेशन को जरूर चैक करें. शुद्ध रेशम की पहचान के लिए साड़ी पर सिल्क मार्क का टैग जरूर चैक करें.
