Weight Loss Tips : बिना एक्सरसाइज और डाइटिंग के आसानी से कम करें वजन

वजन कम करने के लिए लोग क्या क्या नहीं करते. एक्सर्साइज और डाइटिंग के लिए नए नए पैंतरों को आजमाते हैं. पर बहुत कम लोग ही होते हैं कि उन्हें इस परेशानी से निजात मिलती है. इस खबर में हम आपको बताएंगे कि अपनी जीवनशैली में कुछ बदलाव कर आप कैसे अपना वजन कम कर सकती हैं. तो आइए जानें उन टिप्स के बारे में.

1. खूब करें फलों और सब्जियों का सेवन

सेहतमंद रहने के लिए जरूरी है कि आप ताजे और हरे साग, सब्जियों और फलों का सेवन करें. फ्रूट चाट के मुकाबले ताजे फलों का सेवन अधिक फायदेमंद होता है. इससे शरीर को भरपूर मात्रा में फाइबर मिलता है, जिससे डाइजेशन बेहतर बनता है.

2. समय पर सोएं

ज्यादातर कामकाजी लोग अपने नींद को लेकर गंभीर नहीं होते. पर पूरी नींद ना लेने से आपकी सेहत बुरी तरह से प्रभावित होती है. अगर आप स्वस्थ रहना चाहती हैं तो जरूरी है कि आप पूरी नींद लें.

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3. चिप्स या तले हुए खाद्य पदार्थों से रहें दूर

जिस तरह की हमारी जीवनशैली हो गई है हम तले हुए चीजों की ओर तेजी से बढ़ने लगे हैं. अपने काम के बीच हम चिप्स जैसी चीजों को खाते रहते हैं जो हमारी सेहत के लिए काफी हानिकारक होता है. आपको बता दें कि सभी पैकेट वाली चीजों में प्रिजर्वेटिव पाए जाते हैं, जो सेहत को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ वजन भी बढ़ाते हैं.

4. नाश्ता कभी ना करें स्किप

नाश्ता दिनभर का सबसे जरूरी आहार है. अगर आप वजन कम करना चाहती हैं तो जरूरी है कि आप नाश्ता कभी ना छोड़ें. जो लोग नाश्ता नहीं करते, दूसरे वक्त में अधिक खाना खाते हैं. इस चक्कर में आपका वजन बढ़ जाता है.

5. खूब पीएं पानी

वजन कम करने के लिए जरूरी है कि आप अधिक पानी का सेवन करें. अगर आप सौफ्ट ड्रिंक की शौकीन हैं तो ये आपके लिए परेशानी की बात हो सकती है. कोल्ड ड्रिंक्स में कैलोरीज की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो तेजी से वजन बढ़ाती हैं. वजन कम करने के लिए सॉफ्ट ड्रिंक्स की जगह ज्यादा से ज्यादा पानी का सेवन करें.

भूखे रहने से नहीं, खाने से होगा पेट कम

क्या आप भी बढ़ते वजन, निकलते पेट और कमरा रूपी कमर से परेशान हैं? क्या आप भी अपने पुराने फिगर को मिस कर रही हैं? मोटापा आज के समय की एक बहुत बड़ी समस्या है. यह सिर्फ वयस्कों की ही समस्या नहीं है पर बच्चों और टीनेजर में भी मोटापा फैल रहा है.

मोटापे को कंट्रोल करने के लिए, सबसे पहले आपको अपने डाइट पर नजर रखनी होगी. कुछ महिलायें ये समझती हैं कि मोटापे को नियंत्रित करने के लिए खाना बंद कर देना चाहिए. डाइटिंग का मतलब भूखे रहना नहीं होता है. इसके साथ ही रेगुलर एक्सरसाइज करना बहुत जरूरी है. डाइटीशियन की मानें तो सही समय पर सही डाइट से आप अपना वजन कम कर सकती हैं. वजन कम करने के लिए सही मात्रा में फल सब्जियां लेना बहुत जरूरी है. फलों में भरपूर मात्रा में विटामिन और फाइबर होता है. इससे आपकी इम्युनिटी भी बढ़ती है.

इन फलों को खाकर आप मोटापा कम कर सकती हैं:

1. सेब

सेब प्रोपर डाएजेशन के लिए बहुत फायदेमंद हैं. सेब खाने से आपकी भूख भी कंट्रोल में रहती है. सेब लाल और हरे दोनों ही रंगों में पाया जाता है. सेब में कई विटामिन और मिनरल होते हैं. इसमें भरपूर फाइबर भी पाया जाता है.

2. चेरी

चेरी भी वजन कम करने बहुत कारगर है. खाली पेट चेरी खाना स्वास्थय के लिए बेहद फायदेमंद होता है.

3. स्ट्रॉबेरी

स्ट्रॉबेरी न सिर्फ आपके एक्सेस फैट को कंट्रोल करता है बल्की आपकी खूबसूरती को भी निखारता है. प्रतिदिन 5-6 स्ट्रॉबेरी खाना आपको अंदर से फिट और बाहर से कुदरती निखार देगा.

4. अनार

अनार खाने से न सिर्फ आपका पेट कम होगा बल्कि आपके शरीर में खून की मात्रा भी बढ़ेगी. अनार खाने या अनार का रस पीने से आप फिजीकली फिट रहेंगी. जिन महिलाओं को खून की कमी है उनके लिए अनार खाना बहुत फायदेमंद है. दिन भर आपको पूरे घर की देखभाल करनी पड़ती है, वर्किंग महिलाओं के लिए ये और मुश्किल हो जाता है. पर सिर्फ एक अनार खाने से आप अपने शरीर की कुछ हद तक देखभाल कर सकती हैं.

5. प्लम

प्लम के आकार पर मत जाइए. सुबह प्लम खाने से आप पूरे दिन एनर्जेटिक फील करेंगी. कमर घटाने के साथ ही यह आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाता है.

Health Tips: बदल डालें खाने की आदतें

हम अपने काम में अपने आप को इतना व्यस्त कर लेते हैं कि हम अकसर अपनी सेहत से समझौता कर बैठते हैं और हैल्दी रहने के लिए जिम जा कर पसीना बहाते हैं, डाइटिंग करते हैं और सोचते हैं कि ये सब कर खुद को बीमारियों से बचा सकते हैं. लेकिन ऐसा नहीं है आप चुस्त हो या दुरूस्त हो कितने ही हैल्थ कौंशस क्यों न हो फिर भी दुनियाभर की बीमारियां आप को घेर ही लेती हैं इसलिए सिर्फ स्वस्थ आहार या व्यायाम ही काफी नहीं है बल्कि इन के साथसाथ हैल्दी ईटिंग हैबिट भी जरूरी हैं. क्योंकि हैल्दी ईटिंग हैबिट स्वस्थ जीवन जीने के लिए बहुत जरूरी है. फिर भी हम में से बहुत से लोग यह नहीं जानते हैं कि इन का क्या महत्व है या ये कौन सी आदते हैं, जिन्हें अपना कर वे स्वस्थ रह सकते हैं और अनचाही बीमारियों से अपने आप को दूर रख सकते हैं. अगर आप भी हैल्दी रहना चाहते हैं तो यह जानकारी आप ही के लिए है.

1. खानें पर दें ध्यान

आप जब भी खाना खाने बैठे तो इस बात पर ध्यान दें कि आप क्या खा रहें है और आप सब से अधिक क्या खाते हैं. क्या आप बहुत ज्यादा कैलोरी वाला खाना खाते हैं और फिर इस कैलोरी को बर्न नहीं कर पाते हैं. तब आप को शायद कुछ ऐसा खाना चाहिए जो कम वसा वाला हो और आप का शरीर उसे आसानी से पचा ले. साथ ही हल्का खाना खाएं और तलेभुने खाने से दूर रहें. सलाद खाने पर ज्यादा जोर दें. स्प्राउट्स खाएं. अपने लिए हैल्दी फूड का प्लान बनाएं. 

2. पर्याप्त प्रोटीन लें

प्रोटीन शरीर के लिए महत्वपूर्ण हैं और इसे आहार में निश्चित रूप से शामिल किया जाना चाहिए. ब्रोकोली, सोयाबीन, दाल और पालक कुछ प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ हैं. कम वसा वाले डेयरी उत्पाद भी प्रोटीन का अच्छा स्रोत हैं. वैसे तो आप के भोजन में लगभग

25% हिस्सा प्रोटीन होना ही चाहिए. लेकिन यदि आप प्रतिदिन व्यायाम करते हैं, तो 5% प्रोटीन बढ़ा दें.

3. खाना चबा कर खाएं

खाने को पचाने का सब से आसान तरीका है इसे चबा कर खाना. हम में से अधिकतर लोग खाने को जल्दी खाने के चक्कर में उसे सही ढंग से पचा नहीं पाते हैं. जिस वजह से आप का पाचनतंत्र थक जाता है. इसलिए खाने को कम से कम 30-35 बार चबाकर खाएं और इस हैल्दी ईटिंग हैबिग को जरूर अपनाएं.

4. हरी पत्तेदार सब्जियां चुनें

अपने आहार में हरी पत्तेदार सब्जियों को शामिल करें क्योंकि ये प्रोटीन, आयरन, कैल्सियम और फाइबर का अच्छा स्रोत हैं. हरी पत्तेदार सब्जियां तैयार करना आसान है और ये खाने में काफी स्वादिष्ट भी होती हैं. अपने खाने में हर तरह के रंग की सब्जी को शामिल करें और कोशिश करें कि दिन में कम से कम एक बार सभी छह अलगअलग प्रकार के स्वाद (मीठा, नमकीन, खट्टा, कड़वा, तीखा, कसैला) अपने खाने में शामिल होने चाहिए.

5. ओवरईटिंग से बचें

जब भूख लगें तभी खाएं बिना भूख का खाना नुकसानदायक होता है और जब भूख लगे तो इतना खाना खाना चाहिए कि लगे कि बस अब पेट भरने वाला है. क्योंकि जहां ओवरईटिंग हुई वहीं पर मामला गड़बड़ हो जाता है. हम से अधिकतर लोग खाना खाते वक्त फोन या टीवी में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हमें इस बात का ख्याल भी नहीं रहता है कि हम भूख से अधिक खा चुके हैं. ऐसे में यदि आप केवल अपने भोजन पर ध्यान केंद्रित करेंगे तो आप केवल उतना ही खाएंगे जितना आप के शरीर को चाहिए. इसलिए, अगली बार जब भी आप खाने के लिए बैठें, तो रिमोट कंट्रोल और मोबाइल फोन को कुछ समय के लिए दूर ही रखें.

6. पाचन शक्ति बढ़ाएं

अगर आप को यह पता है कि क्या खाना चाहिए और कितना खाना आप के शरीर के लिए जरूरी है, तो आप की ये ईटिंग हैबिट आप की पाचन प्रक्त्रिया को बढ़ाने में मदद करती हैं. इस के अलावा आप कुछ ऐक्सरसाइज के जरिए भी इसे बढ़ा सकती हैं.

7. खाने में बदलाव जरूरी

बीमारियों से बचने के लिए अकसर लोग पौष्टिक आहार खाने की सलाह देते हैं, लेकिन शरीर में सभी पोषक तत्त्वों को पहुंचाने के लिए खाने को बदलबदल कर खाने की आदत को अपनाना जरूरी है. वैसे भी इस तरह से बदलबदल कर भोजन खाने से शरीर की जरूरतें भी पूरी हो जाती हैं और भोजन करने में स्वाद भी आता है.

8. नाश्ता करना न भूलें

आमतौर पर सुबह का समय बहुत व्यस्त होता है, जिस वजह से काम निपटाने के चक्कर में नाश्ता रह जाता है और खाने का समय हो जाता है. जबकि नाश्ता आप के लिए सब से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शरीर को पूरे दिन के लिए तैयार करता है. इसलिए कोशिश करें कि जब भी आप घर से बाहर कदम रखें तो नाश्ता कर के ही जाएं. साथ ही अपने मील टाइम को फिक्स करें.

9. सफेद चीजों को करें नजरअंदाज

इन में चीनी, नमक, दूध, मैदा, चावल सभी आते हैं. कोशिश करें इन को कम खाएं. नमक में सेंधा नमक का प्रयोग करें और अगर आप चाय पीने के शौकीन हैं, तो 4 कप चाय पीते हैं, तो आप इसे घटा कर दिन में 3 बार पिएं जहां 1 चम्मच चीनी लेते हैं वहां आधा चम्मच चीनी डालें, इस से पहले की डाक्टर आप को ये सब बंद करने के लिए बोल दें तो आप खुद ही अपनी आदतों में बदलवा कर लें. वहीं सफेद चावल की जगह ब्राउल राइस खाएं. कोशिश करें मांड वाले चावल खाएं. मैदा से बनी चीज कम खाएं, इस के अलावा फुल क्रीम दूध की जगह डबल टोंड दूध पिएं.

10. ड्राइफ्रूट से न बढाएं दूरी

जिन लोगों को कोलेस्ट्रोल होता है वे अकसर सूखे मेवे खाने से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इस में फैट होता है, जो उन के लिए नुकसानदायक हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है बल्कि बादाम, अखरोट और पिस्ते में पाये जाने वाला फाइबर, ओमेगा-3 फैटी ऐसिड और विटामिंस बुरे कौलेस्ट्रौल को घटाता है और अच्छे कौलेस्ट्रौल को बढ़ाता है. इनमें मौजूद फाइबर आप को भूख नहीं लगने देते हैं. लेकिन एक बात का ध्यान रखें कि तलेभुने सूखे मेवे खाने से बचें.

11. कौलेस्ट्रौल है, तो खानें में इन्हें करें शुमार

यह कौलेस्ट्रौल एक गंभीर समस्या है, जो हृदय रोग के साथ कई गंभीर बीमारियों को जन्म देती है, लेकिन अगर खाने की सही आदतों को अपनाया जाएं, तो इसे कम किया जा सकता है.

12. पानी पीने का ध्यान रखें

पानी के माध्यम से शरीर को महत्वपूर्ण मात्रा में खनिज प्रात होते हैं और शरीर डीटौक्सिफाई होता है जिस से आप की त्वचा पर निखार आता है. हालांकि, भोजन के दौरान पानी पीने से बचें क्योंकि यह पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देता है. इसलिए हमेशा कहा जाता है कि भोजन से 30 मिनट पहले या बाद में पानी पीना उचित है. लेकिन क्या आप को पता है कि सही तरीके से पानी पीना भी हैल्दी ईटिंग हैबिट में आता है. कोशिश करें कि सुबह उठते ही पानी पिएं क्योंकि सुबह की लार पाचन के लिए बेहद फायदेमंद मानी जाती है. सुबह पानी पीने से शरीर से विषैले पदार्थ बाहर निकल जाते हैं और आप विभिन्न रोगों से बच जाते हैं.

13. ये लहसुन बड़ा असरदार

लहसुन जहां खाने के स्वाद को बढ़ाता है, वहीं यह कई गुणों से भरपूर भी है. इस में कई एंजाइम्स पाए जाते हैं, जो कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करते हैं. साथ ही यह हाई ब्लडप्रेशर को भी नियंत्रित करता है.

14. सुपर हैल्दी हैं ओट्स

ब्रेकफास्ट में ओट्स को खाना सब से अच्छा माना जाता है क्योंकि यह एक हैल्दी फूड है, जो आपको भी हैल्दी रखता है. इसमें मौजूद बीटा ग्लूकौन नामक गाड़ा चिपचिपा तत्व हमारी आंतों की सफाई करते हुए कब्ज की समस्या दूर करता है. इस की वजह से शरीर में बुरा कौलेस्ट्रौल नहीं बढता है. इसलिए ओट्स जरूर खाना चाहिए.

15. छोटे से नींबू के बड़े कमाल

एक छोटा सा नींबू जहां सलाद, चटनी व दाल का स्वाद बढ़ाता है तो वहीं नींबू में कुछ ऐसे घुलनशील फाइबर पाए जाते हैं, जो स्टमक (खाने की थैली) में ही बैड कौलेस्ट्रौल को रक्त प्रवाह में जाने से रोक देते हैं. ऐसे फलों में मौजूद विटमिन सी रक्तवाहिका नलियों की सफाई करता है. इस तरह बैड कौलेस्ट्रौल पाचन तंत्र के जरिए शरीर से बाहर निकल जाता है. खट्टे फलों में ऐसे एंजाइम्स पाए जाते हैं, जो मेटाबौलिज्म की प्रक्रिया तेज कर के कौलेस्ट्रौल घटाने में सहायक होते हैं.

इन नेचुरल टिप्स से पाएं गर्दन के फैट से छुटकारा

जैसे जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है वैसे वैसे हमारी गर्दन का भार भी बढ़ने लगता है और एक समय ऐसा आता है जब हमारी गर्दन हमारे चेहरे से अधिक बड़ी या मोटी लगती है. ऐसी स्थिति में आपके चेहरे की सारी शेप ही बिगड़ जाती है और वह थोड़ा भद्दा दिखने लगता है. अगर आपके साथ भी यह दिक्कत है तो आप एक्सरसाइज के द्वारा और डाइट के द्वारा अपनी गर्दन का फैट प्राकृतिक रूप से कम कर सकते हैं. आज हम केवल डाइट के कारण आप कैसे अपनी गर्दन के फैट को कम कर सकते हैं, इस विषय पर चर्चा करेंगे. लेकिन उससे पहले यह जान लेते हैं कि गर्दन फैट के बढ़ने के क्या क्या मुख्य कारण होते हैं.

गर्दन फैट जमा होने के कारण

मोटापा : जो लोग ओवर वेट होते हैं उनकी गर्दन का फैट बढ़ने के चांस अधिक होते हैं इसलिए उनके शरीर के साथ साथ उनकी गर्दन भी मोटी होती है.

कुछ मेडिकल स्थितियां : हार्मोन्स के अनियमित होने के कारण या थायराइड जैसी समस्याओं के कारण मोटापा बढ़ सकता है और इस कारण से गर्दन का फैट भी बढ़ सकता है.

हृदय संबंधी समस्या : जिन लोगों को हृदय संबंधी समस्या हैं उन्हें गर्दन का फैट अधिक होने की समस्या हो सकती है.

उम्र : जिन लोगों की उम्र अधिक हो जाती है उन्हें जवान लोगों के मुकाबले मोटी गर्दन की अधिक समस्या झेलनी पड़ती है.

गर्दन का फैट कम करने की कुछ डाइट टिप्स

ग्रीन टी : ग्रीन टी में कुछ ऐसे पोली फेनोल्स होते हैं जिनमें एंटी ऑक्सिडेंट होते है. यह वजन कम करने में और गर्दन के फैट को कम करने में लाभदायक माने जाते हैं. आप ग्रीन टी बैग्स को पानी के साथ उबाल कर उसे छान कर उसमें शहद एड करके पी सकते हैं.

नारियल का तेल : इसमें कुछ फैटी एसिड्स होते हैं जो मेटाबॉलिज्म को बढ़ाते हैं. इससे आपको बिना चाहा फैट कम करने में मदद मिलती है. आप हर रोज सुबह एक चम्मच एक्स्ट्रा वर्जिन कोकोनट ऑयल पी सकते हैं और अगर चाहें तो इससे अपनी गर्दन पर मसाज भी कर सकते हैं.

खरबूजा : खरबूजे में कैलोरीज़ और फैट की मात्रा बहुत कम होती है. इसमें बहुत से मिनरल और विटामिन होते हैं. यह आपको लंबे समय तक भूख नहीं लगने देते हैं और आपकी वजन कम करने में भी मदद करते है. इसलिए दिन में ताजे ताजे खरबूज की स्लाइस खाते रहें.

नींबू का रस : नींबू के रस में बहुत सी एंटी ऑक्सिडेंट प्रॉपर्टीज होती हैं. यह एंटी ऑक्सिडेंट बॉडी के मेटाबॉलिज्म को इंप्रूव करते हैं और आपका वजन कम करने में भी मदद करता है. इसके लिए आप सुबह सुबह खाली पेट एक गिलास पानी में नींबू निचोड़ कर उसमें शहद एड करके पी सकते हैं.

अलसी : अलसी में ओमेगा 3 फैटी एसिड्स होते हैं जो वजन कम करने में मदद करते हैं. इसके लिए या तो आप अलसी के बीज खा लें या फिर उसके पाउडर को पानी में मिला कर के पी सकते हैं.

मूली : मूली विटामिन ए और फाइबर का एक अच्छा स्रोत होती हैं. इनकी पचाने में अधिक समय लगता है इसलिए यह आपको लंबे समय तक भूख नहीं लगने देती हैं. इसलिए मूली आपका वजन कम करने में मदद कर सकती है. आप इसे सलाद को तरह खा सकते हैं.

एलो वेरा : एलो वेरा बॉडी फैट और वजन को कम करने में बहुत लाभदायक माना जाता है. इससे नेक फैट कम होने में भी सहायता मिल सकती है. आप रोजाना सुबह उठ कर ताजा एलो जूस पी सकते हैं.

उपरलिखित सभी तरीके गर्दन का वजन कम करने में लाभदायक हैं. इनके अलावा आप अधिक से अधिक पानी पिए, ज्यादा कैलोरीज़ वाला खाना न खाएं और हर रोज थोड़ी बहुत एक्सरसाइज भी करते रहें. अगर आपके सारे शरीर का थोड़ा बहुत वर्कआउट होगा तो आपके सभी अंगों का वजन कम होने में मदद मिलेगी. आप सूरज मुखी के बीजों का और लाल शिमला मिर्च का प्रयोग भी कर सकते है.

जानें क्या हैं फिटनैस से जुड़े 10 मिथ और उनके सच

लेखिका- शकुंतला

आजकल युवाओं में अपनी बौडी को हैल्दी बनाने का क्रेज है. इस के लिए वे तरहतरह के व्यायाम करते हैं, जिम जाते हैं और डाइटिंग करते हैं. फिटनैस को ले कर अकसर उन के मन में कुछ गलतफहमियां रहती हैं, जिन्हें मन से निकाल देना ही बेहतर होगा.

1. व्यायाम के पहले स्ट्रैच करना जरूरी है:

कुछ लोगों का कहना है कि व्यायाम करने से पहले स्ट्रैच करना चाहिए, जबकि इस से बेहतर व्यायाम के बाद डाइनामिक स्ट्रैच करना होता है जब जौइंट्स और मसल्स गरम रहती हैं. इस से स्ट्रैस कम होता है, मसल्स टैंशन कम होती है, पोस्चर और रक्तसंचार बेहतर होता है.

2. जिम में घंटों ऐक्सरसाइज करना ज्यादा लाभदायक:

यह भी सही नहीं है. ज्यादा समय तक व्यायाम या वर्कआउट करने से अच्छा है जो भी करें धैर्य से करें और सही तरीके से वर्कआउट से सर्वाधिक लाभ के लिए ऐरोबिक ऐक्सरसाइज से पहले स्ट्रैंथ ट्रेनिंग लेनी चाहिए. इस से शरीर में मौजूद कार्बोहाइड्रेट की खपत पहले होती है.

इस के बाद ऐरोबिक ऐक्सरसाइज  करने से बौडी का फैट और कोलैस्ट्रौल जलता है. सिर्फ जिम में वर्कआउट से ही सबकुछ ठीक नहीं होता है, साथ में कुछ मौडरेट ऐक्सरसाइज जैसे वाकिंग, स्विमिंग, साइक्लिंग आदि भी करते रहना चाहिए.

3. स्ट्रैंथ ट्रेनिंग बंद होने से मसल्स फैट में बदल जाती हैं:

मसल्स कभी फैट में नहीं बदलती हैं. स्ट्रैंथ ट्रेनिंग बंद होने से मसल्स मास घट सकता है, जिस के चलते मैटाबोलिज्म कम हो जाएगा. मैटाबोलिज्म धीमा होने से कम कैलोरी जलेगी और वजन बढ़ने की संभावना रहेगी. मोटापा बढ़ने से कोलन, पैंक्रियाज, किडनी, गालब्लैडर, ब्रैस्ट आदि अंगों में कैंसर की संभावना बढ़ जाती है.

4. बौडी फैट जलाने का लक्ष्य साध सकते हैं:

वर्कआउट से आप अपने शरीर का फैट तो जला सकते हैं पर आप शरीर के किसी खास अंग के फैट का जलना सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं. वर्कआउट के दौरान आप की बौडी का फैट जलेगा पर बौडी किसी मनचाहे अंग का फैट जलाने का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकती है.

5. ज्यादा वजन उठाने से बौडी टोन और शेप बेहतर होगी:

वेट लिफ्टिंग से बौडी टोन और शेप अच्छी होती है पर इस से आप बौडीबिल्डर की तरह नहीं दिख सकते. महिलाओं में टेस्टोस्टेरौन की मात्रा बहुत कम होती है, जिस के चलते उन में मसल्स बिल्डिंग पुरुषों जैसी नहीं हो सकती है. वेटलिफ्टिंग से आप की कैलोरी अवश्य जलेगी और हैल्दी वेट मैंटेन रहेगा. हैल्दी वेट अनेक रोगों को दूर रखता है.

6. क्रंचेज एक बेहतर वर्कआउट है:

क्रंचेज बैली फैट जलाने में सक्षम नहीं होता है. इस के लिए कार्डियो वर्कआउट और रिजिस्टैंस ट्रेनिंग बेहतर ऐक्सरसाइज है.

7. ऐक्सरसाइज कर आप कुछ भी खा सकते हैं:

ऐक्सरसाइज का मतलब यह नहीं है कि आप का खानपान मनचाहा होगा. संतुलित और पौष्टिक आहार किसी भी ऐक्सरसाइज या वर्कआउट से ज्यादा जरूरी है. समुचित आहार  वेट मैनेजमैंट और स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक है. ऐक्सरसाइज या वर्कआउट आप को उचित खानपान से समझौता करने की इजाजत नहीं  देता है.

8. ट्रेडमिल पर ज्यादा चलने से वजन मैंटेन रहेगा:

ट्रेडमिल पर ज्यादा देर वर्कआउट करने से वजन ठीक रहेगा ऐसा कुछ नहीं है उलटे यह आप की कैलोरी जलाती है. ट्रेडमिल एक कार्डियो ऐक्सरसाइज है. वेट मैनेजमैंट के लिए अलग से वेट ट्रेनिंग वर्कआउट करना पड़ता है.

9. जब तक पसीना न निकले वर्कआउट पूरा नहीं होता है:

यह सब के लिए जरूरी नहीं है विशेषकर वेट लिफ्टर के लिए. वजन बढ़ाने के क्रम में बीचबीच में उसे कुछ मिनट रिलैक्स करना पड़ता है ताकि उस का नर्वस सिस्टम रिकवर कर सके और अत्यधिक वजन उठाने के लिए तैयार हो सके. इस दौरान उसे पसीना नहीं भी आ सकता है.

10. प्रत्येक वर्कआउट के बाद इलैक्ट्रोलाइट जरूरी है:

नौर्मल वर्कआउट के बाद स्पोर्ट ड्रिंक्स या इलैक्ट्रोलाइट जरूरी नहीं है. 1 घंटे से ज्यादा कार्डियो वर्कआउट या लंबी मैराथन रनिंग के मध्य में इसे लिया जा सकता है अन्यथा स्पोर्ट ड्रिंक्स पीने से अनावश्यक शुगर मिलेगा और फैट जलाने की प्रक्रिया में बाधा होगी.

World Hearing Day 2024: कान बहने की समस्या को न लें हल्के में, जानें एक्सपर्ट की राय

World Hearing Day 2024: कान और उसकी हेल्थ के बारे में सीके बिरला हॉस्पिटल गुरुग्राम में लीड ईएनटी कंसल्टेंट डॉक्टर अनिष गुप्ता ने विस्तार से जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि पिछले कुछ समय में मिडल ईयर में बहाव के साथ ओटिटिस मीडिया का प्रसार काफी तेजी से बढ़ा है. इस परेशानी को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है लेकिन अगर इसका इलाज न कराया जाए तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं. 3 मार्च को मनाए जाने वाले वर्ल्ड हियरिंग डे के अवसर को देखते हुए ये जरूरी है कि सुनने की क्षमता वाली इस परेशानी के बारे में चर्चा की जाए और इसके खतरे के बारे में समझा जाए.

बहाव के साथ ओटिटिस मीडिया (ओएमई) होने के कई कारण हो सकते हैं जिसमें लगातार कोल्ड होना, एलर्जी, वायरल इंफेक्शन, एडेनोओडाइटिस और एडेनोइड हाइपरट्रॉफी शामिल है. इससे मिडल ईयर यानी मध्य कान का इंफेक्शन हो सकता है या मिडिल ईयर में धीरे-धीरे वेंटिलेशन की समस्या हो सकती है.

ओएमई की घटनाएं खासकर कोविड काल के बाद ज्यादा बढ़ी हैं और इसकी वजह एडेनोइड संक्रमण और हाइपरट्रॉफी को माना जाता है. हालांकि, कोविड वायरस से इसका डायरेक्ट रिलेशन स्थापित होना अभी बाकी है, लेकिन हाल के वक्त में ओएमई के मामलों में 25 से 30 फीसदी का इजाफा हुआ है. 3 से 6 साल के बच्चों को इस समस्या की गिरफ्त में आने का ज्यादा खतरा है, ऐसे में उनकी लगातार स्क्रीनिंग और चेकअप कराने की जरूरत है. जिन बच्चों को एडोनोइड हाइपरट्रॉफी, बार-बार सर्दी, खांसी और एलर्जी होती है, उनके लिए ये जरूरी है.

अगर ओएमई की समस्या की पहचान वक्त पर न हो पाए या फिर इलाज में देरी हो जाए तो इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. ईयरड्रम को डैमेज हो सकता है, और फिर कान की बीमारी हो सकती है. इस सबके कारण सुनने की क्षमता कम हो सकती है, कान बहने लगते हैं और दूसरी अन्य समस्याएं भी हो जाती हैं. ऐसे में ओएमई के नकारात्मक प्रभाव से बचाव के लिए इससे बचाव और शुरुआती इंटरवेंशन बेहद जरूरी है. समय पर इलाज से ओएमई की समस्या को बढ़ने से रोका जा सकता है और सुनने की क्षमता को बचाया जा सकता है.

जिन लोगों को ये समस्या होने का खतरा है उनकी लगातार स्क्रीनिंग कराने की जरूरत है. मां-बाप, केयर टेकर और मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े लोगों के बीच अवेयरनेस फैलाने के साथ ही ओएमई के शुरुआती लक्षणों के बारे में सबको बताने की जरूरत है ताकि समय पर इलाज किया जा सके.

शैक्षिक अभियान और सामुदायिक आउटरीच प्रोग्राम ओएमई की रोकथाम और मैनेजमेंट में अहम भूमिका निभा सकते हैं. कान की हेल्थ के बारे में लोगों को सचेत करके, इसके अर्ली डिटेक्शन की जानकारी देकर हम संयुक्त रूप से ओएमई से संबंधित परेशानियों से बचाव कर सकते हैं.

इस वर्ल्ड हियरिंग डे के अवसर पर सब लोग मिलकर कान और सुनने की क्षमता पर ध्यान दें, ओएमई से संबंधित रिस्क के बचाव के बारे में जागरूकता फैलाएं. हम सब मिलकर ये सुनिश्चित कर सकते हैं कि हर व्यक्ति की समय पर जांच हो, समय पर इलाज मिले और उनकी सुनने की शक्ति प्रभावित न हो. आइए मिलकर ऐसे समाज की कल्पना करें जहां हर शख्स को कान की सेहत से जुड़े मामलों में बेहतर से बेहतर ट्रीटमेंट मिल सके और वो मिडिल ईयर की समस्याओं से निजात पा सकें.

डिलीवरी से पहले कराएं Prenatal Testing ताकि ले सकें समय रहते महत्वपूर्ण फैसला

35 वर्षीय स्नेहा को जैसे ही पता लगा कि वो गर्भवती है उसे सैकड़ो चिताओं ने घेर लिया.वो ये सोच सोच कर परेशान रहती थी ,” लेट प्रेगनेंसी के साइड इफेक्ट्स बहुत ज्यादा होते है.उसका आने वाला बच्चा स्वस्थ होगा कि नहीं?”

एक दिन चेकअप के दौरान स्नेहा ने अपने मन का डर डॉक्टर से साझा किया तो उन्होंने स्नेहा को प्रीनेटल जेनेटिक टेस्ट सजेस्ट किये.क्या होता है प्रीनेटल जेनेटिक टेस्ट आप भी जान लीजिए.

प्रीनेटल जेनेटिक टेस्टिंग के तहत् कुछ ऐसी जांच शामिल होती हैं जो अजन्मे शिशु में संभावित आनुवांशिक विकारों (जेनेटिक डिसऑडर्र) की पुष्टि करती हैं.आनुवांशिक विकार किसी व्यक्ति की जीन्स में होने वाले बदलावों के कारण पैदा होते हैं.इन परीक्षणों से क्रोमोसोम में कम/अतिरिक्त क्रोमोसोम (डाउन्स सिंड्रोम) या जीन्स में होने वाले बदलावों, यानि म्युटेशंस (थैलसीमिया) का पता लगाया जाता है.जरूरी नहीं कि जेनेटिक डिसॉर्डर का कारण हमेशा आनुवांशिक ही हो.

डॉ तलत खान, डॉक्टर इंचार्ज, मेडिकल जेनेटिक्स, मैट्रोपोलिस हैल्थकेयर लिमिटेड के मुताबिक सभी गर्भवती महिलाओं को ये जांच जरूर करवानी चाहिए.दरअसल आंकड़ों के मुताबिक मैट्रोपॉलिस हैल्थकेयर लैबोरेट्री में 1 साल में प्रीनेटल जेनेटिक टेस्टिंग करवाने वाली 50,000 महिलाओं में से करीब 4 फीसदी की रिपोर्ट पॉजिटिव आयी.जो कि चिंताजनक है.लेकिन परेशानी ये है कि भारत में इस विषय पर अभी भी खुलकर बातचीत नहीं होती और यही कारण है कि जागरूकता स्तर को बेहतर बनाए जाने की जरूरत है.

अमेरिकल कॉलेज ऑफ ऑब्सटैट्रिशियन्स एंड गाइनीकोलॉजिस्ट्स (ACOG) की नवीनतम गाइडलाइंस और फेडेरेशन ऑफ ऑब्सटैट्रिक्स एंड गाइनीकोलॉजिकल सोसायटीज़ ऑफ इंडिया (FOGSI) के मुताबिक, सभी गर्भवती महिलाओं की एन्यूप्लोइडी (aneuploidy) के लिए प्रीनेटल जेनेटिक टेस्टिंग की जानी चाहिए और यह गर्भवती की उम्र या अन्य किसी भी रिस्क फैक्टर्स के संदर्भ के बगैर होनी चाहिए.
प्रेग्नेंसी की शुरुआत होते ही जल्द से जल्द जेनेटिक टेस्टिंग पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए यानी पहले ट्राइमेस्टर के दौरान क्योंकि 10 से 18 हफ्ते की प्रेग्नेंसी के समय ही जांच करवाने की सलाह दी जाती है.
सभी गर्भवती महिलाओं की जांच उनकी गेस्टेशनल एज के मुताबिक डुअल मार्कर टेस्ट (11 से 13.6 हफ्ते), क्वाड्रपल मार्कर टेस्ट (14 से 17 हफ्ते) और नॉन-इन्वेसिव प्रीनेटल टेस्टिंग (एनआईपीटी – 10 हफ्ते के बाद) होना चाहिए.ये टैस्ट नॉन-फास्टिंग ब्लड सैंपल पर किए जा सकते हैं.

यदि स्क्रीनिंग से संभावित समस्या का संकेत मिलता है, तो 30 साल से अधिक उम्र की गर्भवती, फैमिली हिस्ट्री या जेनेटिक डिसऑर्डर के रिस्क को बढ़ाने वाली मेडिकल कंडीशंस वाली महिलाओं को इन्वेसिव प्रीनेटल डायग्नॉस्टिक टेस्ट करवाने चाहिए.

ये डायग्नॉस्टिक टेस्ट, कोरियॉनिक विलस सैंपलिंग और एम्नियोटिक फ्लूइड अनॅलिसिस के आधार पर किए जाते हैं और किसी भी अनुवांशिक या जेनेटिक बीमारी की पुष्टि करने के एकमात्र साधन भी हैं.लेकिन यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि इनके साथ गर्भपात का 0.1% खतरा भी जुड़ा होता है.

महिलाओं के मन में उठने वाले सवाल

टैस्ट रिजल्ट मिलने के बाद क्या होता है?

यदि जांच के नतीजे सामान्य रेंज में होते हैं तो इनसे चिंता काफी हद तक दूर हो जाती है और प्रेग्नेंसी पर नज़र रखने के लिए रूटीन एंटीनेटल चेक-अप तथा फॉलो-अप यूएसजी की मदद ली जाती है.

क्या हाइ-रिस्क सूचना से प्रीनेटल केयर पर असर पड़ता?

प्रीनेटल टेस्टिंग से हैल्थकेयर प्रोवाइडर को उन तमाम स्थतियों की जानकारी मिल जाती है जो प्रसव के बाद इलाज के लिए आवश्यक हो सकती हैं, और इस प्रकार वे संभावित कॉम्प्लीकेशन्स के लिए पहले से तैयारी कर पाते हैं.

स्क्रीनिंग टेस्ट कितने सही होते हैं?

सामान्य ट्राइसॉमी के लिए सभी स्क्रीनिंग टेस्ट 90% संवेदी होते हैं.

क्या एम्नयोसेंटेसिस से गर्भपात (एबॉर्शन) का खतरा होता है?

एम्नियोसेंटेसिस 99.9% सुरक्षित होती है और इसमें गर्भपात का खतरा केवल 0.1% होता है.

क्या इन परीक्षणों से गर्भ में पल रहे भ्रूण के लिंग का भी पता लगाया जा सकता?

नहीं, PCPNDT गाइडलाइंस के मुताबिक, प्रसव पूर्व शिशु के लिंग की जानकारी देना गैर-कानूनी होता है.

क्या प्रीनेटल जेनेटिक टेस्ट के साथ फौलो-अप सोनोग्राफी की आवश्यकता होती है?

हां, अल्ट्रासाउंड का समय और फ्रीक्वेंसी का निर्धारण ऑब्सटैट्रिशयन द्वारा किया जाता है और यह हर मरीज के मामले में फर्क हो सकता है.

निष्कर्षः

जेनेटिक टेस्टिंग की सलाह दी जाती है ताकि आप पहली बार प्रीनेटल विजिट के दौरान ही चर्चा कर सकें.
ज्यादातर महिलाओं के मामले में दोनों जेनेटिक स्क्रीनिंग और डायग्नॉस्टिक टेस्ट नेगेटिव आ सकते हैं.
स्क्रीनिंग पर पॉजिटिव रिजल्ट आए तो दोबारा डायग्नोस्टिक टेस्ट करवाएं ताकि पुष्टि की जा सके.
यह जानकारी आगे टेस्टिंग के लिए, अतिरिक्त मेडिकल केयर, प्रेग्नेंसी के विकल्पों या प्रसव के बाद रिसोर्स/सपोर्ट की तलाश में मददगार हो सकती है.

सर्दियों में करें शिशु की देखभाल

सर्दी का मौसम शिशुओं के लिए एक नाजुक मौसम होता है. सर्दी की शुरुआत शिशुओं के लिए विशेषतौर पर बहुत संवेदनशील होती है क्योंकि शिशुओं के तापमान में व्यस्कों की अपेक्षा जल्दी गिरावट आती है. जितना छोटा शिशु होता है, उतनी ही आसानी से वह रोग से ग्रस्त हो सकता है क्योंकि उस के अंदर कंपकंपा कर अपने शरीर में गरमी उत्पन्न करने की क्षमता नहीं होती है तथा उस के शरीर में इतनी वसा भी नहीं होती है जिस का प्रयोग कर वह अपने शरीर के अंदर गरमी पैदा कर सके.

इसलिए स्वाभाविक है कि शिशु को गरम एवं सुरक्षित रखने हेतु उचित व्यवस्था की जाए.

शिशु को आवश्यकतानुसार ऊनी कपड़े पहनाएं बच्चों को मौसम के अनुसार ऊनी कपड़े पहनाना बेहद आवश्यक होता है. उन की त्वचा अत्यंत नाजुक होती है इसलिए उन्हें सर्वप्रथम कोई सूती वस्त्र पहना कर उस के ऊपर ऊनी वस्त्र, स्वैटर अथवा जैकेट आदि पहननी चाहिए क्योंकि ज्यादा गरम कपड़े पहनने पर यदि शिशु को पसीना आता है तो सूती वस्त्र उसे सोख लेता है और शिशु को आराम पहुचाता है. साथ ही ऊनी वस्त्र सीधे शिशु के संपर्क में नहीं आता है जिस से ऊनी रेशों के कारण उस की त्वचा पर किसी भी प्रकार का संक्रमण नहीं होता है और चकत्ते भी नहीं पड़ते हैं.

माताओं को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शिशु को एक मोटा ऊनी कपड़ा पहनाने की अपेक्षा 2 कम गरम ऊनी कपड़े पहनाएं. इस से यदि सर्दी में कमी होने लगे तो वे कपड़े को उतार भी सकती हैं. इस से बच्चे की सर्दी से बचाच भी रहेगा और साथ ही उसे अनावश्यक रूप से पसीना व उल?ान का शिकार भी नहीं होना पड़ेगा. शिशु के पैर में भी उचित रूप से गरम वस्त्र जैसे पाजामा, मोजे आदि पहनाने चाहिए. सिर व हाथों को भी उचित वस्त्रों से ढकना चाहिए ताकि शिशु का शरीर गरम रह सके.

शिशु को घर के अंदर रखें

सर्दी के मौसम में अकसर तापमान में अचानक गिरावट आ जाती है और कई बार तेज हवाएं और बारिश स्थिति को और भी गंभीर बना देती है. ऐसे में शिशु को घर के अंदर रखना उचित होता है. घर का तापमान उचित रखें जिस से शिशु को अत्याधिक वस्त्र न पहनाने पड़ें. कमरे का उचित तापमान 68 डिगरी फारेनहाइट से 72 डिगरी फारेनहाइट माना गया है. रात को सोते समय कमरे का तापमान 65 डिगरी फारेनहाइट से 68 डिगरी फारेनहाइट होना चाहिए. इस से शिशु सुरक्षित रहता है और कमरे के वातावरण में नमी की कमी भी नहीं होती है.

कमरे का तापमान यदि ज्यादा गरम हुआ तो वातावरण में नमी तथा औक्सीजन की कमी हो सकती है जिस से बच्चे के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है. अत: माताओं को ध्यान देना चाहिए कि कमरे का तापमान सामान्य रूप से गरम रहे. यदि कमरे को गरम करने के लिए

हीटर या आग का प्रयोग करते हैं, तो सोने से पूर्व उसे बंद कर दे. वायु के संचार का ध्यान रखें अन्यथा औक्सीजन की कमी से शिशु की मृत्यु हो सकती है.

शिशु को बाहर ले जाते समय सावधानियां

यदि किसी कारणवश शिशु को बाहर ले जाना आवश्यक है तो उसे उचित वस्त्र पहना कर ले जाएं. समयसमय पर यह जांच करती रहें कि शिशु को कोई परेशानी तो नहीं हो रही है. घर से बाहर शिशु को अपने शरीर के पास ही रखें. मानव शरीर की गरमी से शिशु सुरक्षित रहता है. उस के सिर और पैर हमेशा ढक कर रखें. शिशु को ढक कर रखते समय या उस के शरीर को गरमाहट देते समय ध्यान रखें कि उस को सांस लेने में तकलीफ न होने पाए. यह सावधानी शिशु को वस्त्र पहनाते समय भी रखनी चाहिए.

शिशु के खानपान का ध्यान रखें

नवजात का पहला भोजन मां का दूध ही है. उसे पहले 6 माह तक मां का दूध ही देना चाहिए क्योंकि मां के दूध में शिशु के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्त्व उचित मात्रा में उपलब्ध होते हैं. इस के उपरांत शिशु को मां के दूध के साथ ऊपरी आहार देना शुरू कर देना चाहिए. शुरुआत में शिशु को दिया जाने वाला भोजन सौम्य, तरल व कुनकुना होना चाहिए. उस के बाद शिशु को अर्ध ठोस आहार देना चाहिए जैसे हलवा, खिचड़ी, मसला हुआ केला, उबला सेब आदि.

8वें माह के पश्चात जब शिशु के दांत निकलना प्रारंभ होने लगें तो उसे ठोस आहार देना चाहिए. शिशु का आहार अधिक तीखा, मिर्चमसाले वाला नहीं होना चाहिए. भोजन में समयसमय पर 1/2 से 1 छोटा चम्मच घी भी दिया जाना चाहिए. ध्यान रहे कि प्यारदुलार में ज्यादा घी न खिलाएं क्योंकि अधिक घी शिशु के लिवर के लिए हानिकारक होता है. शिशु को दिन में कई बार भोजन देना चाहिए. खाली पेट या प्रयाप्त भोजन न देने से शिशु को ठंड जल्दी लग जाएगी और आप का शिशु कुपोषित भी हो सकता है.

शिशु की त्वचा की देखभाल

सर्दी के मौसम में तापमान गिरने तथा वातावरण में हवा के संचार की कमी होने के कारण शिशु की त्वचा में रूखापन हो जाता है तथा कभीकभी उस पर चकत्ते भी पड़ जाते हैं. इस के निवारण के लिए शिशु की त्वचा को साफ रखने के लिए उसे साफ कुनकुने पानी से नहलाना चाहिए. यदि सर्दी अधिक हो तो शिशु को गरम पानी में तौलिया भिगो कर पोंछ देना (स्पंज करना) चाहिए. स्पंज ऐसे स्थान पर करें जहां गरमी हो एवं हवा शांत हो. शिशु की त्वचा रूखी न होने पाए, इस के लिए लोशन लगाएं अथवा तेल से उस की मालिश भी अवश्य करें. इस से शिशु की त्वचा मुलायम, शरीर में रक्तसंचार सही रहता है और उस के शरीर में गरमाहट भी उत्पन्न होती है. मालिश के लिए जैतून, सरसों अथवा नारियल का तेल प्रयोग कर सकते हैं.

मातापिता आलस न करें

ठंड के कारण मातापिता शिशु की देखभाल में बिलकुल लापरवाही न बरतें. यदि उन्हें या परिवारजनों में से किसी को सर्दीजुखाम हुआ है तो शिशु को उस से दूर ही रखना चाहिए क्योंकि शिशु को किसी भी बीमारी का संक्रमण जल्दी होता है. शिशु को उचित समय पर रोगप्रतिरोधक टीके अवश्य लगवाएं क्योंकि टीकाकरण बच्चों को विभिन्न जानलेवा बीमारियों से बचाता है. सर्दी के मौसम के कारण मातापिता इस में जरा भी लापरवाही न बरतें क्योंकि शिशु संवेदनशील होता है और समय से टीकाकरण उसे कई गंभीर बीमारियों से बचाता है.

शिशु को प्राय: सर्दीजुकाम होता रहता है. यदि सही से देखभाल व इलाज न किया जाए तो उसे निमोनिया हो जाने का खतरा भी हो सकता है. शिशु की नाजुक त्वचा की भी उचित देखभाल करना आवश्यक है. उसे कुछ समय तक सूर्य की रोशनी में रखना बेहद आवश्यक है क्योंकि इस से विटामिन डी मिलता है जिस से शिशु की हड्डियां मजबूत होती हैं और साथ ही शरीर में खून का सही प्रवाह शिशु को हृष्टपुष्ट बनाता है और उस की वृद्धि एवं विकास में सहयोग करता है. उस की त्वचा भी स्वस्थ रहती है.

खांस-खांसकर बुरा हाल है तो इसे हल्के में न लें, हो सकते हैं कैंसर के संकेत

शिवानी हर समय गले में दर्द और खांसी रहने की समस्या से परेशान रहती थी. उसने पहले घरेलू नुस्खे अपनाये. फिर आराम न मिलने पर डाक्टर से मिली और बोला,” डॉक्टर साब इतनी दवाइयां कर लीं पर आराम नहीं.”

इस पर डॉक्टर ने कहा,”थ्रोट कैंसर यानी गले के कैंसर में कई तरह के कैंसर शामिल होते हैं जिसमें लैरिनिक्स, फैरिनिक्स और टॉन्सिल्स के कैंसर होते हैं. इनके अलग-अलग लक्षण होते हैं जिनसे कैंसर का पता चलता है. इन लक्षणों पर ध्यान देकर तुरंत इलाज की जरूरत होती है. मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत , हेड व नेक कैंसर के सर्जन डॉक्टर अक्षत मलिक का मानना है कि इन लक्षणों को पहचानकर इसका इलाज कराना बेहद महत्वपूर्ण है.

गले के कैंसर के जो लक्षण होते हैं हालांकि दूसरी अन्य बीमारियों के कारण भी सामने आते हैं, लेकिन अगर ये लक्षण लगातार 2-3 हफ्तों तक दिखाई दे और वक्त के साथ-साथ हालात बिगड़ते जाएं तो इन्हें दरकिनार नहीं करना चाहिए.

लक्षण

लगातार आवाज बैठना या आवाज में बदलाव: अगर किसी का गला लगातार बैठा रहता है या आवाज दबी रहती है तो इस पर ध्यान देने की जरूरत है.

गला सूखा: अगर गला सूखा रहने की परेशानी पुरानी है या फिर लगातार ऐसा रहता है और सामान्य इलाज से भी ठीक नहीं होता तो इसे इग्नोर न करें.

निगलने में समस्या: अगर खाना निगलने में दिक्कत हो रही है तो ये ट्यूमर के लक्षण हो सकते हैं.

लगातार खांसी: आमतौर पर लोग खांसी बहुत हल्के में लेते हैं लेकिन अगर सांस की दिक्कत आदि न हो और फिर भी लगातार खांसी रहती है तो दिखाने की जरूरत है.

एस्पिरेशन: कुछ निगलने पर खांसी आती है तो समस्या है. ऐसा हवा के पाइप में खाना जाने के कारण भी हो सकता है.

कान में दर्द: एक या दोनों कानों में बिना किसी खास वजह के दर्द होना भी गले में समस्या के कारण हो सकता है.

वजन कम होना: अचानक यूं ही वजन कम हो जाना, खाना निगलने में परेशानी और खाने की आदतों में बदलाव भी कैंसर के लक्षण हो सकते हैं.

गर्दन में गांठ: अगर गर्दन में गांठ हो या सूजन हो तो ये बढ़े हुए लिम्फ नोड्स के कारण हो सकता है और इससे कैंसर फैलने के संकेत मिलते हैं.

सांस लेने में कठिनाई: अगर गले का कैंसर एडवांस स्टेज में हो तो इससे सांस की समस्या भी हो सकती है.

लगातार सांस में बदबू: अगर आप टूथब्रश करते हैं और मुंह साफ करने के अन्य तरीके भी अपनाते हैं और फिर सांसों में बदबू रहती है तो ये चिंता का कारण हो सकता है.

डॉक्टर के मुताबिक ये सभी लक्षण किसी कम गंभीर बीमारी के कारण भी हो सकते हैं. लेकिन अगर ऐसा होता है तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं. ऐसा करने से ट्यूमर होने की स्थिति में जल्दी डायग्नोज हो जाएगा और इलाज से इसे ठीक करना संभव रहेगा. वहीं, जो लोग स्मोकिंग करते हैं, तंबाकू का सेवन करते हैं, शराब पीते हैं वैसे लोग रेगुलर चेकअप कराएं और अपनी सेहत की मॉनिटरिंग रखें.

अपनी सेहत को सबसे ऊपर रखें, अवेयरनेस बढ़ाएं, समय पर डॉक्टर से सलाह लें और बेहतर इलाज लें ताकि गले के कैंसर के खिलाफ लड़ाई को जीता जा सके.

पोषक तत्वों का खजाना है मिलेट्स, जाने इसे कैसे करें खाने में शामिल

अच्छी सेहत के लिए सब से महत्त्वपूर्ण होता है कि आप क्या खा रहे हैं. यदि आप भी खाने में किसी हैल्दी औप्शन की तलाश कर रहे हैं तो nएक खाद्य अनाज जिसे आप को अपने आहार में शामिल करने की आवश्यकता है तो वह है मिलेट्स. मिलेट्स एक प्रकार का मोटा अनाज होता है जोकि गेहूं, चावल के समान होता है लेकिन उस में दूसरे अनाजों के मुकाबले अधिक पोषण और स्वास्थ्य लाभ होते हैं. मिलेट्स के कई प्रकार होते हैं जैसेकि ज्वार, बाजरा, रागी और प्रोसो मिलेट्स आदि.

मिलेट्स के बारे में सब से अच्छी बात यह है कि आप इसे खाने से कभी बोर नहीं हो सकते क्योंकि यह कई रूपों में उपलब्ध है और आसानी से पकाया जा सकता है. सभी तरह के मिलेट्स अलगअलग गुणों से भरपूर होते हैं. ये सब स्वास्थ्य के लिए समान रूप से अच्छे हैं और बेहद पौष्टिक हैं. तभी तो इसे ‘सुपर ग्रेन्स’ के रूप में जाना जाता है. अपने आहार में मिलेट्स का उपयोग कर के आप अपने स्वास्थ्य को बेहतर
बना सकते हैं.

मिलेट्स के प्रकार

ज्वार: ज्वार भारत में एक पौपुलर मिलेट्स है और इसे अकसर रोटी, डोसा और चावल के रूप में खाया जाता है. यह फाइबर और प्रोटीन का अच्छा स्रोत होता है और यह ग्लूटेन फ्री होता है जिस से ग्लूटेन ऐलर्जी वाले लोग भी इस का सेवन कर सकते हैं.

बाजरा: बाजरा विटामिन बी, फौलेट और ऐंटीऔक्सीडैंट्स का अच्छा स्रोत होता है. बाजरे को रोटी और खिचड़ी के रूप में खाया जाता है.

रागी: रागी उच्च प्रोटीन और कैल्सियम का स्रोत होता है. यह खासतौर पर साउथ इंडिया में पसंद किया जाता है और डोसा, इडली और रोटी के रूप में बना कर खाया जाता है.

कोरा: यह फाइबर और विटामिन का अच्छा स्रोत होता है. यह स्वादिष्ठ पुलाव और उपमा के रूप में खाया जा सकता है.

प्रोसो: यह विटामिंस, मिनरल्स और प्रोटीन का अच्छा स्रोत होता है.

मिलेट्स के हैल्थ बैनिफिट्स: मिलेट्स कई तरह से हमारी हैल्थ के लिए फायदेमंद है:

पौष्टिकता: मिलेट्स विटामिन ए, विटामिन बी, मिनरल्स, फास्फोरस, पोटैशियम, ऐंटीऔक्सीडैंट, नियासिन, कैल्सियम और आयरन, प्रोटीन और फाइबर का अच्छा स्रोत होता है. यह हमारे शरीर को सभी महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्व देता है और स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है. बाजरा में कई पोषक तत्त्वों का भंडार होता है.

वजन नियंत्रण: मिलेट्स का सेवन करने से वजन को नियंत्रित किया जा सकता है क्योंकि इस में फाइबर होता है जो भूख को कम करता है.

दिल का स्वास्थ्य: मिलेट्स खराब कोलैस्ट्रौल को कम करने में भी मदद करता है जो हृदयरोग के लिए एक जोखिम कारक है. इस में ऐंटीऔक्सीडैंट्स होते हैं जो दिल के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करते हैं. इसे खाने से दिल की बीमारियों का रिस्क कम होता है.

मधुमेह में फायदेमंद: मिलेट्स में ग्लाइसेमिक इंडैक्स कम होता है जिस का अर्थ है कि उस का रक्त शर्करा के स्तर पर कम प्रभाव पड़ता है. यह मधुमेह वाले व्यक्तियों के लिए फायदेमंद हो सकता है.
कैंसर प्रतिरोधक: मिलेट्स में पाए जाने वाले ऐंटीऔक्सीडैंट्स कैंसर के खिलाफ लड़ाई में मदद कर सकते हैं.

पेट के लिए अच्छा: मिलेट्स में मौजूद अघुलनशील फाइबर प्रीबायोटिक के रूप में कार्य करता है जो आंत में अच्छे बैक्टीरिया का प्रवेश कराता है. मिलेट्स में फाइबर की प्रचुर मात्रा पाई जाती है. साबूत अनाज के रूप में सेवन करने पर फाइबर की मात्रा अधिक होती है और इस प्रकार यह पुरानी कब्ज के रोगियों के लिए फायदेमंद हो सकता है.

ग्लूटेन मुक्त विकल्प: यदि आप को सीलिएक रोग या ग्लूटेन संवेदनशीलता है तो बाजरा गेहूं और जौ जैसे ग्लूटेन युक्त अनाज का एक उत्कृष्ट विकल्प हो सकता है.

ऐंटीऔक्सीडैंट: मिलेट्स ऐंटीऔक्सीडैंट से भरपूर होता है जिस से इसे खाने से संभावित रूप से पुरानी बीमारियों का खतरा कम हो जाता है.

हड्डियों का स्वास्थ्य: मिलेट्स कैल्सियम और फास्फोरस जैसे आवश्यक खनिजों का एक स्रोत है जो स्वस्थ हड्डियों को बनाए रखने के लिए महत्त्वपूर्ण है.

कैसे खाएं मिलेट्स

मिलेट्स से तैयार किए जाने वाले विभिन्न पदार्थ खाने में स्वादिष्ठ होते हैं और स्वास्थ्यपूर्ण भी होते हैं. ये अपेक्षाकृत जल्दी पक जाते हैं और बिना किसी परेशानी के आप के दैनिक भोजन का हिस्सा बन सकते
हैं. आप इसे कई तरह से अपने आहार में शामिल कर सकते हैं.

मिलेट्स की रोटी, मिलेट्स की खिचड़ी, पुलाव, मिलेट्स की इडली, डोसा, उपमा और पोहे, मिलेट्स की ब्रैड, डैजर्ट्स, मिलेट्स का सूप आदि. सभी प्रकार के मिलेट्स को आप उपलब्धता के आधार पर अपने आहार में शामिल कर सकते हैं. यह पूरे साल बाजार में उपलब्ध रहता है. वैसे कुछ खास मिलेट्स खास मौसम में ज्यादा उपयोगी होता है मसलन:

सर्दी: सर्दी के लिए सब से अच्छा मक्का है. यह विशेष रूप से इसी समय उगाया जाता है. यह तासीर में भी गरम होता है.

गर्मी: पूरी गरमी में ज्वार और रागी का उपयोग करें. चिलचिलाती गरमी के दिनों में ये आप को हाइड्रेटेड रहने और आप के शरीर के तापमान को कम करने में मदद कर सकते हैं.

मिलेट्स खाने में कुछ सावधानियां भी जरूर रखें:

मिलेट्स अपने कई फायदों के कारण भोजन के लिए हैल्दी औप्शन है. लेकिन इसे खाने में कुछ सावधानियां रखनी भी जरूरी हैं तभी आप को इस का पूरा लाभ मिलेगा.

इस में मौजूद फाइटिक ऐसिड अन्य पोषक तत्त्वों के अवशोषण को कम कर सकता है. साथ ही यह कुछ लोगों के पेट के स्वास्थ्य के लिए भी परेशानी भरा हो सकता है. इसलिए इस को अपने आहार में शामिल करने से पहले उसे भिगोना चाहिए. भिगोने से उस में मौजूद फाइटिक ऐसिड की कमी होती है. मिलेट्स को भिगो कर, अंकुरित कर के खाने से इस के हानिकारक प्रभाव कम हो जाते हैं.

ज्वार और बाजरा वाले मिश्रण पर स्विच करने से पहले हलके अनाज जैसे रागी और फौक्सटेल बाजरा से शुरुआत करना बेहतर है. मिलेट्स में गोइट्रोजन भी होते हैं जो आयोडीन के अवशोषण में हस्तक्षेप कर सकते हैं जिसे खाना पकाने की प्रक्रिया में कम किया जा सकता है. इसलिए हाइपोथायरायडिज्म वाले लोगों को मिलेट्स से दूर रहना चाहिए.

मिलेट्स का सेवन करते समय भरपूर मात्रा में पानी पीना सुनिश्चित करें क्योंकि इस में फाइबर की मात्रा अधिक होती है. अगर आप मिलेट्स खाने के साथसाथ पानी नहीं पीते हैं तो इस से आप को पाचन संबंधी समस्या हो सकती है और निर्जलीकरण भी हो सकता है.

इम्यूनिटी बूस्ट करें

हमेशा फ्रैश मिलेट्स खाएं. कुछ लोगों की आदत होती है कि कई दिन पुराना मिलेट्स भी खा लेते हैं. ऐसा करना बिलकुल सही नहीं है. हमेशा ताजा मिलेट्स का सेवन करें. बिलकुल उसी तरह जैसे आप ताजा फल या सब्जियों का सेवन करते हैं.

मात्रा संतुलित रखें. मिलेट्स भले ही कई पोषक तत्त्वों का अच्छा स्रोत है, इस की मदद से इम्यूनिटी को बूस्ट किया जा सकता है, इस के बावजूद आप को यह सलाह दी जाती है कि अपनी डाइट में दूसरी तरहतरह की चीजों को भी शामिल करें जैसे दलिया, सलाद, फल आदि. इस से शरीर में पोषक तत्त्वों का बैलेंस बना रहेगा. डाइट में मिलेट्स के साथसाथ प्रोटीन, फैट और बैलेंस्ड डाइट का भी संतुलन बनाए रखें.
अधिक मात्रा में सेवन न करें जैसाकि किसी भी चीज की अति सही नहीं होती है. इसी तरह मिलेट्स का भी ज्यादा मात्रा में सेवन करना सही नहीं है.

स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है कि आप ज्यादा मात्रा में रिफाइंड मिलेट्स का सेवन न करें. इस से स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है. ज्यादा मसाले से न पकाएं. अकसर लोग मोटा अनाज को काफी मसालों के साथ पकाते हैं. ऐसा करना सही नहीं है. मसालों की वजह से भले यह खाने में स्वादिष्ठ हो जाए लेकिन पोषक तत्त्वों में कमी होने लगती है. इसे हलकेफुलके मसालों के साथ पकाया जा
सकता है.

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