Women’s Day 2023: सिंगल मदर की जिम्मेदारी बखूबी निभा रही हैं ये 5 टीवी एक्ट्रेस

महिलाओं को सलाम करने का कोई खास दिन नही होता. लेकिन 8 मार्च यानी आज के दिन पूरी दुनिया एक साथ मिलकर महिलाओं का सम्मान करती है. इसी खास मौके पर आज हम आपको टीवी इंडस्ट्री कुछ ऐसी महिलाओं के बारे में बताएंगे, जिन्होंने अपने हससफर के बिना अपने बच्चों की जिम्मेदारियां संभालीं. आइए आपको बताते हैं कौन है वो सिंगल मदर्स हसीनाएं…

1. श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari)

2 बार शादी कर चुकी श्वेता तिवारी दो बच्चों की मां हैं. दूसरे पति से अलग होने के बाद अब श्वेता तिवारी सिंगल मदर बनकर अपनी बेटी पलक चिवारी और बेटे का ख्याल रख रही हैं, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिलाएं किसी भी चीज में मन लगाएं तो वह काम कर सकते हैं, जिसमें कोई साथ दे या ना दे.

 

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2. नीना गुप्ता (Neena Gupta)

 

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फिल्म ‘बधाई हो’ जैसी एक से एक फिल्मों में नजर आ चुकीं एक्ट्रेस नीना गुप्ता भी इंडस्ट्री सिंगल मदर्स में से एक हैं. पौपुलर क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स को डेट करने वाली नीना गुप्ता की बेटी मसाबा गुप्ता है. हालांकि नीना और क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स की कभी शादी नही हुई. लेकिन उन्होंने मसाबा की पूरी जिम्मेदारी उठाई, जिसके कारण आज मसाबा एक नामी फैशन डिजाइनर हैं.

3. उर्वशी ढोलकिया (Urvashi Dholakia)

 

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कसौटी जिंदगी के सीरियल में कोमोलिका से देश के घर घर में जगह बनाने वाली टीवी एक्ट्रेस उर्वशी ढोलकिया भी एक सिंगल मदर हैं. 16 साल की उम्र में उर्वशी ने शादी की थी, जिसके कुछ समय बाद ही उर्वशी ने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था औऱ अब वह अपने बच्चों के साथ अक्सर मस्ती करते हुए नजर आती हैं.

4. दलजीत कौर (Dalljiet Kaur)

बिग बॉस 13 में नजर आ चुकीं एक्ट्रेस दलजीत कौर एक्टर शालीन भनोट से शादी कर चुकी हैं. हालांकि अब दोनों का तलाक हो चुका है. वहीं तलाक के बाद दलजीत कौर को आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ गया था. बावजूद इसके दलजीत कौर ने हार नहीं मानी और अपने बेटे का सिंगल मदर बनकर ख्याल रखा. जल्दी ही वो दूसरी शादी करने जा रही हैं.

5. जूही परमार (Juhi Parmar)

 

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सीरियल कुमकुम से फैंस के दिल में जगह बनाने वाली जूही परमार अपने पति औऱ एक्टर सचिन श्रॉफ को तलाक दे चुकी हैं, जिसके बाद से वह अपनी बेटी समायरा को खुद ही पाल रही हैं. इसी के साथ उन्होंने अब अपनी जिंदगी में नया कदम भी उठाते हुए बेटी को संभालने के साथ हमारी वाली गुड न्यूज सीरियल में भी काम करती नजर आ रही हैं.

Women’s Day 2023: बोया पेड़ बबूल का…- शालिनी को कैसे हुआ छले जाने का आभास

‘‘तुम्हेंमालूम है चिल्लाते समय तुम बिलकुल जंगली बिल्ली लगती हो. बस थोड़ा बालों को फैलाने की कमी रह जाती है,’’ सौम्य दांत किटकिटा कर चिल्लाया.

‘‘और तुम? कभी अपनी शक्ल देखी है आईने में? चिल्लाचिल्ला कर बोलते समय पागल कुत्ते से लगते हो.’’

यह हम दोनों का असली रूप था, जो अब किसी भी तरह परदे में छिपने को तैयार नहीं था. बस हमारे मासूम बेटे के बाहर जाने की देर होती. फिर वह चाहे स्कूल जाए या क्रिकेट खेलने. पहला काम हम दोनों में से कोई भी एक यह कर देता कि खूब तेज आवाज में गाने बजा देता और फिर उस से भी तेज आवाज में हम लड़ना शुरू कर देते. कारण या अकारण ही. हां, सब के सामने हम अब भी आदर्श पतिपत्नी थे. शायद थे, क्योंकि कितनी ही बार परिचितों, पड़ोसियों की आंखों में एक कटाक्ष, एक उपहास सा कौंधता देखा है मैं ने.

मैं ने और सौम्य ने प्रेमविवाह किया था. मैं मात्र 18 वर्ष की थी और सौम्य का 36वां साल चल रहा था. वे अपनी पहली पत्नी को एक दुर्घटना में गंवा चुके थे और 2 बच्चों को उन के नानानानी के हवाले कर जीवन को पूरी शिद्दत और बेबाकी से जी रहे थे. मस्ती, जोश, फुरतीलापन, कविता, शायरी, कहानियां, नाटक, फिल्में, तेज बाइक चलाना सब कुछ तो था, जो मुझ जैसी फिल्मों से बेइंतहा प्रभावित और उन्हीं फिल्मों की काल्पनिक दुनिया में जीने वाली लड़की के लिए जरूरी रहा था. 36 साल का व्यक्ति 26 साल के युवक जैसा व्यवहार कर रहा है, उस के जैसा बनावशृंगार कर रहा है, इस में मुझे कुछ भी गलत नहीं लगा था उस समय. शायद 18 साल की उम्र होती ही है भ्रमों में जीने की या शायद मैं पूरी तरह सौम्य के इस भ्रमजाल में फंस चुकी थी. मम्मीपापा का कुछ भी समझाना मेरी समझ में नहीं आया.

‘‘36 साल की आयु में कहीं भी उस में गंभीरता नहीं, न संबंधोंरिश्तों को निभाने में और न ही अपनी जिम्मेदारियां निभाने में. वह तुम्हारी क्या देखभाल करेगा? कैसे रहोगी उस के साथ जीवन भर?’’ मम्मी ने समझाने की बहुत कोशिश की थी, लेकिन मैं तो प्रेम के खुमार में डूबी थी.

‘‘यह तो तारीफ की बात है मम्मी. हर समय मुंह लटकाए रखने की जगह अगर कोई खुशदिली से रह रहा है, तो उस में बुरा क्यों देखना? तारीफ करनी चाहिए उस की तो,’’ मैं उलटा मम्मी को ही समझाने लगती.

पापा चुपचाप अखबार पढ़ते रहते. जिस दिन पापा जबरदस्त तनाव में होते उस दिन

के अखबार में न जाने क्याक्या खोजते रहते. फिर भले ही अखबार सुबह पूरा पढ़ लिया हो.

यह देख मैं, मम्मी और मेरे दोनों छोटे भाई शालीन और कुलीन बिलकुल चुप्पी साध लेते. घर में इतनी शांति हो जाती कि केवल बीचबीच में पापा की गहरी सांसों की आवाज ही सुनाई देती.

‘‘तनाव तो सब को हो ही जाता है कभीकभी. शायद बड़ों को ज्यादा ही होता है,’’ मम्मी हमें समझातीं.

तो इस समय पापा पूरी तरह तनाव में हैं.

‘‘शालिनी,’’ पापा ने आवाज लगाई.

पापा का मुझे इस समय शालू के बजाय शालिनी कहना तो यही बताता है कि पापा हाई टैंशन में नहीं वरन सुपर हाई टैंशन में हैं.

‘‘शालिनी, मेरे सामने बैठो… मेरी बात को समझो बेटा. मैं ने पता किया है. सौम्य ठीक लड़का नहीं है. उस की पहली शादी भी प्रेमविवाह थी. फिर बीवी को मानसिक रूप से इतना प्रताडि़त किया कि उस ने आत्महत्या कर ली. बच्चों को उन के नानानानी के पास पहुंचाने के बाद पिछले 5 वर्षों में एक बार भी उन की खोजखबर लेने नहीं गया और न उन्हें कोई पैसे भेजता है. बच्चों के नानानानी को इस कदर डराधमका रखा है कि वे कोर्टकचहरी नहीं करना चाहते और बच्चों और अपनी सुरक्षा के लिए चुप रह गए हैं.

‘‘ऐसा आदमी जो अपनी पहली बीवी और अपनी ही संतान के प्रति इतना निष्ठुर हो, वह तुम्हारी क्या देखभाल करेगा? कैसे रखेगा तुम्हें? फिर तुम दोनों की उम्र में भी बहुत ज्यादा अंतर है. जीवनसाथी तो हमउम्र ही ठीक रहता है. तुम एक बार गंभीरता से सोच कर देखो. प्रेम अच्छी चीज है बेटा. लेकिन प्रेम में इस तरह अंधा हो जाना कि सचाई दिखाई ही न दे, ठीक नहीं है. बेटा, तुम्हें हम ने अच्छे स्कूलों में पढ़ाया, अच्छे संस्कार दिए. आज तुम्हारी सारी समझदारी की परीक्षा है बेटा… 1 बार नहीं 10 बार सोचो और तब निर्णय करो.’’

अपनी सारी अच्छाइयों के बावजूद पापा खुद निर्णय लेने में बेहद दृढ़ रहे हैं. बेहद कड़ाई से निर्णय लेते रहे हैं, लेकिन उस दिन मुझे समझाने में कितने कातर हुए जा रहे थे. उन की कातरता मुझे और भी उद्दंड बना रही थी. उन की किसी बात, किसी तर्क पर मैं ने एक क्षण के लिए भी ध्यान नहीं दिया. सोचनेसमझने की तो बात ही दूर थी.

मैं चिल्ला कर बोली, ‘‘मैं तो निर्णय कर चुकी हूं पापा. एक बार सोचूं या 10 बार… मेरा निर्णय यही है कि मैं सौम्य से शादी कर रही हूं. आप सब की मरजी हो तब भी और न हो तब भी,’’ मैं आपे से बाहर हुई जा रही थी.

‘‘तो मेरा भी निर्णय सुन लो. आज के बाद हमारा तुम से कोई संबंध नहीं. मैं, मेरी बीवी और मेरे दोनों बेटे शालीन और कुलीन तुम्हारे कुछ नहीं लगते और न तुम हमारी कुछ हो. जब मरूंगा तभी आना और मेरी संपत्ति से अपना हिस्सा ले कर निकल जाना. नाऊ, गैट लौस्ट,’’ पापा अपने पूरे दृढ़ रूप में आ गए थे.

मगर मैं ही कौन सा डर रही थी? दृढ़ स्वर में बोली, ‘‘ओके देन. मैं आप की संपत्ति पर थूकती हूं. कभी इस घर का रुख नहीं करूंगी. बाय,’’ और मैं जोर से दरवाजा बंद कर बाहर निकल गई थी.

उसी रात हम ने मंदिर में शादी कर ली. सौम्य के 2-4 मित्रों की मौजूदगी में. अब मैं श्रीमती सौम्य थी, जिसे बहुत लाड़ से सौम्य ने ही सौम्या नाम दिया था.

शादी के कुछ दिनों बाद तक सब बहुत सुंदर था. कथा, कहानियों या कहें फिल्मों के परीलोक जैसा और फिर जल्द ही मासूम के आने की आहट सुनाई दी. मेरे लिए तो यह पहली बार मां बनने का रोमांच था, लेकिन सौम्य तो इस अनुभव से 2 बार गुजर चुके थे और उस अनुभव को कपड़े पर पड़ी धूल की तरह झाड़ चुके थे. उन्हें कोई उत्साह न होता. लेकिन मैं इसे पूरी उदारता से समझ लेती. आखिर मैं हूं ही बहुत समझदार. दूसरे के मनोविज्ञान, दूसरे के मनोभावों को खूब अच्छी तरह समझती हूं. इसलिए मां बनने के अपने उत्साह को मैं ने तनिक भी कम नहीं होने दिया.

समय पर सुंदर बेटे को जन्म दे कर खुद ही निहाल होती रही. सौम्य इस सब में कहीं भी मेरे साथ, मेरे पास नहीं थे. लेडी डाक्टर और नर्सों के साथ उन की हंसीठिठोली चलती रहती. लेकिन इस जिंदादिली की तो मैं खुद कायल थी. तो अब क्या कहती?

इधर मां के रूप में मेरी व्यस्तता बढ़ती जा रही थी उधर सौम्य बरतन साफ करने वाली बाई, मासूम की देखभाल करने वाली आया, यहां तक कि मेरी मालिश करने के लिए आने वाली, मेरा हाल पूछने आने वाली पड़ोसिनों, मेरी सहेलियों को भी अपनी जिंदादिली से भिगोए रहते. काश, थोड़ी सी यही जिंदादिली मेरे मासूम बेटे को भी मिल जाती. ‘मेरे’ इसलिए कहा, क्योंकि सौम्य ने ही कहा था कि यह सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा बच्चा है. मेरे तो पहले ही 2 बच्चे हैं, जो बेचारे मां के मरने की वजह से अपने नानानानी के पास पड़े हैं.

सौम्य का गिरगिट की तरह बदलता रंग मुझे आश्चर्यचकित कर देता. प्रेम की पींगें बढ़ाते समय तो कभी उस ने पत्नी और बच्चों का जिक्र भी नहीं किया था और अब अचानक बच्चों से इतनी ज्यादा सहानुभूति पैदा हो गई थी. बस यहीं कहीं से मेरे प्रेम का दर्पण चटकना शुरू हो गया था और दिनबदिन इस में दरारें बढ़ती जा रही थीं. शायद सब से बड़ी दरार या कहें पूरा दर्पण ही तब चकनाचूर हो गया जब मैं ने सौम्य को किसी से कहते सुना कि यह बेवकूफ औरत (मैं) अपने बाप की सारी दौलत छोड़ कर खाली हाथ मेरा माल उड़ाने चली आई. उस वक्त इस के रूप और यौवन पर फिदा हो कर मैं भी शादी करने की मूर्खता कर बैठा वरना ऐसी औरतों को बेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा करना मुझे खूब आता है.

आज शादी के 8 साल बाद पेट के निचले हिस्से में दर्द होने पर जब जांच करवाई तो पता चला कि गर्भाशय में कुछ समस्या है, इसलिए उसे निकालना बेहद जरूरी है वरना कैंसर होने का खतरा है.

आज एक बार फिर मैं अस्पताल के बिस्तर पर हूं. किसे खबर करूं? मेजर औपरेशन है, लेकिन कोई ऐसा नहीं दिखता जिसे अपने पास बुला सकूं, जो सांत्वना के 2 शब्द कहे. मासूम के भोले मुखड़े को ममता से दुलारे ताकि उस की उदासी कुछ कम हो जाए. अपने पापा की विरक्ति उस से छिपी नहीं है. और मम्मी? न जाने उन्हें क्या हुआ है, क्या होने वाला है. मम्मी को कुछ हो गया तो? कहां जाएगा वह? पहले वाली मम्मी के मांबाप की तरह उस के नानानानी तो उसे रखेंगे नहीं. वे तो मम्मी से सारे संबंध तोड़ चुके हैं. नन्हे से भोले मन में कितनी दुश्चिंताएं सिर पटक रही हैं और मैं सिर्फ उस की पसीजती हथेलियों को अपनी मुट्ठी में दबा कर उसे झूठी सांत्वना देने की कोशिश ही कर पा रही हूं.

नर्स, वार्डबौय सब यमदूत की तरह घेरे हुए हैं मुझे. कोई नस खोज रहा है सूई लगाने के लिए, कोई ग्लूकोस चढ़ाने का इंतजाम कर रहा है, कोई सफाई कर रहा है. औपरेशन से पहले इतनी तैयारी हो रही है कि मेरा मन कांपा जा रहा है और सौम्य? सौम्य कहां हैं? वे बाहर खड़े बाकी नर्सों से हंसीठट्ठा कर रहे हैं.

‘‘अरे मैडम, मुझ से तो यह सब देखा ही नहीं जाता. मेरा वश चले तो मैं अस्पताल आऊं ही नहीं. लेकिन क्या किया जाए? अच्छा है कि आप लोगों जैसी सुंदरसुंदर हंसमुख परियां यहां हैं वरना तो इस नर्क में मेरा बेड़ा गर्क हो जाता. आप सब के भरोसे ही यहां हूं,’’ सौम्य की कामुक आवाज और हंसी अंदर तक आ रही थी.

‘‘चलिए मैडम, औपरेशन का समय हो गया. औपरेशन थिएटर चलना है,’’ स्ट्रेचर लिए

2 वार्डबौय हाजिर हो गए.

मैं दरवाजे की ओर देख रही हूं. शायद अब तो सौम्य अंदर आएं. उन के सामने से ही तो स्ट्रेचर अंदर आई होगी न? आंखों से आंसू भरे मासूम मुझ से लिपट गया.

‘‘अरे, मेरा बहादुर बेटा रो रहा है. मैं जल्दी बाहर आऊंगी और फिर कुछ दिनों में बिलकुल ठीक हो जाऊंगी. रोना नहीं,’’ मैं उसे सांत्वना दे रही हूं, लेकिन मुझे सांत्वना देने वाला वहां कोई नहीं है.

‘‘जल्दी कीजिए मैडम. डाक्टर साहब गुस्सा करेंगी,’’ वार्डबौय ने टोका.

‘‘हां चलिए,’’ कह मैं स्ट्रेचर पर लेट गई. बाहर भी सौम्य का कहीं अतापता न था.

‘‘भैया, मेरे पति कहां हैं?’’ मैं हकलाई.

‘‘वे सारी सिस्टर्स के लिए मिठाई लाने गए हैं. कुछ कह रहे थे… आज उन का स्वतंत्रता दिवस है… आते ही होंगे,’’ कह बेहयाई से दांत निपोरे वार्डबौय ने, लेकिन साथ ही थोड़ा धैर्य भी बंधा दिया. शायद मुझ पर दया आ गई उसे.

औपरेशन थिएटर के अंदर तो जैसे भय सा लगने लगा. अबूझ, अनाम सा भय. निराधार होता मेरा अपना वजूद. मुंह पर मास्क, सिर पर टोपी और ऐप्रन पहने डाक्टर, नर्स, वार्डबौय सभी. किसी की अलग से कोई पहचान नहीं. केवल आंखें और दस्ताने पहने हाथ. ये आंखें मुझे घूर रही हैं जैसे कुछ तोल रही हैं. ‘क्या? मेरी मूर्खता? मेरी निरीहता? मेरा अपमान? मेरा मजाक? या मेरी बीमारी? और ये दस्ताने पहने हाथ? मुझे मेरे वजूद से ही छुटकारा दिला देंगे या सिर्फ मेरी बीमारी को ही निकाल फेकेंगे? क्या सोच रही हूं मैं? मम्मीपापा, शालीन, कुलीन सब के चेहरे आंखों के सामने घूम रहे हैं.

फिर सौम्य, एक नर्स के कंधे पर हाथ टिकाए, दूसरी को समोसा खिलाता. उस की आवाज कानों को चीर रही है, ‘‘अरे, जब यूटरस ही नहीं रहा तो औरत औरत नहीं रही. और मैं? मैं तो आजाद पंछी हूं. कभी इस डाल पर तो कभी उस डाल पर. बंध कर रहना तो मैं ने सीखा ही नहीं. आज से मैं स्वतंत्र हूं, पहले की तरह… अरे यह मैं क्या सोच रही हूं?

‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से होय?’ पापा, आप ने, मम्मी ने मुझे अच्छे संस्कार दिए, अच्छी परवरिश दी, अच्छे स्कूलों में पढ़ाया ताकि आप की बेटी संस्कारी बने, समझदार बने. लेकिन मैं न समझदार बनी, न ही संस्कारी. पापा, मुझे माफ कर दो, मम्मी मुझे माफ कर दो.

अरे, यह क्या हो रहा है मुझे? कहीं दूर से आवाज आ रही है, ‘‘अरे डाक्टर, ये तो बेहोश हो रही हैं, बीपी बहुत डाउन हो गया है. अभी तो ऐनेस्थीसिया दिया भी नहीं गया. ये तो खुदबखुद बेहोश हो रही हैं. डाक्टर… डाक्टर… जल्दी आइए.’’

मैं, मेरा वजूद अंधेरे में डूब गया है.

Women’s Day 2023: मां का घर- क्या अपने अकेलेपन को बांटना चाहती थीं मां

Women’s Day 2023: आशियाना- अनामिका ने किसे चुना

“बहू कुछ दिनों के लिए रश्मि आ रही है. तुम्हें भी मायके गए कितने दिन हो गए, तुम भी शायद तब की ही गई हुई हो, जब पिछली दफा रश्मि आई थी. वैसे भी इस छोटे से घर में सब एकसाथ रहेंगे भी तो कैसे?

“तुम तो जानती हो न उस के शरारती बच्चों को…क्यों न कुछ दिन तुम भी अपने मायके हो आओ,” सासूमां बोलीं.

लेकिन गरीब परिवार में पलीबङी अनामिका के लिए यह स्थिति एक तरफ कुआं, तो दूसरी तरफ खाई जैसी ही होती. उसे न चाहते हुए भी अपने स्वाभिमान से समझौता करना पड़ता.

अनामिका आज भी नहीं भूली वे दिन जब शादी के 6-7 महीने बाद उस का पहली दफा इस स्थिति से सामना हुआ था.

तब मायके में कुछ दिन बिताने के बाद मां ने भी आखिर पूछ ही लिया,”बेटी, तुम्हारी ननद ससुराल गई कि नहीं? और शेखर ने कब कहा है आने को?” मां की बात सुन कर अनामिका मौन रही.

उसी शाम जब पति शेखर का फोन आया तो बोला,”अनामिका, कल सुबह 10 बजे की ट्रेन से रश्मि दीदी अपने घर जा रही हैं. मैं उन्हें स्टेशन छोड़ने जाऊंगा और आते वक्त तुम्हें भी लेता आऊंगा। तुम तैयार रहना, जरा भी देर मत करना. तुम्हें घर छोड़ कर मुझे औफिस भी तो जाना है.”

कुछ देर शेखर से बात करने के बाद जब वह पास पड़ी कुरसी पर बैठने लगी तो उस पर रखे सामान पर उस की नजर गई। उस ने झट से सामान उठा कर पास पड़ी टेबल पर रखा और कुरसी पर बैठ कर अपनी आंखें मूंद लीं.

कुछ देर शांत बैठी अनामिका अचानक से उठ खड़ी हुई. उस ने सामान फिर से कुरसी पर रखा और उसे देखती रही और फिर से वही सामान टेबल पर रख कर कुरसी पर बैठ गई.

इस छोटे से प्रयोग से अनामिका को यह समझने में जरा भी देर नहीं लगी कि कहीं वह भी इस सामान की तरह तो नहीं? कभी यहां तो कभी वहां…

अगले दिन जब वह शेखर के साथ ससुराल गई तो बातबात में उस ने कहीं छोटीमोटी जौब करने की इच्छा जताई तो शेखर ने साफ मना कर दिया.

लेकिन शेखर के ना चाहते हुए भी अनामिका ने कुछ ही दिनों में जौब ढूंढ़ ही ली. और जब अपनी पहली सैलरी ला कर उस में से कुछ रूपए अपनी सासूमां के हाथ में थमाए तो सास भी अपनी बहू की तरफदारी करते हुए शेखर को समझाने लगीं,”अनामिका पढ़ीलिखी है, अब जौब कर के 2 पैसे घर लाने लगी है तो इस में बुराई क्या है?”

अपनी मां से अनामिका की तारीफ सुनने के बाद शेखर के पास बोलने को जैसे कुछ नहीं बचा.

महीनों बाद जब घर में रुपयोंपैसों को ले कर सहुलत होने लगी तो शेखर को भी अनामिका का जौब करना रास आने लगा.

आज जब बेटी रश्मि का फोन आने के बाद सासूमां ने अनामिका को मायके जाने के लिए कहा तो हर बार की तरह मायूस होने की बजाय अनामिका पूरे उत्साह से बोली,”मांजी, मैं आज ही पैकिंग कर लेती हूं. कल शेखर के औफिस जाने के बाद चली जाऊंगी.”

एक बार तो आत्मविश्वास से लबरेज बहू का जबाव सुन कर सास झेंप सी गईं फिर सोचा कि बहुत दिनों बाद मायके जा रही है, शायद उसी की खुशी झलक रही है.

अगले दिन शेखर को औफिस के लिए विदा कर के अपना काम निबटा कर अनामिका ने मायके जाने के लिए इजाजत मांगी तो सास ने कहा,”मायके पहुंचते ही फोन करना मत भूलना.”

‘हां’ में गरदन हिलाते हुए अनामिका बाहर की ओर चल दी.

ससुराल से मायके का सफर टैक्सी में आधे घंटे से अधिक का नहीं था. लेकिन शाम के 4 बजने को आए थे, अनामिका का अब तक कोई फोन नहीं आया.

सासूमां ने उसे फोन किया तो आउट औफ कवरेज एरिया बता रहा था. फिर उस के मायके का नंबर मिलाया तो पता चला कि अनामिका अब तक वहां पहुंची ही नहीं.

सास के पांवों के नीचे से जमीन खिसकने लगी थी. झट से शेखर को फोन कर के इस बारे में बताया.

औफिस में बैठा शेखर भी घबरा गया। वह भी बारबार अनामिका के मोबाइल पर नंबर मिलाने के कोशिश करने लगा. और कुछ देर बाद जब रिंग गई तो…

“अनामिका, तुम ठीक तो हो न? तुम तो मेरे जाने के कुछ ही देर बाद मायके निकल गई थीं? लेकिन वहां पहुंची क्यों नहीं? घर पर मां परेशान हो रही हैं और तुम्हारी मम्मी भी इंतजार कर रही हैं. आखिर हो कहां तुम?” शेखर एक ही सांस में बोल गया.

“मैं अपने घर में हूं,” उधर से आवाज आई.

“लेकिन अभीअभी तुम्हारी मम्मी से मेरी बात हुई तो पता चला तुम वहां पहुंची ही नहीं.”

“मैं ने कहा… मैं अपने घर में हूं,”आशियाना अपार्टमैंट, तीसरा माला, सी-47,” जोर देते हुए अनामिका ने कहा.

“लेकिन वहां क्या कर रही हो तुम?” हैरानपरेशान शेखर ने आश्चर्य से पूछा.

“यहां नए फ्लैट पर चल रहे आखिरी चरण का काम देखने आई हूं.”

“नया फ्लैट? मैं कुछ समझा नहीं… लेकिन यह सब अचानक कैसे?”

“अचानक कुछ नहीं हुआ, शेखर। जब भी रश्मि दीदी सपरिवार हमारे यहां आती हैं, तो मुझे छोटे घर के कारण अपने मायके जाना पड़ता है. और जब मायके ज्यादा दिन ठहर जाती हूं तो मां पूछ बैठती हैं कि बेटी, और कितने दिन रहोगी?

“एक तो पहले से ही वहां भैयाभाभी और उन के बच्चे मां संग रह कर जैसेतैसे अपना गुजारा करती हैं, ऊपर से मैं भी वहां जा कर उन पर बोझ नहीं बनना चाहती.”

और फिर एक कान से दूसरे कान पर फोन लगाते हुए बोली,”औफिस में मेरे साथ जो डिसूजा मैम हैं उन्होंने ने भी 1 साल पहले इसी अपार्टमैंट में 1 फ्लैट खरीदा था.

“मैं ने उन से इस बारे में जानकारी जुटा कर फौर्म भर दिया और हर महीने अपनी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा इस फ्लैट की ईएमआई भरने में लगाने लगी.

“तुम ने भी मेरी सैलरी और उस के खर्च को ले कर कभी कोई हस्तक्षेप नहीं किया, इसलिए इस में तुम्हारा भी बहुत बड़ा योगदान है.”

“अनामिका…अनामिका… प्लीज, ऐसा कह कर मुझे शर्मिंदा मत करो.”

“शर्मिंदा होने का समय गया शेखर… जब मैं किसी सामान की तरह जरूरत के मुताबिक यहां से वहां भेज दी जाती थी. लेकिन आज मैं अपने स्वाभिमान की बदौलत अपने आशियाने में हूं,” कहते हुए अनामिका भावुक हो गई.

महिलाओं को कैरियर बनाने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है- गरिमा अरोड़ा, मिसलिन स्टार शैफ

मुंबई के जय हिंद कालेज से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद गरिमा ने फील्ड में भी काम किया, लेकिन इस दौरान उन्हें एहसास हुआ कि वे जो कर रही हैं उस में उन्हें मजा नहीं आ रहा.

कैरियर और पैशन को ले कर गरिमा बताती हैं, ‘‘पत्रकारिता के दौरान मैं ने अपने अंदर छिपे कुकिंग के पैशन को पहचाना. दरअसल, कुकिंग से मेरा परिचय मेरे पापा ने बहुत कम उम्र में ही करा दिया था. फिर मैं ने पैरिस के कलिनरी स्कूल से कुकिंग का कोर्स करने का फैसला किया.’’

इस के बाद गरिमा ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और मिशलिन स्टार हासिल करने वाली भारत की पहिला महिला शैफ बनीं.

शैफ ही बनना था

पैरिस से कोर्स करने के बाद गरिमा ने रैस्टोरैंट्स में काम किया और कुकिंग के साथसाथ इस व्यवसाय की बारीकियों को सीखा. गरिमा कहती हैं, ‘‘मेरे दिमाग में हमेशा यह रहता था कि मुझे शैफ ही बनना है. मुझे कलिनरी की पढ़ाई के दौरान ही यह पता चल चुका था कि कुकिंग बिजनैस में कैरियर बनाना है तो शुरुआत जल्दी करनी होगी. इस के लिए मैं ने काफी रिसर्च भी की.’’

ऐसा नहीं है कि यह यह सब गरिमा के लिए बहुत आसान था. कैरियर की शुरुआत में भी और शैफ बनने के बाद भी चुनौतियां आती रहीं. सब से बड़ी चुनौती को याद करते हुए गरिमा बताती हैं, ‘‘कोविड-19 के समय रैस्टोरैंट को चलाना, स्टाफ को समय से पैसा देना और डाइनिंग में आए नए बदलाव को समझना बेहद मुश्किल था. हमें रेवेन्यू बढ़ाने के नए तरीकों के बारे में जल्दी सोचना था क्योंकि अपनी टीम की जिम्मेदारी भी हमारी ही थी. इस दौर ने हमें यह समझने का मौका दिया कि हम अंदर से मजबूत हैं और चुनौतियों का सामना कर सकते हैं.’’

संघर्ष जैंडर नहीं देखता

गरिमा का कहती हैं, ‘‘पुरुष हो या महिला दोनों के लिए चुनौतियां अलगअलग होती हैं. महिलाओं के जीवन में संघर्ष थोड़ा ज्यादा होता है. उन्हें उन पाबंदियों से भी जूझना पड़ता है जो समाज ने उन के लिए बना दी हैं और जिन मदरहुड और कैरियर के बीच तालमेल बैठाने के लिए उन्हें आज भी कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं. महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए उन के आसपास के लोगों को उन की मदद करनी चाहिए.’’

गा की शुरुआत

हर शैफ का सपना होता है कि उस का अपना बेहतरीन रैस्टोरैंट हो. गरिमा का भी सपना था कि अपनी स्वाद की समझ को एक नई पहचान, एक नया नाम दें. इस तरह शुरू हुआ यानी गरिमा का रैस्टोरैंट.

गरिमा कहती हैं, ‘‘गा का खयाल मुझे अचानक उस समय आया जब मैं थाईलैंड में एक दिन वाक कर रही थी. मुझे थाईलैंड के जायकों में भारतीय खानपान की झलक दिखाई देती थी. फिर जब मुझे रैस्टोरैंट खोलने में मदद करने के लिए इनवैस्टर भी मिल गया तो फिर मैं ने अपने सपने को सच में बदलने का काम शुरू कर दिया.’’

फिटनेस का भी रखें ख्याल

गरिमा अपने पैशन को जीने के साथसाथ अपनी फिटनैस का भी ध्यान रखती हैं. हफ्ते में 5 दिन वर्कआउट करना गरिमा कभी मिस नहीं करतीं. वे हमेशा ऐसे खाने पर प्रयोग करती रहती हैं जो सेहत के लिए अच्छा हो.

गरिमा महिलाओं को संदेश देते हुए कहती हैं, सेहतमंद खानपान शरीर और दिमाग दोनों को मजबूत बनता है और जब ये दोनों मजबूत रहते हैं तो आप की प्रोडक्टिविटी भी बढ़ती है. इसलिए अच्छा बनाएं, अच्छा खाएं और हमेशा फिट रहें.

मास्टर शेफ की जज

गरिमा इन दिनों मास्टरशैफ शो के नए सीजन में बतौर जज नजर आ रही हैं. खास बात यह है कि इस शो के प्रतिभागियों को कुकिंग टिप्स देने के साथसाथ गरिमा उन का हौसला भी बढ़ाती हैं. शो की महिला प्रतिभागी गरिमा को अपना रोल मौडल मानती हैं. वे हमेशा प्रतिभागियों को प्रोत्साहित करते हुए कहती हैं, ‘‘हमारे देश के खाने में जितनी विविधता है उतनी किसी देश के खाने में नहीं. आप लोग इस विविधता को अपनी लगन से अंतर्राष्ट्रीय मंच पर जरूर ले जाएं.’’

मिडिल क्लास लड़की का भविष्य पहले से ही तय होता है- झूलन गोस्वामी, क्रिकेटर

झूलन गोस्वामी का जन्म 25 नवंबर, 1982 को पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के चकदाहा शहर में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था. उन के पिता का नाम निशित गोस्वामी और माता का नाम झरना गोस्वामी है. उन का एक भाई भी है जिस का नाम कुनाल गोस्वामी है. झूलन ने 15 साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू किया था. क्रिकेट में शुरुआत करने से पहले वह फुटबाल पसंद करती थीं और खेला करती थीं. झूलन को क्रिकेट में दिलचस्पी तब हुई जब उन्होंने 1992 का क्रिकेट विश्वकप टीवी पर देखा.

इस के बाद 1997 के महिला क्रिकेट विश्वकप का फाइनल मैच जोकि कोलकाता के ईडन गार्डन मैदान पर खेला गया था, उस में झूलन एक बालगर्ल का काम कर रही थी. मैच जीतने के बाद आस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों के विक्ट्री लैप को देखने के बाद उन्होंने इस खेल में और अधिक रुचि लेना शुरू किया और भारत के लिए विश्वकप जीतने का सपना देखने लगीं.

उस समय उन के गृहनगर चकदाहा में क्रिकेट खेलने की कोई सुविधा नहीं थी, इसलिए झूलन को लगभग 3 घंटे लोकल ट्रेन में यात्रा कर के कोलकाता आना पड़ता था. उन के कोच सपन साधु बहुत सख्त थे और समय पर मैदान में न पहुंचने पर वह खिलाड़ी को भगा देते थे. लेट आने पर खिलाड़ी को उस दिन की प्रैक्टिस मिस करनी पड़ती थी. सपन झूलन की लंबाई और कलाई के घुमाव से बहुत इम्प्रैस थे. उन्होंने ही झूलन को गेंदबाज बनने की सलाह दी और आज वे विश्व की प्रसिद्ध महिला गेंदबाज हैं.

आसान नहीं था सपना पूरा करना

चकदाहा ऐक्सप्रैस के लिए अपने सपनों को ट्रैक पर उतारना इतना आसान भी नहीं था. झूलन ने अपने सफर को याद करते हुए कहा भी था, ‘‘छोटे कस्बे के मिडिल क्लास परिवार की लड़की का सफर लगभग तय होता है. लेकिन मुझे अपने क्रिकेटर बनने के सपने को पूरा करना ही था. मेरी दादी ने मेरा साथ दिया तो मेरे अंदर हिम्मत आई.

चकदाहा में क्रिकेट की अच्छी सुविधा न होने के कारण मैं कोलकाता स्टेडियम में जाती थी. ट्रेन के सफर के साथ ताने भी सुनने को मिलते थे. फिर रिकशा से स्टेडियम पहुंचती थी. मुझे यह एहसास था कि मैं ने लड़की हो कर सपना देखा है और यदि इसे पूरा करने में नाकाम रही तो शायद फिर समाज की लड़कियों के लिए धारणा सही हो जाएगी कि लड़की को तो घर के काम ही करने चाहिए.’’

कामयाबी की छलांग

साल 2002 में जब झूलन ने चैन्नई में इंगलैंड के खिलाफ अपना पहला एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेला, उस समय उन की उम्र मात्र 19 वर्ष थी. उन्होंने 2007 में आईसीसी महिला खिलाड़ी का वर्ष का पुरस्कार जीता. 2008 में वह एशिया कप में एकदिवसीय मैचों में 100 विकेट तक पहुंचने वाली चौथी महिला खिलाड़ी बनीं और वर्ष 2011 में उन्होंने सर्वश्रेष्ठ महिला क्रिकेटर के लिए ‘एम.ए. चिदंबरम ट्रौफी’ जीती. झूलन को जनवरी 2016 में आईसीसी महिला ओडीआई गेंदबाजी रैंकिंग में पहले स्थान पर रखा गया था.

झूलन ने अपना अंतिम टी20 मैच 10 जून, 2018 बांग्लादेश के खिलाफ खेल था और इस के बाद अगस्त, 2018 में उन्होंने टी20 क्रिकेट से संन्यास की घोषणा कर दी. कुल मिला कर झूलन गोस्वामी ने 280 मैचों में 350 अंतर्राष्ट्रीय विकेट लिए हैं और 3 अर्धशतकों के साथ 1922 रन बनाए हैं.

अर्जुन पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित झूलन गोस्वामी को लीडिंग इंटरनैशनल विकेट टेकर का सम्मान भी हासिल है. आज वे भारतीय महिला क्रिकेट टीम के मुख्य कोच रमेश पोवार के तहत गेंदबाजी सलाहकार के रूप में नियुक्त हैं. झूलन के जीवन और उन की सफलता की कहानी से प्रेरित एक बायोपिक ‘चकदाहा एक्सप्रेस’ बनी है, जिस में अनुष्का शर्मा ने उन की भूमिका निभाई है. इस बायोपिक का निर्देशन सुशांत दास ने किया है. नैटफ्लिक्स पर यह फिल्म 10 मई 2023 को रिलीज होगी.

बेटियों को फाइनैंशियली इंडिपैंडैंट बनाना जरूरी- शिवजीत भारती, आईएएस

हरियाणा के पंचकूला जिले के एक छोटे से गांव जयसिंहपुरा की रहने वाली 29 वर्षीय शिवजीत भारती के पिता गुरनाम सैनी अखबार बेचने का काम करते हैं. एक दिन उन की खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्हीं समाचारपत्रों की सुर्खियों में उन की अपनी बेटी का नाम रोशन हो रहा था. गांव की इस बेटी का सलैक्शन पहले ही प्रयास में हरियाणा सिविल सर्विस में हुआ था. वर्तमान में वे चंडीगढ़ में डिप्टी सैक्रेटरी उप सचिव कोपरेशन डिपार्टमैंट सहकारिता विभाग में कार्यरत हैं.

शिवजीत की मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं. शिवजीत भारती ने पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से मैथ्स में ग्रैजुएशन और पोस्ट ग्रैजुएशन किया है. आर्थिक तंगी के कारण वे अच्छी कोचिंग प्राप्त नहीं कर पाईं थीं पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. किताबों, पत्रिकाओं, अखबारों और यूट्यूब वीडियोज का सहारा ले कर सफलता पाई. अतिरिक्त कमाई के लिए वे अपने घर पर ही छात्रों को ट्यूशन भी पढ़ाती थीं. 2 महीने पहले उन्होंने लव मैरिज की है. उन के पति भी सिविल सर्विसेज में हैं. पति मध्य प्रदेश के हैं, मगर अब हरियाणा सिविल सर्विस कंपीट कर के भारती के साथ चंडीगढ़ में ही हैं.

आर्थिक मजबूती जरूरी

यह पूछने पर कि वे किन समस्याओं पर सब से पहले ध्यान देना चाहती हैं? तो शिवजीत बताती हैं, ‘‘मैं हरियाणा में सैक्स रेश्यो के इम्प्रूवमेंट के लिए काम करना चाहेंगी जिस में हरियाणा काफी कमजोर है. दूसरी कोशिश ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ के लिए करना चाहेंगी. सोसाइटी में अपनी जगह बनाने के लिए महिलाओं और लड़कियों का आर्थिक रूप से इंडिपैंडैंट होना काफी जरूरी है.

ऐसी महिलाएं बच्चों को भी एक अलग प्रोस्पैक्टिव दे सकती हैं. महिला घर से भी काम कर सकती है. छोटे बिजनैस कर सकती है. इस से महिला का आत्मविश्वास बढ़ता है और परिवार को भी आर्थिक सहयोग मिलता है.’’अपने संघर्ष के बारे में बताते हुए शिवजीत कहती हैं, ‘‘मेरे पिता न्यूज पपेर बेचने का काम करते थे. मां आंगनबाड़ी में काम करती हैं. 1 बहन और 1 भाई और है. भाई स्पैशल चाइल्ड है. हम फाइनैंशियली स्ट्रौंग नहीं थे, मगर मेरे पेरैंट्स सपोर्टिव थे. जब मैं पढ़ाई के लिए दिल्ली गई तो सोसाइटी में सब बोलते थे कि बेटी को इतनी दूर भेज दिया. तब लोग मेरे पिता को समझते थे कि इस की शादी करा दो. मगर मेरे पेरैंट्स ने उन की बातों पर ध्यान नहीं दिया और तभी आज मैं इस मुकाम पर हूं.’’

आज भी महिलाओं के लिए समाज की स्टीरियोटाइप थिंकिंग से पार पाना कितना मुश्किल है? इस सवाल के जवाब में शिवजीत कहती हैं, ‘‘अगर फैमिली खासकर पेरैंट्स सपोर्टिव हैं, आप का हस्बैंड और बौस की सपोर्ट है और आप के अंदर आत्मविश्वास है तो आप हर बाधा पार कर सकती हैं. यही वजह है कि लाख बाधाओं के बावजूद महिलाओं ने खुद को हमेशा प्रूव किया है. महिलाओं में किसी भी परेशानी या दुख से उबरने और कठिनाइयों से लड़ने की क्षमता बहुत अधिक होती है.’’

मां से मिली प्रेरणा

शिवजीत भारती को हमेशा अपनी मां से प्रेरणा मिली है. वे बताती हैं, ‘‘मेरा भाई स्पैशल चाइल्ड है जबकि मां वर्किंग वूमन थीं. वे घर का काम भी करती थीं और जौब भी. मेरे भाई को भी संभालती थीं. यदि किसी के घर में स्पैशल चाइल्ड होता है तो इंसान और सबकुछ भूल जाता है. जौब भी भूल जाता है और दूसरे बच्चों को भी. मगर मेरी मां ने सबकुछ बहुत अच्छे से संभाला.

संदेश

महिलाओं को संदेश देते हुए भारती कहती हैं, ‘‘वे यह न सोचें कि बेटी हैं तो उन की ऐजुकेशन, जौब या ऐंपावरमैंट औप्शनल है. जितना यह सब बेटे के लिए जरूरी है उतना ही बेटी के लिए भी. फाइनैंशियल इंडिपैंडैंस औप्शनल नहीं है. महिलाएं जब पढ़ेंगी और अपने पैरों पर खड़ी होंगी तभी दुनिया बदलेगी, समाज में समानता आएगी.’’

महिला असफल हो जाए तो लोग उस की क्षमता पर सवाल उठाते हैं- विदिशा बथवाल

विदिशा एक बिजनैस फैमिली से आती हैं और उन्होंने बिजनैस की डिगरी भी हासिल की है. उन की शादी भी एक व्यावसायिक परिवार में ही हुई. यही वजह है कि उन के मन में भी अपना खुद का बिजनैस शुरू करने का जनून जगा.

उन्होंने 2011 में पैपरिका की शुरुआत की जिस का उद्देश्य कोलकाता के लोगों को रैस्टोरैंट स्टाइल फैसी कुक्ड मील्स मुहैया कराना था. एक दशक से भी अधिक समय से यह ब्रैंड कोलकाता का प्रीमियम और पसंदीदा गोरमे डैस्टिनेशन बना हुआ है.

विदिशा बताती हैं, ‘‘मैं हमेशा से एक ऐसा व्यवसाय करना चाहती थी जिसे अपना कह सकूं और जिस से मुझे पहचान मिले. मैं शुरू में लंदन में हेज फंड ऐनालिस्ट के रूप में काम कर रही थी. फिर वह नौकरी छोड़ दी और कोलकाता चली गई. वहीं इस बिजनैस का विचार दिमाग में आया.

कई पुरस्कार जीते

पैपरिका के साथ अपने एक दशक के लंबे सफर के दौरान विदिशा ने कई पुरस्कार भी जीते. मसलन, 2012 में गौरमे के क्षेत्र में ‘अपराजिता पुरस्कार,’ 2018 में ‘गो गेटर वाईएफएलओ कोलकाता गौरमंड’, 2018 में ‘जस्ट डायल पैपरिका टेक अवे’ और 2019 में फिक्की द्वारा संजीव कपूर कुकिंग कंपीटिशन में भी पुरस्कार हासिल किया.

क्या आज भी महिलाओं के लिए समाज की रूढि़वादी सोच से पार पाना मुश्किल है? इस सवाल के जवाब में विदिशा कहती हैं, ‘‘लड़कियों को इसी मानसिकता के साथ बड़ा किया जाता है कि युवा होते ही उन की शादी कर दी जाए और उन के बच्चे हो जाएं. फिर सारी जिंदगी घरपरिवार के कामों में उलझे रहें. अगर कोई महिला अपना बिजनैस शुरू करना चाहे तो उस का अपना ही परिवार, दोस्त, रिश्तेदार और समाज के लोग उसे पीछे खींचते हैं. कभीकभी जब एक महिला अपना बिजनैस शुरू करती है और कोई समस्या आती है तो उस की क्षमता पर सवाल उठता है. लोग कहने लगते हैं कि हमें पता था तुम से नहीं होगा.

शाम के बाद लड़की घर से नहीं निकलेगी भले ही उस का कैटरिंग इवेंट मैनेज करने के लिए शाम में जाना जरूरी हो. इस तरह उस के पैर बांधने की कोशिश की जाती है.’’

एक घटना ने बदली जिंदगी

जिंदगी की कोई घटना जिस ने आप के जीवन की दिशा बदल दी हो? इस सवाल के जवाब में विदिशा कहती हैं, ‘‘अपने कैरियर की शुरुआत में मैं ने कोलकाता में एक बौंबे कंपनी की फ्रैंचाइजी ली थी. हालांकि यह अच्छा नहीं चल रहा था और मुझे भारी मन से उस बिजनैस को बंद करना पड़ा. इस निर्णय ने मेरे विजन को और भी मजबूत बना दिया. मैं ने जो भी निवेश कर के बौंबे फ्रैंचाइजी शुरू की थी वह मैं नहीं चाहती थी कि यह बरबाद हो जाए. इसलिए मैं ने उसी से अपना कैटरिंग क्लाउड किचन शुरू किया और फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा.’’

इस फील्ड में कितना कंपीटिशन है? इस के जवाब में वे कहती हैं, ‘‘12 साल पहले जब मैं ने काम शुरू किया था तब से अब तक प्रतिस्पर्धा  काफी बढ़ गई है. बहुत सारे कम उम्र के लड़के हों या लड़कियां इस बिजनैस में आ रहे हैं.  वे प्रौपर ट्रेनिंग ले रहे हैं और प्रोफैशनल शेफ बन रहे हैं. इस से प्रतिस्पर्धा बढ़ती है क्योंकि वे बिजनैस के सभी गुर सीख रहे हैं और अपने स्वयं के कैफे, रेस्तरां खोल रहे हैं जो एक तरह से बहुत अच्छा है.’’

विदिशा कहती हैं, ‘‘हम ने दुबई, संयुक्त अरब अमीरात में इस नाम के साथ कैटरिंग शुरू की. दुबई ने हम पर ढेर सारा प्यार बरसाया और हमारे ब्रैंड का खुले हाथों से स्वागत किया. हम अपनी कैटरिंग पेरुवियन कोरियन और मैक्सिकन तक फैला रहे हैं. मैं रचनात्मकता और जनून में दृढ़ विश्वास रखती हूं और मैं इस बात पर जोर देती हूं कि व्यक्ति को हमेशा ऊंचा लक्ष्य रखना चाहिए. मेरा लक्ष्य भविष्य में रैस्टोरैंट खोलने का है.

पैसे की कमी के कारण कई बार हौकी छोड़ने का विचार आया- रानी रामपाल, हौकी खिलाड़ी

हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के शाहबाद में एक गरीब परिवार में 4 दिसंबर, 1994 को जन्मी रानी रामपाल के पिता परिवार का पेट पालने के लिए टांगा चलाते थे. दिन भर में बमुश्किल 100 रुपए उन की कमाई होती थी जिस में पत्नी, 3 बच्चे, अपना और घोड़े का खाना जुटाना मुश्किल होता था. रानी के दोनों बड़े भाइयों ने जब होश संभाला तो पिता का हाथ बंटाने के लिए एक भाई ने एक दुकान में सेलसमैन की नौकरी कर ली और दूसरा बढ़ई बन गया.

पिता की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण रानी का स्कूल में एडमिशन बड़ी मुश्किल से हुआ. रानी स्कूल के मैदान में दूसरे बच्चों को हौकी खेलते हुए देखती थी. उस समय उन की उम्र सिर्फ 6 साल थी. हौकी का खेल उन्हें आकर्षित करती थी.

कभीकभी वे दूसरे बच्चों से हौकी स्टिक ले कर खेलने लगती थीं. धीरेधीरे हौकी पर उन का हाथ जमने लगा. स्कूल के बच्चे अकसर उन को अपने साथ खिलाने लगे.

पैसे की समस्या

एक दिन रानी ने अपने पिता से हाकी खेलने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन पिता राजी नहीं हुए. उस समय लड़कियों का हाफ पैंट पहन कर हौकी खेलना बहुत बड़ी बात थी. जिस लोकैलिटी में उन का परिवार रहता था वहां बेटियों का हाफ पैंट पहनने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था.

रानी के बहुत जिद करने के बाद उन के पिता ने रानी का दाखिला शाहाबाद हौकी ऐकैडमी में करवा दिया. एडमिशन तो मिल गया, लेकिन मुश्किल यह थी कि रानी के पिता के पास इतने पैसे नहीं होते थे कि वे उन की कोचिंग की फीस चुका सकें. कई बार भाइयों ने कुछ पैसे जमा कर बहन को दिए तो कभी पिता ने उधार ले कर फीस चुकाई. रानी ने इस कारण कई बार हौकी छोड़ने के बारे में सोचा. लेकिन जब पैसे की समस्या की बात उन के कोच बलदेव सिंह और कुछ सीनियर खिलाडि़यों के सामने आई तो उन्होंने रानी को समझाया और उन की आर्थिक मदद की.

खेल के साथ पढ़ाई

खेल के साथसाथ रानी की पढ़ाई भी चलती रही. स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने बीए में एडमिशन ले लिया लिया लेकिन अभ्यास के कारण वे ग्रैजुएशन पूरा नहीं कर पाईं.

रानी रामपाल ने 212 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले और भारतीय महिला हौकी टीम की कप्तान बनीं. रानी ने जून, 2009 में रूस के कजान में आयोजित चैंपियंस चैलेंज टूरनामैंट में खेला और फाइनल में 4 गोल कर के भारत को जीत दिलाई. उन्हें ‘द टौप गोल स्कोरर’ और ‘यंग प्लेयर औफ द टूरनामैंट’ चुना गया. नवंबर, 2009 में आयोजित एशिया कप में भारतीय टीम के लिए रजत पदक जीतने में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.

2010 राष्ट्रमंडल खेलों और 2010 एशियाई खेलों में भारत की राष्ट्रीय टीम के साथ खेलने के बाद रानी रामपाल को 2010 की एफआईएच महिला औल स्टार टीम में नामांकित किया गया. वे ‘वर्ष की युवा महिला खिलाड़ी’ पुरस्कार के लिए नामांकित हुईं. उन्हें ग्वांगझोउ में 2010 एशियाई खेलों में उन के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें एशियाई हौकी महासंघ की औल स्टार टीम में भी शामिल किया गया था. 2010 में अर्जेंटीना के रोसारियो में आयोजित महिला हौकी विश्व कप में उन्होंने कुल 7 गोल किए, जिस ने भारत को विश्व महिला हौकी रैंकिंग में 9वें स्थान पर रखा.

लाजवाब प्रदर्शन

उन्हें 2013 जूनियर विश्व कप में ‘टूरनामैंट का खिलाड़ी’ चुना गया था. 2013 के जूनियर विश्व कप में उन्होंने भारत को पहला कांस्य पदक दिलाया. उन्हें 2014 के फिक्की कमबैक औफ द ईयर अवार्ड के लिए नामित किया गया. वे 2017 महिला एशियाई कप का हिस्सा रहीं और 2017 में जापान के काकामीगहारा में दूसरी बार खिताब भी जीता था.

रानी ने भारतीय खेल प्राधिकरण के साथ सहायक कोच के रूप में भी काम किया. राष्ट्रमंडल खेलों में रानी रामपाल का प्रदर्शन लाजवाब रहा है. 2020 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया.

टैनिस की वजह से ही कुश्ती से जुड़ पाई-विनेश फोगाट, रैसलर

2006 रियो ओलिंपिक. कुश्ती के मैट पर भारत की विनेश फोगाट और चीन की सुन यान आमनेसामने थीं. मुकाबला था क्वार्टर फाइनल और विनेश फंसी थीं सुन यान के एक दांव में. भारतीय पहलवान ने अपनी प्रतिद्वंद्वी की पकड़ से बाहर निकलने की कोशिश की और इस संघर्ष में उन का दाहिना घुटना चोटिल हो गया.

ये पल विनेश फोगाट के लिए सब से ज्यादा दर्दनाक पलों में से थे क्योंकि इस के बाद वे रियो ओलिंपिक में आगे नहीं बढ़ पाई थीं. तब फूटफूट कर रोती विनेश फोगाट ने कहा था, ‘‘मुझे अभी भी पता नहीं है कि क्या हुआ था. मैं बस उठ कर जारी रखना चाहती थी, लेकिन मेरे पैर काम नहीं कर रहे थे.

‘‘मैं चाह रही थी कि कोई मुझे दर्द दूर करने की दवा दे दे. मैं फिर से वहां जाना चाहती थी. मैं ने अभी हार नहीं मानी थी. मैं हार मानने वालों में से नहीं हूं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मैं सबकुछ देख सकती थी और वहां असहाय पड़ी हुई थी.’’

खेल के प्रति लगाव

विनेश फोगाट का वह आंखों में नमी वाला गमगीन चेहरा कोई भी कुश्ती प्रेमी नहीं भूल पाएगा और शायद वह चेहरा भी नहीं भूल पाएगा, जब इस साल के जनवरी महीने में विनेश फोगाट दिल्ली के जंतरमंतर पर अपने साथी पहलवानों के साथ एक अलग ही लड़ाई लड़ने के लिए बैठी थीं. तब उन की आंखों का सूनापन साफ बता रहा था कि सर्द सड़क पर हो रही यह हक की लड़ाई उस कुश्ती से कितनी ज्यादा मुश्किल है, जहां अपने जैसे खिलाडि़यों की आवाज को अपनों के सामने ही बुलंद करना है.

विनेश फोगाट उन्हीं महिला पहलवान बबीता और गीता फोगाट की चचेरी बहन हैं, जिन के जीवन पर आमिर खान ने फिल्म ‘दंगल’ बनाई थी. अपनी बहनों से प्रेरणा पा कर और ताऊजी महाबीर फोगाट से प्रशिक्षण ले कर विनेश फोगाट ने कुश्ती खेलना शुरू किया था. लेकिन यह सब उतना आसान नहीं था, जितनी आसानी से विनेश फोगाट सामने वाली पहलवान को चित कर देती हैं.

सब से हैरत की बात तो यह कि विनेश फोगाट का पहला प्रेम कुश्ती को ले कर नहीं था, बल्कि लौन टैनिस पर वे अपनी जान छिड़कती थीं. उन का कहना है, ‘‘बचपन से ही मुझे इस खेल के प्रति लगाव था. मैं टैनिस सितारों के पोस्टर जमा करती थी. सानिया मिर्जा की मैं बहुत बड़ी फैन हूं. उन का जब भी अखबार में फोटो आता था, तो मैं उसे काट कर अपनी बुक में लगा लेती थी. पता नहीं मैं कभी टैनिस खेल पाती या नहीं, पर शायद इसी वजह से मैं कुश्ती से जुड़ पाई हूं.’’

हरियाणा के चरखी दादरी जिले के गांव बलाली की रहने वाली विनेश फोगाट की मां प्रेमलता को 2003 में बच्चेदानी में कैंसर हो गया था. यह खबर परिवार को हिला देने वाली थी, पर तभी रोडवेज विभाग में चालक विनेश फोगाट के पिता राजपाल फोगाट की मौत हो गई. विनेश तो तब नादान थीं, पर कैंसर और पति की मौत ने प्रेमलता को बुरी तरह झकझोर दिया था.

विनेश फोगाट ने उन दिनों को याद करते हुए बताया, ‘‘मेरी मां बड़े जीवट वाली महिला हैं. उन्होंने हार नहीं मानी और अपने तीनों बच्चों का भविष्य संवारने के लिए कैंसर से जंग लड़ने की ठानी. उन्होंने औपरेशन करा कर बच्चेदानी को निकलवा दिया. उस समय मेरा भाई हरविंद्र 10वीं, बड़ी बहन प्रियंका 7वीं और मैं चौथी क्लास में पढ़ती थी.’’

दर्जनों मैडल नाम किए

विनेश फोगाट ने 13 दिसंबर, 2018 को अपनी शादी में 7 के बजाय 8 फेरे लिए थे. यह 8वां फेरा ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और बेटी खिलाओ’ संदेश को समर्पित था. उन के पति सोमवीर राठी भी पहलवान हैं, जिहोंने दहेज के नाम पर एक रुपया लिया था. कुश्ती के लिए 2020 में ‘मेजर ध्यानचंद खेल रत्न अवार्ड’ और 2016 में ‘अर्जुन अवार्ड’ जीतने वाली विनेश फोगाट ने एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को सोने के तमगे दिलाने के अलावा कई दूसरे इंटरनैशनल मुकाबलों में भी दर्जनों मैडल अपने नाम किए हैं और यह साबित किया है कि असली खिलाड़ी वही है, जो अपने संघर्षों से जूझ कर बड़ी वापसी करता है.

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