Single Woman: हिम्मत से लिखी खुद की दास्तां

जयपुर की अंजलि, अरुणा और मंजू हो या फिर बीते जमाने की सीता, कुंती, मरियम… पुराने जमाने से ले कर आधुनिक जमाने के इस लंबे सफर में अकेली औरत ने हमेशा संघर्ष, शक्ति और दमदख का ऐसा परिचय दिया है कि अकेले दम पर अगली जैनरेशन तक तैयार कर दी.

कवि रवींद्रनाथ टैगौर की रचना ‘एकला चालो रे…’ लगता है जैसे इन्हीं महिलाओं के साहस को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए लिखी गई हो. गीत की अगली पंक्तियों में है कि यदि आप की पुकार पर भी कोई नहीं आता है, तो आप अकेली ही चलें.

बहुत सी महिलाओं ने कभी भी नहीं चाहा था कि सिंगल पेरैंटिंग की जिम्मेदारी उन पर पड़े, लेकिन जब हालात ने उन्हें इस राह पर ला खड़ा किया तो उन्होंने पूरी हिम्मत और लगन से बच्चों की परिवरिश का जिम्मा उठाया बच्चों को एहसास कराए बिना कि उन्होंने जिस कश्ती को तैराया है, वह अनगिनत हिचकोलों से गुजरी है.

आत्मविश्वास है सब से बड़ी पूंजी

शादी के 11 साल में ही डिवोर्स का दंश झेल मंदबुद्धि एक युवती ने बच्चों के लिए काम करना शुरू किया. वह कहती है, ‘‘मैं आज में जीती हूं, हर दिन मेरे लिए नया होता है. अलग होने का फैसला काफी दर्दभरा था, लेकिन कई चीजें होती हैं जो ज्यादा लंबी नहीं चल सकतीं.’’

डिवोर्स के बाद उस ने ग्रैजुएशन किया. टीचिंग की, लौ किया. आत्मविश्वास में कभी कमी नहीं आने दी. दृढ़ रही और लोगों की बातों को कभी दिल से नहीं लगाया. अपने बच्चे के लिए किसी की यहां तक कि अपने पेरैंट्स तक की मदद नहीं ली और न उस के पिता से कोई लालनपालन का क्लेम लिया. उसे लगा कि  उस से बढ़ कर दूसरे लोग कहीं ज्यादा दुखी हैं. अपने लिए तो सभी जीते हैं, उस ने दूसरों के लिए जीना सीखा.

औरत को कभी अपनेआप को कमजोर नहीं समझना चाहिए. खुद में आत्मविश्वास है तो आगे बढ़ने से आप को कोई नहीं रोक सकता. किसी से कोई उम्मीद नहीं रखें क्योंकि जब उम्मीदें टूटती हैं तो दर्द ज्यादा होता है. जहां तक समाज के नजरिए की बात है, तो मुश्किल पलों में हमदर्दी दिखाने वाले खूब लोग होते हैं, लेकिन आप का संबल रीना दत्त, अमृता सिंह जैसे कई नाम हैं, जो मां के साहस और क्षमता के प्रतीक हैं.

ये भी पढे़ं- शिक्षा पर ठगी का धंधा

एकल अभिभावक की जिम्मेदारी

आमिर खान और सैफ अली जब अन्यत्र गए तो बच्चों की परवरिश का बीड़ा मां ने उठाया. आमिर ने जहां डेढ़ दशक से भी ज्यादा पुराना दांपत्य खत्म किया, वहीं सैफ  अली ने 1 दशक पुराने दांपत्य से किनारा कर लिया. रीना दत्त बेटे जुनैद और आयशा को ले कर ससम्मान अलग हो गई. उधर अमृता सिंह सारा और इब्राहिम को बड़ा करने में जुट गई.

रीना हो या अमृता, दोनों की ओर से कभी कोई बयानबाजी नहीं हुई, जबकि सक्रिय मीडिया हमेशा ऐसे बयानों की तलाश में फन फैलाए रखता है. ये औरतें काबिल ए तारीफ हैं क्योंकि ये झकी और गिड़गिड़ाई नहीं. सम्मान बरकरार रखते हुए बच्चों के लालनपालन में जुटी रहीं.

एक और अभिनेत्री है सुष्मिता सेन. बिटिया गोद ले कर उन्होंने एक नई परंपरा रची है. उन्होंने बता दिया कि स्त्री ममता से सराबोर है, इस के लिए उसे शादी का सार्टिफिकेट नहीं चाहिए.

जयपुर भी ऐसी अनेक महिलाओं का साक्षी है, जो अपने बूते पर एकल अभिभावक की जिम्मेदारी निबाह रही हैं. पुराने जमाने की पूरी दास्तां भी एक ही स्याही से लिखी हुई मालूम होती है.

सीता ने अंत तक अपना आत्मसम्मान व स्वाभिमान नहीं खोया हालांकि आज उन्हें राम की मात्र पत्नी के तौर पर जाना जाता है. वाल्मीकि रामायण को पढ़ने पर ही सीता का व्यक्तित्व सामने आ जाता है पर रामचरित्रमानस में तुलसीदास ने उन्हें वह स्थान नहीं दिया.

बूआओंमौसियों से अलग

‘‘मैं औरत के लिए बनाई गई सदियों पुरानी छवि में भरोसा नहीं करती. मैं आज की उस औरत की प्रतिनिधि हूं, जो अपने विकल्प खुद चुनती है, जो अपनी पसंद के रास्तों का चुनाव करने के लिए खुद को स्वतंत्र मानती है. अपनी तरह रह पाने की आजादी मुझे भाती है. मैं खुश हूं और यदि लोग इस बारे में अलग सोचते हैं, तो मुझे परवाह नहीं,’’ यह कहना है जयपुर में विज्ञापन एजेंसी में काम करने वाली एक कर्मठ प्रोडक्शन डिजाइनर का. 46 साल की इस महिला ने अविवाहित रहने का फैसला किया है.

ऐसा फैसला करने वालों का एक ऐसा जहान है, जहां अकेले रहने को एकाकी नहीं माना जाता. जहां के बाशिंदे समाज से कट कर, अपने अकेलेपन पर आंसू नहीं बहाते, बल्कि समाज से पूरा भावनात्मक, व्यावहारिक लगाव रखते हुए अपने चुने विकल्प का आनंद लेते हैं. ये सभी शिक्षित, समझदार और संवेदनशील भी हैं. बस, अकेले रहना चाहते हैं. ये पुराने जमाने की अविवाहित बूआओं, मौसियों से अलग हैं. इन के अकेले रहने के गहरे माने हैं.

इन के पास दोस्तों की एक पूरी ब्रिगेड है, रिश्ते भी हैं, लेकिन और लोगों से ये अलग हैं. इन के लिए जो बातें माने रखती हैं, मसलन- आत्मसम्मान, विश्वास और सृजनात्मकता, उन का इन के रिश्तों से कोई तअल्लुक  नहीं है.

ये भी पढ़ें- महिलाओं का शोषण

मुश्किलें तो हैं

एक सवाल अब भी वहीं है कि अकेले रहने वाले क्या पारिवारिक जिम्मेदारियों से बचने के लिए यह रास्ता चुनते हैं? लेकिन यह रास्ता चुनना आसान नहीं है. जो इसे चुनते हैं उन से पूछिए. महज जिम्मेदारियां ही नहीं, आमतौर पर अकेली महिलाओं को बिना सोचेसमझे पथभ्रष्ट, जिद्दी, रहस्यमयी जैसी उपाधियों से नवाज दिया जाता है. पुरुषों की दुनिया में अकेले रहती औरत के नैतिक व्यक्तित्व पर भी प्रश्नचिह्न लगाना सहज हो जाता है. इस से बड़ी अजीबोगरीब स्थितियां भी जन्म लेती हैं.

प्रियांशी जो 49 साल की एक सामाजिक सलाहकार हैं, का कहना है- अकेली युवती के लिए नए शहर में मकान की तलाश करना एक बड़ी मुश्किल होती है. उसे अपनी आयु से ले कर खानपान की आदतों, आय तथा मिलनेजुलने वालों तक का हिसाबकिताब देना पड़ता है, तब भी अविश्वास की तलवार तो लटकी ही रहती है. अकेली युवती के रहनसहन, उस के तौरतरीकों, मित्रों, यहां तक कि उस के विचारों तक पर उंगली उठाना हर इंसान अपना अधिकार समझता है. यह मान लेना तो सब से आसान है कि अकेली युवती अनुशासित जिंदगी तो क्या जीती होगी? सारा दिन बाहर घूमती होती, घर पर खाना थोड़े ही बनाती होगी वगैरहवगैरह. शादी जैसे पारिवारिक समागम में उसे बड़ीबूढि़यों द्वारा ‘बेचारी’ कह कर बुलाया जाता है. उसे अधूरा माना जाता है.

जयपुर की रहने वाली पल्लवी का कहना है, ‘‘मैं दूसरों से अलग रहने या कट जाने के लिए अकेली नहीं रहती. पर ऐसा होता है कि कई बार मैं अपने आसपास किसी को नहीं चाहती. शादीशुदा लोगों के जीवन में भी ऐसे लमहे तो आते ही होंगे.’’

42 साल की सिया पेशे से मुर्तीकार है और अकसर विदेशी दौरों पर रहती है. जब देश में होती है, तो फुरसत के लमहे मातापिता के साथ बिताती है. वह कहती है, ‘‘मुझे घूमने का शौक है. काम ने मुझे इस का मौका दिया है. किसी एक जगह पर रुक जाने वाली जिंदगी मैं जी ही नहीं सकती. महज रस्म के लिए शादी करने वाली बात कभी दिमाग में आई ही नहीं.’’

44 साल की सुषमा जोकि मार्केटिंग कंसल्टैंट है और अकेले रह कर खुश भी है, का मानना है, ‘‘शादीशुदा जिंदगी के सारे पहलुओं पर गौर करने के बाद मैं ने अकेले रहने का फैसला किया था क्योंकि मेरी अहमियतें कुछ और थीं. अपने कैरियर पर ध्यान देने का समय शायद नहीं मिल पाता. मैं उन औरतों के बिलकुल भी खिलाफ नहीं हूं जो एक सफल पत्नी व मां बनने की आकांक्षा रखती है.’’

‘‘ऐसा नहीं है कि आप दुनिया से कट जाते हैं और आप के पास कोई रिश्ता नहीं बचता निभाने के लिए. आप को मां बनने के लिए किसी पुरुष की मदद की भी जरूरत नहीं है,’’ यह कहना है 43 साल की अंजू का, जिस ने 8 माह पहले ही 2 साल की श्रेया को गोद लिया है. अंजू 2 लोगों के नए परिवार में काफी खुश है.

मानसिकता में बदलाव

लोगों की मानसिकता में बदलाव आ रहा है और इस का श्रेय जाता है- स्त्री शिक्षा और समाज में आज जो इन का जगह बनी है, उस को. आज कम से कम शहरी क्षेत्रों में स्त्री का अलग रहना उस की मजबूरी नहीं, बल्कि मरजी समझ जाने लगा है. अब लोगों को यह समझने में आसानी होती है कि  फलां लड़की ने शादी इसलिए नहीं कि होगी क्योंकि वह घर और दफ्तर साथ में नहीं संभाल सकती थी.

ये भी पढे़ं- जानें पहली Trans Queen India की ट्रासजेंडर नव्या सिंह के संघर्ष की कहानी

अकेले हम तो क्या गम

कोई अकेले अपनी जिंदगी बिता रही है, इस का एक कारण यह है कि वह अपनी पहचान नहीं खोना चाहती. अकेले जिंदगी का सफर तय करने वाली महिलाओं की बढ़ती संख्या का एक बड़ा कारण है उन्हें अपने मित्रों और परिवार वालों का भरपूर प्यार, सहयोग और सम्मान मिलना.

बहुतों ने तो सिंगल लाइफ के अलावा दूसरी लाइफ  के बारे में सोचा तक नहीं. उन्हें कभी

ऐसा महसूस भी नहीं हुआ कि वे अकेली हैं. उन के दोस्तों और परिवार वालों ने हमेशा उन्हें सपोर्ट किया और हर मौके को उन्होंने उन के साथ ऐंजौय किया.

अगर अकेली हैं तो गर्व से कहें ‘‘मैं अकेली हूं, इस का मुझे कोई दुखतकलीफ नहीं है. मैं मानती हूं कि शादी करना मेरी पहचान नहीं है. मैं इस से कहीं ज्यादा अपनी आजादी और रुचियों को अहमियत देती हूं.’’

शहरी आबोहवा और तेजी से आए लाइफस्टाइल में बदलाव ने भी सिंगल वूमन कंसैप्ट को आगे बढ़ाया है. आज लोगों के जीने का तरीका बदल गया है. आज अकेली रहने वाली महिला हो या पुरुष वास्तव में अकेले नहीं हैं. वे एकदूसरे के घर जाते, गपशप करते हैं. यही वजह है कि उन्हें शादी करने और गृहस्थी बसाने की जरूरत ही महसूस नहीं होती.

Women’s Day Special: ममता के रंग- प्राची ने कुणाल की अम्मा की कैसी छवि बनाई थी

‘‘दीदी, वे लोग आ गए,’’ कहते हुए पोंछे को वहीं फर्श पर फेंकते हुए कजरी जैसे ही बाहर की तरफ दौड़ी, प्राची का दिल जोर से धड़क उठा. सिर पर पल्ला रखते हुए उस ने एक बार अपनेआप को आईने में देख लिया. सच, एकदम आदर्श बहू लग रही थी.

मन में उठ रही ढेरों शंकाओं ने प्राची को परेशान कर दिया. जब नईनवेली दुलहन ससुराल आती है, तब सास उस की आरती उतारती है. लेकिन यहां पर किस्सा उलटा था, बहू के घर सास पहली बार आ रही थी.

अम्मा प्राची और कुणाल के विवाह के खिलाफ थीं, इसलिए दोनों ने कोर्टमैरिज कर ली थी. शादी को साल भर होने जा रहा था कि अम्मा ने सूचित किया कि  वे आ रही हैं.

कई बार प्राची ने सोचा था कि स्टेशन जाने से पहले वह कुणाल से विस्तार से बात करेगी कि अम्मा के आते ही उसे उन का सामना कैसे करना है? लेकिन अम्मा के आने की सूचना मिलते ही घर सजानेसंवारने की व्यस्तता और खुशी से रोमांचित प्राची तो जैसे सबकुछ भूल गई थी.

‘‘प्राची,’’ बाहर से कुणाल की पुकार सुनते ही उस का चेहरा लाल हो गया. अम्मा का स्वागत उन के चरणों को छू कर ही करेगी, यह सोचते हुए वह बाहर निकल आई.

ये भी पढ़ें- एहसास: कौनसी बात ने झकझोर दिया सविता का अस्तित्व

पर अम्मा को देखते ही जैसे पैरों में ब्रेक लग गए. उन का रूपरंग तो उस की कल्पना के उलट था. बौयकट बाल, होंठों पर गुलाबी लिपस्टिक और साड़ी के स्थान पर बगैर दुपट्टे का सूट देख कर वह स्तब्ध रह गई.

अम्मा की आधुनिक छवि को देख कर वह जैसे अपने ही स्थान पर जड़ हो गई थी. न आगे बढ़ कर चरणों को छू पाई, न ही हाथ जोड़ कर नमस्ते तक करने की औपचारिकता निभा पाई.

‘‘कुणाल, तुम्हारा चुनाव अच्छा है,’’ अम्मा ने अंगरेजी में कहा और प्राची के गालों को चूम लिया. पर प्राची का चेहरा शर्म से गुलनार न हो पाया.

कुणाल प्राची की उधेड़बुन से अनजान मां के कंधों को थामे लगातार बड़बड़ाता जा रहा था.

प्राची की आंखें यह सोच कर भर आईं कि मां की जो कमी उसे प्रकृति ने दी थी, वह कभी पूरी नहीं हो पाएगी. रसोई में अपने काम को अंतिम रूप देते हुए वह सोच रही थी, कितनी तारीफ करता था कुणाल अपनी अम्मा की, उन के ममत्व की. जो तसवीर कुणाल ने अपने कमरे में लगा रखी थी, उस में तो वास्तव में अम्मा आदर्श मां ही लग रही थीं. नाक में नथ, बड़ी सी बिंदी, कानों में झुमके, सीधे पल्ले की जरी वाली साड़ी, घने काले बाल…

प्राची के मन में अपनी मां की जो छवि रहरह कर उभरती, उस से कितनी मिलतीजुलती थी, कुणाल की अम्मा की तसवीर. इसीलिए तो अम्मा के प्रति प्राची बेहद भावुक थी.

जब भी कुणाल अम्मा की ममता का जिक्र करता, प्राची का ममता के लिए ललकता मन तड़प उठता. वह अम्मा को देखने और उन के प्यार को पाने की उम्मीद लगा बैठती.

अम्मा के ममत्व का जिक्र करते हुए कुणाल कहा करता था, ‘जब अम्मा थकीहारी रसोई का काम निबटा कर बैठती थीं, तब बजाय उन को आराम देने के, मैं उन की गोद में सिर रख कर लेट जाया करता था. जानती हो, तब वे अपने माथे का पसीना पोंछना भूल कर अपने हाथों को मेरे बालों पर फेरती रहतीं…सच…कितना सुख मिलता था तब. जब मुझे मैडिकल कालेज जाना पड़ा, तब उन की याद में नींद नहीं आती थी…’

‘अम्मा बहुत ममतामयी हैं न? उन्हें गुस्सा तो कभी नहीं आता होगा?’ प्राची पूछती.

‘नहीं, तुम गलत कह रही हो. अम्मा जितनी ममतामयी हैं, उतनी ही सख्त भी हैं. झूठ से तो उन्हें सख्त नफरत है. मुझे याद है, एक बार मैं स्कूल से एक बच्चे की पैंसिल उठा लाया था और अम्मा से झूठ कह दिया कि मेरे दोस्त ने मुझे पैंसिल तोहफे में दी है. जाने कैसे, अम्मा मेरा झूठ भांप गई थीं. अगले रोज वे मेरे साथ स्कूल आईं और मेरे दोस्त से पैंसिल के बारे में पूछा. उस के इनकार करने पर मुझे जो डांट पिलाई थी, वह मैं आज तक नहीं भूला,’ कुणाल ने कहा, ‘तब से ले कर आज तक मैं ने कभी अम्मा से झूठ नहीं बोला.

‘पिताजी के निधन के बाद अम्मा हमेशा इस बात से आशंकित रहती थीं कि मैं और मेरे भैया कहीं गलत राह पर न चले जाएं.’

प्राची हमेशा अपनी सास की तसवीर में उन के चेहरे को देखते हुए उन के व्यक्तित्व को आंकने का प्रयास करती रहती. अम्मा की तसवीर की तरफ देखते हुए कुणाल उस से कहता, ‘जानती हो, यह अम्मा की शादी की तसवीर है. इस के अलावा उन की और कोई तसवीर मेरे पास नहीं है.’

ये भी पढ़ें- Valentine Special: तुम्हारे ये घुंघराले बाल

‘कुणाल, मैं कई बार यह सोच कर खुद को अपराधी महसूस करती हूं कि मेरी वजह से तुम अम्मा से दूर हो गए, न तुम मुझ से विवाह करते, न अम्मा से जुदा होना पड़ता.’

‘प्राची, क्या पागलों जैसी बात कर रही हो. अम्मा को मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वे हम से ज्यादा दिनों तक अलग नहीं रह सकतीं. वे हमें जल्दी ही अपने पास बुलाएंगी.’

‘काश, वह दिन जल्दी आता,’ प्राची धीमे स्वर में कहती, ‘मैं ने अपनी मां को नहीं देखा है. मैं 6 माह की थी जब उन की मृत्यु हो गई. पिताजी ने मेरी देखरेख में कोई कमी नहीं की थी, लेकिन मां की ममता के लिए हमेशा मेरा मन ललकता रहता है. कल रागिनी आई थी. जब उसे पता चला कि मैं गर्भवती हूं तो मुझ से पूछने आ गई कि मेरी क्या खाने की इच्छा है? मेरा मन भर आया. रागिनी मेरी सहेली है, उस के पूछने में एक दर्द था. मेरी मां नहीं हैं न, इसीलिए शायद वह अपने स्नेह से उस कमी को थोड़ा कम करने का प्रयास कर रही थी,’ आंखों को पोंछते हुए प्राची बोली.

कुणाल ने उसे सीने से लगाते हुए कहा, ‘यह कभी मत कहना कि तुम्हारी मां नहीं, अम्मा तुम्हारी भी तो मां हैं?’

‘जरूर हैं, इसीलिए तो उन से मिलने को ललचाती रहती हूं. पर न जाने उन से कब मिलना हो पाएगा. और फिर यह भी तो नहीं पता कि मुझे माफ करना उन के लिए संभव होगा या नहीं.’

‘सबकुछ ठीक हो जाएगा,’ कहते हुए कुणाल ने प्राची के माथे पर हाथ फेरते हुए उसे यकीन दिलाने की कोशिश की.

प्राची की अम्मा के प्रति छटपटाहट और उन के स्नेह को पाने की ललक देख कर कुणाल का मन पीडि़त हुआ करता था. अम्मा चाहे कुणाल को पत्र लिखें या न लिखें. लेकिन कुणाल हर हफ्ते उन्हें पत्र जरूर लिखता.

प्राची कई बार कुणाल से जिद करती कि वह अम्मा से टैलीफोन कर बात करे, ताकि प्राची भी कम से कम उन की आवाज तो सुन सके. लेकिन जब भी कुणाल फोन करता, अम्मा रिसीवर रख देतीं.

कुणाल द्वारा पिछले हफ्ते लिखे गए खत में प्राची के गर्भवती होने की सूचना के साथसाथ उस की मां का प्यार पाने की इच्छा का कुछ ज्यादा ही बखान हो गया था, तभी तो अम्मा पसीज गई थीं और फोन पर सूचित किया था कि वे आ रही हैं.

प्राची अम्मा के आने की खबर सुन कर पूरी रात सो न पाई थी. उस ने कल्पना की थी कि अम्मा आते ही उसे सीने से लगा लेंगी, हालचाल पूछेंगी, लेकिन यहां तो सबकुछ उलटा नजर आ रहा था.

कुणाल और अम्मा की बातों का स्वर काफी तेज था. अम्मा शायद भैया के व्यापार के बारे में कुछ बता रही थीं और कुणाल अपने को अधिक बुद्धिजीवी साबित करने का प्रयास करते हुए उन की छोटीमोटी गलतियों का आभास कराता जा रहा था.

गर्भावस्था में भी अब तक प्राची को काम करने में कोई असुविधा नहीं हुई थी, लेकिन पूरी रात न सो पाने से वह असहज हो उठी थी. साथ ही, अम्मा को अपने खयालों के मुताबिक न पा कर उस में एक अजीब सा तनाव आ गया था. अचानक उसे कुणाल भी पराया सा लगने लगा था.

किसी तरह नाश्ता बना कर प्राची ने डाइनिंग टेबल पर लगा दिया और अम्मा व कुणाल को बुलाने कमरे में आ गई.

अम्मा पलंग पर बैठी थीं और कुणाल उन की गोद में सिर रख कर लेटा था. अम्मा की उंगलियां कुणाल के बालों में उलझी हुई थीं. प्राची ने देखा, अम्मा का एक भी बाल सफेद नहीं है. ‘शायद बालों को रंगती हों,’ प्राची ने सोचा और मन ही मन हंस दी, ‘युवा दिखने का शौक भी कितना अजीब होता है. बच्चे बड़े हो गए और मां का जवान दिखने का पागलपन.’

प्राची के मनोभावों से परे अम्मा और कुणाल अपनी ही बातचीत में खोए हुए थे. अम्मा कह रही थीं, ‘‘बेटा, तू अब वहीं आ जा, अपना अस्पताल खोल ले. अब दूरदूर नहीं रहा जाता.’’

‘‘अभी नहीं, अम्मा, मैं करीब 5 साल मैडिकल अस्पताल में ही प्रैक्टिस करना चाहता हूं. यहां रह कर तरहतरह के मरीजों से निबटना तो सीख लूं. जब भी अस्पताल खोलूंगा, वहीं खोलूंगा, तुम्हारे पास, यह तो तय है.’’

‘‘अम्मा, नाश्ता तैयार है,’’ दोनों के प्रेमालाप में विघ्न डालते हुए प्राची को बोलना पड़ा.

ये भी पढ़ें- Short Story: उन्होंने सच कहा था

‘‘अच्छा बेटी, चलो कुणाल, तुम दोनों से मिल कर मेरी तो भूख ही मर गई,’’ अम्मा ने उठते हुए कहा.

‘‘पर अम्मां, मेरी भूख तो दोगुनी हो गई,’’ कुणाल ने उन के हाथों को अपने हाथ में लेते हुए कहा.

‘‘पागल कहीं का, तू तो बिलकुल नहीं बदला,’’ अम्मा ने लाड़ जताते हुए कहा.

नाश्ते की मेज पर न तो अम्मा और न कुणाल को इतनी फुरसत थी कि नाश्ते की तारीफ में कुछ कहें, न ही यह याद रहा कि प्राची भी भूखी है. रात अम्मा से मिलने की उत्सुकता में उस की नींद और भूख, दोनों मर गई थीं.

पर अब प्राची भूख सहन नहीं कर पा रही थी. उसे लग रहा था, अम्मा उस से भी साथ खाने को कहेंगी या कम से कम कुणाल तो उस का खयाल रखेगा. पर सबकुछ आशा के उलट हो रहा था. अब तक प्राची के बगैर चाय तक न पीने वाला कुणाल बड़े मजे से कटलेट सौस में डुबो कर खाए जा रहा था. प्राची के मन में अकेलेपन का एहसास बढ़ता ही जा रहा था.

मां व बेटे के इस रूप को देख कर प्राची को भी संकोच को दरकिनार करना पड़ा और वह अपने लिए प्लेट ले कर नाश्ता करने के लिए बैठ गई. नाश्ता स्वादहीन लग रहा था, पर भूख को शांत करने के लिए वह बड़ी तेजी से 2-3 कटलेट निगल गई. फलस्वरूप, उसे उबकाई आने लगी. रातभर के जागरण और सुबह से हो रहे मानसिक तनाव से पीडि़त प्राची को कटलेट हजम नहीं हुए.

प्राची तेजी से उठ कर बाथरूम की ओर दौड़ पड़ी. भीतर जा कर जो कुछ खाया था, सब उगल दिया. माथे पर छलक आई पसीने की बूंदों को पोंछते हुए बाथरूम में खड़ी रही. ऐसा लग रहा था जैसे अभी गिर पड़ेगी. सिर भी चकराने लगा था. तभी 2 कोमल भुजाओं ने प्राची को संभाल लिया. ‘‘चल बेटी, तू आराम कर.’’ लेकिन प्राची वहां से हट न पाई. थोड़ी सी गंदगी बाथरूम के बाहर भी फैल गई थी. सो, यह बोली, ‘‘अम्मा, वह वहां भी थोड़ी सी गंदगी…’’

‘‘मैं साफ कर लूंगी, तू चल कर आराम कर,’’ अम्मा प्राची को सहारा दे कर उसे उस के कमरे तक ले आईं. फिर बिस्तर पर लिटा कर उस के चेहरे को तौलिए से पोंछ कर साफ किया.

कुणाल ने एक गिलास पानी से प्राची को एक गोली खिला दी. अब कुणाल के चेहरे पर परेशानी के भाव साफ नजर आ रहे थे. ‘‘ज्यादा भागदौड़ हो गई होगी न. अब तुम आराम करो.’’

‘कुणाल, मुझे उबकाई आ गई थी. बाथरूम के बाहर भी जरा सी गंदगी हो गई है. अम्मा साफ करेंगी तो अच्छा नहीं लगेगा. सास से कोई ऐसे काम नहीं करवाता.’’

‘‘पागल,’’ प्राची के गालों पर प्यार से चपत मारता हुआ कुणाल बोला, ‘‘वे तुम्हारी मां हैं मां. और उन्हें जो करना है, वह करेंगी ही. मेरे कहने से मानेंगी थोड़े ही.’’

‘‘फिर भी,’’ प्राची ने उठने का प्रयास करते हुए कहा.

‘‘तुम चुपचाप लेटी रहो और सोने का प्रयास करो,’’ कुणाल धीरेधीरे उस के माथे पर हाथ फेरता रहा. कब नींद आ गई, प्राची को पता ही न चला.

जब उस की आंख खुली तो अम्मा को अपने सिरहाने बैठा पाया. वे नेलपौलिश रिमूवर से अपने नाखून साफ कर रही थीं, प्राची ने उठने का प्रयास किया तो अम्मा ने रोक दिया, ‘‘न बेटी, तुम आराम करो. तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं. मैं आ गईर् हूं और सिर्फ तुम्हें आराम देने के लिए ही आई हूं.’’

‘‘अम्मा, मुझे अच्छा नहीं लग रहा, मैं आप की सेवा भी नहीं कर पा रही हूं.’’

‘‘नहीं बेटी, मैं अपने हिस्से का आराम करती रहूंगी, तुम चिंता मत करो. जब से योगाभ्यास करने लगी हूं, खुद को काफी स्वस्थ महसूस कर रही हूं. अपने योग शिक्षक से तुम्हारे करने योग्य योग भी सीख कर आई हूं, तुम्हें जरूर सिखाऊंगी, लेकिन पहले तुम्हारे डाक्टर से मिलना होगा. तुम मेरी और कुणाल की चिंता छोड़ दो. तुम्हारे प्रसव तक घर की देखभाल मैं करूंगी.’’

‘‘अम्मां, तब तक आप यहीं रहेंगी?’’

ये भी पढ़ें- औरत एक पहेली: कैसी थी संदीप और विनीता के बीच दोस्ती

‘‘हां,’’ उन्होंने मुसकराते हुए कहा.

प्राची एकटक अम्मा को ताकती रही, वे ममता की प्रतिमूर्ति लग रही थीं. वह सोचने लगी कि केवल वेशभूषा से किसी के दिल को भला कैसे आंका जा सकता है. अम्मा ने लिपस्टिक भी लगाई थी, चेहरे पर पाउडर और कटे बालों में हेयरबैंड भी. पर अब प्राची को सबकुछ अच्छा लग रहा था क्योंकि अम्मा के मेकअप वाले आवरण की ओट से झांकती उन की अंदरूनी खूबसूरती और ममत्व का रंग उसे अब स्पष्ट दिखाई देने लगा था.

कैरियर और बच्चे में किसी एक का चुनाव करना, मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ: पंकज भदौरिया मास्टर शैफ

2010 में मास्टर शैफ सीजन 1 की विनर रहीं पंकज भदौरिया आज किसी परिचय की मुहताज नहीं हैं. ‘शैफ पंकज का जायका,’ ‘किफायती किचन,’ ‘3 कोर्स विद पंकज,’ ‘रसोई से पंकज भदौरिया के साथ’ जैसे कई टीवी शोज ने उन्हें घरघर में पहचान दिलाई है. उन की 2 कुकबुक ‘बार्बी : आई एम शैफ’ और ‘चिकन फ्रौम माई किचन’ दुनियाभर में काफी मशहूर रही हैं. 2 बच्चों की मां पंकज स्कूल टीचर से कैसे बनीं मास्टर शैफ, किस तरह उन्होंने परिवार को संभालते हुए कैरियर में ऊंची उड़ान भरी, चलिए, जानते हैं:

कुकिंग में दिलचस्पी कब से हुई?

मेरे पेरैंट्स को कुकिंग का बहुत शौक था. वे बहुत अच्छे होम कुक थे. लोगों को पार्टी में बुलाना और उन्हें अपने हाथों से तरहतरह की रैसिपीज बना कर खिलाना उन्हें अच्छा लगता था. उस वक्त मुझे भी लगता था कि अच्छा खाना बनाने से न सिर्फ अच्छा खाना खाने को मिलता है, बल्कि कइयों की तारीफ भी मिलती है. इसीलिए मेरी रुचि भी कुकिंग में बढ़ने लगी. मैं 11 साल की उम्र से खाना बनाने लगी. मुझे शुरुआत से कुकिंग में ऐक्सपैरिमैंट करने का बहुत शौक था. इंटरनैशनल फूड जैसे चाइनीज, इटैलियन, थाई बनाना मुझे ज्यादा अच्छा लगता था. शादी के बाद पति भी खाने के शौकीन निकले, इसलिए कुकिंग और ऐक्सपैरिमैंट का सिलसिला जारी रहा.

ये भी पढ़ें- ‘‘कैरियर शुरू करने की कोई उम्र नहीं होती.’’ राजी गुप्ता शैफ

बहुत छोटी उम्र में पेरैंट्स को खो दिया. ऐसे में आप के लिए कैरियर की डगर कितनी मुश्किल रही?

जब मैं 13 साल की थी तब मेरे पिता की मौत हो गई. 21 साल की उम्र में मैं ने अपनी मां को भी खो दिया. मेरी मां अकसर कहती थीं कि शिक्षा एक ऐसा गहना है, जिसे आप से कोई नहीं छीन सकता, इसलिए हमेशा पढ़ाई जारी रखना. चूंकि मेरी मां कम पढ़ीलिखी थीं. इसलिए पिता की मौत के बाद उन्हें अच्छी जौब नहीं मिल पाई, इसलिए भी वे मुझे हमेशा पढ़ने को कहती थीं. मैं ने अंगरेजी में एमए किया और फिर स्कूल में पढ़ाने लगी. बाद में शादी हो गई. ससुराल वालों के साथ पार्टी में आने वाले भी मेरे खाने की बहुत तारीफ करने लगे, जिस से मुझे महसूस होता था कि शायद मैं कुछ खास बनाती हूं. उसी दौरान मैं ने टीवी पर मास्टर शैफ का विज्ञापन देखा. मैं ने टीचिंग छोड़ कर इस में भाग लिया और जीतने के बाद अपने पैशन को प्रोफैशन बना लिया. अपने सपनों को साकार करने के लिए मैं ने जो हिम्मत दिखाई उस ने मेरी जिंदगी को एक नई दिशा दी.

घर संभालते हुए कैरियर में आगे जाना मुमकिन हो पाया?

जब मैं घर में रहती हूं तब बस घर में रहती हूं और जब बाहर जाती हूं, तो पूरी तरह से बाहर रहती हूं. मैं बहुत जल्दी स्विच औफ और स्विच औन कर लेती हूं. घर में मैं होम मोड पर होती हूं, बिलकुल एक सामान्य घरेलू महिला की तरह. खुद खाना बनाती हूं, सफाई करती हूं आदि. खाने को ले कर अपने बच्चों की सारी फरमाइशों को भी पूरा करती हूं. मैं अपनी प्रोफैशनल लाइफ को घर के दरवाजे के बाहर छोड़ आती हूं और जब औफिस जाती हूं, तो घर को घर में छोड़ आती हूं. जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए हर महिला को मैनेजमैंट के गुण आने चाहिए. यदि वह ऐसा नहीं कर पाती तो उसे परिवार और अपने काम के साथ पूरा न्याय करने में मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है.

अपने दोनों बच्चों के साथ कैसा रिश्ता है?

19 साल की बेटी और 15 साल का बेटा दोनों मेरे सब से अच्छे फ्रैंड हैं. मेरे पेरैंट्स ने भी मुझे ऐसे ही बड़ा किया है. मेरी मां और मेरे पिता दोनों ही मेरे अच्छे फ्रैंड रहे हैं. हम बच्चों को अच्छा इनसान बनाने में यकीन रखते हैं. हम उन्हें मैंटली और फिजिकली तौर पर फिट रखते हैं. हम चारों मिल कर एकसाथ खेलतेकूदते भी हैं. हर तरह की मूवी देखते हैं, हर मुद्दे पर बात करते हैं. आजकल की पेरैंटिंग की डिमांड भी यही है कि मां-बाप अपने बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार बना कर रखें ताकि वे अपनी किसी बात को आप के साथ शेयर करने से हिचकिचाएं नहीं.

ये भी पढ़ें- ‘कैरियर एक समान नहीं रहता, एक्सपैरिमैंट करती रहें’- सुचि मुखर्जी

मां बनने के बाद कैरियर को छोड़ने वाली महिलाओं को क्या सलाह देंगी?

औरत की जिंदगी में ऐसा पड़ाव आता है, जब उसे कैरियर और बच्चे के बीच किसी एक का चुनाव करना पड़ता है. शुक्र है मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ, लेकिन जिन महिलाओं को बच्चों की परवरिश के लिए ऐसा फैसला लेना पड़ा है, मेरे अनुसार वे मिड ऐज में दोबारा काम शुरू कर सकती हैं किसी भी रूप में जैसे पार्टटाइम, वर्क फ्रौम होम आदि.

Edited by Rosy

मैं झूठ नहीं बोलती: ममता को सच बोलना क्यों पड़ा भारी?

‘‘निधि रुक जा, कहां भागी जा रही है? बस निकल जाएगी, ममता ने गेट की ओर तेजी से जाती हुई निधि को पुकारा, पर निधि तो अपनी ही धुन में थी. उस ने ममता को वहीं रुकने का इशारा किया और गेट से बाहर निकल गई. तब तक बस आ गई और सभी छात्राएं उस में बैठने लगीं. ममता जानती थी कि यदि वह निधि के पीछे गई तो उस की बस भी निकल जाएगी. अत: वह बस में जा कर बैठ गई.

तभी निधि दौड़ती हुई बस की ओर आई और बोली, ‘‘ममता, मां पूछें तो कह देना कि मेरी ऐक्सट्रा क्लास है.’’

‘‘मैं क्यों झूठ बोलूं, दादीमां कहती हैं कि सब बुराइयां झूठ से ही शुरू होती हैं,’’ ममता ने चिढ़ कर उत्तर दिया.

‘‘सतयुग में एक राजा हरिश्चंद्र थे और कलियुग में तू, तेरे जो मन में आए कह देना. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ निधि झुंझलाते हुए बोली और देखते ही देखते आंखों से ओझल हो गई. ममता उसे पुकारती ही रह गई, लेकिन उस ने पीछे मुड़ कर देखा भी नहीं. उधर बस में बैठी छात्राएं निधि और ममता की बातचीत के मजे ले कर खूब हंस रही थीं.

‘‘अब तो निधि ने भी आज्ञा दे दी है. आज ही जा कर निधि की मम्मी को सब सच बता देना. समझा देना कि आजकल उन की बेटी कक्षा में कम और कैंटीन में आशीष के साथ अधिक नजर आती है. तू ने इतना सा साहस दिखा दिया तो उस के घर वाले तुझे उपहारों से लाद देंगे,’’ रचना बोली तो बस में फिर से ठहाके गूंज उठे.

‘‘क्या हो रहा है ये सब? रचना, मैं ने तुम से सलाह मांगी है क्या?’’ ममता गुस्से से बोली.

हंसहंस कर दोहरी हो रही रचना पर ममता इतनी जोर से चीखी कि हवा जैसे थम सी गई.

‘‘तुम जानो और तुम्हारी सहेली. हमें क्या पड़ी है दूसरों के झमेलों में पड़ने की,’’ रचना ने बड़ी अदा से मुंह बनाया व अपनी अन्य सहेलियों के साथ गपें हांकने लग गई. अन्य छात्राएं भी शीघ्र ही निधि प्रकरण को भूल गईं और ममता ने चैन की सांस ली. पर असली समस्या तो अभी भी मुंहबाए खड़ी थी. सत्या आंटी ने अगर पूछ लिया कि उन की बेटी निधि कहां है तो वह क्या उत्तर देगी. न वह झूठ बोल सकती है और न ही सच. निधि उस की सब से प्यारी सहेली है. उस के राज को राज रखना उस का कर्तव्य भी तो बनता है.

निधि की मां, सत्या आंटी अपने गेट के पास निधि की प्रतीक्षा में खड़ी रहती थीं. आज उन्हें वहां खड़ा न देख कर ममता ने चैन की सांस ली और लपक कर अपने घर में घुस गई.

‘‘क्या हुआ, इस तरह दौड़ कर क्यों घर में घुस गई? मैं बाहर दरवाजे पर खड़ी तेरी प्रतीक्षा कर रही थी, मुझे देखा तक नहीं तू ने,’’ उस की मां निशा अचरज से बोलीं.

‘‘बात ही कुछ ऐसी है मां, मुझे लगा कहीं सत्या आंटी सामने मिल गईं तो मैं क्या करूंगी,’’ ममता ने अपनी मां को अपना स्वर नीचे रखने का इशारा किया.

‘‘क्यों, ऐसा क्या किया है तुम ने, जो सत्या से डर रही हो,’’ मां चकित स्वर में बोलीं.

‘‘मैं ने कुछ नहीं किया है मां पर निधि…’’

‘‘क्या हुआ निधि को?’’

ये भी पढ़ें- उत्तरजीवी: क्यों रह गई थी फूलवती की जिंदगी में कड़वाहट?

‘‘कुछ नहीं हुआ उसे, पर आप ने क्या देखा नहीं कि निधि मेरे साथ बस से नहीं उतरी?’’

‘‘अरे, हां, कहां गई वह? घर क्यों नहीं आई?’’

‘‘यही तो मुश्किल है मां, वह अपने मित्र के साथ घूमने गई है. मुझ से कहा कि अगर उस की मम्मी पूछें तो कह दूं कि उस की आज ऐक्स्ट्रा क्लास है.’’

‘‘पर गई कहां है वह?’’

‘‘उस का एक मित्र है, आशीष, आजकल उसी के साथ घूमती रहती है. कई बार तो कक्षा छोड़ कर भी चली जाती है.’’

‘‘आशीष? यह तो लड़के का नाम है.’’

‘‘वह लड़का ही है मां, आप भी न बस…’’

‘‘पर तुम्हारा स्कूल तो केवल लड़कियों के लिए है. वहां यह आशीष कहां से आ गया?’’

‘‘स्कूल तो लड़कियों के लिए है पर स्कूल के बाहर तो लड़के भी होते हैं, मां. हमारे स्कूल के आसपास तो लड़के कुछ अधिक ही मंडराते रहते हैं.’’

‘‘हो क्या गया है निधि को. 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली इतनी सी लड़की को डर नहीं लगता क्या? किसी के भी साथ चल पड़ती है.’’

‘‘निधि बहुत निडर और स्मार्ट है, मां. मेरी तरह डरपोक नहीं है.’’

‘‘क्या मतलब, तुम डरपोक नहीं होती तो किसी के साथ भी घूमने चल पड़ती,’’ मां तीखे स्वर में बोलीं.

‘‘मैं ने ऐसा कब कहा मां. आप हर बात का गलत अर्थ क्यों निकालती हो. कुछ खाने को दो न, बहुत भूख लगी है.’’

‘‘ड्रैस बदल कर और हाथमुंह धो कर आओ, तब तक खाना लगाती हूं,’’ मां रसोई में जातेजाते बोलीं.

‘‘पर मन में ममता की बातें गूंजती रहीं. किसी अनहोनी की आशंका से मन कांप उठा. खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है. कहीं निधि को देख कर ममता भी उसी राह पर चल पड़ी तो क्या करूंगी,’’ सोचतेसोचते निशा अपनी बेटी से बोली, ‘‘देख ममता, निधि तेरी मित्र है इसीलिए कह रही हूं, उस की मम्मी को सबकुछ सचसच बता दे नहीं तो बहुत बुरा मानेंगी वे.’’

‘‘और अगर सच बता दिया तो निधि मुझे कच्चा चबा जाएगी. वह मेरी सब से अच्छी मित्र है, मुझ पर विश्वास कर के ही वह अपने राज मुझे बताती है. 2 सहेलियों के बीच विश्वास ही नहीं रहा तो बचेगा क्या,’’ ममता कुछ ऐसे अंदाज में बोली कि मां अपनी हंसी नहीं रोक पाईं.

‘‘मांबेटी के बीच क्या गंभीर वार्त्तालाप चल रहा है हम भी तो सुनें,’’ तभी ममता की दादी ने कमरे में प्रवेश किया.

‘‘कुछ नहीं मांजी, यों ही स्कूल की बातें कर रही थी. कह रही थी कि दादी कहती हैं कि झूठ बोलने से बड़ा पाप और कोई नहीं है,’’ मां फिर हंस दीं.

‘‘अरे, वाह, मेरी गुडि़या तो बहुत सयानी हो गई है. जीवन में पढ़तेलिखते तो सब हैं पर गुनते बहुत कम लोग हैं और ममता गुनने वालों में से है. देख लेना यह एक दिन अवश्य तुम दोनों का नाम रोशन करेगी.’’

‘‘क्या नाम रोशन करेगी मांजी. आजकल नाम सच बोलने से नहीं पढ़नेलिखने से होता है. ममता को तो आप जानती ही हैं कि कभी 50% से अधिक अंक नहीं आए इस के.’’

‘‘अभी तो मुझे यह बताओ कि यह क्या बात थी जिस के लिए ममता झूठ बोलने से कतरा रही थी.’’

‘‘कुछ नहीं, पड़ोस में इस की सहेली निधि रहती है. एक लड़के से दोस्ती है उस की. स्कूल के बाद उस से मिलतीजुलती है, घूमने जाती है और ममता से कहती है कि उस की मम्मी पूछें तो कह देना कि स्कूल में ऐक्स्ट्रा क्लास है.’’

‘‘यह तो बहुत गलत बात है. सच बोलने के लिए बड़े साहस की आवश्यकता होती है. सत्य बोलना कायरों का काम नहीं है. तुम्हें अपनी सहेली के लिए झूठ बोलने की जरूरत नहीं है.’’

‘‘वही तो रोना है मांजी, दोस्ती में न कुछ कहते बनता है न छिपाते. फिर ममता अपनी सहेली को खोना भी नहीं चाहती. पता नहीं किस ने उसे बता दिया है कि अपनी सहेली के राज को राज ही रखना चाहिए,’’ मां ने झिझकते हुए बताया.

‘‘अब जमाना बहुत बदल गया है. अब केवल सच बोलने से काम नहीं चलता. आज की दुनिया में बड़ा जोड़तोड़ करना पड़ता है.’’

‘‘कहना क्या चाहती हो तुम.’’

‘‘मेरा मतलब बस इतना है कि हमें दूसरों के झमेलों में पड़ने की क्या जरूरत है. मैं नहीं चाहती कि इन सब बातों का असर ममता की पढ़ाई पर पड़े.’’

‘‘सच नहीं बोलेगी तो उस पर असर पड़ेगा. हर बार अपनी सहेली के बारे में ही सोचती रहेगी ममता. तुम बच्चों के मनोविज्ञान को नहीं समझती हो,’’ दादीमां भी अपनी बात पर अड़ गईं.

‘‘आप दोनों शांत हो जाइए. मैं वादा करती हूं कि मैं किसी को भी शिकायत का अवसर नहीं दूंगी,’’ ममता नाराज हो कर अपने कमरे में चली गई.

थोड़ी ही देर में बात आईगई हो गई. ममता ही नहीं उस की मां और दादी भी सारे प्रकरण को भूल चुकी थीं, अचानक रात के 10 बजे घंटी बजी.

ममता की मां ने जैसे ही दरवाजा खोला तो सामने निधि की मां सत्या खड़ी थीं.

‘‘जी, कहिए,’’ न चाहते हुए भी वह अचकचा गईं.

‘‘ममता कहां है, कृपया उसे बुलाइए,’’ निधि की मम्मी बोलीं.

सत्या आंटी की आवाज सुन कर ममता स्वयं ही चली आई.

‘‘ममता, निधि कहां है अब तक घर नहीं आई.’’

‘‘क्या अब तक नहीं आई,’’ मां और ममता एकसाथ बोलीं.

‘‘कुछ कह कर गई थी क्या?’’

‘‘ऐक्स्ट्रा क्लास थी ऐसा कुछ कह कर तो गई थी पर अब तक उस का कोई अतापता नहीं है, इसी से चिंता हो रही है. तुम कितने बजे घर पहुंची,’’ उन्होंने ममता से पूछा.

ये  भी पढ़ें- Short Story: ओए पुत्तर- सरदारजी की जिंदगी में किस चीज की थी कमी?

‘‘मैं तो स्कूल बस से ही आ गई थी. आज कोई ऐक्स्ट्रा क्लास नहीं थी,’’ डरतेडरते बोली.

‘‘तुम्हारी नहीं रही होगी. निधि कह रही थी कि यह क्लास केवल 90त्न से अधिक वाली छात्राओं के लिए है जिन की 10वीं में मैरिट लिस्ट में आने की आशा है,’’ सत्या तनिक गर्व से बोलीं.

‘‘कोई फोन आदि,’’ ममता की मां ने दोबारा पूछा.

‘‘यही तो रोना है. स्कूल वाले फोन ले जाने की अनुमति कहां देते हैं. फिर भी निधि छिपा कर ले जाती थी, पर आज भूल गई, पता नहीं कहां होगी मेरी बच्ची?’’ सत्या रो पड़ी.

‘‘धीरज रखिए, मिल जाएगी,’’ ममता की मां ने उन्हें ढाढ़स बंधाना चाहा.

‘‘क्या धीरज रखूं? मैं ने सोचा था कि शायद ममता को कुछ पता हो पर यहां भी निराशा ही हाथ लगी.’’

‘‘आंटी, मुझे पता है. आज कोई ऐक्स्ट्रा क्लास नहीं थी. निधि तो आशीष के साथ डिस्को गई थी. वह नवीन जूनियर कालेज का विद्यार्थी है, निधि उस से अकसर मिलती है.’’

‘‘क्या, इतना घटिया आरोप मेरी बेटी पर? मैं ने तो सोचा था कि तुम निधि की मित्र हो. पर अब समझ में आया कि तुम मन ही मन उस से जलती हो.’’

‘‘नहीं यह सच नहीं है. मैं भला निधि से क्यों जलने लगी.’’

‘‘मां, जल्दी घर चलो. दीदी के स्कूल की प्राचार्या का फोन आया है. वह किसी के साथ मोटरसाइकिल पर जा रही थी कि दुर्घटनाग्रस्त हो गई. वह निर्मल अस्पताल में भरती है,’’ तभी निधि के भाई ने सारी बात बताई और सत्या के साथ ममता के मातापिता भी अस्पताल के लिए रवाना हो गए. रह गई थीं केवल ममता और उस की दादी दमयंती.

ममता फूटफूट कर रो रही थी और दादी उसे समझा रही थीं कि सच बोलने वालों को तो इस तरह की हर बात के लिए तैयार रहना चाहिए. पर ममता के पल्ले उन की बात पड़ी या नहीं.

इज्जत बनाने में क्या बुराई है

ऑफिस के गेट पर सफेद रंग की कैब रुकी और उस में से क्रीम कलर की खूबसूरत ड्रेस और हाई हील्स पहने प्राप्ति उतरी तो आसपास खड़े लोगों की निगाहें बरबस ही उस की तरफ खिंच गई. ऑफिस के दरबान ने भी बड़ी इज्जत से उसे सलाम ठोका. अपने स्टाइलिश बैग को कंधे से लटकाए  हुए प्राप्ति अदा से मुस्कुराई और अंदर चली आई.

शाहदरा में रहने वाली प्राप्ति का ऑफिस झंडेवालान में है. वह पुलबंगश तक मेट्रो से आती है और फिर वहां से कैब कर लेती है. लौटते समय भी वह पुलबंगश तक कैब से जा कर फिर मेट्रो लेती है. इतनी कम दूरी के लिए कैब में मुश्किल से 50 से 70 तक का किराया लगता है. मगर ऑफिस वालों को लगता है कि देखो लड़की कैब में आनाजाना करती है यानी काफी पैसे वाली है. बहुत अच्छे घर की है.

एक तरह से देखा जाए तो प्राप्ति  ने  इस तरह ऑफिस में अपनी छद्म इज्जत कायम की है और इस के लिए उस ने और भी कई तरीके अपनाए हैं मसलन;

घर में भले ही वह  पूरा दिन फटी जींस और पतली सी टीशर्ट पहन कर गुजार देती हो, मगर जब ऑफिस के लिए निकलती है तो हमेशा लेटेस्ट स्टाइल के ब्रांडेड कपड़े पहनती है.

ये भी पढ़ें- कब आती है दोस्ती में दरार

उस के टिफिन में हमेशा पनीर, मशरूम जैसी महंगी सब्जियां और चिकन वगैरह होता है. घर में भले ही सूखी रोटियां खाती हो, मगर टिफिन में हमेशा परांठे होते हैं.

उस के पेन से ले कर पर्स, मोबाइल और मोबाइल कवर तक सभी लेटेस्ट ब्रांड और स्टाइल के होते हैं. घर में भले ही वह फटी चप्पल में सारा दिन निकाल दे मगर ऑफिस या बाहर आनेजाने के लिए उस ने 2 -3 हाई हील्स और स्टाइलिश सैंडल्स रखे हुए हैं.

वह फोन या दूसरों से आमने सामने होने पर हमेशा हाईफाई लाइफस्टाइल की बातें करती है. घर में भले ही कभी भी उस ने बाई नहीं रखी मगर सहेलियों से हमेशा अपनी कामवालियों के नखरों और उन के  प्रति अपनी दिलदारी की बातें करती है.

हमेशा अपने बड़े से घर का बखान करती रहती है जब कि उस के पास छोटेछोटे दो कमरों का फ्लैट है.

वह हमेशा दूसरों के आगे अपनी प्रॉपर्टीज और हाईफाई लाइफ़स्टाइल का जिक्र करती रहती है. उस ने अपने ऑफिस कुलीग्स और अपनी सहेलियों को बताया हुआ है कि उस के घर में एक बड़ा सा स्वीमिंग पूल और जिम भी है. जहाँ वह रोज स्वीमिंग और वर्कआउट का अभ्यास करती है जब कि सच्चाई यह है कि उस के पास पर्सनल स्वीमिंग पूल या जिम नहीं है. वह कॉमन जिम और स्वीमिंग पूल का इस्तेमाल करती है.

वह दूसरों के आगे कभी भी फलसब्जियां या कपड़े खरीदते वक्त कीमत को ले कर चिकचिक नहीं करती. घर में भले ही वह आसपास के सब्जीवालों के बीच पैसों के मामले में खडूस के रूप में बदनाम है.

उस ने अपने रिश्तेदारों के बारे में ऑफिस कूलीग्स से बढ़चढ़ कर बताया हुआ है. अक्सर वह उन के आगे जताती रहती है कि उस के रिश्तेदार बहुत पढ़ेलिखे और ऊँचे ओहदों पर आसीन है

इन बातों का नतीजा यह निकला कि ऑफिस में लोग उस की इज्जत करते हैं. उस से अच्छे संबंध बनाए रखने का प्रयास करते हैं. पूरे ऑफिस में उस की अलग धाक बन चुकी है और वह सब की चहेती है.

प्राप्ति ने जिस तरह से अपनी इज्जत बनाई है उस में कोई बुराई नहीं है. सुनने में भले ही कुछ अजीब लगे  मगर हम सब कहीं न कहीं अपनी छद्म इज्जत बनाते फिरते हैं. भले ही सोशल मीडिया हो, फैमिली गेदरिंग हो, ऑफिस इवेंट हो या फिर सोसायटी फंक्शन.

हर कोई दूसरों के आगे अपनी बेहतर छवि दिखाने का प्रयास करता है. तस्वीरें खिंचवाते समय हम कितने ही टेंशन में क्यों न हो पर हमेशा अपनी मुस्कुराती हुई तस्वीर ही खिंचवाते हैं. कोशिश करते हैं कि हमारी  बाहर निकली हुई बेडौल टमी किसी भी तरह छुप जाए. हमारी जुल्फें ज्यादा बाउंसी दिखे. चेहरे की रंगत बेहतर बनाने के लिए फिल्टर्स  का सहारा लेते हैं. अच्छे से अच्छे कपड़ों में तस्वीरें खिंचवाकर उसे फेसबुक, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम पर डालते हैं.

ये भी पढ़ें- तलाक के बाद करने जा रही हैं डेटिंग तो काम आ सकते हैं ये 25 टिप्स

सोशल मीडिया पर हम वैसी ही चीज़ें डालते हैं जिस से लोग हम से  प्रभावित और आकर्षित हों. हमारे अधिक से अधिक दोस्त बनें. यही वजह है कि  हम अपनी सफलता, खूबसूरती और सम्पन्नता का प्रचार करते नहीं थकते. इन सभी प्रयासों के पीछे एकमात्र जो चाह होती है  वह है दूसरों  की नजरों में ऊँचा उठने की ख्वाहिश.

अपनी चीजें बढ़ाचढ़ा कर दिखाने की आदत हमें बचपन से ही लग चुकी होती है और इस में कुछ गलत भी नहीं. दूसरों के आगे अपनी कमियां दिखा कर रोने से कोई नतीजा नहीं निकलता. उल्टे लोग आप से कतराने लगते हैं. तो फिर क्यों न खुद को बेहतर दिखा कर अपने अंदर का आत्मविश्वास बढ़ाएं और चेहरे पर खुशनुमा रौनक जगाएं. दोस्तों की फेहरिस्त बढ़ाएं और जी भर कर जीएं.

सेक्स में पति की जबरदस्ती

श्वेता खाना खाकर सोने चली गयी थी. उसका पति प्रदीप अभी घर नहीं लौटा था. पहले श्वेता रात के खाने पर पति का देर तक इंतजार करती थी. कुछ दिनों के बाद प्रदीप ने कहा कि अगर वह 10 बजे तक घर न आये तो खाने पर उसका इंतजार न करे. इसके बाद देर होने पर श्वेता खाना खाकर लेट जाती थी. इसके बाद भी उसको नंीद नहीं आ रही थी. वह अपने संबंधें के बारे में सोच रही थी. उसको लग रहा था जैसे वह पति की जबरदस्ती का शिकार हो रही है. प्रदीप ज्यादातर देर रात से घर लौटता था. इसके बाद कभी सेा जाता था तो कभी श्वेता को शारीरिक संबंध् बनाने के लिये मजबूर करने लगता था. नींद के आगोश में पहुच चुकी श्वेता को इस तरह संबंध बनाना अच्छा नहीं लगता था. कभी तो श्वेता को लगता जैसे पति प्यार न करके बलात्कार कर रहा हो.

मैं एक लड़के से प्यार करती हूं. वह भी मुझे बेहद चाहता है, लेकिन…

श्वेता अपने को यह सोचकर समझाती कि पति की शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिये ही शायद शादी होती है. इसलिये उसको पति की जरूरतों को पूरा करना चाहिये. इस जोर जबरदस्ती में श्वेता को 4 साल के विवाहित जीवन में एक दो बार ही ऐसा लगा था कि प्रदीप प्यार के साथ भी संबंध् बना सकता था . ज्यादातर बार श्वेता जोरजबरदस्ती का ही शिकार बनी थी. इसका प्रभाव श्वेता के उफपर कुछ इस तरह पडा कि वह शारीरिक संबंधें से चिढने सी लगी. श्वेता और प्रदीप को एक बेटा था. श्वेता जब कभी अपनी सहेली से बात करती तो उसको पता चलता कि उनका पतिपत्नी का रिश्ता ज्यादा मजे में चल रहा है. श्वेता ने अपनी परेशानी सहेली शालिनी को बतायी . वह श्वेता को लेकर सेक्स कांउसलर के पास गयी.

सेक्स को लेकर बातचीत में रूखापन

कांउसलर ने बातचीत करके यह जानने की कोशिश की कि श्वेता की परेशानी क्या है ? श्वेता ने काउंसलर को बताया कि पति प्रदीप उस समय सेक्स संबंध् बनाने की कोशिश करता है जब उसका मन नहीं होता है. कई बार जब वह इसके लिये मना करती है तो जोरजबरदस्ती पर उतर आता है. इससे श्वेता को सेक्स संबंधे से ही मन हट गया है. काउसंलर रेखा पाण्डेय ने श्वेता को सलाह देते हुये कहा कि इस बारे में पति से आराम से बात करे. यह बातचीत सेक्स संबंधे के समय न करके बाद में की जाये. इसके लिये प्यार से पति को मनाने की कोशिश की जाये. अगर पति कभी नशे की हालत में इस तरह के सेक्स संबंध् बनाने का काम करते हो तो उनका नशा उतरने के बाद ही बात करे.

जब बिगड़ने लगे बच्चे का व्यवहार

नशे की हालत में लोगो को बात समझ में नहीं आती उल्टे कभी कभी लडाई झगडे से मामला बिगड जरूर जाता है. पति हर समय गलत होता है यह भी नहीं मान लेना चाहिये. सेक्स पति कर जरूरत होती है. उसको इसके लिये टालना सही नहीं होता है. हो सकता है कि कभी आपका मन न हो इसके बाद भी आपको सकारात्मक रूख रखना चाहिये. सेक्स पति और पत्नी दोनो की जरूरत होती है. इसलिये इससे जुडी किसी भी परेशानी को हल करने के लिये आप दोनो को मिलकर ही सोंचना चाहिये. जब आप खुलकर एक दूसरे से बात करेगें तो तमाम सारी गलतपफहमियां अपने से दूर हो जायेगी. ज्यादातर पति पत्नी के साथ सेक्स को लेकर बातचीत कम करते है. जबरन सेक्स के चक्कर में रहते है. इस वजह से पति पत्नी के बीच दूरियां भी बढती है और पत्नी सैक्स को इन्जाव भी नहीं कर पाती है.

कम नहीं होती पत्नियों में बहानेबाजी

सेक्स दाम्पत्य जीवन की सबसे अहम चीज होती है. यह बात पति पत्नी दोनो को पता होती है. सवाल उठता है कि सेक्स संबंध् के लिये जबरदस्ती क्यो करनी पडती है. कभी पति पत्नी दोनो को कुछ ऐसी बीमारियां लग जाती है जिससे सेक्स संबंधें से मन उचट जाता है. ऐसे में बहुत ही ध्ैर्य और समझदारी की जरूरत होती है. सबसे पहले अपनी साथी की जरूरत को समझने की कोशिश करे. अगर कोई शारीरिक परेशानी है तो उसका इलाज किसी योेग्य डाक्टर से कराये. सेक्स की ज्यादातर बीमारियों की वजह मानसिक ही होती है. इसके लिये आपस में बात करे अगर बात न बने तो मनोचिकित्सक से भी बातचीत कर सकती है.

तांत्रिक बाबा से यूं बढ़ीं नजदीकियां और फिर…

सेक्स के प्रति पत्नी की निगेटिव सोंच ही पति को कभी कभी जबरदस्ती करने के लिये मजबूर करती है. कुछ पत्नियां सेक्स को गंदा काम मानकर उससे संकोच करती है. अगर आप भी इसी तरह के विचार रखती है तो सही नहीं है. आपके इस तरह के विचार पति को जबरदस्ती करने के लिये उकसाते है. पति की जबरदस्ती से बचने के लिये इस तरह की निगेटिव मानसिकता से बचना चाहिये. इस मानसिकता के चलते न आप कभी खुश रह सकती है और न पति को खुश रख पायेगी. ऐसा करके आप कभी सेक्स का आनंद न ले पायेगी और न कभी आप अपने पति को ही यह सुख दे पायेगी.  जबरदस्ती से बचने के लिये सेक्स के प्रति अपनी सोंच को सकरात्मक बनाये.

बहाने बनाने से बचे

आमतौर पर पतियों को यह शिकायत होती है कि पत्नी बहाने बनाती है जिसके चलते जबरदस्ती करनी पडती है. इन शिकायतों में सबसे बडी शिकायत बच्चों के बडे होने , मूड ठीक न होने और घर में एकांत की कमी होना होता है. रमेश का कहना है कि मै जब भी अपनी पत्नी के साथ सेक्स करने की पहल करता था वह बच्चो और परिवार का बहाना कर टाल जाती थी. इसका मैने हल यह निकाला सप्ताह में एक बार पत्नी को लेकर आउफटिंग पर जाने लगा. इसके बाद पत्नी से हमारे संबंध् सही रूप से चलने लगे. अब पत्नी को यह अच्छा लगने लगा है. उसके साथ हमारे संबंध् सहज हो गये.

तलाक के बाद करने जा रही हैं डेटिंग तो काम आ सकते हैं ये 25 टिप्स

पत्नी के बहाना बनाने का असर यह होता है कि जब कभी पत्नी को हकीकत में कोई परेशानी होगी तब भी पति को लगेगा कि वह बहाना ही बता रही है. मूड न होने पर भी साथी को सहयोग देने की कोशिश करे इससे उसकी जबरदस्ती से बच सकती है. पति का समीप आना पत्नी की अंदर की भावनाओं को जगा देता है. इससे पत्नी भी उत्तजित हो जाती है. पति जबरदस्ती करने से बच जाता है. आपको मूड न हो तो उसको बनाया जा सकता है. आपको पति को बताना पडेगा कि मूड बनाने के लिये वह क्या करे.

समझदारी से सुखद संबंध

साथ रहते रहते पति पत्नी को एक दूसरे के बारे में बहुत सारी बातों का पता चल जाता है. शालिनी का कहना है कि जब उसके पति नहाने के बाद अच्छा सा परपयूम लगाकर सोने के लिये आते है तो उसको पता चल जाता है कि आज की रात वह कुछ चाहते है. रेखा कहती है कि उसके पति कोई न कोई बहाना बनाकर अपनी बात कह देते है. काउंसलर रेखा पांडेय कहती है कि इस तरह के लोगो के साथ समाजस्य बठाना आसान होता है. मुश्किल में वह लोग पत्नी को डालते है जो बिना किसी तैयारी के सेक्स संबंध् बनाने की कोशिश उस समय करते है जब पत्नी इसके लिये तैयार नहीं होती है. सुमन की कहानी से यह बात समझ में आ जाती है. सुमन का पति जब तक वह जागती थी अपना काम करता रहता था . जब वह सो जाती थी तब वह जबरदस्ती करने लगता था. ऐसे मामलो में पति को समझाकर ही काम चलाया जा सकता है.  पति पत्नी में ऐसे हालत से बचना चाहिये कि जबरन संबंध् बनाये जाये. अगर कभी पति जबरदस्ती करे तो आपको उन्दी से सहयोग देकर जबरदस्ती से बचना चाहिये. पति जबरदस्ती करे और आपने भी उसको उसी तरह से जवाब दिया तो संबंधे में दरार पड सकती है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें