Serial Story: तुम से मिल कर

 

 

 

Serial Story: तुम से मिल कर (भाग-1)

हर्ष बहुत प्यार से त्रिशा के बालों में उंगलियां फेर रहा था और वह उस की गोद में लेटी आंखें बंद किए मंदमंद मुसकरा रही थी.

पार्क के उस कोने वाली बैंच पर दोनों दिनदुनिया से बेखबर अपनेआप में ही मगन थे.

“हर्ष, आगे का क्या सोचा है?” आंखें बंद किए ही उस के हाथों को चूमते हुए आतुरता से त्रिशा बोली,“ अगर तुम्हें स्कौलरशिप मिल जाती है, तो तुम तो विदेश चले जाओगे. लेकिन कभी सोचा है कि यहां अकेली मैं क्या करूंगी तुम्हारे बिना?”

“यह तो मैं ने सोचा ही नहीं,” गंभीरता से हर्ष बोला, “एक काम करना, तुम शादी कर लेना. लाइफ में व्यस्त हो जाओगी. जब तक मैं आऊंगा, 1-2 बच्चों की मां तो बन ही चुकी होगी. क्या कहती हो?”

किसी तरह अपनी हंसी को रोकते हुए हर्ष बोला,“ मैं तुम्हारे बच्चों के लिए विदेशी खिलौने ले कर आऊंगा देखना.“

उस की बातें सुन त्रिशा झटके से उठ बैठी और बोली, “तो तुम यही चाहते हो की मैं किसी और से शादी कर लूं? तो ठीक है. रिश्ते तो आ ही रहे हैं कई, उन में से 1 को मैं हां बोल देती हूं,“ बोल कर गुस्से से वह जाने ही लगी कि हर्ष ने उस का हाथ पकड़ लिया.

”वह तो ठीक है लेकिन यह तो बताती जाओ कि तुम मुझे अपनी शादी में बुलाओगी या नहीं? चलो कोई बात नहीं, शादी की बधाइयां मैं तुम्हें अभी ही दे देता हूं, किसी तरह अपनी हंसी रोकते हुए हर्ष बोला.

ये भी पढ़ें- होटल ऐवरेस्ट: विजय से दूर क्यों चली गई काम्या?

“थैंक यू सो मच…” त्रिशा ने मुंह बनाया, “अब छोड़ो मेरा हाथ और अपनी बकवास बंद करो.”

“अरे, ऐसे कैसे छोड़ दूं? जीवनभर साथ निभाने का वादा किया है,” हर्ष की बांहों ने उसे घेरा तो वह रुक गई. उस का चेहरा हर्ष से इंच भर की दूरी पर ही था. फिर हर्ष के होंठों ने उस के होंठों को छुआ, तो त्रिशा की नजरें अपनेआप ही शर्म के मारे झुक गई.

हर्ष ने त्रिशा का चेहरा ऊपर उठाते हुए कहा, “बेकार में समुंद्र मथा गया क्योंकि 14 रत्न तो तुम्हारी आंखों में हैं. एक और सच कहूं, गुस्से में तुम और भी हसीन लगती हो.“

“अच्छा, तो वैसे मैं बदसूरत दिखती हूं, यही कहना चाहते हो न तुम ?” अपनेआप को हर्ष की बांहों से छुड़ाते हुए त्रिशा बोली,“कितनी बार कहा है कि ऐसी बातें मत किया करो. मुझे नहीं पसंद, फिर भी क्यों करते हो ऐसी बातें?”

“अच्छा बाबा सौरी,अब से नहीं करूंगा ऐसीवैसी बातें,” कह कर हर्ष अपना कान पकड़ कर उठकबैठक करने लगा.

“अच्छाअच्छा बस करो अब. बहुत हो चुकी नौटंकी. पहले तो गुस्सा दिलाते हो और फिर यह सब…” मुसकराते हुए त्रिशा बोली, “मैं तुम्हें अपने मम्मीडैडी से मिलवाना चाहती हूं. वे तुम से मिल कर बहुत खुश होंगे. आखिर वह भी तो देखें मैं ने उन के लिए कितना हैंडसम और समझदार दामाद पसंद किया है,” त्रिशा की बात पर हर्ष भले ही मुसकरा पड़ा. लेकिन उसे उस के मम्मीडैडी से मिलने में बहुत संकोच महसूस हो रहा था कि जाने वे उस से मिल कर कैसे रिऐक्ट करेंगे क्योंकि कहां वे लोग और कहां हर्ष का परिवार. जमीनआसमान का फर्क था दोनों में.

लेकिन त्रिशा के सामने वह यह बात बोल भी तो नहीं सकता था, वरना वह फिर से गुस्सा हो जाती.

एक बार ऐसे ही हर्ष ने बोल दिया था कि क्या उस के मम्मीडैडी उन के रिश्ते को स्वीकारेंगे? तो गुस्से में नाक फुलाती हुई त्रिशा बोली थी, “क्यों नहीं स्वीकारेंगे? एक इंसान में जो चीजें होनी चाहिए, जैसे 2 आंखें, 2 कान, 1 नाक, हाथपैर, दिमाग सबकुछ तो है तुम्हारे पास. स्मार्ट भी बहुत हो और सब से बड़ी बात कि उन की इकलौती बेटी तुम्हें पसंद करती है, तो फिर क्यों नहीं स्वीकारेंगे तुम्हें बोलो? मेरे मम्मीडैडी मेरे लिए कुछ भी कर सकते हैं,” सीना तानते हुए त्रिशा बोली थी.

“तुम कहां इतने बड़े मांबाप की इकलौती बेटी हो. तुम्हें ऐशोआराम में जीने की आदत है और मैं ठहरा एक साधारण परिवार का लड़का. तो क्या तुम्हारे मम्मीडैडी मुझ जैसे लड़के…” बोलतेबोलते हर्ष चुप हो गया था लेकिन त्रिशा सारी बात समझ गई कि वह कहना क्या चाहता है.

“अच्छा, तो तुम यह कहना चाहते हो कि मैं एक पैसे वाले बाप की बेटी हूं और तुम एक साधारण परिवार से, तो हमारा मिलन कैसे हो सकता है? लेकिन जब हम एकदूसरे से मिले थे, जब हमें एकदूसरे से प्यार हुआ था, तब क्या तुम्हें या मुझे पता था कि तुम गरीब हो और मैं अमीर? नहीं न, फिर? हम एकदूसरे से प्यार करते हैं और यही सब से बड़ी सचाई है हर्ष. हमारे बीच न तो कभी पैसा आएगा, न धर्म और न ही जातपात की दीवारें खड़ी होंगी, वादा करती हूं तुम से,” बड़ी दृढ़ता से बोल कर त्रिशा ने हर्ष को चूम लिया था.

त्रिशा का चुंबन हर्ष के होंठों के साथसाथ उस के मन के भीतर किसी गहराई तक गतिशील हुआ था. दोनों घंटों एकदूसरे में खोए रहे थे.

“कहां खो गए हर्ष,” त्रिशा ने जब उसे झंझकोरा तो वह अतीत से वर्तमान में पहुंच गया.

ये भी पढ़ें- किरचें: पिता की मौत के बाद सुमन ने अपनी मां के मोबाइल में ऐसा क्या देखा?

“मैं कल तुम्हें लेने आऊंगी तैयार रहना, और हां, वह लाइट ग्रीन वाली शर्ट पहनना, जो मैं ने तुम्हारे जन्मदिन पर गिफ्ट किया था. उस में तुम बहुत अच्छे लगते हो,“ त्रिशा बहुत खुश थी कि पहली बार वह अपने मम्मीडैडी से हर्ष को मिलवाने जा रही है और उसे पूरा विश्वास था कि हर्ष उन्हें जरूर पसंद आएगा. खासकर त्रिशा के डैडी अशोक तो उस से मिल कर बहुत खुश होंगे, क्योंकि उन का विचार हर्ष से काफी मिलताजुलता है.

दोनों जिंदादिल इंसान हैं, एकजैसे ही. हां, त्रिशा की मम्मी थोड़ी अलग टाइप की इंसान हैं, पर वे भी हर्ष को देख कर ना नहीं कह पाएंगी.

हर्ष और त्रिशा की मुलाकात न तो किसी कालेज में हुई थी और न ही किसी दोस्त की पार्टी में, बल्कि दोनों संयोग से मिले थे.

कुछ महीने पहले, एक रोज अचानक त्रिशा की गाड़ी बीच सड़क पर खराब हो गई थी. आसपास कोई मैकेनिक भी नजर नहीं आ रहा था जिस से वह अपनी गाड़ी ठीक करवा सके.

यह सोच कर ही वह परेशान हो रही थी कि ऐसी सुनसान जगह पर कुछ देर और रुकना पड़ा तो खतरा हो सकता है क्योंकि आजकल जिस तरह से लड़कियों के साथ वारदातें हो रही हैं, सुन कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

वह मम्मीडैडी को फोन लगा रही थी ताकि वे आ कर उसे ले जाएं. मगर नेटवर्क क्षेत्र से बाहर होने के कारण उस का फोन भी नहीं लग रहा था.

“अब मैं क्या करूं, किसी का फोन भी नहीं लग रहा है,” अपनेआप में ही बुदबुदाते हुए त्रिशा इधरउधर देखे जा रही थी कि शायद कोई उस की मदद के लिए आ जाए. मगर कोई भी ऐसा इंसान नहीं दिख रहा था जिसे वह मदद के लिए पुकारे.

नीले रंग की ड्रैस और बालों को इकठ्ठा कर बनाई गई एक हाई पोनीटेल वाली लड़की को सड़क के किनारे खड़े देख हर्ष को समझते देर नहीं लगी कि वह कोई मुसीबत में है.

“कोई समस्या है क्या? अचानक पीछे से किसी की आवाज सुन त्रिशा चौंक कर मुड़ी. लेकिन सामने जब हट्ठेकट्ठे नौजवान को देखा, तो वह बुरी तरह से डर गई।

“लगता है आप की गाड़ी खराब हो गई है. मैं कुछ मदद करूं?” बाइक को साइड में रोकते हुए हर्ष ने पूछा, तो डर के मारे त्रिशा की रूह कांप उठी कि जाने यह लड़का उस के साथ क्या करेगा?

‘इस सुनसान जगह में अकेली लड़की जान कर कहीं यह मेरा रेप कर के मुझे मार तो नहीं डालेगा? कुछ महीने पहले ऐसे ही तो मदद के नाम पर कुछ लड़कों ने एक लड़की का रेप कर उसे जला कर मार डाला था, तो कहीं मेरे साथ भी ऐसा कुछ हो गया तो मैं क्या करूंगी?’

“हैलो मैडम, कहां खो गईं आप?” हर्ष ने त्रिशा के चेहरे के सामने हवा में हाथ लहराते हुए पूछा, “कोई मदद चाहिए या मैं निकलूं?”

“नहींनहीं, कोई मदद नहीं चाहिए, तुम जाओ,” घबराते हुए वह फिर से अपने घर वालों को फोन लगाने लगी कि शायद कोई फोन उठा ले और उसे लेने आ जाए. लेकिन फोन लगे तब न. त्रिशा को अकेले लौंग ड्राइव पर जाना बहुत पसंद था.

आगे पढ़ें- शहरों की भीड़भाड़ से दूर जंगलों…

ये भी पढ़ें- मैं चुप रहूंगी: विजय की असलियत जब उसकी पत्नी की सहेली को चली पता

Serial Story: तुम से मिल कर (भाग-2)

अकसर वह गाड़ी ले कर कहीं दूर, बहुत दूर निकल पड़ती थी. शहरों की भीड़भाड़ से दूर जंगलों से गुजरते हुए खेतखलियान, गांव, कसबा देखना उसे बहुत पसंद था. कितनी बार उस के डैड ने समझाया उसे कि इतनी दूर, वह भी अकेले जाना ठीक नहीं. गाड़ी खराब हो जाए या कोई और समस्या आन पड़े, तो क्या करेगी वह? अगर जाना ही है तो किसी को साथ ले कर जाया करे. मगर त्रिशा का कहना था कि अकेले घूमने में जो मजा है वह औरों के साथ कहां? अपनी मरजी से चाहे जहां घूमो, बिंदास.

“डोंट वरी डैड, कुछ नहीं होगा आप की बेटी को,” बोल कर वह अपने डैडी को चुप करा दिया करती थी. लेकिन आज उसे समझ आ रहा था कि उस के डैडी कितने सही थे. कोई साथ होता, तो कम से कम एक बल तो मिलता.

‘काश, वह अपने डैडी की बात मान ली होती,’ मन ही मन वह पछता ही रही थी कि तभी एक बड़ी सी गाङी उस के पास से हो कर गुजरी. उस ने मदद के लिए हाथ हिलाया, पर गाड़ी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ गई.

लेकिन उस ने देखा वह गाड़ी उस के पास ही आ रही थी. अपने सीने पर हाथ रख त्रिशा ने राहत की सांस ली थी. गाड़ी ठीक उस के साम ने आ कर रुकी तो वह बोली,“भाई साहब, मेरी गाड़ी खराब हो गई है. मदद चाहिए, प्लीज.“

त्रिशा को डर भी लग रहा था. पर पूरी रात वह यहीं तो नहीं गुजर सकती न?

ये भी पढ़ें- त्रिशंकु: नवीन का फूहड़पन और रुचि का सलीकापन

गाड़ी में बैठे दोनों लड़कों ने पहले तो उसे ऊपर से नीचे तक घूर कर देखा, फिर आंखों ही आंखों में दोनों ने कुछ बातें की. फिर बोला,“आप की गाड़ी खराब हो गई? लेकिन यहां तो कोई मैकेनिक नहीं मिलेगा. इस के लिए तो आप को शहर जाना पड़ेगा. वैसे, जाना कहां है आप को?” उन लड़कों ने बड़ी शराफत से पूछा.

“जी…जी, आदर्श नगर, ग्रीन पार्क,” घबराहट के मारे त्रिशा के मुंह से ठीक से आवाज भी नहीं निकल रही थी.
“ओह… ग्रीन पार्क। हम भी तो उधर ही जा रहे हैं. अगर आप चाहें तो हम आप को आप के घर छोड़ सकते हैं. और कोई दिक्कत नहीं है, फोन कर देंगी तो मैकेनिक आप की गाड़ी ठीक कर के आप के घर पहुंचा देगा,” उन लड़कों ने कहा तो 1 मिनट के लिए त्रिशा ठिठक गई क्योंकि किसी पर भी इतनी जल्दी विश्वास करना सही नहीं है. लेकिन चेहरे से वे लड़के शरीफ लग रहे थे.

‘अगर मैं इन के साथ नहीं गई, तो क्या पता फिर कोई मदद करने वाला मिले न मिले? अंधेरा भी गहराने लगा है, यह जगह भी बहुत सुनसान लग रहा है, इसलिए इन के साथ चले जाना ही उचित रहेगा’ अपने मन में ही सोच त्रिशा उन की गाड़ी में बैठने ही लगी कि एक ने उस का हाथ जोर से खींचा और दूसरा अभी दरवाजा लगाता ही कि त्रिशा,” छोड़ो मुझे, नहीं जाना तुम्हारे साथ,” बोल कर चिल्लाने लगी.

मगर दोनों लड़के उसे जबरदस्ती पकड़ कर कर गाड़ी में बैठाने लगे और एक ने डपटते हुए बोला,“चुप रहो, नहीं तो यहीं मार कर फेंक देंगे किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा,” उस की बात सुन त्रिशा सहम उठी.

दोनों जिस तरह से त्रिशा को घूर रहे थे इस से उन की बदनीयती साफसाफ झलक रही थी.

वह समझ गई कि आज वह नहीं बच सकती इन के हाथों, क्योंकि इस वीरान और सुनसान इलाके में कोई उसे कोई बचाने नहीं आने वाला. शहरों में तो आधी रात तक लोगों की चहलपहल बनी रहती है. मगर गांवों में तो सांझसवेरे ही लोग घरों में सिमट जाते हैं.

आज त्रिशा को अपनी मौत बड़ी निकट से दिखाई दे रही थी. उसे जीवन में आज पहली बार अपनी लड़की होने पर दुख हो रहा था. अफसोस उसे इस बात का भी हो रहा था कि कैसे वह इन हैवानों को पहचान नहीं पाई? कैसे उस ने इन पर भरोसा कर लिया? रोना आ रहा था उसे पर उस के आंखों से आंसू नहीं निकल रहे थे. बोलना चाह रही थी वह पर डर के मारे मुंह नहीं खुल रहे थे.

सोच लिया उस ने जो होना है हो कर रहेगा, अब कुछ नहीं कर सकती वह. अभी उन की कार रफ्तार पकड़ती ही कि तभी गाड़ी के सामने एक शख्स को देख अचानक से चालक ने कस कर ब्रैक लगा दिया.

वह बाहर निकल कर कुछ पूछता ही कि मौका पा कर उस शख्स ने उस लड़के के सिर पर धड़ाधड़ 2-3 डंडे बरसा दिए जिस से वह वहीं ढेर हो गया. दूसरा यह सब देख कर अपनी जान बचा कर भागता ही कि उस का भी वही हश्र हुआ.

त्रिशा ने देखा वह तो वही लड़का है जो अभी कुछ देर पहले उसे मदद करने की बात कर रहा था, मगर त्रिशा ने उसे मना कर दिया था.

“आजकल लड़कियों के साथ क्याक्या हो रहा है पता है न आप को? फिर भी कैसे इन अनजान लड़कों के साथ उन की गाड़ी में बैठने को तैयार हो गईं आप? जरा भी दिमाग है कि नहीं आप में?” जब हर्ष ने त्रिशा की तरफ देख कर बोला, तो वह अकचका कर उसे देखने लगी.

ये भी पढ़ें- सान्निध्य: रोहिणी को था आखिर किस बात का दुख

“वह तो मैं ज्यादा दूर नहीं गया था इसलिए आप के चीखने की आवाज सुनाई दे गई मुझे. वरना पता भी है, आज आप के साथ क्या हो गया होता?”

उस के आंखों से बहते आंसू देख हर्ष को लगा कि उस ने कुछ ज्यादा ही डांट दिया उसे, क्योंकि बेचारी पहले से ही डरी हुई है ऊपर से वह उसे और डांटे जा रहा है. इसलिए फिर कुछ न बोल कर वह गाड़ी देखने लगा कि उस में समस्या क्या हो गई. हर्ष थोड़ाबहुत गाड़ी ठीक करना जानता था.

“लीजिए आप की गाड़ी ठीक हो गई,” अपना हाथ झाड़ते हुए हर्ष बोला.

त्रिशा को समझ नहीं आ रहा था कि वह किस तरह से हर्ष का शुक्रिया अदा करे. ‘अगर आज वह नहीं होता तो जाने उस के साथ क्या हो गया होता,’ सोच कर अभी भी वह कांप रही थी.

“नहींनहीं शुक्रिया की कोई जरूरत नहीं, प्लीज,” जब हर्ष ने बोला तो त्रिशा हैरान रह गई गई कि उसे कैसे पता कि वह उस का शुक्रिया अदा करना चाहती है, “आप के चेहरे के भावों से,” बोल कर हर्ष हंसा तो त्रिशा को भी हंसी आ गई.

“खैर, गाड़ी के बहाने ही सही, पर अच्छा लगा आप से मिल कर,” त्रिशा को एक भरपूर नजरों से देखते हुए हर्ष बोला.

“मुझे भी अच्छा लगा तुम से मिल कर,” अपने लटों को कान के पीछे खोंसते हुए त्रिशा मुसकराई थी.

घर आ कर त्रिशा ने किसी को भी कुछ नहीं बताया, क्योंकि बेकार में सब परेशान हो जाते और गाड़ी चलाने पर पाबंदी लग जाती सो अलग. लेकिन अपनेआप से उस ने यह वादा किया कि अब वह संभल कर रहेगी. किसी पर भी तुरंत विश्वास नहीं कर लेगी. हम सब की ज़िंदगी में कोई न कोई एक ऐसा दिन जरूर आता है, जो हमारे लिए बहुत खास बन जाता है. त्रिशा के लिए भी वह दिन बहुत खास बन गया जब गाड़ी खराब होने की वजह से हर्ष से उस की मुलाकात हुई थी.

जब भी हर्ष का हंसतामुसकराता चेहरा उस के आंखों के सामने आता, वह उस से मिलने को बेचैन हो उठती थी. मगर कैसे मिलती? कोई पताठिकाना या फोन नंबर भी तो नहीं था उस के पास.

ये भी पढ़ें- सहारा: मोहित और अलका आखिर क्यों हैरान थे

उधर हर्ष भी जबतब त्रिशा के खयालों में खो जाता और फिर अपना सिर झटकते हुए मुसकरा कर खुद को ही कोसते हुए कहता, “पागल कहीं का, अरे, कम से कम एक फोन नंबर तो मांग लिया होता उस लड़की का.”

इसी तरह उन की मुलाक़ात को 2 महीने बीत गए, पर अब भी वे एकदूसरे को नहीं भूले थे. अकसर वे एकदूसरे के खयालों में खो जाते और सोचते कि काश, एक बार फिर मिल जाएं.

आगे पढ़ें- उस दिन अचानक दोनों…

Serial Story: तुम से मिल कर (भाग-3)

उस दिन अचानक दोनों चांदनी चौक मार्केट में टकरा गए. एकदूसरे से मिलने के बाद उन के दिल में जो एहसास जागा, वह बयां करना भी कठिन था. त्रिशा को हर्ष का सीधासाधा, ईमानदार और हंसमुख रवैया बहुत पसंद आया था, वहीं त्रिशा की छरहरी देह, सोने जैसा दमकता रंग, बड़ीबड़ी तीखी पलकों से ढंकी आंखें, काले घने बाल और गुलाबी अधरों पर छलकती मनमोहक हंसी देख हर्ष उस की ओर खींचता चला आया था.

इस के बाद दोनों कई बार मिले. अब एकदूसरे से दोनों खुलने लगे थे। दोनों की पसंद और सोच काफी मिलतीजुलती थी. त्रिशा की तरह हर्ष भी अन्याय बरदाश्त नहीं कर सकता था. बेकार में लोगों की चापलूसी करना हर्ष को भी नहीं पसंद था. वह भी जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए हमेशा खड़ा रहता था. दोनों की पसंदनापसंद इतनी मिलतीजुलती थी कि उन्हें लगता दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं.

इन कुछ महीनों की दोस्ती में उन्हें लगने लगा कि उन्हें एकदूसरे की आदत सी हो गई है. वे एकदूसरे से बिना मिले एक दिन भी नहीं रह सकते हैं अब. यह कहना गलत नहीं होगा कि दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित होने लगे थे.

हर्ष का साथ पा कर त्रिशा को लगता जैसे जीवन में उसे क्याकुछ मिल गया हो. हर्ष की सोच और उस के बात करने का अंदाज त्रिशा को बहुत पसंद आता था.

ये भी पढ़ें- रिटर्न गिफ्ट: अंकिता ने राकेशजी को कैसा रिटर्न गिफ्ट दिया

पूछती कि वह इतना अच्छा कैसे बोल लेता है? कहां से आते हैं उस के पास इतने अच्छेअच्छे शब्द? तो हर्ष कहता, “अनुभव से. जिंदगी इंसान को सबकुछ सीखा देती है। बोलना भी…” त्रिशा ने तो अपने भावी जीवनसाथी के रूप में हर्ष को देख लिया था. जानती थी डैडी को मनाना मुश्किल नहीं होगा, पर मम्मी को मनाना थोड़ा कठिन है. लेकिन उसे विश्वास था कि हर्ष को देख कर वह भी मान जाएगी.

हर्ष को इस बात का कोई डर नहीं था, क्योंकि उसे पता था उस के मातापिता तो सिर्फ अपने बेटे की खुशी चाहते थे. मगर हर्ष को अपनी 2 जवान व कुंआरी बहनों की फिक्र थी. घर में खाने वाले 5 जन थे पर कमाने वाला सिर्फ एक यानी उन के पापा थे.

कई बार हर्ष ने कहा भी कि अब वह कहीं नौकरी ढूंढ़ लेगा क्योंकि कब तक वह अकेले अपने कंधे पर पूरे घर की जिम्मेदारी ढोते रहेंगे? पर हर्ष के पापा का कहना था कि वह सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. उन का सपना था कि उन का बेटा अपने आगे की पढ़ाई विदेश जा कर करे और इसलिए वह हर्ष को घर की झंझटों से दूर रखना चाहते थे.

त्रिशा, अपने और हर्ष के बारे में अपनी मम्मी को बताती, उस से पहले ही एक लड़के की फोटो दिखा कर वह कहने लगी कि यह उस के अमेरिका वाली सहेली का बेटा है और वह इस से त्रिशा की शादी करना चाहती है.

“पर मम्मी, मैं इस से शादी नहीं करना चाहती क्योंकि मैं किसी और से प्यार करती हूं,” कह कर त्रिशा ने अपने और हर्ष के बारे में नताशा को सब कुछ बता दिया. त्रिशा की बात पर उस के डैडी अशोक को तो कोई एतराज नहीं हुआ, पर उस की मम्मी नताशा भड़क उठीं, यह बोल कर कि पहले वह उस लड़के से मिलना चाहती हैं. फिर फैसला करेगी कि वह त्रिशा के लायक है भी या नहीं.

त्रिशा को पूरा विश्वास था कि उस की मम्मी को हर्ष जरूर पसंद आएगा, क्योंकि वह इतना अच्छा इंसान जो है. इधर हर्ष अभी भी इस दुविधा में था कि क्या त्रिशा के मम्मीडैडी उसे स्वीकारेंगे? अगर उन्हें वह पसंद नहीं आया तो?

लेकिन त्रिशा की जिद के आगे उस की एक न चली और उसे उस के साथ जाना ही पड़ा.

रास्ते भर त्रिशा हर्ष को समझाती रही कि उसे उस के मम्मीडैडी से कैसे और क्या बोलना है. उसे किस तरह उन के मम्मीडैडी को इंप्रैस करना है. लेकिन फिर भी हर्ष के दिल में एक धुकधुकी लगी हुई थी कि कहीं वह उन्हें पसंद ना आया तो? कहीं वह उन्हें इंप्रैस नहीं कर पाया तो?

ये भी पढ़ें- शरणागत: कैसे तबाह हो गई डा. अमन की जिंदगी

वह बहुत घबराया हुआ था. मगर त्रिशा के पापा अशोक से मिलकर उसे ऐसा लगा ही नहीं कि वह उन से पहली बार मिल रहा है. कुछ ही देर में वह अशोक से ऐसे घुलमिल गया कि पुछो मत. हर्ष जैसे जिंदादिल इंसान से मिल कर अशोक भी बहुत खुश हुए. मजा आ गया उन्हें तो हर्ष से मिल कर.

बहुत दिनों बाद अशोक को कोई अपने जैसा इंसान मिला था. लेकिन नताशा अभी भी आंखों ही आंखों में हर्ष को तौल रही थी कि वह उस की बेटी के लायक है या नहीं.

उस का साधारण पहनावाओढ़ावा, बात करने का अंदाज… कहीं से भी वह उस की बेटी के लायक नहीं लग रहा था. लेकिन वह कुछ बोली नहीं, क्योंकि पहले वह हर्ष और उस के पूरे परिवार के बारे में जान लेना चाहती थी. जैसेकि उस के घर में कौनकौन हैं? पिता क्या करते हैं? मां क्या करती हैं? लड़के का चरित्र कैसा है? कहीं परिवार का कोई क्रिमिनल रिकंर्ड तो नहीं जैसे तमाम सवालों का जवाब जानने के लिए नताशा ने ‘प्री मैट्रीमोनियम इन्वैस्टिगेशन (शादी से पहले जांच) करा लेना चाहती थी, फिर सोचेगी क्या करना है क्योंकि अकसर सीधे बन कर ही लोग दूसरों को अपनी जाल में फंसाते हैं, ऐसा नताशा का मानना था. और इस के लिए नताशा ने एक डिटैक्टिव ऐजेंसी हायर किया.

जांच के बाद पता चला कि हर्ष बहुत ही साधारण परिवार का लड़का है. पिता की एक साधारण सी नौकरी है जिस से घर खर्च और बांकी भाईबहनों की पढ़ाईलिखाई हो पाती है. मां गृहिणी है. अपना घर नहीं है और वे किराए के मकान में रहते हैं.

हर्ष अपनी खुद की पढ़ाई का खर्चा बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर निकाल लेता है. वह स्कौलरशिप के लिए अप्लाई कर चुका है. लड़के का चरित्र खराब नहीं है, यह भी बताया डिटैक्टिव ऐजेंसी वालों ने.

‘ये मुंह और मसूर की दाल… चले हैं मेरी बेटी से शादी का सपने देखने,’ अपने अधर को टेढ़ा करते हुए नताशा मन ही मन बोली,’चरित्र तो अब मैं तुम्हारा खराब करूंगी, वह भी अपनी बेटी के सामने. अरे, तुम बापबेटे उतना नहीं कमा लेते होगे 1 महीने में, जितना मेरी बेटी का 1 दिन का खर्चा है. क्या सोचा पैसे वाली लड़की को फंसा कर पूरी उम्र मौज करोगे? खुद का खर्चा तो चलता नहीं होगा. रोटी पर सब्जी नदारद और चले हैं मेरी बेटी से शादी का सपना देखने,’

मन तो किया उस का अभी जा कर त्रिशा को सब बता दें और कहें कि वह लड़का तुम से नहीं, बल्कि तुम्हारे पैसों से प्यार करता है. पर वह कहेगी कि क्या आप के लिए पैसा ही सबकुछ है? प्यार का कोई मोल नहीं है आप की नजरों में? जो भी हो पर मैं हर्ष से प्यार करती हूं और शादी भी उसी से करूंगी समझ लो आप,’ और फिर नताशा कुछ बोल नहीं पाएगी.

आजकल के बच्चों से बहस लगाने का मतलब है खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारना और नताशा अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहती है, बल्कि वह तो अपनी बेटी के पैरों में जंजीर डालना चाहती है. लेकिन दिमाग से, बहुत सोचसमझ कर कदम बढ़ाएगी वह.

ये भी पढ़ें- जीना इसी का नाम है: अपनों द्वारा ही हजारों बार छली गई सांवरी

अशोक से तो कुछ उम्मीद ही नहीं कर सकते, क्योंकि वे तो हर हाल में अपनी बेटी त्रिशा का ही साथ देंगे. उन का मानना है किसी पर जोरजबरदस्ती सही नहीं. सब को अपनी तरह से जीने का हक है. और इस में कोई दोराय नहीं है कि वह अपनी बेटी त्रिशा से बहुत प्यार करते हैं, कुछ भी कर सकते हैं उस के लिए.

लेकिन नताशा इतनी पागल नहीं है कि वह अपनी बेटी का अच्छाबुरा न देख पाए. वह कभी भी हर्ष से त्रिशा की शादी नहीं होने दे सकती.

आगे पढ़ें- नताशा को तो हर्ष फूटी आंख…

Serial Story: तुम से मिल कर (भाग-4)

नताशा को तो हर्ष फूटी आंख नहीं सुहाया था. मन तो किया था उस का नौकरों से धक्के मरवा कर उसे घर से बाहर फिकवा दें और कहे कि यही उस की असली जगह है. लेकिन बेटी की खातिर वह खून का घूंट पी कर रह गई थी.

हर्ष से मिलने के बाद नताशा के मन में एक बौखलाट भर गई थी यह सोच कर कि अगर कहीं त्रिशा ने हर्ष से शादी करने की जिद पकड़ ली तो वह क्या करेगी? समाज में उस की इज्जत और मानमर्यादा का क्या होगा? लोग तो हसेंगे उस पर और कहेंगे कि बड़ी पैसे वाली बनती है, तो बेटी की शादी एक ऐसे लड़के से क्यों कर दी जिस का अपना एक घर भी नहीं है?

नताशा किसी भी तरह हर्ष से अपनी बेटी को दूर कर देना चाहती थी. और इस के लिए वह कोई भी रास्ता अपनाने को तैयार थी.

पता लगाते हुए एक रोज वह हर्ष के घर पहुंच गई और उस के परिवार वालों की खूब बेइज्जती करने लगी यह बोलकर कि जानबूझ कर उन्होंने अपने बेटे को उस की बेटी के पीछे लगाया, ताकि सारी उम्र मुफ्त की रोटियां तोड़ सकें.

“क्या समझते हो, तुम बापबेटे अपने चाल में कामयाब हो जाओगे? कभी नहीं. कभी मैं तुम्हें तुम्हारे मंसूबों में कामयाब नहीं होने दूंगी,” जो मन सो नताशा उन्हें सुना आई.

चाहते तो हर्ष के पिता भी उस की बेइज्जती कर सकते थे, पर घर आए मेहमान को उन्होंने इज्जत देना सीखा था, इसलिए चुपचाप सब सुनते रहे.

ये भी पढ़ें- ब्लाउज: इंद्र ने अपनी पत्नी के ब्लाउजों को खोल कर देखा तो क्या हुआ

हर्ष ने कुछ नहीं बताया, मगर त्रिशा को सब पता चल ही गया कि मम्मी ने हर्ष के घर जा कर उस के मांपापा की खूब बेइज्जती की है और इतना ही नहीं, उस ने उन्हें पैसों से भी खरीदने की कोशिश की.

त्रिशा का दिमाग ही सन्न रह गया कि मम्मी ऐसा कैसे कर सकती हैं? तमतमाती हुई वह मम्मी के कमरे में जा कर उन्हें खूब खरीखोटी सुना आई और कहा कि यह उस की जिंदगी है, वह जिस से चाहे शादी कर सकती है, बालिग है, कोई रोक नहीं सकता उसे. वह तो उस घर को छोड़ कर चली जाना चाहती थी मगर अपने डैडी का मुंह देख कर वह रुक गई.

अशोक तो खुद ही अपनी पत्नी नताशा के खराब व्यवहार से त्रस्त थे. नताशा ने कभी अशोक को पति का सम्मान नहीं दिया. घर में वही होता आया आजतक जो नताशा चाहती है. मजाल नहीं जो अशोक उस के एक भी बात का विरोध कर पाए, हिम्मत ही नहीं थी उन में।

नताशा बहुत बड़े घर की बेटी है. उस के पापा नेवी में बहुत बड़े औफिसर थे. गांव में भी उन की अच्छीखासी जमीन जगह थी और संतान मात्र एक नताशा ही थी.

नाजों में पलीबङी हुई नताशा बचपन से ही जिद्दी और घमंडी स्वभाव की थी. उस के पापा चाहते थे कि उन की जिद्दी और घमंडी बेटी के लिए कोई शांतसरल लड़का चाहिए, जो इस के गुस्से को सहन कर सके, इसे संभाल सके.

अपनी बेटी के लिए अशोक से बेहतर लड़का उन्हें और कोई नहीं लगा. दहेज के लालच में अशोक के मांपापा भी अपने बेटे की शादी नताशा से करने को तैयार हो गए. लेकिन उन्होंने यह नहीं सोचा कि पैसे से कभी किसी को सुख नहीं मिला है.

नताशा ने कभी अशोक से सीधे मुंह बात नहीं की और न ही अपने सासससुर को अपनाया. उसे अपने धनदौलत का इतना घमंड था कि वह अपने सामने हर इंसान को तुच्छ समझती थी और आज भी वह अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझती.

वह लोगों से इस तरह से बात करती है जैसे वह उस का खरीदा हुआ गुलाम हो. लेकिन त्रिशा अपनी मां की तरह बिलकुल नहीं है. उसे जरा भी अपने पैसे और शोहरत का घमंड नहीं है. वह हर इंसान को एकजैसा समझती है. तभी तो वह शहर की चकाचौंध से दूर कहीं दूर गांवबस्ती में जा कर सुकून का पल बिताती है.

नताशा ने मन ही मन सोच लिया कि वह कुछ ऐसा करेगी जिस से खुदबखुद त्रिशा का मन उस हर्ष से फटने लगेगा.

एक दिन वह अपनी गाड़ी से कहीं जा रही थी तभी उस ने देखा हर्ष एक लड़की के साथ बस स्टैंड पर खड़ा है. दोनों जिस तरह से सट कर खड़े थे नताशा को शंका हुआ, तो वह अपनी गाड़ी पार्क कर उन से थोड़ी दूरी बना कर खड़ी हो गई. देखा उस ने दोनों खूब हंसहंस कर बातें कर रहे थे. फिर उन्होंने चाय पी.

बस में बैठने से पहले उस लड़की ने हर्ष को गले लगाया, तो प्यार से हर्ष ने भी उसे अपनी बांहों में समेट लिया. फिर उस का गाल थपथपा कर उसे विदा किया. नताशा ने चुपके से उन की सारी तसवीर अपने फोन में कैद कर लिया ताकि उसे त्रिशा को दिखा सके.

हर्ष और उस लड़की की फोटो दिखाते हुए नताशा कहने लगी, “देखो, क्या अब भी तुम यही कहोगी कि हर्ष अच्छा लड़का है? जिस हर्ष पर तुम आंख बंद कर के विश्वास कर रही हो न, असल में वह है क्या, अच्छे से देख लो. वह तुम से नहीं, बल्कि तुम्हारे पैसों से प्यार करता है त्रिशा, सही कह रही हूं मैं. वह केवल प्यार का दिखावा कर है तुम से, धोखा दे रहा है तुम्हें बेटा, समझो मेरी बात को,” एक ही सांस में नताशा बोलती चली गई.

ये भी पढ़ें- कब जाओगे प्रिय: क्या गलत संगत में पड़ गई थी कविता

“मम्मी, क्या हो गया है आप को ? क्यों आप बिना जानेबुझे कुछ भी बोलती जा हो? और यह चंद तसवीरें दिखा कर आप क्या साबित करना चाहती हैं कि हर्ष बुरा लड़का है? चरित्र खराब है उस का? तो आप गलत हो मम्मी क्योंकि यह लड़की हर्ष की चाचा की लड़की है जो यहां बैंक के जौब के लिए परीक्षा देने आई थी और हर्ष उसे बस में छोड़ने गया था.

“पैसापैसापैसा… बस पैसा ही दिखता है आप को. क्या पैसा ही इंसान के लिए सबकुछ होता है मम्मी? और आप को क्या लगता है हर्ष मेरे पैसे के लिए मुझे प्यार करता है? तो आप गलत हो. नहीं चाहिए मुझे आप का एक भी पैसा. मैं अपने हर्ष के साथ हर हाल में खुश रह लूंगी,” बोल कर त्रिशा अपने कमरे में जा कर अंदर से दरवाजा लगा लिया.

तंग आ चुकी थी वह मम्मी की हरकतों से. जब देखो हर्ष की कोई न कोई बुराई निकाल कर अनापशनाप बोलने लगती थी. हरदम यह जतलाने की कोशिश करती कि हर्ष किसी भी तरह से उस के लायक नहीं है. और उसशका परिवार भी एकदम मराटूटा है, तो कैसे वह उस घर में सुखी रह पाएगी?

नताशा चाहती थी त्रिशा उस की सहेली के बेटे विलियम से शादी कर के अमेरिका शिफ्ट हो जाए. इसलिए वह त्रिशा पर इस बात का दबाव बनाती कि वह कुछ वक्त विलियम के साथ गुजारे, उस के साथ घूमेफिरे, उसे वक्त दे. मगर त्रिशा को विलियम जरा भी अच्छा नहीं लगता था. पर नताशा की जिद के कारण उसे उस के साथ बाहर घूमने जाना पड़ता था.

नताशा की सहेली थी तो इंडियन, पर अमेरिका जा कर उस ने वहां शादी कर हमेशा वहीं की हो कर रह गई. लेकिन अकसर दोनों सहेलियों में फोन पर बातें होती रहती थीं.

नताशा भी कई बार अपनी सहेली के घर अमेरिका हो आई थी. उसे विलियम अच्छा लगा था इसलिए चाहती थी क्यों न यह दोस्ती रिश्तेदारी में बदल दी जाए. मगर त्रिशा सपने में भी उस विलियम से शादी नहीं करना चाहती थी. वह तो नताशा की जिद के कारण उसके साथ कहीं घूमने चली जाती थी, मगर शादी… कभी नहीं, क्योंकि जिस तरह से वह अपने अमेरिकन दोस्तों से फोन पर लड़कियों के प्राइवैट पार्ट्स की बातें कर हंसता था, उस से त्रिशा को उस से घृणा हो आती थी.

आगे पढ़ें- स्कौलरशिप के लिए हर्ष ने…

ये भी पढ़ें- सरप्राइज गिफ्ट: मिताली ने संजय को सरप्राइज गिफ्ट देकर कैसे चौंका दिया

Serial Story: तुम से मिल कर (भाग-5)

विलियम की सिर्फ चमड़ी ही सफेद थी, मगर उस का दिल एकदम काला था. कई बार वह त्रिशा को भी गलत तरीके से छूना चाहा था, पर त्रिशा ने उसे वह मौका ही नहीं दिया. नताशा जितना त्रिशा को विलियम के करीब करना चाहती थी वह उतना ही उस से दूर भगाती थी. त्रिशा अपनी मां को समझाना चाहती थी कि विलियम अच्छा लड़का नहीं है. पर वह सुने तब न.

स्कौलरशिप के लिए हर्ष ने परीक्षा दिया था जिस में वह चुन लिया गया. कालेज की पढ़ाई पूरी होते ही 2 साल के लिए वह स्लौकरशिप पर स्विट्जरलैंड चला गया. त्रिशा भी बीबीए करने के बाद एमबीए करने 2 साल के लिए स्विट्जरलैंड चली गई.

वहां से लौटते ही दोनों परिवार की सहमति से विवाह बंधन में बंधने का फैसला कर चुके थे. त्रिशा ने अपना प्लान पहले ही डैडी को बता दिया था, पर मम्मी को बताने में उसे डर लग रहा था इसलिए सोचा वहां जा कर बताएगी.

लेकिन हर्ष से शादी की बात सुनते ही नताशा ने घर में कुहराम मचा दिया था. दोनों मांबेटी में इस बात को ले कर जंग छिड़ गई थी. न त्रिशा अपनी मां की बात को समझने को तैयार थी और न ही नताशा बेटी की भावनाओं को समझ रही थी.

ये भी पढ़ें- बिट्टू: अनिता क्यों बिट्टू को अपना प्यार नहीं दे पा रही थी

नताशा का कहना था कि हर्ष का रहनसहन, खानपान, पहनावा सबकुछ अलग है. दोनों परिवारों का कहीं से भी कोई मेल नहीं है. वह कैसे निभाएगी हर्ष के साथ? और तो और दोस्तरिशतेदारों में उन की हंसी उड़ेगी. लोग कहेंगे कि अपनी इकलौती बेटी की शादी हम ने अपने से छोटे परिवार में कर दिया.

लेकिन त्रिशा अपनी मां की एक भी बात सुनने को तैयार नहीं थी. उस का कहना था कि वह मर जाएगी पर हर्ष के सिवा किसी और से शादी नहीं करेगी. नताशा को एक यह भी डर सताने लगा था कि त्रिशा बालिग है. अपनी मरजी से जिस से चाहे शादी कर सकती है. वह रोक नहीं पाएगी उसे. मगर वह भी हार मनाने वाली नहीं थी.

उस ने त्रिशा को हर्ष से मिलने पर रोक लगा दी. उस का अकेले कहीं आनेजाने पर भी पाबंदी लगा दिया गया. फोन पर वह किस से कितनी देर बात करती है, उस पर भी नजर रखा जाने लगा. घर के बाहर भी सख्त पहरा लगवा दिया गया था ताकि हर्ष घर के आसपास मंडरा न सके.

त्रिशा अपने ही घर में कैद हो कर रह गई थी. नताशा का कहना था जब तक वह विलियम से शादी के लिए नहीं मान जाती, उसे ऐसे ही रहना होगा. त्रिशा चाहती तो अपनी मां के हर बात का जवाब दे सकती है. घर से भाग कर हर्ष से शादी कर सकती थी. मगर वह केवल अपने डैडी का मुंह देख कर चुप रह गई. जानती थी उस के बाद मम्मी उन का जीना हराम कर देंगी.

ऐसे ही तो बोलती रहती है कि अशोक ने ही त्रिशा को बिगाड़ रखा है. वरना क्या उस की इतनी हिम्मत थी कि वह हर्ष जैसे लड़के से प्यार करने की जुर्रत करती?

लेकिन क्या प्यार करना कोई पाप है? बल्कि प्यार में तो वह परिवत्रा होती है जो सब को एक करना सिखाती है. एक नए भारत के निर्माण का सपना, जहां धर्म, जाति और दकियानुसी परंपराओं की संक्रीण दीवारों से उठ कर इंसानियत और प्यार के पैगाम के साथ आगे बढ़ा जाता है.

लेकिन आज दिमागी तौर पर जाति, धर्म और संकीर्णता की दीवारें ढहने के बजाय बढ़ने लगी हैं.

उस रोज विलियम का जन्मदिन था. नताशा, अशोक और त्रिशा उस पार्टी के स्पैशल गेस्ट थे. वैसे, त्रिशा उस पार्टी में नहीं जाना चाहती थी. मगर नताशा ने घर में इतना हंगामा मचाया कि त्रिशा को जाना ही पड़ा.

पार्टी शहर के सब से बड़े होटल में रखी गई थी. उस पार्टी में शहर के बड़ेबड़े लोगों के अलावा, अमेरिका से विलियम के कुछ दोस्त भी आए थे जिसे वह त्रिशा से मिलवा रहा था.

नताशा चाहती थी कि किसी तरह त्रिशा विलियम को पसंद करने लगे और उस हर्ष को भूल जाए तो सब ठीक हो जाएगा. इसलिए जबरदस्ती फोर्स कर उस ने विलियम के साथ उसे डांस करने को मजबूर किया.

एक जरूरी फोन कौल के कारण पार्टी के बीच में ही नताशा को जाना पड़ गया. लेकिन उस ने कहा कि वह जल्द ही आएगी. पार्टी देररात तक चली. डांस के बाद विलियम ने त्रिशा को ड्रिंक ला कर दिया जिसे न चाहते हुए भी उसे पीना पड़ा. लेकिन ड्रिंक पीते ही त्रिशा को मदहोसी छाने लगी और वह वहीं सोफे पर ही लुढ़क गई.

विलियम का इरादा त्रिशा को ले कर नेक नहीं था, यह बात हर्ष पहले से ही जानता था तभी तो वह उस पार्टी में किसी तरह शामिल हो गया था.

विलियम को उस ने त्रिशा को कमरे में ले जाते हुए देखा, पर वह उसे किस कमरे में ले कर गया पता नहीं चल रहा था. तभी होटल के एक कमरे के बाहर उसे त्रिशा का ब्रैसलेट पड़ा दिखाई दिया. कान लगा कर सुना तो अंदर से फुसफुसाहट सुनाई पड़ी. हर्ष समझ गया कि त्रिशा इसी कमरे में है.

उसने तुरंत जा कर होटल के मैनेजर को सारी बात बताई और कहा कि अगर उस लड़की के साथ कुछ ऐसावैसा हो जाता है, तो वही जिम्मेदार होगा और इस होटल की बदनामी होगी सो अलग.

ये भी पढ़ें- गोल्डन वूमन: फैशन मौडल से लेकर शादी के सफर की साधना की कहानी

हर्ष की बात सुन होटल के मैनेजर ने तुरंत दूसरी चाबी से दरवाजा खुलवाया और सब ने जो देखा, आवाक रह गया…

विलियम अपने 2 दोस्तों के साथ त्रिशा के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहा था और वह अर्धचेतना में ही अपनेआप को उनसे बचाने की कोशिश कर रही थी.

“तुम्हारी इतनी हिम्मत की तुम मेरी बेटी के साथ…” कह कर नताशा विलियम के गाल पर तड़ातड़ थप्पड़ बरसाने लगी. उन दोनों लड़कों को भी नताशा ने खूब मारा।

अपनी सहेली को भी उस ने खूब खरीखोटी सुनाई और कहा कि अच्छा हुआ जो उन का असली चेहरा सब के सामने आ गया, वरना वह तो बरबाद हो गई होती.

तब तक पुलिस भी वहां पहुंच चुकी गई. विलियम की मां ने नताशा के सामने हाथ जोड़े, पांव पड़े पर नताशा ने उन की एक न सुनी और विलियम और उस के दोनों दोस्तों को पुलिस के हवाले कर दिया.

यह सोचसोच कर नताशा के आंसू नहीं रुक रहे थे कि आज अगर हर्ष न होता तो उस की बेटी के साथ क्या हो गया होता. शायद ये दरिंदे उन की बेटी के साथ बलात्कार कर उसे मार भी डालते, फिर क्या कर लेती वह?केसकानून करने से भी क्या उस की बेटी वापस आ जाती?

आज नताशा को समझ में आ गया कि त्रिशा सही थी और वह गलत. सही कहती थी त्रिशा कि पैसा ही सबकुछ नहीं होता.

इंसान अच्छा और सच्चा होना चाहिए. धन तो कैसे भी कर के कमाया जा सकता है, पर अच्छे संस्कार हर किसी के पास नहीं होते. पढ़लिख कर बड़ा आदमी बन जाना, अच्छे कपड़े पहनना, अच्छा खाना खाना, बड़ीबड़ी गाड़ियों में घूमना यही सब अच्छे संस्कारों की गिनती में नहीं आते, बल्कि अच्छे संस्कार का मतलब होता है लोगों के दुखों को समझना, अपनों से बड़ों को सम्मान देना, जो विलियम में तो बिलकुल नहीं था.

यह बात त्रिशा ने कई बार बताना चाहा कि विलियम अच्छा लड़का नहीं है, पर नताशा हर बार उस की बात को नजरअंदाज कर उसे ही चुप करा देती थी. लेकिन आज उसे समझ में आ गया कि त्रिशा बिलकुल सही थी.

घर पहुंच कर नताशा ने सिर्फ अपनी बेटी त्रिशा और पति अशोक से ही हाथ जोड़ कर माफी नहीं मांगी, बल्कि हर्ष के सामने भी वह सिर झुका कर खड़ी हो गई. हाथ जोड़ कर कहने लगी कि हर्ष उसे माफ कर दे. उस से इंसान के चुनाव में गलती हो गई.

“नहीं आंटी, प्लीज, ऐसा मत कहिए. आप अपनी जगह एकदम सही थीं. हर मांबाप अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा सुखी देखना चाहते हैं. आप ने भी ऐसा ही सोचा तो क्या गलत किया? और आप को लगा विलियम से शादी कर के त्रिशा ज्यादा सुखी रहेगी.”

ये भी पढ़ें-  दीवारें बोल उठीं: घर के अंदर ऐसा क्या किया अमन ने

नताशा उसे देखती रह गई कि वह कितनी गलत थी उसे ले कर. अपनी जिद और अहंकार के कारण उस ने हीरा को पत्थर और पत्थर को हीरा समझ लिया.

आज नताशा को हर्ष से मिल कर बहुत खुशी महसूस हो रही थी. अब वह दिल से हर्ष को अपना दामाद मान चुकी थी.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें