Duology Movies: पिछले कुछ सालों से बौलीवुड में 2 भागों में बनी फिल्मों का क्रेज फिल्म मेकर के बीच शुरू हो चुका है, इस में वे किसी भी बड़ी स्टारकास्ट को ले कर, कहानी में थोड़ी फेरबदल कर फिल्म को 2 भागों या इस से अधिक में बना लेते हैं. इस में उन्हें अधिक कुछ सोचना नहीं पड़ता और ऐक्शन व बेकार की कौमेडी के बीच उसे हौल में रिलीज कर देते हैं.

इसी कड़ी में ‘हाउसफुल 5’ जो 2 भागों में बनी थी, जिस की कहानी और कौमेडी दोनों ही बेसिरपैर रही, 1 भाग को देखने के बाद दर्शक इतने मायूस हुए कि दूसरा देखने के लिए हिम्मत नहीं जुटा पाए और फिल्म बुरी तरह से फ्लौप रही.

जोखिम 

असल में 2 भागों में बनी फिल्म (डुओलौजी) बनाना जरूरी है या नहीं, यह कहानी की प्रकृति, बजट और निर्देशक की विजन पर निर्भर करता है. यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है जब कहानी इतनी बड़ी हो कि एक फिल्म में न समा पाए, जैसे ‘बाहुबली’, ‘केजीएफ’, जिस से कहानी में गहराई और दर्शकों के लिए ज्यादा जुड़ाव आता है, लेकिन इस के लिए ज्यादा समय, पैसा और मार्केटिंग लगती है और यह जोखिमभरा भी हो सकता है.

अगर पहला भाग सफल न हो, तो दूसरे भाग को देखने के लिए दर्शक साहस नहीं जुटा पाते और फिल्म फ्लौप हो जाती है.

घटित घटना का महिमामंडन

2 भागों में बनी फिल्में बेहद सफल हो सकती हैं, बशर्ते कहानी दमदार हो और दोनों भागों को दर्शकों का प्यार मिले, जैसे ‘धुरंधर’ हालिया उदाहरण है, जिसे दर्शकों ने कमोवेश पसंद किया, क्योंकि इस की कहानी से दर्शक खुद को रिलेट कर पाए क्योंकि इस फिल्म में दिखाई गई किसी भी घटना से दर्शक परिचित रहे और फिल्ममेकर को इस की कहानी लिखते हुए अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ी. उन्होंने इसे एअरकंडीशन होटल में बैठ कर लिखा और वीएफएक्स के प्रभाव से इसे दर्शकों तक पहुंचाया.

पुरानी फिल्म ‘शोले’ भी वैसी ही एक फिल्म थी, जिस का प्रभाव दर्शकों पर पड़ा क्योंकि उस दौरान डाकुओं का प्रभाव देश के कुछ भागों पर था, जिस से कहानीकार ने मनोरंजक फिल्म के जरीए लोगों तक पहुंचाया और फिल्म हिट रही.

आज अगर इस तरह की फिल्म बनती है, तो शायद वह दर्शकों को हौल तक खींचने में समर्थ नहीं हो सकती क्योंकि ऐसी कहानियां अब गुजरे जमाने की हो चुकी हैं. इतना ही नहीं, हौलीवुड में भी कई भागों में फिल्में बनाने का प्रचलन है. मसलन, ‘द डार्क नाइट’ और ‘गौडफादर’ के पार्ट 2 जैसी फिल्मों ने रिकौर्ड तोड़े हैं, जो दिखाते हैं कि अगर कहानी और निर्देशन सही हो, तो यह फौर्मूला बहुत सफल होता है.

समझते है सेट फौर्मूला

इस बारे में शौर्ट फिल्ममेकर और लेखक विकास कुमार मित्रा कहते हैं कि असल में एक फिल्म के हिट होने पर फिल्ममेकर इसे सेट फौर्मूला मानते हैं क्योंकि उस के चरित्र से दर्शक खुद को जोड़ पाते हैं, चरित्र अलाइव होता है, इसलिए उन सभी कैरेक्टर को बीच में रख कर पहली कहानी से मेलखाती हुई दूसरी फिल्म फिल्ममेकर लिख लेते हैं, जैसा अंगरेजी फिल्म ‘ट्वाईलेट’, ‘सीरीज औफ शेरलक होम्स’, अगाथा क्रिस्टी की ‘हरलोक फुरो’ आदि थी.

असल में एक चरित्र के हाइलाइट होने पर औडियंस उसे देखना पसंद करते हैं, जैसा मिशन इंपोसिबल फिल्म थी, जिस के कई पार्ट बने.

धारावाहिकों में भी ऐसा होता है, जहां एक चरित्र के स्थापित हो जाने पर दर्शक उसे देखना पसंद करते हैं, इस का फायदा सीरियल वाले उठाते हैं, लेकिन केवल चरित्र से कुछ नहीं हो सकता, कहानी अच्छी और रुचिकर होनी चाहिए ताकि स्टैब्लिश किए गए कलाकार का फायदा फिल्ममेकर को हो.

अगर फिल्म का फर्स्ट पार्ट ठीक नहीं बना, तो दूसरा पार्ट भी फ्लौप होता है. फिल्म ‘भूलभुलैया’ की पहला पार्ट अच्छी थी, बाद में बनाई गई दोनों सीरीज नहीं चली क्योंकि कहानी अच्छी नहीं थी, कलाकार के स्टैब्लिश होते हुए भी लोगों ने उसे देखने से नकार दिया.

मानसिक दिवालिएपन के शिकार फिल्ममेकर

असल में फिल्म एक शौर्ट स्टोरी होती है. नौवेल में कई कहानियां होती हैं. फिल्म ‘लाइफ इन मैट्रो’ में सारी कहनियों को एकसाथ जोड़ कर एक अच्छी फिल्म बनी जबकि आज के फिल्ममेकर एक छोटी कहानी को लंबा खींचते जाते हैं, जिस में कहानी का अस्तित्व खत्म हो जाता है और वे उस में खो जाते हैं और कहानी बेसिर पैर बन जाती है. फिल्म ‘हाउसफुल 5’ की भी यही हालत रही.

देखा जाए तो आज के फिल्ममेकर मानसिक दिवालिएपन के शिकार हो रहे हैं और दर्शकों के चौइस को समझ नहीं पा रहे हैं और फिल्में फ्लौप हो रही हैं क्योंकि आज कोई लेखक दर्शक तक नहीं पहुंचता. इस से वे उन की भावनाओं को समझ नहीं पाते और फिल्म की कहानियां भी आम जीवन से दूर होती हैं, जिस से कोई रिलेट नहीं कर सकता.

रियल स्टोरी पर फिल्में आज कोई नहीं लिखता, इसलिए बौलीवुड की हालत बहुत खराब हो चुकी है. फिल्म ‘धुरंधर’ भी इसलिए चली क्योंकि इस में दिखाए गए सभी घटनाओं से लोग परिचित हैं, साथ ही हाइप की गई एक एपिसोडिक कहानी है. सोशल मीडिया के इस जमाने में बहुत सारी चीजें कैमोफ्लौज हो कर आगे बढ़ जाती हैं. मसलन, ‘कश्मीर फाइल्स’ फिल्म चली, लेकिन ‘बंगाल फाइल्स’ और ‘उदयपुर फाइल्स’ जैसी फिल्में नहीं चलीं.

किताबें पढ़ना हुआ कोसों दूर

निर्देशक विकास आगे कहते हैं कि नई कहानी, जिसे दर्शक देखे और हौल से निकलने पर सोचने के लिए मजबूर हो, ऐसा कोई नहीं लिखता क्योंकि आज के फिल्ममेकर समाज की गलत चीजों को रिविल नहीं करना चाहते. उन का टारगेट केवल दर्शकों से पैसे निकलवाना है और आज बौलीवुड एक तमाशा बन चुका है. फिल्मों का आर्ट से कोई लेनादेना नहीं. सेंसिबल फिल्में आज नहीं बनतीं. फाइव स्टार होटल में बैठ कर लोग कहानी लिखते हैं. समुद्र के किनारे या किसी नैचुरल जगह पर बैठ कर सिचुएशन को फील कर कहानी लिखने की प्रथा अब खत्म हो चुकी है. इस तरह से वे दर्शकों के साथ कनेक्शन को खो चुके हैं क्योंकि वे दर्शकों के मनमस्तिष्क को पढ़ नहीं पाते, वे किताबें या नौवेल नहीं पढ़ते, जो आज के परिवेश के अनुसार लिखी जाती है.

तकनीक की दृष्टि से हम आगे बढ़े हैं, लेकिन कहानी और स्क्रिप्ट में बहुत अधिक पिछड़ चुके हैं.

अभी फिल्ममेकर प्रोडक्ट को पैकेजिंग कर पब्लिक के सामने बेच रहे हैं. सामाजिक इश्यू पर आज बहुत कम फिल्में बनती हैं. पहले कई फिल्में एकजैसी स्टारकास्ट ले कर फिल्ममेकर ऋषिकेश मुखर्जी बनाया करते थे. मसलन ‘गोलमाल’, ‘नरमगरम’ आदि. वैसी ही लीजैंड फिल्ममेकर सत्यजीत रे ने भी ‘अपू ट्रायोलौजी’ में अपू को ले कर ही 3 भागों में फिल्में बनाई थीं. जैसे ‘पाथेर पांचाली’, ‘अपराजितो’ और ‘अपूर संसार’. ये फिल्में एक बंगाली लड़के अपू के बचपन से ले कर वयस्कता तक के जीवन का चित्रण करती हैं और इसे विश्व सिनेमा की महत्त्वपूर्ण कृतियों में गिनी गया.

इस प्रकार 2 भागों में बनी फिल्में एक लंबी और जटिल कहानी कहने का अच्छा तरीका है, जिस से कहानी में गहराई आती है और दर्शक पूरी तरह जुड़ पाते हैं. अंगरेजी फिल्म ‘हंगर गेम्स’ की कहानी अच्छी थी, इसलिए चली, लेकिन कहानी को कृत्रिम रूप से लंबा खींचा जाए या दोनों भाग संतोषजनक न हों, तो दर्शक निराश हो सकते हैं.

यह पूरी तरह निर्देशक और कहानी पर निर्भर करता है कि वह इसे कितनी सफलतापूर्वक पेश कर पाते हैं और ऐसा कंटैंट अगर फिल्ममेकर के पास न हो, तो उसे न बनाने में ही भलाई है क्योंकि दिमागी दिवालिएपन का शिकार दर्शक एक बार ही होता है, बारबार नहीं.

Duology Movies

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...