Screen time for children : यह  लेख गाजियाबाद की घटना से प्रेरित है. इस तरह की घटनाएं भविष्य में रोकी जा सकती हैं. इस के लिए मातापिता क्या कर सकते हैं, पर अपने विचार रख रही हूं.

आजकल बच्चों पर मोबाइल की लत इस कदर हावी है कि उन से मोबाइल लेने पर वे अपना गुस्सा दिखाते हैं या चिढ़चिढ़ाते हैं या फिर अपना कमरा बंद कर बैठ जाते है अथवा आत्महत्या जैसा कदम भी बड़ी आसानी से उठा लेते हैं. ऐसे में मातापिता या अभिभावकों को क्या करना चाहिए ताकि उन के बच्चे मोबाइल की लत से दूर रहें और आत्महत्या जैसा कदम न उठाएं, आइए इस लेख के माध्यम से जानते हैं :

बच्चों की दिनोंदिन बढ़ती आत्महत्याओं की घटनाएं आजकल के मातापिता के लिए चिंता का विषय हैं. उन के लिए पेरैंटिंग किसी चुनौती से कम नहीं कि आखिर क्या करें कि बच्चों के दिल का हाल जान सकें.

आजकल के बच्चों के लिए मोबाइल पर औनलाइन गेम्स की लत मानो जिंदा रहने और मरने का कारण बन गई है. कुछ समय पहले गाजियाबाद में एक ही परिवार की एकसाथ 3 बहनों की आत्महत्या का कदम इस सचाई को उजागर कर रहा है. यदि मोबाइल नहीं तो जी कर क्या करेंगे, क्या हमारे बच्चों के लिए मोबाइल जान से प्यारा है? आए दिन न जाने कितने बच्चे यह कदम उठा रहे हैं. तो आखिर पेरैंट्स को क्या करना चाहिए ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके?

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अपना फ्री समय मोबाइल, सोशल मीडिया और इंटरनैट पर गेम्स आदि के साथ बिता रहे हैं, जिस की वजह से अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं. उन के इस अकेलेपन को दूर करने के लिए मातापिता का बच्चों को समय देना बहुत जरूरी है ताकि वे उन से अपने दिल का हाल बयां कर सकें न कि अपने दोस्तों से.

इस के लिए पेरैंट्स को रोज कुछ समय अपने बच्चों के लिए अवश्य निकालना चाहिए ताकि उन की बात सुन सकें, उन के व्यवहार में बदलाव को पहचान सकें, साथ ही इंटरनैट पर वे कौनकौन सी ऐक्टिविटीज कर रहे हैं के साथसाथ उन की चैटिंग भी पढ़ें ताकि वे जान सकें कि आखिर उन के मन में क्या चल रहा है क्योंकि कई बार बच्चे अपनी बात अपने पेरैंट्स के बजाय फ्रैंडस के साथ शेयर करना पसंद करते हैं. इस के लिए पेरैंट्स घर में ऐसा माहौल बनाएं ताकि वे अपनी हर बात बिना डरे व बे?िझक उन के साथ शेयर कर पाएं.

नजर रखें उन के बदलते व्यवहार पर

यदि आप का बच्चा कुछ अलग व्यवहार कर रहा है जैसे कि उस का बातचीत का तरीका, उस का खानपान, उस के कपड़े, उस के दोस्त आदि में कुछ बदल रहा है तो थोड़ा सतर्क हो जाएं कि आखिर उस में ये बदलाव क्यों आ रहे हैं? यह जानने के लिए थोड़ा समय निकालें. इस के लिए खाने की टेबल पर एकसाथ बैठें, उन के साथ पार्क में टहलने जाएं, उन के साथ बैठ कर गेम्स आदि खेलें और बातोंबातों में उन से जानने की कोशिश करें.

स्क्रीन टाइम को करें कम

पेरैंट्स के लिए डिजिटल दौर में सब से बड़ी चुनौती यही है कि वे आखिर कैसे बच्चों को मोबाइल से दूर रखें और यदि उन्हें इस का उपयोग करना भी है तो कितनी देर क्योंकि आजकल बच्चों के स्कूल के असाइनमैंट, उन का सबमिशन, नोटिस, टैस्ट आदि व्हाट्सऐप गु्रप एवं औनलाइन मोड पर हो रहे हैं. ऐसे में उन पर नजर बनाए रखना थोड़ा मुश्किल हो रहा है.

ऐसे में अपने बच्चों को इंटरनैट के सही इस्तेमाल के बारे में बताएं और उन के स्क्रीन टाइम पर भी नजर बनाए रखें क्योंकि कई बार बच्चे इंटरनैट पर मौजूद चीजों में इतने मशगूल हो जाते हैं कि उन्हें इस के अलावा कुछ और नजर नहीं आता है. उन की इस आदत या लत को छुड़ाने के लिए एकदम मोबाइल छीनने के बजाय धीरेधीरे उन के स्क्रीन टाइम को कम करने की कोशिश करें एवं इस के लिए खुद भी जब उन के साथ हों मोबाइल से दूरी बनाएं.

रखें दोस्ताना व्यवहार

अकसर मातापिता अपने बच्चों को कई नियमों और अनुशासन में बांध कर रखते हैं. उन्हें हर छोटीछोटी बात पर टोकते, डांटते और मारते हैं. इस से कई बार बच्चे जिद्दी हो जाते हैं और उन की बात पर ध्यान देना छोड़ देते हैं, उन का कहना नहीं मानते हैं. कई बार डांट एवं मार के डर से बच्चे मातापिता से चीजें छिपाना शुरू कर देते हैं. कुछ भी शेयर करने से बचते हैं. अत: इस से बचने के लिए मातापिता का फर्ज है कि अपने बच्चों को ऐसा माहौल दें कि वे बिना किसी हिचकिचाहट एवं डर के सबकुछ आप के साथ शेयर कर सकें ताकि वे कोई भी गलत काम करने से बच सकें. ऐसे में पेरैंट्स का बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार बेहतर, मजबूत रिश्ता बना सकता है.

बच्चों से औफलाइन जुड़ें

अपने बच्चों से औफलाइन जुड़ें. उन्हें तनाव से दूर रखने और उन का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए उन की कल्पनाओं के साथ उडि़ए, उन के साथ हंसिए, उन की शरारतों का हिस्सा बनिए. यदि वे कहीं उल?ों तो आप उन्हें सही रास्ता दिखाएं, सही और गलत में फर्क करना सिखाएं. देखिए वे बिना किसी भय के हर बात आप के साथ शेयर करने लगेंगे. किसी भी तरह की नकारात्मकता उन के आसपास नहीं आएगी. बच्चों में नई ऊर्जा देखने को मिलेगी. याद रहे बचपन लौट कर नहीं आता. कहीं ऐसा न हो कि हमारी भागमभाग वाली जिंदगी में उन का बचपन बीत जाए, इसलिए उन से कनैक्ट या जुड़े रहें.

उन की औनलाइन ऐक्टिविटीज पर नजर बनाए रखें कि वे क्या देख रहे हैं? सोशल मीडिया पर उन की चैटिंग देखें कि वे क्या लिख रहे हैं.

उन की समस्या को जानें क्योंकि बच्चों एवं किशोरों में तनाव, उलझन, डर और संदेह की भावनाएं उन की समस्या सुलझाने और फैसला करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं.

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