राखी लखन, (जानकीपुरम)

मां,

अथाह प्यार और त्याग का प्रतीक होती है. उसका सुख-दुख अपने परिवार में ही निहित होता है. बच्चा खुश हो तो मां खुश, उसे कोई परेशानी हो तो मां को दुगुनी परेशानी. ऐसी होती है मां. मेरी मां भी ऐसी ही थी. उनकी शादी 13 साल में होने के कारण वो बहुत ज्यादा पढ़ नहीं पाई थीं, लेकिन जितना भी पढ़ा था वो सब हम सबको बताया करती थीं. पढ़ाई और खाने के मामले में सख्त और वैसे बहुत ही प्यारी.

हर गलती पर बचा लेती मां...

घर में सबसे छोटी होने के कारण हमें विशेष प्यार करती थीं. हमेशा हर गलती पर ये कहकर बचा लेती थी हमें कि अभी छोटी है. बड़ी बहन कहती थी कि मां ये कब तक छोटी रहेगी. तो कहती थी मेरे लिए तो हमेशा ही रहेगी. आज मैं भी मां हूं एक बेटे की और आज उनकी कही हर बात समझ में आती है. उनकी चिंता, उनकी डांट और गुस्से के पीछे छुपा प्यार सब कुछ समझ में आता है.

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मुश्किल वक्त में नहीं मानी हार...

कुछ ही साल पहले की बात है जब वो बहुत बीमार हुईं और आईसीयू में एडमिट थी. हम सब जब उनसे मिलते और पूछते कि कैसी तबियत है तो यहीं कहती कि मैं ठीक हो जाऊंगी, तुम लोग चिंता मत करना. हम सब भी जानते थे कि कुछ ठीक नहीं है फिर भी वो हम लोगों को हिम्मत देती कि सब ठीक है. सब ठीक हो जाएगा. उनसे सीख मिली की परिस्थितियां कैसी भी हो हार नहीं माननी चाहिए.

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