गरबा 2022: हेल्थ का ख्याल रखना है जरूरी

फेस्टिवल के दौरान अक्सर लोग अपने कपड़ों और मेकअप पर ध्यान देते हैं, लेकिन हेल्थ को नजरअंदाज कर देते हैं. वहीं गरबे में डांस करते समय हमारी एनर्जी खत्म हो जाती है, जिससे हमारी स्किन पर भी असर पड़ता है. अगर आप भी गरबा फेस्टिवल के दौरान अपनी हेल्थ का ध्यान नही रखते हैं तो जरूरी है कि आप ये खबर पढ़ें. आज हम आपको बताएंगे कि गरबा फेस्टिवल के दौरान कैसे अपनी हेल्थ का ख्याल रखें ताकि आप फेस्टिवल को मजे कर पाएं…

1. स्टेमिना बनाएं रखें

गरबों के दौरान आपका शारीरिक व्यायाम अधि‍क होता है. इसलिए गरबा खेलने के लिए स्टेमिना बढ़ाना भी जरूरी होता है. इसलिए कोशिश करें कि आप ऐसी चीजों पर गरबे के दौरान ऐसी चीजें खाएं या पिएं, जिससे आपका स्टेमिना बना रहे.

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2. नींद है जरूरी

गरबा फेस्टिवल का मजा लेने के लिए नींद लेना जरूरी होता है, इसीलिए कोशिश करें कि आप 6-7 घंटे की नींद जरूर लें. अगर आप रात को देरी से सो रहे हैं, तो सुबह कुछ देर ज्यादा नींद लें या फिर दिन में आराम करें. ये आपकी थकान को दूर करने में मदद करेगा.

3. डिहाइड्रेशन से बचें

गरबा खेलने के दौरान पसीना ज्यादा आता है. ऐसे में शरीर में पानी का स्तर बनाए रखना बेहद जरूरी है. इसलिए रोजाना कम से कम 12 से 15 गिलास पानी जरूर पिएं. लेकिन ध्यान रखें कि एक साथ अधि‍क पानी न पिएं.

4. एक्स्ट्रा कौलोरी है जरूरी

अगर आप रोज गरबा खेल रहे हैं तो अपने नौर्मल फूड में 300-400 केलोरी ज्यादा लें. इसके अलावा फाइबर से भरपूर चीजों खाएं ताकि एनर्जी भी बनी रहे और आप स्वस्थ भी रह सकें.

5. एनर्जी बनाए रखने के लिए करें ये काम

सुबह गुनगुने पानी में 1-2 बूंद नींबू का रस व एक-चौथाई टी-स्पून शहद मिलाकर पिएं. आधे घंटे बाद एक गिलास दूध पिएं. इससे बौडी में एनर्जी बनी रहेगी. इसके बाद सुबह 10-11 बजे के बीच ऐसे फलों खाएं, जिसमें केलोरी ज्यादा हो. फलों का सेवन करने से आपको पोषण भी मिलेगा और आवश्यक उर्जा भी मिलेगी. फल आपकी हेल्थ बनाए रखने में मदद करेंगे.

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6. गरबा खेलने से पहले खाएं ये फूड

गरबा खेलने जाने के 2-3 घंटे पहले उबले आलू, साबुदाने की खिचड़ी, रोस्टेड ग्राउंडनट जैसे व्यंजन का व फल का सेवन करें. वहीं गरबा खेलने के दौरान हर आधे घंटे के अंतराल में ग्लूकोज पीते रहें, इससे कमजोरी नहीं होगी और समय-समय पर जरूरी उर्जा की आवश्यकता भी पूरी होती रहेगी.

7. जंक फूड से रहें दूर

गरबों के दौरान तले हुए खाने, जंक फूड व बाजार का खाना हो सके तो ना खाएं. यह आपको कैलोरी तो देंगे लेकिन उर्जा नहीं. इसके अलावा रात को सोने से पहले भी एक गिलास दूध जरूर पीएं. इससे आपको नींद भी अच्छी आएगी और पोषण भी मिलेगा. हेल्दी फूड के साथ-साथ जरूरी है कि आप ज्यादा से ज्यादा आराम करें. ये आपकी स्किन और हेल्थ के लिए दोनों के लिए फायदेमंद रहेगा.

गरबा 2022: ट्राय करें परफेक्ट गरबा आउटफिट

फेमस ब्रांड में इस बार गरबा में जरी की कढ़ाई की ड्रेसेस ने वापसी की है. हालांकि जरदोजी कढ़ाई पहले से ही चलन में है.  यह देखकर खुशी होती है कि भारत में  नवीनतम फैशन ट्रेंड को सभी भारतीय ना केवल फौलो कर रहे हैं  बल्कि देश के समृद्ध विरासत का प्रतीक व भूली जा चुकी शिल्प के पुनरुद्धार पर काम कर रहे हैं.

1. क्लासिक लहंगा

त्यौहारों का मौसम चल रहा है. हर महिला ऐसे खास मौकों पर अपनी खूबसूरती का परचम लहराना चाहती है. लहंगा उन भारतीय  पहनावों में से एक है जो सबसे अधिक पसंद किया जाता है. क्योंकि यह भारी कढ़ाई और मोतियों, रूपांकनों और सेक्विन जैसे काम से सुशोभित है. जिगर ब्रांड ने हल्के रंगों के साथ भारी सेक्विन और जरी वर्क वाले लहंगे के साथ ट्रेंडिंग दिखने के लिए पेस्टल कलर्स पर हल्के गोटा पट्टी दुपट्टे का टच दिया है. दूसरी तरफ रफल्स जैसे ट्रेंडिंग फीचर्स के साथ प्लेन लहंगे की शुरुआत की हैं. जिसमें  मिरर वर्क काम  हैं. तो हो जाइए गरबा और डांडिया के लिए तैयार.

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2. मौडिश इजी शरारा

क्या आप चूड़ीदार पजामी यह सलवार से बोर हो गए हैं? तो आप एक नया प्रयोग करके देखिए! कुर्ते को फ्लेयर्ड प्लाजो और घेर वाले शरारा के साथ पहने . आप शॉर्ट कुर्ते और हाई या लो असिमिट्रिकल कुर्ता या लोंग या शौर्ट कुर्ता और शरारा भी पहन सकते हैं. इस फेस्टिव सीजन के लिए शरारा भी यूनिक लुक देते हैं .जरदोजी शॉर्ट कुर्ता, फ्लेयर्ड गोटा पत्ती के साथ मौडर्न ट्विस्ट तो देता ही है, आपको बहुत कूल और कंफर्टेबल भी रहेगा.  गरबा के दिनों में शरारा बहुत ही आरामदायक और बहुत ही खूबसूरत लुक के लिए बेहतरीन ड्रेस है.

3. एवरग्रीन अनारकली

अनारकली सूट किस को नहीं पसंद होगा? हर राजकुमारी के लिए एक बहुत ही प्यारी सी ड्रेस .अगर ढंग से पहना जाए तो हर महिला भी किसी राजकुमारी से कम नहीं लगेगी . यह वह पारंपरिक परिधान है जो आकर्षक फैशनेबल लुक के साथ आरामदायक भी है. बस ड्रेस से मैच करता हुआ मेकअप और हेयर स्टाइल करें! प्यारे प्यारे कानों में झुमके लटकाए है और आप लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए तैयार हैं.

4. एलीगेंट फ्यूजन साड़ी

भारतीय परिधानों का एक अहम हिस्सा है साड़ी .हम ने बचपन से खास मौके पर महिलाओं को साड़ी पहने हुए देखा है. पश्चात्य फैशन को अपनाने के बाद भी आज साड़ी हर किसी की मनपसंद परिधान है. हल्के और सस्ते कपड़े  जैसे सूती सिल्क आर्ट सिल्क फेस्टिव सीजन के लिए बेस्ट है. एथेनिक फैशन जिनमें साड़ियों का चलन है उनके लिए सिल्क की साड़ी सेल्फ प्रिंट के साथ बेस्ट है. साड़ी सभी महिलाओं और युवतियों का एक बहुत ही पसंदीदा और फैशनेबल परिधान है जोकि किसी भी प्रकार के डांस में आरामदायक है.

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5. बोहो चिक धोती पैंट्स

ट्रेडिशनल साड़ियों और लहंगो के फैशन को कोई नहीं हरा सकता लेकिन इन सब ट्रेंड्स में थोड़ा बहुत बदलाव के साथ पहनने से और भी ट्रेडिशनल और फैशनेबल लुक आपकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती है एक नया ट्रेंड धोती पेंट का चलन आया है बांधने में ऐसी पहनने में इजी जिस पर ऊपर से क्रौप टौप या उबर चेक कुर्ता पहना जाता है. यह फैशन ट्रेंड धीरे-धीरे बहुत ज्यादा पौपुलर हो रहा है उन सभी महिलाओं के लिए जो बहुत खूबसूरत और गौर्जियस दिखना चाहती हैं, धोती पैंट साथ में स्ट्रेट कुर्ता या पेप्लम टौप, क्रौप टौप या फिर जैकेट बहुत ही फबेगी .

6. पारंपरिक गाउन

गाउन  पश्चात्य फैशन को प्रस्तुत करते हैं.इस पाश्चात्य फैशन को थोड़ा भारतीयता के टच के साथ हम मार्केट में लेकर आए हैं. इसमें वेस्टर्न फ्यूजन ,इंडियन ट्रेन्ड, जरदोजी, सिकिवल्स, गोटा पत्ती का सम्मिश्रण है. भारतीय परिधानों का मौडर्नाइजेशन है यह.

7. प्लाजो सूट

शौर्ट कुर्ती और प्लाजो, शरारा और गरारा आज के सबसे आरामदायक परिधानों में से हैं .लाइट प्लाजो के साथ यदि हेवी दुपट्टा कैरी किया जाए तो यह और भी आकर्षक लगता है.

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गरबा 2022: फेस्टिवल की थकान को दूर करने के लिए बेस्ट है ये फूड

फैस्टिवल सीजन में अकसर थकान और कमजोरी के कारण हमारी हेल्थ को नुकसान होता है. वहीं गरबा की बात करें तो 4-5 घंटे लगातार डांस करने से हमारे अंदर थकान और कमजोरी हो जाती है, जो खतरनाक भी साबित हो सकती है. इसलिए जरूरी है कि इस फैस्टिव सीजन में आप अपने एनर्जी लेवल को बढ़ाने के लिए अपनी डाइट पर भी ध्यान दें. लगातार काम करने से आप थकान महसूस करती हैं. अगर आप थकान से लड़ने के लिए अपने शरीर को मजबूत बनाना और एनर्जी लेवल बढ़ाना चाहती हैं तो नियमित रूप से नाश्ता करना कभी न भूलें. आइए आपको बताते कुछ ऐसे फूड सप्लिमेंट लें, जिससे आपकी हेल्थ बनी रहे….

1. फेस्टिवल थकान मिटाने के लिए परफेक्ट है ओटमील

थकान मिटाने के लिए ओटमील परफेक्ट फूड है. इस में मौजूद कार्बोहाइड्रेट्स ग्लाइकोजिन के रूप में शरीर में जमा हो जाते हैं और दिन भर दिमाग और मांसपेशियों को ऐनर्जी देते हैं. साथ ही इस में मौजूद पौष्टिक तत्त्व ऐनर्जी लैवल बढ़ाते हैं.

2. हर्बल ड्रिंक है फायदेमंद

हर्बल ड्रिंक, जैसे आंवला या एलोवेरा जूस या ग्रीन टी पीने से शरीर में ऐनर्जी बरकरार रहती है क्योंकि इस में अधिक मात्रा में पौष्टिक तत्त्व पाए जाते हैं जो हमारे इम्यून सिस्टम को स्ट्रौंग बनाते हैं. हर्बल टी में तो ऐंटीऔक्सीडैंट फ्लैवोनाइड तत्त्व भरपूर मात्रा में होते हैं, इसलिए इस के नियमित सेवन से कई फायदे होते हैं. जैसे पाचनतंत्र मजबूत रहता है और शरीर अंदर से साफ रहता है. ऐनर्जी भी भरपूर बनी रहती है.

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3. केला दे पेन से आराम

केले में पर्याप्त पोटैशियम होता है जो शरीर में मौजूद शुगर को ऐनर्जी में बदल देता है. इस के साथ ही केले में कई और पौष्टिक तत्त्व होते हैं जो सुस्ती को दूर करते हैं, मसल्स पेन में आराम देते हैं और थकान मिटाने में मददगार होते हैं.

4. फाइबर युक्त खाएं अखरोट

वर्कआउट के बाद होने वाली थकान को दूर करने के लिए फाइबरयुक्त अखरोट खाना चाहिए. ओमेगा 3 फैटी ऐसिड से भरपूर अखरोट डिप्रेशन दूर करने में मदद करता है और थकान मिटाने में भी मददगार होता है.

5. प्रोटीन से भरपूर दही

प्रोटीन से भरपूर दही में कार्बोहाइड्रेट भी होता है जो थकान से लड़ने में मदद करता है. जब भी आप को ऐनर्जी चाहिए तब आप दही खा सकती हैं पर दही मलाई वाला नहीं होना चाहिए.

6. मेटाबौलिज्म को बढ़ाए पालक

थकान मिटाने के लिए आयरन से भरपूर पालक भी खाया जा सकता है. मेटाबौलिज्म बढ़ाना हो या ऐनर्जी के घटते स्तर को नियंत्रित करना हो, पालक फायदेमंद होता है.

7. मूंगफली करे कौलेस्ट्रोल को कम

इस में न्यूट्रिऐंट्स, मिनरल, ऐंटी औक्सीडैंट और विटामिन जैसे पदार्थ पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक हैं. इस में मोनो इनसैचुरेटेड फैटी ऐसिड भी पाया जाता है जो खराब कोलैस्ट्रौल को कम कर के अच्छे कौलैस्ट्रौल को बढ़ाता है.

8. कौफी भी है फायदेमंद

कौफी का सही मात्रा में सेवन शरीर में ऊर्जा को बूस्टअप करता है और थकान से दूर भगाता है. ऐसे में शरीर में अंदरूनी ताकत का एहसास होता है.

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9. ड्राई फ्रूट्स

गरी, छुहारा, मुनक्का, चिलगोजा, बादाम आदि ड्राई फू्रट्स शरीर में अंदरूनी ताकत लाते हैं. इन के रोजाना सेवन करने से बौडी में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जिस से शरीर को बीमारियों से लड़ने की ताकत मिल जाती है.

10. पानी मिटाए थकान

पानी शरीर की थकान हटाने के लिए एक अच्छा स्रोत है. खूब पानी पीएं, जिस से डिहाइड्रेशन नहीं होगा और थकान महसूस नहीं होगी.

गरबा 2022: गरबा नाइट पर आप दिखें कुछ खास

त्योहार के दिनों में हर दिन एक नया सेलिब्रेशन है. सेलिब्रेट करने की तैयारियों के बीच खास दिखने की चाहत भला किसे नहीं होती. गरबा या डांडिया नाइट पर कैसी ड्रेस पहनें, कैसा मेकअप हो जैसी कई प्रकार की उधेड़बुन हमारे मन में चलती है. तो चलिए, आपकी इस उधेड़बुन को हम सुलझा देते हैं. इस गरबा आप भी कुछ इस तरह से तैयार हों की सभी आपको देखते रह जाएं.

कैसे चुनें परफेक्ट ड्रेस

आपकी कोशिश होनी चाहिए कि आपकी ड्रेस जितनी स्टाइलिश हो उतनी ही आरामदायक भी हो जिससे आप बेहिचक डांस कर सकें. ऐसे में लहंगा-चोली से बेहतरीन औप्शन भला क्या होगा. यह मौके के हिसाब से पारंप‌रिक भी है और आरामदायक भी. सबसे बड़ी बात की हेवी वर्क के बावजूद भी इसे पहनने में आपको कोई दिक्कत नहीं होगी.

कैसा हो मेकअप

मौसम कितना भी खुशनुमा क्यों ना हो लेकिन भीड़-भाड़ और डांस के दौरान पसीना आना वाजिब है. ऐसे में मेकअप के दौरान ध्यान रखें कि इसका बेस वाटरप्रूफ हो जिससे पसीने के साथ-साथ मेकअप न बहे. आप चाहें तो ग्लौसी या न्यूड मेकअप को भी तरजीह दे सकती हैं.

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फाउंडेशन

पहले चेहरे को अच्छे से साफ करें और अपनी त्वचा के रंग के हिसाब से इस पर सही फाउंडेशन लगाएं.

ब्लशर

गरबा नाइट के मौके पर गुलाबी, पीच या ब्राउन ब्लशर खूब फबेगा. रात के समय ब्लशर थोड़ा डार्क रखें और इसे गालों से कनपट्टी तक ब्रश से लगाएं. ध्यान रहे कि ब्लशर आपके स्किन टोन के हिसाब से ही हो.

लिप ग्लौस

वहीं लिपस्टिक के बजाय आप लिप पेंसिंल लें और लाइनिंग के बाद लिप ग्लौस का इस्तेमाल करेंगी तो आपका लुक अधिक ब्राइट लगेगा. ट्रैडिशनल टच के लिए पतली या छोटी बिंदी लगाएं.

नथ

अगर आप इससे कुछ ज्यादा करना चाहती हैं तो एक छोटी सी नथ भी लगाएं. इसके साथ बड़ी बिंदी का इस्तेमाल करें.

आंखों का मेकअप हो खास

कोई भी मेकअप तब तक पूरा नहीं है जब तक आंखों के मेकअप को तरजीह न दी जाए. गरबा नाइट पर खास लुक के लिए आप आंखों पर पर्पल, पिंक, ग्रीन, ब्लू या कापर शेड के आइशैडो ट्राई कर सकती हैं जो पार्टी लुक के लिए परफेक्ट है. यह ध्यान रखें कि आइशैडो के शेड्स आपकी ड्रेस से मैच करें.

आइब्रो के ठीक नीचे आप स्पार्कल्स भी लगा सकती हैं जिससे रात में आपका मेकअप ब्राइट लगेगा. चाहें तो आंखों के नीचे कलरफुल लाइनर लगाकर स्मज करें, सिर्फ इतने से ही आपकी आंखें आकर्षक लगेंगी. लाइनर या काजल को बाहर की ओर निकालकर लगाने से भी आपका लुक चेंज हो जाएगा.

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ट्राई करें फैंटेसी मेकअप

आजकल बैकलेस, क्रौसलेस या हाल्टर लुक वाली चोली का काफी चलन है. इसमें पीठ, गर्दन आदि काफी एक्सपोज होता है. कुछ अलग दिखने की चाह है तो आप अपने बैक या गर्दन के खुले भाग पर फैंटेसी मेकअप भी करवा सकती हैं. इसमें मेंहदी, स्पार्कल्स और कई रंगों के प्रयोग से तरह-तरह की कलाकृतियां बनवा सकती हैं.

हेयरस्टाइल हो खास

आमतौर पर लड़कियां आजकल खुले बाल ज्यादा पसंद करती हैं पर आप अलग लुक के लिए अपनी हेयरस्टाइल के साथ थोड़े बदलाव जरूर करें. बालों के आगे भाग की कई चोटियां गुथ लें और पीछे से प्लेन चोटी या जूड़ा बनाएं या फिर आगे के बालों को कर्ल कराकर निकाल लें और पीछे चोटी रखें. चाहें तो चेटियों में मोती या पिन क्लच करें. डांडिया नाइट पर यकीनन सिर्फ आप ही आप दिखेंगी.

बांझपन का इलाज है न, पढ़ें खबर

जब गर्भनिरोधक के बिना 1 वर्ष तक कोशिश करने के बाद भी स्वाभाविक रूप से कोई विवाहित जोड़ा गर्भधारण करने में अक्षम रहता है तो उसे बां झपन कहा जाता है. भारत में 10 से 15% जोड़े बां झपन से पीडि़त हैं. यह कई कारणों से हो सकता है जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, थायराइड, मोटापा, हारमोनल समस्याएं और पौलिसिस्टिक  अंडाशय सिंड्रोम पीसीओएस.

इस के अलावा गलत लाइफस्टाइल की आदतें जैसे तंबाकू, शराब और खराब भोजन का सेवन और बिना शारीरिक मेहनत के जीवन जीने के परिणामस्वरूप होता है. यहां यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि बां झपन के कुल मामलों में एकतिहाई मामलों को महिला साथी, एकतिहाई मामलों में पुरुष साथी और बाकी मामलों में दोनों साथी इस में बराबर के भागीदार होते हैं. इसलिए यह सम झना आवश्यक है कि बां झपन सिर्फ एक महिला से जुड़ा मुद्दा नहीं है जैसाकि समाज अभी भी सोचता है.

अकसर देखा गया है कि पुरुष साथी में कई समस्याएं जैसे इरैक्टाइल डिस्फंक्शन यानी नपुंसकता और एजोस्पर्मिया यानी शुक्राणुओं की अनुपस्थिति होती है जिस से बां झपन की स्थिति आ जाती है. कुछ जोड़े समस्या की गहराई में पहुंचे बिना बच्चे पैदा करने की कोशिश करते रहते हैं. उन में से कई बाबाओं से भी संपर्क करते हैं और उन के समाधान के लिए  झाड़फूंक का सहारा लेते हैं.

सर्वोत्तम समाधान का विकल्प

बां झपन एक मैडिकल समस्या है और इसे दूर करने के लिए चिकित्सकीय समाधान की आवश्यकता होती है. दुनिया में 25 जुलाई, 1978 को पहला ‘टैस्ट ट्यूब बेबी,’ लुईस ब्राउन, पैदा हुई थी. लुईस का जन्म इनविट्रो फर्टिलाइजेशन या आईवीएफ प्रक्रिया से हुआ था. ‘इनविट्रो’ शब्द का अर्थ ‘किसी के शरीर के बाहर’ है और फर्टिलाइजेशन या निषेचन वह प्रक्रिया है जहां मादा का अंडा और पुरुष के शुक्राणु को जीवन बनाने के लिए एकसाथ फ्यूज किया जाता है. इस प्रकार अंडा और शुक्राणु शरीर के बाहर महिला के गर्भाशय के बजाय एक लैब में मिलते हैं और इसे बाद में गर्भाशय में डाल दिया जाता है.

यहीं से असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टैक्नोलौजी यानी एआरटी का भी जन्म हुआ. आईवीएफ, एआरटी की कई विधियों में से सिर्फ एक प्रक्रिया है. पिछले 44 वर्षों में दुनिया तकनीकी रूप से काफी आगे निकल चुकी है जिस से कई और एआरटी विकल्प उपलब्ध हुए हैं जिन में इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजैक्शन (आईसीएसआई) और इंट्रायुटराइन इनसेमिनेशन (आईयूआई) शामिल हैं.

आइए इन चिकित्सा समाधानों को सम झते हैं ताकि विवाहित लोग अपनी बां झपन की समस्याओं के सर्वोत्तम समाधान का विकल्प चुन सकें.

जब एक दंपती 1 वर्ष से अधिक समय से स्वाभाविक रूप से बच्चा पैदा करने में असमर्थ रहें तो सर्वप्रथम उन्हें एक बां झपन विशेषज्ञ से परामर्श करना चाहिए. हालांकि यहां यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि कुछ जोड़े अपने जीवन में अपनी इच्छा से बाद में गर्भधारण करना चाहते हैं, इसलिए 1 वर्ष की अवधि सभी जोड़ों के लिए लागू नहीं होती है. इस काउंसलिंग के दौरान दंपती से मैडिकल इतिहास पर चर्चा की जाती है. यहां यह जानना भी महत्त्वपूर्ण है कि बां झपन उपचार 100% सफलता की गारंटी नहीं देता है, इसलिए जोड़ों को इस प्रक्रिया के किसी भी जोखिम और दुष्प्रभावों को पहले ही जानना चाहिए.

ब्लड टैस्ट अल्ट्रासाउंड

इस के बाद विवाहित दंपती की समस्या की जड़ को सम झने के लिए रक्त परीक्षण (ब्लड टैस्ट) और स्कैन किए जाते हैं ताकि मधुमेह, उच्च रक्तचाप या थायराइड जैसी किसी भी पूर्व मौजूदा स्थिति को सम झा जा सके. हारमोन के स्तर और अल्ट्रासाउंड की जांच के लिए ब्लड टैस्ट भी किया जाता है ताकि यह जांचा जा सके कि महिला के गर्भाशय और अंडाशय में पीसीओएस, फाइब्रौएड्स या ऐंडोमिट्रिओसिस जैसी कोई वृद्धि है या नहीं. इस से यह पता लगाने में भी मदद मिलती है कि क्या महिला के अंडाशय में अंडे हैं जिन का उपयोग इलाज के लिए किया जा सकता है?

वीर्य विश्लेषण

वीर्य तरल पदार्थ है जिस में शुक्राणु होते हैं. शुक्राणुओं की संख्या, उन के आकार और उन की गति की जांच के लिए पुरुष साथी के वीर्य का विश्लेषण किया जाता है क्योंकि ये तीनों एक जोड़े की प्रजनन क्षमता के लिए आवश्यक हैं.

फौलोअप कंसल्टेशन

इन परीक्षणों के परिणाम घोषित होने के बाद विशेषज्ञ के साथ एक फौलोअप कंसल्टेशन फिक्स की जाती है. इस में निष्कर्षों पर चर्चा की जाती है जिस के बाद उपचार पर चर्चा होती है. इस में एक सामान्य चिकित्सक या ऐंडोक्राइनोलौजिस्ट के साथ फौलोअप शामिल हो सकती है जिस में किसी भी मौजूदा बीमारी के लिए दवा शुरू करने के लिए जो प्रजनन में बाधा उत्पन्न कर रही है पर चर्चा की जाती है.

ऐसा इसलिए है क्योंकि कई मामलों में अन्य बीमारियों के ठीक होने से दंपती जोड़े स्वाभाविक रूप से ही गर्भधारण कर लेते हैं. अन्यथा रोगियों के साथ एआरटी उपचार योजना पर चर्चा की जाती है, उन की सहमति ली जाती है और फिर उपचार शुरू होता है. कुछ मामलों में रोगियों को अधिक परीक्षण कराने के लिए भी कहा जा सकता है.

अंडाशय औषधि प्रयोग

इलाज के अंतर्गत महिला साथी को हारमोनल इंजैक्शन लेने की आवश्यकता होती है. एक सामान्य मासिकधर्म चक्र में हर महीने एक निश्चित संख्या में अंडा निकलता है. चूंकि एआरटी प्रक्रिया के लिए अधिक अंडों की उपलब्धता की आवश्यकता होती है, इसलिए हारमोनल इंजैक्शन द्वारा औषधि का प्रयोग यह सुनिश्चित करता है कि कई अंडे विकसित हों. महिला साथी को नियमित रूप से रक्त परीक्षण और अल्ट्रासाउंड की मदद से देखा जाता है कि दवाओं ने उसे कैसे प्रभावित किया है. फिर एक ट्रिगर इंजैक्शन दिया जाता है ताकि अंडे परिपक्व हो जाएं.

अंडा संग्रह/डिंब पिक और वीर्य संग्रह

अंडा संग्रह के दौरान मादा को ऐनेस्थीसिया के तहत रखा जाता है. अंडे की कल्पना करने के लिए योनि के माध्यम से एक अल्ट्रासाउंड छड़ी डाली जाती है जिस के बाद उन्हें सूई के साथ एकत्र किया जाता है. उसी दिन पुरुष साथी अपने वीर्य का नमूना प्रदान करता है. इस के बाद उन की गुणवत्ता की जांच की जाती है और अगले चरण के लिए केवल सर्वश्रेष्ठ वीर्य का ही उपयोग होता है.

फर्टिलाइजेशन और भू्रण स्थानांतरण

आईवीएफ और आईसीएसआई में फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया अलगअलग होती है. आईवीएफ में कई अंडों और शुक्राणुओं को फर्टिलाइजेशन के लिए एक इनक्यूबेटर में रखा जाता है.

आईसीएसआई में एक अच्छे शुक्राणु को अंडे में डाला जाता है. किसी भी प्रक्रिया में इस प्रकार बनने वाले भू्रण को 5-6 दिन यानी तब तक विकसित होने दिया जाता है जब तक कि वे ब्लास्टोसिस्ट नामक चरण तक नहीं पहुंच जाते. इन ब्लास्टोसिस्ट्स को प्रीइंप्लांटेशन जेनेटिक टैस्टिंग (पीजीटी) का उपयोग कर के उन के आनुवंशिक मेकअप के लिए जांचा जाता है जो किसी भी आनुवंशिक रूप से असामान्य ब्लास्टोसिस्ट को हटाने में मदद करता है.

ऐसा ही एक ब्लास्टोसिस्ट भू्रण स्थानांतरण नामक प्रक्रिया की मदद से गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है. यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि एकसाथ कई भू्रण स्थानांतरित न हों वरना वे गर्भावस्था की जटिलताओं का कारण बन सकते हैं.

गर्भावस्था परीक्षण

स्थानांतरण के 12 दिनों के बाद गर्भावस्था परीक्षण किया जाता है ताकि यह देखा जा सके कि इस के परिणामस्वरूप गर्भावस्था हुई है या नहीं.

इंट्रायूटराइन इनसेमिनेशन (आईयूआई) आईवीएफ और आईसीएसआई के लिए आईयूआई चरण सही है. हालांकि आईयूआई के लिए प्रक्रिया थोड़ी अलग है. अंतर्गर्भाशयी गर्भाधान वह प्रक्रिया है जिस में अंडे को निषेचित करने के लिए सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले शुक्राणुओं को गर्भाशय में इंजैक्ट किया जाता है. यहां उद्देश्य शुक्राणुओं को जितना हो सके अंडे के करीब लाना है. यह आईवीएफ और आईसीएसआई से अलग है क्योंकि अंडाणु और शुक्राणु दोनों को बाहरी वातावरण में संभाला जाता है.

आईयूआई आमतौर पर तब किया जाता है जब महिला साथी को ऐंडोमिट्रिओसिस, ग्रीवा संबंधी समस्याएं होती हैं, पुरुष बां झपन का अनुभव करता है या युगल अस्पष्टीकृत बां झपन का अनुभव करता है. यहां वीर्य का नमूना लिया जाता है जिसे सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले शुक्राणुओं का चयन करने और मलबे और वीर्य द्रव को हटाने के लिए धोया जाता है.

ओव्यूलेशन का समय (जब हर महीने महिला के अंडाशय से अंडा निकलता है) अल्ट्रासाउंड और रक्त परीक्षण की मदद से महिला साथी की बारीकी से निगरानी की जाती है. कुछ मामलों में रोगी प्रक्रिया को प्रोत्साहित करने के लिए प्रजनन क्षमता की दवा भी ले सकता है. स्थानांतरण के 12 दिनों के बाद एक गर्भावस्था परीक्षण लिया जाता है ताकि यह देखा जा सके कि इस के परिणामस्वरूप गर्भावस्था हुई है या नहीं.

सैल्फ साइकिल एवं डोनर साइकिल

जब एआरटी प्रक्रिया महिला और पुरुष भागीदारों के अंडों और शुक्राणुओं की मदद से की जाती है तो इसे सैल्फ साइकिल कहा जाता है. कुछ जोड़ों में या तो एक या दोनों फिर साथी पर्याप्त शुक्राणु या अंडे का उत्पादन नहीं कर सकते हैं. ऐसे मामलों में डोनर की आवश्यकता होती है.

यहां या तो अंडे या शुक्राणु या फिर दोनों ही डोनर से लिए जाते हैं, जैसा भी मामला हो, उस के अनुसार प्रक्रिया की जाती है. यह एक डोनर साइकिल है. इन विकल्पों पर बां झपन विशेषज्ञ द्वारा चर्चा की जाती है और इलाज शुरू करने से पहले रोगियों की सहमति ली जाती है.

-डा. क्षितिज मुर्डिया

सीईओ और सह संस्थापक, इंदिरा आईवीएफ.

रिश्तों को जोड़ने की कड़ी हैं बच्चे

प्रिया की शादी के 1 साल तक घर वालों ने उस से मां बनने या परिवार आगे बढ़ाने को ले कर कोई बात नहीं की. इस मामले में उस के पति भी हमेशा सपोर्टिव रहे और पूछने पर यही कहा कि जब तुम चाहो सिर्फ तभी मां बनने का फैसला लेना. मगर जब शादी के कुछ साल तक बच्चा नहीं हो तो लोगों के दिमाग में सिर्फ एक ही बात आती है कि कुछ कमी होगी. प्रिया के साथ भी ऐसा ही हुआ. लोग उस में ही कमी तलाशने लगे और दबे मुंह ताने भी देने लगे.

‘बच्चा नहीं हो रहा, जरूर कुछ कमी होगी’ प्रिया को इस तरह की बातें भी सुनने को मिलने लगीं. दरअसल, आज भी कई लोगों को फैमिली प्लानिंग के बारे में कोई जानकारी नहीं है. उन्हें लगता है कि बस शादी हुई और बच्चा हो जाना चाहिए और अगर नहीं हुआ है तो जरूर कोई कमी होगी. देखा जाए तो यह कमी पुरुष में भी हो सकती है. लेकिन प्रैक्टिकली इस कमी का इशारा सिर्फ महिला की तरफ ही होता है.

इन तानों से बचने के लिए प्रिया ने शादी के करीब 2 साल बाद ही फैमिली प्लानिंग खत्म कर मां बनने का फैसला लिया. उस ने अपने पति से इस बारे में बात की. इस के बाद शुरू हुई वह कहानी जहां कई लोगों की जिंदगी एक नए रास्ते की तरफ मुड़ जाती है. प्रिया ने प्राकृतिक तरीके से प्रैगनैंट होने की काफी कोशिश की, मगर ऐसा नहीं हो सका. घर में सब उदास से रहते. सास और वह खुद भी किसी छोटे बच्चे को देखती तो दिल में हूक सी उठती. हर महीने वे 3 दिन आते और उसे फिर से निराश कर के चले जाते.

कई तरह के डाक्टरी चैकअप और इलाज के बाद भी जब कोई नतीजा नहीं निकला तब प्रिया को प्रैगनैंसी के लिए आईवीएफ की मदद लेनी पड़ी. आईवीएफ के जरीए वह जल्द ही प्रैगनैंट हो गई. फिर बहुत इंतजार के बाद जब नन्हा सा फूल उस की गोद में खेलने लगा तो घर भर में खुशी की लहर दौड़ गई. बच्चे को गोद में लेते ही सब के चेहरे पर रौनक छा जाती. वह बच्चा पूरे परिवार को जोड़ने और घर भर की खुशियों की वजह बन गया.

नई खुशी और उत्साह की वजह

सच में किसी भी परिवार के लिए बच्चे का जन्म एक नई खुशी और उत्साह की वजह बनता है. बच्चा उन के जीवन में नए रंग ले कर आता है. बच्चे के जन्म के साथ ही शादीशुदा जिंदगी में एक मजबूती आ जाती है. रिश्तों में प्रगाड़ता और घर में रौनक आ जाती है. पतिपत्नी एकदूसरे के ज्यादा करीब आते हैं. एकदूसरे की तकलीफ सम झने लगते हैं और एक अनकहा सा जुड़ाव महसूस करते हैं.

जिन मुद्दों पर शादी के बाद 2 लोगों के बीच अकसर बहस हो जाती थी, बच्चे पैदा होने के बाद वे मुद्दे कहीं खो जाते हैं. दोनों मिल कर केवल बच्चे की सेहत और उस की सुरक्षा के बारे में सोचने लग जाते हैं. बच्चे की मासूमियत के आगे घर के सारे गम फीके से लगने लग जाते हैं. लेकिन वही बच्चा जब बीमार हो जाता है तो जैसे मांबाप के दिन का चैन और रातों की नींदें ही उड़ जाती हैं.

दरअसल, बच्चे परिवार का वह हिस्सा होते हैं जो बीज से निकल कर एक छोटे से पौधे के रूप में जन्म लेते हैं. बच्चों के जन्म लेने से हर परिवार की खुशियां दोगुनी हो जाती हैं. मातापिता बच्चों की परवरिश से ले कर उन्हें बड़ा करने तक उन की सारी जिम्मेदारियां उठाते हैं. बच्चा जबजब रोता है तबतब माता अपने सारे काम छोड़ कर उस को चुप करवाने के लिए चली आती है.

बच्चा जब भी किसी वस्तु के लिए जिद करता है तो पिता समेत पूरा घर उस की हर जिद के लिए दिनरात एक कर देता है. बच्चे के जन्म के साथ ही पति का पत्नी के साथसाथ परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ भी रिश्ता और मजबूत हो जाता है.

पतिपत्नी करीब आते हैं

बच्चे का आगमन पतिपत्नी को जोड़ता है. वे एक इकाई के रूप में काम करने लगते हैं. दोनों का ध्येय अपने दिल के टुकड़े को आराम पहुंचाना और सही तरीके से उस का विकास होता देखना होता है. उन के पास एकदूसरे के साथ लड़ने का समय नहीं रहता. वे सम झने लगते हैं कि बच्चे को अपने पेरैंट्स का प्यार चाहिए. बच्चे को प्यारदुलार देने के लिए पतिपत्नी को भी करीब आना पड़ता है ताकि उसे एक खुशहाल माहौल में मां और पिता दोनों का प्यार एकसाथ मिल सके. इस तरह से एक बच्चा पतिपत्नी को दूर नहीं बल्कि करीब लाने का काम करता है.

साथ समय बिताना

नन्हे बच्चे के आने के साथ ही मातापिता की दिनचर्या बदल जाती है. वे बच्चे के साथ जागते हैं और बच्चे के साथ ही सोते हैं. उस के साथ हंसते हैं और बच्चे के रोने पर एकसाथ परेशान भी होते हैं. बच्चे का डायपर बदलने से ले कर उस के खानेपीने का इंतजाम करने और खिलौने से खिलाने, नहलानेधुलाने और बीमार पड़ने पर रातभर उस का खयाल रखने का काम भी दोनों मिल कर करते हैं और इस वजह से उन्हें ज्यादा समय साथ बिताने का मौका मिलता है.

सिर्फ मातापिता ही नहीं बल्कि दादादादी, बूआ, चाचा जैसे घर के दूसरे सदस्यों को भी बच्चे के साथ समय बिताने का मौका मिलता है और वे इसे भरपूर ऐंजौय करते हैं. इस तरह पूरा परिवार एकजुट हो जाता है.

जुड़ाव

एक बच्चे के आ जाने के बाद मांबाप उस के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहते हैं. इस दौरान उन्हें भी एकदूसरे से एक खास जुड़ाव का एहसास होने लगता है. एकदूसरे के लिए की गई छोटीछोटी कोशिश पतिपत्नी को और करीब लाने का काम करती है. बच्चे की देखभाल के बहाने पतिपत्नी कई तरह की बातें शेयर करते हैं. उन के बीच कम्यूनिकेशन मजबूत होता है और इसी के साथ उन का रिश्ता भी मजबूत होता है.

औरत के जीवन में प्रैगनैंसी यानी गर्भावस्था एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण मुकाम होता है. कुछ दंपती बच्चे की प्लानिंग करते हैं और उन का मातापिता बनने का सफर आसानी से शुरू हो जाता है, वहीं कुछ दंपतियों को कई कोशिशों के बाद भी यह खुशी मिलने में एक अरसा लग जाता है. इस के अलावा कई बार कुछ सामान्य शारीरिक दोषों की वजह से भी औरत गर्भावस्था के सुख से वंचित रह जाती है. ऐसे में आजकल पतिपत्नी यह सपना आईवीएफ के जरीए भी पूरा करने लगे हैं. यह बच्चे के लिए तरसते दंपतियों की जिंदगी में खुशियों के दीप जलाने की एक बेहतरीन और नई तकनीक है.

आइए, जानते हैं प्रैगनैंसी और आईवीएफ से जुड़ी कुछ रोचक और जरूरी बातें:

गर्भावस्था क्या है: गर्भावस्था का एहसास और इस की पूरी प्रक्रिया से ले कर बच्चे के मां के हाथों में आने तक सबकुछ इतना जादुई है कि कभीकभी यकीन करना कठिन होता है कि छोटा सा फर्टिलाइज्ड एग कैसे मां के गर्भाशय में पहुंच कर एक बच्चे का रूप ले लेता है. दरअसल, गर्भावस्था का पूरा मामला हारमोंस के एक ऐसे बायोलौजिकल डांस पर टिका होता है जिस की एक भी बीट आप को मिस नहीं करनी चाहिए वरना फिर अगले महीने का इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता है. अगला महीना यानी अगला औव्यूलेशन पीरियड.

एक सामान्य लड़की के यूटरस यानी गर्भाशय में सिर्फ 10 मिलीलिटर यानी 2 चम्मच पानी समाने जितनी क्षमता होती है. लेकिन जब गर्भावस्था का समय आता है तब इस की क्षमता बढ़ कर इतनी ज्यादा हो जाती है कि इस में लगभग 5 लिटर फ्लूड आ जाता है. गर्भाशय खुद को इतना ज्यादा फैला लेता है कि इस में बढ़ते बच्चे के लिए पूरी जगह बनने लगती है.

एक औरत के मां बनने के लिए पतिपत्नी का सिर्फ शारीरिक संबंध बनाना ही काफी नहीं है बल्कि यह संबंध महिला का औव्यूलेशन पीरियड के समय बनाना जरूरी होता है. कई लड़कियों को औव्यूलेशन पीरियड के बारे में जानकारी नहीं होती है, इसलिए मां बनने की उन की इच्छा बहुत देर से पूरी होती है.

जटिल प्रक्रिया: सामान्य रूप से गर्भावस्था एक एग और स्पर्म के मिलने की प्रक्रिया है. लेकिन वास्तव में इस के पीछे शरीर के भीतर बहुत कुछ घटित होता है. साइंस की भाषा में गर्भावस्था तब शुरू होती है जब एक फर्टिलाइज्ड एग गर्भाशय में प्रवेश करता है. यह पूरी प्रक्रिया काफी जटिल है और इस को सम झने के लिए स्पर्म और एग के बारे में सम झना जरूरी है.

स्पर्म एक प्रकार के माइक्रोस्कोपिक सैल होते हैं जो टैस्टिकल्स में बनते हैं. स्पर्म अन्य फ्लूड्स के साथ मिल कर सीमन तैयार करता है जो इजैक्यूलेशन के दौरान पुरुष जननांग से बाहर निकलता है. जितनी बार इजैक्युलेशन होता है उतनी बार लाखों की संख्या में स्पर्म निकलते हैं, लेकिन गर्भावस्था के लिए सिर्फ एक स्पर्म और एग के मिलने की जरूरत होती है. एग्स ओवरीज में होते हैं. हारमोंस जो महिलाओं के मासिकचक्र के लिए जिम्मेदार होते हैं उन की ही वजह से हर महीने कुछ एग मैच्योर हो जाते हैं.

एग के मैच्योर होने का मतलब है कि वह स्पर्म के साथ फर्टिलाइज होने के लिए तैयार है. हारमोंस की वजह से गर्भाशय की बाहरी सतह भी थोड़ी मोटी हो जाती है जिस से महिला का शरीर गर्भावस्था के लिए तैयार होता है.

औव्यूलेशन पीरियड और गर्भावस्था

मासिकचक्र शुरू होने से कुछ दिनों पहले एक मैच्योर एग ओवरी से बाहर निकलता है और फैलोपियन ट्यूब से होते हुए यूटरस में प्रवेश करता है जिसे औव्यूलेशन पीरियड कहा जाता है. इस दौरान गर्भवती होने की संभावना सब से ज्यादा होती है. इस दौरान जब स्पर्म और एग जुड़ते हैं तो इसे फर्टिलाइजेशन कहा जाता है. जब यह फर्टिलाइज्ड एग गर्भाशय की तरफ जाता है तब वह ज्यादा से ज्यादा सैल्स में विभाजित होने लगता है जिस से एक बौलनुमा आकृति बन जाती है.

कोशिकाओं की ये गेंदनुमा आकृति फर्टिलाइजेशन के 3-4 दिन बाद गर्भाशय में प्रवेश करती है. जब यह गर्भाशय की दीवार से जुड़ जाती है तो इसे इंप्लांटेशन कहा जाता है जो गर्भावस्था की औफिशियल शुरुआत होती है. इन सारी प्रक्रियाओं के करीब 9 महीने के बाद बच्चे का जन्म होता है.

कमी महिला में ही नहीं पुरुष में भी हो सकती है: जब एक फर्टिलाइज्ड एग गर्भाशय में इंप्लांट हो जाता है तब प्रैगनैंसी हारमोंस की वजह से पीरियड्स रुक जाते हैं. लेकिन अगर एग स्पर्म से नहीं जुड़ता है या फर्टिलाइज्ड एग यूटरस में इंप्लांट नहीं होता है तो पीरियड्स के साथ ये फर्टिलाइज्ड एग्स भी बाहर निकल जाते हैं और गर्भवती होने के लिए अगले महीने का इंतजार जरूरी हो जाता है.

कई बार महीनों तक कोशिश करने के बाद भी गर्भावस्था की स्थिति सामने नहीं आती. इस की वजह मोटापा और ज्यादा उम्र के अलावा पीसीओएस (पौलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) या पीसीओडी जैसे कारण हो सकते हैं. कई दफा 2 खास हारमोन प्रोजेस्टेरौन और ऐस्ट्रोजन के बीच संतुलन बिगड़ जाता है या कई बार अंडाशय में सिस्ट (गांठ) बनने लगती हैं. इस से शरीर में कई समस्याएं होने लगती हैं और गर्भ ठहरने में बाधा पहुंचती है.

शादी के बाद सबकुछ सही होने पर भी दंपती को 6 महीनों से ले कर साल तक का समय गर्भावस्था की स्थिति तक पहुंचने में लग सकता है. इस से ज्यादा समय लगने पर जरूर डाक्टर की सलाह लेनी चाहिए और उसी के अनुसार दवा व उपचार किया जाना चाहिए. कमी सिर्फ महिला में ही नहीं बल्कि पुरुष में भी हो सकती है. हालांकि इन समस्याओं का उपचार भी संभव है.

मां न बन पाने पर हत्या

हाल ही में बिहार के बगहा में संतान नहीं होने पर विवाहिता के गले में रस्सी डाल कर

हत्या का मामला सामने आया. हत्या के बाद ससुराल वाले घर छोड़ कर फरार हो गए. रामनगर थाना के भुवाल साह ने अपनी बेटी निर्मला की शादी 4 साल पूर्व बगहा नगर के कैलाश नगर निवासी भोला साह से की थी. 4 साल बीत जाने के बाद उस की कोई संतान नहीं हुई जिस को ले कर ससुराल वाले उस को प्रताडि़त करते थे, उस के साथ मारपीट करते थे और आएदिन ताने देते थे. कई बार घर से भी निकाल देते थे.

उसे घर में रखने के लिए रुपयों की मांग करते थे. सास अपने बेटे पर दूसरी शादी करने का दबाव भी बनाती थी. अंत में उन्होंने महिला की हत्या ही कर दी.

यह कोई अकेली घटना नहीं है. इस तरह की घटनाएं अकसर होती रहती हैं जब औरत पर बां झ होने का आरोप लगा कर और प्रताडि़त कर उसे दुनिया से ही रुखसत कर दिया जाता है मानों सारा दोष स्त्री का ही हो. ऐसे घर भी होते हैं जहां बच्चा न होने की वजह से घर में रोजरोज कलह होती है.

लड़ाई झगड़ों के बीच रिश्तों के बीच का प्रेम दम तोड़ने लगता है. घर में हमेशा अ

शांति और असंतुष्टि का साम्राज्य छाया रहता है. इस से भी बढ़ कर कुछ लोग तो संतान न होने पर ओ झामौलवी और बाबाओं के दर का चक्कर लगाने लगते हैं और इस तरह रहासहा सुकून और लाखों रुपए भी बरबाद करते हैं.

उपचार के कई विकल्प

भारत में बां झपन के उपचार के कई विकल्प मौजूद हैं, जिन में अंडाशय को अंडे की बेहतर गुणवत्ता के लिए स्टिम्युलेट करने की दवाएं शामिल हैं. इस के साथ अब दूरबीन से होने वाली सर्जरी में काफी तरक्की हुई है जैसे लैप्रोस्कोपी और हिस्ट्रोस्कोपी. ये न केवल समस्या का पता लगाने में मदद करती हैं, बल्कि बेहतर सफलता दर के साथ इस समस्या का उपचार भी करती हैं.

इस के अलावा कृत्रिम प्रजनन तकनीक जैसे इनविट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) मौजूद है. इस में अंडे और शुक्राणुओं को मिलाया जाता है और इन विट्रो यानी शरीर के बाहर निषेचित किया जाता है. उस के बाद उसे फिर गर्भ में स्थानांतरित कर दिया जाता है. यह तकनीक दंपतियों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है.

एआरटी जैसे आईवीएफ, आईसीएसआई आदि बां झपन के लिए एक वरदान है, मगर काफी महंगी है. इस का खर्च प्रति साइकिल करीब 1.5 से 2.5 लाख रुपए आता है जो इसे गरीबों की पहुंच से बाहर कर देता है.

कुछ समय पहले तक बेऔलाद महिलाओं को आईवीएफ की मदद से 45 साल की उम्र तक मां बनने की इजाजत थी, लेकिन लोकसभा में ‘असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टैक्नोलौजी (रैगुलेशन) यानी एआरटी बिल 2020’ पास होने के बाद संतानहीन महिलाएं आईवीएफ की मदद से 50 साल की उम्र तक मां बन सकेंगी.

एग डोनर महिलाओं को मिलने वाले मेहनताने में सुधार होगा और उन की सेहत का खयाल भी रखा जाएगा. बहुत सारी महिलाओं के शरीर में ‘एग’ की कमी होती है. इन के लिए एग डोनर की सुविधा ली जाती है.

उम्मीदों को मिली उड़ान

आज पूरे विश्व में करीब 90 लाख बच्चे आईवीएफ की मदद से जन्म ले रहे हैं. ‘इंडियन आईवीएफ मार्केट आउटलुक 2020’ की रिपोर्ट के अनुसार 2014 से 2020 के बीच आईवीएफ मार्केट में 15% की बढ़त हुई. ‘आरएनसीओएस’ बिजनैस कंसल्टैंसी सर्विसेज की इस रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ सालों में कई वजहों से इनफर्टिलिटी बढ़ी है, जिस में अधिक उम्र में शादी होना और लाइफस्टाइल को जिम्मेदार ठहराया गया है. यूनाइटेड नेशंस के डेटा के अनुसार भारत में इनफर्टिलिटी रेट बढ़ी है.

ठंड के कारण मेरी आंखों से पानी आता है, कोई इलाज बताएं?

सवाल-

ठंड के कारण मेरी आंखों से पानी आता है. धुएं के संपर्क में आते ही आंखों में चुभन महसूस होती है, जिस से और ज्यादा पानी आता है. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब-

सर्दी के मौसम में हवा में नमी की कमी के कारण आंखों से पानी आने की समस्या बढ़ जाती है. गरम चीजों या धुएं के संपर्क में आते ही समस्या और बढ़ जाएगी. वातावरण में नमी लाने के लिए ह्यूमिडीफायर का प्रयोग करें. पानी का अधिक से अधिक सेवन करें. ताजे फल व हरी सब्जियों का सेवन करें. चेहरे पर हीटर या आग की गरमी को सीधा न पड़ने दें. जब भी आंखों से पानी आए आंखों की हलके गरम कपड़े से सिंकाई करें. डाक्टर की सलाह से आई ड्रौप का इस्तेमाल करें. टी बैग की मदद से भी इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है. परेशानी ज्यादा हो तो डाक्टर से मिलें.

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अगर मौनसून में आंखों का ठीक प्रकार से ध्यान न रखा जाए तो उन में कई समस्याएं हो जाती हैं. मसलन, आंखों का सूजना, लाल होना, आंखों का संक्रमण भी हो सकता है. कंजक्टिवाइटिस, आई स्टाई, ड्राई आईज के साथसाथ कौर्नियल अल्सर होने का भी खतरा बढ़ जाता है.

मौनसून में होने वाली आंखों की प्रमुख समस्याएं हैं:

कंजक्टिवाइटिस: कंजक्टिवाइटिस में आंखों के कंजक्टाइवा में सूजन आ जाती है. उन में जलन महसूस होती है. आंखों से पानी जैसा पदार्थ निकलने लगता है.

कारण: फंगस या वायरस का संक्रमण, हवा में मौजूद धूल या परागकण, मेकअप प्रोडक्ट्स.

उपचार: अगर आप कंजक्टिवाइटिस के शिकार हो जाएं तो हमेशा अपनी आंखों को ठंडा रखने के लिए गहरे रंग के ग्लासेज पहनें. अपनी आंखों को साफ रखें. दिन में कम से कम 3-4 बार ठंडे पानी के आंखों को छींटे दें. ठंडे पानी से आंखें धोने से रोगाणु निकल जाते हैं. अपनी निजी चीजें जैसे टौवेल, रूमाल आदि किसी से साझा न करें. अगर पूरी सावधानी बरतने के बाद भी आंखें संक्रमण की चपेट में आ जाएं तो स्विमिंग के लिए न जाएं. कंजक्टिवाइटिस को ठीक होने में कुछ दिन लगते हैं. बेहतर है कि किसी अच्छे नेत्ररोग विशेषज्ञ को दिखाया जाए और उचित उपचार कराया जाए.

कौर्नियल अल्सर: आंखों की पुतलियों के ऊपर जो पतली झिल्ली या परत होती है उसे कौर्निया कहते हैं. जब इस पर खुला फफोला हो जाता है, तो उसे कौर्नियल अल्सर कहते हैं. कौर्नियल अल्सर होने पर आंखों में बहुत दर्द होता है, पस निकलने लगता है, धुंधला दिखाई देने लगता है.

Monsoon Special: आंखों की सुरक्षा है जरुरी

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

कर्म करें या व्रत

यह सोचने वाली बात है कि क्यों हर व्रत का पालन बस स्त्रियां ही करती हैं फिर चाहे वह करवाचौथ का हो, अहोई अष्टमी या वट सावित्री? क्यों बस पुरुषों की लंबी उम्र की कामना के लिए ही व्रत रखे जाते हैं? हर व्रत के साथ एक पौराणिक कथा भी जुड़ी होती है जिस कारण अधिकतर स्त्रियां इन व्रतों को बहुत ही  श्रद्धा और कड़े नियमों के साथ रखती हैं.

मान्यता तो यह भी है कि यदि पहला करवाचौथ व्रत निर्जला रखा है तो हर करवाचौथ ऐसे ही रखना होता है चाहे ऐसे व्रतों का आप के स्वास्थ्य पर कितना भी बुरा प्रभाव क्यों न पड़े.

क्या वास्तव में हर माह पूर्णिमा या निर्जला एकादशी व्रत करने से घर में शांति बनी रहती है? क्यों हम इन व्रतों पर इतनी श्रद्धा रखते हैं? क्या यह हमारी भीरुता का परिचायक नहीं है? जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने के बजाय हमारे धर्मगुरु हमें व्रत करने की सलाह देते हैं.

पढ़ेलिखे भी झांसे में

क्यों हम किसी भी कठिन समय में कर्म के बजाय व्रत को महत्त्व देते हैं? क्यों आज भी पढे़लिखे लोग इन व्रतों के जाल से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं?

इस के पीछे का कारण है उन का अंधविश्वास या फिर उन का आलस्य. किसी भी समस्या के समाधान के लिए हमें एक सुनियोजित तरीके से काम करना होता है, जिस के लिए लगती है कड़ी मेहनत और अथक प्रयास. मगर बहुत बार हमें व्रत की राह अधिक आसान लगती है क्योंकि हमें हमेशा से ही वह चीज ज्यादा आकर्षित करती है जो हमें सपनों की दुनिया में खींच ले जाती है.

वैभवलक्ष्मी के व्रत करने से धन लाभ होगा, ऐसा मान कर न जाने कितनी महिलाएं इस व्रत को करती हैं तथा सच्ची श्रद्धा से इस का उद्यापन भी करती हैं. इन व्रतों का कड़े नियम से पालन करने में और इन के उद्यापन में भी बेहद खर्चा होता है. ये व्रत हमारी जेब पर बहुत भारी पड़ते हैं. समय पर खानापीना न खा कर और रात में गरिष्ठ भोजन के कारण हमारे स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है यह तो हम सब जान ही चुके होंगे.

गहरी साजिश है यह

मेरी अपनी सास हमेशा करवाचौथ के उपवास को बहुत ही श्रद्धा के साथ रखती थीं. हर व्रत उन के पति की लंबी आयु के लिए ही होता था, फिर भी उन की चिर सुहागन की इच्छा पूरी न हो सकी.

गौर करें तो पाएंगे कि सारे व्रत केवल महिलाएं ही रखती हैं? फिर चाहे वह पूर्णमासी का व्रत हो, एकादशी का हो, अष्टमी का हो या फिर करवाचौथ का. हर व्रत के पीछे मुख्य भावना होती है परिवार की सुखशांति या फिर पुत्र अथवा पति की लंबी आयु. ये व्रतअनुष्ठान बस स्त्रियां ही क्यों रख पाती हैं क्योंकि उन्हें बचपन से ही इच्छाओं को दमन करने की शिक्षा दी जाती है. यह समाज में पुरुषों की सत्ता का दबदबा रखने के लिए भी किया जाता है.

सारे व्रत महिलाएं रखती हैं पर उन व्रतों के नियम बनाने वाले सब पंडित पुरुष ही हैं. क्यों अब तक भी पंडिताई में पुरुषों का ही वर्चस्व है? क्या इस के पीछे यह कारण तो नहीं है कि हमारा धर्म आज भी महिलाओं को एक ऐसे अंधकार में रखना चाहता है जहां पर नारी खुल कर सोच न पाए. अगर व्रत करने से जिंदगी आसान हो जाती है तो शायद ही हमें अपने आसपास कोई दुखी इनसान मिले.

जिंदगी की राह ऐसे आसान बनाइए

जो समय और ऊर्जा हमारी महिलाएं इन व्रतों को रखने में लगाती हैं, उतने ही समय में तो वे कितने ही लाभकारी कार्य भी कर सकती हैं. जो समय और ऊर्जा महिलाएं इन व्रतों को करने में लगाती हैं उतने ही समय में वे कोई लाभकारी हुनर सीख सकती हैं जो उन की जिंदगी की राह को आसान बना सकने में सक्षम रहेगा. मैं व्रतअनुष्ठानों के खिलाफ कोई मुहिम नहीं छेड़ रही हूं. मैं बस यह कहना चाहती हूं कि आप भले ही कोई भी व्रत रखें पर उसे अपनी खुशी के लिए रखें. अपने समय और स्वास्थ्य के हिसाब से आप उन के नियम और कायदों को ढाल भी लें.

Festive Special: डेजर्ट में बनाएं क्यूब ब्रेड सैंडविच

फेस्टिव सीजन प्रारम्भ हो चुका है और फेस्टिवल्स अपने साथ लाते हैं मिठाईयां भांति भांति के स्नैक्स. अक्सर त्यौहार पर वही गुलाबजामुन, काजू बर्फी, शकरपारे आदि बनाकर बोरियत होने लगती है तो ऐसे में कुछ नया बनाने कामन करने लगता है. इसके अलावा इन दिनों रेडीमेड मिठाईयां मिलावट के कारण स्वास्थ्यप्रद नहीं होतीं. इसलिए आज हम आपको ब्रेड से बनने वाली ऐसी डिश बनाना बता रहे हैं जिसे आप बड़ी आसानी से घर की सामग्री से ही बना भी लेंगी और त्यौहार पर मेहमानों के सामने अपनी कुकिंग का जलवा भी बिखेर देंगी तो आइए देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाते हैं-

-क्यूब ब्रेड सैंडविच

कितने लोगों के लिए            8-10

बनने में लगने वाला समय       30 मिनट

मील टाइप                            वेज

सामग्री

ब्रेड स्लाइस                         4

घी                                  पर्याप्त मात्रा में

शकर                              250 ग्राम

केसर के धागे                 5-6

इलायची पाउडर              1/4 टीस्पून

फुल क्रीम दूध                  1कप

मिल्क पाउडर                  3/4 कप

कटे पिस्ता                       टीस्पून

विधि

ब्रेड स्लाइस के किनारे काटकर 1 इंच के चौकोर टुकड़ों में काट लें. अब गर्म घी में धीमी आंच पर इन्हें सुनहरा होने तक तलकर बटर पेपर पर निकाल लें ताकि अतिरिक्त चिकनाई पेपर सोख ले. एक पैन में 1/4 कप पानी में शकर डाल दें. केसर के धागे और इलायची पाउडर डालकर एक तार की चाशनी बनाएं. तैयार चाशनी में तले ब्रेड के क्यूब्स 2-3 मिनट तक डालकर एक चलनी पर रख दें ताकि अतिरिक्त चाशनी निकल जाए. अब एक पैन में दूध डालकर मिल्क पाउडर डालें और अच्छी तरह चलाएं जब तक कि मिश्रण गाढ़ा न हो जाये. जैसे ही मिश्रण गाढ़ा हो जाये तो गैस बंद कर दें. जब मिश्रण ठंडा हो जाये तो 1 टीस्पून मिश्रण लेकर ब्रेड के एक क्यूब के ऊपर अच्छी तरह फैलाकर दूसरे ब्रेड क्यूब से कवर कर दें. इसी प्रकार सारे सैंडविच क्यूब तैयार करें. ऊपर से कटे पिस्ता से सजाकर सर्व करें.

9 टिप्स: डेंगू से बच्चों को बचाएं ऐसे

मौनसून में बीमारियों का खतरा सब से ज्यादा होता है क्योंकि इस समय आसपास जमा हुए पानी में मच्छर तेजी से पनपने लगते हैं, जो डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों को जन्म देते हैं. वहीं दूसरी ओर कपड़ों, दीवारों और हवा में मौजूद नमी के कारण बैक्टीरिया भी बढ़ने लगते है. ऐसे में इस मौसम में हाइजीन और मच्छरों से सुरक्षित रहना बहुत जरूरी होता है खासकर छोटे बच्चों को ले कर सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि उन के बीमार होने की संभावना अधिक होती है.

इस बारे में माइलो ऐक्सपर्ट श्वेता गुप्ता कहती हैं कि मच्छरों को भगाने में कौइल और स्प्रे जैसी चीजों का इस्तेमाल करना इफैक्टिव हो सकता है, लेकिन इस से बच्चे को हैल्थ संबंधित समस्याएं होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. इसलिए मौनसून के मौसम में बच्चे का ध्यान रखने के लिए कुछ सु झाव निम्न हैं:

– 6 माह से कम उम्र के बच्चे को मच्छरों और कीटों से सुरक्षा देने के लिए सिर्फ अच्छे कपड़ों और बैड नैट का ही इस्तेमाल करें.

– हमेशा बच्चे को उठाने से पहले हाथों को अच्छी तरह साफ कर लें. हाथों को कुछ समय के अंतराल में धोते रहें. बच्चे की इम्यूनिटी कमजोर होती है, जिस वजह से वह जल्दी बीमार पड़ जाता है. साथ ही बच्चे के हाथों को भी साफ़ रखें. असल में बच्चा जिस भी चीज को देखता है उसे मुंह में डालने की कोशिश करते है. ऐसे में बच्चे के हाथों की सफाई भी मैडिकेटेड साबुन से करनी चाहिए क्योंकि उस की त्वचा बहुत ही नाजुक होती है.

– बच्चे को कौटन के ऐसे ढीले कपड़े पहनाएं, जो उस के हाथों और पैरों को अच्छे से कवर करते हों ताकि मच्छर उस की त्वचा तक न पहुंच सकें और उस की त्वचा को हवा भी लगती रहे. ध्यान रखें कि बच्चे को कपड़े पहनाने से पहले उस का शरीर पूरी तरह से सूख चुका हो क्योंकि अकसर गीली त्वचा पर बैक्टीरिया पनपने लगते हैं जिस से त्वचा पर फंगल इन्फैक्शन होने की संभावना रहती है.

– मच्छरों को दूर रखने में मौस्किटो रेपलैंट बहुत ही इफैक्टिव तरीके से काम करता है. इस में नैचुरल पदार्थ से बने रेपलैंट होता है और ये आसानी से मच्छरों को दूर भगा सकता है, लेकिन इस का ज्यादा उपयोग फफोले, मैमोरी लौस और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है. इसलिए बच्चे की सुरक्षा के लिए डीईईटी फ्री और लैमनग्रास, सिट्रोनेला, नीलगिरी और लैवेंडर जैसी चीजों से बने रेपलैंट का ही इस्तेमाल करें.

– मौस्किटो पैचेस मच्छरों को दूर रखने में इफैक्टिव तरीके से काम करता है. आप इसे बच्चे के कपड़ों, क्रिब, बैड और स्ट्रौलर पर लगा सकते हैं.

– अपने बच्चे के स्ट्रौलर, कैरियर या क्रिब को मच्छरदानी से कवर कर दें ताकि मच्छर आप के बच्चे तक न पहुंच सकें. आप घर के अंदर और बाहर जाने पर भी मच्छरदानी का उपयोग कर सकते हैं. ऐसा करने से मच्छर आप के बच्चे की त्वचा तक नहीं पहुंच पाएंगे.

– घर में साफसफाई का विशेष तौर पर ध्यान रखें. एसी की पानी की ट्रे, प्लांट गमलों में पानी आदि किसी जगह पर पानी जमा न होने दें. यहां तक कि वाशरूम में बालटी में पानी भर कर न रखें. अगर कहीं से पानी लीक होता हो तो उस का भी ध्यान रखें. दरअसल, जमे हुए पानी में मच्छर और कीड़े तेजी से पनपते हैं.

– भले ही आप का घर कितना ही साफ क्यों न हो, लेकिन आप अपने बच्चे को किसी भी चीज को मुंह में रखने से नहीं रोक सकते. इसलिए यह जरूरी है कि आप के बच्चे के संपर्क में आने वाली हर चीज साफ हो, खासकर खिलौने. आप जहां ठोस खिलौनों को साबुन की मदद से धो सकते हैं, वहीं सौफ्ट खिलौनों को वौशिंग मशीन में धो सकते हैं.

– बेबी वाइप्स के साथ उस साबुन का ही इस्तेमाल करें जो आप के बच्चे की नाजुक त्वचा के अनुकूल हो. न्यू बौर्न बेबी के लिए अल्कोहलफ्री और पानी पर आधारित वाइप्स का ही उपयोग करें क्योंकि इस तरह कि वाइप्स बच्चे की त्वचा को खासतौर पर पोषण देती है.

– अगर आप के बच्चे को डेंगू हो जाता है, तो उस के लक्षणों पर नजर रखें ताकि उसे सही ट्रीटमैंट दिया जा सके. बुखार, उलटी, सिरदर्द, मुंह का सूखापन, पेशाब में कमी, रैशेज और ग्रंथि में सूजन आना आदि कुछ आम लक्षण हैं. इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. बच्चे में इन में से कोई भी लक्षण दिखने पर तुरंत डाक्टर से संपर्क करें.

इस छोटी उम्र में बच्चे अपना खयाल खुद नहीं रख सकते हैं. बीमारियों से बचने के लिए उन्हें खास केयर की जरूरत होती है. इसलिए इस मौनसून में आप इन टिप्स को फौलो कर अपना और अपने परिवार का बेहतर तरीके से खयाल रख सकती हैं.

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