family story in hindi
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हौलीवुड इंडस्ट्री में इन दिनों ऐक्टर जौनी डेप और उन की एक्स वाइफ एंबर हर्ड का वैवाहिक विवाद आए दिन नई खबरों के साथ सुर्खियों में है. जौनी डेप और एंबर हर्ड की तरफ से एकदूसरे पर कई आरोप लग चुके हैं. एंबर हर्ड ने जहां डेप पर घरेलू हिंसा का केस दर्ज कराया है, वहीं जौनी डेप ने एंबर हर्ड पर मानहानि का केस किया है.
एंबर हर्ड की तरफ से हाल ही में उन की डाक्टर डौन ह्यूज कोर्ट में पेश हुई थीं और जौनी डेप पर गंभीर आरोप लगाए थे. डौन ह्यूज का कहना था कि जौनी डेप एंबर हर्ड से जबरन सैक्स करते थे और हिंसक हो जाते थे. जॉनी डेप हमेशा नशे में रहते थे और एक दिन भंयकर नशे में एंबर हर्ड को बेड पर पटक कर उन का गाउन फाड़ दिया फिर उन के साथ जबरन सैक्स करने की कोशिश की.
जब एंबर हर्ड ने इस का विरोध किया तो जौनी डेप ने उन के साथ मारपीट की. यही नहीं जौनी डेप जब भी गुस्से में होते थे तो वे एंबर हर्ड को जबरन ओरल सैक्स करने पर मजबूर करते थे. डेप नहीं चाहते थे कि एंबर हर्ड फिल्मों में बोल्ड सीन करें.
एंबर ने यह भी खुलासा किया कि जौनी ने शराब की बोतल से उन का यौन उत्पीड़न किया था. शादी के तुरंत बाद उन्हें मारने की धमकी भी दी थी. कोर्ट में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार 2013 में जौनी डेप ने एंबर हर्ड के साथ मारपीट की और फिर उन की चीजों को भी जलाया था. इस के अलावा 2014 में उन्होंने एंबर हर्ड के साथ प्लेन में भी बुरा बरताव किया था, जबकि डेप के वकील की दलील थी कि एंबर हर्ड को हिंसा और टकराव की आदत और जरूरत थी. एंबर अकसर डेप के खिलाफ अपमानजनक, चुभने वाली, टौक्सिक और हिंसात्मक बातें करती थीं.
हाल ही में जौनी ने अपनी ऐक्स वाइफ पर मानहानि का मामला दर्ज कराया है, जिस की सुनवाई अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में 11 अप्रैल से चल रही है. जौनी डेप ने एंबर पर 50 मिलियन डौलर का मुकदमा दायर किया है. जौनी ने दावा किया है कि एंबर ने वाशिंगटन पोस्ट के लिए 2018 के एक औप एड में उन्हें बदनाम करने के लिए लेख लिखा था. उन का दावा है कि इस लेख ने उन के फिल्मी कैरियर और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया. अभिनेता को ‘फैंटास्टिक बीस्ट्स’ फिल्म फ्रैंचाइजी से हटा दिया गया. वहीं एंबर के वकीलों का कहना है कि यह जौनी के लिए नहीं लिखा गया था.
क्या है पूरा मामला
58 साल के जौनी डेप ने अपनी पूर्व पत्नी और अभिनेत्री एंबर हर्ड पर मुकदमा किया है. ‘पाइरेट्स औफ कैरिबियन’ फिल्म और एक सीरीज में काम कर चुके अभिनेता जौनी डेप 3 बार औस्कर अवार्ड के लिए नामांकित हो चुके हैं और गोल्डन ग्लोब अवार्ड जीत चुके हैं. जौनी डेप और एंबर हर्ड 2011 में फिल्म ‘द रम डायरी’ के सैट पर मिले थे जो प्यूर्टो रिको में शूट हुई थी.
कुछ साल बाद दोनों दोबारा फिल्म की पब्लिसिटी के दौरान मिले और वहीं से दोनों का रिश्ता शुरू हुआ. इस के बाद दोनों एकदूसरे को डेट करने लगे और फरवरी, 2015 में शादी कर ली. लेकिन दोनों ज्यादा दिनों तक साथ नहीं रहे. 2016 में ही दोनों ने तलाक की अर्जी दे दी. जौनी डेप ने तलाक के बाद एंबर को 7 मिलियन डौलर दिए जिस पर एंबर ने कहा कि वे इस राशि का दान करना चाहती हैं.
बाद में 2018 में एंबर ने वाशिंगटन पोस्ट अखबार में एक लंबाचौड़ा लेख लिखा था कि वे घरेलू हिंसा की शिकार हुई हैं. हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था. लेकिन जौनी डेप ने कहा कि यह लेख उन की मानहानि करता है और इस से उन के कैरियर पर असर पड़ा है. इसी के बाद जौनी डेप ने अपनी पूर्व पत्नी पर 50 मिलियन डौलर का मुकदमा दायर कर दिया. बदले में एंबर ने भी 100 मिलियन डौलर का केस किया है.
जब पूनम पांडे ने खो दी सूंघने की क्षमता
बोल्ड और बिंदास पूनम पांडे ने हाल ही में रिऐलिटी शो ‘लौकअप’ में अपनी पर्सनल लाइफ को ले कर बड़ा खुलासा किया. पूनम ने बताया कैसे उन के ऐक्स हसबैंड सैम बौंबे उन के साथ मारपीट करते थे. इस वजह से पूनम को ब्रेन हैमरेज तक हो गया था और इस से उन की सूंघने की क्षमता चली गई.
पूनम पांडे ने 2020 में सैम बौंबे से शादी की थी. दोनों लंबे वक्त से एकदूसरे को डेट कर रहे थे. पूनम पांडे और सैम बौंबे की शादी होने के साथ ही विवादों में आ गई थी. गोवा में हनीमून के दौरान ऐक्ट्रैस ने सैम को मारपीट, प्रताड़ना के आरोप में जेल भिजवा दिया था. बाद में दोनों का पैचअप हो गया. लेकिन कुछ वक्त बाद पूनम और सैम के बीच फिर से लड़ाई?ागड़े होने लगे. पूनम ने सैम बौंबे को घरेलू हिंसा के आरोप में दोबारा जेल भिजवाया. इस बार पूनम को गंभीर चोट की वजह से अस्पताल में भरती होना पड़ा था. अब दोनों अलग हो चुके हैं.
पूनम का आरोप था कि सैम उन्हें डौमिनेट करते थे. घर में पूनम को एक से दूसरे कमरे तक में जाने की इजाजत नहीं थी. सैम जिस रूम में होते थे वे पूनम को भी उसी रूप में चाहते थे. अपने खुद के घर में अपना फोन छूने की इजाजत नहीं थी जबकि सैम पूनम के सभी आरोपों को गलत बताते हैं.
ग्लैमर की दुनिया से अकसर ऐसी घरेलू हिंसा की खबरें आती रहती हैं:
करिश्मा कपूर संजय कपूर
हिंदी सिनेमा जगत के सब से पावरफुल फैमिली से ताअल्लुक रखने वाली करिश्मा कपूर खानदान की पहली फीमेल सुपरस्टार रहीं. 2003 में करिश्मा ने बिजनैसमैन संजय कपूर से शादी कर ली. जिस वक्त करिश्मा ने शादी की तब वे अपने कैरियर के पीक पर थीं. 11 साल की शादी से दोनों के 2 बच्चे भी हैं. लेकिन 2014 में जब अभिनेत्री ने तलाक की अर्जी दी तब सचाई सामने आई कि वे घरेलू हिंसा का शिकार रह चुकी हैं. करिश्मा ने पति संजय कपूर और उन के घर वालों पर घरेलू हिंसा करने की बात कही तो वहीं संजय ने भी करिश्मा पर कई आरोप लगाए. करिश्मा संजय की दूसरी पत्नी थीं.
बकौल करिश्मा संजय उन से शादी के बाद भी पहली पत्नी के संपर्क में थे. यहां तक कि जब वे अपने हनीमून पर थीं तो संजय ने उन्हें अपने दोस्त के साथ शारीरिक संबंध बनाने को कहा. न कहने पर मारपीट की गई.
पूजा भट्ट रणवीर शौरी
पूजा भट्ट की गिनती बौलीवुड की बोल्ड अभिनेत्रियों में होती थी. एक समय वे अभिनेता रणवीर शौरी के साथ लिव इन में रहती थीं. लेकिन फिर एक दिन दोनों का ब्रेकअप हो गया. पूजा के अनुसार, रणवीर बहुत ही ज्यादा वायलैंट थे. शराब पर उन का कोई कंट्रोल नहीं था और जब भी पूजा इन सब बातों पर रणवीर को रोकती थीं तो दोनों के बीच बहस होती. तब रणवीर उन के साथ मारपीट भी करते.
प्रीति जिंटा नेस वाडिया
डिंपल गर्ल के नाम से मशहूर प्रीति जिंटा ने बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड के बाद भी बौलीवुड में ऐक्टिंग की छाप छोड़ी. वे इतनी बोल्ड और मुखर थीं कि कैरियर के शुरुआती दिनों में ही अंडरवर्ल्ड से पंगा ले लिया. प्रीति ने छोटा शकील के खिलाफ कोर्ट में गवाही दी थी. 2005 में वे बौंबे डाइंग के उत्तराधिकारी नेस वाडिया के साथ रिश्ते में आईं. लंबे समय तक रिश्ते में रहने के बाद फिर एक दिन दोनों के ब्रेकअप की खबर सामने आ गई. 13 जून, 2014 को प्रीति ने अपने ऐक्स बौयफ्रैंड नेस वाडिया पर अपने साथ छेड़छाड़ करने, गालियां देने और आईपीएल मैच के दौरान धमकी देने के आरोप लगाए थे.
युक्ता मुखी प्रिंस तुली
युक्ता मुखी ने 1999 में मिस इंडिया और मिस वर्ल्ड का खिताब जीता. फिर वहां से उन के लिए बौलीवुड का दरवाजा खुला. हालांकि वे बौलीवुड में सफलता हासिल नहीं कर पाईं. 2008 में युक्ता ने न्यूयौर्क बेस्ड बिजनैसमैन प्रिंस तुली से शादी कर ली. लेकिन दोनों की शादी 5 साल से ज्यादा नहीं टिकी. 2013 में युक्ता ने मुंबई में पति प्रिंस तुली के खिलाफ घरेलू हिंसा का केस दर्ज कराया. एफआईआर में मारपीट, दहेज प्रताड़ना, अननैचुरल सैक्स जैसी बातें कही गईं. बात कोर्ट तक पहुंची. फिर दोनों ने सहमति से तलाक ले लिया. दोनों का 1 बेटा है जिस की कस्टडी युक्ता के पास ही है.
सोचने वाली बात है कि यदि बोल्ड और ग्लैमरस ऐक्ट्रैसेस को इस का शिकार होना पड़ता है तो फिर सामान्य घरेलू या कामकाजी महिलाओं के साथ क्या होता होगा.
‘नैशनल फैमिली हैल्थ रिपोर्ट’ के मुताबिक हर 3 में से 1 महिला घरेलू हिंसा की शिकार है. रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में महिलाओं पर घरेलू हिंसा के केस बढ़े हैं. भारत में 59% महिलाओं को बाजार, हौस्पिटल या गांव से बाहर जाने की इजाजत नहीं मिलती है. 79% महिलाएं पति के जुल्म चुपचाप सहती हैं.
देश में महिलाओं की उम्र बढ़ने के साथ ही उन पर घरेलू हिंसा भी बढ़ती जाती है. 18-19 साल की 17% महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हैं, जबकि 40 से 49 साल की 32% महिलाओं को यह दंश ?ोलना पड़ रहा है. एनएफएचएस जेड की रिपोर्ट के अनुसार, 79.4% महिलाएं कभी अपने पति के जुल्मों की शिकायत नहीं करतीं.
सैक्सुअल हिंसा के केस में तो 99.5% महिलाएं चुप्पी साध लेती हैं. जिन के पति अकसर शराब पीते हैं ऐसी 70% महिलाओं हिंसा झेलती है. 23% महिलाएं ऐसी भी हैं जिन के पति शराब नहीं पीते फिर भी हिंसा का शिकार होती हैं. शहरों के मुकाबले गांवों में घरेलू हिंसा ज्यादा होती है.
देश के 22 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामलों में सब से बुरा हाल कर्नाटक, असम, मिजोरम, तेलंगाना और बिहार का है, जहां 30% से अधिक महिलाओं को अपने पति द्वारा शारीरिक और यौन हिंसा का सामना करना पड़ा है.
मगर गौर करने की बात यह है कि भारत में वैवाहिक हिंसा की शिकार सिर्फ पत्नियां ही नहीं हैं, 10% पति भी हिंसा के शिकार हो रहे हैं. एनएफएचएस सर्वे से यह खुलासा हुआ है.
एनएफएचएस के सर्वे में यह भी खुलासा हुआ है कि देश की 45% महिलाएं मानती हैं कि अगर पत्नियां अपने कर्तव्य ठीक से नहीं निभाती हैं तो उन पर घरेलू हिंसा जायज है, जबकि 44% पुरुष इस से सहमत दिखे. सैक्स सो से मना करने पर भी महिलाएं ही सब से अधिक महिलाओं की पिटाई के पक्ष में हैं.
घरेलू हिंसा के कारण
घरेलू हिंसा अकसर उसी के साथ होती है जो कमजोर है या जिसे सहने की आदत हो. महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा का मुख्य कारण यह मानसिकता है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में शारीरिक और भावनात्मक रूप से कमजोर होती हैं. सामान्यतया महिला का आर्थिक रूप से पति या परिवार पर निर्भर होना इस की मुख्य वजह बनता है.
घरेलू हिंसा के मामलों के बारे में जानकारी न होना भी इस का एक बड़ा कारण है. इसी वजह से सही मेल न होने का नतीजा यह होता है कि कभी दहेज के नाम पर तो कभी शक के आधार पर पति उस पर हाथ उठाने लगते हैं. घर वाले भी उस के कामों में कमियां गिनाते हुए उसे टौर्चर करने लगते हैं.
मायके से पैसे मंगवाने से इनकार करने, पति के साथ बहस करने, उस के साथ यौन संबंध बनाने से इनकार करने, बच्चों की उपेक्षा करने, पति को बताए बिना दोस्त से मिलने के लिए घर से बाहर जाने, स्वादिष्ठ खाना न बनाने जैसी तोहमतें लगा कर उस के साथ मारपीट की जाती है. कभीकभी विवाहेतर संबंध होना, ससुराल वालों की देखभाल न करना या बां?ापन भी परिवार के सदस्यों द्वारा उस पर हमले का कारण बनता है. अगर कामकाजी है तो उस की तरक्की भी इस की वजह बन सकती है.
घरेलू हिंसा का एक बड़ा कारण शराब भी है. एक व्यक्ति जब नशे की हालत में होता है तो उसे पता नहीं होता कि वह क्या कर रहा है. अगर लोग शराब पीना छोड़ दें तो घरेलू हिंसा बहुत कम हो सकती है. तालमेल का अभाव भी घरेलू रिश्ते में दरार बढ़ाता है. इस के लिए आपसी भरोसा होना आवश्यक है, जो रिश्ते में मजबूत स्तंभ का काम करता है.
ज्यादातर औरतों को लगता है कि पुरुषों से पिटना औरतों की नियति है. यही वजह है कि घरेलू हिंसा के मामले अधिकतर तो रिपोर्ट ही नहीं होते. इस हिंसा के वही मामले रिपोर्ट होते हैं जिन में हिंसा गंभीर किस्म की होती है. पत्नी के साथ घर में मारपीट, प्रताड़ना और समान रूप से व्यवहार नहीं होना घरेलू हिंसा है. लेकिन इसे रिपोर्ट नहीं किया जाता. ऐसे मामले मैट्रो शहरों में तो सामने आ जाते हैं, लेकिन छोटे शहरों, कसबों और गांवों से इस तरह के मामले रिपोर्ट नहीं होते.
समाज का रवैया भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है. पति या परिवार की शिकायत ले कर पुलिस में जाने वाली महिला को समाज में अच्छी नजरों से नहीं देख जाता. फिर भी वह शिकायत करती है तो अकसर उसे कोई समर्थन नहीं मिलता और वह अकेली पड़ जाती है. इस के बाद उस के पास सम?ाता करने के सिवा कोई रास्ता नहीं होता.
महिलाओं के खिलाफ अपराधों में दंड दिए जाने की दर महज 23.7% है. वहीं इस तरह के मामलों के लंबित होने का प्रतिशत 91.2 है. इस का कारण विशेष अदालतों की कमी, पुलिस जांच में ढिलाई, गवाहों का सामने नहीं आना, समाज का नकारात्मक रुख और अदालतों का दूर होना है.
घरेलू हिंसा कानून में कहा गया है कि
3 दिनों के अंदर मामले की सुनवाई होगी और
60 दिनों के अंदर अंतिम आदेश आएगा. लेकिन असल में तो पहली सुनवाई के लिए ही महीनों लग जाते हैं. अंतिम आदेश आने में सालों निकल जाते हैं. मुकदमे लंबे चलते हैं, इसलिए वे थक कर पीछे हट जाती हैं.
महिलाओं को मैडिकल टैस्ट की जानकारी नहीं होती. वे समय रहते टैस्ट नहीं कराती हैं, जिस से हिंसा के सुबूत ही नहीं मिल पाते हैं.
घरेलू हिंसा के प्रभाव
यदि किसी महिला ने अपने जीवन में घरेलू हिंसा का सामना किया है तो उस के लिए इस डर से बाहर आ पाना अत्यधिक कठिन होता है. लगातार काफी समय तक घरेलू हिंसा का शिकार होने के बाद व्यक्ति की सोच में नकारात्मकता हावी हो जाती है. इस से पीडि़त व्यक्ति अकसर या तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है या फिर अवसाद का शिकार हो जाता है.
जिन लोगों पर हम इतना भरोसा करते हैं और जिन के साथ रहते हैं जब वही हमें इस तरह का दुख देते हैं तो व्यक्ति का रिश्तों पर से विश्वास उठ जाता है और वह स्वयं को अकेला कर लेता है. कई बार इस स्थिति में लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं.
जिस घर में घरेलू हिंसा होती है या जिन बच्चों के साथ ऐसा होता है वे अपने पिता से गुस्सैल व आक्रामक व्यवहार सीखते हैं. ऐसे बच्चों को अन्य कमजोर बच्चों व जानवरों के साथ हिंसा करते हुए देखा जा सकता है. वहीं बेटियां दब्बू, चुपचुप रहने वाली या परिस्थितियों से दूर भागने वाली बन जाती हैं.
समाधान के उपाय
हमारे समाज में जिस तरह लड़कों में बचपन से मर्दानगी की भावना भरी जाती है और उसी के ओट में वे अपनी पत्नियों पर हाथ आजमाते हैं, यह निहायत ही निंदनीय मानसिकता है. अब समय आ गया है कि लड़कों को रुलाने वाला न बना कर सुरक्षा देने वाला पिलर बनाया जाए. उन के मन में बचपन से उदारता और औरतों के लिए इज्जत की भावना विकसित की जाए ताकि बड़ा हो कर वे पत्नियों को इज्जत दे सकें.
कुरीतियों को खत्म करें
घरेलू हिंसा पर रोक लगाने के लिए महिलाओं को शिक्षित करना एक उपाय हो सकता है. इस के साथसाथ हमें उस पुरुषप्रधान सत्ता का भी अंत करना होगा जो सदियों से चली आ रही है. हमें समाज की उन कुरीतियों को दूर करना होगा जो घरेलू हिंसा को बढ़ाती हैं जैसे पुत्र न होने पर महिला की उपेक्षा की जाती है, मासिकधर्म के दौरान उस से दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है. दहेज के नाम पर टौर्चर किया जाता है. समाज में लैंगिक समानता की सोच विकसित करना आवश्यक है.
शीघ्र न्याय जरूरी
महिलाओं की सुरक्षा व संरक्षण के लिए बने कानूनों का सफल क्रियान्वयन जरूरी है. किसी महिला का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक या यौन शोषण किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाना जिस के साथ महिला के पारिवारिक संबंध हैं घरेलू हिंसा में शामिल है. घरेलू हिंसा पर तभी रोक लगाई जा सकती है जब अन्याय का शिकार होती महिलाओं को शीघ्र न्याय मिले.
नारी स्वावलंबन जरूरी
जो नारियां घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं उन्हें स्वावलंबी बनाया जाए. इस से उन में आत्मविश्वास बढ़ेगा जिस से वे किसी भी घरेलू हिंसा का मुकाबला कर सकेंगी. शिक्षित, स्वावलंबी नारी ही समाज को शक्तिशाली बना सकती है. जब लड़की अपने पैरों पर खड़ा होने लायक हो तभी उस का विवाह किया जाना चाहिए.
टीवी के हिट सीरियल्स में एक ‘अनुपमा’ (Anupamaa) के मेकर्स ने हाल ही में समर यानी एक्टर पारस कलनावत (Paras Kalnawat) को शो से बाहर करने की खबर फैंस को दी थी. वहीं एक्टर के शो से जाने के बाद फैंस नया समर कौन होगा. इसे जानने के लिए बेताब हैं. वहीं अब खबरें हैं कि मेकर्स ने नया समर ढूंढ लिया है. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…
मेकर्स ने चुना ये एक्टर
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‘अनुपमा’ के सेट से खबरें हैं कि मेकर्स को नया समर मिल गया है. दरअसल, कहा जा रहा है कि सीरियल ‘अपनापन’ में नजर आ चुके एक्टर सुवांश धर को इस रोल के लिए अप्रोच किया गया है. वहीं खबर वायरल होते ही पेशे से एक्टर और मॉडल सुवांश धर की फोटोज सोशलमीडिया पर वायरल हो रही हैं. वहीं पारस कलनावत के बाद सुवांश को देखने के लिए एक्साइटेज नजर आ रहे हैं. हालांकि मेकर्स और एक्टर की तरफ से इस खबर कोई पुष्टि नहीं की गई है.
इस कारण बाहर हुए पारस कलनावत
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हाल ही में झलक दिखला जा 10 का हिस्सा बनने की खबरों के बाद मेकर्स ने एक्टर पारस कलनावत को शो से बाहर करने का फैसला लिया है. वहीं निर्माता राजन शाह का कहना है कि उन्होंने एक्टर के कौंट्रेक्ट तोड़ने के चलते यह फैसला किया है. हालांकि एक्टर का कहना है कि हां उनकी गलती थी कि उन्होंने पहले मेकर्स को इस बारे में खबर नहीं दी. लेकिन उन्होंने सोचा था कि शो साइन करने के बाद वह मेकर्स से बात करेंगे. वहीं अपने रोल को लेकर एक्टर का कहना है कि इन दिनों समर के ट्रैक पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है.
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पाखी और अनुज पर है फोकस
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सीरियल अनुपमा में इन दिनों शाह और कपाड़िया परिवार पर फोकस होता हुआ दिख रहा है. जहां अधिक और पाखी के कारण अनुपमा और वनराज परेशान दिख रहे हैं. वहीं हाल ही के प्रोमो में अनुज का अनुपमा की जिंदगी से दूर जाने से फैंस परेशान हो गए हैं.
परी हूं मैं……, जानम समझा करों…. जैसी एलबम बनाकर चर्चा में आने वाले सिंगर, कंपोजर, प्रोड्यूसर लेस्ली लुईस कहते है कि अबतक मैंने बहुत सारा काम दूसरों के लिए किया है, लेकिन अब मैं अपने लिये कुछ करना चाहता हूं. लेस्ली उस समय के रॉक & पॉप गानों से परिचय करवाने वाले पहले कंपोजर है. उनके पिता पी एल रॉय एक तबला वादक और कोरियोग्राफर थे, इससे उनके घर में संगीतकारों का आना-जाना होता था, जिससे उन्हें संगीत में रूचि बढ़ी और वे इस क्षेत्र में आ गए.
गजल गायक हरिहरन के साथ मिलकर कोलोनियल एलबम बनाने वाले लुईस ने आशा भोसले, केके समेत कई गायकों के साथ उन्होंने काम किया, लेकिन, अब वे खुद के गीतों को अपनी आवाज में संगीतबद्ध करना चाहता है. उन्हें लगता है कि अगर गायक और संगीतकार एक हो, तो वह गीत के संगीत के साथ ज्यादा न्याय कर सकता है, ऐसे में कोशिश है कि फिल्मों के लिए ज्यादा से ज्यादा गाऊं. आज एलबम का दौर खत्म हो रहा है और टेलीविजन गैर फिल्मों गीतों को ज्यादा प्रोत्साहित नहीं करता.
सवाल –क्या नए जेनरेशन की शिष्या काव्या जोन्स के साथ गाना गाने में किसी प्रकार की परेशानी हुई?
जवाब – इसमें लगन और मेहनत करने की एक धुन है. वह सबके पास नहीं है. आज के जेनरेशन फ़ास्ट फ़ूड की तरह सब कुछ फ़ास्ट-फ़ास्ट करना चाहती है, एक जगह टिक कर धैर्य के साथ काम नहीं करती. यहाँ वहां भटकती है और किसी भी संगीत को पूर्ण रूप से सीख नहीं पाती. अगर मैं कभी नए बच्चों से उनके घराना, क्या सीखा, उनकी जड़े कहाँ की है, पूछता हूं, तो उन्हें समझ में नहीं आता, लेकिन काव्या हर दिन, वक्त, मीटिंग, शो में मेरे साथ रहने पर उसे मेरे घराने को समझने में आसानी रही और उसी के अनुसार वह सीख रही है.
सवाल – आज के यूथ रैप अधिक करते है, जिसमे न तो मेलोडी होती है और न ही धुन, इसे कैसे लेते है, जबकि आप भी वेस्टर्न संगीत के ही प्रसंशक है?
जवाब – संगीत की भाषा पूरे विश्व में हर जगह एक ही होती है, सुर सबमेंप्रधान होता है और मेलोडी संगीत में होना जरुरी है, क्योंकि भाषा कोई भी हो, सभी संगीत की शुरुआतओम से होती है, स्वर हमारे हृदय में है. पूरा यूनिवर्स ओम पर चलता है, उसी से ही मेलोडी बनती है, जो सुनने में अच्छा लगता है. इसी मेलोडी में अगर शब्द जोड़ दिए जाय, तो उस गाने को सुनने में और भी सुंदर लगता है. शब्द न समझने पर मेलोडी से उस गाने को सुना जा सकता है. मेरे नये गाने में पॉप के साथ-साथ मेलोडी भी है. रैप में अगर कुछ बोला जा रहा है, तो उसे सुनना पड़ता है, थोड़े दिन अच्छा लगता है, बाद में सुनना कोई पसंद नहीं करता. मेलोडी जीवन पर्यंत रहेगी. 1940, 50 60,70,80,90 की फिल्मों के गाने जिसे लता मंगेशकर,आशा भोसलें, किशोर कुमार आदि ने गाये है, उनके गाने आज भी सुने जाते है. सभी गाने आज रिमिक्स हो रही है, क्योंकि उनके पास मेलोडी है. रैप नहीं चल सकती, क्योंकि ये एटीट्यूड दिखाती हुई संगीत है, जो आगे चलकर नीरस लगती है.
सवाल –भारतीय संस्कृति में रॉक और पॉप को परिचय कराना कितना कठिन था?
जवाब – पॉप मीठा संगीत है, क्योंकि पोपुलर गाने को पॉप कहते है. पॉपुलैरिटी की वजह मेलोडी का होना है, हर व्यक्ति उसे सुनना चाहता है, जिसमें जानम समझा करों….. जैसे गाने है. रॉक में एक एटीट्यूड होती है, जो सुनने में थोड़ा हार्श लगता है. नई जेनरेशन एंटी एस्टाब्लिशमेंट को पसंद करती है. हमारे देश में गाने में मिठास सभी पसंद करते है. रॉक म्युजिक में एंग्री यंग मैन वाली फीलिंग होती है. के के सिंगर के लिए मैंने थोड़ा रॉक अपनाया था, जो सबको बहुत पसंद आया. 90 के दशक में लोग बहुत पसंद नहीं करते थे, लेकिन अब नई जेनरेशन इसे अधिक पसंद करने लगे है. इन्टरनेट होने की वजह से संगीत का विकास अधिक हुआ है.
सवाल –गानों में शब्दों का प्रयोग मनमर्जी तरीके से होता है, जिसका अर्थ नहीं निकलता, बेतुकी लगती है, आप की सोच इस बारें में क्या है?
जवाब – इस जेनरेशन के बच्चे उर्दू नहीं समझते, इसलिए उन्हें केवल तुकबंदी कर ही लिरिक बनाना आता है. मेरी गानों में आम जनता की भाषा को प्राथमिकता दी गयी है. हिंदी फिल्मों के गानों में भी अब वही शुरू हो चुका है, मसलन क्या बोलती तू…..क्या मैं बोलूँ…. ऐसे शब्द आज के यूथ समझते है, लेकिन कुछ अच्छे शब्द के अर्थ उन्हें पता नहीं होता, मैंने कई गानों के साथ ऐसा महसूस किया है.
सवाल – आपने कई बड़े सिंगर और फिल्मों के लिए संगीत दिए है, आज के जेनरेशन के साथ कुछ करने की इच्छा रखते है क्या ?
जवाब – मैंने कई बड़े सिंगर्स के साथ काम किया है, लेकिन लेस्ली लुईस के लिए नहीं किया अब उनके लिए करूँगा (हँसते हुए). मैं शोज में गाना गाने पर मेरी आवाज को सुनकर चौक जाते है. मैंने सबके लिए गाने बनाई, पर अपने लिए नहीं बनाया.
सवाल – संगीत में आने की प्रेरणा कैसे मिली?
जवाब – मेरे पिता कोरियोग्राफर के अलावा तबला बजाते थे, उन्हें संगीत का बहुत शौक था. घर पर जाकिर हुसैन, उनके पिता भी मेरे घर आते थे. संगीत का माहौल था. डांस और गायकों का हमेशा आना-जाना रहता था. इसके अलावा शास्त्रीय डांस के लिए शास्त्रीय गायक होना चाहिए, जिससे संगीत का मेल डांस के लिए ठीक हो. संगीत के इस माहौल में रहने पर मुझे धीरे-धीरे संगीत से प्यार होने लगा और इस क्षेत्र में आ गया. अच्छी बात यह रही कि मुझे अच्छे कलकारों का साथ मिला. अभी तकनीक का दौर है, इसमें सभी को वैसे ही जाना है. फिर चाहे, इन्स्टाग्राम हो या यू ट्यूब सभी पर यूथ कुछ न कुछ कर छोड़ते है, जिसे लोग पसंद कर रहे है. संगीत को सिम्पल form में यूथ के पास लेकर आना है.
सवाल – आगे की योजनायें क्या है?
जवाब – अभी मैं स्वतंत्र आर्टिस्ट के रूप में काम कर रह हूं. मेरे गाने को खुद गाता और लिखता हूं.
सवाल – अपने जीवन की यादों को शेयर करें, जिसे अभी भी आप याद करते है?
जवाब – 17 साल की उम्र में मैं गिटार बजाना चाहता था, उन्होंने मुझे राहुल देव बर्मन के पास भेजा, वहां आशा भोसलें और आर डी बर्मन थे. वहां मेरे पिता ने मेरा परिचय बी कॉम फेल कहकर किया, इस पर आशा भोसले ने मुझे बहुत समझाया और अच्छी पढाई करने की सलाह दी, लेकिन अंत में मैंने ही उनकी एलबम ‘राहुल एंड आई” बाद में बनाई, जिसे सभी ने पसंद किया.
सवाल – 75 साल की इंडिपेंडेंट हुए देश के बारें में आपकी राय क्या है?
जवाब – पहले एक ड्रेस सालों तक पहनते थे, अब नहीं. संगीत भी पिछले कुछ वर्षों से घुलमिल गया है, जिसे सही कर मुझे सबके बीच में लेकर आना है. मधुर संगीत का माहौल फिर से आयेगा.
टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupama) जहां फैंस के बीच अपने लेटेस्ट ट्रैक के चलते सुर्खियों में है तो वहीं हाल ही में समर के फैंस के लिए बुरी खबर सामने आई है. दरअसल, समर के रोल में नजर आने वाले एक्टर पारस कलनावत (Paras Kalnavat) को रातों रात अनुपमा के मेकर्स ने शो से बाहर कर दिया है. वहीं इसके चलते मेकर्स और एक्टर्स आमने-सामने आ गए हैं. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…
सामने आई वजह
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बीते दिनों जहां मीडिया में खबरें थीं कि समर यानी पारस कलनावत जल्द ही झलक दिखला जा 10 में नजर आने वाले हैं तो वहीं मेकर्स ने इस पर अपना फैसला सुनाते हुए एक्टर को शो से बाहर कर दिया है. वहीं इस खबर की पुष्टि करते हुए अनुपमा के निर्माता राजन शाही ने एक इंटरव्यू में कहा है कि ‘हम एक प्रोडक्शन हाउस के रूप में कॉन्ट्रैक्ट के उल्लंघन को स्वीकार नहीं करेंगे. इसी कारण हमने एक एक्टर के रूप में उनकी सेवाओं को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया है. हम उन्हें उनके भविष्य के लिए शुभकामनाएं देते हैं.‘
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एक्टर ने कही ये बात
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मेकर्स के बयान पर अपना पक्ष रखते हुए एक्टर पारस कलनावत ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘मैं झलक दिखला जा 10 को लेकर काफी उत्साहित हूं. हालांकि मैंने अब तक भी झलक दिखला जा 10 का कॉन्ट्रैक्ट साइन नहीं किया है. मेकर्स को लग रहा है कि मैंने उनके कोई बात छिपाई है. जबकि ऐसा नहीं है. मैं कॉन्ट्रैक्ट साइन होने के बाद मेकर्स को जरूर बताता. लेकिन मैं समझता हूं कि शायद मुझे पहले ही मेकर्स से बात कर लेनी चाहिए थी और फिर शो के बारे में सोचना चाहिए था. वहीं समर के किरदार को लेकर एक्टर ने कहा, बीते एक साल से मेरे रोल में करने के लिए कुछ खास नहीं था. शो में नए नए किरदार आ रहे हैं, जिसके चलते एक और परिवार दिखाया जा रहा है और समर की कोई जरूरत नहीं है. हालांकि मैं पहले ही समझ आ गया था कि अब मेरा किरदार जल्द ही खत्म होने वाला है.’
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बता दें, सीरियल में इन दिनों पाखी और अधिक के रिश्ते पर फोकस होते हुए दिख रहा है. वहीं शो के नए प्रोमो में अनुज को अनुपमा की जिंदगी से दूर होते हुए दिखाया जा रहा है, जिसके चलते फैंस काफी परेशान हैं. वहीं समर के शो से निकलने के बाद दर्शकों का क्या रिएक्शन होगा. यह बात देखने लायक होगी.
नोएडा में 81 साल का पेंटर मौरिस राइडर एक लड़की के साथ अपनी उंगली से सैक्स करता था. लड़की ने अपने पेरैंट्स को यह बात बताई और तब मामला पुलिस तक पहुंचा. पुलिस ने इस मुकदमे को डिजिटल रेप की धारा के तहत लिखा. इस के बाद यह डिजिटल रेप शब्द प्रचलन में आया. इस के पहले दिल्ली और मुंबई में 2 मामले पहले भी सामने आ चुके थे पर वे इतना चर्चा में नहीं आए थे.
लड़कियों के यौन अंगों से खेलने की कुत्सित मानसिकता रखने वाले यह सोचते थे कि रेप तभी माना जाएगा जब पुरुष का लिंग लड़की या महिला की वैजाइना में प्रवेश करे. कुत्सित मानसिकता वाले लोग छोटी लड़कियों की वैजाइना में उंगली डाल कर सैक्स का एहसास करते थे. कम उम्र की लड़की को यह सम झ ही नहीं आता था. ऐेसे में उन का अपराध छिप जाता था.
कई मामले ऐसे देखे गए जिन में अपराधी महिला की वैजाइना में कोई रौड या दूसरी चीज डाल कर उसे अपनी कुत्सित मानसिकता का शिकार बना लेता था. कई बार इस में औरत की जान तक चली जाती थी. दिल्ली में निर्भया के अंग में भी लोहे की रौड का प्रयोग किया गया था, जिस से उस की आतें फट गई थीं.
पहले इस तरह के अपराध को रेप नहीं माना जाता था. ऐसे में अपराधी सजा से छूट जाता था. अब कानून में बदलाव के बाद ऐसे अपराध को भी डिजिटल रेप माना जाएगा. रेप की परिभाषा में बदलाव से बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों में अब सजा हो सकेगी.
क्या होता है डिजिटल रेप
बात जब डिजिटल रेप की होती है तो आमतौर पर लोग यह सम झते हैं कि सोशल मीडिया पर नैकेड फोटो, वीडियो या अश्लील मैसेज कर के जब लड़की को परेशान किया जाता है तो उसे ‘डिजिटल रेप’ कहते हैं. इस की वजह यह है कि डिजिटल शब्द सामने आते ही सोशल मीडिया पर होने वाले यौन अपराध की तसवीर आंखों के सामने आ जाती है. डिजिटल रेप का मतलब रिप्रोडक्टिव और्गन के अलावा किसी अंग या औब्जैक्ट जैसे उंगली, अंगूठा या किसी वस्तु का यूज कर के जबरन सैक्स करना. इंग्लिश में डिजिट का मतलब अंक होता है. साथ ही उंगली, अंगूठा, पैर की उंगली जैसे शरीर के अंगों को भी डिजिट से संबोधित किया जाता है.
रेप और डिजिटल रेप में रिप्रोडक्टिव और्गन के इस्तेमाल का फर्क है. यह बात और है कि कानून की नजर में रेप और डिजिटल रेप में कोई फर्क नहीं. 2012 से पहले डिजिटल रेप छेड़छाड़ के दायरे में आता था. दिल्ली के निर्भया कांड के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों से निबटने वाले कानून को नई तरह से देखा गया. इस के बाद रेप की कैटेगरी में एक धारा और जोड़ी गई जिस को डिजिटल रेप कहा जाता है.
दिसंबर, 2012 में दिल्ली में निर्भया केस के बाद यौन हिंसा से जुड़े कानूनों की समीक्षा की गई थी. भारत के पूर्व चीफ जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता वाली कमेटी ने सु झाव दिए. इन में से कई सुझावों को अपनाते हुए दशकों पुराने कानून को बदला गया. 2013 में रेप की परिभाषा को फोर्स्ट पीनो वैजाइनल पेनिट्रेशन से बढ़ाया गया. नई परिभाषा के मुताबिक, महिला के शरीर में किसी भी चीज या शारीरिक अंग को जबरदस्ती डालना रेप माना गया.
डिजिटल रेप के मामले
डिजिटल रेप का पहला मामला मुंबई में आया, जहां 2 साल की मासूम के साथ इस तरह का अपराध किया गया. मुंबई में खून से लथपथ 2 साल की मासूम को अस्पताल लाया गया. जांच के बाद डाक्टरों ने पाया कि उस की बैजाइना में उंगलियों के निशान मिले. हालांकि इस दौरान यौन उत्पीड़न या रेप का कोई संकेत नहीं मिला था. बाद में पता चला कि उस का पिता ही बच्ची के साथ ऐसी हरकत करता था. इस के बाद उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन उसे आईपीसी की धारा 376 के तहत दंडित या आरोपित नहीं किया गया जो रेप से संबंधित है.
धारा 376 में बदलाव
मुंबई और दिल्ली में हुई 2 डिजिटल रेप की घटनाओं में आईपीसी की धारा 376 में खामियों को देखा और सम झा गया. डिजिटल रेप के तहत हुए अपराध में जिस में मूलरूप से उंगलियों या किसी बाहरी वस्तु या मानव शरीर के किसी अन्य हिस्से का यूज कर महिला की गरिमा के साथ खिलवाड़ किया गया था, लेकिन इसे किसी भी सैक्शन के तहत अपराध नहीं माना गया. इसी के बाद रेप की परिभाषा में बदलाव कर डिजिटल रेप को भी इस में शामिल किया, जिस के बाद इसे गंभीर अपराध माना लाने लगा.
इस का प्रभाव नोएडा में हुए डिजिटल रेप में देखने को मिला. नोएडा पुलिस ने 81 साल के स्कैच आर्टिस्ट को 17 साल की नाबालिग युवती के साथ डिजिटल रेप के आरोप में गिरफ्तार किया. पुलिस ने बताया कि पीडि़त युवती शुरू में शिकायत दर्ज कराने से डरती थी, लेकिन फिर उस ने आरोपी के यौन संबंधों को रिकौर्ड करना शुरू कर दिया और बड़े पैमाने पर सुबूत एकत्र किए. इस के बाद उस ने इस की जानकारी अपने पेरैंट्स को दी. पेरैंट्स की शिकायत पर पुलिस ने डिजिटल रेप का मामला दर्ज किया.
अगर आप नई डिश ट्राय करने के शौकीन हैं तो गोभी इन कौर्न ग्रेवी आपके लिए अच्छा औप्शन हैं, जिसे आप आसानी से अपनी फैमिली के लिए बना सकते हैं.
सामग्री
– 1 छोटा फूल गोभी
– 2 छोटे चम्मच कौर्नफ्लोर
– 1/2 कप टोमैटो प्यूरी
– 1/2 कप प्याज का पेस्ट
– 1 छोटा चम्मच अदरक का पेस्ट
– 2 हरीमिर्च बारीक कटी
– थोड़ा सी धनियापत्ती कटी
– 1/2 छोटा चम्मच जीरा
– 1 छोटा चम्मच धनिया पाउडर
– 1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर
– 1/2 छोटा चम्मच गरममसाला
– तेल आवश्यकतानुसार – नमक स्वादानुसार.
विधि
गोभी को टुकड़ों में काट कर नमक मिले पानी में हलका सा उबालें. कड़ाही में तेल गरम कर के उबली गोभी तल लें. फ्राईपैन में 1 बड़ा चम्मच तेल गरम कर के जीरा डालें. इस के तड़कने पर प्याज व अदरक पेस्ट मिला कर गुलाबी होने तक भूनें. टोमैटो प्यूरी, हरीमिर्च व सारे मसाले मिला कर चलाते हुए भूनें. कौर्नफ्लोर को थोड़े से पानी में घोलें और मसालों में मिला कर पकाएं. ग्रेवी गाढ़ी होने पर तली गोभी डाल कर 2 मिनट और पका लें. धनियापत्ती बुरक कर सर्व करें.
‘गूसीगूसी जैंडर…’ ‘जैक ऐंड जिल…’ ‘रिंग ए रिंग ओ रोसेज…’ ‘बाबा ब्लैक शीप…’ ‘लंदन ब्रिज इज फालिंग डाउन…’ ‘हंप्टीडंप्टी…’ ‘ईनीमीनी मो…’ ‘ओल्ड मदर हर्ब्ब्ड…’ ‘रब ए डबडब…’ ‘यानकी डूडली…’ ‘थ्री ब्लाइंड माइस…’
इस तरह की नर्सरी राइम्स भारत में भी पढ़ाई जाती हैं. जब भी घर में कोईर् आता है तो बच्चों को आंटी या अंकल के सामने राइम सुनाने पर खूब शाबाशी मिलती है, भले ही मातापिता या फिर घर आए मेहमान को उस राइम का मतलब समझ न आए.
इन्हें सिखाने पर जोर देने के पीछे सोच यह होती है कि ये गंग्लिश की नर्सरी राइम्स बच्चों की अंगरेजी की पकड़ और उन के अच्छे महंगे स्कूल का आभास देती हैं. मेहमान को इन इंग्लिश राइम्स को सुन कर पूछना ही होता है कि बच्चा कौन से स्कूल में पढ़ने जाता है. यह मौका रोब जमाने के लिए होता है.
पेरैंट्स को लगता है कि अगर उन के बच्चे ये राइम्स सीखते हैं तो तभी वे मौडर्न नजर आएंगे. वे दकियानूसी नहीं माने जाएंगे.
इंगलैंड की ब्रिस्टल रौयल बाल चिकित्सालय की टीम ने पाया कि टीवी कार्यक्रमों की तुलना में या पारंपरिक नर्सरी राइम्स में हिंसा 10 गुना ज्यादा होती है.
साहित्यिक इतिहासकारों की रोचक खोज है कि ‘बाबा ब्लैक शीप…’, ‘लंदन ब्रिज इज फालिंग…’ ‘हंप्टीडंप्टी…’ ‘जैक ऐंड जिल…’ ‘मैरीमैरी…’, ‘लिटिल बौय ब्लू…’, ‘ई वल्ड कौक रोबिन…’ ‘ब्लाइंड माइस…’, ‘सिंग ए सौंग औफ सिक्सपैंस…’, ‘इट्स रेनिंग इट पोरिंग…’, ‘गौंगीपौर्गी…’ जैसी प्रसिद्ध राइम्स नैगेटिव हैं.
ये राइम्स इंगलैंड व अमेरिका के सदियों पहले के दौर के रीतिरिवाजों, अत्याचारों, वेश्यावृत्ति, अंधविश्वास, असमानता व धार्मिक कुरूतियों के संदर्भ में गढ़ी गई थीं. ये अनैतिकता की जड़ हैं.
कुछ राइम्स पर एक नजर डालते हैं
बाबा ब्लैक शीप:
ऐसा माना जाता है कि यह राइम इंगलैंड के सामंती काल के जीवन की वास्तविकता पर आधारित है, जो भेड़ से निकले ऊन से संबंधित है. उस समय राजा के दरबारियों ने किसान से भारी ऊन कर वसूला. ऊन से भरा बैग किसानों से छीन कर पहले इलाके के लौर्ड को भेजा जाता था, फिर कुछ हिस्सा चर्च के पास और अंत में जो बचता था केवल वही किसान का होता था जो बेहद गरीबी में जीता था पर राजा और चर्च के गुण गाता था.
गूसीगूसी जैंडर…:
यह नर्सरी राइम भी इसी तरह की है. साहित्य के इतिहासकारों का मानना है कि यह राइम इंगलैंड के राजा हेनरी 8वें और बाद में इंगलैंड के सम्राट के समकक्ष ओलिवर क्रौंबेल के शासनकाल पर आधारित है. उस समय प्रोटैस्टैंट दबाव के कारण कैथोलिक भक्तों को प्रार्थना करने की अनुमति नहीं थी और कैथोलिक पुजारी बनना देशद्रोह बन गया था. इस वजह से कैथोलिक पुजारी तहखानों में छिप कर रहते थे. अगर वे प्रार्थना करते हुए पकड़े जाते थे तो सैनिक उन के पैरों को रस्सी से बांध कर सीढि़यों से नीचे गिरा देते थे. यह नर्सरी राइम इसी पर है जिस में प्रीस्ट को सीढि़यों से फेंकने की बात बच्चों को सिखाई जाती है.
लंदन ब्रिज इज फालिंग डाउन…:
इस राइम को पुल बनाने के काम से जोड़ा जाता है. इस की धुन से लगता है कि यह मस्ती से संबंधित है. लेकिन इस के पीछे का इतिहास कुछ और है. दरअसल, इस के निर्माताओं का मानना था कि ब्रिज को मजबूत रखने के लिए मानव बलि देनी होगी खासकर बच्चों की बलि, जिन की आत्माएं पुल की रक्षा करेंगी यानी लंदन ब्रिज से जोड़ कर इस राइम के पीछे बच्चों का बलिदान छिपा है.
हंप्टीडंप्टी…:
बच्चों की किताब में ‘हंप्टीडंप्टी…’ को एक बड़े से अंडे के रूप में दिखाया गया है, जो बच्चों की तरह कपड़े पहने हुए है. लेकिन यह एक दुखद कहानी है, जिस में ‘हंप्टीडंप्टी…’ न तो वास्तविक इंसान थे और न ही वे अंडे के आकार के थे बल्कि वह एक बड़ी तोप का नाम था जो काफी डरावनी व प्रभावशाली थी. उस का इस्तेमाल ब्रिटेन के गृहयुद्ध के दौरान किया गया था जब कोल्पेस्टर शहर पर राजा के दुश्मनों ने हमला किया था. तब ‘हंप्टीडंप्टी…’ को बाहर निकाला गया और चर्च की दीवार के ऊपर रखा गया. लेकिन दुश्मन दीवार को नष्ट करने में सफल हुए और ‘हंप्टीडंप्टी…’ के कई टुकडे़ हो गए. उन की फिर कभी मरम्मत नहीं हो सकी. इस राइस का भी बच्चों से कोई लेनादेना नहीं है.
जैक ऐंड जिल…:
इस राइम में फ्रांस के राजा लुई 16वें को जैक और उन की रानी मैरी एटोनेट को जिल के रूप में दिखाया गया है. यह भी बच्चों के खेल से संबंधित नहीं है बल्कि इस में यह बताया गया है कि कैसे जनता ने विद्रोह कर के पहले राजा जैक का मुकुट सिर काटा फिर उन की रानी जिल का सिर भी काट कर लटका दिया गया. सिर्फ यही नहीं, इस राइम के और भी कई अर्थ हैं जो बच्चों के विकास के लिए नहीं यूरोप अन्य कई घटनाओं पर आधारित हैं.
रिंग ए रिंग ओ रोजेस:
बच्चे इस राइम को गागा कर खेलते हैं. लेकिन यह राइम इंगलैंड में फैली प्लेग से संबंधित है. इस बीमारी में शरीर से एक अजीब सी दुर्गंध आती थी जिस से शरीर लाल हो जाता था और रैशेज हो जाते थे. उस समय इस दुर्गंध को कम करने के लिए लोग अपनी जेब में गुलाब के खुश्बूदार फूल व जड़ीबूटियां रखते थे. इस की आखिरी पंक्ति में मरने वालों के अंतिम संस्कार का उल्लेख है.
हियर वी गे अराउंड द मलबेरी बुश:
इस राइम का बच्चों से कोई लेनादेना नहीं है. इतिहासकार आर एस डंकन का कहना है कि इस राइम को इंगलैंड के वेकफील्ड जेल में महिला कैदी गाती थी, जब वह चांदनी रात में एक शहतूत के पेड़ के पास कसरत करती थीं.
मैरीमैरी क्वाइट कौंट्रेरी:
हमें लगता है कि यह राइम बागबानी से संबंधित है और इसी वजह से बच्चों को सिखाई जाती है, लेकिन वास्तव में यह राजा हेनरी 8वें की बेटी मैरी की क्रूरता पर आधारित है. मैरी कैथोलिक धर्म मानती थी और इसी वजह से वह प्रोटैस्टैंट भक्तों को मरवा डालती थी. ब्रिटेन में वैस ही ईसाई कैथोलिकों और ईसाई प्रोटैस्टों में मारकाट हुई जैसी हमारे यहां हिंदूमुसलिमों में हुई.
इन नर्सरी राइम्स का अर्थ नकारात्मकता, धार्मिक भेदभाव और क्रूरता को दर्शाता है. उदाहरण के तौर पर ‘जैक ऐंड जिल…’ में जैक का सिर काट कर शरीर से अलग कर दिया गया, ‘हंप्टीडंप्टी…’ में घातक चोट की बात की गई है, ‘रौक ए बाई बेबी…’ में पेड़ की शाखा से बच्ची को ?ाले के साथ धड़ाम से गिरते दिखाया गया है, ‘लंदन ब्रिज…’ में गिरता हुआ लंदन ब्रिज, ‘देयर वाज एन ओल्ड वूमन’ में जूते में रहने वाली बूढ़ी औरत अपने बच्चों को सजा देती है, ‘गूसीगूसी जैंडर…’ में कैथोलिक प्रार्थना करने पर सीढि़यों से नीचे धकेलना, ‘पीटरपीटर…’ में पत्नी की हत्या कर कद्दू में दफनाने जैसी घटनाओं का जिक्र है.
धर्म का महिमामंडन: दुनियाभर के देशों में छोटे बच्चों को स्कूलों में नर्सरी राइम्स सिखाई जा रही हैं जबकि ‘गूसीगूसी जैंडर…’ ‘थ्री ब्लाइंड माइस…’ ‘मैरीमैरी…’ राइम्स धार्मिक शोषण पर आधारित हैं, जिन से बच्चे नर्सरी क्लास से ही धर्म के प्रति नफरत की भावना रखना शुरू कर देते हैं.
आज भी पूरी दुनिया में धर्म के नाम पर हिंसा हो रही है. वह चाहे कश्मीर में पत्थरबाजी हो या अमेरिका में नस्लवादी घटनाएं, इन की जड़ों में बच्चों में जानेअनजाने धार्मिक प्रचार ही है.
इस तरह की राइम्स से बच्चों के दिमाग में सब से पहला सवाल यह आता है कि कैथोलिक कौन होते हैं और प्रोटैस्टैंट कौन. आप उन्हें जो भी बताएं वे उस के आधार पर अपने दोस्तों से भी पूछते हैं कि वे क्या हैं. इस से उन के बीच भेदभाव पैदा होता है. वे एकदूसरे से नफरत करने लगते हैं? जबकि नर्सरी राइम्स का उद्देश्य यह होना चाहिए कि वे बच्चों को मानवता का गुण सिखाएं, जिन में व्यक्ति को प्यार करने, आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने की बात हो. उन में धर्म, नस्ल, जाति, रंग कहीं आड़े न आए.
केवल धर्म ही नहीं, अधिकांश राइम्स में तो लड़कों को ऊर्जावान, साहसी, महत्त्वाकांक्षी व मजबूत रूप में प्रस्तुत किया गया है, जबकि लड़कियों को कमजोर व शांत दिखाया गया है, जैसे ‘जैक ऐंड जिल…’ में जिल को पुरुषप्रधान समाज की एक कमजोर लड़की के रूप में दिखाया गया है. ‘मैरी हैड ए लिटिल लैंब…’ में मैरी की तुलना एक मेमने से की गई है. इसी तरह ‘पौली पुट द कैटल औन…’ में कहा गया है कि पौली की जगह किचन में है. उस के भाई बाहर जा कर खेल सकते हैं, जबकि वह किचन में ही अपनी सहेलियों के साथ चाय पार्टी करती है. इस राइम में यह बताया गया है कि लड़कियों की जगह किचन में ही है, वे घर से बाहर नहीं निकल सकतीं.
नर्सरी राइम्स की विचित्रता यहीं समाप्त नहीं होती बल्कि ‘चब्बी चीक्स…’ नर्सरी राइम से लड़कियों को ऐसा लगने लगता है कि यदि उन के होंठ गुलाबी, रंग गोरा, डिंपल, चिन व घुंघराले बाल नहीं हैं तो वे सुंदर नहीं हैं.
जैंडर डिस्क्रिमिनेशन वाली राइम्स सिखा कर लड़कियों के दिमाग में हीनभावना भरी जा रही है कि वे कमजोर हैं, जबकि आज के समय में लड़कियां किसी भी काम में लड़कों से कम नहीं हैं.
ऐसा नहीं है कि केवल इंग्लिश राइम्स ही ऐसी हैं. हमारे देश की भाषाओं में भी इस तरह की कविताओं की मिसालें मिलती हैं जिन में धर्म, पूजापाठ, प्रार्थना, अंधविश्वास का वर्णन किया गया है. जैसे-
‘हे भगवान तुझे प्रणाम…’ ‘तेरे बच्चे हम हो सचे…’ ‘पढ़ेंगेलिखेंगे योग्य बनेंगे…’ काम करेंगे नहीं डरेंगे…’ ‘नित्य बढ़ेंगे बढ़े चलेंगे…’ ‘दो वरदान हे भगवान…’
जब आप इस तरह की कविताएं बच्चों को सिखाते हैं तो उन के दिमाग में यह बात बैठ जाती है कि अगर वे भगवान से प्रार्थना करेंगे तो परीक्षा में पास हो जाएंगे, जबकि आप को भी पता है सफलता इन चीजों से नहीं बल्कि मेहनत व लगन से मिलती है. फिर बच्चे को ऐसी चीजें सिखाने का क्या फायदा?
महिलाओं को कई बार अचानक अपने ब्रेस्ट साइज में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है. दरअसल, अचानक से यदि ब्रेस्ट का साइज बढ़ने लगे, तो महिलाएं शर्मिदा होने लगती है, लेकिन ये शर्मिदा होने वाली नहीं बल्कि बीमारी का संकेत होता है. मेडिकल की भाषा में इस समस्या को गिगेंटोमैस्टिया या ब्रेस्ट हाइपरट्रॉफी कहते हैं. ये एक दुर्लभ कंडीशन है, इसके सिर्फ कुछ ही मामले सामने आते हैं. हालांकि, इसके कारण अभी पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन फिर भी कुछ लक्षण और कारण ऐसे होते हैं, जिनसे इस समस्या का पता लगाया जा सकता है तो जानते हैं ब्रेस्ट के साइज के बड़े होने के कारण और लक्षण, साथ में इलाज को भी जान लेते है
आपको जानकार यह आश्चर्य होगा कि ब्रेस्ट एन्हांसमेंट को एक ब्यूटी समझी जाती है, अधिकतर सेलेब्स इसे करवाकर खुद को आकर्षक और सेक्सी बनाती है, जिसमें शिल्पा शेट्टी, बिपाशा बासु, कंगना रनौत, आयशा टाकिया, सुस्मिता सेन आदि कई अभिनेत्रियाँ है, जो खुद की सुन्दरता को बनाए रखने के लिए इस तरह की सर्जरी करवाती है. हालाँकि इसका ट्रेंड हॉलीवुड से आया है, जहाँ किमकार्दासिया ने ब्रैस्ट एन्हांसमेंट कर अपनी खूबसूरती में 4 चाँद लगवाए, लेकिन अगर जरुरत से ज्यादा स्तन बढने लगे, तो समझ लेना पड़ता है कि ये कोई बीमारी है
मुंबई की 17 साल की रौशनी को कम उम्र में अचानक स्तन का आकार बढ़ने लगा पहले उसने इस पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया, लेकिन कुछ दिनों बाद उसे इतनी समस्या होने लगी कि वह कॉलेज जाना अवॉयड करने लगी. पहले माँ को समझना मुश्किल था कि वह ऐसा क्यों कर रही है, पर बाद में बहुत पूछने पर पता चला, तो कॉस्मेटिक सर्जन के पास जाने पर डॉक्टर ने बताया कि ये ब्यूटी नही,गिगेंटोमैस्टियाएक बीमारी है, जिसके लिएदवा या सर्जरी करनी पड़ती है.
इसके अलावा, बहुत ज्यादा बड़े ब्रेस्ट के परिणामस्वरूप मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक समस्याएं हो सकती है.
असल में गिगेंटोमैस्टिया एक दुर्लभ बीमारी है, जो महिलाओं को प्रभावित करती है, जिसमें किशोर, गर्भावस्था और बढते उम्र में स्तन वृद्धि की समस्या दिखाई देती है.गिगेंटोमैस्टिया एक बहुत ही दुर्लभ बीमारी है, जहां ब्रेस्ट बहुत अधिक बढ़ जाते है. अपोलो स्पेक्ट्रा अस्पताल के ब्रेस्ट सर्जन डॉ. नीरजा गुप्ता ने ब्रेस्ट रिडक्शन सर्जरी ने मेडिकल लिटरेचर में अभी तक इसके केवल 200 मामले ही दर्ज किए गए है, ज्यादातर यह हार्मोन के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता के कारण होता है और कई बार गर्भावस्था के बाद स्तन वापस सामान्य आकार में नहीं आते है.कुछ लक्षण निम्न है,
लक्षण
अपने अनुभव के बारें में डॉ. नीरजा कहती है कि गिगेंटोमैस्टिया नामक इस दुर्लभ बीमारी से स्तन के बढ़ने के कारण दिल्ली में रहनेवाली एक 40 उम्र के निशा अरोड़ा को चलने में दिक्कत आ रही थी. 40 वर्षीय महिला के स्तन का आकार बढता जा रहा था. 5 साल पहले डिलिवरी के बाद यह समस्या अधिक होने लगी थी, लेकिन महिला ने इसे नजरअंदाज किया, बढते स्तन के कारण महिला को गर्दन और पीठ दर्द, कंधे में दर्द और चलने में कठिनाई होने लगी थी.डॉ गुप्ता आगे कहती है कि “गिगेंटोमैस्टिया एक जेंटल यानि सौम्य (गैर-कैंसरयुक्त) स्थिति है. यह बिमारी यौवन या फिर गर्भावस्था के दौरान हो सकती है. यह एक ऐसी स्थिती है, जिसमें स्तन का आकार बढता जाता है. यह एक या दोनों स्तनों को प्रभावित कर सकता है. स्तनों के बढ़ने से महिला का आत्मविश्वास कम होने लगता है.
कुछ कारण निम्न है,
इलाज
डॉ गुप्ता ने कहा, “गिगेंटोमैस्टिया के इलाज के लिए सबसे प्रभावी तरीका दवा और सर्जरी है, लेकिन इसमें सर्जरी फायदेमंद साबित हो सकती है. सर्जरी करने से पहले मैमोग्राम, यूएसजी, स्तनों का एमआरआई, सीरम थायरॉयड फंक्शन टेस्ट, सीरम प्रोलैक्टिन, ऑस्ट्राडियोल और टेस्टोस्टेरोन का स्तर की जाँच करना जरूरी है. सर्जरी द्वारा 40 साल के महिला के दोनों तरफ से लगभग 1000 ग्राम निकाला गया हैं. यह सर्जरी 4.5 घंटे तक चली. मरीज के सेहत में सुधार देखकर सर्जरी के अगले दिन उसे डिस्जार्च दिया गया हैं.
अनुभव
असल में निशा अरोड़ा की दूसरे बच्चे की डिलीवरी के बाद स्तन का बढ़ना शुरू हुआ.स्तन बढ़कर नाभि के नीचे तक आ गया था. स्तन का वजन उन पर आ गया था, बढते स्तन के कारण ब्रा खरीदना, पीठ के बल सोना और सामान लेने के लिए नीचे झुकना काफी मुश्किल हो गया था. इस बीमारी ने उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रभावित किया था. स्तन दर्द, पीठ दर्द, आत्मसम्मान खोना, कंधे और गर्दन में दर्द, थकान, सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी. शर्म के कारण मैं घर में बाहर नही निकलती थी. असामान्य स्तनोंके साथ अकेले रहना बिलकुल भी आसान नहीं था.शर्मिंदगी और अपमान का शिकार होना पड़ता था. मैंने डॉक्टर की परामर्श से इलाज करवाने पर अब बहुत राहत है 40 बी से अब 32 बी साइज़ की ब्रा का उपयोग कर रही हूँ. मैं अब चल सकती हूं और खुलकर सांस ले सकती हूँ मैंने अपनी दैनिक गतिविधियों को आसानी से करना शुरू कर दिया है.
समय से करवाएं इलाज
गिगेंटोमैस्टिया यह आनुवंशिक बिमारी नही है.इस बिमारी का इलाज जोखिम भरा नहीं हैं, लेकिन निदान व इलाज समय रहते नही हुआ, तो यह शारीरिक, मनोसामाजिक और शरीर की छवि से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता हैं. हार्मोनल असंतुलन के कारण स्तन का आकार बढता जाता हैं. इसपर सर्जरीही एकमात्र उपचार हैं, लेकिन सर्जरी के बाद सावधानियां बरतनी काफी जरूरी हैं, जैसे बार-बार स्तन की जांच करवाना, स्तन के आकार में कुछ बदलाव दिखाई पड़े तो डॉक्टर के पास जाना आदि इस इलाज के बाद व्यक्ति साधारण तरीके से अपनी जिंदगी गुजार सकता है.
अनन्या पांडे ने 2019 में तारा सुतारिया के साथ टाइगर श्रौफ के अपोजिट अपना फिल्मी डेब्यू ‘स्टूडैंट औफ द ईयर 2’ से किया था. इतने कम समय में अपने चुलबुले और स्टाइलिश लुक की वजह से उन्होंने काफी फैन फौलोइंग बना ली है, खासकर यंग जैनरेशन उन्हें बहुत पसंद करती है. अनन्या ऐक्टिंग के साथसाथ अपनी फैशन सैंस को ले कर भी काफी चर्चा में रहती हैं. कुछ फैशन टिप्स जो आप उन से सीख सकती हैं:
कौकटेल ड्रैस के जलवे:
अनन्या अकसर कौकटेल ड्रैस में नजर आती हैं. वे इसे मौके के हिसाब से हील्स और ऐक्सैसरीज के साथ पार्टीवियर बना लेती हैं और कभी डैनिम और स्नीकर के साथ कैजुअल रूप में दिखती हैं.
मोनोक्रोमैटिक मेकअप:
मोनोक्रोमैटिक मेकअप लुक थोड़ा मुश्किल होता है क्योंकि इस में आंखों, गालों और होंठों के लिए एक ही कलर पैलेट का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन अनन्या को हम कई बार खूबसूरती से बैलेंस किए गए इस लुक में देखते हैं. यह उन का हौट स्टाइल है. उदाहरण के लिए आप पीच, पिंक और न्यूड शेड्स का इस्तेमाल कर के यह लुक पा सकती हैं. पीच आईशैडो, पिंक गालों और न्यूड लिप्स के साथ आप का लुक बहुत इंप्रैसिव और डिफरैंट नजर आएगा. इस तरह के कई कलर कौंबिनेशन किए जा सकते हैं. इस लुक में हेयरस्टाइल के साथ भी ऐक्सपैरिमैंट किए जा सकते हैं.
बेबी हेयर:
अनन्या को अलगअलग हेयरस्टाइल ट्राई करना बहुत पसंद है. फिर चाहे वह ग्लैमरस पोनीटेल्स हो या फिर फिशटेल ब्रेड्स. वैसे अनन्या की पहली पसंद है अच्छी तरह ब्लो ड्राई किए हुए बेबी हेयर. यह हेयरस्टाइल हर तरह के आउटफिट्स और लुक्स के साथ अच्छा लगता है.
हाइड्रेटेड स्किन:
एक अच्छा स्किनकेयर रूटीन और खूब पानी पीना स्किन के लिए बहुत फायदेमंद साबित होता है और अनन्या इस बात का पूरा खयाल रखती हैं. यही वजह है कि वे अपनी नैचुरल स्किन में भी फ्लालैस और ग्लोइंग लगती हैं. उन की स्किन पर एक अलग सी चमक दिखती है.